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स्वर्ग

From जैनकोष

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देवों के चार भेदों में एक वैमानिक देव नाम का भेद है। ये लोग ऊर्ध्वलोक के स्वर्ग विमानों में रहते हैं तथा बड़ी विभूति व ऋद्धि आदि को धारण करने वाले होते हैं। स्वर्ग के दो विभाग हैं-कल्प व कल्पातीत। इन्द्र सामानिक आदि रूप कल्पना भेद युक्त देव जहाँ तक रहते हैं उसे कल्प कहते हैं। वे १६ हैं। इनमें रहने वाले देव कल्पवासी कहलाते हैं। इसके ऊपर इन सब कल्पनाओं से अतीत, समान ऐश्वर्य आदि प्राप्त अहमिन्द संज्ञावाले देव रहते हैं। वह कल्पातीत है। उनके रहने का सब स्थान स्वर्ग कहलाता है। इसमें इन्द्रक व श्रेणीबद्ध आदि विमानों की रचना है। इनके अतिरिक्त भी उनके पास घूमने फिरने को विमान है, इसीलिए वैमानिक संज्ञा भी प्राप्त है। बहुत अधिक पुण्यशाली जीव वहाँ जन्म लेते हैं, और सागरों की आयु पर्यन्त दुर्लभ भोग भोगते हैं।

  1. वैमानिक देवों के भेद व लक्षण
    1. वैमानिक का लक्षण।
    2. कल्प का लक्षण।
    3. कल्प व कल्पातीत रूप भेद व उनके लक्षण।
    4. कल्पातीत देव सभी अहमिन्द्र होते हैं।
  2. वैमानिक देव सामान्य निर्देश
    1. मोक्ष जाने की योग्यता सम्बन्धी नियम।
    • मार्गणा व गुणस्थान आदि २० प्ररूपणाएँ-देखें - सत् ।
    • सत् संख्या क्षेत्र आदि आठ-प्ररूपणाएँ।-देखें - वह -वह नाम।
    • अवगाहना व आयु।-देखें - वह -वह नाम।
    • सम्भव कषाय, वेद, लेश्या, पर्याप्ति।-देखें - वह -वह नाम।
    • सम्भव कर्मों का बन्ध उदय सत्त्व।-देखें - वह -वह नाम।
    • जन्म, शरीर, आहार, सुख, दु:ख आदि।- देखें - देव / II / २
    • कहाँ जन्मे और क्या गुण प्राप्त करे।- देखें - जन्म / ६
  3. वैमानिक इन्द्रों का निर्देश
    1. नाम व संख्या आदि का निर्देश।
    2. दक्षिण व उत्तर इन्द्रों का विभाग।
    3. इन्द्रों व देवों के आहार व श्वास का अन्तराल।
    • विमानों के भेद-वैक्रियक व स्वाभाविक-देखें - विमान।
    1. इन्द्रों के चिह्न व यान विमान।
    2. इन्द्रों व देवों की शक्ति व विक्रिया।
    3. वैमानिक इन्द्रों का परिवार।
      1. सामानिक आदि देवों की अपेक्षा।
      2. देवियों की अपेक्षा।
    4. इन्द्रों के परिवार देवों की देवियाँ।
    5. इन्द्रों के परिवार, देवों का परिवार विमान आदि।
  4. वैमानिक देवियों का निर्देश
    1. इन्द्रों की प्रधान देवियों के नाम।
    2. देवियों की उत्पत्ति व गमनागमन सम्बन्धी नियम।
  5. स्वर्गलोक का निर्देश
    1. स्वर्गलोक सामान्य निर्देश।
    2. कल्प व कल्पातीत विभाग निर्देश।
    3. स्वर्गों में स्थित पटलों के नाम व उनमें स्थित इन्द्रक व श्रेणीबद्ध।
    4. श्रेणीबद्धों के नाम।
    5. स्वर्गों में विमानों की संख्या।
      1. बारह इन्द्रों की अपेक्षा।
      2. चौदह इन्द्रों की अपेक्षा।
    6. विमानों के वर्ण व उनका अवस्थान।
    7. दक्षिण व उत्तर कल्पों में विमानों का विभाग।
    8. दक्षिण व उत्तर इन्द्रों का निश्चित निवास स्थान।
    9. इन्द्रों के निवासभूत विमानों का परिचय।
    10. कल्पविमानों व इन्द्र भवनों के विस्तारादि।
    11. इन्द्र नगरों का विस्तार आदि।

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