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शीलपाहुड़ गाथा 3

From जैनकोष

१दुक्खे णज्जदि णाणं णाणं णाऊण भावणा दुक्खं ।
भावियमई व जीवो विसयेसु विरज्जए दुक्खं ॥३॥
२दु:खेनेयते ज्ञानं ज्ञानं ज्ञात्वा भावना दु:खम्‌ ।
भावितमतिश्च जीव: विषयेषु विरज्यति दुक्खम्‌ ॥३॥


आगे कहते हैं कि ज्ञान होने पर भी ज्ञान की भावना करना और विषयों से विरक्त होना कठिन है (दुर्लभ है) -
अर्थ - प्रथम तो ज्ञान ही दु:ख से प्राप्त होता है, कदाचित्‌ ज्ञान भी प्राप्त करे तो उसको जानकर उसकी भावना करना, बारंबार अनुभव करना दु:ख से (दृढ़तर सम्यक्‌ पुरुषार्थ से) होता है और कदाचित्‌ ज्ञान की भावनासहित भी जीव हो जावे तो विषयों को दु:ख से त्यागता है ।
भावार्थ - ज्ञान की प्राप्ति करना, फिर उसकी भावना करना, फिर विषयों का त्याग करना ये उत्तरोत्तर दुर्लभ हैं और विषयों का त्याग किये बिना प्रकृति पलटी नहीं जाती है इसलिए पहिले ऐसा कहा है कि विषय ज्ञान को बिगाड़ते हैं, अत: विषयों को त्यागना ही सुशील है ॥३॥


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