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शीलपाहुड़ गाथा 28

From जैनकोष

उदधी व रदणभरिदो तवविणयंसीलदाणरयणाणं ।
सोहेंतो य ससीलो णिव्वाणमणुत्तरं पत्ते ॥२८॥
उदधिरिव रत्नभृत: तपोविनयशीलदानरत्नानाम्‌ ।
शोभते य सशील: निर्वाणमनुत्तरं प्राप्त: ॥२८॥


आगे जो शील के द्वारा आत्मा शोभा पाता है उसको दृष्टान्त द्वारा दिखाते हैं -
अर्थ - जैसे समुद्र रत्नों से भरा है तो भी जलसहित शोभा पोता है वैसे ही यह आत्मा तप, विनय, शील, दान - इन रत्नों में शीलसहित शोभा पाता है क्योंकि जो शीलसहित हुआ उसने अनुत्तर अर्थात्‌ जिससे आगे और नहीं है ऐसे निर्वाणपद को प्राप्त किया ।
भावार्थ - जैसे समुद्र में रत्न बहुत हैं तो भी जल ही से ‘समुद्र’ नाम को प्राप्त करता है वैसे ही आत्मा अन्य गुणसहित हो तो भी शील से निर्वाणपद को प्राप्त करता है, ऐसे जानना ॥२८॥


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