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शीलपाहुड़ गाथा 17

From जैनकोष

सीलगुणमंडिदाणं देवा भवियाण वल्लहा होंति ।
सुदपारयपउरा णं दुस्सीला अप्पिला लोए ॥१७॥
शीलगुणमण्‍डितानां देवा भव्यानां वल्लभा भवन्‍ति ।
श्रुतपारगप्रचुरा: नं दु:शीला अल्पका: लोके ॥१७॥


आगे कहते हैं कि जो शील गुण से मंडित हैं, वे देवों के भी वल्लभ हैं -
अर्थ - जो भव्यप्राणी शील और सम्यग्दर्शनादि गुण से मंडित है वह देवों के भी उनका देव भी वल्लभ होते हैं, उनकी सेवा देव भी करते हैं, जो श्रुतपारग अर्थात्‌ शास्त्र के पार पहुँचे हैं, ग्यारह अंग तक पढ़े हैं, ऐसे बहुत हैं और उनमें कई शीलगुण से रहित हैं, दु:शील हैं, विषय-कषायों में आसक्त हैं वे तो लोक में ‘अल्पका’ अर्थात्‌ न्यून हैं, वे मनुष्यों के भी प्रिय नहीं होते हैं तब देव कहाँ से सहायक हो ?
भावार्थ - शास्त्र बहुत जाने और विषयासक्त हो तो उसका कोई सहायक न हो, चोर और अन्यायी की लोक में कोई सहायता नहीं करता है, परन्तु शीलगुण से मंडित हो और ज्ञान थोड़ा भी हो तो उसके उपकारी सहायक देव भी होते हैं, तब मनुष्य तो सहायक होते ही हैं । शील गुणवाला सबका प्यारा होता है ॥१७॥


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