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अनेकान्त

From जैनकोष

वस्तुमें एक ही समय अनेकों क्रमवर्ती व अक्रमवर्ती विरोधी धर्मों, गुणों, स्वभावों व पर्यायोंके रूपमें-भली प्रकार प्रतीति के विषय बन रहे हैं। जो वस्तु किसी एक दृष्टिसे नित्य प्रतीत होती है वही किसी अन्य दृष्टिसे अनित्य प्रतीत होती है, जैसे व्यक्ति वहका वह रहते हुए भी बालकसे बूढ़ा और गँवारसे साहब बन जाता है। यद्यपि विरोधी धर्मोंका एक ही आधारमें रहना साधारण जनोंको स्वीकार नहीं हो सकता पर विशेष विचारकजन दृष्टिभेदकी अपेक्षाओं को मुख्य गौण करके विरोधमें भी अविरोधका विचित्र दर्शन कर सकते हैं। इसी विषयका इस अधिकारमें कथन किया गया है।

  1. भेद व लक्षण
  1. अनेकान्तसामान्यका लक्षण।
  2. अनेकान्तके दो भेद (सम्यक् व मिथ्या)।
  3. सम्यक् व मिथ्या अनेकान्तके लक्षण।
  4. क्रम व अक्रम अनेकान्तके लक्षण।
  1. अनेकान्त निर्देश
  1. अनेकान्त छल नहीं है।
  2. अनेकान्त संशयवाद नहीं है।
  • अनेकान्त प्रमाणस्वरूप है। - देखे नय I/२।
  1. अनेकान्तके बिना वस्तुकी सिद्धि नहीं होती।
  2. किसी न किसी रूपमें सब अनेकान्त मानते हैं।
  3. अनेकान्त भी अनेकान्तात्मक है।
  4. अनेकान्तमें सर्व एकान्त रहते हैं पर एकान्तमें अनेकान्त नहीं रहता।
  5. निरपेक्ष नयोंका समूह अनेकान्त नहीं है।
  6. अनेकान्त व एकान्त का समन्वय।
  • सर्व दर्शन मिलकर एक जैनदर्शन बन जाता है। - देखे अनेकान्त २/६।
  • एवकारका प्रयोग व कारण आदि। - देखे एकान्त २।
  • स्यात्कारका प्रयोग व कारण आदि। - देखे [[स्याद्वाद <]] /LI>
  1. सर्व एकान्तवादियोंके मत किसी न किसी नयमें गर्भित हैं।
  1. अनेकान्तका कारण व प्रयोजन
  1. अनेकान्तके उपदेशका कारण।
  • शब्द अल्प है और अर्थ अनन्त।
  1. अनेकान्तके उपदेशका प्रयोजन।
  2. अनेकान्तवादियोंको कुछ भी कहना अनिष्ट नहीं।
  3. अनेकान्तकी प्रधानता व महत्ता।
  1. वस्तुमें विरोधी धर्मोंका निर्देश
  1. वस्तु अनेकों विरोधी धर्मोंसे गुम्फित है।
  2. वस्तु भेदाभेदात्मक है।
  3. सत् सदा अपने प्रतिपक्षीकी अपेक्षा रखता है।
  4. स्व सदा परकी अपेक्षा रखता है।
  5. विधि सदा निषेधकी अपेक्षा रखती है।
  6. वस्तुमें कुछ विरोधी धर्मोंका निर्देश।
  7. वस्तुमें कथंचित् स्व-पर भाव निर्देश।
  1. विरोधमें अविरोध
  • वस्तुके विरोधी धर्मोंमें कथंचित् विधि निषेध व भेदाभेद। - देखे सप्तभंगी ५।
  • अनेकान्तके स्वरूपमें कथंचित् विधि निषेध। - देखे सप्तभंगी ३।
  1. विरोधी धर्म रहनेपर भी वस्तुमें कोई विरोध नहीं पड़ता।
  2. सभी धर्मोंमें नहीं बल्कि यथायोग्य धर्मोंमें ही अविरोध है।
  3. अपेक्षाभेदसे विरोध सिद्ध है।
  4. वस्तु एक अपेक्षासे एकरूप है और अन्य अपेक्षासे अन्यरूप है।
  5. नयोंको एकत्र मिलानेपर भी उनका विरोध कैसे दूर होता है।
  6. विरोधी धर्मोंमें अपेक्षा लगानेकी विधि।
  7. विरोधी धर्म बतानेका प्रयोजन।
  • अपेक्षा व विवक्षा प्रयोग विधि। - देखे स्याद्वाद
  • नित्यानित्य पक्षमें विधि निषेध व समन्वय। - देखे उत्पाद, व्यय ध्रौव्य २।
  • द्वैत व अद्वैत अथवा भेद व अभेद अथवा एकत्व व पृथक्त्व पक्षमें विधि निषेध व समन्वय। - देखे द्रव्य ४।
  1. भेद व लक्षण
  1. अनेकान्त सामान्यका लक्षण

धवला पुस्तक संख्या १५/२५/१ को अणेयंतो णाम। जच्चंतरत्तं।

= अनेकान्त किसको कहते हैं? जात्यन्तरभावको अनेकान्त कहते हैं (अर्थात् अनेक धर्मों या स्वादोंके एकरसात्मक मिश्रणसे जो जात्यन्तरपना या स्वाद उत्पन्न होता है, वही अनेकान्त शब्दका वाच्य है)।

समयसार / आत्मख्याति परिशिष्ट यदेव तत्तदेवातत्, यदेवैकं तदेवानेकं, यदेव सत्तदेवासत्, यदेव नित्यं तदेवानित्यसित्येकवस्तुनि वस्तुत्वनिष्पादकपरस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमनेकान्तः।

= जो तत् है वही अतत् है, जो एक है वही अनेक है, जो सत् है वही असत् है, जो नित्य है वही अनित्य है, इस प्रकार एक वस्तुमें वस्तुत्वकी उपजानेवाली परस्पर विरुद्ध दो शक्तियोंका प्रकाशित होना अनेकान्त है।

(और भी देखो आगे सम्यगनेकान्तका लक्षण)।
न्यायदीपिका अधिकार ३/$७६ अनेके अन्ता धर्माः सामान्यविशेषपर्याया गुणा यस्येति सिद्धोऽनेकान्तः।

= जिसके सामान्य विशेष पर्याय व गुणरूप अनेक अन्त या धर्म हैं, वह अनेकान्त रूप सिद्ध होता है।

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ३०/२)।

  1. अनेकान्तके दो भेद-सम्यक् व मिथ्या

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,७/३५/२३ अनेकान्तोऽपि द्विविधः-सम्यगनेकान्तो मिथ्याऽनेकान्त इति।

= अनेकान्त भी दो प्रकारका है - सम्यगनेकान्त व मिथ्या अनेकान्त।

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ७३/१०)।

  1. सम्यक् व मिथ्या अनेकान्तके लक्षण
  1. सम्यगनेकान्तका लक्षण

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,७/३५/३६ एकत्र सप्रतिपक्षानेकधर्मस्वरूपनिरूपणो युक्त्यागमाभ्यामविरुद्धः सम्यगनेकान्तः।

= युक्ति व आगमसे अविरुद्ध एक ही स्थानपर प्रतिपक्षी अनेक धर्मोंके स्वरूपका निरूपण करना सम्यगनेकान्त है।

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ७४/२)।

  1. मिथ्या अनेकान्तका लक्षण

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,७/३५/२७ तदतत्स्वभाववस्तुशून्यं परिकल्पितानेकात्मकं केवलं वाग्विज्ञानं मिथ्यानेकान्तः।

= तत् व अतत् स्वभाववस्तुसे शून्य केवल वचन विलास रूप परिकल्पित अनेक धर्मात्मक मिथ्या अनेकान्त है।

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ७४/३)।

  1. क्रम व अक्रम अनेकान्तके लक्षण

प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा संख्या १४१/२००/९ तिर्यक्प्रचयाः तिर्यक्सामान्यमिति विस्तारसामान्यमिति अक्रमानेकान्त इति च भण्यते। .....ऊर्ध्वप्रचय इत्यूद्र्ध्वसामान्यमित्यायतसामान्यमिति क्रमानेकान्त इति च भण्यते।

= तिर्यक्प्रचय, तिर्यक् सामान्य, विस्तार सामान्य और अक्रमानेकान्त यह सब शब्द तिर्यक् प्रचयके नाम हैं और इसी प्रकार ऊर्ध्व प्रचय, ऊर्ध्व सामान्य, आयतसामान्य तथा क्रमानेकान्त ये सब शब्द ऊर्ध्व प्रचयके वाचक हैं। (अर्थात् वस्तुका गुणसमूह अक्रमानेकान्त है, क्योंकि गुणोंकी वस्तुमें युगपत् वृत्ति है और पर्यायोंका समूह क्रमानेकान्त है, क्योंकि पर्यायोंकी वस्तुमें क्रमसे वृत्ति है।

  1. अनेकान्त निर्देश
  1. अनेकान्त छल नहीं है

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,८/३६/१ स्यान्मतम्-`तदेवास्ति तदेव नास्ति तदेव नित्यं तदेवानित्यम्' इति चानेकान्तप्ररूपणं छलमात्रमिति, तन्नः, कुतः। छललक्षणाभावात्। छलस्य हि लक्षणमुक्तम्-"वचनाविधातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम् यथा नवकम्बलोऽयम् इत्यविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पनम् नवास्य कम्बला न चत्वारः इति, नवो वास्य कम्बलो न पुराणः" इति नवकम्बलः। न तथानेकान्तवादः। यत उभयनयगुणप्रधानभावापादितार्पितानर्पितव्यवहारसिद्धिविशेषबललाभप्रापितयुक्तिपुष्कलार्थः अनेकान्तवादः।

=
प्रश्न - `वही वस्तु है और वही वस्तु नहीं है, वही वस्तु नित्य है और वही वस्तु अनित्य है, इस प्रकार अनेकान्तका प्ररूपण छल मात्र है? = उत्तर-अनेकान्त छल रूप नहीं है, क्योंकि, जहाँ वक्ताके अभिप्रायसे भिन्न अर्थकी कल्पना करके वचन विघात किया जाता है, वहाँ छल होता है। जैसे `नवकम्बलो देवदत्तः' यहाँ `नव' शब्दके दो अर्थ होते हैं। एक ९ संख्या और दूसरा नया। तो `नूतन' विवक्षा कहे गये `नव' शब्दका ९ संख्या रूप अर्थ विकल्प करके वक्ताके अभिप्रायसे भिन्न अर्थकी कल्पना छल कही जाती है। किन्तु सुनिश्चित मुख्य गौण विवक्षासे सम्भव अनेक धर्मोंका सुनिर्णीत रूपसे प्रतिपादन करनेवाला अनेकान्तवाद छल नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें वचनविघात नहीं किया गया है, अपितु यथावस्थित वस्तुतत्त्वका निरूपण किया गया है।

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ७९/१०)।

  1. अनेकान्त संशयवाद नहीं है

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,९-१२/३६/८ स्यान्मतम्-संशयहेतुरनेकान्तवादः। कथम्। एकत्राधारे विरोधिनोऽनेकस्यासम्भवात्। ....तच्च न; कस्मात्। विशेषलक्षणोपलब्धेः। इह सामान्यप्रत्यक्षाद्विशेषस्मृतेश्च संशयः। ....न च तद्वदनेकान्तवादे विशेषानुलब्धिः, यतः स्वरूपाद्यादेशवशीकृता विशेषा उक्ता वक्तव्याः प्रत्यक्षमुपलभ्यन्ते। ततो विशेषोपलब्धेर्न संशयहेतुः ।।९।। विरोधाभावात् संशयाभावः ।।१०।। ....उक्तादर्पआभेदाद् एकत्राविरोधेनावरोधो धर्माणां पितापुत्रादिसंबन्धवत् ।।११।। सपक्षासपक्षापेक्षोपलक्षितसत्त्वासत्त्वादिभेदोपचितैकधर्मवद्वा ।।१२।।

=
प्रश्न - अनेकान्तसंशयका हेतु है, क्योंकि एक आधारमें अनेक विरोधी धर्मोंका रहना असम्भव है?
उत्तर - नहीं, क्योंकि यहाँ विशेष लक्षणकी उपलब्धि होती है। ....सामान्य धर्मका प्रत्यक्ष होनेसे विशेष धर्मोंका प्रत्यक्ष न होनेपर किन्तु उभय विशेषोंका स्मरण होनेपर संशय होता है। जैसे धुँधली रात्रिमें स्थाणु और पुरुषगत ऊँचाई आदि सामान्य धर्मकी प्रत्यक्षता होनेपर, स्थाणुगत पक्षी-निवास व कोटर तथा पुरुषगत सिर खुजाना, कपड़ा, हिलना आदि विशेष धर्मोंके न दिखनेपर किन्तु उन विशेषोंका स्मरण रहनेपर ज्ञान दो कोटिमें दोलित हो जाता है, कि यह स्थाणु है या पुरुष। इसे संशय कहते हैं। किन्तु इस भाँति अनेकान्तवादमें विशेषोंकी अनुपलब्धि नहीं है। क्योंकि स्वरूपादिकी अपेक्षा करके कहे गये और कहे जाने योग्य सर्व विशेषोंकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। इसलिए अनेकान्त संशयका हेतु नहीं है ।।९।। इन धर्मोंमें परस्पर विरोध नहीं है, इसलिए भी संशयका अभाव है ।।१०।। पिता-पुत्रादि सम्बन्धवत् मुख्यगौण विवक्षासे अविरोध सिद्ध है (देखो आगे अनेकान्त ५) ।।११।। तथा जिस प्रकार वादी या प्रतिवादीके द्वारा प्रयुक्त प्रत्येक हेतु स्वपक्षकी अपेक्षा साधक और परपक्षकी अपेक्षा दूषक होता है, उसी प्रकार एक ही वस्तुमें विविध अपेक्षाओंसे सत्त्व-असत्त्वादि विविध धर्म रह सकते हैं, इसलिए भी विरोध नहीं है ।।१२।।

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ८१-९३। आठ दोषोंका निराकरण)।

  1. अनेकान्तके बिना वस्तुकी सिद्धि नहीं होती

व.स्ती./२२,२४,२५ अनेकमेकं च तदेव तत्त्वं, भेदान्वयज्ञानमिदं हि सत्यम्। मृषोपचारोऽन्यतरस्य लोपे, तच्छेषलोपोऽपि ततोऽनुपाख्यम् ।।२२।। न सर्वथा नित्यमुदेत्यपैति, न च क्रियाकारकमत्र युक्तम्। नैवासतो जन्म सतो न नाशो, दीपस्तमः पुद्गलभावतोऽस्ति ।।२४।। विधिर्निषेधश्चकथंचिदिष्टौ, विवक्षया मुख्यगुणव्यवस्था ।।२५।।

= वह सुयुक्तिनीतवस्तुतत्त्व भेद-अभेद ज्ञानका विषय है और अनेक तथा एक रूप है। भेद ज्ञानसे अनेक और अभेद ज्ञानसे एक है। ऐसा भेदाभेद ग्राहक ज्ञान ही सत्य है। जो लोग इनमें-से एकको ही सत्य मानकर दूसरेमें उपचारका व्यवहार करते हैं वह मिथ्या है, क्योंकि दोनों धर्मोंमें-से एकका अभाव माननेपर दूसरेका ही अभाव हो जाता है। दोनोंका अभाव हो जानेपर वस्तुतत्त्व अनुपाख्य अर्थात् निःस्वभाव हो जाता है ।।२२।। यदि वस्तु सर्वथा नित्य हो तो वह उदय अस्तको प्राप्त नहीं हो सकती और न उसमें क्रियाकारककी ही योजना बन सकती है। जो सर्वथा असत है उसका कभी जन्म नहीं होता और जो सत् है उसका कभी नाश नहीं होता। दीपक भी बुझनेपर सर्वथा नाशको प्राप्त नहीं होता किन्तु अन्धकार रूप पर्यायको धारण किये हुए अपना अस्तित्व रखता है ।।२४।। वास्तवमें विधि और निषेध दोनों कथंचित् इष्ट हैं। विवक्षावश उनमें मुख्यगौणकी व्यवस्था होती है ।।२५।।

(स्वयंभू स्त्रोत्र / श्लोक संख्या ४२-४४; ६२/६५), (पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक संख्या ४१८-४३३)।
धवला पुस्तक संख्या १/१,१,११/१६७/२ नात्मनोऽडनेकान्तत्वमसिद्धमनेकान्तमन्तरेण तस्यार्थकारित्वानुपपत्तेः।

= आत्माका अनेकान्तपना असिद्ध नहीं है, क्योंकि अनेकान्तके बिना उसके अर्थक्रियाकारीपना नहीं बन सकता।

(श्लोकवार्तिक पुस्तक संख्या १/१,१,१२७/५९७)।

  1. किसी न किसी रूपमें सब अनेकान्त मानते हैं

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,१४/३७ नात्र प्रतिवादिनो विसंवदन्ते एकमनेकात्मकमिति। केचित्तावदाहुः-`सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रधानम्' इति। तेषां प्रसादलाघवशोषतापावरणसादनादिभिन्नस्वभावानां प्रधानात्मना मिथेश्च न विरोधः। अथ मन्येथाः `न प्रधानं नामैकं गुणेभ्योऽर्थान्तरभूतमस्ति, किन्तु त एव गुणाः साम्यापन्नाः प्रधानाख्यं लभन्ते' इति। यद्येवं भूमा प्रधानस्य स्यात्। स्यादेतत्-तेषां समुदयः प्रधानमेकमितिः अतएवाविरोधः सिद्धः गुणानामवयवानां समुदायस्य च। अपरे मन्यन्ते-`अनुवृत्तिविनिवृत्तिबुद्ध्यभिधानलक्षणः सामान्यविशेषः' इति। तेषां च सामान्यमेव विशेषः सामान्यविशेषः इत्येकस्यात्मन उभयात्मकं न विरुध्यते। अपरे आहुः-`वर्णादिपरमाणुसमुदयो रूपपरमाणुः' इति। तेषां कक्खडत्वादिभिन्नलक्षणानां रूपात्मना मिथश्चं न विरोधः। अथ मतम् `न परमाणुर्नामैकोऽस्ति बाह्यः, किन्तु विज्ञानमेव तदाकारपरिणतं परमाणुव्यपदेशार्हम् इत्युच्यते; अत्रापि ग्राहकविषयाभाससंवित्तिशक्तित्रयाकाराधिकरणस्यैकस्याभ्युपगमान्न विरोधः। किं सर्वेषामेव तेषां पूर्वोत्तरकालभावावस्था विशेषार्पणाभेदादेवस्य कार्यकारणशक्तिसमन्वयो न विरोधस्यास्पदमित्यविरोधसिद्धिः।

= `एक वस्तु अनेक धर्मात्मक है' इसमें किसी वादीको विवाद भी नहीं है। यथा सांख्य लोग सत्त्व रज और तम इन भिन्नस्वभाववाले धर्मोंका आधार एक प्रधान मानते हैं। उनके मतमें प्रसाद, लाघव, शोषण, अपवरण, सादन आदि भिन्न-भिन्न गुणोंका प्रधानसे अथवा परस्परमें विरोध नहीं है। वह प्रधान नामक वस्तु उन गुणोंसे पृथक् ही कुछ हो सो भी नहीं है, किन्तु वे ही गुण साम्यावस्थाको प्राप्त करके `प्रधान' संज्ञाको प्राप्त होते हैं औऐर यदि ऐसे हों तो प्रधान भूमा (व्यापक) सिद्ध होता है। यदि यहाँ यह कहो कि उनका समुदाय प्रधान एक है तो स्वयं ही गुणरूप अवयवों के समुदायमें अविरोध सिद्ध हो जाता है। वैशेषिक पृथिवीत्व आदि सामान्य विशेष स्वीकार करते हैं। एक ही पृथिवी स्वव्यक्तियों में अनुगत होनेसे सामान्यत्मक होकर भी जलादिसे व्यावृत्ति करानेके कारण विशेष कहा जाता है। उनके यहाँ `सामान्य ही विशेष है' इस प्रकार पृथिवीत्व आदिको सामान्यविशेष मान गया है। अतः उनके यहाँ भी एक आत्माके उभयात्मकपन विरोधको प्राप्त नहीं होता। बौद्ध जन कर्कश आदि विभिन्न लक्षणवाले परमाणुओंके समुदायको एकरूप स्वलक्षण मानते हैं। इनके मतमें भी विभिन्न परमाणुओंमें रूपकी दृष्टिसे कोई विरोध नहीं है। विज्ञानाद्वैतवादी योगाचार बौद्ध एक ही विज्ञानको ग्राह्याकार, ग्राहकाकार और संवेदनाकार इस प्रकार त्रयाकार स्वीकार करते ही हैं। सभी वादी पूर्वावस्थाको कारण और उत्तरावस्थाको कार्य मानते हैं, अतः एक ही पदार्थमें अपनी पूर्व और उत्तर पर्यायोंकी दृष्टिसे कारण-कार्य व्यवहार निर्विरोध रूपसे होता है। उसी तरह सभी जीवादि पदार्थ विभिन्न अपेक्षाओंसे अनेक धर्मोंके आधार सिद्ध होते हैं।

(गीता/१३/१४-१६) (ईशोपनिषद्/८)।

  1. अनेकान्त भी अनेकान्तात्मक है

स्वयंभू स्त्रोत्र / श्लोक संख्या १०३ ननुभगवन्मते येन रूपेण जीवादि वस्तु नित्यादिस्वभावं तेन किं कथं चित्तथा सर्वथा वा। यदि सर्वथा तदेकान्तप्रसङ्गादनेकान्तक्षतिः, अथ कथंचित्तदानवस्थेत्याशङ्क्याह-अनेकान्तोऽप्यनेकान्तः प्रमाणनयसाधनः अनेकान्तः प्रमाणात्ते तदेकान्तोऽर्पितात्रयात्।

= प्रश्न-भगवान्के मतमें जीवादि वस्तुका जिस रूपसे नित्यादि स्वभाव बताया है, वह कथंचित् रूपसे है या सर्वथा रूपसे। यदि सर्वथा रूपसे है तब तो एकान्तका प्रसंग आनेके कारण अनेकान्तकी क्षति होती है और यदि कथंचित् रूपसे है तो अनवस्था दोष आता है। इसी आशंकाके उत्तरमें आचार्यदेव कहते हैं। उत्तर-आपके मतमें अनेकान्त भी प्रमाण और नय साधनोंको लिये हुए अनेकान्तस्वरूप है। प्रमाणकी दृष्टिसे अनेकान्तरूप सिद्ध होता है और विवक्षित नयकी अपेक्षासे अनेकान्तमें एकान्तरूप सिद्ध होता है।

राजवार्तिक अध्याय संख्या १,६/७/३५/२८ नयार्पणादेकान्तो भवति एकनिश्चयप्रवणत्वात्; प्रमाणार्पणादनेकान्तो भवति अनेकनिश्चयाधिकरणत्वात्।

= एक अंगका निश्चय करानेवाला होनेके कारण नयकी मुख्यतासे एकान्त होता है और अनेक अंगोंका निश्चय करानेवाला होनेके कारण प्रमाण की विवक्षासे अनेकान्त होता है।

श्लोकवार्तिक पुस्तक संख्या २/१,६,५६/४७४ न चैवमेकान्तोपगमे कश्चिद्दोषः सुनयार्पितस्यैकान्तस्य समीचीनतया स्थितत्वात् प्रमाणार्पितस्यास्तित्वानेकान्तस्य प्रसिद्धेः। येनात्मनानेकान्तस्तेनात्मनानेकान्त एवेत्येकान्तानुषङ्गोऽपि नानिष्टः। प्रमाणसाधनस्यैवानेकान्तत्वसिद्धेः नयसाधनस्यैकान्तव्यवस्थितरेकान्तोऽप्यनेकान्त इति प्रतिज्ञानात्। तदुक्तम्-"अनेकान्तोऽप्यनेकान्तः.....(देखो ऊपर नं. १)"

= इस प्रकार एकान्तको स्वीकार करने पर भी हमारे यहाँ कोई दोष नहीं है, क्योंकि श्रेष्ठ नयसे विवक्षित किये गये एकान्तकी समीचीन रूपसे सिद्धि हो चुकी है और प्रमाणसे विवक्षित किये गये अस्तित्वके अनेकान्तकी प्रसिद्धि हो रही है। `जिस विवक्षित प्रमाणस्वरूपसे अनेकान्त है, उस स्वरूपसे अनेकान्त ही है', ऐसा एकान्त होनेका प्रसंग भी अनिष्ट नहीं है, क्योंकि, प्रमाण करके साधे गये विषयको ही अनेकान्तपना सिद्ध है, और नयके द्वारा साधन किये गये विषयको एकान्तपना व्यवस्थित हो रहा है। हम तो सबको अनेकान्त होनेकी प्रतिज्ञा करते हैं, इसलिए अनेकान्त भी अनेक धर्मवाला होकर अनेकान्त है। श्री १०८ समन्तभद्राचार्यने कहा भी है, कि अनेकान्त भी अनेकान्तस्वरूप है...इत्यादि

(देखो ऊपर नं.१ स्व.स्त./१०३)।
न.च.वृ/१८१ एयंतो एयणयो होइ अणेयंतमस्स सम्मूहो।

= एकान्त एक नयरूप होता है और अनेकान्त नयोंका समूह होता है।

कार्तिकेयानुप्रेक्षा / मूल या टीका गाथा संख्या २६१ जं वत्थु अणेयंतं एयंतं तं पि होदि सविपेक्खं। सुयणाणेण णएहि य णिरवेक्खं दीसदे णेव ।।२६१।।

= जो वस्तु अनेकान्तरूप है वही सापेक्ष दृष्टिसे एकान्तरूप भी है। श्रुतज्ञानकी अपेक्षा अनेकान्तरूप है और नयोंकी अपेक्षा एकान्तरूप है ।।२६१।।

  1. अनेकान्तमें सर्व एकान्त रहते हैं पर एकान्तमें अनेकान्त नहीं रहता

नयचक्रवृहद्‍ गाथा संख्या ५७ में उद्धृत "नित्यैकान्तमतं यस्य तस्यानेकान्तता कथम्। अनेकान्तमतं यस्य तस्यैकान्तमतं स्फुटम्।

= जिसका मत नित्य एकान्तस्वरूप है उसके अनेकान्तता कैसे हो सकती है। जिसका मत अनेकान्त स्वरूप है उसके स्पष्ट रूपसे एकान्तता होती है।

नयचक्रवृहद्‍ गाथा संख्या १७६ जह सद्धाणमाई सम्मत्तं जह तवाइगुणणिलए। धाओ वा एयरसो तह णयमूलं अणेयंतो ।।१७६।।

= जिस प्रकार तप ध्यान आदि गुणोंमें, श्रद्धान, सम्यक्त्व, ध्येय आदि एक रसरूपसे रहते हैं, उसी प्रकार नयमूलक अनेकान्त होता है। अर्थात् अनेकान्तमें सर्व नय एक रसरूपसे रहते हैं।

स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या ३०/३३६/११ सर्वनयात्मकत्वादनेकान्तवादस्य। यथा विशकलितानां मुक्तामणीनामेकसूत्रानुस्यूताना हारव्यपदेशः, एव पृथगभिसंबन्धिनां नयनां स्याद्वादलक्षणैकसूत्रप्रीतानां श्रुताख्यप्रमाणव्यपदेश इति।

= अनेकान्तवाद सर्वनयात्मक है। जिस प्रकार बिखरे हुए मोतियोंको एक सूत्रमें पिरो देनेसे मोतियोंका सुन्दर हार बन जाता है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न नयोंको स्याद्वादरूपी सूतमें पिरो देनेसे सम्पूर्ण नय `श्रुत प्रमाण' कहे जाते हैं।

स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या ३०/३३६/२९ न च वाच्यं तर्हि भगवत्समयस्तेषु कथं नोपलभ्यते इति। समुद्रस्य सर्वसरिन्मयत्वेऽपि विभक्तासु तासु अनुपलम्भात्। तथा च वक्तृवचनयोरैक्यमध्यवस्य श्रीसिद्धसेनदिवाकरपादा (ई. ५५०) उदधाविव सर्वसिन्धवः समुदीर्णास्त्वयि नाथ दृष्टयः। न च तासु भवान् प्रदृश्यते प्रविभक्तासु सरित्स्विवोदधिः।

= प्रश्न-यदि भगवान्का शासन सर्वदर्शन स्वरूप है, तो यह शासन सर्वदर्शनोंमें क्यों नहीं पाया जाता? उत्तर-जिस प्रकार समुद्रके अनेक नदी रूप होनेपर भी भिन्न-भिन्न नदियोंमें समुद्र नहीं पाया जाता उसी प्रकार भिन्न-भिन्न दर्शनोंमें जैन दर्शन नहीं पाया जाता। वक्ता और उसके वचनोंसे अभेद मानकर श्री सिद्धसेन दिवाकर (ई. ५५०) ने कहा है, `हे नाथ' जिस प्रकार नदियाँ समुद्रमें जाकर मिलती हैं वैसे ही सम्पूर्ण दृष्टियोंका आपमें समावेश होता है। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नदियों में सागर नहीं रहता उसी प्रकार भिन्न-भिन्न दर्शनोमें आप नहीं रहते।

  1. निरपेक्ष नयोंका समूह अनेकान्त नहीं है

आप्तमीमांसा श्लोक संख्या १०८ मिथ्यासमूहो मिथ्या चेन्न मिथ्यैकान्ततास्ति नः। निरपेक्षा नया मिथ्याः सापेक्षा वस्तुतोऽर्थकृत ।।१०८।।

= मिथ्या नयोंका समूह भी मिथ्या ही है, परन्तु हमारे यहाँ नयोंका समूह मिथ्या नहीं है, क्योंकि, परस्पर निरपेक्ष नय मिथ्या हैं, परन्तु जो अपेक्षा सहित नय हैं वे वस्तुस्वरूप हैं।

प.सु./६/६१-६२ विषयाभासं सामान्यं विशेषो द्वयं वा स्वतन्त्रम् ।।६१।। तथा प्रतिभासनात् कार्याकरणाच्च ।।६२।।

= वस्तुके सामान्य व विशेष दोनों अंशोंको स्वतन्त्र विषय मानना विषयाभास है ।।६१।। क्योंकि न तो ऐसे पृथक् सामान्य या विशेषोंकी प्रतीति है और न ही पृथक्-पृथक् इन दोनोंसे कोई अर्थक्रिया सम्भव है।

न्यायदीपिका अधिकार ३/$८६ ननु प्रतिनियताभिप्रायगोचरतया पृथगात्मनां परस्पर साहचर्यानपेक्षायां मिथ्याभूतानामेकत्वादीनां धर्माणां साहचर्यलक्षणसमुदायोऽपि मिथ्यैवेति चेत्तदङ्गीकुर्महे, परस्परोपकार्योपकारकभावं विना स्वतन्त्रतया नैरपेक्ष्यापेक्षायां परस्वभावविमुक्तस्य तन्तु समूहस्य शीतनिवारणाद्यर्थक्रियावदेकत्वानेकत्वानामर्थक्रियायां सामर्थ्याभावात्कथंचिन्मिथ्यात्वस्यापिसंभवात्।

=
प्रश्न - एक-एक अभिप्रायके विषयरूपसे भिन्न-भिन्न सिद्ध होनेवाले और परस्परमें साहचर्यकी अपेक्षा न रखनेपर मिथ्याभूत हुए एकत्व अनेकत्व आदि धर्मोंका साहचर्य रूप समूह भी जो कि अनेकान्त माना जाता है, मिथ्या ही है। तात्पर्य यह कि परस्पर निरपेक्ष एकत्वादि एकान्त जब मिथ्या हैं तो उनका समूहरूप अनेकान्त भी मिथ्या ही कहलायेगा? उत्तर-वह हमें दृष्ट है। जिस प्रकार परस्परके उपकार्य-उपकारक भावके बिना स्वतन्त्र होनेसे एक दूसरेकी अपेक्षा न करनेपर वस्त्ररूप अवस्थासे रहित तन्तुओंका समूह शीत निवारण आदि कार्य नहीं कर सकता है, उसी प्रकार एक दूसरेकी अपेक्षा न करनेपर एकत्वादिक धर्म भी यथार्थ ज्ञान कराने आदि अर्थक्रियामें समर्थ नहीं है। इसलिए उन परस्पर निरपेक्ष धर्मोंमें कथंचित् मिथ्यापन भी सम्भव है।

  1. अनेकान्त व एकान्तका समन्वय

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,७/३५/२९ यद्यनेकान्तोऽनेकान्त एव स्यान्नैकान्तो भवेत्; एकान्ताभावात् तत्समूहात्मकस्य तस्याप्यभावः स्यात्, शाखाद्यभावे वृक्षाद्यभाववत्। यदि चैकान्त एव स्यात्; तदविनाभाविशेषनिराकरणादात्मलोपे सर्वलोपः स्यात्। एवम् उत्तरे च भङ्गा योजयितव्याः।

= यदि अनेकान्तको अनेकान्त ही माना जाये और एकान्तका सर्वथा लोप किया जाये तो सम्यगेकान्तके अभावमें, शाखादिके अभावमें वृक्षके अभावकी तरह तत्समुदायरूप अनेकान्तका भी अभाव हो जायेगा। यदि एकान्त ही माना जाये तो अविनाभावी इतर धर्मोंका लोप होनेपर प्रकृत शेषका भी लोप होनेसे सर्व लोपका प्रसंग प्राप्त होता है। इसी प्रकार (अस्ति नास्ति भंगवत्) अनेकान्त व एकान्तमें शेष भंग ही लागू कर लेने चाहिए।

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ७५/४)।

  1. सर्व एकान्तवादियोंके मत किसी न किसी नयमें गर्भित हैं

स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या २८/३१६/७ एत एव च परामर्शा अभिप्रेतधर्मावधारणात्मकतयाशेषधर्मतिरस्कारेण प्रवर्तमाना दुर्नयसंज्ञामश्नुवते। तद्बलप्रभावितसत्ताका हि खल्वेते परप्रवादाः। तथाहि-नैगमनयदर्शनानुसारिणौ नैयायिक-वैशेषिकौ। संग्रहाभिप्रायवृत्ताः सर्वेऽप्यद्वैतवादा सांख्यदर्शनं च। व्यवहारनयानुपातिप्रायश्चार्वाकदर्शनम्। ऋजुसूत्राकूतप्रवृत्तबुद्धयस्तथागताः। शब्दादिनयावलम्बिनो वैयाकरणादयः।

= जिस समय ये नय अन्य धर्मोंका निषेध करके केवल अपने एक अभीष्ट धर्मका ही प्रतिपादन करते हैं, उस समय दुर्नय कहे जाते हैं। एकान्तवादी लोग वस्तुके एक धर्मको सत्य मानकर अन्य धर्मोंका निषेध करते हैं, इसलिए वे लोग दुर्नयवादी कहे जाते हैं। वह ऐसे कि-न्याय-वैशेषिक लोग नैगमनयका अनुसरण करते हैं, वेदान्ती अथवा सभी अद्वेतवादी तथा सांख्य दर्शन संग्रहनयको मानते हैं। चार्वाक लोग व्यवहारनयवादी हैं, बौद्ध लोग केवल ऋजुसूत्रनयको मानते हैं तथा वैयाकरण शब्दादि तीनों नयका अनुकरण करते हैं। नोट - [इन नयाभासोंके लक्षण

(देखे नय III)]।

  1. अनेकान्तका कारण व प्रयोजन
  1. अनेकान्तके उपदेश कारण

समयसार / परिशिष्ट "ननु यदि ज्ञानमात्रत्वेऽपि आत्मवस्तृनः स्वयमेवानेकान्तः प्रकाशते तर्हि किमर्थमर्हद्भिस्तत्साधनत्वेनानुशास्यतेऽनेकान्तः। अज्ञानिनां ज्ञानमात्रात्मवस्तुप्रसिद्ध्यर्थमिति ब्रूमः। न खल्वनेकान्तमन्तरेण ज्ञानमात्रमात्ममवस्त्वेव प्रसिध्यति। तथा हि-इह स्वभावत एव बहुभावनिर्भरविश्वेसर्वभावानां स्वभावेनाद्वैतेऽपि द्वैतस्य निषेद्धुमशक्यत्वात् समस्तमेव वस्तु स्वपररूपप्रवृत्तिव्यावृत्तिभ्यामुभयभावाध्यासितमेव।

= प्रश्न-यदि आत्मवस्तुको ज्ञानमात्रता होनेपर भी, स्वयमेव अनेकान्त प्रकाशता है, तब फिर अर्हन्त भगवान् उसके साधनके रूपमें अनेकान्तका उपदेश क्यों देते हैं? उत्तर-अज्ञानियोंके ज्ञानमात्र आत्मवस्तुकी प्रसिद्धि करनेके लिए उपदेश देते हैं, ऐसा हम कहते हैं। वास्तवमें अनेकान्तके बिना ज्ञानमात्र आत्म वस्तु ही प्रसिद्ध नहीं हो सकती। इसीको इस प्रकार समझाते हैं। स्वभावसे ही बहुत से भावोंसे भरे हुए इस विश्वमें सर्व भावोंका स्वभावसे अद्वैत होनेपर भी, द्वैतका निषेध करना अशक्य होनेसे समस्त वस्तु स्वरूपमें प्रवृत्ति और पररूपसे व्यावृत्तिके द्वारा दोनों भावोंसे अध्यासित है। (अर्थात् समस्त वस्तु स्वरूपमें प्रवर्तमान होनेसे और पर रूपसे भिन्न रहनेसे प्रत्येक वस्तुमें दोनों भाव रह रहे हैं)।

पंचास्तिकाय संग्रह / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा संख्या १० अविशेषाद्द्रव्यस्य सत्स्वरूपमेव लक्षणम्, न चानेकान्तात्मकस्य द्रव्यस्य सन्मात्रमेव स्वरूपम्।

= सत्तासे द्रव्य अभिन्न होनेके कारण सत् स्वरूप ही द्रव्यका लक्षण है, परन्तु अनेकान्तात्मक द्रव्यका सन्मात्र ही स्वरूप नहीं है।

और भी दे नय I/२/५-(अनेक धर्मोंको युगपत् जाननेवाला ज्ञान ही प्रमाण है।)
और भी दे नय I/२/८ (वस्तुमें सर्व धर्म युगपत् पाये जाते हैं।)

  1. अनेकान्त के उपदेशका प्रयोजन

नयचक्रवृहद्‍ गाथा संख्या २६०-२६१ तच्चं पि हेयमियरं हेयं खलु भणिय ताण परदव्वं। णिय दव्वं पि य जाणसु हेयाहेयं च णयजोगे ।।२६०।। मिच्छासरागभूयो हेयो आदा हवेई णियमेण। तव्विवरीओ झेआ णायव्वो सिद्धिकामेन ।।२६१।।

= तत्त्व भी हेय और उपादेय रूपसे दो प्रकारका है। तहाँ परद्रव्यरूप तत्त्व तो हेय है और निजद्रव्यरूप तत्त्व उपादेय है। ऐसा नय योगसे जाना जाता है ।।२६०।। नियमसे मिथ्यात्व व राग सहित आत्मा हेय है और उससे विपरीत ध्येय है ।।२६१।।

कार्तिकेयानुप्रेक्षा / मूल या टीका गाथा संख्या ३११-३१२ जो तच्चमणेयंतं णियमा सद्दहदि सत्तभंगेहिं। लोयाण पण्हवसदो ववहारपवत्तणट्ठ च ।।३११।। जो यायरेण मण्णदि जीवाजीवादि णवविहं अत्थं। सुदणाणेण णएहि य सो सद्दिट्ठी हवे सुद्धो ।।३१२।।

= जो लोगोंके प्रश्नोंके वशसे तथा व्यवहार चलानेके लिए सप्तभंगीके द्वारा नियमसे अनेकान्त तत्त्वका श्रद्धान करता है वह सम्यग्दृष्टि होता है ।।३११।। जो श्रुतज्ञान तथा नयोंके द्वारा जीव-अजीव आदि नव प्रकारके पदार्थोंको आदर पूर्वक मानता है, वह शुद्ध सम्यक्दृष्टि है ।।३१२।।

  1. अनेकान्तवादियोंको कुछ भी कहना अनिष्ट नहीं

लो.वा.२/५,२-१४/१८० व्यक्तिरपि तथा नित्या स्यादिति चेत् न किंचिदनिष्टं, पर्यायार्थादेशावदेवविशेषपर्यायस्य सामान्यपर्यायस्यवानित्यत्वोपगमात्।

= प्रश्न-यदि कोई कहे कि इस प्रकार तो द्रव्यकी व्यक्तियें अर्थात् घट पट आदि पर्यायें भी नित्य हो जायेंगी? उत्तर-हो जाने दो। हम स्याद्वादियोंको कुछ भी अनिष्ट नहीं है। हमने पर्यायार्थिक नयसे ही सामान्य व विशेष पर्यायोंको अनित्य स्वीकार किया है, द्रव्यार्थिक नयसे तो सम्पूर्ण पदार्थ नित्य हैं ही।

  1. अनेकान्तकी प्रधानता व महत्ता

स्वयंभू स्त्रोत्र / श्लोक संख्या ९८ अनेकान्तात्मदृष्टिस्ते सती शून्यो विपर्ययः। ततः सर्वं मृषोक्तं स्यात्तदयुक्तं स्वघाततः ।।९८।।

= आपकी अनेकान्त दृष्टि सच्ची है। विपरीत इसके जो एकान्त मत है वह शून्यरूप असत् है, अतः जो कथन अनेकान्त दृष्टिसे रहित है, वह सब मिथ्या है।

धवला पुस्तक संख्या १/१,१,२७/२२२/२ उत्सुत्तं लिहंता आइरियां कतं वज्जभीरुणो। इदि चे ण एस दोसो, दोण्हं मज्झे एकस्सेव संगहे कीरमाणे वज्जभीरुत्तं णिवट्टति। दोण्हं पि संगहं करेंताणमाइरियाणं वज्जभीरुत्ताविणासादो।

= प्रश्न-उत्सूत्र लिखनेवाले आचार्य पापभीरु कैसे माने जा सकते हैं? उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि दोनों प्रकारके वचनोंसे किसी एक ही वचनके संग्रह करनेपर पापभीरुता निकल जाती है अर्थात् उच्छृंखलता आ जाती है। अतएव दोनों प्रकारके वचनोंका संग्रह करनेवाले आचार्योंके पापभीरुता नष्ट नहीं होती है।

गोम्मट्टसार कर्मकाण्ड / मूल गाथा संख्या ८९५/१०७४ एकान्तवादियोंका सर्व कथन मिथ्या और अनेकान्तवादियोंका सर्व कथन सम्यक् है।
(देखे स्याद्वाद् ५।)
प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा संख्या २७ अनेकान्तोऽत्र बलवान्।

= यहाँ अनेकान्त बलवान् है।

प.का/त.प्र./२१ स खल्वयं प्रसादोऽनेकान्तवादस्य यदीदृशोऽपि विरोधी न विरुध्यते।

= यह प्रसाद वास्तवमें अनेकान्तवादका है कि ऐसा विरोध भी विरोध नहीं है।

पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक संख्या २२७ तत्र यतोऽनेकान्तो बलवानिह खलु न सर्वथेकान्तः। सर्व स्यादविरुद्धं तत्पूर्वं तद्विना विरुद्धं स्यात् ।।२२७।।

= जैन सिद्धान्तमें निश्चयसे अनेकान्त बलवान् है, सर्वथा एकान्त बलवान् नहीं है। इसलिए अनेकान्त पूर्वक सब ही कथन अविरुद्ध पड़ता है और अनेकान्तके बिना सर्व ही कथन विरुद्ध हो जाता है।

  1. वस्तुमें विरोधी धर्मोंका निर्देश
  1. वस्तु अनेकों विरोधी धर्मोंसे गुम्फित है

समयसार / आत्मख्याति परिशिष्ट "अत्र यदेव तत्तदेवातत्, यदेवैकं तदेवानेकं, यदेव सत्तदेवासत्, यदेव नित्यं तदेवानित्यमित्येकवस्तु वस्तुत्वनिष्पादकपरस्परविरुद्धशक्तिद्वयप्रकाशनमेकान्तः।

= अनेकान्त। १/१

(समयसार / आत्मख्याति परिशिष्ट )।
न्यायदीपिका अधिकार ३/$५७ सर्वस्मिन्नपि जीवादिवस्तुनि भावाभावरूपत्वमेकानेकरूपत्वं नित्यानित्यरूपत्वमित्येवमादिकमनेकान्तात्मकत्वम्।

= सर्व ही जीवादि वस्तुओंमें भावपना-अभावपना, एकरूपपना-अनेकरूपपना, नित्यपना-अनित्यपना, इस प्रकार अनेकान्तत्मकपना है।

पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक संख्या २६२-२६३ स्यादस्ति च नास्तीति च नित्यमनित्यं त्वनेकमेकं च। तदतच्चेति चतुष्ट्ययुग्मैरिव गुम्फितं वस्तु ।।२६२।। अथ तद्यथा यदस्ति हि तदेव नास्तीति तच्चतुष्कं च। द्रव्येण क्षेत्रेण च कालेन तथाथवापि भावेन ।।२६३।।

= कथंचित् है और नहीं है यह तथा नित्य-अनित्य और एक-अनेक, तत्-अतत् इस प्रकार इन चारयुगलोंके द्वारा वस्तु गूंथी हुई की तरह है ।।२६२।। इसका खुलासा इस प्रकार है कि निश्चयसे स्व द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव इन चारोंके द्वारा जो सत् है वही पर द्रव्यादिसे असत् है। इस प्रकारसे द्रव्यादि रूपसे अस्ति-नास्तिका चतुष्टय हो जाता है ।।२६३।।

  1. वस्तु भेदाभेदात्मक है।

युक्त्यनुशासन श्लोक संख्या ७ अभेदभेदात्मकमर्थतत्त्वं, तव स्वतन्त्रान्यतरत्खपुष्पम्।।

= हे प्रभु! आपका अर्थ तत्त्व अभेदभेदात्मक है। अभेदात्मक और भेदात्मक दोनोंको स्वतन्त्र स्वीकार करनेपर प्रत्येक आकाश पुष्पके समान हो जाता है।

  1. सत् सदा अपने प्रतिपक्षीकी अपेक्षा रखता है

पंचास्तिकाय / / मूल या टीका गाथा संख्या ८ सत्तासव्वपयत्थासव्विस्सरूवा अणंतपज्जाया। भंगुप्पादधुवत्ता सप्पडिवक्खा हवदि एक्का ।।८।।

= सत्ता उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक, एक, सर्वपदार्थस्थित, सविश्वरूप, अनन्तपर्यायमय और सप्रतिपक्ष

(कषायपाहुड़ पुस्तक संख्या १/१/१-१/६/५३) (धवला पुस्तक संख्या १४/५-६-१२८ १८/२३४)।
पंचास्तिकाय संग्रह / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा संख्या ८ एवंभूतापि सा न खलु निरङ्कुशा किंतु सप्रतिपक्षा। प्रतिपक्षो ह्यसत्ता सत्तायाः, अत्रिलक्षणत्वं त्रिलक्षणायाः अनेकत्वमेकस्याः, एकपदार्थस्थितत्वं सर्वपदार्थस्थितायाः, एकरूपत्वं सविश्वरूपायाः, एकपर्यायत्वमनन्तपर्याया इति।

= ऐसी होनेपर भी वह (सत्ता) वास्तवमें निरंकुश नहीं है, किन्तु सप्रतिपक्ष है। १. सत्ताको असत्ता प्रतिपक्ष है; २. त्रिलक्षणको अत्रिलक्षणपना प्रतिपक्ष है; ३. एकको अनेकपना प्रतिपक्ष है; ४. सर्वपदार्थस्थितको एकपदार्थ स्थितपना प्रतिपक्ष है; ५. सविश्वरूपको एकरूपपना प्रतिपक्ष है, ६. अनन्तपर्यायमयको एकपर्यायमयपना प्रतिपक्ष है।

(पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक संख्या १५) (न.च./श्रु/५३)।
नियमसार / तात्त्पर्यवृत्ति गाथा संख्या ३४ अस्तित्व नाम सत्ता। सा किंविशिष्टा। सप्रतिपक्षा, अवान्तरसत्ता महासत्तेति।

= अस्तित्व नाम सत्ताका है। वह कैसी है? महासत्ता और अवान्तरसत्ता-ऐसी सप्रतिपक्ष है।

सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ५१/३ सत्ता सप्रतिपक्षका इति वचनात्।

= सम्पूर्ण द्रव्य, क्षेत्र, कालादि रूप जो एक महासत्ता है वही विकल द्रव्य, क्षेत्र आदिसे प्रतिपक्ष सहित है। ऐसा अन्यत्र आचार्यका वचन है।

  1. स्व सदा परकी अपेक्षा रखता है

स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या १६/२१८/११ कथमन्यथा स्वशब्दस्य प्रयोगः। प्रतियोगीशब्दो ह्ययं परमपेक्षमाण एव प्रवर्तते।

= `स्व' शब्दका प्रयोग अन्यथा क्यों किया है? स्व-शब्द प्रतियोगी शब्द है। अतएव स्वशब्दसे पर शब्दका भी ज्ञान होता है।

  1. विधि सदा निषेधकी अपेक्षा रखती है।

नयचक्रवृहद्‍ गाथा संख्या २५७,३०४ एक्कणिरुद्धे इयरी पडिवक्खो अणवरेइ सब्भावो। सव्वेसिं च सहावे कायव्वा होइ तह भंगी ।।२५७।। अत्थित्तं णो णत्थिसहावस्स जो हु सावेक्खं। णत्थी विय तह दव्वे मूढो मूढो दु सव्वत्थ ।।३०४।।

= एक स्वभावका निषेध होनेपर दूसरा प्रतिपक्षी स्वभाव अनुवृत्ति करता है, इस प्रकार सभी स्वभावोंमें सप्तभंगी करनी चाहिए ।।२५७।। जो अस्तित्वको नास्तित्व सापेक्ष और नास्तित्वको अस्तित्व सापेक्ष नहीं मानता है, वह द्रव्यमें मूढ़ और इसलिए सर्वत्र मूढ़ है।

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,१३/३७/९ यो हेतुरुपदिश्यते स साधको दूषकश्च स्वपक्षं साधयति परपक्षं दूषयति।

= जो हेतु कहा जाता है वह साधक भी होता है और दूषक भी, क्योंकि स्वपक्षको सिद्ध करता है पर पक्षमें दोष निकालता है

(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ९०/३)।
पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक संख्या ६६५ विधिपूर्वः प्रतिषेधः प्रतिषेधपुरस्सरो विधिस्त्वनयोः। मैत्री प्रमाणमिति वा स्वपराकारावगाहि यज्ज्ञानम्।

= विधिपूर्वक प्रतिषेध और प्रतिषेध पूर्वक विधि होती है, परन्तु इन दोनोंकी मैत्री स्वपराकारग्राही ज्ञान रूप है। वही प्रमाण है।

  1. वस्तुमें कुछ विरोधी धर्मोंका निर्देश

दे.अनेकान्त/शीर्षक "संख्या सत्-असत्; एक-अनेक; नित्य-अनित्य; तत्-अतत्। (४/१); भेद-अभेद (४/२)। सत्ता-असत्ता; त्रिलक्षणत्वअत्रिलक्षणत्व; एकत्व-अनेकत्व; सर्वपदार्थस्थित-एकपदार्थस्थित; सविश्वरूप-एकरूप; अनन्तपर्यायमयत्व-एकपर्यायमयत्व; महासत्ताअवान्तरसत्ता; स्व-पर; (४/३)।"
नयचक्रवृहद्‍ गाथा संख्या ७०/टीका "सद्रूप-असद्रूप; नित्य-अनित्य; एक-अनेक; भेद-अभेद; भव्य-अभव्य; स्वभाव-विभाव; चैतन्य-अचैतन्य; मूर्त-अमूर्त; एकप्रदेशत्व-अनेकप्रदेशत्व; शुद्ध-अशुद्ध; उपचरित-अनुपचरित; एकान्त-अनेकान्त.....इत्यादि स्वभाव है।
स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या २५ अनित्य-नित्य; सदृश-विसदृश; वाच्य-अवाच्य; सत्-असत्।
ध./पू./श्लो.नं. "देश-देशांश ।।७४।।; स्व द्रव्य=महासत्ता-अवान्तरसत्ता ।।२६४।।; स्वक्षेत्र=सामान्य-विशेष; अर्थात् अखण्ड द्रव्य तथा उसके प्रदेश; स्व काल=सामान्य-विशेष अर्थात् अखण्ड द्रव्यकी एक पर्याय तथा पृथक्-पृथक् गुणोंको पर्याय; स्वभाव=सामान्य व विशेष अर्थात् द्रव्य तथा गुण व पर्याय ।।२७०-२८०।।
(और भी देखे जीव ३/४)

  1. वस्तुमें कथंचित् स्वपर भाव निर्देश

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,५/३४/३९ चैतन्यशक्तेर्द्वाकारौ ज्ञानाकारो ज्ञेयाकारश्च.....तत्रज्ञेयाकारः स्वात्मातन्मूलत्वाद् घटव्यवहारस्य। ज्ञानाकारः परात्मा सर्वसाधारणत्वात्।

= चैतन्य शक्ति में दो आकार रहते हैं - ज्ञानाकार व ज्ञेयाकार। तहाँ ज्ञानाकार तो घटव्यवहारका मूल होनेके कारण स्वात्मा है तथा सर्वसाधारण होनेके कारण ज्ञेयाकार परमात्मा है।

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,५/३३/३९,४०,४१,४३ घटत्व नामक धर्म `घट' का स्वरूप है और पटत्वादि पररूप है।....नाम, स्थापना, द्रव्य, भावादिकोंमें जो विवक्षित है, वह स्वरूप है और जो अविवक्षित है, वह पररूप है। घट विशेषके अपने स्थौल्यादि धर्मोंसे विशिष्ट घटत्व तो उसका स्वरूप है और अन्य घटोंका घटत्व उसका पररूप है। और उस ही घट विशेषमें पूर्वोत्तरकालवर्ती पिण्ड कुशूलादि उसका पररूप है और उन पिण्ड कुशूलादिमें अनुस्यूत एक घटत्व उसका स्वरूप है। ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा वर्तमान घटपर्याय स्वरूप है और पूर्वोत्तर कालवर्ती घटपर्याय पररूप है। उस क्षणमें भी तत्क्षणवर्ती रूपादि समुदायात्मक घटमें रहनेवाले पृथुबुध्नोदरादि आकार तो उसके स्वरूप हैं और इसके अतिरिक्त अन्य आकार उसके पररूप हैं। तत्क्षणवर्ती रूपादिकोंमें भी रूप उसका स्वरूप है और अन्य जो रसादि वे उसके पर रूप हैं, क्योंकि चक्षु इन्द्रिय द्वारा रूपमुखेन ही घटका ग्रहण होता है। समभिरूढ़ नयसे घटनक्रिया विषयक कर्तृत्व ही घटका स्वरूप है और अन्य कौटिल्यादि धर्म उसके पररूप हैं। मृत द्रव्य उसका स्व-द्रव्य है और अन्य स्वर्णादि द्रव्य उसके परद्रव्य हैं। घटका स्वक्षेत्र भूतल आदि है और परक्षेत्र भीत आदि हैं। घटका स्वकाल वर्तमानकाल है और परकाल अतीतादि है।
(सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ३९-४५)।
सप्तभंग तरंङ्गिनी पृष्ठ संख्या ४९-५१ प्रमेयका प्रमेयत्व उसका स्वरूप है घटत्वादिक ज्ञेय उसका पररूप है। अथवा प्रमेयका स्वरूप तो प्रमेयत्व है और पररूप अप्रमेयत्व है ।।४९-५०।। छहों द्रव्योंका शुद्ध अस्तित्व तो उनका स्वरूप है और उनका प्रतिपक्षी अशुद्ध अस्तित्व उनका पररूप है। शुद्ध द्रव्यमें भी उसका सकल द्रव्य क्षेत्र काल भावकी उपेक्षा सत्त्व है और विकल्प द्रव्य क्षेत्रादिकी अपेक्षा असत्त्व है ।।५१।।
पंचाध्यायी / उत्तरार्ध श्लोक संख्या ३९८ ज्ञानात्मक आत्माका एक ज्ञान गुण स्वार्थ है और शेष सुख आदि गुण परार्थ है।
राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,५/३५/११ एवमियं सप्तभङ्गी जीवादिषु सम्यग्दर्शनादिषु च द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकनयार्पणाभेदाद्योजयितव्या।

= इस प्रकार यह सप्तभंगी जीवादिक व सम्यग्दर्शनादिक सर्व विषयोंमें द्रव्यार्थिक व पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा भेद करके लागू कर लेनी चाहिए।

  1. विरोधमें अविरोध
  1. विरोधी धर्म रहनेपर भी वस्तुमें कोई विरोध नहीं पड़ता

धवला पुस्तक संख्या १/१,१,११/१६६/९ अक्रमेण सम्यग्गिथ्यारुच्यात्मको जीवः सम्यग्मिथ्यादृष्टिरिति प्रतिजानीमहे। न विरोधोऽप्यनेकान्ते आत्मनि भूयसां धर्माणां सहानवस्थालक्षणविरोधासिद्धेः।

= युगपत् समीचीन और असमीचीन श्रद्धावाला जीव सम्यग्मिथ्यादृष्टि है, ऐसा मानते हैं और ऐसा माननेमें विरोध भी नहीं आता, क्योंकि आत्मा अनेकधर्मात्मक है, इसलिए उसमें अनेक धर्मोंका सहानवस्थालक्षण विरोध असिद्ध है।

पद्मनन्दि पंचविंशतिका अधिकार संख्या ८/१३/१५१ यत्सूक्ष्मं च महच्च शून्यमपि यन्नो शून्यमुत्पद्यन्ते, नश्यत्येव च नित्यमेव च तथा नास्त्येव चास्त्येव च। एकं यद्यदनेकमेव तदपि प्राप्ते प्रतीतिं दृढां, सिद्धज्योतिरमूर्ति चित्सुखमयं केनापि तल्लक्ष्यते ।।१३।।
पद्मनन्दि पंचविंशतिका अधिकार संख्या १०/१४/१७२ निर्विनराशमपि नाशमाश्रितं शून्यमत्यतिशयेन संभृतम्। एकमेव गतमप्यनेकतां तत्त्वमीदृगपि नो विरुध्यते ।।१४।।

= जो सिद्धज्योति सूक्ष्म भी है और स्थूल भी है, शून्य भी है और परिपूर्ण भी है, उत्पाद-विनाशशाली भी है और नित्य भी है, सद्भावरूप भी है और अभावरूप भी है तथा एक भी है और अनेक भी है, ऐसा वह दृढ़ प्रतीतिको प्राप्त हुई अमूर्तिक चेतन एव सुखस्वरूप सिद्ध ज्योति किसी बिरले ही योगी पुरुषके द्वारा देखी जाती है ।।१३।। वह आत्मतत्त्व विनाशसे रहित होकर भी नाशको प्राप्त है, शून्य होकर भी अतिशयसे परिपूर्ण है तथा एक होकर भी अनेकताको प्राप्त है। इस प्रकार नय विवक्षासे ऐसा माननेमें कुछ भी विरोध नहीं आता है

(गोता/१३/१४-१६) (ईशोपनिषद्/८) (और भी दे.अनेकान्त/२/५)।

  1. सभी धर्मोंमें नहीं बल्कि यथायोग्य धर्मोंमें ही अविरोध हैं

धवला पुस्तक संख्या १/१/१,१,११/१६७/३ अस्त्वेकस्मिन्नात्मनि भूयसां सहावस्थानां प्रत्यविरुद्धानां संभवो नाशेषाणामिति चेत्क एवमाह समस्तानाप्यवस्थितिरिति चैतन्याचैतन्यभव्याभव्यादिधर्माणामप्यक्रमणैकात्मन्यवस्थितिप्रसङ्गात्। किन्तु येषां धर्माणां नात्यन्ताभावो यस्मिन्नात्मनि तत्र कदाचित्कवचिदक्रमेण तेषामस्तित्वं प्रतिजानीमहे।

= प्रश्न-जिन धर्मोंका एक आत्मामें एक साथ रहनेमें विरोध नहीं है, वे रहें, परन्तु सम्पूर्ण धर्म तो एक साथ एक आत्मामें रह नहीं सकते हैं? उत्तर-कौन ऐसा कहता है कि परस्पर विरोधी और अविरोधी समस्त धर्मोंका एक साथ आत्मामें रहना सम्भव है? यदि सम्पूर्ण धर्मोंका एक साथ रहना मान लिया जावे तो परस्पर विरुद्ध चैतन्य-अचैतन्य, भव्यत्व-अभव्यत्व आदि धर्मोंका एक साथ एक आत्मामें रहनेका प्रसंग आ जायेगा। इसलिए सम्पूर्ण परस्पर विरोधी धर्म एक आत्मामें रहे हैं, अनेकान्तका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए। किन्तु जिन धर्मोंका जिस आत्मामें अत्यन्त अभाव नहीं (यहाँ सम्यग्मिथ्यात्व भावका प्रकरण है) वे धर्म उस आत्मामें किसी काल और किसी क्षेत्रकी अपेक्षा युगपत् भी पाये जा सकते हैं, ऐसा हम मानते हैं।

  1. अपेक्षा भेदसे अविरोध सिद्ध है

सर्वार्थसिद्धि अध्याय संख्या ५/३२/३०३ ताभ्यां सिद्धेरर्पितानर्पितासिद्धेर्नास्ति विरोधः। तद्यथा-एकस्य देवदत्तस्य पिता पुत्रो भ्राता भागिनेय इत्येवमादयः संबन्धा जनकत्वजन्यत्वादिनिमित्ता न विरुध्यन्ते; अर्पणभेदात्।। पुत्रापेक्षया पिता, पित्रपेक्षया पुत्र इत्येवमादिः। तथा द्रव्यमपि सामान्यार्पणया नित्यम्, विशेषार्पणयानित्यमिति नास्ति विरोधः।

= इन दोनोंकी अपेक्षा एक वस्तुमें परस्पर विरोधी वो धर्मोंकी सिद्धि होती है, इसलिए कोई विरोध नहीं है। -जैसे देवदत्तके पिता, पुत्र, भाई और भानजे, इसी प्रकार और भी जनकत्व और जन्यत्वादिके निमित्तसे होनेवाले सम्बन्ध विरोधको प्राप्त नहीं होते। जब जिस धर्मकी प्रधानता होती है उस समय उसमें वही धर्म माना जाता है। उदाहरणार्थ-पुत्रकी अपेक्षा वह पिता है और पिताकी अपेक्षा वह पुत्र है आदि। उसी प्रकार द्रव्य भी सामान्यकी अपेक्षा नित्य है और विशेषकी अपेक्षा अनित्य है, इसलिए कोई विरोध नहीं है।

( राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६,११/३६/२२)।
राजवार्तिक अध्याय संख्या ५/३१, २/४९७/४ वियदेव न व्येति, उत्पद्यमान एव नोत्पद्यते इति विरोधः, ततो न युक्तमिति; तन्नः किं कारणम्। धर्मान्तराश्रयणात्। यदि येन रूपेण व्ययोदयकल्पना तेनैव रूपेण नित्यता प्रतिज्ञायेत स्याद्विरोधः जनकत्वापेक्षयैव पितापुत्रव्यपदेशवत्, नन्तु धर्मान्तरसंश्रयणात्।

= प्रश्न-`जो नष्ट होता है वही नष्ट नहीं होता और जो उत्पन्न होता है वही उत्पन्न नहीं होता,' यह बात परस्पर विरोधी मालूम होती है? उत्तर-वस्तुत विरोध नहीं है, क्योंकि जिस दृष्टिसे नित्य कहते हैं यदि उसी दृष्टिसे अनित्य कहते तो विरोध होता जैसे कि एक जनकत्वकी ही अपेक्षा किसीको पिता और पुत्र कहनेमें। पर यहाँ द्रव्य दृष्टिसे नित्य और पर्याय दृष्टिसे अनित्य कहा जाता है, अतः विरोध नहीं है। दोनों नयोंकी दृष्टिसे दोनों धर्म बन जाते हैं।

न.च./श्रु./पृ.६५ यथा स्वस्वरूपेणास्तित्वं तथा पररूपेणाप्यस्तित्वं माभूदिति स्याच्छब्द।....यथा द्रव्यरूपेण नित्यत्वं तथा पर्यायरूपेण (अपि) नित्यत्वं माभूदिति स्याच्छब्दः।

= जिस प्रकार वस्तुका स्वरूपसे अस्तित्व है, उसी प्रकार पररूपसे भी अस्तित्व न हो जाये, इसलिए स्यात् शब्द या अपेक्षाका प्रयोग किया जाता है। जिस प्रकार द्रव्यरूपसे वस्तु नित्य है, उसी प्रकार पर्यायरूपसे भी वह नित्य न हो जाये इसलिए स्यात् शब्दका प्रयोग किया जाता है।

(स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या २३/२७९/७)।
पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा संख्या १८/३८ ननु यद्युत्पादविनाशौ तर्हि तस्यैव पदार्थस्य नित्यत्वं कथम्। नित्यं तर्हि तस्यैवोत्पादव्ययद्वयं च कथम्। परस्परविरुद्धमिदं शीतोष्णवदिति पूर्वपक्षे परिहारमाहुः। येषां मते सर्वथैकान्तेन नित्यं वस्तु क्षणिकं वा तेषां दूषणमिदम्। कथमिति चेत्। येनैव रूपेण नित्यत्वं तेनैवानित्यत्वं न घटते, येन च रूपेणानित्यत्वं तेनैव न नित्यत्वं घटते। कस्मात्। एकस्वभावत्वाद्वस्तुनस्तन्मते। जैनमते पुनरनेकस्वभावं वस्तु तेन कारणेन द्रव्यार्थिकनयेन द्रव्यरूपेण नित्यत्वं घटते पर्यायार्थिकनयेन पर्यायरूपेणानित्यत्वं च घटते। तौ च द्रव्यपर्यायौपरस्परं सापेक्षौ-तेन कारणेन....एकवेदत्तस्य जन्यजनकादिभाववत् एकस्यापि द्रव्यस्य नित्यानित्यत्वं घटते नास्ति विरोधः।

= प्रश्न-यदि उत्पाद और विनाश है तो उसी पदार्थमें नित्यत्व कैसे हो सकता है? और यदि नित्य है तो उत्पाद-व्यय कैसे हो सकते हैं? शीत व उष्ण की भाँति ये परस्पर विरुद्ध हैं? उत्तर-जिनके मतमें वस्तु सर्वथा एकान्त नित्य या क्षणिक है उनको यह दूषण दिया जा सकता है। कैसे? वह ऐसे कि जिस रूपसे नित्यत्व है, उसी रूपसे अनित्यत्व घटित नहीं होता और जिस रूपमे अनित्यत्व है, उसी रूपसे नित्यत्व घटित नहीं होता। क्योंकि उनके मतमें वस्तु एक स्वभावी है। जैन मतमें वस्तु अनेकस्वभावी है। इसलिए द्रव्यार्थिकनयसे नित्यत्व और पर्यायार्थिकनयसे अनित्यत्व घटित हो जाता है और क्योंकि ये द्रव्य व पर्याय परस्पर सापेक्ष है, इसलिए एक देवदत्तके जन्य-जनकत्वादि भाववत् एक ही द्रव्यके नित्यामित्यत्व घटित होनेमें कोई विरोध नहीं है।

स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या २४/२९०/८ तदा हि विरोधः स्याद्वयद्येकोपाधिकं सत्त्वमसत्त्वं च स्यात्। न चैवम्। यतो न हि येनैवांशेन सत्त्वं तेनैवासत्त्वमपि। किंत्वन्योपाधिकं सत्त्वम्, अन्योपाधिकं पुनरसत्त्वम्। स्वरूपेण सत्त्वं पररूपेण चासत्त्वम्।

= सत्त्व असत्त्व धर्मोंमें तब तो विरोध हुआ होता जब दोनोंको एक ही अपेक्षासे माना गया होता। परन्तु ऐसा तो है नहीं, क्योंकि, जिस अंशसे सत्त्व है उसी अंशसे असत्त्व नहीं है। किन्तु अन्य अपेक्षासे सत्त्व है और किसी अन्य ही अपेक्षासे असत्त्व है। स्वरूपसे सत्त्व है और पररूपसे असत्त्व है।

  1. वस्तु एक अपेक्षासे एकरूप है और अन्य अपेक्षासे अन्यरूप

राजवार्तिक अध्याय संख्या १/६/१२/३७/१ सपक्षासपक्षापेक्षयोपलक्षितानां सत्त्वासत्त्वादीनां भेदानामाधारेण पक्षधर्मेणैकेन तुल्यं सर्वद्रव्यम्।

= जैसे एक ही हेतु सपक्षमें सत् और विपक्षमें असत् होता है उसी तरह विभिन्न अपेक्षाओंसे अस्तित्व आदि धर्मोंके रहनेमें भी कोई विरोध नहीं है। (तथा इसी प्रकार अन्य अपेक्षाओंसे भी कथन किया है)।

नयचक्रवृहद्‍ गाथा संख्या ५८ भावा णेयसहावा पमाणगहणेण होंति णिप्वत्ता। एक्कसहावा वि पूणो ते चिय णयभेयगहणेण ।।५८।।

= प्रमाणकी अपेक्षा करनेपर भाव अनेकस्वभावोंसे निष्पन्न भी हैं और नय भेदकी अपेक्षा करनेपर वे एक स्वभावी भी हैं।

समयसार / आत्मख्याति परिशिष्ट "अत्र स्वात्मवस्तुज्ञानमात्रतया अनुशात्यमानेऽपि न तत्परिकोपः, ज्ञानमात्रस्यात्मवस्तुनः स्वमेवानेकान्तत्वात्।....अन्तश्वकचकायमानज्ञानस्वरूपेण तत्त्वाद् बहिरुन्मिषदनन्तज्ञेयतापन्नस्वरूपातिरिक्तपररूपेणातत्त्वात्। सहक्रमप्रवृत्तानन्तचिदंशसमुदयरूपाविभागद्रव्येणैकत्वात्। अविभागैकद्रव्यप्राप्तसहक्रमप्रवृत्तानन्तचिदंशरूपपर्यायैरनेकत्वात्, स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावभवनशक्तिस्वभाववत्त्वेन सत्त्वात्, परद्रव्यक्षेत्रकालभावाभवनशक्तिस्वभाववत्वेनासत्त्वात्, अनादिनिधनाविभागैकवृत्तिपरिणत्वेन नित्यत्वात्, क्रमप्रवृत्तैकसमयावच्छिन्नानेकवृत्त्यंशपरिणतत्वेनानित्यत्वात्तदत्त्वमेक्कानेकत्वं सदसत्त्वं नित्यानित्यत्वं च प्रकाशत एव।....

= इसलिए आत्मवस्तुको ज्ञानमात्रता होनेपर भी, तत्त्व-अतत्त्व, एकत्व-अनेकत्व, सत्त्व-असत्त्व और नित्यत्वपना प्रकाशता ही है, क्योंकि उसके अन्तरंगमें चकचकित ज्ञानस्वरूपके द्वारा तत्पना है; और बारह प्रगट होते, अनन्त ज्ञेयत्वको प्राप्त, स्वरूपसे भिन्न ऐसे पररूपके द्वारा अतत् पना है। सहभूत प्रवर्तमान और क्रमशः प्रवर्तमान अनन्त चैतन्य अंशोंके समूदायरूप अविभाग द्रव्यके द्वारा एकत्व है और अविभाग एक द्रव्यमें व्याप्त, सहभूत प्रवर्तमान तथा क्रमशः प्रवर्तमान अनन्त चैतन्य अंशरूप पर्यायोंके द्वारा अनेकत्व है। अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूपमें होनेकी शक्तिरूप जो स्वभाव है उस स्वभाववानपनेके द्वारा सत्त्व है और परके द्रव्य, क्षेत्र, काल भावरूप न होनेकी शक्तिरूप जो स्वभाव है, उस स्वभाववानपनेके द्वारा असत्त्व है, अनादि निधन अविभाग एक वृत्तिरूपसे परिणतपनेके द्वारा नित्यत्व है; और क्रमशः प्रवर्त्तमान एक समयकी मर्यादावाले अनेक वृत्ति अंशीरूपसे परिणतपनेके द्वारा अनित्यत्व है। - दे.नय X/९/५।

  1. नयोंको एकत्र मिलानेपर भी उनका विरोध कैसे दूर होता है

स्वयंभू स्त्रोत्र / श्लोक संख्या ६१ य एव नित्यक्षणिकादयो नया मिथोऽनपेक्षाः स्वपरप्रणाशिनः। त एव तत्त्वं विमलस्य ते मुनेः, परस्परेक्षाः स्वपरोपकारि।

= जो ही ये नित्य क्षणिकादि नय परस्परमें अनपेक्ष होनेसे स्व-पर प्रणाशी हैं, वे ही नय हैं प्रत्यक्षज्ञानी विमल जिन! आपके मतमें परस्पर सापेक्ष होनेसे स्व-पर उपकारी है।

स्याद्वादमंजरी श्लोक संख्या ६०/३३६/१३ ननु प्रत्येकं नयानां विरुद्धत्वं कथं समुदितानां निर्विरोधिता। उच्यते। यता हि समीचीनं मध्यस्थं न्यायनिर्णीतारमासाद्य परस्परं विवदमाना अपि वादिनो दिवादाद् विरमन्ति, एवं नया अन्योऽन्यं वैरायमाणा अपि सर्वज्ञशासनमुपेत्य स्याच्छब्दप्रयोगोपशमितविप्रतिपत्तयः सन्तः परस्परमत्यन्तं सुहृद्भूयावतिष्ठन्ते।

= प्रश्न-यदि प्रत्येक नय परस्पर विरुद्ध हैं तो उन नयोंके एकत्र मिलानेसे उनका विरोध किस प्रकार नष्ट होता है? उत्तर-परस्पर वाद करते हुए वादी लोग किसी मध्यस्थ न्यायीके द्वारा न्याय किये जानेपर विवाद करना बन्द करके आपसमें मिल जाते हैं, वैसे ही परस्पर विरुद्ध नय सर्वज्ञ भगवान्के शासनकी शरण लेकर `स्याद्' शब्दसे विरोधके शान्त हो जानेपर मैत्री भावसे एकत्र रहने लगते है।

(स्याद्वाद/५ में देखो स्यात् पद प्रयोगका महत्त्व)।

  1. विरोधी धर्मोंमें अपेक्षा लगानेकी विधि
  1. सत् असत् धर्मोंकी योजना विधि-

- (देखे सप्तभंगी ४)।

  1. एक अनेक धर्मोंकी योजना विधि-

पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक सं./केवल भावार्थ-"द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके द्वारा वह सत् अखण्ड या एक कैसे सिद्ध होता है, इसका निरूपण करते हैं ।।४३७।। १. द्रव्यकी अपेक्षा-गुणपर्यायवान् द्रव्य कहनेसे यह अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए कि उस सत्के कुछ अंश गुण रूप हैं और कुछ अंश पर्याय रूप हैं, बल्कि उन गुणपर्यायोंका शरीर वह एक सत् है ।।४३८।। तथा वही सत् द्रव्यादि चतुष्टयके द्वारा अखण्डित होते हुए भी अनेक है, क्योंकि व्यतिरेकके बिना अन्वय भी अपने पक्षकी रक्षा नहीं कर सकता है ।।४९४।। द्रव्य, गुण व पर्याय इन तीनोंमें संज्ञा लक्षण प्रयोजनकी अपेक्षाभेद सिद्ध होनेपर वह सत् अनेक रूप क्यों न होगा ।।४९५।। २. क्षेत्रकी अपेक्षा-क्षेत्रके द्वारा भी अखण्डित होनेके कारण सत् एक है ।।४९५।। २. क्षेत्रकी अपेक्षा-क्षेत्रके द्वारा भी अखण्डित होनेके कारण सत् एक है ।।४५४।। अखण्ड भी उस द्रव्यके प्रदेशोंको देखनेपर-जो सत् एक प्रदेशमें है वह उसीमें है उससे भिन्न दूसरे प्रदेशमें नहीं। अर्थात् प्रत्येक प्रदेशकी सत्ता जुदा-जुदा दिखाई देती है। इसलिए कौन क्षेत्रसे भी सत्को अनेक नहीं मानेगा ।।४९६।। ३. कालकी अपेक्षा-वह सत् बार बार परिणमन करता हुआ भी अपने प्रमाणके बराबर रहनेसे अथवा खण्डित नहीं होनेसे कालकी अपेक्षासे भी एक है ।।४७८।। क्योंकि सत्की पर्यायमालाको स्थापित करके देखें तो एक समयकी पर्यायमें रहनेवाला जो जितना व जिस प्रकारका सत् है, वही उतना तथा उसी प्रकारका सम्पूर्ण सत् समुदित सब समयोंमें भी है। कहीं कालकी वृद्धि-हानि होनेसे शरीरकी भाँति उसमें वृद्धि-हानि नहीं हो जाती ।।४७२-४७४।। पृथक्-पृथक् पर्यायोंको देखनेपर जो सत् एक कालमें है, वह सत् अर्थात् विवक्षित पर्याय विशिष्ट द्रव्य उससे भिन्न कालमें नहीं है। इसलिए कालसे वह सत् अनेक हैं ।।४९७।। ४. भावकी अपेक्षा-(यदि सम्पूर्ण सत्को गुणोंकी पंक्तिरूपसे स्थापित करके केवल भावसुखेन देखो तो इन गुणोंमें सब सत् ही है और यहाँपर कुछ भी नहीं है। इसलिए वह सत् एक है ।।४८१।। जिस-जिस भावमुखसे जिस-जिस समय सत्की विवक्षा की जायेगी, उस-उस समय वह सत् उस-उस भावभय ही कहा जायेगा या प्रतीतिमें आयेगा अन्य भावरूप नहीं। इस प्रकार भावकी अपेक्षा वह सत् अनेक भी है ।।४९८।।

  1. अनित्य व नित्य धर्मोंकी योजना विधि

पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक सं. "जिस समय केवल वस्तु दृष्टिगत होती है और परिणाम दृष्टिगत नहीं होता उस समय द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा सर्व वस्तु नित्य है ।।३३९।। जिस समय यहाँ केवल परिणाम दृष्टिगत होता है और वस्तु दृष्टिगत नहीं होती, उस समय पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे, नवीन पर्याय रूपसे उत्पन्न और पूर्व पर्यायरूपसे विनष्ट होनेसे सब वस्तु अनित्य है।

  1. तत् व अतत् धर्मोंकी योजना विधि

पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लो.सं. "परिणमन करते हुए भी अपने सम्पूर्ण परिणमनोंमें तज्जातीयपना उल्लंघन न करनेके कारण वह सत् तत् रूप है ।।३१२।। परन्तु सत् असत्की तरह पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा देखनेपर प्रत्येक पर्यायमें वह सत् अन्य अन्य दिखनेके कारण असत् रूप भी है ।।३३३।।

  1. विरोधी धर्म बतानेका प्रयोजन

पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक संख्या ३३२,४४२ अयमर्थः सदसद्वत्तदतदपि च विधिनिषेधरूपं स्यात्। न पुनर्निरपेक्षतया तद्द्वयमपि तत्त्वमुभयतया ।।३३२।। स्यादेकत्वं प्रति प्रयोजक स्यादखण्डवस्तुत्वम्। प्रकृतं यथासदेकं द्रव्येणाखण्डितं मतं तावत्।।

= सत्-असत्की तरह तत्-अतत् भी विधिनिषेध रूप होते हैं, किन्तु निरपेक्षपने नहीं क्योंकि परस्पर सापेक्षपनेसे वे दोनों तत्-अतत् भी तत्त्व हैं ।।३३२।। कथंचित् एकत्व बताना वस्तुकी अखण्डताका प्रयोजक है।

न.च./श्रु./पृ.६५-६७/ भावार्थ "स्यात् नित्यका फल चिरकाल तक स्थायीपना है। स्यादनित्यका फल निज हेतुओंके द्वारा अनित्य स्वभावी कर्मके ग्रहण व परित्यागादि होते हैं।"