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शीलपाहुड़ गाथा 12

From जैनकोष

सीलं रक्खंताणं दंसणसुद्धाण दिढचरित्तणं ।
अत्थि धुवं णिव्वाणं विसएसु विरत्तचित्तणं ॥१२॥
शीलं रक्षतां दर्शनशुद्धानां दृढ़चारित्राणाम्‌ ।
अस्ति ध्रुवं निर्वाणं विषयेषु विरक्तचित्तनाम्‌ ॥१२॥


आगे इसी को शील की मुख्यता द्वारा नियम से निर्वाण कहते हैं -
अर्थ - जिन पुरुषों का चित्त विषयों से विरक्त है, शील की रक्षा करते हैं, दर्शन से शुद्ध हैं और जिनका चारित्र दृढ़ है ऐसे पुरुषों को ध्रुव अर्थात्‌ निश्चय से-नियम से निर्वाण होता है ।
भावार्थ - विषयों से विरक्त होना ही शील की रक्षा है, इसप्रकार से जो शील की रक्षा करते हैं, उन ही के सम्यग्दर्शन शुद्ध होता है और चारित्र अतिचाररहित शुद्ध-दृढ़ होता है ऐसे पुरुषों को नियम से निर्वाण होता है । जो विषयों में आसक्त हैं, उनके शील बिगड़ता है तब दर्शन शुद्ध न होकर चारित्र शिथिल हो जाता है, तब निर्वाण भी नहीं होता है, इसप्रकार निर्वाण मार्ग में शील ही प्रधान है ॥१२॥


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