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बौद्धदर्शन

From जैनकोष



  1. सामान्य परिचय
    1. इस मत का अपरनाम सुगत है । सुगत को तीर्थंकर, बुद्ध अथवा धर्मधातु कहते हैं । ये लोग सात सुगत मानते हैं - विपर्श्या, शिखी, विश्वभू, क्रकुच्छन्द, कांचन, काश्यय और शाक्यसिंह । ये लोग बुद्ध भगवान्‌ को सर्वज्ञ मानते हैं ।
    2. बुद्धों के कण्ठ तीन रेखाओं से चिह्नित होते हैं । बौद्धसाधु चमर, चमड़े का आसन, व कमण्डलु रखते हैं । मुण्डन कराते हैं । सारे शरीर को एक गेरुवे वस्त्र से ढके रहते हैं ।
  2. उत्पत्ति व आचार-विचार
    1. काल व उपदेश की समानता के कारण जैनव बौद्धमत को कोई-कोई एक मानता है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है । जैन शास्त्रों में इसकी उत्पत्ति सम्बन्धी दो दृष्टियाँ प्राप्त हैं ।
    2. उत्पत्ति सम्बन्धी दृष्टि नं. १
      द.सा./मू./६-७ श्री पार्श्व नाथतीर्थे सरयूतीरे पलाशनगरस्‍थ । पिहितास्रवस्य शिष्यो महाश्रुतो बुद्धिकीतिमुनिः ।६। तिमिपूर्णाशनैः अधिगतप्रव्रज्यातः परिभ्रष्टः । रक्ताम्बरं धृत्वा प्रवर्तितं तेन एकान्तम्‌ ।७।
      गो.जो./जी.प्र./१६ बुद्धदर्शनादयः एकान्तमिथ्यादृष्टयः । = श्रीपार्श्वनाथ भगवान्‌ के तीर्थ में सरयू नदी के तटवर्ती पलाश नामक नगर में पिहिताश्रव साधु का शिष्य बुद्धिकीर्ति मुनि हुआ,जो महाश्रुत व बड़ा भारी शास्त्रज्ञ था ।६। मछलियों का आहार करने से वह ग्रहण की हुई दीक्षा से भ्रष्ट हो गया और रक्ताम्बर (लाल वस्त्र) धारण करके उसने एकान्त मत की प्रवृत्ति की ।७। बुद्धदर्शन आदि ही एकान्त मिथ्यादृष्टि है ।
      द.सा./प्र./२६ प्रेमीजी, बुद्धकीर्ति सम्भवतः बुद्धदेव (महात्मा बुद्ध) का ही नामान्तर था । दीक्षा से भ्रष्ट होकर एकान्त मत चलाने से यह अनुमान होता है कि यह अवश्य ही पहले जैन साधु था । बुद्धिकीर्ति को पिहितास्रव नामक साधु का शिष्य बतलाया है । स्वयं ही आत्मारामजी ने लिखा है कि पिहितास्रव पार्श्वनाथ की शिष्य परम्परा में था । श्वेताम्बर ग्रन्थों से पता चलता है कि भगवान्‌ महावीर के समय में पार्श्वनाथ की शिष्य परम्परा मौजूद थी ।
    3. उत्पत्ति सम्बन्धी दृष्टि नं. २
      धर्म परीक्षा /१/६ रुष्टः श्रीवीरनाथस्य तपस्वी मौडिलायनः । शिष्यः श्रीपार्श्वनाथस्य विदधे बुद्धदर्शनम्‌ ।६। शुद्धोदनसुतं बुद्ध परमात्मानमब्रवीत्​ । = भगवान्‌ पार्श्वनाथ की शिष्य परम्परा में मौडिलायन नाम का तपस्वी था । उसने महावीर भगवान्‌ से रुष्ट होकर बुद्धदर्शन को चलाया और शुद्धोदन के पुत्र बुद्ध को परमात्मा कहा ।
      द. सा./प्र./२७ प्रेमी जी नं. १ व नं. २ दृष्टियों में कुछ विरोध मालूम होता है, पर एक तरह से उनकी संगति बैठ जाती है । महावग्ग आदि बौद्ध ग्रन्थों से मालूम होता है कि मौडिलायन और सारीपुत्त दोनों बुद्धदेव के शिष्य थे । वे जब बुद्धदेव के शिष्य होने जा रहे थे, तो उनके साथी संजय परिव्राजकने  उन्हें रोका था । इससे मालूम होता  है कि ‘धर्म’ परीक्षा की मान्यता के अनुसार ये अवश्य पहले जैन रहे होंगे ।
      परन्तु इस प्रकार वे बुद्ध के शिष्य थे न कि मतप्रवर्तक । सम्भवतः बौद्धधर्म के प्रधान प्रचारकों में से होने के कारण इन्हें प्रवर्तक कह दिया गया हो । बस नं. १ व नं. २ की संगति ऐसे बैठ जाती है कि भगवान्‌ पार्श्वनाथ के तीर्थ में पिहितास्रव मुनि हुए । उनके शिष्य बुद्धदेव हुए, जिन्होंने बौद्धधर्म चलाया, और उनके शिष्य मौडिलायन हुए जिन्होंने इस धर्म का बहुत अधिक प्रचार किया ।
    4. बौद्ध लोगों का आचार-विचार
      द. सा./मू./८-९ मासस्य नास्ति जीवो यथा फले दधिदुग्धशर्करायां च । तस्मात्तं वाञ्छन्‌ तं भक्षन्‌ न पापिष्ठः ।८। मद्यं न वर्जनीयं द्रवद्रव्यं यथा जलं यथा एतत्‌ । इति लोके घोषयित्वा प्रवर्तितं सर्वसावद्यं ।९। = फल, दूध, दही, शक्कर आदि के समान मांस में भी जीव नहीं हैं । अतएव उसकी इच्छा करने और भक्षण करने में पाप नहीं है ।८। जिस प्रकार जल एक तरल पदार्थ है उसी प्रकार मद्य भी तरल पदार्थ है, वह त्याज्य नहीं है । इस प्रकार की घोषणा करके उस (बुद्धिकीर्ति) ने संसार में सम्पूर्ण पापकर्म की परिपाटी चलायी ।९।
      द.सा./प्र./२७ प्रेमी जी, उपरोक्त बात ठीक मालूम नहीं होती, क्योंकि बौद्धधर्म प्राणिवध का तीव्र निषेध करता है, वह ‘मांस में जीव नहीं है’ यह कैसे कह सकता है । दूसरे बौद्ध साधुओं के विनयपि‍टक आदि ग्रन्थों में दशशील ग्रहण करने का आदेश है, जो एक प्रकार से बौद्धधर्म के मूलगुण हैं, उनमें से पाँचवाँ शील इन शब्दों में ग्रहण करना पड़ता है । मैं मद्य या किसी भी मादक द्रव्य का सेवन नहीं करूँगा, ऐसी दशा में मद्य सेवन की आज्ञा बुद्धदेव ने दी होगी, यह नहीं कहा जा सकता ।
      स.म./परि.ख./३८५ यद्यपि बौद्ध साधु जीवदया पालते हैं, चलते हुए भूमि को बुहार कर चलते हैं, परन्तु भिक्षा पात्रों में आये हुए मांस को भी शुद्ध मानकर खा लेते हैं । ब्रह्मचर्य आदि क्रियाओं में दृढ़ रहते हैं ।
  3. बौद्ध सम्प्रदाय
    1. बुद्ध निर्वाण के पश्चात्‌ बौद्ध लोगों में दो सम्प्रदाय उत्पन्न हो गये । महासंघिक व स्थविर । ई. पू. ४०० की वैशाली परिषद्‌ में महासंघिक ९ शाखाओं में विभक्त हो गये- महासंघिक, एक व्यवहारिक, लोकोत्तरवादी, कुकुल्लिक, बहुश्रुतीय, प्रज्ञप्तिवादी, चैत्तिक, अपरशैल, और उत्तरशैल । स्थविरवादी ११ संघों में विभक्त हुए - हैमवत, सर्वास्तिवाद, धर्मगुप्तिक, महीशासक, काश्यपीय, सौत्रान्तिक, वात्सीपुत्रीय, धर्मोत्तरीय, भद्रयानीय, सम्मितीय, और छत्रागरिका । सर्वास्तिवादी (वैभाषिक) और सौत्रान्तिक के अतिरिक्त इन शाखाओं का कोई विशेष उल्लेख अब नहीं मिलता । (परि. ख /३८५) ।
    2. बौद्धों के प्रधान सम्प्रदाय निम्न प्रकार हैं -

बौद्ध

महायान या महासंघिक
(तर्कप्रधानी)

हीनयान या स्थविरवादी
(रूढ़िवादी)

विज्ञानवादयायोगाचार

माध्यमिकयाशून्यवाद

वैभाषिक

सौत्रान्तिक

महायानका लक्ष्यपर-कल्याणपर है।
ये लोगश्रावक पद की दश भूमिस्वीकार करते हैं।

हीनयान का लक्ष्य अर्हंत पद कीप्राप्ति मात्र है ।
ये लोग श्रावक पदकी चार भूमि स्वीकार करते हैं ।

  1. प्रवर्तक साहित्य व समय
    स.म./परि.ख./३८६-३८९
    1. विनय पिटक, सुत्तपिटक, और अभिधम्म पिटक ये पिटकत्रय ही बौद्धों का प्रधान आगम है । इनमें से सुत्तपिटक के पाँच खण्ड हैं - दीघनिकाय, मज्झिम निकाय, संयुक्त निकाय, अंगुत्तरनिकाय और खुद्दकनिकाय । (भारतीयदर्शन) ।
    2. सौत्रान्तिकों में धर्मत्राता (ई १००) कृत पंचवस्तु विभाषा शास्त्रः, संयुक्ताभिधर्महृदयशास्‍त्र, अवदान सूत्र, घोष (ई. १५०) कृत अभिधर्मामृत शास्त्रः, बुद्धदेव (ई. १००) का कोई शास्त्र उपलब्ध नहीं है:वसुमित्र (ई. १०० ) कृत अभिधर्मप्रकरणपाद, अभिधर्म धातुकाय पद, अष्टदश निकाय तथा आर्यवसुमित्र, बोधिसत्त्व, संगीत शास्‍त्र - ये चार विद्वान् व उनके ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं । (स.म./परि, ख/३८८) ।
    3. वैभाषिकों में - कात्यायनीपुत्र का ज्ञानप्रस्थानशास्त्र या विशाखा; सारीपुत्र का धर्मस्कन्ध; पूर्ण का धातुकाय, मौगलायनका प्रज्ञप्ति शास्त्र; देवक्षेम का विज्ञानकाय;  सारीपुत्र का संगीतिपर्याय और वसुमित्र का प्रकरणवाद प्रसिद्ध ग्रन्थ है । इनके अतिरिक्त भी ई. ४२०-५०० में वसुबन्ध ने अभिधर्म कोश (वैभाषिक कारिका तथा उसका भाष्य लिखा) यशोमित्र ने इस ग्रन्थ पर अभिधान धर्मकोश व्याख्या लिखी । संषभद्र ने समय प्रदीप, न्यायानुसार नामक गन्‍थ लिखे । दिङ्‌नागने भी प्रमाणसमुच्चय, न्‍यायप्रवेश, हेतुचक्रहमरु, प्रमाणसमुच्‍चय  वृत्ति, आलम्बन परीक्षा, त्रिकाल-परीक्षा आदि न्याय ग्रन्थों की रचना की ।
    4. इनके अतिरिक्त भी धर्मकीर्ति (ई. ६३५) विनोददेव, शान्तभद्र, धर्मोत्तर (ई. ८४१) रत्नकीर्ति, पण्डित अशोक, रत्नाकर, शान्ति आदि विद्वान्‌ इन सम्प्रदायों के उल्लेखनीय विद्वान्‌ हैं ।
  2. मूल सिद्धान्त विचार
    1. बौद्ध दर्शन में दुःख से निवृत्तिका उपाय ही प्रधान है तत्त्व या प्रमेयों का विचार नहीं । ये लोग चार आर्य सत्य मानते हैं- संसार दुःखमय है, दुःख समुदाय अर्थात दुःख का कारण, दुःख निरोध अर्थात्‌ दुःख नाश की सम्भावना और दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद अर्थात्‌ दुःख नाश का उपाय ।
    2. संसार दुःखमय है । दुःख परम्परा का मूल अविद्या है । अविद्या हेतुक परम्परा की प्रतीत्य समुत्पाद कहते हैं । वह निम्न प्रकार १२ भागों में विभाजित है ।
      1. अविद्या से संस्कार,
      2. संस्कार से विज्ञान,
      3. विज्ञान से नामरूप,
      4. नामरूप से षडायतन (मन सहित पाँच इन्द्रियाँ),
      5. षडायतन से स्पर्श,
      6. स्पर्श से वेदना,
      7. वेदना से तृष्णा,
      8. तृष्णा से उपादान,
      9. उपादान से भव (संसार में होने की प्रवृत्ति)
      10. भव से जाति,
      11. जाति से जरा,
      12. जरा से मरण ।
      1. सम्मादिट्‌ठि (आर्य सत्‍यों का ज्ञान),
      2. सम्मा संकप्प (रागादि के त्याग का दृढ़ निश्चय),
      3. सम्मावाचा (सत्य वचन),
      4. सम्मकम्मन्त (पापों का त्याग),
      5. सम्माआजीव (न्यायपूर्वक आजीविका),
      6. सम्मा वायाम (अशुभ से निवृत्ति और शुभ में प्रवृत्ति),
      7. सम्मासत्ति (चित्त शुद्धि),
      8. सम्मा समाधि (चित्त की एकाग्रता)। ये आठ दुःखनिवृत्ति के उपाय हैं ।
    3. बुद्धत्व प्राप्ति की श्रेणियाँ हैं-श्रावकपद, प्रत्येक बुद्ध अर्थात्‌ जन्म से ही सम्यग्दृष्टि व बोधिसत्त्व अर्थात्‌ स्व व पर कल्याणकी भावना ।
  3. श्रावक की भूमियाँ
    1. हीनयान (स्थविरवादी) चार भूमियाँ मानते हैं-स्रोतापन्न (सम्यग्दृष्टि आदि - साधक); सकृद्‌गामी (एक भवावतारी), अनागामी (चरम शरीरी), अर्हत्‌ (बोधिको प्राप्त) ।
    2. महायान (महासंघिक) दस भूमियाँ मानते हैं-
      1. मुदिया (पर कल्याण की भावना का उदय),
      2. विमला (मन,वचन, कार्य द्वारा शीलपारमिता का अभ्यास व साधना),
      3. प्रभाकरी (धैर्यपारमिता का अभ्यास अर्थात्‌ तृष्णाओं की क्षति),
      4. अचिष्मती (वीर्य पारमिता का अभ्यास अर्थात्‌ चित्त की साम्यता);
      5. अभिमुक्ति (प्रज्ञा पारमिता का अभ्यास अर्थात्‌ समता का अनुभव, सब पर समान (दया का भाव)
      6. दूरंगमा (सर्वज्ञत्व की प्राप्ति),
      7. अचला (अपने को जगत्‌ से परे देखता है),
      8. साधमति (लोगों के कल्याणार्थ उपाय सोचता है),
      9. धर्ममेव (समाधिनिष्ठ होकर अन्त में बुद्धत्‍व को प्राप्त अवस्था) ।
  4. हीनयान वैभाषिक की अपेक्षा तत्त्वविचार
    जगत्‌ व चित्त सन्तति दोनों की पृथक्‌-पृथक्‌ सत्ता को स्वीकार करते हैं । तहाँ जगत्‌ की  सत्ता बाहर में है जो इन्द्रियों द्वारा जानने में आती है, और चित्तसन्तति की सत्ता अन्तरंग में है । यह लोग क्षणभंगवादी हैं ।
    1. समस्त जगत्‌ तीन भागों में विभक्त है-स्कन्ध, आयतन, धातु ।
    2. स्कन्ध पाँच हैं-चार स्कन्धों का सम्बन्ध मानसिक वृत्तियों से है ।
    3. आयतन १२ हैं-मनसहित छह इन्द्रियाँ तथा छह इनके विषय । इन्हें धातु कहते हैं । इनसे छह ही प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता है । आत्मा का ज्ञान इन्द्रियों से नहीं होता, इसलिए आत्मा कोई वस्तु नहीं है । मन में ६४ धर्म है और शेष में एक-एक है ।
    4. धातु १८ हैं-६इन्द्रियधातु (चक्षुधातु, श्रोत्रधातु, घ्राणधातु, रसनाधातु, कायधातु, मनोधातु), ६ इन्द्रियों के विषय (रूपधातु, शब्द, गन्ध, रस स्प्रष्टव्य तथा धर्मधातु), ६ विज्ञान (चक्षुविज्ञान, श्रोत्र, घ्राण, रसना, काय, और मनोविज्ञान या अन्तर्हृदय के भावों का ज्ञान ।
    5. धर्म- भूत और चित्त के उन सूक्ष्म तत्त्वों को धर्म कहते हैं जिनके आघात व प्रतिघात से समस्त जगत्‌ की स्थिति होती है । सभी धर्म सत्तात्मक हैं तथा क्षणिक हैं । ये दो प्रकार के हैं-असंस्कृत व संस्कृत । नित्य, स्थायी, शुद्ध व अहेतुक (पारिणामिक) धर्मों को असंस्कृत कहते हैं ।
    6. असंस्कृत धर्म तीन हैं- प्रतिसंख्या निरोध, अप्रतिसंख्या निरोध तथा आकाश । प्रज्ञाद्वारा रागादिक सास्रव धर्मों का निरोध  (अर्थात्‌ धर्मध्यान) प्रतिसंख्या निरोध कहलाता है । बिना प्रज्ञा के सास्रव धर्मों का निरोध (अर्थात्‌ शुक्लध्यान) अप्रतिसंख्या निरोध कहलाता है । अप्रतिसंख्या ही वास्तविक निरोध है । आवरण के अभाव को आकाश  कहते हैं । यह नित्य व अपरिवर्तनशील है ।
    7. संस्कृत धर्म चार हैं-रूप, चित्त, चैतसिक तथा चित्त-विप्रमुक्त। इनमें भी रूप के ११, चित्त का १. चैतसिक के ४६ और चित्त-विप्रमुक्त के १६ भेद हैं । पाँच इन्द्रिय तथा पाँच उनके विषय तथा अविज्ञप्ति ये ग्यारह रूप अर्थात्‌ भौतिक पदार्थों के भेद हैं । इन्द्रियों व उनके विषयों के परस्पर आघात से चित्त उत्पन्न होता है । यही मुख्य तत्त्व है ।
      इसी में सब संस्कार रहते हैं । इसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, क्योंकि हेतु प्रत्यय से उत्पन्न होती है । यह एक है, पर उपाधियों के कारण इसके अनेक भेद-प्रभेद हैं । यह प्रतिक्षण बदलता है । इस लोक व परलोक में यही आता-जाता है । चित्त से घनिष्ट सम्बन्ध को रखने वाले मानसिक व्यापार  चैतसिक या चित्त-संप्रयुक्त धर्म कहते हैं । इसके ४६ प्रभेद हैं । जो धर्म न रूप धर्मों में और न चित्त धर्मों में परिगतिण हो, उन्हें चित्त-विप्रयुक्त धर्म कहते हैं । इनकी संख्या १४ है ।
    8. निर्वाण - एक प्रकार का असंस्कृत या स्वाभाविक धर्म है, जिसे अर्हत्‌ जन सत्य मार्ग के अनुसरण से प्राप्त होते हैं । यह स्वतन्त्र, सत्‌ व नित्य है । यह ज्ञान का आधार है । यह एक है तथा सर्व भेद इसमें विलीन हो जाते हैं । यह आकाशवत्‌ अनन्त, अपरिमित व अनिर्वचनीय है ।
  5. हीनयान सौत्रान्तिककी अपेक्षा तत्त्वविचार
    1. अन्तर जगत्‌ सत्‌ है पर बाह्य जगत्‌ नहीं । वह केवल चित्त में उत्पन्न होने वाले धर्मों पर निर्भर है ।
    2. इनके मत में बुझे हुए दीपकवत्‌ ‘निर्वाण’ धर्मों के अनुत्पाद रूप है, यह असंस्कृत धर्म नहीं है, क्योंकि मार्ग के द्वारा उत्पन्न होता है ।
    3. इनके मत में उत्पत्ति से पूर्व व विनाश के पश्चात्‌ शब्द की स्थिति नहीं रहती, अतः वह अनित्य  है ।
    4. सत्तागत दो वस्तुओं में कार्यकारण भाव  ये लोग नहीं मानते ।
    5. वर्तमान काल के अतिरिक्त भूत, भविष्यत्‌ काल भी नहीं है ।
    6. इनके मत में परमाणु निरवयव होता है । अतः इनके संघटित होने पर भी यह पृथक्‌ ही रहते हैं । केवल उनका परिमाण ही बढ़ जाता है ।
    7. प्रतिसंख्या व अप्रतिसंख्या धर्मों में विशेष नहीं मानते । प्रतिसंख्या निरोध में प्रज्ञा द्वारा रागादिक का निरोध हो जाने पर भविष्य में उसे कोई क्लेश न होगा । और अप्रतिसंख्या निरोध में क्लेशों  का नाश हो जाने पर दुःख की आत्यन्तिकी निवृत्ति हो जायेगी, जिससे कि वह भवचक्र से छूट जायेगा ।
  6. महायान योगाचार या विज्ञानवाद की अपेक्षा तत्त्वविचार
    1. बाह्य जगत्‌ असत्‌ है ।
    2. चित्त या विज्ञान ही एक मात्र परम तत्त्व है । चित्त ही की प्रवृत्ति व मुक्ति होती है । सभी वस्तुएँ एक मात्र चित्त के विकल्प हैं । अविद्या के कारण ज्ञाता, ज्ञान व ज्ञेय में भेद मालूम होता है । वह दो प्रकार का है - प्रवृत्तिविज्ञान व आलय-विज्ञान ।
    3. आलय-विज्ञान को तथागत गर्भ भी कहते हैं । समस्त कायिक, वाचिक व मानसिक विज्ञानों के वासनारूप बीज आलय-विज्ञानरूप चित्त में शान्त भाव से पड़े रहते हैं, और समय आने पर व्यवहाररूप जगत्‌ में प्रगट होते हैं । पुनः इसी में उसका लय भी हो जाता है । एक प्रकार से यही आलय-विज्ञान व्यावहारिक जीवात्मा है ।
    4. आलय-विज्ञान क्षणिक विज्ञानों की सन्तति मात्र है । इसमें शुभ तथा अशुभ सभी वासनाएँ रहती हैं । इन वासनाओं के साथ-साथ इस आलय में सात और भी विज्ञान हैं, जैसे - चक्षुविज्ञान, श्रोत्र, घ्राण, रसना, काय, मनो तथा क्लिष्टमनोविज्ञान । इन सब में मनोविज्ञान आलय के साथ सदैव कार्य में लगा रहता है और साथ ही साथ अन्य छह विज्ञान भी कार्य में लगे  रहते हैं । व्यवहार में आनेवाले ये सात विज्ञान ‘प्रवृतिविज्ञान’ कहलाते हैं । वस्तुतः प्रवृत्तिविज्ञान आलयविज्ञान पर ही निर्भर है  ।
  7. महायान माध्यमिक या शून्यवाद की अपेक्षा तत्त्वविचार
    1. तत्त्वदृष्टि से न बाह्य जगत्‌ की सत्ता है न अन्तर्जगत्‌ की ।
    2. सभी शून्य के गर्भ में विलीन हो जाते हैं । यह न सत्‌ है और न असत्‌, न उभय है न अनुभय । वस्तुतः यह अलक्षण है । ऐसा शून्य ही एक मात्र परम तत्त्व है । यह स्वलक्षण मात्र है । उसकी सत्ता दो प्रकार की है - संवृत्ति सत्य और परमार्थ सत्य ।
    3. संवृति सत्य पारमार्थिक स्वरूप का आवरण करने वाली है । इसी को अविद्या, मोह आदि कहते हैं । यह संवृति भीदो प्रकार की है - तथ्य संवृति व मिथ्या संवृति । जिस घटना को सत्य मानकर लोक का व्यवहार चलता है उसे लोक संवृति या तथ्य संवृति कहते हैं । और जो घटना यद्यपि किसी कारण से उत्पन्न अवश्य होती है पर उसे सभी लोग सत्य नहीं मानते, उसे मिथ्या संवृति कहते हैं ।
    4. परमार्थ सत्य  निर्वाणस्वरूप है । इसे शून्यता, तथता, भूतकोटि, धर्मधातु आदि भी कहते हैं । निःस्वभावता ही वस्तुतः परमार्थ सत्य है । अनिर्वचनीय है । (और भी देखें - शून्यवाद ) ।
  8. प्रमाणविचार
    1. हीनयान वैभाषिक सम्यग्ज्ञान को प्रमाण कहते हैं । वह दो प्रकार है - प्रत्यक्ष व अनुमान ।
    2. कल्पना व भ्रान्ति से रहित ज्ञान प्रत्यक्ष  है । यह चार प्रकार का है - इन्द्रियज्ञान, मनोविज्ञान (श्रुतज्ञान), आत्मसंवेदन (सुख-दुःख आदि चैतसिक धर्मों का अपने स्वरूप मेंप्रगट होना) ; योगिज्ञान (सद्‌भूत अर्थों की चरमसीमा वाला ज्ञान)।प्रत्यक्ष ज्ञान स्‍वलक्षण है, यही परमार्थ सत्य है ।
    3. अनुमान दो प्रकार है - स्वार्थ व परार्थ । हेतु, सपक्ष व वि‍पक्ष को ध्यान में रखते हुये जो ज्ञान स्वतः हो उसे स्वार्थ कहते हैं । उपदेशादि द्वारा दूसरे से प्राप्त किया गया ज्ञान परार्थानुमान है ।
    4. इसमें तीन प्रकार के हेतु होते हैं - अनुपलब्धि, स्वभाव व कार्य । किसी स्थान विशेषपर घटका न मिलना उसकी अनुपलब्धि है । स्वभाव सत्तामात्र भावी हेतु स्वभाव हेतु हैं । धुएँरूप कार्य को देखकर अग्निरूप साध्य का अनुमान करना कार्य हेतु है । इन तीनों के अतिरिक्त अन्य हेतु नहीं है । अनुमान ज्ञान अवास्तविक है । हेतु में पक्ष, सपक्ष और विपक्ष व्यावृत्ति ये तीनों बातें रहनी चाहिए, अन्यथा वह हेत्वाभास होगा ।
    5. हेत्वाभास तीन प्रकार है - असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक ।
    6. अनुभव दो प्रकार है - ग्रहण व अध्यवसाय । ज्ञान का निर्विकल्प रूप (दर्शन) ग्रहण कहलाता है । तत्पश्चात्‌ होनेवाला साकार ज्ञान अध्यवसाय कहलाता है । चक्षु, मन व श्रोत्र दूर होने से अपने विषय का ज्ञान प्राप्‍तकरती है  किन्तु अन्य इन्द्रियों के लिए अपने-अपने विषय के साथ सन्निकर्ष करना आवश्यक है ।
  9. जैन व बौद्धधर्म की तुलना
    शुद्ध पर्यायार्थिक ऋजुसूत्र नय की अपेक्षा बौद्धवत्‌ जैनदर्शन भी एक निरवयव, अविभागी, एक समयवर्ती तथा स्वलक्षणभूत निर्विकल्प ही तत्त्व मानता है । अहिंसाधर्म तथा धर्म व शुक्लध्यान की अपेक्षा भी दोनों में समानता है । अनेकान्तवादी होने के कारण जैनदर्शन तो उसके विपक्षी द्रव्यार्थिक नय से उसी तत्त्व को अनेक सावयव, विभागी, नित्य व गुण-पर्याय युक्त आदि भी स्वीकार कर लेता है  परन्तु एकान्तवादी होने के कारण बौद्धदर्शन उसे सर्वथा स्वीकार नहीं करता है । इस अपेक्षा दोनों में भेद है । बौद्धदर्शन ऋजुसूत्र नयाभासी है । ( देखें - अनेकान्त / २ / ९ ) एकत्व-अनेकत्व का विधि-निषेध व समन्वय देखें - द्रव्य / ४ ) नित्यत्व व अनित्यत्व का विधि-निषेध व समन्वय देखें - उत्पाद / २

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