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रत्नकरंड श्रावकाचार - सल्लेखना अधिकार - श्लोक 1

From जैनकोष


अथ सागोरणाणुव्रतादिवत् सल्लेखनाप्यनुष्ठातव्या। सा च किं स्वरूपा कदा चानुष्ठातव्येत्याह-

उपसर्गे दुर्भिक्षे जरसि रुजायां च निःप्रतिकारे ।
धर्माय तनुविमोचनमाहुः सल्लेखनामार्याः ॥ १ ॥

आर्या गणधरदेवादय: सल्लेखनामाहु:। किं तत्? तनुविमोचनं शरीरत्याग:। कस्मिन् सति? उपसर्गे तिर्यङ्मनुष्यदेवाचेतनकृते। नि:प्रतीकारे प्रतीकारागोचरे। एतच्च विशेषणं दुर्भिक्षजरारुजानां प्रत्येकं सम्बन्धनीयम्। किमर्थं तद्विमोचनम्? धर्माय रत्नत्रयाराधनार्थं न पुन: परस्य ब्रह्महत्याद्यर्थम्॥ १॥


आगे गृहस्थ को अणुव्रतादि के समान सल्लेखना भी धारण करनी चाहिए। उस सल्लेखना का क्या स्वरूप है तथा किसी समय धारण करने योग्य है, यह कहते हैं-

गणधरादिक देव प्रतिकार रहित उपसर्ग, दुष्काल, बुढ़ापा और रोग के उपस्थित होने पर धर्म के लिए शरीर को छोडऩे को सल्लेखना कहते हैं।

टीकार्थ- उपद्रव को उपसर्ग कहते हैं। वह तिर्यंच, मनुष्य, देव और अचेतनकृत इस प्रकार चार प्रकार का है। जब अन्न की एकदम कमी हो जाती है, सभी जीव-जन्तु भूख से पीडि़त होने लगते हैं, वह दुर्भिक्ष-अकाल कहलाता है। वृद्धावस्था के कारण शरीर अत्यन्त जीर्ण हो जाता है, उसे जरा कहते हैं। रोग की उद्भूति को रुजा कहते हैं। ये चारों इस रूप में उपस्थित हो जायें कि जिनका प्रतिकार नहीं हो सके, तब रत्नत्रयधर्म की आराधना करने के लिए शरीर छोडऩे को सल्लेखना कहते हैं। किन्तु स्व और पर के प्राणघात के लिए जो शरीर का त्याग किया जाता है, वह सल्लेखना नहीं है।
टीकार्थ- उपद्रव को उपसर्ग कहते हैं। वह तिर्यंच, मनुष्य, देव और अचेतनकृत इस प्रकार चार प्रकार का है। जब अन्न की एकदम कमी हो जाती है, सभी जीव-जन्तु भूख से पीडि़त होने लगते हैं, वह दुर्भिक्ष-अकाल कहलाता है। वृद्धावस्था के कारण शरीर अत्यन्त जीर्ण हो जाता है, उसे जरा कहते हैं। रोग की उद्भूति को रुजा कहते हैं। ये चारों इस रूप में उपस्थित हो जायें कि जिनका प्रतिकार नहीं हो सके, तब रत्नत्रयधर्म की आराधना करने के लिए शरीर छोडऩे को सल्लेखना कहते हैं। किन्तु स्व और पर के प्राणघात के लिए जो शरीर का त्याग किया जाता है, वह सल्लेखना नहीं है।

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