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शीलपाहुड़ गाथा 36

From जैनकोष

लावण्यसीलकुसलो जम्ममहीरुहो जस्स सवणस्स ।
सो सीलो स महप्पा भमिज्ज गुणवित्थरं भविए ॥३६॥
लावण्यशीलकुशल: जन्ममहीरुह: यस्य श्रमणस्य ।
स: शील: स महात्मा भ्रमेत्‌ गुणविस्तार: भव्ये ॥३६॥


आगे कहते हैं कि जो लावण्य और शीलयुक्त हैं वे मुनि प्रशंसा के योग्य होते हैं -
अर्थ - जिस मुनि का जन्मरूप वृक्ष लावण्य अर्थात्‌ अन्य को प्रिय लगता है ऐसा सर्व अंग सुन्दर तथा मन वचन काय की चेष्टा सुन्दर और शील अर्थात्‌ अंतरंग, मिथ्यात्व विषय रहित परोपकारी स्वभाव - इन दोनों में प्रवीण निपुण हो वह मुनि शीलवान्‌ है, महात्मा है, उसके गुणों का विस्तार लोक में भ्रमता है, फैलता है ।
भावार्थ - ऐसे मुनि के गुण लोक में विस्तार को प्राप्त होते हैं, सर्वलोक के प्रशंसा योग्य होते हैं, यहाँ भी शील ही की महिमा जानना और वृक्ष का स्वरूप कहा, जैसे वृक्ष के शाखा, पत्र, पुष्प, फल सुन्दर हों और छायादि करके रागद्वेष रहित सब लोक का समान उपकार करे उस वृक्ष की महिमा सब लोग करते हैं ऐसे ही मुनि भी ऐसा हो तो सबके द्वारा महिमा करने योग्य होता है ॥३६॥


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