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शीलपाहुड़ गाथा 31

From जैनकोष

जइ णाणेण विसोहो सीलेण विणा बुहेहिं णिद्दिट्ठो ।
दसपुव्वियस्स भावो य ण किं पुणु णिम्मलो जादो ॥३१॥
यदि ज्ञानेन विशुद्ध: शीलेन विना बुधैर्निर्दिष्ट: ।
दशपूर्विकस्य भाव: च न किं पुन: निर्मल: जात: ॥३१॥


आगे कहते हैं कि शील के बिना ज्ञान से ही भाव की शुद्धता नहीं होती है -
अर्थ - जो शील के बिना ज्ञान ही से विसोह अर्थात्‌ विशुद्ध भाव पंडितों ने कहा हो तो दश पूर्व को जाननेवाला जो रुद्र उसका भाव निर्मल क्यों नहीं हुआ, इसलिए ज्ञात होता है कि भाव निर्मल शील ही से होते हैं ।
भावार्थ - कोरा ज्ञान तो ज्ञेय को ही बताता है, इसलिए वह मिथ्यात्व कषाय होने पर विपर्यय हो जाता है,अत: मिथ्यात्व कषाय का मिटना ही शील है, इसप्रकार शील के बिना ज्ञान ही से मोक्ष की सिद्धि होती नहीं, शील के बिना मुनि भी हो जाय तो भ्रष्ट हो जाता है । इसलिए शील को प्रधान जानना ॥३१॥


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