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	<title>जैनकोष - User contributions [en]</title>
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		<title>स्थापना नय</title>
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		<updated>2022-12-18T15:35:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/तत्व प्रदीपिका/परि./नय नं.१२-१५&lt;br /&gt;
 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्‍थापनानयेन मूर्तित्‍ववत्‍सकलपुद्‍गलावलम्बि &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;स्‍थापना नय मूर्तित्‍व की भांति सर्व पुद्‍गलों का अवलम्‍बन करने वाला है| &lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अधिक जानकारी के लिए ﻿देखें [[ नय#I.5.3 | नय - I.5.3]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[ स्थापना | पूर्व पृष्ठ ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ स्थापना निक्षेप | अगला पृष्ठ ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category: स]]&lt;br /&gt;
[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106311</id>
		<title>स्थान</title>
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		<updated>2022-12-18T15:18:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;1. स्थान सामान्य का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
1. अनुभाग के अर्थ में&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 5/1,7,1/189/1  &amp;lt;/span&amp;gt;किं ठाणं। उप्पत्ति हेऊ ट्ठाणं।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भाव की उत्पत्ति के कारण को स्थान कहते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 6/1,9-2,1/79/3  &amp;lt;/span&amp;gt;तिष्ठत्यस्यां संख्यायामस्मिन् वा अवस्थाविशेषे प्रकृतय: इति स्थानम् । ठाणं ठिदी अवट्ठाणमिदि एयट्ठो।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिसमें संख्या,अथवा जिस अवस्था विशेष में प्रकृतियाँ ठहरती हैं, उसे स्थान कहते हैं। स्थान, स्थिति और अवस्थान तीनों एकार्थक हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 12/4,2,7,200/111/12  &amp;lt;/span&amp;gt;एगजीवम्मि एक्कम्हि समए जो दीसदि कम्माणुभागो तं ठाणं णाम।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;एक जीव में एक समय में जो कर्मानुभाग दिखता है, उसे स्थान कहते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; गोम्मटसार कर्मकांड / जीवतत्त्व प्रदीपिका/226/272/10  &amp;lt;/span&amp;gt;अविभागप्रतिच्छेदसमूहो वर्ग:, वर्गसमूहो वर्गणा। वर्गणासमूह: स्पर्धकं। स्पर्धकसमूहो गुणहानि:। गुणहानिसमूह: स्थानमिति ज्ञातव्यम् ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अविभागी प्रतिच्छेदों का समूह वर्ग, वर्ग का समूह वर्गणा, वर्गणा का समूह स्पर्धक, स्पर्धक का समूह गुणहानि और गुणहानि का समूह स्थान है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लब्धिसार/ भाषा./285/236/12&amp;lt;/span&amp;gt; एक जीवकैं एक कालविषै (प्रकृति बंध, अनुभाग बंध आदि) संभवैं ताका नाम स्थान है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
2. जगह विशेष के अर्थ में&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,5,64/336/3  &amp;lt;/span&amp;gt;समुद्रावरुद्ध: व्रज: स्थानं नाम निम्नगावरुद्धं वा।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;समुद्र से अवरुद्ध अथवा नदी से अवरुद्ध व्रज का नाम स्थान है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; अनगारधर्मामृत/8/84  &amp;lt;/span&amp;gt;स्थीयते येन तत्स्थानं वंदनायां द्विधा मतम् । उद्भीभावो निषद्या च तत्प्रयोज्यं यथाबलम् ।84।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;(वंदना प्रकरण में) वंदना करने वाला शरीर की जिस आकृति अथवा क्रिया द्वारा एक ही जगह पर स्थित रहे उसको स्थान कहते हैं...।84।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;2. स्थान के भेद-&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
1. अध्यात्म स्थानादि&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; समयसार/52-55 &amp;lt;/span&amp;gt;...णो अज्झप्पट्ठाणा णेव य अणुभायठाणाणि।52। जीवस्स णत्थि केई जोयट्ठाणा ण बंधठाणा वा। णेव य उदयट्ठाणा ण मग्गणठाणया केई।53। णो ठिदिबंधट्ठाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा। णेव विसोहिट्ठाणा णो संजमलद्धिठाणा वा।54। णेव य जीवट्ठाणा ण गुणट्ठाणा य अत्थि जीवस्स। जेण दु एदे सव्वे पुग्गलदव्वस्स परिणामा।55।&amp;lt;/span&amp;gt; = &lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जीव के अध्यात्म स्थान भी नहीं हैं और अनुभाग स्थान भी नहीं है।52। जीव के योगस्थान भी नहीं, बंधस्थान भी नहीं, उदयस्थान भी नहीं, कोई मार्गणास्थान भी नहीं है।53। स्थितिबंधस्थान भी नहीं, अथवा संक्लेश स्थान भी नहीं, विशुद्धि स्थान भी नहीं, अथवा संयम लब्धि स्थान भी नहीं है।54। और जीव के जीव स्थान भी नहीं अथवा गुणस्थान भी नहीं है, क्योंकि ये सब पुद्गल द्रव्य के परिणाम हैं।55। (अर्थात् आगम में निम्न नाम के स्थानों का उल्लेख यत्रतत्र मिलता है।)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
2. निक्षेप रूप स्थान&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;नोट&amp;lt;/strong&amp;gt;-&amp;lt;span&amp;gt;नाम, स्थापना, आदि के भेद देखें [[ निक्षेप#1.2  | निक्षेप - 1.2 ]](&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 10/4,2,4,175/434/8 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चार्ट&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भाव निक्षेप रूपभेद-देखें [[ भाव ]]।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;3. निक्षेप रूप भेदों के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 10/2,4,4,175/434/10  &amp;lt;/span&amp;gt;जं त्तं धुवं तं सिद्धाणमोगाहणट्ठाणं। कुदो। तेसिमोगाहणाए वड्ढि-हाणीणमभावेण थिरसरूवेण अवट्ठाणादो। जं तमद्धुवं सच्चित्तट्ठाणं तं संसारत्थाण जीवाणमोहगाहणा। कुदो। तत्थ वडि्ढहाणीणमुवलंभादो। ...जं तं संकोच-विकोचणप्पयमब्भंतरसच्चित्तट्ठाणं तं सव्वेसिं सजोगजीवाणं जीवदव्व। जं तं तव्विहीणमब्भंतरं सच्चित्तट्ठाणं तं केवलणाण-दंसणहराणं अमोक्खट्ठिदिबंधपरिणयाणंसिद्धाणंअजोगिकेवलीणंवा जीवदव्वं।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो ध्रुव सचित्त स्थान है, वह सिद्धों का अवगाहना स्थान है, क्योंकि वृद्धि व हानि का अभाव होने से उनकी अवगाहना स्थिर स्वरूप से अवस्थित है। जो अध्रुव सचित्तस्थान है, वह संसारी जीवों की अवगाहना है, क्योंकि उसमें वृद्धि और हानि पायी जाती है।...संकोच विकोचात्मक अभ्यंतर सचित्त स्थान है, वह योग युक्त सब जीवों का जीव द्रव्य है। जो तद्विहीन अभ्यंतर सचित्त स्थान है, वह केवलज्ञान व केवलदर्शन को धारण करने वाले एवं मोक्ष व स्थितिबंध से परिणत ऐसे सिद्धों अथवा अयोगकेवलियों का जीव द्रव्य है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;नोट&amp;lt;/strong&amp;gt;-शेष निक्षेपरूप भेदों के लक्षण-देखें [[ निक्षेप ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;* अन्य संबंधित विषय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
1. अध्यात्म आदि स्थानों के लक्षण-देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
2. जीव स्थान-देखें [[ जीव समास ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
3. स्वस्थान स्वस्थान व विहारवत्स्व-स्वस्थान-देखें [[ क्षेत्र#1 | क्षेत्र - 1]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[ स्थाणु | पूर्व पृष्ठ ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ स्थानकवासी | अगला पृष्ठ ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category: स]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p&amp;gt; संगीत के शरीर स्वर का एक भेद । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 19.148 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[ स्थाणु | पूर्व पृष्ठ ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ स्थानकवासी | अगला पृष्ठ ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: स]]&lt;br /&gt;
[[Category: करणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=106310</id>
		<title>ऋद्धि</title>
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		<updated>2022-12-18T14:35:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;तपश्चरण के प्रभाव से कदाचित् किन्हीं योगीजनों को कुछ चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। उन्हें ऋद्धि कहते हैं। इसके अनेकों भेद-प्रभेद हैं। उन सबका परिचय इस अधिकार में दिया गया है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;hr width=800 /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[ ऋद्धि#1 | ऋद्धि के भेद-निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ #1.1 | ऋद्धियों के वर्गीकरण का चित्र]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ ऋद्धि#1.2 | उपरोक्त भेदों प्रभेदों के प्रमाण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol &amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;[[ ऋद्धि#2 |  बुद्धि ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;  केवल, अवधि व मनःपर्ययज्ञान ऋद्धियाँ&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/ul&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt; - दे. [[वह वह नाम]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;   &lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.1 | बुद्धि ऋद्धि सामान्य का लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.2 | बीजबुद्धि निर्देश :]]&lt;br /&gt;
         &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धि का लक्षण&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धि के लक्षण सम्बन्धी दृष्टि भेद&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धि की अचिन्त्य शक्ति व शंका&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.3 | कोष्ठ बुद्धि का लक्षण व शक्ति निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.4 | पादानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेष]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(अनुसारिणी, प्रतिसारिणी व उभयसारिणी)&lt;br /&gt;
         &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.5 | संभिन्न श्रोतृत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;  [[  ऋद्धि#2.6 |दूरास्वादन आदि, पाँच ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
               &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;चतुर्दश पूर्वी व दश पूर्वी - दे. श&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;अष्टांग निमित्तज्ञान - दे. [[निमित्त]] २&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.7 | प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञा श्रमणत्व सामान्य व विशेष के लक्षण (औत्पत्तिकी, परिणामिकी, वैनयिकी, कर्मजा)&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकी में अन्तर&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि व ज्ञानसामान्य में अन्तर &lt;br /&gt;
         &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt; प्रत्येक बुद्धि ऋद्धि - दे. [[बुद्ध]]&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.8 | वादित्व बुद्धि ऋद्धि]]&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#3 | विक्रिया ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.1 | विक्रिया ऋद्धि की विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.2 | अणिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.3 | महिमा, गरिमा व लघिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.4 | प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रिया के लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.5 | ईशित्व व वशित्व विक्रिया निर्देश]]&lt;br /&gt;
                      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व के लक्षण&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व में अन्तर&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व में विक्रियापना कैसे है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.6 | अप्रतिघात, अंतर्धान व काम रूपित्व]]&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#4 | चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.1 | चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.2 | चारण ऋद्धि की विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.3 | आकाशचारण व आकाशगामित्व]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; आकाशगामित्व ऋद्धि का लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण ऋद्धि का लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्व में अन्तर&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.4 | जलचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारण का लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धि में अन्तर&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.5 | जंघा चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.6 | अग्नि, धूम, मेघ, तंतु, वायु व श्रेणी चारण ऋद्धियों का निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.7 | धारा व ज्योतिष चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.8 | फल, पुष्प, बीज व पत्रचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#5 |  तपऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
           &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.1 | उग्रतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;li&amp;gt; उग्रोग्र तप व अवस्थित उग्रतप के लक्षण&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	   &amp;lt;ul&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt;उग्रतप ऋद्धि में अधिक से अधिक उपवास करने की सीमा व तत्सम्बन्धी शंका - दे. [[प्रोषधोपवास २]]&amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.2 | घोरतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.3 | घोर पराक्रमतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.4 | घोर ब्रह्मचर्यतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर व अघोर गुण ब्रह्मचारी के लक्षण&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण व घोर पराक्रम तप में अन्तर&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.5 | दीप्ततप व महातप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#6 |  बल ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#6.1 | मनोबल, वचनबल व कालबल ऋद्धि के लक्षण]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#7 |  औषध ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.1 | औषध ऋद्धि सामान्य]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.2 | आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल व विट औषध]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt;उपरोक्त चारों के लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; आमर्शौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्य में अन्तर।&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.3 | सर्वौषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.4 | आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#8 |  रस ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.1 | आशीर्विष रस ऋद्धि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(शुभ व अशुभ आशीर्विशके लक्षण)&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.2 | दृष्टि विष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टिविष रस ऋद्धि का लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि का लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोर ब्रह्मचर्य तप में अन्तर&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; क्षीर, मधु, सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धियों के लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थों का क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#9 |  क्षेत्र ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#9.1 | अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धि के लक्षण]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#10 |  ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.1 | शुभ ऋद्धि की प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभ ऋद्धियों की प्रयत्न पूर्वक ही]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.2 |एक व्यक्ति में युगपत् अनेक ऋद्धियों की सम्भावना]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.3 | परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;परिहार विशुद्धि, आहारक व मनःपर्यय का परस्पर विरोध - दे. [[परिहारविशुद्धि]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;आहारक व वैक्रियक में विरोध - दे. ऊपरवाला शीर्षक&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;तैजस व आहारक ऋद्धि निर्देश - दे. वह वह नाम&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;गणधर देव में युगपत् सर्वऋद्धियाँ - दे. [[गणधर]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;साधुजन ऋद्धि का भोग नहीं करते - दे. [[श्रुतकेवली ]]१/२&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;hr width=&amp;quot;800&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; ऋद्धि के भेद निर्देश&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li id=&amp;quot;1.1&amp;quot; &amp;gt; ऋद्धियों के वर्गीकरण का चित्र&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads &amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads&amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt; उपरोक्त भेद-प्रभेदों के प्रमाण&lt;br /&gt;
&amp;lt;dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/१८/५८); ([[सर्वार्थसिद्धि]] अध्याय संख्या  ३/३६/२३०/२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१२); ([[नियमसार]] / [[नियमसार तात्त्पर्यवृत्ति | तात्त्पर्यवृत्ति ]] गाथा संख्या ११२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बुद्धि ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६९-९७१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११/२) (पदानुसारी-[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५) दशपूर्वित्व - ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६९/५) अष्टांग महानिमित्तज्ञान - ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१००२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या ९/४,१,१४/१९/७२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१४/३) प्रज्ञाश्रमणत्व- ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;विक्रिया सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;(दे. ऊपर क्रिया व विक्रिया दोनों के भेद) क्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। विक्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-१०२५); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/५/४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१३)। चारण-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३५,१०४८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/२१/७९); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०,८८)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;तप सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४९-१०५०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। उग्रतप-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७/५)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। घोरब्रह्मचर्य-([[षट्खण्डागम]] पुस्तक संख्या  ९/४,१/२८-२९/९३-९४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बल –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२४/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;औषध –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६७) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;रस सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७७); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/४)। आशार्विष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८६/४) दृष्टिविष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८७/२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;क्षेत्र –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८८); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. बुद्धि ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt; बुद्धि ऋद्धि सामान्य का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२ बुद्धिरवगमो ज्ञान तद्विषया अष्टादशविधा ऋद्धयः।&lt;br /&gt;
= बुद्धि नाम अवगम या ज्ञान का है। उसको विषय करने वाली १८ ऋद्धियाँ हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; बीजबुद्धि निर्देश&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;li&amp;gt;बीजबुद्धि का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७५-९७७ णोइंदियसुदणाणावरणाणं वोरअंतरायाए। तिविहाणं पगदीणं उक्कस्सखउवसमविमुद्धस्स ।९७५। संखेज्जसरूवाणं सद्दाणं तत्थ लिंगसंजुत्तं। एक्कं चिय बीजपदं लद्धूण परोपदेसेण ।९७६। तम्मि पदे आधारे सयलमुदं चिंतिऊण गेण्हेदि। कस्स वि महेसिणो जा बुद्धि सा बीजबुद्धि त्ति ।९७७।&lt;br /&gt;
= नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तराय, इन तीन प्रकार की प्रकृतियों के उत्कृष्ट क्षयोपशम से विशुद्ध हुए किसी भी महर्षि की जो बुद्धि, संख्यात स्वरूप शब्दों के बीच में-से लिंग सहित एक ही बीजभूत पद को पर के उपदेश से प्राप्त करके उस पद के आश्रय से सम्पूर्ण श्रुत को विचारकर ग्रहण करती है, वह बीजबुद्धि है। ९७५-९७७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२६)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/२)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६-१; ५९-९ बीजमिव बीजं। जहाबीजं मूलंकुर-पत्त-पोर-क्खंद-पसव-तुस-कुसुम-खीरतं दुलाणमाहारं तहा दुवालसगत्थाहारं जं पदं तं बीजतुल्लत्तादो बीजं। बीजपदविसयमदिणाणं पि बीजं, कज्जे कारणोवचारादो। एसा कुदो होदि। विसिट्ठोग्गहावरणीयक्खओवसमादो। (५९-९)&lt;br /&gt;
= बीज के समान बीज कहा जाता है। जिस प्रकार बीज, मूल, अंकुर, पत्र, पोर, स्कन्ध, प्रसव, तुष, कुसुम, क्षीर और तंदुल आदिकों का आधार है; उसी प्रकार बारह अंगों के अर्थ का आधारभूत जो पद है वह बीज तुल्य होने से बीज है। बीजपद विषयक मतिज्ञान भी कार्य में कारण के उपचार से बीज है ।५६।.....यह बीज बुद्धि कहाँ से होती है। वह विशिष्ट अवग्रहावरणीय के क्षयोपशम से होती है।&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धि के लक्षण सम्बन्धी दृष्टिभेद&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५७/६ बीजपदट्ठिदरपदेसादो हेट्ठिमसुदणाणुप्पत्तीए कारणं होदूण पच्छा उवरिमसुदणाणुप्पत्तिणिमित्ता बीजबुद्धि त्ति के वि आइरिया भणंति। तण्ण घडदे, कोट्ठबुद्धियादिचदुण्हं णाणाणमक्कमेणेक्कम्हि जीवे सव्वदा अणुप्पत्तिप्पसंगादो।.....ण च एक्कम्हि जीवे सव्वदा चदुण्हं बुद्धीण अक्कमेण अणुप्पत्ती चेव।....त्ति सुत्तगाहाए वक्खाणम्मि गणहरदेवाणं चदुरमलबुद्धीणं दंसणादो। किंच अत्थि गणहरदेवेसु चत्तारि बुद्धीओ अण्णहा दुवासंगाणमणुप्पत्तिप्पसंगादो।&lt;br /&gt;
= बीजपद से अधिष्ठित प्रदेश से अधस्तनश्रुत के ज्ञान की उत्पत्ति का कारण होकर पीछे उपरिम श्रुत के ज्ञान की उत्पत्ति में निमित होने वाली बीज बुद्धि है। (अर्थात् पहले बीजपद के अल्पमात्र अर्थ को जानकर, पीछे उसके आश्रय पर विषय का विस्तार करने वाली बुद्धि बीजबुद्धि है, न कि केवल शब्द-विस्तार ग्रहण करने वाली) ऐसा कितने ही आचार्य कहते हैं। किन्तु वह घटित नहीं होता। क्योंकि ऐसा मानने पर कोष्ठबुद्धि आदि चार ज्ञानों की (कोष्ठबुद्धि तथा अनुसारी, प्रतिसारी व तदुभयसारी ये तीन पदानुसारी के भेद)। युगपत् एक जीव में सर्वदा उत्पत्ति न हो सकने का प्रसंग आवेगा। और एक जीव में सर्वदा चार बुद्धियों की एक साथ उत्पत्ति हो ही नहीं, ऐसा है नहीं क्योंकि - (सात ऋद्धियों का निर्देश करने वाली) सूत्रगाथा के व्याख्यान में (कही गयीं) गणधर देवों के चार निर्मल बुद्धियाँ देखी जाती हैं। तथा गणधर देवों के चार बुद्धियाँ होती हैं, क्योंकि उनके बिना (उनके द्वारा) बारह अंगों की उत्पत्ति न हो सकने का प्रसंग आवेगा।&lt;br /&gt;
 &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धि की अचिन्त्य शक्ति व शंका&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६/३ &amp;quot;संखेज्जसद्दअणंतलिंगेहिं सह बीजपदं जाणंती, बीजबुद्धि त्ति भणिदं होदि। णा बीजबुद्धि अणंतत्थ पडिबद्धअणंतलिंगबीजपदमवगच्छदि, खओसमियत्तादो त्ति। ण खओवसमिएण परोक्खेण सुदणाणेण इत्यादि (देखो केवल भाषार्थ)&lt;br /&gt;
= संख्यात शब्दों के अनन्त अर्थों में सम्बद्ध अनन्त लिंगों के साथ बीजपद को जानने वाली बीज बुद्धि है, यह तात्पर्य है। '''प्रश्न'''-बीज बुद्धि अनन्त अर्थों से सम्बद्ध अनन्त लिंगरूप बीजपद को नहीं जानती, क्योंकि वह क्षायोपशमिक है? '''उत्तर'''-नहीं, क्योंकि जिस प्रकार क्षयोपशमजन्य परोक्ष श्रुतज्ञान के द्वारा केवलज्ञान से विषय किये गये अनन्त अर्थों का परोक्ष रूप से ग्रहण किया जाता है, उसी प्रकार मतिज्ञान के द्वारा भी सामान्य रूप से अनन्त अर्थों को ग्रहण किया जाता है, क्योंकि इसमें कोई विरोध नहीं है। '''प्रश्न'''-यदि श्रुतज्ञान का विषय अनन्त संख्या है, तो `चौदह पूर्वी का विषय उत्कृष्ट संख्यात है' ऐसा जो परिकर्म में कहा है, वह कैसे घटित होगा? '''उत्तर'''-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट, उत्कृष्ट-संख्यात को ही जानता है, ऐसा यहाँ नियम नहीं है। '''प्रश्न'''-श्रुतज्ञान समस्त पदार्थों को नहीं जानता है, क्योंकि, (पदार्थोंके अनन्तवें भाग प्रज्ञापनीय हैं और उसके भी अनन्तवें भाग द्वादशांग श्रुत के विषय हैं) इस प्रकारका वचन है? उत्तर-समस्त पदार्थों का अनन्तवाँ भाग द्रव्यश्रुतज्ञान का विषय भले ही हो, किन्तु भाव श्रुतज्ञान का विषय समस्त पदार्थ हैं; क्योंकि ऐसा माने बिना तीर्थंकरों के वचनातिशय के अभावका प्रसंग होगा।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; कोष्ठबुद्धि का लक्षण व शक्ति निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७८-९७९ &amp;quot;उक्कस्सिधारणाए जुत्तो पुरिसो गुरुवएसे। णाणाविहगंथेसु वित्थारे लिंगसद्दबीजाणि ।९७८। गहिऊण णियमदीए मिस्सेण विणा धरेदि मदिकोट्ठे। जो कोई तस्स बुद्धी णिद्दिट्ठा कोट्ठबुद्धी त्ति ।९७९।&lt;br /&gt;
= उत्कृष्ट धारणा से युक्त जो कोई पुरुष गुरु के उपदेश से नाना प्रकार के ग्रन्थों में से विस्तार पूर्वक लिंग सहित शब्दरूप बीजों को अपनी बुद्धि में ग्रहण करके उन्हें मिश्रण के बिना बुद्धिरूपी कोठे में धारण करता है, उसकी बुद्धि कोष्ठबुद्धि कही गयी है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २९२/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,६/५३/७ कोष्ठ्यः शालि-व्रीहि-यव-गोधूमादिनामाधारभूतः कुस्थली पल्यादिः। सा चासेसदव्वपज्जायधारणगुणेण कोट्ठसमाणा बुद्धी कोट्ठो, कोट्ठा च सा बुद्धी च कोट्ठबुद्धी। एदिस्से अल्पधारणकालो जहण्णेण संखेज्जाणि उक्कस्सेण असंखेज्जाणि वसाणि कुदो। `कालमसंखं संखं च धारणा' त्ति सुत्तुवलंभादो। कुदो एदं होदि। धारणावरणीयस्स तिव्वखओवसमेण।&lt;br /&gt;
= शालि, व्रीहि, जौ और गेहूँ आदि के आधारभूत कोथली, पल्ली आदि का नाम कोष्ठ है। समस्त द्रव्य व पर्यायों को धारण करने रूप गुण से कोष्ठ के समान होने से उस बुद्धि को भी कोष्ठ कहा जाता है। कोष्ठ रूप जो बुद्धि वह कोष्ठ बुद्धि है। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,५,४०/२४३/११) इसका अर्थ धारणकाल जघन्य से संख्यात वर्ष और उत्कर्ष से असंख्यात वर्ष है, क्योंकि `असंख्यात और संख्यात काल तक धारणा रहती है' ऐसा सूत्र पाया जाता है। '''प्रश्न'''-यह कहाँ से होती है? '''उत्तर'''-धारणावरणीय कर्म के तीव्र क्षयोपशम से होता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; पदानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेष के लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०-९८३ बुद्धीविपक्खणाणं पदाणुसारी हवेदि तिविहप्पा। अणुसारी पडिसारी जहत्थणामा उभयसारी ।९८०। आदि अवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय उवरिमगंथं जा गिण्हदि सा मदी हु अणुसारी ।९८१। आदिअवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय हेट्ठिमगंथं बुज्झदि जा सा च पडिसारी ।९८२। णियमेण अणियमेण य जुगवं एगस्स बीजसद्दस्स। उवरिमहेट्ठिमगंथं जा बुज्झइ उभयसारी सा ।९८३।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/२ पदमनुसरति अनुकुरुते इति पदानुसारी बुद्धिः। बीजबुद्धीए बीजपदमवगंतूण एत्थ इदं एदेसिमक्खराणं लिंगं होदि ण होदि त्ति इहिदूणसयलसुदक्खर-पदाइमवगच्छंती पदाणुसारी। तेहि पदेहिंतो समुप्पज्जमाणं णाणं सुदणाणं ण अक्खरपदविसयं, तेसिमक्खरपदाणं बीजपदंताभावादो। सा च पदाणुसारी अणु-पदितदुभयसारिभेदेण तिविहो।....कुदो एदं होदि। ईहावायावरणीयाणं तिव्वक्खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/६०) - पद का जो अनुसरण या अनुकरण करती है वह पदानुसारी बुद्धि है। बीज बुद्धि से बीजपद को जानकर, `यहाँ यह इन अक्षरों का लिंग होता है और इनका नहीं', इस प्रकार विचार कर समस्त श्रुत के अक्षर पदों को जानने वाली पदानुसारी बुद्धि है (उन पदों से उत्पन्न होने वाला ज्ञान श्रुतज्ञान है, वह अक्षरपद विषयक नहीं है; क्योंकि उन अक्षर पदों का बीजपद में अन्तर्भाव है। '''प्रश्न'''-यह कैसे होती है? उत्तर-ईहावरणीय कर्म के तीव्र क्षयोपशम से होती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]]  - विचक्षण पुरुषों की पदानुसारिणी बुद्धि अनुसारिणी, प्रतिसारिणी और उभयसारिणी के भेद से तीन प्रकार है, इस बुद्धि के ये यथार्थ नाम हैं ।९८०। जो बुद्धि आदि मध्य अथवा अन्त में गुरु के उपदेश से एक बीजपद को ग्रहण करके उपरिम (अर्थात् उससे आगे के) ग्रन्थ को ग्रहण करती है वह `अनुसारिणी' बुद्धि कहलाती है ।९८१। गुरु के उपदेश से आदि मध्य अथवा अन्त में एक बीजपद को ग्रहण करके जो बुद्धि अधस्तन (पीछे वाले) ग्रन्थ को जानती है, वह `प्रतिसारिणी' बुद्धि है ।९८२। जो बुद्धि नियम अथवा अनियम से एक बीजशब्द के (ग्रहण करनेपर) उपरिम और अधस्तन (अर्थात् उस पद के आगे व पीछे के सर्व) ग्रन्थ को एक साथ जानती है वह `उभयसारिणी' बुद्धि है ।९८३।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;संभिन्नश्रोतृत्वका लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८४-९८६ सोदिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदं गोवंगाणामकम्मम्मि ।९८४। सोदुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणपएसे। संठियणरतिरियाणं बहुविहसद्दे समुट्ठंते ।९८५। अक्खरअणक्खरमए सोदूणं दसदिसासु पत्तेक्कं। जं दिज्जदि पडिवयणं तं चिय संभिण्णसोदित्तं ।९८६।&lt;br /&gt;
= श्रोत्रेन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तराय का उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्म का उदय होने पर श्रोत्रेन्द्रिय के उत्कृष्ट क्षेत्र से बाहर दशों दिशाओं में संख्यात योजन प्रमाण क्षेत्र में स्थित मनुष्य एवं तिर्यंचों के अक्षरानक्षरात्मक बहुत प्रकार के उठने वाले शब्दों को सुनकर जिससे (युगपत्) प्रत्युत्तर दिया जाता है, वह संभिन्नश्रोतृत्व नामक बुद्धि ऋद्धि कहलाती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६१/४); (सा.चा. २१३/१)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६२/६ कुदो एदं होदि। बहुबहुविहक्खिप्पावरणीयाणं खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= यह कहाँ से होता है? बहु, बहुविध और क्षिप्र (मति) ज्ञानावरणीय के क्षयोपशम से होता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; दूरादास्वादन आदि ऋद्धियों के लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८७-९९७/१-जिब्भिंदिय सुदणाणावरणाणं वीयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८७। जिब्भुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणं। विविहरसाणं सादं जाणइ दूरसादित्तं ।९८८। २-पासिंदिय सुदणाणावरणाणं वारियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८९। पासुक्कस्सखिदोदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणिं। अट्ठविहप्पासाणिं जं जाणइ दूरपासत्तं ।९९०। ३-घाणिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९१। घाणुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। जं बहुविधगंधाणिं तं घायदि दूरघाणत्तं ।९९२। ४-सोदिंदियसुदणाणावरणाणं बीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउ वसमे उदिदं गोबंगणामकम्मम्मि ।९९३। सोदुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। चेट्ठंताणं माणुसतिरियाणं बहुवियप्पाणं ।९९४। अक्खरअणक्खरमए बहुविहसद्दे विसेससंजुत्ते। उप्पण्णे आयण्णइ जं भणिअं दूरसवणत्त ।९९५। ५-रूविंदियसुदणाणावरणाणं वीरिअंतराआए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९६। रूउक्कस्सखिदीदो बाहिरं संखेज्जजोयणठिदाइं। जं बहुविहदव्वाइं देक्खइ तं दूरदरिसिणं णाम ।९९७।&lt;br /&gt;
= वह वह इन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन तीन प्रकृतियों के उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्म का उदय होने पर उस उस इन्द्रिय के उत्कृष्ट विषयक्षेत्र से बाहर संख्यात योजनों में स्थित उस उस सम्बन्धी विषय को जान लेना उस उस नाम की ऋद्धि है। यथा-जिह्वा इन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरास्वादित्व', स्पर्शन इन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरस्पर्शत्व', घ्राणेन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरघ्राणत्व', श्रोत्रेन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरश्रवणत्व' और चक्षु रन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरदर्शित्व' ऋद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व सामान्य व विशेष के लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१७-१०२१ पयडीए सुदणाणावरणाए वीरयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उप्पज्जइ पण्णसमणद्धी ।१०१७। पण्णासवणर्द्धिजुदो चोद्दस्सपुव्वीसु विसयसुहुमत्तं। सव्वं हि सुदं जाणदि अकअज्झअणो वि णियमेण ।१०१८। भासंति तस्स बुद्धी पण्णासमणद्धी सा च चउभेदा। अउपत्तिअ-परिणामिय-वइणइकी-कम्मजा णेया ।१०१९। भवंतर सुदविणएणं समुल्लसिदभावा। णियणियजादिविसेसे उप्पण्णा पारिणामिकी णामा ।१०२०। वइणइकी विणएणं उप्पज्जदि बारसंगसुदजोग्गं। उवदेसेण विणा तवविसेसलाहेण कम्मजा तुरिमा ।१०२१।&lt;br /&gt;
= श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय का उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर `प्रज्ञाश्रमण' ऋद्धि उत्पन्न होती है। प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि से युक्त जो महर्षि अध्ययन के बिना किये ही चौदहपूर्वों में विषय की सूक्ष्मता को लिए हुए सम्पूर्ण श्रुत को जानता है और उसको नियमपूर्वक निरूपण करता है उसकी बुद्धि को प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि कहते हैं। वह औत्पत्तिकी, पारिणामिकी, वैनयिकी और कर्मजा इन भेदों से चार प्रकार की जाननी चाहिए ।१०१७-१०१९। इनमें से पूर्व भव में किये गये श्रुत के विनय से उत्पन्न होनेवाली औत्पत्तिकी (बुद्धि है) ।१०२०।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/२२/८२ विणएण सुदमधीदं किह वि पमादेण होदि विस्सरिदं। तमुवट्ठादि परभवे केवलणाणं च आहवदि ।२२। - एसो उप्पत्तिपण्णसमणो छम्मासोपवासगिलाणो वि तब्बुद्धिमाहप्पजाणावणट्ठ पुच्छावावदचोद्दसपुव्विस्स विउत्तरबाहओ।&lt;br /&gt;
= विनय से अधीत श्रुतज्ञान यदि किसी प्रकार प्रमाद से विस्मृत हो जाता है तो उसे वह परभव में उपस्थित करती है और केवलज्ञान को बुलाती है ।२२। यह औत्पत्तिकी प्रज्ञाश्रमण छह मास के उपवास से कृश होता हुआ भी उस बुद्धि के माहात्म्य को प्रकट करने के लिए पूछने रूप क्रिया में प्रवृत्त हुए चौदहपूर्वी को भी उत्तर देता है। निज-निज जाति विशेषों में उत्पन्न हुई बुद्धि `पारिणामिकी' है, द्वादशांग श्रुत के योग्य विनय से उत्पन्न होनेवाली `वैनयिकी' और उपदेश के बिना ही विशेष तप की प्राप्ति से आविर्भूत हुई चतुर्थ `कर्मजा' प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि समझना चाहिए ।१०२०-१०२१।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२१६/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/१ उसहसेणादीणं-तित्थयरवयणविणिग्गयबीजपदट्ठावहारयाणं पण्णाए कत्थं तब्भावो। पारिणामियाए, विणय-उप्पत्तिकम्मेहि विणा उप्पत्तीदो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-तीर्थंकरों के मुखसे निकले हुए बीजपदों के अर्थ का निश्चय करने वाले वृषभसेनादि गणधरों की प्रज्ञा का कहाँ अन्तर्भाव होता है? '''उत्तर'''-उसका पारिणामिक प्रज्ञा में अन्तर्भाव होता है, क्योंकि वह विनय, उत्पत्ति और कर्म के बिना उत्पन्न होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकी में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/२ पारिणामिय-उप्पत्तियाणं को विसेसो। जादि विसेसजणिदकम्मक्खओवसमुप्पण्णा पारिणामिया, जम्मंतरविणयजणिदसंसकारसमुप्पण्णा अउप्पत्तिया, त्ति अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-पारिणामिकी और औत्पत्तिकी प्रज्ञा में क्या भेद है? '''उत्तर'''-जाति विशेष में उत्पन्न कर्म क्षयोपशम से आविर्भूत हुई प्रज्ञा पारिणामिकी है, और जन्मान्तर में विनयजनित संस्कार से उत्पन्न प्रज्ञा औपपत्तिकी है, यह दोनों में विशेष है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि और ज्ञान सामान्य में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८४/२ पण्णाए णाणस्स य को विसेसो णाणहेदुजीवसत्ती गुरूवएसणि रवेक्खा पण्णा णाम, तक्कारियं णाणं। तदो अत्थि भेदो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-प्रज्ञा और ज्ञान के बीच क्या भेद है? '''उत्तर'''-गुरु के उपदेश से निरपेक्ष ज्ञान की हेतुभूत जीव की शक्ति का नाम प्रज्ञा है, और उसका कार्य ज्ञान है; इस कारण दोनों में भेद है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;वादित्व का लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२३ सक्कादीणं वि पक्खं बहुवादेहिं णिरुत्तरं कुणदि। परदव्वाइं गवेसइ जीए वादित्तरिद्धी सा ।१०२३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के द्वारा शक्रादि के पक्ष को भी बहुत वाद से निरुत्तर कर दिया जाता है और पर के द्रव्यों की गवेषणा (परीक्षा) करता है (अर्थात् दूसरों के छिद्र या दोष ढूँढता है) वह वादित्व ऋद्धि कहलाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/५)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; विक्रिया ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;विक्रिया ऋद्धि की विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-२५, १०३३ अणिमा-महिमा-लघिमा-गरिमा-पत्ती-य तह अ पाकम्मं। ईसत्तवसित्तताइं अप्पडिघादंतधाणाच ।१०२४। रिद्धी हु कामरूवा एवं रूवेहिं विविहभेएहिं। रिद्धी विकिरिया णामा समणाणं तवविसेसेणं ।१०२५। दुविहा किरियारिद्धी णहयलगामित्तचारणत्तेहिं ।१०३३।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५,४ अणिमा महिमा लहिमा पत्ती पागम्यं ईसित्तं वसित्तं कामरूवित्तमिदि विउव्वणमट्ठविहं।....एत्थ एगसंजोगादिणा विसदपंचवंचासविउव्वणभेदा उप्पाएदव्वा, तइक्कारणस्स वडचित्तयत्तादो (पृ. ७६/६)।&lt;br /&gt;
= अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, अप्रतिघात, अन्तर्धान और कामरूप इस प्रकार के अनेक भेदों से युक्त विक्रिया नामक ऋद्धि तपोविशेष से श्रमणों को हुआ करती है। [[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ....([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); (व.सु.श्रा. ५१३)। नभस्तलगामित्व और चारणत्व के भेद से `क्रियाऋद्धि' दो प्रकार है। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, और कामरूपित्व - इस प्रकार विक्रिया ऋद्धि आठ प्रकार है। यहाँ एकसंयोग, द्विसंयोग आदि के द्वारा २५५ विक्रिया के भेद उत्पन्न करना चाहिए, क्योंकि उनके कारण विचित्र हैं। एकसंयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = ८; और अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५&lt;br /&gt;
(विशेष देखो [गणित] II/४)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अणिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२६ अणुतणुकरणं अणिमा अणुछिद्दे पविसिदूण तत्थेव। विकरदि खंदावारं णिएसमविं चक्कवट्टिस्स ।१०२६।&lt;br /&gt;
= अणु के बराबर शरीर को करना अणिमा ऋद्धि है। इस ऋद्धि के प्रभाव से महर्षि अणु के बराबर छिद्र में प्रविष्ट होकर वहाँ ही, चक्रवर्ती के कटक और निवेश की विक्रिया द्वारा रचना करता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३४) ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; महिमा गरिमा व लघिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२७ मेरूवमाण देहा महिमा अणिलाउ लहुत्तरो लहिमा। वज्जाहिंतो गुरुवत्तणं च गरिमं त्ति भणंति ।१०२७।&lt;br /&gt;
= मेरु के बराबर शरीर के करने को महिमा, वायु से भी लघु (हलका) शरीर करने को लघिमा और वज्र से भी अधिक गुरुतायुक्त (भारी) शरीर के करने को गरिमा ऋद्धि कहते हैं।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५); (च.सा. २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२८-१०२९ भूमोए चेट्ठंतो अंगुलिअग्गेण सूरिससिपहुदिं। मेरुसिहराणि अण्णं जं पावदि पत्तिरिद्धी सा ।१०२८। सलिले वि य भूमीए उन्मज्जणिमज्जणाणि जं कुणदि। भूमीए वि य सलिले गच्छदि पाकम्मरिद्धी सा ।१०२९।&lt;br /&gt;
= भूमि पर स्थित रहकर अंगुलि के अग्रभाग से सूर्य-चन्द्रादिक को, मेरुशिखरों को तथा अन्य वस्तु को प्राप्त करना यह प्राप्ति ऋद्धि है ।१०२८। जिस ऋद्धि के प्रभाव से जल के समान पृथिवी पर उन्मज्जन-निमज्जन क्रिया को करता है और पृथिवी के समान जल पर भी गमन करता है वह प्राकाम्य ऋद्धि है ।१०२९।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/७ भूमिट्ठियस्स करेण चदाइच्चदबिंबच्छिवणसत्ती पत्ती णाम। कुलसेलमेरुमहीहर भूमीणं बाहमकाऊण तासु गमणसत्ती तवच्छरणबलेणुप्पणा पागम्मं णाम।&lt;br /&gt;
= (प्राप्ति का लक्षण उपरोक्तवत् ही है) - कुलाचल और मेरुपर्वत के पृथिवीकायिक जीवों को बाधा न पहुँचाकर उनमें, तपश्चरण के बल से उत्पन्न हुई गमनशक्ति को प्राकाम्य ऋद्धि कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/४ अनेकजातिक्रियागुणद्रव्याधीनं स्वाङ्गाद् भिन्नमभिन्नं च निर्माणं प्राकाम्यं सैन्यादिरूपमिति केचित्।&lt;br /&gt;
= कोई-कोई आचार्य अनेक तरह की क्रिया गुण वा द्रव्य के आधीन होने वाले सेना आदि पदार्थों को अपने शरीर से भिन्न अथवा अभिन्न रूप बनाने की शक्ति प्राप्त होने को प्राकाम्य कहते हैं।&lt;br /&gt;
(विशेष दे. वैक्रियक ।१। पृथक् व अपृथक्विक्रिया)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३० णिस्सेसाण पहुत्तं जगाण ईसत्तणामरिद्धी सा। वसमेंति तवबलेणं जं जीओहा वसित्तरिद्धी सा ।१०३०।&lt;br /&gt;
= जिससे सब जगत् पर प्रभुत्व होता है, वह ईशित्वनामक ऋद्धि है और जिससे तपोबल द्वारा जीव समूह वश में होते हैं, वह वशित्व ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/४) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/५)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/२ सव्वेसिं जीवाणं गामणयरखेडादीणं च भुंजणसत्ती समुप्पण्णा ईसित्तं णाम। माणुस-मायंग-हरि-तुरयादीणं सगिच्छाए विउव्वणसत्ती वसित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= सब जीवों तथा ग्राम, नगर, एवं खेडे आदिकों के भोगने की जो शक्ति उत्पन्न होती है वह ईशित्व ऋद्धि कही जाती है। मनुष्य, हाथी, सिंह एवं घोड़े आदिक रूप अपनी इच्छा से विक्रिया करने की (अर्थात् उनका आकार बदल देने की) शक्ति का नाम वशित्व है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रिया में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/३ ण च वसित्तस्स ईसित्तिम्म पवेसो, अवसाणं पि हदाकारेण ईसित्तकरणुवलंभादो।&lt;br /&gt;
= वशित्व का ईशित्व ऋद्धि में अन्तर्भाव नहीं हो सकता; क्योंकि अवशीकृतों का भी उनका आकार नष्ट किये बिना ईशित्वकरण पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;. ईशित्व व वशित्व में विक्रियापना कैसे है?&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/५ ईसित्तवसित्ताणं कधं वेउव्विवत्तं। ण, विविहगुणइड्ढिजुत्तं वेउव्वियमिदि तेसिं वेउव्वियत्ताविरोहादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-ईशित्व और वशित्व के विक्रियापना कैसे सम्भव है? उत्तर-नहीं, क्योंकि नाना प्रकार गुण व ऋद्धि युक्त होने का नाम विक्रिया है, अतएव उन दोनों के विक्रियापने में कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अप्रतिघात अन्तर्धान व कामरूपित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३१-१०३२ सेलसिलातरुपमुहाणब्भंतरं होइदूण गमणं व। जं वच्चदि सा ऋद्धी अप्पडिघादेत्ति गुणणामं ।१०३१। जं हवदि अद्दिसत्तं अंतद्धाणाभिधाणरिद्धी सा। जुगवें बहुरूवाणि जं विरयदि कामरूवरिद्धी सा ।१०३२।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के बल से शैल, शिला और वृक्षादि के मध्य में होकर आकाश के समान गमन किया जाता है, वह सार्थक नामवाली अप्रतिघात ऋद्धि है ।१०३१। जिस ऋद्धि से अदृश्यता प्राप्त होती है, वह अन्तर्धान नामक ऋद्धि है; और जिससे युगपत् बहुत से रूपों को रचता है, वह कामरूप ऋद्धि है ।१०३२।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/६)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/४ इच्छिदरूवग्गहणसत्ती कामरूवित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= इच्छित रूप के ग्रहण करने की शक्ति का नाम कामरूपित्व है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/७ चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो एयट्ठो तह्मि कुसलो णिउणो चारणो।&lt;br /&gt;
= चरण, चारित्र, संजम, पापक्रिया निरोध इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण हैं वे चारण कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धि की विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३४-१०३५, १०४८ &amp;quot;चारणरिद्धी बहुविहवियप्पसंदोह वित्थरिदा ।१०३४। जलजंधाफलपुप्फं पत्तग्गिसिहाण धूममेधाणं। धारामक्कडतंतूजोदीमरुदाण चारणा कमसो ।१०३५। अण्णो विविहा भंगा चारणरिद्धीए भाजिदा भेदा। तां सरूवंकहणे उवएसो अम्ह उच्छिण्णो ।१०४८।&lt;br /&gt;
= चारण ऋद्धि क्रम से जलचारण, जंघाचारण, फलचारण, पुष्पचारण, पत्रचारण, अग्निशिखाचारण, धूमचारण, मेघचारण, धाराचारण, मर्कटतन्तुचारण, ज्योतिषचारण और मरुच्चारण इत्यादि अनेक प्रकार के विकल्प समूहों से विस्तार को प्राप्त हैं ।१०३४-१०३५। इस चारण ऋद्धि के विविध भंगों से युक्त विभक्त किये हुए और भी भेद होते हैं। परन्तु उनके स्वरूप का कथन करने वाला उपदेश हमारे लिए नष्ट हो चुका है ।१०४८।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/पृ. ७८/१० तथा पृ. ८०/६ जल-जंघ-तंतु-फल-पुप्फ-बीय-आयास-सेडीभेएण अट्ठविहा चारणा। उत्तं च (गा.सं. २१)।७८-१०। चारणाणमेत्थ एगसंजोगादिकमेण विसदपंचपंचासभागा उप्पाएदव्वा। कधमेगं चारित्तं विचित्तसत्तिमुप्पाययं। ण परिणामभेएण णाणाभेदभिण्णचारित्तादो चारणबहुत्तं पडि विरोहाभावादो। कधं पुण चारणा अट्ठविहा त्ति जुज्जदे ण एस दोसो, णियमाभावादो, विसदपंचवंचासचारणाणं अट्ठविहचारणेहिंतो एयंतेण पुधत्ताभावादो च।&lt;br /&gt;
= जल, जंघा, तन्तु, फल, पुष्प, बीज, आकाश और श्रेणी के भेद से चारण ऋद्धि धारक, आठ प्रकार हैं। कहा भी है। (गा. नं. २१ में भी यही आठ भेद कहे हैं।) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१।) यहाँ चारण ऋषियों के एक संयोग, दो संयोग आदि के क्रम से २५५ भंग उत्पन्न करना चाहिए। एक संयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = २८; अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५। (विशेष दे. [[गणित]] II/४) '''प्रश्न'''-एक ही चारित्र इन विचित्र शक्तियों का उत्पादक कैसे हो सकता है? '''उत्तर'''-नहीं, क्योंकि परिणाम के भेद से नाना प्रकार चारित्र होने के कारण चारणों की अधिकता में कोई विरोध नहीं है। '''प्रश्न'''-जब चारणों के भेद २५५ हैं तो फिर उन्हें आठ प्रकार का बतलाना कैसे युक्त है? '''उत्तर'''-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उनके आठ होने का कोई नियम नहीं है। तथा २५५ चारण आठ प्रकार चारणों से पृथक् भी नहीं है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;. &amp;lt;b&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;आकाशगामित्व ऋद्धि का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३-१०३४.....। अट्ठीओ आसीणो काउसग्गेण इदरेण ।१०३३। गच्छेदि जीए एसा रिद्धी गयणगामिणी णाम ।१०३४।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के द्वारा कायोत्सर्ग अथवा अन्य प्रकार से ऊर्ध्व स्थित होकर या बैठकर जाता है वह आकाशगामिनी नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३१ पर्यङ्कावस्था निषण्णा वा कायोत्सर्ग शरीरा वा पादोद्धारनिक्षेपणविधिमन्तरेण आकाशगमनकुशला आकाशगामिनः।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= पर्यङ्कासन से बैठकर अथवा अन्य किसी आसन से बैठकर या कायोत्सर्ग शरीर से [पैरों को उठाकर रखकर (धवला)] तथा बिना पैरों को उठाये रखे आकाश में गमन करने में जो कुशल होते हैं, वे आकाशगामी हैं।&lt;br /&gt;
([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/५ आगासे जहिच्छाए गच्छंता इच्छिदपदेसं माणुसुत्तरं पव्वयावरुद्धं आगासगामिणो त्ति घेतव्वो। देवविज्जाहरणं णग्गहणं जिणसद्दणुउत्तीदो।&lt;br /&gt;
= आकाश में इच्छानुसार मानुषोत्तर पर्वत से घिरे हुए इच्छित प्रदेशों में गमन करने वाले आकाशगामी हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। यहाँ देव व विद्याधरों का ग्रहण नहीं है, क्योंकि `जिन' शब्द की अनुवृत्ति है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण ऋद्धि का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/२ चउहि अंगुलेहिंतो अहियपमाणेण भूमीदो उवरि आयासे गच्छंतो आगासचारणं णाम।&lt;br /&gt;
= चार अंगुल से अधिक प्रमाण में भूमि से ऊपर आकाश में गमन करने वाले ऋषि आकाशचारण कहे जाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण व आकाशगामित्व में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/६ &amp;quot;आगासचारणाणमागासगामीणं च को विसेसो। उच्चदे-चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो त्ति एयट्ठो, तह्मि कुसलो णिउणो चारणो। तवविसेसेण जणिदआगासट्ठियजीव(-वध) परिहरणकुसलत्तणेण सहिदो आगासचारणो। आगासगमणमेत्तजुत्तो आगासगामी। आगासगामित्तादो जीववधपरिहरणकुसलत्तणेण विसेसिदआगासगामित्तस्स विसेसुवलंभादो अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-आकाशचारण और आकाशगामी के क्या भेद हैं? '''उत्तर'''-चरण, चारित्र, संयम व पापक्रिया निरोध, इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण है वह चारण कहलाता है। तप विशेष से उत्पन्न हुई, आकाशस्थित जीवों के (वध के) परिहार की कुशलता से जो सहित है वह आकाशचारण है। और आकाश में गमन करने मात्र से आकाशगामी कहलाता है। (अर्थात् आकाशगामी को जीव वध परिहार की अपेक्षा नहीं होती)। सामान्य आकाशगामित्व की अपेक्षा जीवों के वध परिहार की कुशलता से विशेषित आकाशगामित्व के विशेषता पायी जाने से दोनों में भेद हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जलचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारण का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-३; ८१-७ तत्थ भूमीए इव जलकाइयजीवाणं पीडमकाऊण जलमफुसंता जहिच्छाए जलगमणसत्था रिसओ जलचारणा णाम। पउणिपत्तं व जलपासेण विणा जलमज्झगामिणो जलचारणा त्ति किण्ण उच्चंति। ण एस दोसो, इच्छिज्जमाणत्तादो ।७९-३। ओसकखासधूमरोहिमादिचारणाणं जलचारणेसु अंतब्भावो, आउक्काइयजीवपरिहरणकुशलत्तं पडि साहम्मदंसणादो ।८१-७।&lt;br /&gt;
= जो ऋषि जलकायिक जीवों को बाधा न पहुँचाकर जल को न छूते हुए इच्छानुसार भूमि के समान जल में गमन करने में समर्थ हैं, वे जलचारण कहलाते हैं। (जलपर भी पादनिक्षेपपूर्वक गमन करते हैं)। '''प्रश्न'''-पद्मिनीपत्र के समान जल को न छूकर जल के मध्य में गमन करने वाले जलचारण क्यों नहीं कहलाते? '''उत्तर'''-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा अभीष्ट है। ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३६) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२८) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/२)। ओस, ओला, कुहरा और बर्फ आदि पर गमन करनेवाले चारणों का जलचारणों में अन्तर्भाव होता है। क्योंकि इनमें जलकायिक जीवों के परिहार की कुशलता देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धि में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७१/५ जलचारण-पागम्मरिद्धीणं दोण्हं को विसेसो। घणपुढवि-मेरुसायराणमंतो सव्वसरीरेण पवेससत्ती पागम्मं णाम। तत्थ जीवपरिहरणकउसल्लं चारणत्तं।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-जलचारण और प्राकाम्य इन दोनों ऋद्धियों में क्या विशेषता है? '''उत्तर'''-सघन पृथिवी, मेरु और समुद्र के भीतर सब शरीर से प्रवेश करने की शक्ति को प्राकाम्यऋद्धि कहते हैं, और यहाँ जीवों के परिहार की कुशलता का नाम चारण ऋद्धि है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जंघाचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  १०३७ चउरंगुलमेत्तमहिं छंडिय गयणम्मि कुडिलजाणु व्रिणा। जं बहुजोयणगमणं सा जंघाचारणा रिद्धी ।१०३७।&lt;br /&gt;
= चार अंगुल प्रमाण पृथिवी को छोड़कर आकाश में घुटनों को मोड़े बिना (या जल्दी जल्दी जंघाओं को उत्क्षेप निक्षेप करते हुए-[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) जो बहुत योजनों तक गमन करना है, वह जंघाचारण ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९/७; ८१/४ भूमीए पुढविकाइयजीवाणं बाहमकाऊण अणेगजोयणसयगामिणो जंघाचारणा णाम ।७९-७।....चिक्खल्लछारगोवर-भूसादिचारणाणं जंघाचारणेसु अंतब्भावो, भूमीदो चिक्खलादीणं कधंचि भेदाभावादो ।८१-४।&lt;br /&gt;
= भूमि में पृथिवीकायिक जीवों को बाधा न करके अनेक सौ योजन गमन करने वाले जंघाचारण कहलाते हैं।....कीचड़ भस्म, गोबर और भूसे आदि पर से गमन करनेवालों का जंघाचारणों में अन्तर्भाव होता है, क्योंकि भूमि से कीचड़ आदि में कथंचित् अभेद है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अग्नि, धूम, मेघ, तन्तु, वायु व श्रेणी चारण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४१-१०४३, १०४५, १०४७ अविराहिदूण जोवे अग्निसिहालंठिए विचित्ताणं। जं ताण उवरि गमणं अग्निसिहाचारणा रिद्धी ।१०४१। अधउड्ढतिरियपसरं धूमं अवलंबिऊण जं देंति। पदखेवे अक्खलिया सा रिद्धी धूमचारणा णाम ।१०४२। अविरा `हदूणजीवे अपुकाए बहुविहाण मेघाणं। जं उवरि गच्छिइ मुणी सा रिद्धी मेघचारणाणाम ।१०४३। मक्कडयतंतुपंतीउवरिं अदिलघुओ तुरदपदखेवे। गच्छेदि मुणिमहेसी सा मक्कडतंतुचारणा रिद्धी ।१०४५। णाणाविहगदिमारुदपदेसपंतीसु देंति पदखेवे। जं अक्खलिया मुणिणो सा मारुदचारणा रिद्धी ।१०४७।&lt;br /&gt;
= अग्निशिखा में स्थित जीवों की विराधना न करके उन विचित्र अग्नि-शिखाओं पर से गमन करने को `अग्निशिखा चारण' ऋद्धि कहते हैं ।१०४१। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनिजन नीचे ऊपर और तिरछे फैलने वाले धुएँ का अवलम्बन करके अस्खलित पादक्षेप देते हुए गमन करते हैं वह `धूमचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४२। जिस ऋद्धि से मुनि अप्कायिक जीवों को पीड़ा न पहुँचाकर बहुत प्रकार के मेघों पर से गमन करता है वह `मेघचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४३। जिसके द्वारा मुनि महर्षि शीघ्रता से किये गये पद-विक्षेप में अत्यन्त लघु होते हुए मकड़ी के तन्तुओं की पंक्ति पर से गमन करता है, वह `मकड़ीतन्तुचारण' ऋद्धि है ।१०४५। जिसके प्रभाव से मुनि नाना प्रकार की गति से युक्त वायु के प्रदेशों की पंक्ति पर से अस्खलित होकर पदविक्षेप करते हैं; वह `मारुतचारण' ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०-१; ८१-८ धूमग्गि-गिरि-तरु-तंतुसंताणेसु उड्ढारोहणसत्तिसंजुत्ता सेडीचारणा णाम ।८०-१।.....धूमग्गिवाद-मेहादिचारणाणं तंतु-सेडिचारणेसु अंतब्भाओ, अणुलोमविलोमगमणेसु जीवपीडा अकरणसत्तिसंजुत्तादो।&lt;br /&gt;
= धूम, अग्नि, पर्वत, और वृक्ष के तन्तु समूह पर से ऊपर चढ़ने की शक्ति से संयुक्त `श्रेणी चारण' है। .....धूम, अग्नि, वायु और मेघ आदिक के आश्रय से चलने वाले चारणों का `तन्तु-श्रेणी' चारणों में अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि वे अनुलोम और प्रतिलोम गमन करने में जीवों को पीड़ा न करने की शक्ति से संयुक्त हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; धारा व ज्योतिष चारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४४,१०४६ अविराहिय तल्लीणे जीवे घणमुक्कवारिधाराणं। उवरिं जं जादि मुणी सा धाराचारणा ऋद्धि ।१०४४। अघउड्ढतिरियपसरे किरणे अविलंबिदूण जोदीणं। जं गच्छेदि तवस्सी सा रिद्धी जोदि-चारणा णाम ।१०४६।&lt;br /&gt;
= जिसके प्रभाव से मुनि मेघों से छोड़ी गयी जलधाराओं में स्थित जीवों को पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपर से जाते हैं, वह धारा चारण ऋद्धि है ।१०४४। जिससे तपस्वी नीचे ऊपर और तिरछे फैलनेवाली ज्योतिषी देवों के विमानों की किरणों का अवलम्बन करके गमन करता है वह ज्योतिश्चारण ऋद्धि है ।१०४६। (इन दोनों का भी पूर्व वाले शीर्षक में दिये धवला ग्रन्थ के अनुसार तन्तु श्रेणी ऋद्धि में अन्तर्भाव हो जाता है।)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; फल पुष्प बीज व पत्रचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३८-१०४० अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बणप्फलाण विविहाणं। उवरिम्मि जं पधावदि स च्चिय फलचारणा रिद्धी ।१०३८। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पुप्फाणं। उवरिम्मि जं पसप्पदि सा रिद्धो पुप्फचारणा णाम ।१०३०। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पत्ताण। जा उवरि वच्चदि मुणी सा रिद्धी पत्तचारणा णामा ।१०३९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि का धारक मुनि वनफलों में, फूलों में, तथा पत्तों में रहने वाले जीवों की विराधना न करके उनके ऊपर से जाता है वह फलचारण, पुष्पचारण तथा पत्रचारण नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-७; ८१-५ तंतुफलपुप्फबीजचारणाणं पि जलचारणाणं व वत्तव्वं ।७९-७।.....कुंथुद्देही-मुक्कण-पिपीलियादिचारणाणं फलचारणेसु अंतब्भावो, तस जीवपरिहरणकुसलत्तं पडि भेदाभावादो। पत्तंकुरत्तण पवालादिचारणाणं पुप्फचारणेसु अंतब्भावो, हरिदकायपरिहरणकुसलत्तेण साहम्मादो ।८१/५।&lt;br /&gt;
= तन्तुचारण, फलचारण, पुष्पचारण और बीजचारण का स्वरूप भी जलचारणों के समान कहना चाहिए (अर्थात् उनमें रहने वाले जीवों को पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपर गमन करना) ।७९-७।....कुंथुजीव, मुत्कण, और पिपीलिका आदि पर से संचार करनेवालों का फलचारणों में अन्तर्भाव होता है, क्योंकि इनमें त्रस जीवों के परिहार की कुशलता की अपेक्षा कोई भेद नहीं है ।। पत्र, अंकुर, तृण और प्रवाल आदि पर से संचार करनेवालों का पुष्पचारणों में अन्तर्भाव होता है, क्योंकि हरितकाय जीवों के परिहार की कुशलता की अपेक्षा इनमें समानता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तपऋद्धि निर्देशs&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; उग्रतपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७-५; ८९-६ उग्गतवा दुविहा उग्गुग्गतवा अवट्ठिदुग्गतवा चेदि। तत्थ जो एक्कोववासं काऊण पारिय दो उववासो करेदि, पुणरवि पारिय तिण्णि उववासे करेदि। एवमेगुत्तरवड्डीए जाव जीविदं तं तिगुत्तिगुत्तो होदूण उववासे करेंतो उग्गगतवो णाम। एदस्सुववास पारणाणयणे सुत्तं-&amp;quot;उत्तरगुणिते तु धने पुनरप्यष्टापितेऽत्र गुणमादिम्। उत्तरविशेषितं वर्ग्गितं च योज्यान्येन्मूलम् ।२३। इत्यादि....तत्थ दिक्खट्ठेमेगोववासं काऊण पारिय पुणो-एक्कहंतरेण गच्छंतस्स किंचिणिमित्तेण छट्ठोववासो जादो। पुणो तेण छट्ठोववासेण विहरंतस्स अट्ठमोववासो जादो। एवं दसमदुवालसादिक्कमेण हेट्ठा ण पदंतो जाव जीविदंतं जो विहरदि अवट्ठिदुग्गतवो णाम। एदं पि तवोविहाणं वीरियंतराइयक्खओवसमेण होदि।&lt;br /&gt;
= उग्रतप ऋद्धि के धारक दो प्रकार हैं-उग्रोग्रतप ऋद्धि धारक और अवस्थितउग्रतप ऋद्धि धारक। उनमें जो एक उपवास को करके पारणा कर दो उपवास करता है, पश्चात् फिर पारणा कर तीन उपवास करता है। इस प्रकार एक अधिक वृद्धि के साथ जीवन पर्यन्त तीन गुप्तियों से रक्षित होकर उपवास करनेवाला `उग्रोग्रतप' ऋद्धि का धारक है। इसके उपवास और पारणाओं का प्रमाण लाने के लिए सूत्र-(यहाँ चार गाथाएँ दी हैं जिनका भावार्थ यह है कि १४ दिन में १० उपवास व ४ पारणाएँ आते हैं। इसी क्रम से आगे भी जानना) ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०-१०५१) दीक्षा के लिए एक उपवास करके पारणा करे, पश्चात् एक दिन के अंतर से ऐसा करते हुए किसी निमित्त से षष्टोपवास (बेला) हो गया। फिर (पूर्वाक्तवत् ही) उस षष्ठोपवास से विहार करने वाले के (कदाचित्) अष्टमोपवास (तेला) हो गया। इस प्रकार दशमद्वादशम आदि क्रम से नीचे न गिरकर जो जीवन पर्यन्त विहार करता है, वह अवस्थित उग्रतप ऋद्धि का धारक कहा जाता है। यह भी तप का अनुष्ठान वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से होता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर तपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५५ जलसूलप्पमुहाणं रोगेणच्चंतपीडिअंगा वि। साहंति दुर्द्ध रतवं जोए सा घोरतवरिद्धी ।१०५५।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२६/९२/२ उववासेसुछम्मासोववासो, अवमोदरियासु एक्ककवलो उत्तिपरिसंखासु चच्चरे गोयराभिग्गहो, रसपरिच्चाग्गेसु उण्हजलजुदोयणभोयणं, विवित्तसयणासणेसु वय-वग्घ-तरच्छ-छवल्लादिसावयसेवियासुसज्झविज्झुडईसु णिवासो, कायकिलेसेसुतिव्वहिमवासादिणिवदंतविसएसु अब्भोकासरुक्खमूलादावणजोगग्गहणं। एवमब्भंतरतवेसु वि उक्कट्ठतवपरूवणा कायव्वा। एसो बारह विह वि तवो कायरजणाणं सज्झसजणणो त्ति घोरत्तवो। सो जेसिं ते घोरत्तवा। बारसविहतवउक्कट्ठवट्ठाए वट्टमाणा घोरतवा त्ति भणिद होदि। एसा वि तवजणिदरिद्धी चेव, अण्णहा एवं विहाचरणाणुववत्तीदो।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) जिस ऋद्धि के बल से ज्वर और शूलादिक रोग से शरीर के अत्यन्त पीड़ित होने पर भी साधुजन दुर्द्धर तप को सिद्ध करते हैं, वह घोर तपऋद्धि है ।१०५५। उपवासों में छह मास का उपवास अवमोदर्य तपों में एक ग्रास; वृत्तिपरिसंख्याओं में चौराहे में भिक्षा की प्रतिज्ञा; रसपरित्यागों में उष्ण जल युक्त ओदन का भोजन; विविक्तशय्यासनों में वृक, व्याघ्र, तरक्ष, छवल्ल आदि श्वापद अर्थात् हिंस्रजीवों से सेवित सह्य, विन्ध्य आदि (पर्वतों की) अटवियों में निवास; कायक्लेशों में तीव्र हिमालय आदि के अन्तर्गत देशों में, खुले आकाश के नीचे, अथवा वृक्षमूल में; आतापन योग अर्थात् ध्यान ग्रहण करना। इसी प्रकार अभ्यन्तर तपों में भी उत्कृष्ट तप की प्ररूपणा करनी चाहिए। ये बारह प्रकार ही तप कायर जनों को भयोत्पादक हैं, इसी कारण घोर तप कहलाते हैं। वह तप जिनके होता है वे घोर तप ऋद्धि के धारक हैं। बारह प्रकार के तपों की उत्कृष्ट अवस्था में वर्तमान साधु घोर तप कहलाते हैं, यह तात्पर्य है। यह भी तप जनित (तप से उत्पन्न होनेवाली) ऋद्धि ही है, क्योंकि बिना तप के इस प्रकार का आचरण बन नहीं सकता।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१२), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२२/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर पराक्रम तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५६-१०५७ णिरुवमवड्ढंततवा तिहुवणसंहरणकरसत्तिजुत्ता। कंटयसिलग्गिपव्वयधूमुक्कापहुदिवरिसणसमत्था ।१०५६। सहस त्ति सयलसायरसलिलुप्पीलस्स सोसणसमत्था। जायंति जीए मुणिणो घोरपरक्कमतव त्ति सा रिद्धी ।१०५७।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि जन अनुपम एवं वृद्धिंगत तप से सहित, तीनों लोकों के संहार करने की शक्ति से युक्त; कंटक, शिला, अग्नि, पर्वत, धुआँ तथा उल्का आदि के बरसाने में समर्थ; और सहसा संपूर्ण समुद्र के सलिल समूह के सुखाने की शक्ति से भी संयुक्त होते हैं वह घोर-पराक्रम-तप ऋद्धि है ।१०५६-१०५७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२७/९३/२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;घोर ब्रह्मचर्य तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५८-१०६० जीए ण होंति मुणिणो खेत्तम्मि वि चोरपहुदिबाधाओ। कालमहाजुद्धादी रिद्धी सघोरब्रह्मचारित्ता ।१५८। उक्कस्स खउवसमे चारित्तावरणमोहकम्मस्स। जा दुस्सिमणं णासइ रिद्धी सा घोरब्रह्मचारित्ता ।१०५९। अथवा-सव्वगुणेहिं अघोरं महेसिणो बह्मसद्दचारित्तं। विप्फुरिदाए जीए रिद्धी साघोरब्रह्मचारित्ता ।१०६०।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि से मुनि के क्षेत्र में भी चौरादिक की बाधाएँ और काल एवं महायुद्धादि नहीं होते हैं, वह `अघोर ब्रह्मचारित्व' ऋद्धि है ।१०५८। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/४) चारित्रमोहनीय का उत्कृष्ट क्षयोपशम होने पर जो ऋद्धि दुःस्वप्न को नष्ट करती है तथा जिस ऋद्धि के आविर्भूत होने पर महर्षिजन सब गुणों के साथ अघोर अर्थात् अविनश्वर ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं वह अघोर ब्रह्मचारित्व ऋद्धि है ।१०५९-१०६०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]]  तथा [[चारित्रसार]]  में इस लक्षण का निर्देश ही घोर गुण ब्रह्मचारी के लिए किया गया है) &lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९३-६; ९४-२ घोरा रउद्दा गुणा जेसिं ते घोरगुणा। कधं चउरासादिलक्खगुणाणं घोरत्तं। घोरकज्जकारिसत्तिजणणादो। ९४६।.....ब्रह्म चारित्रं पंचव्रत-समिति-त्रिगुप्त्यात्मकम्, शान्तिपुष्टिहेतुत्वात्। अघोरा शान्ता गुणा यस्मिन् तदघोरगुणं, अघोरगुणं, ब्रह्मचरन्तीति अघोरगुणब्रह्मचारिणः।.....एत्थ अकारो किण्ण सुणिज्जदे। संधिणिद्देसादो ।१९२। &lt;br /&gt;
= घोर अर्थात् रौद्र हैं गुण जिनके वे घोर गुण कहे जाते हैं। '''प्रश्न'''-चौरासी लाख गुणों के घोरत्व कैसे सम्भव है। '''उत्तर'''-घोर कार्यकारी शक्ति को उत्पन्न करने के कारण उनके घोरत्व सम्भव है। ब्रह्म का अर्थ पाँच व्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिस्वरूप चारित्र है, क्योंकि वह शान्ति के पोषण का हेतु है। अघोर अर्थात् शान्त हैं गुण जिसमें वह अघोर गुण है। अघोर गुण ब्रह्म (चारित्र) का आचरण करने वाले अघोर गुण ब्रह्मचारी कहलाते हैं। (भावार्थ-अघोर शान्त को कहते हैं। जिनका ब्रह्म अर्थात् चारित्र शान्त है उनको अघोर गुण ब्रह्मचारी कहते हैं। ऐसे मुनि शान्ति और पुष्टि के कारण होते हैं, इसीलिए उनके तपश्चरण के माहात्म्य से उपरोक्त ईति, भीति, युद्ध व दुर्भिक्षादि शान्त हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-`णमो घोरगुणबम्हचारीणं' इस सूत्र में अघोर शब्द का अकार क्यों नहीं सुना जाता? '''उत्तर'''-सन्धियुक्त निर्देश होने से।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण और घोर पराक्रम तप में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/९३/८ ण गुण-परक्कमाण मेयत्तं, गुणजणि दसत्तीए परक्कमववएसादो।&lt;br /&gt;
= गुण और पराक्रम के एकत्व नहीं हैं, क्योंकि गुण से उत्पन्न हुई शक्ति की पराक्रम संज्ञा है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तप्त दीप्त व महातप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५२-१०५४ बहुविहउववासेहिं रविसमवड्ढंतकायकिरणोघो। कायमणवयणबलिणो जीए सा दित्ततवरिद्धी ।१०५२। तत्ते लोहकढाहे पडिंअंबुकणं ब जीए भुत्तण्णं। झिज्जहिं धाऊहिं सा णियझाणाएहिं तत्ततवा ।१०५३। मंदरपंत्तिप्पमुहे महोववासे करेदि सव्वे वि। चउसण्णाण बलेणं जीए सा महातवा रिद्धी ।१०५४।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२३/९०/५ तेसिं ण केवलं दित्ति चेव वंड्ढदि किंतु बलो वि वड्ढदि।.....तेण ण तेसिं भुत्ति वि तेण कारणाभावादो। ण च भुक्खादुक्खवसमणट्ठं भुजंति, तदभावादो। तदभावो कुदीवगम्मदे।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के प्रभाव से, मन, वचन और काय से बलिष्ठ ऋषि के बहुत प्रकार के उपवासों द्वारा सूर्य के समान दीप्ति अर्थात् शरीर की किरणों का समूह बढ़ता हो वह `दीप्त तप ऋद्धि' है ।१०५२। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/२)। (धवला में उपरोक्त के अतिरिक्त यह और भी कहा है कि उनके केवल दीप्ति ही नहीं बढ़ती है, किन्तु बल भी बढ़ता है। इसीलिए उनके आहार भी नहीं होता, क्योंकि उसके कारणों का अभाव है। यदि कहा जाय कि भूख के दुःख को शान्त करने के लिए वे भोजन करते हैं सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उनके भूख के दुःख का अभाव है।) तपी हुई लोहे की कड़ाही में गिरे हुए जलकण के समान जिस ऋद्धि से  खाया हुआ अन्न धातुओं सहित क्षीण हो जाता है, अर्थात् मल-मूत्रादि रूप परिणमन नहीं करता है, वह निज ध्यानसे उत्पन्न हुई तप्त `तप ऋद्धि' है ।१०५३। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२४/९१/१), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/३)। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि चार सम्यग्ज्ञानों (मति, श्रुत, अवधि व मनःपर्यय) के बल से मन्दिर पंक्ति प्रमुख सब ही महान् उपवासों को करता है वह `महा तप ऋद्धि' है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३/६३/२०३/११)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२५/९१/५ अणिमादिअट्ठगुणोवेदो जलचारणादिअट्ठविहचारणगुणालंकरियो फुरंतसरीरप्पहो दुविहअवखीणरिद्धिजुत्तो सव्वोसही सरूवो पाणिपत्तणिवदिदसव्वहारो अमियसादसरूवेण पल्लट्ठावणसमत्थो सयलिंदेहिंतो वि अणंतबलो आसी-दिट्ठिविसलद्धिसमण्णिओ तत्ततवो सयलविज्जाहरो मदि सुद ओहि मणपज्जवणाणेहि मुणिदतिहुवणवावारो मुणी महातवो णाम। कस्मात्। महत्त्वहेतुस्तपोविशेषो महानुच्यते उपचारेण, स येषां ते तपसः इति सिद्धत्वात्। अथवा महसां हेतुः तप उपचारेण महा इति भवति।&lt;br /&gt;
= जो अणिमादि आठ गुणों से सहित हैं, जलचारणादि आठ प्रकार के चारण गुणों से अलंकृत हैं, प्रकाशमान शरीर प्रभा से संयुक्त हैं, दो प्रकार की अक्षीण ऋद्धि से युक्त हैं, सर्वोषध स्वरूप हैं, पाणिपात्र में गिरे हुए आहार को अमृत स्वरूप से पलटाने में समर्थ हैं, समस्त इन्द्रों से भी अनन्तगुणे बल के धारक हैं, आशीर्विष और दृष्टिविष लब्धियों से समन्वित हैं, तप्ततप ऋद्धि से संयुक्त हैं, समस्त विद्याओं के धारक हैं; तथा मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय ज्ञानों से तीनों लोकों के व्यापार की जानने वाले हैं, वे मुनि `महातप ऋद्धि' के धारक हैं। कारण कि महत्त्वके हेतुभूत तपविशेष को उपचार से महान् कहा जाता है। वह जिनके होता है वे महातप ऋषि हैं, ऐसा सिद्ध है। अथवा महस् अर्थात् तेजों का हेतुभूत जो तप है वह उपचार से महा होता है। (तात्पर्य यह कि सातों ऋद्धियों की उत्कृष्टता को प्राप्त होने वाले ऋषि महातप युक्त समझे जाते हैं।)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; बल ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ४/१०६१-१०६६ बलरिद्धी तिविहप्पा मणवयणसरीरयाणभेएण। सुदणाणावरणाए पगडीए वीरयंतरायाए ।१०६१। उक्कसक्खउवसमे सुहुत्तमेत्तंतरम्मि सयलसुदं। चिंतइ जाणइ जीए सा रिद्धी मणबला णामा ।१०६२। जिब्भिंदियणोइंदिय-सुदणाणावरणविरियविग्घाणं। उक्कस्सखओवसमे मुहुत्तमेत्तंतरम्मि मुणी ।१०६३। सयलं पि सुदं जाणइ उच्चारइ जीए विप्फुरंतीए। असयो अहिकंठो सा रिद्धीउ णेया वयणबलणामा ।१०६४। उक्कस्सखउसमे पविसेसे विरियविग्धपगढीए। मासचउमासपमुहे काउसग्गे वि समहीणा ।१०६५। उच्चट्ठिय तेल्लोक्कं झत्ति कणिट्ठंगुलीए अण्णत्थं। घविदं जीए समत्था सा रिद्धी कायबलणामा ।१०६६।&lt;br /&gt;
= मन वचन और काय के भेद से बल ऋद्धि तीन प्रकार है। इनमें से जिस ऋद्धि के द्वारा श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन दो प्रकृतियों का उत्कृष्ट क्षयोपशम होने पर मुहूर्तमात्र काल के भीतर अर्थात् अन्तर्मुहूर्त्त काल में सम्पूर्ण श्रुत का चिन्तवन करता है वह जानता है, वह `मनोबल' नामक ऋद्धि है ।१०६१-१०६२। जिह्वेन्द्रियावरण, नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर जिस ऋद्धिके प्रगट होनेसे मुनि श्रमरहित और अहीनकंठ होता हुआ मुहूर्त्तमात्र कालके भीतर सम्पूर्ण श्रुत को जानता व उसका उच्चारण करता है, उसे `वचनबल' नामक ऋद्धि जानना चाहिए ।१०६३-१०६४। जिस ऋद्धि के  बल से वीर्यान्तराय प्रकृति के उत्कृष्ट क्षयोपशम की विशेषता होने पर मुनि, मास व चतुर्मासादि रूप कायोत्सर्ग को करते हुए भी श्रम से रहित होते हैं, तथा शीघ्रता से तीनों लोकों को कनिष्ठ अँगुलीके ऊपर उठाकर अन्यत्र स्थापित करनेके लिए समर्थ होते हैं, वह `कायबल' नामक ऋद्धि है ।१०६५-१०६६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३५-३७/९८-९९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२२४/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; औषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;औषध ऋद्धि सामान्य&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४ औषधर्द्धिरष्टविधा-असाध्यानामप्यामयानां सर्वेषां विनिवृत्तिहेतुरामर्शक्ष्वेलजल्लमलविट्सर्वौषधिप्राप्तास्याविषदृष्टिविषविकल्पात्।&lt;br /&gt;
= असाध्य भी सर्व रोगोंकी निवृत्तिकी हेतुभूत औषध-ऋद्धि आठ प्रकारकी है - आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल, विट्, सर्व, आस्याविष और दृष्टिविष। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्ष क्ष्वेल जल मल व विट् औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६८-१०७२ रिसिकरचरणादीणं अल्लियमेत्तम्मि। जीए पासम्मि। जीवा होंति णिरोगा सा अम्मरिसोसही रिद्धी ।१०६८। जीए तालासेमच्छीमलसिंहाणआदिआ सिग्घं। जीवाणं रोगहरणा स च्चिय खेलोसही रिद्धो ।१०६९। सेयजलो अंगरयं जल्लं भण्णेत्ति जीए तेणावि। जीवाणं रोगहरणं रिद्धी जस्लोसही णामा ।१०७०। जीहीट्ठदं तणासासोंत्तादिमलं पि जीए सत्तीए। जोवाणं रोगहरणं मलोसही णाम सा रिद्धी ।१०७१।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के प्रभाव से जीव पास में आने पर ऋषि के हस्त व पादादि के स्पर्शमात्र से ही निरोग हो जाते हैं, वह `आमर्षौषध' ऋद्धि है ।१०६८। जिस ऋद्धि के प्रभाव से लार, कफ, अक्षिमल और नासिकामल शीघ्र ही जीवों के रोगों को नष्ट करता है वह `क्ष्वेलौषध ऋद्धि है ।१०६९। पसीने के आश्रित अंगरज जल्ल कहा जाता है। जिस ऋद्धि के प्रभाव से उस अंग रज से भी जीवों के रोग नष्ट होते हैं, वह `जल्लौषधि' ऋद्धि कहलाती है ।१०७०। जिस शक्ति से जिह्वा, ओठ, दाँत, नासिका और श्रोत्रादिक का मल भी जीवों के रोगों को दूर करनेवाला होता है, वह `मलौषधि' नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२५); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०-३३/९५-९७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्षौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्य में अन्तर&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०/९६/१ तवोमाहप्पेण जेसिं फासो सयलोसहरूवत्तं पत्तो तेसिमाम्मरिसो सहिपत्ता त्ति सण्णा।&lt;br /&gt;
= ण च एदेसिमघोरगुणबंभयारीणं अंतब्भावो, एदेसिं वाहिविणासणे चेव सत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= तप के प्रभाव से जिनका स्पर्श समस्त औषधियों के स्वरूप को प्राप्त हो गया है, उनको आमर्षौषधि प्राप्त ऐसी संज्ञा है। इनका अघोरगुण ब्रह्मचारियों में अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि इनके अर्थात् अघोरगुण ब्रह्मचारियों के केवल, व्याधि के नष्ट करने में ही शक्ति देखी जाती है। (पर उनका स्पर्श औषध रूप नहीं होता)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; सर्वौषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७३ जीए पस्सजलाणिलरीमणहादीणि वाहिहरणाणि। दुक्करवजुत्ताणं रिद्धी सव्वोही णामा ।१०७३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के बल से दुष्कर तप से युक्त मुनियों का स्पर्श किया हुआ जल व वायु तथा उन के रोम और नखादिक व्याधि के हरने वाले हो जाते हैं, वह सर्वौषधि नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/५)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३४/९७/६ रस-रुहिर-मांस-मेदट्ठि-मज्ज-सुक्क-पुप्फस-खरीसकालेज्ज-मुत्त-पित्तंतुच्चारादओ सव्वे ओसाहत्तं पत्ता जेसि ते सव्वोसहिषत्ता।&lt;br /&gt;
= रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र, पुप्फस, खरीष, कालेय, मूत्र, पित्त, अँतड़ी, उच्चार अर्थात् मल आदिक सब जिनके औषधिपने को प्राप्त हो गये हैं वे सर्वौषधिप्राप्त जिन हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७४-१०७६ तित्तादिविविहम्मण्णं विसुजुत्तं जीए वयणमेत्तेण। पावेदि णिव्विसत्तं सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७४। अहवा बहुवाहाहिं परिभूदा झत्ति होंति णीरोगा। सोदुं वयणं जीए सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७५। रोगाविसेहिं पहदा दिट्ठीए जीए झत्ति पावंति। णीरोगणिव्विसत्तं सा भणिदा दिट्ठिणिव्विसा रिद्धी ।१०७६।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३,३६,३/२०३/३० उग्रविषसंपृक्तोऽप्याहारो येषामास्यगतो निर्विषीभवति यदीयास्यनिर्गतं वचःश्रवणाद्वा महाविषपरीता अपि निर्विषीभवन्ति ते आस्याविषाः।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) - जिस ऋद्धि से तिक्तादिक रस व विष से युक्त विविध प्रकार का अन्न वचनमात्र से ही निर्विषता को प्राप्त हो जाता है, वह `वचननिर्विष' नामक ऋद्धि है ।१०७४। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) - उग्र विष से मिला हुआ भी आहार जिनके मुख में जाकर निर्विष हो जाता है, अथवा जिनके मुख से निकले हुए वचन के सुनने मात्र से महाविष व्याप्त भी कोई व्यक्ति निर्विष हो जाता है वे `आस्याविष' हैं। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/१)। ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) अथवा जिस ऋद्धि के प्रभाव से बहुत व्याधियों से युक्त जीव, ऋषि के वचन को सुनकर ही झट से नीरोग हो जाया करते हैं, वह वचन निर्विष नामक ऋद्धि है ।१०७५। रोग और विष से युक्त जीव जिस ऋद्धि के प्रभाव से झट देखने मात्र से ही निरोगता और निर्विषता को प्राप्त कर लेते हैं; वह `दृष्टिनिर्विष' ऋद्धि है ।१०७६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/२)&amp;lt;/ol&amp;gt;&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आशीर्विष रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७८ मर इदि भणिदे जीओ मरेइ सहस त्ति जीए सत्तीए। दुक्खरतवजुदमुणिणा आसीविस णाम रिद्धी सा।&lt;br /&gt;
= जिस शक्ति से दुष्कर तप से युक्त मुनि के द्वारा `मर जाओ' इस प्रकार कहने पर जीव सहसा मर जाता है, वह आशीविष नामक ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८५/५ अविद्यमानस्यार्थस्य आशंसनमाशीः, आशीर्विष एषां ते आशीर्विषाः। जेसि जं पडि मरिहि त्ति वयणं णिप्पडिदं तं मारेदि, भिक्खं भमेत्तिवयणं भिक्खं भमावेदि, सीसं छिज्जउ त्ति वयणं सीस छिंददि, आसीविसा णाम समणा। कधं वयणस्स विससण्णा। विसमिव विसमिदि उवयारादो। आसी अविसममियं जेसिं ते आसीविसा। जेसिं वयणं थावर-जंगम-विसपूरिदजीवे पडुच्च `णिव्विसा होंतु' त्ति णिस्सरिदं ते जीवावेदि। वाहिवेयण-दालिद्दादिविलयं पडुच्च णिप्पडितं सं तं तं तं कज्जं करेदि ते वि आसीविसात्ति उत्तं होदि।&lt;br /&gt;
= अविद्यमान अर्थ की इच्छा का नाम आशिष है। आशिष है विष (वचन) जिनका वे आशीर्विष कहे जाते हैं। `मर जाओ' इस प्रकार जिनके प्रति निकला हुआ जिनका वचन उसे मारता है, `भिक्षा के लिए भ्रमण करो' ऐसा वचन भिक्षार्थ भ्रमण कराता है, `शिरका छेद हो' ऐसा वचन शिर को छेदता है, (अशुभ) आशीर्विष नामक साधु हैं। '''प्रश्न'''-वचन के विष संज्ञा कैसे सम्भव है? '''उत्तर'''-विष के समान विष है। इस प्रकार उपचार से वचन को विष संज्ञा प्राप्त है। आशिष है अविष अर्थात् अमृत जिनका वे (शुभ) आशीर्विष हैं। स्थावर अथवा जंगम विष से पूर्ण जीवों के प्रति `निर्विष हो' इस प्रकार निकला हुआ जिनका वचन उन्हें जिलाता है, व्याधिवेदना और दारिद्र्य आदि के विनाश हेतु निकला हुआ जिनका वचन उस उस कार्य को करता है, वे भी आशीर्विष हैं, यह सूत्र का अभिप्राय है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. दृष्टिविष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;दृष्टिविष रस ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७९ जीए जीवो दिट्ठो महासिणा रोसभरिदहिदएण। अहदट्ठं व मरिज्जदि दिट्ठिविसा णाम सा रिद्धी ।१०७९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे रोषयुक्त हृदय वाले महर्षिसे देखा गया जीव सर्प द्वारा काटे गयेके समान मर जाता है, वह दृष्टिविष नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२७/१)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/७ दृष्टिरिति चक्षुर्मनसोर्ग्रहणं, तत्रोभयत्र दृष्टिशब्दप्रवृत्तिदर्शनात्। तत्साहचर्यात्कर्मणोऽपि। रुट्ठो जदि जोएदि चिंतेदि किरियं करेदि वा `मारेमि' त्ति तो मारेदि, अण्णं पि असुहकम्मं संरंभपुव्वावलोयणेण कुणमाणोदिट्ठविसो णाम।&lt;br /&gt;
= दृष्टि शब्द से यहाँ चक्षु और मन (दोनों) का ग्रहण है, क्योंकि उन दोनों में दृष्टि शब्द की प्रवृत्ति देखी जाती है। उसकी सहचरता से क्रिया का भी ग्रहण है। रुष्ट होकर वह यदि `मारता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है व क्रिया करता है तो मारता है; तथा क्रोध पूर्वक अवलोकन से अन्य भी अशुभ कार्य को करनेवाला (अशुभ) दृष्टिविष कहलाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृतरस ऋद्धि का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/९ एवं दिट्ठअमियाणं पि जाणिदूण लक्खणं वत्तव्वं।&lt;br /&gt;
= इसी प्रकार दृष्टि अमृतों का भी लक्षण जानकर कहना चाहिए। (अर्थात् प्रसन्न होकर वह यदि `नीरोग करता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है, व क्रिया करता है तो नीरोग करता है, तथा प्रसन्नतापूर्वक अवलोकन से अन्य भी शुभ कार्य को करने वाला दृष्टिअमृत कहलाता है)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोरब्रह्मचर्य तप में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/६ दिट्ठअमियाणमघोरगुणबंभयारीणं च को विसेसो। उवजोगसहेज्जदिट्ठीए दिट्ठिलद्धिजुत्ता दिट्ठिविसा णाम। अघोर गुणबंभयारीणं पुण लद्धी असंखेज्जा सव्वंगगया, एदेसिमंगलग्गवादे वि सयलोवद्दवविणासणसत्तिदंसणादो तदो। अत्थि भेदो। णवरि असुद्धलद्धोणं पउत्ती लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी। सुहाणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-दृष्टि-अमृत और अघोरगुण ब्रह्मचारी के क्या भेद हैं? '''उत्तर'''-उपयोग की सहायता युक्त दृष्टि में स्थित लब्धि से संयुक्त दृष्टिविष कहलाते हैं। किन्तु अघोरगुण ब्रह्मचारियों की लब्धियाँ सर्वांगगत असंख्यात हैं। इनके शरीर से स्पृष्ट वायु में भी समस्त उपद्रवों को नष्ट करने की शक्ति देखी जाती है इस कारण दोनों में भेद है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विशेष इतना है कि अशुभ लब्धियों की प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवों की इच्छाके वश से होती है। किन्तु शुभ लब्धियों की प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारों से सम्भव है, क्योंकि इनकी इच्छा के बिना भी उक्त लब्धियों की प्रवृत्ति देखी जाती है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षीर-मधु-सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८०-१०८७ करयलणि क्खिताणिं रुक्खाहारादियाणि तक्कालं। पावंति खीरभावं जीए खीरोसवी रिद्धी ।१०८०। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयण सवण मेत्तेणं। पसमदि णरतिरियाणं स च्चिय खीरोसवी ऋद्धी ।१०८१। मुणिकइणिक्खिताणि लुक्खाहारादियाणिहोंतिखणे। जीए महुररसाइं स च्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८२। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयणसवणमेत्तेण। णासदि णरतिरियाणं तच्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८३। मुणिपाणिसंठियाणिं रुक्खाहारादियाणि जीय खणे। पावंति अमियभावं एसा अमियासवी ऋद्धी ।१०८४। अहवा दुक्खादीणं महेसिवयणस्स सवणकालम्मि। णासंति जीए सिग्घं रिद्धी अमियआसवी णामा ।१०८५। रिसिपाणितलणिक्खित्तं रुक्खाहारादियं पि खणमेत्ते। पावेदि सप्पिरूवं जीए सा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८६। अहवा दुक्खप्पमुहं सवणेण मुणिंदव्ववयणस्स। उवसामदि जीवाणं एसा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८७।&lt;br /&gt;
= जिससे हस्त तल पर रखे हुए रूखे आहारादिक तत्काल ही दुग्ध परिणाम को प्राप्त हो जाते हैं, वह `क्षीरस्रावी' ऋद्धि कही जाती है ।१०८०। अथवा जिस ऋद्धि से मुनियों के वचनों के श्रवणमात्र से ही मनुष्य तिर्यंचों के दुःखादि शान्त हो जाते हैं उसे क्षीरस्रावी ऋद्धि समझना चाहिए ।१०८१। जिस ऋद्धि से मुनि के हाथ में रखे गये रूखे आहारादिक क्षणभर में मधुर रस से युक्त हो जाते हैं, वह `मध्वास्रव' ऋद्धि है, ।१०८२। अथवा जिस ऋषि-मुनि के वचनों के श्रवणमात्र से मनुष्य तिर्यंच के दुःखादिक नष्ट हो जाते हैं वह मध्वास्रावी ऋद्धि है ।१०८३। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि के हाथ में स्थित रूखे आहारादिक क्षणमात्र में अमृतपने को प्राप्त करते हैं, वह अमृतास्रवी नामक ऋद्धि है ।१०८४। अथवा जिस ऋद्धि से महर्षि के वचनों के श्रवण काल में शीघ्र ही दुःखादि नष्ट हो जाते हैं, वह अमृतस्रावी नामक ऋद्धि है ।१०८५।  जिस ऋद्धि से ऋषि के हस्ततल में निक्षिप्त रूखा आहारादिक भी क्षणमात्र में घृतरूप को प्राप्त करता है, वह `सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८६। अथवा जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनीन्द्र के दिव्य वचनों के सुनने से ही जीवों के दुःखादि शान्त हो जाते हैं, वह सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/४१/९१-१०१) (च.सा. २२७/२) &lt;br /&gt;
नोट-धवला में हस्तपुट वाले लक्षण हैं। वचन वाले नहीं। [[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या व.[[चारित्रसार]]  में दोनों प्रकार के है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थों का क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३८/१००/१ कधं रसंतरेसु ट्ठियदव्वाणं तक्खणादेव खीरासादसरूवेण परिणामो। ण, अमियसमुद्दम्मि णिवदिदविसस्सेव पंचमहव्वय-समिइ-तिगुत्तिकलावघडिदंजलिउदणिवदियाणं तदविरोहादो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-अन्य रसों में स्थित द्रव्य का तत्काल ही क्षीर स्वरूप से परिणमन कैसे सम्भव है? '''उत्तर'''-नहीं, क्योंकि जिस प्रकार अमृत समुद्र में गिरे हुए विष का अमृत रूप परिणमन होने में कोई विरोध नहीं है, उसी प्रकार पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तियों के समूह से घटित अंजलिपुट में गिरे हुए सब आहारों का क्षीर स्वरूप परिणमन करने में कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षेत्र ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धि के लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८९-१०९१ लाभंतरायकम्मक्खउवसमसंजुदए जीए फुडं। मुणिभुत्तमसेसमण्णं धामत्थं पियं ज कं पि ।१०८९। तद्दिवसे खज्जंतं खंधावारेण चक्कवट्टिस्स। झिज्जइ न लवेण वि सा अक्खीणमहाणसा रिद्धो ।१०९०। जीए चउधणुमाणे समचउरसालयम्मि णरतिरिया। मंतियसंखेज्जा सा अक्खीणमहालया रिद्धी ।१०९१।&lt;br /&gt;
= लाभान्तरायकर्म के क्षयोपशम से संयुक्त जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि के आहार से शेष, भोजनशाला में रखे हुए अन्न में से जिस किसी भी प्रिय वस्तु को यदि उस दिन चक्रवर्ती का सम्पूर्ण कटक भी खावे तो भी वह लेशमात्र क्षीण नहीं होता है, वह `अक्षीणमहानसिक' ऋद्धि है ।१०८९-१०९९। जिस ऋद्धि से समचतुष्कोण चार धनुषप्रमाण क्षेत्र में असंख्यात मनुष्य तिर्यंच समा जाते हैं, वह `अक्षीण महालय' ऋद्धि है ।१०९०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,४२/१०१/८/केवल अक्षीण महानस का निर्देश है, अक्षीण महालय का नहीं); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; शुभ ऋद्धि की प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभ की प्रयत्न पूर्वक ही&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९५/१ असुहलद्धीणं पउत्तो लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी सुहाणं लद्धीणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= अशुभ लब्धियों की प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवों की इच्छा के वश से होती है। किन्तु शुभ लब्धियों की प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारों से (इच्छा से व स्वतः) सम्भव है, क्योंकि इच्छा के बिना भी उक्त लब्धियों की प्रवृत्ति देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; एक व्यक्ति में युगपत् अनेक ऋद्धियों की सम्भावना&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १/१,१,५९/२९८/६ नैष नियमोऽप्यस्त्येकस्मिन्नक्रमेण नर्द्धयो भूयस्यो भवन्तीति। गणभृत्सु सप्तानामपि, ऋद्धीनामक्रमेण सत्त्वोपलम्भात्। आहारर्द्ध्या सह मनःपर्ययस्य विरोधो दृश्यते इति चेद्भवतु नाम दृष्टत्वात्। न चानेन विरोध इति सर्वाभिर्विरोधो वक्तुं पार्यतेऽव्यवस्थापत्तेरिति।&lt;br /&gt;
= एक आत्मा में युगपत् अनेक ऋद्धियाँ उत्पन्न नहीं होती, यह कोई नियम नहीं है, क्योंकि गणधरों के एक साथ सातों ही ऋद्धियों का सद्भाव पाया जाता है। '''प्रश्न'''-आहारक ऋद्धि के साथ मनःपर्यय का तो विरोध देखा जाता है। '''उत्तर'''-यदि आहारक ऋद्धि के साथ मनःपर्ययज्ञान का विरोध देखने में आता है तो रहा आवे। किन्तु मनःपर्यय के साथ विरोध है, इसलिए आहारक ऋद्धि का दूसरी सम्पूर्ण ऋद्धियों के साथ विरोध है ऐसा नहीं कहा जा सकता है। अन्यथा अव्यवस्था की आपत्ति आ जायेगी। (विशेष देखो `[[गणधर]]')।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,३,२५/३२/३ पमत्तसंजदस्स अणिमादिलद्धिसंपण्णस्स विउव्विदसमए आहारसरीरुट्ठावणसंभवाभावादो।&lt;br /&gt;
= अणिमादि लब्धियों से सम्पन्न प्रमत्त संयत जीव के विक्रिया करते समय आहारक शरीर की उत्पत्ति सम्भव नहीं है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[गोम्मट्टसार जीवकाण्ड]] / मूल गाथा संख्या २४२/५०५ वै गुव्विय आहारयकिरिया ण समं पमत्तविरदम्हि। जोगोवि एक्ककाले एक्केव य होदि नियमेण।।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; गोम्मटसार जीवकाण्ड/ &amp;lt;/span&amp;gt;मं.प्र. २४२/५०५ प्रमत्तविरते वैक्रियकयोगक्रिया आहारकयोगक्रिया च समं युगपन्न संभवतः। यदा आहारकयोगमवलम्ब्य प्रमत्तसंयतस्य गमनादिक्रिया प्रवर्तते तदा विक्रियर्द्धिबलेन वैक्रियकयोगमवलम्ब्य क्रिया तस्य न घटते, आहारकर्धिविक्रियर्द्ध्योर्युगपदवृत्तिविरोधात् अनेन गणधरादिनामितरर्द्धियुगपद्वृत्तिसम्भवो दर्शितः।&lt;br /&gt;
= छट्ठे गुणस्थान में वैक्रियिक और आहारक शरीर की क्रिया युगपत् नहीं होती। और योग भी नियम से एक काल में एक ही होता है। प्रमत्त विरत षष्ठ गुणस्थानवर्ती मुनिकैं समकालविषैं युगपत् वैक्रियक योग की क्रिया अर आहारक काययोग की क्रिया नाहीं। ऐसा नाहीं कि एक ही काल विषैं आहारक शरीर को धारि गमनागमनादि क्रिया कौ करै अर तभी विक्रिया ऋद्धि के बल से वैक्रियककाययोग को धारि विक्रिया सम्बन्धी कार्यकौ भी करैं। दोऊमें सौ एक ही होइ। यातैं यहू जान्या कि गणधरादिकनिकैं और ऋद्धि युगपत् प्रवर्त्तै तो विरुद्ध नाहीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>ऋद्धि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=106306"/>
		<updated>2022-12-18T08:58:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;तपश्चरणके प्रभावसे कदाचित् किन्हीं योगीजनोंको कुछ चामत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। उन्हें ऋद्धि कहते हैं। इसके अनेकों भेद-प्रभेद हैं। उन सबका परिचय इस अधिकारमें दिया गया है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;hr width=800 /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[ ऋद्धि#1 | ऋद्धिके भेद-निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ #1.1 | ऋद्धियोंके वर्गीकरणका चित्र]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ ऋद्धि#1.2 | उपरोक्त भेदों प्रभेदोंके प्रमाण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol &amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;[[ ऋद्धि#2 |  बुद्धि ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;  केवल, अवधि व मनःपर्ययज्ञान ऋद्धियाँ&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/ul&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt; - दे. [[वह वह नाम]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;   &lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.1 | बुद्धि ऋद्धि सामान्यका लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.2 | बीजबुद्धि निर्देश :]]&lt;br /&gt;
         &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धि का लक्षण&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धिके लक्षण सम्बन्धी दृष्टिभेद&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धिकी अचिन्त्य शक्ति व शंका&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.3 | कोष्ठ बुद्धिका लक्षण व शक्ति निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.4 | पादानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेष]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(अनुसारिणी, प्रतिसारिणी व उभयसारिणी)&lt;br /&gt;
         &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.5 | संभिन्न श्रोतृत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;  [[  ऋद्धि#2.6 |दूरास्वादन आदि, पाँच ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
               &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;चतुर्दश पूर्वी व दश पूर्वी - दे. श&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;अष्टांग निमित्तज्ञान - दे. [[निमित्त]] २&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.7 | प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व सामान्य व विशेषके लक्षण (औत्पत्तिकी, परिणामिकी, वैनयिकी, कर्मजा)&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकीमें अन्तर&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि व ज्ञानसामान्यमें अन्तर &lt;br /&gt;
         &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt; प्रत्येक बुद्धि ऋद्धि - दे. [[बुद्ध]]&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.8 | वादित्व बुद्धि ऋद्धि]]&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#3 | विक्रिया ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.1 | विक्रिया ऋद्धि की विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.2 | अणिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.3 | महिमा, गरिमा व लघिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.4 | प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रियाके लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.5 | ईशित्व व वशित्व विक्रिया निर्देश]]&lt;br /&gt;
                      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व के लक्षण&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्वमें अन्तर&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्वमें विक्रियापना कैसे है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.6 | अप्रतिघात, अंतर्धान व काम रूपित्व]]&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#4 | चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.1 | चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.2 | चारण ऋद्धिकी विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.3 | आकाशचारण व आकाशगामित्व]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; आकाशगामित्व ऋद्धिका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण ऋद्धिका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्वमें अन्तर&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.4 | जलचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारणका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धिमें अन्तर&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.5 | जंघा चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.6 | अग्नि, धूम, मेघ, तंतु, वायु व श्रेणी चारण ऋद्धियों का निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.7 | धारा व ज्योतिष चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.8 | फल, पुष्प, बीज व पत्रचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#5 |  तपऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
           &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.1 | उग्रतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;li&amp;gt; उग्रोग्र तप व अवस्थित उग्रतपके लक्षण&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	   &amp;lt;ul&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt;उग्रतप ऋद्धिमें अधिकसे अधिक उपवास करनेकी सीमा व तत्सम्बन्धी शंका - दे. [[प्रोषधोपवास २]]&amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.2 | घोरतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.3 | घोर पराक्रमतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.4 | घोर ब्रह्मचर्यतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर व अघोर गुण ब्रह्मचारीके लक्षण&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण व घोर पराक्रम तपमें अन्तर&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.5 | दीप्ततप व महातप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#6 |  बल ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#6.1 | मनोबल, वचनबल व कालबल ऋद्धिके लक्षण]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#7 |  औषध ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.1 | औषध ऋद्धि सामान्य]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.2 | आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल व विट औषध]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt;उपरोक्त चारोंके लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; आमर्शौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्यमें अन्तर।&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.3 | सर्वौषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.4 | आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#8 |  रस ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.1 | आशीर्विष रस ऋद्धि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(शुभ व अशुभ आशीर्विशके लक्षण)&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.2 | दृष्टि विष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टिविष रस ऋद्धिका लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धिका लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोर ब्रह्मचर्य तप में अन्तर&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; क्षीर, मधु, सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धियोंके लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थोंका क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#9 |  क्षेत्र ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#9.1 | अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धिके लक्षण]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#10 |  ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.1 | शुभ ऋद्धिकी प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभ ऋद्धियोंकी प्रयत्न पूर्वक ही]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.2 |एक व्यक्तिमें युगपत् अनेक ऋद्धियोंकी सम्भावना]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.3 | परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;परिहार विशुद्धि, आहारक व मनःपर्ययका परस्पर विरोध - दे. [[परिहारविशुद्धि]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;आहारक व वैक्रियकमें विरोध - दे. ऊपरवाला शीर्षक&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;तैजस व आहारक ऋद्धि निर्देश - दे. वह वह नाम&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;गणधरदेवमें युगपत् सर्वऋद्धियाँ - दे. [[गणधर]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;साधुजन ऋद्धिका भोग नहीं करते - दे. [[श्रुतकेवली ]]१/२&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;hr width=&amp;quot;800&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; ऋद्धिके भेद निर्देश&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li id=&amp;quot;1.1&amp;quot; &amp;gt; ऋद्धियोंके वर्गीकरणका चित्र&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads &amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads&amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt; उपरोक्त भेद-प्रभेदोंके प्रमाण&lt;br /&gt;
&amp;lt;dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/१८/५८); ([[सर्वार्थसिद्धि]] अध्याय संख्या  ३/३६/२३०/२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१२); ([[नियमसार]] / [[नियमसार तात्त्पर्यवृत्ति | तात्त्पर्यवृत्ति ]] गाथा संख्या ११२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बुद्धि ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६९-९७१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११/२) (पदानुसारी-[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५) दशपूर्वित्व - ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६९/५) अष्टांग महानिमित्तज्ञान - ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१००२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या ९/४,१,१४/१९/७२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१४/३) प्रज्ञाश्रमणत्व- ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;विक्रिया सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;(दे. ऊपर क्रिया व विक्रिया दोनोंके भेद) क्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। विक्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-१०२५); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/५/४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१३)। चारण-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३५,१०४८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/२१/७९); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०,८८)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;तप सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४९-१०५०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। उग्रतप-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७/५)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। घोरब्रह्मचर्य-([[षट्खण्डागम]] पुस्तक संख्या  ९/४,१/२८-२९/९३-९४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बल –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२४/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;औषध –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६७) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;रस सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७७); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/४)। आशार्विष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८६/४) दृष्टिविष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८७/२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;क्षेत्र –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८८); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. बुद्धि ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt; बुद्धि ऋद्धि सामान्यका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२ बुद्धिरवगमो ज्ञान तद्विषया अष्टादशविधा ऋद्धयः।&lt;br /&gt;
= बुद्धि नाम अवगम या ज्ञानका है। उसको विषय करनेवाली १८ ऋद्धियाँ हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; बीजबुद्धि निर्देश&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;li&amp;gt;बीजबुद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७५-९७७ णोइंदियसुदणाणावरणाणं वोरअंतरायाए। तिविहाणं पगदीणं उक्कस्सखउवसमविमुद्धस्स ।९७५। संखेज्जसरूवाणं सद्दाणं तत्थ लिंगसंजुत्तं। एक्कं चिय बीजपदं लद्धूण परोपदेसेण ।९७६। तम्मि पदे आधारे सयलमुदं चिंतिऊण गेण्हेदि। कस्स वि महेसिणो जा बुद्धि सा बीजबुद्धि त्ति ।९७७।&lt;br /&gt;
= नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तराय, इन तीन प्रकारकी प्रकृतियोंके उत्कृष्ट क्षयोपशमसे विशुद्ध हुए किसी भी महर्षिकी जो बुद्धि, संख्यातस्वरूप शब्दोंके बीचमें-से लिंग सहित एक ही बीजभूत पदको परके उपदेशसे प्राप्त करके उस पदके आश्रयसे सम्पूर्ण श्रुतको विचारकर ग्रहण करती है, वह बीजबुद्धि है। ९७५-९७७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२६)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/२)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६-१; ५९-९ बीजमिव बीजं। जहाबीजं मूलंकुर-पत्त-पोर-क्खंद-पसव-तुस-कुसुम-खीरतं दुलाणमाहारं तहा दुवालसगत्थाहारं जं पदं तं बीजतुल्लत्तादो बीजं। बीजपदविसयमदिणाणं पि बीजं, कज्जे कारणोवचारादो। एसा कुदो होदि। विसिट्ठोग्गहावरणीयक्खओवसमादो। (५९-९)&lt;br /&gt;
= बीजके समान बीज कहा जाता है। जिस प्रकार बीज, मूल, अंकुर, पत्र, पोर, स्कन्ध, प्रसव, तुष, कुसुम, क्षीर और तंदुल आदिकोंका आधार है; उसी प्रकार बारह अंगोंके अर्थका आधारभूत जो पद है वह बीज तुल्य होनेसे बीज है। बीजपद विषयक मतिज्ञान भी कार्यमें कारणके उपचारसे बीज है ।५६।.....यह बीज बुद्धि कहाँसे होती है। वह विशिष्ट अवग्रहावरणीयके क्षयोपशमसे होती है।&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धिके लक्षण सम्बन्धी दृष्टिभेद&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५७/६ बीजपदट्ठिदरपदेसादो हेट्ठिमसुदणाणुप्पत्तीए कारणं होदूण पच्छा उवरिमसुदणाणुप्पत्तिणिमित्ता बीजबुद्धि त्ति के वि आइरिया भणंति। तण्ण घडदे, कोट्ठबुद्धियादिचदुण्हं णाणाणमक्कमेणेक्कम्हि जीवे सव्वदा अणुप्पत्तिप्पसंगादो।.....ण च एक्कम्हि जीवे सव्वदा चदुण्हं बुद्धीण अक्कमेण अणुप्पत्ती चेव।....त्ति सुत्तगाहाए वक्खाणम्मि गणहरदेवाणं चदुरमलबुद्धीणं दंसणादो। किंच अत्थि गणहरदेवेसु चत्तारि बुद्धीओ अण्णहा दुवासंगाणमणुप्पत्तिप्पसंगादो।&lt;br /&gt;
= बीजपदसे अधिष्ठित प्रदेशसे अधस्तनश्रुतके ज्ञानकी उत्पत्तिका कारण होकर पीछे उपरिम श्रुतके ज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित होनेवाली बीज बुद्धि है। (अर्थात् पहले बीजपदके अल्पमात्र अर्थको जानकर, पीछे उसके आश्रय पर विषयका विस्तार करनेवाली बुद्धि बीजबुद्धि है, न कि केवल शब्द-विस्तार ग्रहण करनेवाली) ऐसा कितने ही आचार्य कहते हैं। किन्तु वह घटित नहीं होता। क्योंकि, ऐसा माननेपर कोष्ठबुद्धि आदि चार ज्ञानोंकी (कोष्ठबुद्धि तथा अनुसारी, प्रतिसारी व तदुभयसारी ये तीन पदानुसारीके भेद)। युगपत् एक जीवमें सर्वदा उत्पत्ति न हो सकनेका प्रसंग आवेगा। और एक जीवमें सर्वदा चार बुद्धियोंकी एक साथ उत्पत्ति हो ही नहीं, ऐसा है नहीं क्योंकि - (सात ऋद्धियोंका निर्देश करनेवाली) सूत्रगाथाके व्याख्यानमें (कही गयीं) गणधर देवोंके चार निर्मल बुद्धियाँ देखी जाती हैं। तथा गणधर देवोंके चार बुद्धियाँ होती हैं, क्योंकि उनके बिना (उनके द्वारा) बारह अंगोंकी उत्पत्ति न हो सकनेका प्रसंग आवेगा।&lt;br /&gt;
 &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धिकी अचिन्त्य शक्ति व शंका&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६/३ &amp;quot;संखेज्जसद्दअणंतलिंगेहिं सह बीजपदं जाणंती, बीजबुद्धि त्ति भणिदं होदि। णा बीजबुद्धि अणंतत्थ पडिबद्धअणंतलिंगबीजपदमवगच्छदि, खओसमियत्तादो त्ति। ण खओवसमिएण परोक्खेण सुदणाणेण इत्यादि (देखो केवल भाषार्थ)&lt;br /&gt;
= संख्यात शब्दों के अनन्त अर्थों में सम्बद्ध अनन्त लिंगों के साथ बीजपद को जानने वाली बीज बुद्धि है, यह तात्पर्य है। '''प्रश्न'''-बीज बुद्धि अनन्त अर्थों से सम्बद्ध अनन्त लिंगरूप बीजपद को नहीं जानती, क्योंकि वह क्षायोपशमिक है? '''उत्तर'''-नहीं, क्योंकि जिस प्रकार क्षयोपशमजन्य परोक्ष श्रुतज्ञान के द्वारा केवलज्ञान से विषय किये गये अनन्त अर्थों का परोक्ष रूप से ग्रहण किया जाता है, उसी प्रकार मतिज्ञान के द्वारा भी सामान्य रूप से अनन्त अर्थों को ग्रहण किया जाता है, क्योंकि इसमें कोई विरोध नहीं है। '''प्रश्न'''-यदि श्रुतज्ञान का विषय अनन्त संख्या है, तो `चौदह पूर्वी का विषय उत्कृष्ट संख्यात है' ऐसा जो परिकर्म में कहा है, वह कैसे घटित होगा? '''उत्तर'''-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट, उत्कृष्ट-संख्यात को ही जानता है, ऐसा यहाँ नियम नहीं है। '''प्रश्न'''-श्रुतज्ञान समस्त पदार्थों को नहीं जानता है, क्योंकि, (पदार्थोंके अनन्तवें भाग प्रज्ञापनीय हैं और उसके भी अनन्तवें भाग द्वादशांग श्रुत के विषय हैं) इस प्रकारका वचन है? उत्तर-समस्त पदार्थों का अनन्तवाँ भाग द्रव्यश्रुतज्ञान का विषय भले ही हो, किन्तु भाव श्रुतज्ञान का विषय समस्त पदार्थ हैं; क्योंकि ऐसा माने बिना तीर्थंकरों के वचनातिशय के अभावका प्रसंग होगा।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; कोष्ठबुद्धिका लक्षण व शक्तिनिर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७८-९७९ &amp;quot;उक्कस्सिधारणाए जुत्तो पुरिसो गुरुवएसे। णाणाविहगंथेसु वित्थारे लिंगसद्दबीजाणि ।९७८। गहिऊण णियमदीए मिस्सेण विणा धरेदि मदिकोट्ठे। जो कोई तस्स बुद्धी णिद्दिट्ठा कोट्ठबुद्धी त्ति ।९७९।&lt;br /&gt;
= उत्कृष्ट धारणासे युक्त जो कोई पुरुष गुरुके उपदेशसे नाना प्रकारके ग्रन्थों में से विस्तार पूर्वक लिंग सहित शब्दरूप बीजों को अपनी बुद्धि में ग्रहण करके उन्हें मिश्रण के बिना बुद्धिरूपी कोठे में धारण करता है, उसकी बुद्धि कोष्ठबुद्धि कही गयी है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २९२/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,६/५३/७ कोष्ठ्यः शालि-व्रीहि-यव-गोधूमादिनामाधारभूतः कुस्थली पल्यादिः। सा चासेसदव्वपज्जायधारणगुणेण कोट्ठसमाणा बुद्धी कोट्ठो, कोट्ठा च सा बुद्धी च कोट्ठबुद्धी। एदिस्से अल्पधारणकालो जहण्णेण संखेज्जाणि उक्कस्सेण असंखेज्जाणि वसाणि कुदो। `कालमसंखं संखं च धारणा' त्ति सुत्तुवलंभादो। कुदो एदं होदि। धारणावरणीयस्स तिव्वखओवसमेण।&lt;br /&gt;
= शालि, व्रीहि, जौ और गेहूँ आदि के आधारभूत कोथली, पल्ली आदि का नाम कोष्ठ है। समस्त द्रव्य व पर्यायों को धारण करने रूप गुण से कोष्ठ के समान होने से उस बुद्धि को भी कोष्ठ कहा जाता है। कोष्ठ रूप जो बुद्धि वह कोष्ठ बुद्धि है। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,५,४०/२४३/११) इसका अर्थ धारणकाल जघन्य से संख्यात वर्ष और उत्कर्ष से असंख्यात वर्ष है, क्योंकि `असंख्यात और संख्यात काल तक धारणा रहती है' ऐसा सूत्र पाया जाता है। '''प्रश्न'''-यह कहाँ से होती है? '''उत्तर'''-धारणावरणीय कर्म के तीव्र क्षयोपशम से होता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; पदानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेषके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०-९८३ बुद्धीविपक्खणाणं पदाणुसारी हवेदि तिविहप्पा। अणुसारी पडिसारी जहत्थणामा उभयसारी ।९८०। आदि अवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय उवरिमगंथं जा गिण्हदि सा मदी हु अणुसारी ।९८१। आदिअवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय हेट्ठिमगंथं बुज्झदि जा सा च पडिसारी ।९८२। णियमेण अणियमेण य जुगवं एगस्स बीजसद्दस्स। उवरिमहेट्ठिमगंथं जा बुज्झइ उभयसारी सा ।९८३।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/२ पदमनुसरति अनुकुरुते इति पदानुसारी बुद्धिः। बीजबुद्धीए बीजपदमवगंतूण एत्थ इदं एदेसिमक्खराणं लिंगं होदि ण होदि त्ति इहिदूणसयलसुदक्खर-पदाइमवगच्छंती पदाणुसारी। तेहि पदेहिंतो समुप्पज्जमाणं णाणं सुदणाणं ण अक्खरपदविसयं, तेसिमक्खरपदाणं बीजपदंताभावादो। सा च पदाणुसारी अणु-पदितदुभयसारिभेदेण तिविहो।....कुदो एदं होदि। ईहावायावरणीयाणं तिव्वक्खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/६०) - पद का जो अनुसरण या अनुकरण करती है वह पदानुसारी बुद्धि है। बीज बुद्धि से बीजपद को जानकर, `यहाँ यह इन अक्षरों का लिंग होता है और इनका नहीं', इस प्रकार विचारकर समस्त श्रुत के अक्षर पदों को जाननेवाली पदानुसारी बुद्धि है (उन पदों से उत्पन्न होने वाला ज्ञान श्रुतज्ञान है, वह अक्षरपद विषयक नहीं है; क्योंकि उन अक्षरपदों का बीजपद में अन्तर्भाव है। '''प्रश्न'''-यह कैसे होती है? उत्तर-ईहावरणीय कर्म के तीव्र क्षयोपशम से होती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]]  - विचक्षण पुरुषों की पदानुसारिणी बुद्धि अनुसारिणी, प्रतिसारिणी और उभयसारिणी के भेद से तीन प्रकार है, इस बुद्धि के ये यथार्थ नाम हैं ।९८०। जो बुद्धि आदि मध्य अथवा अन्त में गुरु के उपदेश से एक बीजपदको ग्रहण करके उपरिम (अर्थात् उससे आगेके) ग्रन्थको ग्रहण करती है वह `अनुसारिणी' बुद्धि कहलाती है ।९८१। गुरुके उपदेशसे आदि मध्य अथवा अन्त में एक बीजपद को ग्रहण करके जो बुद्धि अधस्तन (पीछे वाले) ग्रन्थ को जानती है, वह `प्रतिसारिणी' बुद्धि है ।९८२। जो बुद्धि नियम अथवा अनियम से एक बीजशब्द के (ग्रहण करनेपर) उपरिम और अधस्तन (अर्थात् उस पदके आगे व पीछे के सर्व) ग्रन्थ को एक साथ जानती है वह `उभयसारिणी' बुद्धि है ।९८३।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;संभिन्नश्रोतृत्वका लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८४-९८६ सोदिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदं गोवंगाणामकम्मम्मि ।९८४। सोदुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणपएसे। संठियणरतिरियाणं बहुविहसद्दे समुट्ठंते ।९८५। अक्खरअणक्खरमए सोदूणं दसदिसासु पत्तेक्कं। जं दिज्जदि पडिवयणं तं चिय संभिण्णसोदित्तं ।९८६।&lt;br /&gt;
= श्रोत्रेन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्मका उदय होनेपर श्रोत्रेन्द्रियके उत्कृष्ट क्षेत्रसे बाहर दशों दिशाओंमें संख्यात योजन प्रमाण क्षेत्रमें स्थित मनुष्य एवं तिर्यंचोंके अक्षरानक्षरात्मक बहुत प्रकारके उठनेवाले शब्दोंको सुनकर जिससे (युगपत्) प्रत्युत्तर दिया जाता है, वह संभिन्नश्रोतृत्व नामक बुद्धि ऋद्धि कहलाती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६१/४); (सा.चा. २१३/१)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६२/६ कुदो एदं होदि। बहुबहुविहक्खिप्पावरणीयाणं खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= यह कहाँ से होता है? बहु, बहुविध और क्षिप्र (मति) ज्ञानावरणीय के क्षयोपशम से होता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; दूरादास्वादन आदि ऋद्धियों के लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८७-९९७/१-जिब्भिंदिय सुदणाणावरणाणं वीयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८७। जिब्भुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणं। विविहरसाणं सादं जाणइ दूरसादित्तं ।९८८। २-पासिंदिय सुदणाणावरणाणं वारियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८९। पासुक्कस्सखिदोदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणिं। अट्ठविहप्पासाणिं जं जाणइ दूरपासत्तं ।९९०। ३-घाणिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९१। घाणुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। जं बहुविधगंधाणिं तं घायदि दूरघाणत्तं ।९९२। ४-सोदिंदियसुदणाणावरणाणं बीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउ वसमे उदिदं गोबंगणामकम्मम्मि ।९९३। सोदुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। चेट्ठंताणं माणुसतिरियाणं बहुवियप्पाणं ।९९४। अक्खरअणक्खरमए बहुविहसद्दे विसेससंजुत्ते। उप्पण्णे आयण्णइ जं भणिअं दूरसवणत्त ।९९५। ५-रूविंदियसुदणाणावरणाणं वीरिअंतराआए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९६। रूउक्कस्सखिदीदो बाहिरं संखेज्जजोयणठिदाइं। जं बहुविहदव्वाइं देक्खइ तं दूरदरिसिणं णाम ।९९७।&lt;br /&gt;
= वह वह इन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन तीन प्रकृतियों के उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्म का उदय होने पर उस उस इन्द्रिय के उत्कृष्ट विषयक्षेत्र से बाहर संख्यात योजनों में स्थित उस उस सम्बन्धी विषय को जान लेना उस उस नाम की ऋद्धि है। यथा-जिह्वा इन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरास्वादित्व', स्पर्शन इन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरस्पर्शत्व', घ्राणेन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरघ्राणत्व', श्रोत्रेन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरश्रवणत्व' और चक्षु रन्द्रियावरण के क्षयोपशम से `दूरदर्शित्व' ऋद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व सामान्य व विशेष के लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१७-१०२१ पयडीए सुदणाणावरणाए वीरयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उप्पज्जइ पण्णसमणद्धी ।१०१७। पण्णासवणर्द्धिजुदो चोद्दस्सपुव्वीसु विसयसुहुमत्तं। सव्वं हि सुदं जाणदि अकअज्झअणो वि णियमेण ।१०१८। भासंति तस्स बुद्धी पण्णासमणद्धी सा च चउभेदा। अउपत्तिअ-परिणामिय-वइणइकी-कम्मजा णेया ।१०१९। भवंतर सुदविणएणं समुल्लसिदभावा। णियणियजादिविसेसे उप्पण्णा पारिणामिकी णामा ।१०२०। वइणइकी विणएणं उप्पज्जदि बारसंगसुदजोग्गं। उवदेसेण विणा तवविसेसलाहेण कम्मजा तुरिमा ।१०२१।&lt;br /&gt;
= श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय का उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर `प्रज्ञाश्रमण' ऋद्धि उत्पन्न होती है। प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि से युक्त जो महर्षि अध्ययन के बिना किये ही चौदहपूर्वों में विषय की सूक्ष्मता को लिए हुए सम्पूर्ण श्रुत को जानता है और उसको नियमपूर्वक निरूपण करता है उसकी बुद्धि को प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि कहते हैं। वह औत्पत्तिकी, पारिणामिकी, वैनयिकी और कर्मजा इन भेदों से चार प्रकार की जाननी चाहिए ।१०१७-१०१९। इनमें से पूर्व भव में किये गये श्रुत के विनय से उत्पन्न होनेवाली औत्पत्तिकी (बुद्धि है) ।१०२०।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/२२/८२ विणएण सुदमधीदं किह वि पमादेण होदि विस्सरिदं। तमुवट्ठादि परभवे केवलणाणं च आहवदि ।२२। - एसो उप्पत्तिपण्णसमणो छम्मासोपवासगिलाणो वि तब्बुद्धिमाहप्पजाणावणट्ठ पुच्छावावदचोद्दसपुव्विस्स विउत्तरबाहओ।&lt;br /&gt;
= विनय से अधीत श्रुतज्ञान यदि किसी प्रकार प्रमाद से विस्मृत हो जाता है तो उसे वह परभव में उपस्थित करती है और केवलज्ञान को बुलाती है ।२२। यह औत्पत्तिकी प्रज्ञाश्रमण छह मास के उपवास से कृश होता हुआ भी उस बुद्धि के माहात्म्य को प्रकट करने के लिए पूछने रूप क्रिया में प्रवृत्त हुए चौदहपूर्वीको भी उत्तर देता है। निज-निज जाति विशेषों में उत्पन्न हुई बुद्धि `पारिणामिकी' है, द्वादशांग श्रुत के योग्य विनय से उत्पन्न होनेवाली `वैनयिकी' और उपदेश के बिना ही विशेष तप की प्राप्ति से आविर्भूत हुई चतुर्थ `कर्मजा' प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि समझना चाहिए ।१०२०-१०२१।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२१६/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/१ उसहसेणादीणं-तित्थयरवयणविणिग्गयबीजपदट्ठावहारयाणं पण्णाए कत्थं तब्भावो। पारिणामियाए, विणय-उप्पत्तिकम्मेहि विणा उप्पत्तीदो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-तीर्थंकरों के मुखसे निकले हुए बीजपदों के अर्थ का निश्चय करने वाले वृषभसेनादि गणधरों की प्रज्ञा का कहाँ अन्तर्भाव होता है? उत्तर-उसका पारिणामिक प्रज्ञा में अन्तर्भाव होता है, क्योंकि वह विनय, उत्पत्ति और कर्म के बिना उत्पन्न होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकी में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/२ पारिणामिय-उप्पत्तियाणं को विसेसो। जादि विसेसजणिदकम्मक्खओवसमुप्पण्णा पारिणामिया, जम्मंतरविणयजणिदसंसकारसमुप्पण्णा अउप्पत्तिया, त्ति अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-पारिणामिकी और औत्पत्तिकी प्रज्ञा में क्या भेद है? उत्तर-जाति विशेष में उत्पन्न कर्म क्षयोपशम से आविर्भूत हुई प्रज्ञा पारिणामिकी है, और जन्मान्तर में विनयजनित संस्कार से उत्पन्न प्रज्ञा औपपत्तिकी है, यह दोनों में विशेष है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि और ज्ञान सामान्य में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८४/२ पण्णाए णाणस्स य को विसेसो णाणहेदुजीवसत्ती गुरूवएसणि रवेक्खा पण्णा णाम, तक्कारियं णाणं। तदो अत्थि भेदो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-प्रज्ञा और ज्ञान के बीच क्या भेद है? '''उत्तर'''-गुरु के उपदेश से निरपेक्ष ज्ञान की हेतुभूत जीव की शक्ति का नाम प्रज्ञा है, और उसका कार्य ज्ञान है; इस कारण दोनों में भेद है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;वादित्व का लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२३ सक्कादीणं वि पक्खं बहुवादेहिं णिरुत्तरं कुणदि। परदव्वाइं गवेसइ जीए वादित्तरिद्धी सा ।१०२३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के द्वारा शक्रादि के पक्ष को भी बहुत वाद से निरुत्तर कर दिया जाता है और पर के द्रव्यों की गवेषणा (परीक्षा) करता है (अर्थात् दूसरों के छिद्र या दोष ढूँढता है) वह वादित्व ऋद्धि कहलाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/५)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; विक्रिया ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;विक्रिया ऋद्धि की विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-२५, १०३३ अणिमा-महिमा-लघिमा-गरिमा-पत्ती-य तह अ पाकम्मं। ईसत्तवसित्तताइं अप्पडिघादंतधाणाच ।१०२४। रिद्धी हु कामरूवा एवं रूवेहिं विविहभेएहिं। रिद्धी विकिरिया णामा समणाणं तवविसेसेणं ।१०२५। दुविहा किरियारिद्धी णहयलगामित्तचारणत्तेहिं ।१०३३।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५,४ अणिमा महिमा लहिमा पत्ती पागम्यं ईसित्तं वसित्तं कामरूवित्तमिदि विउव्वणमट्ठविहं।....एत्थ एगसंजोगादिणा विसदपंचवंचासविउव्वणभेदा उप्पाएदव्वा, तइक्कारणस्स वडचित्तयत्तादो (पृ. ७६/६)।&lt;br /&gt;
= अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, अप्रतिघात, अन्तर्धान और कामरूप इस प्रकार के अनेक भेदों से युक्त विक्रिया नामक ऋद्धि तपोविशेष से श्रमणों को हुआ करती है। [[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ....([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); (व.सु.श्रा. ५१३)। नभस्तलगामित्व और चारणत्व के भेद से `क्रियाऋद्धि' दो प्रकार है। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, और कामरूपित्व - इस प्रकार विक्रिया ऋद्धि आठ प्रकार है। यहाँ एकसंयोग, द्विसंयोग आदि के द्वारा २५५ विक्रिया के भेद उत्पन्न करना चाहिए, क्योंकि उनके कारण विचित्र हैं। एकसंयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = ८; और अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५&lt;br /&gt;
(विशेष देखो [गणित] II/४)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अणिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२६ अणुतणुकरणं अणिमा अणुछिद्दे पविसिदूण तत्थेव। विकरदि खंदावारं णिएसमविं चक्कवट्टिस्स ।१०२६।&lt;br /&gt;
= अणु के बराबर शरीर को करना अणिमा ऋद्धि है। इस ऋद्धि के प्रभाव से महर्षि अणु के बराबर छिद्र में प्रविष्ट होकर वहाँ ही, चक्रवर्ती के कटक और निवेश की विक्रिया द्वारा रचना करता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३४) ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; महिमा गरिमा व लघिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२७ मेरूवमाण देहा महिमा अणिलाउ लहुत्तरो लहिमा। वज्जाहिंतो गुरुवत्तणं च गरिमं त्ति भणंति ।१०२७।&lt;br /&gt;
= मेरु के बराबर शरीर के करने को महिमा, वायु से भी लघु (हलका) शरीर करने को लघिमा और वज्र से भी अधिक गुरुतायुक्त (भारी) शरीर के करने को गरिमा ऋद्धि कहते हैं।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५); (च.सा. २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२८-१०२९ भूमोए चेट्ठंतो अंगुलिअग्गेण सूरिससिपहुदिं। मेरुसिहराणि अण्णं जं पावदि पत्तिरिद्धी सा ।१०२८। सलिले वि य भूमीए उन्मज्जणिमज्जणाणि जं कुणदि। भूमीए वि य सलिले गच्छदि पाकम्मरिद्धी सा ।१०२९।&lt;br /&gt;
= भूमि पर स्थित रहकर अंगुलि के अग्रभाग से सूर्य-चन्द्रादिक को, मेरुशिखरों को तथा अन्य वस्तु को प्राप्त करना यह प्राप्ति ऋद्धि है ।१०२८। जिस ऋद्धि के प्रभाव से जल के समान पृथिवी पर उन्मज्जन-निमज्जन क्रिया को करता है और पृथिवी के समान जल पर भी गमन करता है वह प्राकाम्य ऋद्धि है ।१०२९।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/७ भूमिट्ठियस्स करेण चदाइच्चदबिंबच्छिवणसत्ती पत्ती णाम। कुलसेलमेरुमहीहर भूमीणं बाहमकाऊण तासु गमणसत्ती तवच्छरणबलेणुप्पणा पागम्मं णाम।&lt;br /&gt;
= (प्राप्ति का लक्षण उपरोक्तवत् ही है) - कुलाचल और मेरुपर्वत के पृथिवीकायिक जीवों को बाधा न पहुँचाकर उनमें, तपश्चरण के बल से उत्पन्न हुई गमनशक्ति को प्राकाम्य ऋद्धि कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/४ अनेकजातिक्रियागुणद्रव्याधीनं स्वाङ्गाद् भिन्नमभिन्नं च निर्माणं प्राकाम्यं सैन्यादिरूपमिति केचित्।&lt;br /&gt;
= कोई-कोई आचार्य अनेक तरह की क्रिया गुण वा द्रव्य के आधीन होने वाले सेना आदि पदार्थों को अपने शरीर से भिन्न अथवा अभिन्न रूप बनाने की शक्ति प्राप्त होने को प्राकाम्य कहते हैं।&lt;br /&gt;
(विशेष दे. वैक्रियक ।१। पृथक् व अपृथक्विक्रिया)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३० णिस्सेसाण पहुत्तं जगाण ईसत्तणामरिद्धी सा। वसमेंति तवबलेणं जं जीओहा वसित्तरिद्धी सा ।१०३०।&lt;br /&gt;
= जिससे सब जगत् पर प्रभुत्व होता है, वह ईशित्वनामक ऋद्धि है और जिससे तपोबल द्वारा जीव समूह वश में होते हैं, वह वशित्व ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/४) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/५)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/२ सव्वेसिं जीवाणं गामणयरखेडादीणं च भुंजणसत्ती समुप्पण्णा ईसित्तं णाम। माणुस-मायंग-हरि-तुरयादीणं सगिच्छाए विउव्वणसत्ती वसित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= सब जीवों तथा ग्राम, नगर, एवं खेडे आदिकों के भोगने की जो शक्ति उत्पन्न होती है वह ईशित्व ऋद्धि कही जाती है। मनुष्य, हाथी, सिंह एवं घोड़े आदिक रूप अपनी इच्छा से विक्रिया करने की (अर्थात् उनका आकार बदल देने की) शक्ति का नाम वशित्व है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रिया में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/३ ण च वसित्तस्स ईसित्तिम्म पवेसो, अवसाणं पि हदाकारेण ईसित्तकरणुवलंभादो।&lt;br /&gt;
= वशित्व का ईशित्व ऋद्धि में अन्तर्भाव नहीं हो सकता; क्योंकि अवशीकृतों का भी उनका आकार नष्ट किये बिना ईशित्वकरण पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;. ईशित्व व वशित्व में विक्रियापना कैसे है?&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/५ ईसित्तवसित्ताणं कधं वेउव्विवत्तं। ण, विविहगुणइड्ढिजुत्तं वेउव्वियमिदि तेसिं वेउव्वियत्ताविरोहादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-ईशित्व और वशित्व के विक्रियापना कैसे सम्भव है? उत्तर-नहीं, क्योंकि नाना प्रकार गुण व ऋद्धि युक्त होने का नाम विक्रिया है, अतएव उन दोनों के विक्रियापने में कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अप्रतिघात अन्तर्धान व कामरूपित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३१-१०३२ सेलसिलातरुपमुहाणब्भंतरं होइदूण गमणं व। जं वच्चदि सा ऋद्धी अप्पडिघादेत्ति गुणणामं ।१०३१। जं हवदि अद्दिसत्तं अंतद्धाणाभिधाणरिद्धी सा। जुगवें बहुरूवाणि जं विरयदि कामरूवरिद्धी सा ।१०३२।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के बल से शैल, शिला और वृक्षादि के मध्य में होकर आकाश के समान गमन किया जाता है, वह सार्थक नामवाली अप्रतिघात ऋद्धि है ।१०३१। जिस ऋद्धि से अदृश्यता प्राप्त होती है, वह अन्तर्धान नामक ऋद्धि है; और जिससे युगपत् बहुत-से रूपों को रचता है, वह कामरूप ऋद्धि है ।१०३२।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/६)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/४ इच्छिदरूवग्गहणसत्ती कामरूवित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= इच्छित रूप के ग्रहण करने की शक्ति का नाम कामरूपित्व है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/७ चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो एयट्ठो तह्मि कुसलो णिउणो चारणो।&lt;br /&gt;
= चरण, चारित्र, संजम, पापक्रिया निरोध इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण हैं वे चारण कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धि की विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३४-१०३५, १०४८ &amp;quot;चारणरिद्धी बहुविहवियप्पसंदोह वित्थरिदा ।१०३४। जलजंधाफलपुप्फं पत्तग्गिसिहाण धूममेधाणं। धारामक्कडतंतूजोदीमरुदाण चारणा कमसो ।१०३५। अण्णो विविहा भंगा चारणरिद्धीए भाजिदा भेदा। तां सरूवंकहणे उवएसो अम्ह उच्छिण्णो ।१०४८।&lt;br /&gt;
= चारण ऋद्धि क्रम से जलचारण, जंघाचारण, फलचारण, पुष्पचारण, पत्रचारण, अग्निशिखाचारण, धूमचारण, मेघचारण, धाराचारण, मर्कटतन्तुचारण, ज्योतिषचारण और मरुच्चारण इत्यादि अनेक प्रकार के विकल्प समूहों से विस्तार को प्राप्त हैं ।१०३४-१०३५। इस चारण ऋद्धि के विविध भंगों से युक्त विभक्त किये हुए और भी भेद होते हैं। परन्तु उनके स्वरूप का कथन करने वाला उपदेश हमारे लिए नष्ट हो चुका है ।१०४८।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/पृ. ७८/१० तथा पृ. ८०/६ जल-जंघ-तंतु-फल-पुप्फ-बीय-आयास-सेडीभेएण अट्ठविहा चारणा। उत्तं च (गा.सं. २१)।७८-१०। चारणाणमेत्थ एगसंजोगादिकमेण विसदपंचपंचासभागा उप्पाएदव्वा। कधमेगं चारित्तं विचित्तसत्तिमुप्पाययं। ण परिणामभेएण णाणाभेदभिण्णचारित्तादो चारणबहुत्तं पडि विरोहाभावादो। कधं पुण चारणा अट्ठविहा त्ति जुज्जदे ण एस दोसो, णियमाभावादो, विसदपंचवंचासचारणाणं अट्ठविहचारणेहिंतो एयंतेण पुधत्ताभावादो च।&lt;br /&gt;
= जल, जंघा, तन्तु, फल, पुष्प, बीज, आकाश और श्रेणी के भेद से चारण ऋद्धि धारक, आठ प्रकार हैं। कहा भी है। (गा. नं. २१ में भी यही आठ भेद कहे हैं।) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१।) यहाँ चारण ऋषियों के एक संयोग, दो संयोग आदि के क्रम से २५५ भंग उत्पन्न करना चाहिए। एक संयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = २८; अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५। (विशेष दे. [[गणित]] II/४) '''प्रश्न'''-एक ही चारित्र इन विचित्र शक्तियों का उत्पादक कैसे हो सकता है? '''उत्तर'''-नहीं, क्योंकि परिणाम के भेद से नाना प्रकार चारित्र होने के कारण चारणों की अधिकता में कोई विरोध नहीं है। '''प्रश्न'''-जब चारणों के भेद २५५ हैं तो फिर उन्हें आठ प्रकार का बतलाना कैसे युक्त है? '''उत्तर'''-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उनके आठ होने का कोई नियम नहीं है। तथा २५५ चारण आठ प्रकार चारणों से पृथक् भी नहीं है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;. &amp;lt;b&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;आकाशगामित्व ऋद्धि का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३-१०३४.....। अट्ठीओ आसीणो काउसग्गेण इदरेण ।१०३३। गच्छेदि जीए एसा रिद्धी गयणगामिणी णाम ।१०३४।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के द्वारा कायोत्सर्ग अथवा अन्य प्रकार से ऊर्ध्व स्थित होकर या बैठकर जाता है वह आकाशगामिनी नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३१ पर्यङ्कावस्था निषण्णा वा कायोत्सर्ग शरीरा वा पादोद्धारनिक्षेपणविधिमन्तरेण आकाशगमनकुशला आकाशगामिनः।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= पर्यङ्कासन से बैठकर अथवा अन्य किसी आसन से बैठकर या कायोत्सर्ग शरीर से [पैरोंको उठाकर रखकर (धवला)] तथा बिना पैरों को उठाये रखे आकाश में गमन करने में जो कुशल होते हैं, वे आकाशगामी हैं।&lt;br /&gt;
([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/५ आगासे जहिच्छाए गच्छंता इच्छिदपदेसं माणुसुत्तरं पव्वयावरुद्धं आगासगामिणो त्ति घेतव्वो। देवविज्जाहरणं णग्गहणं जिणसद्दणुउत्तीदो।&lt;br /&gt;
= आकाश में इच्छानुसार मानुषोत्तर पर्वत से घिरे हुए इच्छित प्रदेशों में गमन करनेवाले आकाशगामी हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। यहाँ देव व विद्याधरों का ग्रहण नहीं है, क्योंकि `जिन' शब्द की अनुवृत्ति है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण ऋद्धि का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/२ चउहि अंगुलेहिंतो अहियपमाणेण भूमीदो उवरि आयासे गच्छंतो आगासचारणं णाम।&lt;br /&gt;
= चार अंगुल से अधिक प्रमाण में भूमि से ऊपर आकाश में गमन करने वाले ऋषि आकाशचारण कहे जाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण व आकाशगामित्व में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/६ &amp;quot;आगासचारणाणमागासगामीणं च को विसेसो। उच्चदे-चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो त्ति एयट्ठो, तह्मि कुसलो णिउणो चारणो। तवविसेसेण जणिदआगासट्ठियजीव(-वध) परिहरणकुसलत्तणेण सहिदो आगासचारणो। आगासगमणमेत्तजुत्तो आगासगामी। आगासगामित्तादो जीववधपरिहरणकुसलत्तणेण विसेसिदआगासगामित्तस्स विसेसुवलंभादो अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-आकाशचारण और आकाशगामीके क्या भेद हैं? '''उत्तर'''-चरण, चारित्र, संयम व पापक्रिया निरोध, इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण है वह चारण कहलाता है। तप विशेष से उत्पन्न हुई, आकाशस्थित जीवों के (वध के) परिहार की कुशलता से जो सहित है वह आकाशचारण है। और आकाश में गमन करने मात्र से आकाशगामी कहलाता है। (अर्थात् आकाशगामी को जीव वध परिहार की अपेक्षा नहीं होती)। सामान्य आकाशगामित्व की अपेक्षा जीवों के वध परिहार की कुशलता से विशेषित आकाशगामित्व के विशेषता पायी जाने से दोनों में भेद हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जलचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारण का लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-३; ८१-७ तत्थ भूमीए इव जलकाइयजीवाणं पीडमकाऊण जलमफुसंता जहिच्छाए जलगमणसत्था रिसओ जलचारणा णाम। पउणिपत्तं व जलपासेण विणा जलमज्झगामिणो जलचारणा त्ति किण्ण उच्चंति। ण एस दोसो, इच्छिज्जमाणत्तादो ।७९-३। ओसकखासधूमरोहिमादिचारणाणं जलचारणेसु अंतब्भावो, आउक्काइयजीवपरिहरणकुशलत्तं पडि साहम्मदंसणादो ।८१-७।&lt;br /&gt;
= जो ऋषि जलकायिक जीवों को बाधा न पहुँचाकर जल को न छूते हुए इच्छानुसार भूमि के समान जल में गमन करने में समर्थ हैं, वे जलचारण कहलाते हैं। (जलपर भी पादनिक्षेपपूर्वक गमन करते हैं)। '''प्रश्न'''-पद्मिनीपत्र के समान जल को न छूकर जल के मध्य में गमन करने वाले जलचारण क्यों नहीं कहलाते? '''उत्तर'''-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा अभीष्ट है। ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३६) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२८) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/२)। ओस, ओला, कुहरा और बर्फ आदि पर गमन करनेवाले चारणों का जलचारणों में अन्तर्भाव होता है। क्योंकि इनमें जलकायिक जीवों के परिहार की कुशलता देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धि में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७१/५ जलचारण-पागम्मरिद्धीणं दोण्हं को विसेसो। घणपुढवि-मेरुसायराणमंतो सव्वसरीरेण पवेससत्ती पागम्मं णाम। तत्थ जीवपरिहरणकउसल्लं चारणत्तं।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-जलचारण और प्राकाम्य इन दोनों ऋद्धियों में क्या विशेषता है? '''उत्तर'''-सघन पृथिवी, मेरु और समुद्र के भीतर सब शरीर से प्रवेश करने की शक्ति को प्राकाम्यऋद्धि कहते हैं, और यहाँ जीवों के परिहार की कुशलता का नाम चारण ऋद्धि है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जंघाचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  १०३७ चउरंगुलमेत्तमहिं छंडिय गयणम्मि कुडिलजाणु व्रिणा। जं बहुजोयणगमणं सा जंघाचारणा रिद्धी ।१०३७।&lt;br /&gt;
= चार अंगुल प्रमाण पृथिवी को छोड़कर आकाश में घुटनों को मोड़े बिना (या जल्दी जल्दी जंघाओं को उत्क्षेप निक्षेप करते हुए-[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) जो बहुत योजनों तक गमन करना है, वह जंघाचारण ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९/७; ८१/४ भूमीए पुढविकाइयजीवाणं बाहमकाऊण अणेगजोयणसयगामिणो जंघाचारणा णाम ।७९-७।....चिक्खल्लछारगोवर-भूसादिचारणाणं जंघाचारणेसु अंतब्भावो, भूमीदो चिक्खलादीणं कधंचि भेदाभावादो ।८१-४।&lt;br /&gt;
= भूमिमें पृथिवीकायिक जीवों को बाधा न करके अनेक सौ योजन गमन करने वाले जंघाचारण कहलाते हैं।....कीचड़ भस्म, गोबर और भूसे आदि पर से गमन करनेवालों का जंघाचारणों में अन्तर्भाव होता है, क्योंकि भूमि से कीचड़ आदि में कथंचित् अभेद है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अग्नि, धूम, मेघ, तन्तु, वायु व श्रेणी चारण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४१-१०४३, १०४५, १०४७ अविराहिदूण जोवे अग्निसिहालंठिए विचित्ताणं। जं ताण उवरि गमणं अग्निसिहाचारणा रिद्धी ।१०४१। अधउड्ढतिरियपसरं धूमं अवलंबिऊण जं देंति। पदखेवे अक्खलिया सा रिद्धी धूमचारणा णाम ।१०४२। अविरा `हदूणजीवे अपुकाए बहुविहाण मेघाणं। जं उवरि गच्छिइ मुणी सा रिद्धी मेघचारणाणाम ।१०४३। मक्कडयतंतुपंतीउवरिं अदिलघुओ तुरदपदखेवे। गच्छेदि मुणिमहेसी सा मक्कडतंतुचारणा रिद्धी ।१०४५। णाणाविहगदिमारुदपदेसपंतीसु देंति पदखेवे। जं अक्खलिया मुणिणो सा मारुदचारणा रिद्धी ।१०४७।&lt;br /&gt;
= अग्निशिखा में स्थित जीवों की विराधना न करके उन विचित्र अग्नि-शिखाओं पर से गमन करने को `अग्निशिखा चारण' ऋद्धि कहते हैं ।१०४१। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनिजन नीचे ऊपर और तिरछे फैलने वाले धुएँ का अवलम्बन करके अस्खलित पादक्षेप देते हुए गमन करते हैं वह `धूमचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४२। जिस ऋद्धि से मुनि अप्कायिक जीवों को पीड़ा न पहुँचाकर बहुत प्रकार के मेघों पर से गमन करता है वह `मेघचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४३। जिसके द्वारा मुनि महर्षि शीघ्रता से किये गये पद-विक्षेप में अत्यन्त लघु होते हुए मकड़ी के तन्तुओं की पंक्ति पर से गमन करता है, वह `मकड़ीतन्तुचारण' ऋद्धि है ।१०४५। जिसके प्रभाव से मुनि नाना प्रकार की गति से युक्त वायु के प्रदेशों की पंक्ति पर से अस्खलित होकर पदविक्षेप करते हैं; वह `मारुतचारण' ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०-१; ८१-८ धूमग्गि-गिरि-तरु-तंतुसंताणेसु उड्ढारोहणसत्तिसंजुत्ता सेडीचारणा णाम ।८०-१।.....धूमग्गिवाद-मेहादिचारणाणं तंतु-सेडिचारणेसु अंतब्भाओ, अणुलोमविलोमगमणेसु जीवपीडा अकरणसत्तिसंजुत्तादो।&lt;br /&gt;
= धूम, अग्नि, पर्वत, और वृक्ष के तन्तु समूह पर से ऊपर चढ़ने की शक्ति से संयुक्त `श्रेणी चारण' है। .....धूम, अग्नि, वायु और मेघ आदिक के आश्रय से चलने वाले चारणों का `तन्तु-श्रेणी' चारणों में अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि वे अनुलोम और प्रतिलोम गमन करने में जीवों को पीड़ा न करने की शक्ति से संयुक्त हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; धारा व ज्योतिष चारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४४,१०४६ अविराहिय तल्लीणे जीवे घणमुक्कवारिधाराणं। उवरिं जं जादि मुणी सा धाराचारणा ऋद्धि ।१०४४। अघउड्ढतिरियपसरे किरणे अविलंबिदूण जोदीणं। जं गच्छेदि तवस्सी सा रिद्धी जोदि-चारणा णाम ।१०४६।&lt;br /&gt;
= जिसके प्रभाव से मुनि मेघों से छोड़ी गयी जलधाराओं में स्थित जीवों को पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपर से जाते हैं, वह धारा चारण ऋद्धि है ।१०४४। जिससे तपस्वी नीचे ऊपर और तिरछे फैलनेवाली ज्योतिषी देवों के विमानों की किरणों का अवलम्बन करके गमन करता है वह ज्योतिश्चारण ऋद्धि है ।१०४६। (इन दोनों का भी पूर्व वाले शीर्षक में दिये धवला ग्रन्थ के अनुसार तन्तु श्रेणी ऋद्धि में अन्तर्भाव हो जाता है।)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; फल पुष्प बीज व पत्रचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३८-१०४० अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बणप्फलाण विविहाणं। उवरिम्मि जं पधावदि स च्चिय फलचारणा रिद्धी ।१०३८। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पुप्फाणं। उवरिम्मि जं पसप्पदि सा रिद्धो पुप्फचारणा णाम ।१०३०। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पत्ताण। जा उवरि वच्चदि मुणी सा रिद्धी पत्तचारणा णामा ।१०३९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि का धारक मुनि वनफलों में, फूलों में, तथा पत्तों में रहनेवाले जीवों की विराधना न करके उनके ऊपर से जाता है वह फलचारण, पुष्पचारण तथा पत्रचारण नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-७; ८१-५ तंतुफलपुप्फबीजचारणाणं पि जलचारणाणं व वत्तव्वं ।७९-७।.....कुंथुद्देही-मुक्कण-पिपीलियादिचारणाणं फलचारणेसु अंतब्भावो, तस जीवपरिहरणकुसलत्तं पडि भेदाभावादो। पत्तंकुरत्तण पवालादिचारणाणं पुप्फचारणेसु अंतब्भावो, हरिदकायपरिहरणकुसलत्तेण साहम्मादो ।८१/५।&lt;br /&gt;
= तन्तुचारण, फलचारण, पुष्पचारण और बीजचारणका स्वरूप भी जलचारणोंके समान कहना चाहिए (अर्थात् उनमें रहने वाले जीवोंको पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपर गमन करना) ।७९-७।....कुंथुजीव, मुत्कण, और पिपीलिका आदि परसे संचार करनेवालोंका फलचारणोंमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, इनमें त्रस जीवों के परिहार की कुशलता की अपेक्षा कोई भेद नहीं है ।। पत्र, अंकुर, तृण और प्रवाल आदि पर से संचार करनेवालों का पुष्पचारणों में अन्तर्भाव होता है, क्योंकि हरितकाय जीवों के परिहार की कुशलता की अपेक्षा इनमें समानता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तपऋद्धि निर्देशs&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; उग्रतपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७-५; ८९-६ उग्गतवा दुविहा उग्गुग्गतवा अवट्ठिदुग्गतवा चेदि। तत्थ जो एक्कोववासं काऊण पारिय दो उववासो करेदि, पुणरवि पारिय तिण्णि उववासे करेदि। एवमेगुत्तरवड्डीए जाव जीविदं तं तिगुत्तिगुत्तो होदूण उववासे करेंतो उग्गगतवो णाम। एदस्सुववास पारणाणयणे सुत्तं-&amp;quot;उत्तरगुणिते तु धने पुनरप्यष्टापितेऽत्र गुणमादिम्। उत्तरविशेषितं वर्ग्गितं च योज्यान्येन्मूलम् ।२३। इत्यादि....तत्थ दिक्खट्ठेमेगोववासं काऊण पारिय पुणो-एक्कहंतरेण गच्छंतस्स किंचिणिमित्तेण छट्ठोववासो जादो। पुणो तेण छट्ठोववासेण विहरंतस्स अट्ठमोववासो जादो। एवं दसमदुवालसादिक्कमेण हेट्ठा ण पदंतो जाव जीविदंतं जो विहरदि अवट्ठिदुग्गतवो णाम। एदं पि तवोविहाणं वीरियंतराइयक्खओवसमेण होदि।&lt;br /&gt;
= उग्रतप ऋद्धि के धारक दो प्रकार हैं-उग्रोग्रतप ऋद्धि धारक और अवस्थितउग्रतप ऋद्धि धारक। उनमें जो एक उपवास को करके पारणा कर दो उपवास करता है, पश्चात् फिर पारणा कर तीन उपवास करता है। इस प्रकार एक अधिक वृद्धि के साथ जीवन पर्यन्त तीन गुप्तियों से रक्षित होकर उपवास करनेवाला `उग्रोग्रतप' ऋद्धि का धारक है। इसके उपवास और पारणाओं का प्रमाण लाने के लिए सूत्र-(यहाँ चार गाथाएँ दी हैं जिनका भावार्थ यह है कि १४ दिन में १० उपवास व ४ पारणाएँ आते हैं। इसी क्रम से आगे भी जानना) ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०-१०५१) दीक्षा के लिए एक उपवास करके पारणा करे, पश्चात् एक दिन के अंतर से ऐसा करते हुए किसी निमित्त से षष्टोपवास (बेला) हो गया। फिर (पूर्वाक्तवत् ही) उस षष्ठोपवास से विहार करने वाले के (कदाचित्) अष्टमोपवास (तेला) हो गया। इस प्रकार दशमद्वादशम आदि क्रम से नीचे न गिरकर जो जीवन पर्यन्त विहार करता है, वह अवस्थित उग्रतप ऋद्धि का धारक कहा जाता है। यह भी तप का अनुष्ठान वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से होता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर तपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५५ जलसूलप्पमुहाणं रोगेणच्चंतपीडिअंगा वि। साहंति दुर्द्ध रतवं जोए सा घोरतवरिद्धी ।१०५५।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२६/९२/२ उववासेसुछम्मासोववासो, अवमोदरियासु एक्ककवलो उत्तिपरिसंखासु चच्चरे गोयराभिग्गहो, रसपरिच्चाग्गेसु उण्हजलजुदोयणभोयणं, विवित्तसयणासणेसु वय-वग्घ-तरच्छ-छवल्लादिसावयसेवियासुसज्झविज्झुडईसु णिवासो, कायकिलेसेसुतिव्वहिमवासादिणिवदंतविसएसु अब्भोकासरुक्खमूलादावणजोगग्गहणं। एवमब्भंतरतवेसु वि उक्कट्ठतवपरूवणा कायव्वा। एसो बारह विह वि तवो कायरजणाणं सज्झसजणणो त्ति घोरत्तवो। सो जेसिं ते घोरत्तवा। बारसविहतवउक्कट्ठवट्ठाए वट्टमाणा घोरतवा त्ति भणिद होदि। एसा वि तवजणिदरिद्धी चेव, अण्णहा एवं विहाचरणाणुववत्तीदो।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) जिस ऋद्धि के बल से ज्वर और शूलादिक रोग से शरीर के अत्यन्त पीड़ित होने पर भी साधुजन दुर्द्धर तप को सिद्ध करते हैं, वह घोर तपऋद्धि है ।१०५५। उपवासों में छह मास का उपवासः अवमोदर्य तपों में एक ग्रास; वृत्तिपरिसंख्याओं में चौराहे में भिक्षा की प्रतिज्ञा; रसपरित्यागों में उष्ण जल युक्त ओदन का भोजन; विविक्तशय्यासनों में वृक, व्याघ्र, तरक्ष, छवल्ल आदि श्वापद अर्थात् हिंस्रजीवों से सेवित सह्य, विन्ध्य आदि (पर्वतों की) अटवियों में निवास; कायक्लेशों में तीव्र हिमालय आदि के अन्तर्गत देशों में, खुले आकाश के नीचे, अथवा वृक्षमूल में; आतापन योग अर्थात् ध्यान ग्रहण करना। इसी प्रकार अभ्यन्तर तपों में भी उत्कृष्ट तप की प्ररूपणा करनी चाहिए। ये बारह प्रकार ही तप कायर जनों को भयोत्पादक हैं, इसी कारण घोर तप कहलाते हैं। वह तप जिनके होता है वे घोर तप ऋद्धि के धारक हैं। बारह प्रकार के तपों की उत्कृष्ट अवस्था में वर्तमान साधु घोर तप कहलाते हैं, यह तात्पर्य है। यह भी तप जनित (तप से उत्पन्न होनेवाली) ऋद्धि ही है, क्योंकि बिना तप के इस प्रकार का आचरण बन नहीं सकता।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१२), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२२/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर पराक्रम तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५६-१०५७ णिरुवमवड्ढंततवा तिहुवणसंहरणकरसत्तिजुत्ता। कंटयसिलग्गिपव्वयधूमुक्कापहुदिवरिसणसमत्था ।१०५६। सहस त्ति सयलसायरसलिलुप्पीलस्स सोसणसमत्था। जायंति जीए मुणिणो घोरपरक्कमतव त्ति सा रिद्धी ।१०५७।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि जन अनुपम एवं वृद्धिंगत तप से सहित, तीनों लोकों के संहार करने की शक्ति से युक्त; कंटक, शिला, अग्नि, पर्वत, धुआँ तथा उल्का आदि के बरसाने में समर्थ; और सहसा संपूर्ण समुद्र के सलिल समूह के सुखाने की शक्ति से भी संयुक्त होते हैं वह घोर-पराक्रम-तप ऋद्धि है ।१०५६-१०५७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२७/९३/२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;घोर ब्रह्मचर्य तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५८-१०६० जीए ण होंति मुणिणो खेत्तम्मि वि चोरपहुदिबाधाओ। कालमहाजुद्धादी रिद्धी सघोरब्रह्मचारित्ता ।१५८। उक्कस्स खउवसमे चारित्तावरणमोहकम्मस्स। जा दुस्सिमणं णासइ रिद्धी सा घोरब्रह्मचारित्ता ।१०५९। अथवा-सव्वगुणेहिं अघोरं महेसिणो बह्मसद्दचारित्तं। विप्फुरिदाए जीए रिद्धी साघोरब्रह्मचारित्ता ।१०६०।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि से मुनि के क्षेत्र में भी चौरादिक की बाधाएँ और काल एवं महायुद्धादि नहीं होते हैं, वह `अघोर ब्रह्मचारित्व' ऋद्धि है ।१०५८। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/४) चारित्रमोहनीय का उत्कृष्ट क्षयोपशम होने पर जो ऋद्धि दुःस्वप्न को नष्ट करती है तथा जिस ऋद्धि के आविर्भूत होने पर महर्षिजन सब गुणों के साथ अघोर अर्थात् अविनश्वर ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं वह अघोर ब्रह्मचारित्व ऋद्धि है ।१०५९-१०६०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]]  तथा [[चारित्रसार]]  में इस लक्षण का निर्देश ही घोर गुण ब्रह्मचारी के लिए किया गया है) &lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९३-६; ९४-२ घोरा रउद्दा गुणा जेसिं ते घोरगुणा। कधं चउरासादिलक्खगुणाणं घोरत्तं। घोरकज्जकारिसत्तिजणणादो। ९४६।.....ब्रह्म चारित्रं पंचव्रत-समिति-त्रिगुप्त्यात्मकम्, शान्तिपुष्टिहेतुत्वात्। अघोरा शान्ता गुणा यस्मिन् तदघोरगुणं, अघोरगुणं, ब्रह्मचरन्तीति अघोरगुणब्रह्मचारिणः।.....एत्थ अकारो किण्ण सुणिज्जदे। संधिणिद्देसादो ।१९२। &lt;br /&gt;
= घोर अर्थात् रौद्र हैं गुण जिनके वे घोर गुण कहे जाते हैं। प्रश्न-चौरासी लाख गुणों के घोरत्व कैसे सम्भव है। उत्तर-घोर कार्यकारी शक्ति को उत्पन्न करने के कारण उनके घोरत्व सम्भव है। ब्रह्म का अर्थ पाँच व्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिस्वरूप चारित्र है, क्योंकि वह शान्ति के पोषण का हेतु है। अघोर अर्थात् शान्त हैं गुण जिसमें वह अघोर गुण है। अघोर गुण ब्रह्म (चारित्र) का आचरण करने वाले अघोर गुण ब्रह्मचारी कहलाते हैं। (भावार्थ-अघोर शान्तको कहते हैं। जिनका ब्रह्म अर्थात् चारित्र शान्त है उनको अघोर गुण ब्रह्मचारी कहते हैं। ऐसे मुनि शान्ति और पुष्टि के कारण होते हैं, इसीलिए उनके तपश्चरण के माहात्म्य से उपरोक्त ईति, भीति, युद्ध व दुर्भिक्षादि शान्त हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&lt;br /&gt;
= '''प्रश्न'''-`णमो घोरगुणबम्हचारीणं' इस सूत्र में अघोर शब्द का अकार क्यों नहीं सुना जाता? '''उत्तर'''-सन्धियुक्त निर्देश होनेसे।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण और घोर पराक्रम तप में अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/९३/८ ण गुण-परक्कमाण मेयत्तं, गुणजणि दसत्तीए परक्कमववएसादो।&lt;br /&gt;
= गुण और पराक्रम के एकत्व नहीं हैं, क्योंकि गुण से उत्पन्न हुई शक्ति की पराक्रम संज्ञा है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तप्त दीप्त व महातप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५२-१०५४ बहुविहउववासेहिं रविसमवड्ढंतकायकिरणोघो। कायमणवयणबलिणो जीए सा दित्ततवरिद्धी ।१०५२। तत्ते लोहकढाहे पडिंअंबुकणं ब जीए भुत्तण्णं। झिज्जहिं धाऊहिं सा णियझाणाएहिं तत्ततवा ।१०५३। मंदरपंत्तिप्पमुहे महोववासे करेदि सव्वे वि। चउसण्णाण बलेणं जीए सा महातवा रिद्धी ।१०५४।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२३/९०/५ तेसिं ण केवलं दित्ति चेव वंड्ढदि किंतु बलो वि वड्ढदि।.....तेण ण तेसिं भुत्ति वि तेण कारणाभावादो। ण च भुक्खादुक्खवसमणट्ठं भुजंति, तदभावादो। तदभावो कुदीवगम्मदे।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धि के प्रभाव से, मन, वचन और काय से बलिष्ठ ऋषि के बहुत प्रकार के उपवासों द्वारा सूर्य के समान दीप्ति अर्थात् शरीर की किरणों का समूह बढ़ता हो वह `दीप्त तप ऋद्धि' है ।१०५२। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/२)। (धवला में उपरोक्त के अतिरिक्त यह और भी कहा है कि उनके केवल दीप्ति ही नहीं बढ़ती है, किन्तु बल भी बढ़ता है। इसीलिए उनके आहार भी नहीं होता, क्योंकि उसके कारणों का अभाव है। यदि कहा जाय कि भूख के दुःख को शान्त करने के लिए वे भोजन करते हैं सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उनके भूख के दुःख का अभाव है।) तपी हुई लोहे की कड़ाही में गिरे हुए जलकण के समान जिस ऋद्धि से  खाया हुआ अन्न धातुओं सहित क्षीण हो जाता है, अर्थात् मल-मूत्रादि रूप परिणमन नहीं करता है, वह निज ध्यानसे उत्पन्न हुई तप्त `तप ऋद्धि' है ।१०५३। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२४/९१/१), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/३)। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि चार सम्यग्ज्ञानों (मति, श्रुत, अवधि व मनःपर्यय) के बल से मन्दिर पंक्ति प्रमुख सब ही महान् उपवासों को करता है वह `महा तप ऋद्धि' है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३/६३/२०३/११)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२५/९१/५ अणिमादिअट्ठगुणोवेदो जलचारणादिअट्ठविहचारणगुणालंकरियो फुरंतसरीरप्पहो दुविहअवखीणरिद्धिजुत्तो सव्वोसही सरूवो पाणिपत्तणिवदिदसव्वहारो अमियसादसरूवेण पल्लट्ठावणसमत्थो सयलिंदेहिंतो वि अणंतबलो आसी-दिट्ठिविसलद्धिसमण्णिओ तत्ततवो सयलविज्जाहरो मदि सुद ओहि मणपज्जवणाणेहि मुणिदतिहुवणवावारो मुणी महातवो णाम। कस्मात्। महत्त्वहेतुस्तपोविशेषो महानुच्यते उपचारेण, स येषां ते तपसः इति सिद्धत्वात्। अथवा महसां हेतुः तप उपचारेण महा इति भवति।&lt;br /&gt;
= जो अणिमादि आठ गुणों से सहित हैं, जलचारणादि आठ प्रकार के चारण गुणों से अलंकृत हैं, प्रकाशमान शरीर प्रभा से संयुक्त हैं, दो प्रकार की अक्षीण ऋद्धि से युक्त हैं, सर्वोषध स्वरूप हैं, पाणिपात्र में गिरे हुए आहार को अमृत स्वरूप से पलटाने में समर्थ हैं, समस्त इन्द्रों से भी अनन्तगुणे बल के धारक हैं, आशीर्विष और दृष्टिविष लब्धियों से समन्वित हैं, तप्ततप ऋद्धि से संयुक्त हैं, समस्त विद्याओं के धारक हैं; तथा मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय ज्ञानों से तीनों लोकों के व्यापार की जानने वाले हैं, वे मुनि `महातप ऋद्धि' के धारक हैं। कारण कि महत्त्वके हेतुभूत तपविशेष को उपचार से महान् कहा जाता है। वह जिनके होता है वे महातप ऋषि हैं, ऐसा सिद्ध है। अथवा महस् अर्थात् तेजों का हेतुभूत जो तप है वह उपचार से महा होता है। (तात्पर्य यह कि सातों ऋद्धियों की उत्कृष्टता को प्राप्त होने वाले ऋषि महातप युक्त समझे जाते हैं।)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; बल ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ४/१०६१-१०६६ बलरिद्धी तिविहप्पा मणवयणसरीरयाणभेएण। सुदणाणावरणाए पगडीए वीरयंतरायाए ।१०६१। उक्कसक्खउवसमे सुहुत्तमेत्तंतरम्मि सयलसुदं। चिंतइ जाणइ जीए सा रिद्धी मणबला णामा ।१०६२। जिब्भिंदियणोइंदिय-सुदणाणावरणविरियविग्घाणं। उक्कस्सखओवसमे मुहुत्तमेत्तंतरम्मि मुणी ।१०६३। सयलं पि सुदं जाणइ उच्चारइ जीए विप्फुरंतीए। असयो अहिकंठो सा रिद्धीउ णेया वयणबलणामा ।१०६४। उक्कस्सखउसमे पविसेसे विरियविग्धपगढीए। मासचउमासपमुहे काउसग्गे वि समहीणा ।१०६५। उच्चट्ठिय तेल्लोक्कं झत्ति कणिट्ठंगुलीए अण्णत्थं। घविदं जीए समत्था सा रिद्धी कायबलणामा ।१०६६।&lt;br /&gt;
= मन वचन और काय के भेद से बल ऋद्धि तीन प्रकार है। इनमें से जिस ऋद्धि के द्वारा श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन दो प्रकृतियों का उत्कृष्ट क्षयोपशम होने पर मुहूर्तमात्र काल के भीतर अर्थात् अन्तर्मुहूर्त्त काल में सम्पूर्ण श्रुत का चिन्तवन करता है वह जानता है, वह `मनोबल' नामक ऋद्धि है ।१०६१-१०६२। जिह्वेन्द्रियावरण, नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर जिस ऋद्धिके प्रगट होनेसे मुनि श्रमरहित और अहीनकंठ होता हुआ मुहूर्त्तमात्र कालके भीतर सम्पूर्ण श्रुत को जानता व उसका उच्चारण करता है, उसे `वचनबल' नामक ऋद्धि जानना चाहिए ।१०६३-१०६४। जिस ऋद्धि के  बल से वीर्यान्तराय प्रकृति के उत्कृष्ट क्षयोपशम की विशेषता होने पर मुनि, मास व चतुर्मासादि रूप कायोत्सर्ग को करते हुए भी श्रम से रहित होते हैं, तथा शीघ्रता से तीनों लोकों को कनिष्ठ अँगुलीके ऊपर उठाकर अन्यत्र स्थापित करनेके लिए समर्थ होते हैं, वह `कायबल' नामक ऋद्धि है ।१०६५-१०६६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३५-३७/९८-९९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२२४/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; औषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;औषध ऋद्धि सामान्य&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४ औषधर्द्धिरष्टविधा-असाध्यानामप्यामयानां सर्वेषां विनिवृत्तिहेतुरामर्शक्ष्वेलजल्लमलविट्सर्वौषधिप्राप्तास्याविषदृष्टिविषविकल्पात्।&lt;br /&gt;
= असाध्य भी सर्व रोगोंकी निवृत्तिकी हेतुभूत औषध-ऋद्धि आठ प्रकारकी है - आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल, विट्, सर्व, आस्याविष और दृष्टिविष। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्ष क्ष्वेल जल मल व विट् औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६८-१०७२ रिसिकरचरणादीणं अल्लियमेत्तम्मि। जीए पासम्मि। जीवा होंति णिरोगा सा अम्मरिसोसही रिद्धी ।१०६८। जीए तालासेमच्छीमलसिंहाणआदिआ सिग्घं। जीवाणं रोगहरणा स च्चिय खेलोसही रिद्धो ।१०६९। सेयजलो अंगरयं जल्लं भण्णेत्ति जीए तेणावि। जीवाणं रोगहरणं रिद्धी जस्लोसही णामा ।१०७०। जीहीट्ठदं तणासासोंत्तादिमलं पि जीए सत्तीए। जोवाणं रोगहरणं मलोसही णाम सा रिद्धी ।१०७१।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके प्रभावसे जीव पासमें आनेपर ऋषिके हस्त व पादादिके स्पर्शमात्र से ही निरोग हो जाते हैं, वह `आमर्षौषध' ऋद्धि है ।१०६८। जिस ऋद्धिके प्रभावसे लार, कफ, अक्षिमल और नासिकामल शीघ्र ही जीवोंके रोगोंको नष्ट करता है वह `क्ष्वेलौषध ऋद्धि है ।१०६९। पसीनेके आश्रित अंगरज जल्ल कहा जाता है। जिस ऋद्धिके प्रभावसे उस अंगरजसे भी जीवों के रोग नष्ट होते हैं, वह `जल्लौषधि' ऋद्धि कहलाती है ।१०७०। जिस शक्तिसे जिह्वा, ओठ, दाँत, नासिका और श्रोत्रादिकका मल भी जीवोंके रोगोंको दूर करनेवाला होता है, वह `मलौषधि' नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२५); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०-३३/९५-९७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्षौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्यमें अन्तर&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०/९६/१ तवोमाहप्पेण जेसिं फासो सयलोसहरूवत्तं पत्तो तेसिमाम्मरिसो सहिपत्ता त्ति सण्णा।&lt;br /&gt;
= ण च एदेसिमघोरगुणबंभयारीणं अंतब्भावो, एदेसिं वाहिविणासणे चेव सत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= तप के प्रभावसे जिनका स्पर्श समस्त औषधियोंके स्वरूपको प्राप्त हो गया है, उनको आमर्षौषधि प्राप्त ऐसी संज्ञा है। इनका अघोरगुणब्रह्मचारियों में अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि, इनके अर्थात् अघोरगुण ब्रह्मचारियोंके केवल, व्याधिके नष्ट करनेमें ही शक्ति देखी जाती है। (पर उनका स्पर्श औषध रूप नहीं होता)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; सर्वौषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७३ जीए पस्सजलाणिलरीमणहादीणि वाहिहरणाणि। दुक्करवजुत्ताणं रिद्धी सव्वोही णामा ।१०७३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे दुष्कर तपसे युक्त मुनियोंका स्पर्श किया हुआ जल व वायु तथा उन के रोम और नखादिक व्याधिके हरनेवाले हो जाते हैं, वह सर्वौषधि नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/५)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३४/९७/६ रस-रुहिर-मांस-मेदट्ठि-मज्ज-सुक्क-पुप्फस-खरीसकालेज्ज-मुत्त-पित्तंतुच्चारादओ सव्वे ओसाहत्तं पत्ता जेसि ते सव्वोसहिषत्ता।&lt;br /&gt;
= रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र, पुप्फस, खरीष, कालेय, मूत्र, पित्त, अँतड़ी, उच्चार अर्थात् मल आदिक सब जिनके औषधिपनेको प्राप्त हो गये हैं वे सर्वौषधिप्राप्त जिन हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७४-१०७६ तित्तादिविविहम्मण्णं विसुजुत्तं जीए वयणमेत्तेण। पावेदि णिव्विसत्तं सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७४। अहवा बहुवाहाहिं परिभूदा झत्ति होंति णीरोगा। सोदुं वयणं जीए सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७५। रोगाविसेहिं पहदा दिट्ठीए जीए झत्ति पावंति। णीरोगणिव्विसत्तं सा भणिदा दिट्ठिणिव्विसा रिद्धी ।१०७६।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३,३६,३/२०३/३० उग्रविषसंपृक्तोऽप्याहारो येषामास्यगतो निर्विषीभवति यदीयास्यनिर्गतं वचःश्रवणाद्वा महाविषपरीता अपि निर्विषीभवन्ति ते आस्याविषाः।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) - जिस ऋद्धिसे तिक्तादिक रस व विषसे युक्त विविध प्रकारका अन्न वचनमात्रसे ही निर्विषताको प्राप्त हो जाता है, वह `वचननिर्विष' नामक ऋद्धि है ।१०७४। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) - उग्र विषसे मिला हुआ भी आहार जिनके मुखमें जाकर निर्विष हो जाता है, अथवा जिनके मुखसे निकले हुए वचनके सुनने मात्रसे महाविष व्याप्त भी कोई व्यक्ति निर्विष हो जाता है वे `आस्याविष' हैं। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/१)। ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) अथवा जिस ऋद्धिके प्रभावसे बहुत व्याधियोंसे युक्त जीव, ऋषिके वचनको सुनकर ही झटसे नीरोग हो जाया करते हैं, वह वचन निर्विष नामक ऋद्धि है ।१०७५। रोग और विषसे युक्त जीव जिस ऋद्धिके प्रभावसे झट देखने मात्रसे ही निरोगता और निर्विषताको प्राप्त कर लेते हैं; वह `दृष्टिनिर्विष' ऋद्धि है ।१०७६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/२)&amp;lt;/ol&amp;gt;&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आशीर्विष रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७८ मर इदि भणिदे जीओ मरेइ सहस त्ति जीए सत्तीए। दुक्खरतवजुदमुणिणा आसीविस णाम रिद्धी सा।&lt;br /&gt;
= जिस शक्तिसे दुष्कर तपसे युक्त मुनिके द्वारा `मर जाओ' इस प्रकार कहने पर जीव सहसा मर जाता है, वह आशीविष नामक ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८५/५ अविद्यमानस्यार्थस्य आशंसनमाशीः, आशीर्विष एषां ते आशीर्विषाः। जेसि जं पडि मरिहि त्ति वयणं णिप्पडिदं तं मारेदि, भिक्खं भमेत्तिवयणं भिक्खं भमावेदि, सीसं छिज्जउ त्ति वयणं सीस छिंददि, आसीविसा णाम समणा। कधं वयणस्स विससण्णा। विसमिव विसमिदि उवयारादो। आसी अविसममियं जेसिं ते आसीविसा। जेसिं वयणं थावर-जंगम-विसपूरिदजीवे पडुच्च `णिव्विसा होंतु' त्ति णिस्सरिदं ते जीवावेदि। वाहिवेयण-दालिद्दादिविलयं पडुच्च णिप्पडितं सं तं तं तं कज्जं करेदि ते वि आसीविसात्ति उत्तं होदि।&lt;br /&gt;
= अविद्यमान अर्थकी इच्छाका नाम आशिष है। आशिष है विष (वचन) जिनका वे आशीर्विष कहे जाते हैं। `मर जाओ' इस प्रकार जिनके प्रति निकला हुआ जिनका वचन उसे मारता है, `भिक्षाके लिए भ्रमण करो' ऐसा वचन भिक्षार्थ भ्रमण कराता है, `शिरका छेद हो' ऐसा वचन शिरको छेदता है, (अशुभ) आशीर्विष नामक साधु हैं। प्रश्न-वचनके विष संज्ञा कैसे सम्भव है? उत्तर-विषके समान विष है। इस प्रकार उपचारसे वचनको विष संज्ञा प्राप्त है। आशिष है अविष अर्थात् अमृत जिनका वे (शुभ) आशीर्विष हैं। स्थावर अथवा जंगम विषसे पूर्ण जीवोंके प्रति `निर्विष हो' इस प्रकार निकला हुआ जिनका वचन उन्हें जिलाता है, व्याधिवेदना और दारिद्र्य आदिके विनाश हेतु निकला हुआ जिनका वचन उस उस कार्यको करता है, वे भी आशीर्विष हैं, यह सूत्रका अभिप्राय है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. दृष्टिविष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;दृष्टिविष रस ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७९ जीए जीवो दिट्ठो महासिणा रोसभरिदहिदएण। अहदट्ठं व मरिज्जदि दिट्ठिविसा णाम सा रिद्धी ।१०७९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे रोषयुक्त हृदय वाले महर्षिसे देखा गया जीव सर्प द्वारा काटे गयेके समान मर जाता है, वह दृष्टिविष नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२७/१)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/७ दृष्टिरिति चक्षुर्मनसोर्ग्रहणं, तत्रोभयत्र दृष्टिशब्दप्रवृत्तिदर्शनात्। तत्साहचर्यात्कर्मणोऽपि। रुट्ठो जदि जोएदि चिंतेदि किरियं करेदि वा `मारेमि' त्ति तो मारेदि, अण्णं पि असुहकम्मं संरंभपुव्वावलोयणेण कुणमाणोदिट्ठविसो णाम।&lt;br /&gt;
= दृष्टि शब्दसे यहाँ चक्षु और मन (दोनों) का ग्रहण है, क्योंकि उन दोनोंमें दृष्टि शब्दकी प्रवृत्ति देखी जाती है। उसकी सहचरतासे क्रियाका भी ग्रहण है। रुष्ट होकर वह यदि `मारता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है व क्रिया करता है तो मारता है; तथा क्रोधपूर्वक अवलोकनसे अन्य भी अशुभ कार्यको करनेवाला (अशुभ) दृष्टिविष कहलाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृतरस ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/९ एवं दिट्ठअमियाणं पि जाणिदूण लक्खणं वत्तव्वं।&lt;br /&gt;
= इसी प्रकार दृष्टि अमृतोंका भी लक्षण जानकर कहना चाहिए। (अर्थात् प्रसन्न होकर वह यदि `नीरोग करता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है, व क्रिया करता है तो नीरोग करता है, तथा प्रसन्नतापूर्वक अवलोकनसे अन्य भी शुभ कार्यको करनेवाला दृष्टिअमृत कहलाता है)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोरब्रह्मचर्य तपमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/६ दिट्ठअमियाणमघोरगुणबंभयारीणं च को विसेसो। उवजोगसहेज्जदिट्ठीए दिट्ठिलद्धिजुत्ता दिट्ठिविसा णाम। अघोर गुणबंभयारीणं पुण लद्धी असंखेज्जा सव्वंगगया, एदेसिमंगलग्गवादे वि सयलोवद्दवविणासणसत्तिदंसणादो तदो। अत्थि भेदो। णवरि असुद्धलद्धोणं पउत्ती लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी। सुहाणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-दृष्टि-अमृत और अघोरगुणब्रह्मचारीके क्या भेद हैं? उत्तर-उपयोगकी सहायता युक्त दृष्टिमें स्थित लब्धिसे संयुक्त दृष्टिविष कहलाते हैं। किन्तु अघोरगुणब्रह्मचारियोंकी लब्धियाँ सर्वांगगत असंख्यात हैं। इनके शरीरसे स्पृष्ट वायुमें भी समस्त उपद्रवोंको नष्ट करनेकी शक्ति देखी जाती है इस कारण दोनोंमें भेद है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विशेष इतना है कि अशुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवों की इच्छाके वशसे होती है। किन्तु शुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारोंसे सम्भव है, क्योंकि, इनकी इच्छाके बिना भी उक्त लब्धियोंकी प्रवृत्ति देखी जाती है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षीर-मधु-सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८०-१०८७ करयलणि क्खिताणिं रुक्खाहारादियाणि तक्कालं। पावंति खीरभावं जीए खीरोसवी रिद्धी ।१०८०। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयण सवण मेत्तेणं। पसमदि णरतिरियाणं स च्चिय खीरोसवी ऋद्धी ।१०८१। मुणिकइणिक्खिताणि लुक्खाहारादियाणिहोंतिखणे। जीए महुररसाइं स च्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८२। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयणसवणमेत्तेण। णासदि णरतिरियाणं तच्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८३। मुणिपाणिसंठियाणिं रुक्खाहारादियाणि जीय खणे। पावंति अमियभावं एसा अमियासवी ऋद्धी ।१०८४। अहवा दुक्खादीणं महेसिवयणस्स सवणकालम्मि। णासंति जीए सिग्घं रिद्धी अमियआसवी णामा ।१०८५। रिसिपाणितलणिक्खित्तं रुक्खाहारादियं पि खणमेत्ते। पावेदि सप्पिरूवं जीए सा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८६। अहवा दुक्खप्पमुहं सवणेण मुणिंदव्ववयणस्स। उवसामदि जीवाणं एसा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८७।&lt;br /&gt;
= जिससे हस्ततलपर रखे हुए रूखे आहारादिक तत्कालही दुग्धपरिणाम को प्राप्त हो जाते हैं, वह `क्षीरस्रावी' ऋद्धि कही जाती है ।१०८०। अथवा जिस ऋद्धिसे मुनियोंके वचनोंके श्रवणमात्रसे ही मनुष्य तिर्यंचोंके दुःखादि शान्त हो जाते हैं उसे क्षीरस्रावी ऋद्धि समझना चाहिए ।१०८१। जिस ऋद्धिसे मुनिके हाथमें रखे गये रूखे आहारादिक क्षणभरमें मधुररससे युक्त हो जाते हैं, वह `मध्वास्रव' ऋद्धि है, ।१०८२। अथवा, जिस ऋषि-मुनिके वचनोंके श्रवणमात्रसे मनुष्यतिर्यंचके दुःखादिक नष्ट हो जाते हैं वह मध्वास्रावी ऋद्धि है ।१०८३। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि के हाथ में स्थित रूखे आहारादिक क्षणमात्र में अमृतपने को प्राप्त करते हैं, वह अमृतास्रवी नामक ऋद्धि है ।१०८४। अथवा जिस ऋद्धि से महर्षि के वचनों के श्रवण काल में शीघ्र ही दुःखादि नष्ट हो जाते हैं, वह अमृतस्रावी नामक ऋद्धि है ।१०८५।  जिस ऋद्धिसे ऋषिके हस्ततलमें निक्षिप्त रूखा आहारादिक भी क्षणमात्रमें घृतरूपको प्राप्त करता है, वह `सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८६। अथवा जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनीन्द्रके दिव्य वचनोंके सुननेसे ही जीवोंके दुःखादि शान्त हो जाते हैं, वह सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/४१/९१-१०१) (च.सा. २२७/२) &lt;br /&gt;
नोट-धवलामें हस्तपुटवाले लक्षण हैं। वचन वाले नहीं। [[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या व.[[चारित्रसार]]  में दोनों प्रकारके है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थोंका क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३८/१००/१ कधं रसंतरेसु ट्ठियदव्वाणं तक्खणादेव खीरासादसरूवेण परिणामो। ण, अमियसमुद्दम्मि णिवदिदविसस्सेव पंचमहव्वय-समिइ-तिगुत्तिकलावघडिदंजलिउदणिवदियाणं तदविरोहादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-अन्य रसोंमें स्थित द्रव्यका तत्काल ही क्षीर स्वरूपसे परिणमन कैसे सम्भव है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, जिस प्रकार अमृत समुद्रमें गिरे हुए विषका अमृत रूप परिणमन होनेमें कोई विरोध नहीं है, उसी प्रकार पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तियोंके समूह से घटित अंजलिपुटमें गिरे हुए सब आहारोंका क्षीर स्वरूप परिणमन करनेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षेत्र ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धिके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८९-१०९१ लाभंतरायकम्मक्खउवसमसंजुदए जीए फुडं। मुणिभुत्तमसेसमण्णं धामत्थं पियं ज कं पि ।१०८९। तद्दिवसे खज्जंतं खंधावारेण चक्कवट्टिस्स। झिज्जइ न लवेण वि सा अक्खीणमहाणसा रिद्धो ।१०९०। जीए चउधणुमाणे समचउरसालयम्मि णरतिरिया। मंतियसंखेज्जा सा अक्खीणमहालया रिद्धी ।१०९१।&lt;br /&gt;
= लाभान्तरायकर्मके क्षयोपशमसे संयुक्त जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनिके आहारसे शेष, भोजनशालामें रखे हुए अन्नमेंसे जिस किसी भी प्रिय वस्तुको यदि उस दिन चक्रवर्तीका सम्पूर्ण कटक भी खावे तो भी वह लेशमात्र क्षीण नहीं होता है, वह `अक्षीणमहानसिक' ऋद्धि है ।१०८९-१०९९। जिस ऋद्धिसे समचतुष्कोण चार धनुषप्रमाण क्षेत्रमें असंख्यात मनुष्य तिर्यंच समा जाते हैं, वह `अक्षीण महालय' ऋद्धि है ।१०९०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,४२/१०१/८/केवल अक्षीण महानसका निर्देश है, अक्षीण महालयका नहीं); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; शुभ ऋद्धिकी प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभकी प्रयत्न पूर्वक ही&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९५/१ असुहलद्धीणं पउत्तो लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी सुहाणं लद्धीणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= अशुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवोंकी इच्छाके वशसे होती है। किन्तु शुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारोंसे (इच्छासे व स्वतः) सम्भव है, क्योंकि, इच्छाके बिना भी उक्त लब्धियोंकी प्रवृत्ति देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; एक व्यक्तिमें युगपत् अनेक ऋद्धियोंकी सम्भावना&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १/१,१,५९/२९८/६ नैष नियमोऽप्यस्त्येकस्मिन्नक्रमेण नर्द्धयो भूयस्यो भवन्तीति। गणभृत्सु सप्तानामपि, ऋद्धीनामक्रमेण सत्त्वोपलम्भात्। आहारर्द्ध्या सह मनःपर्ययस्य विरोधो दृश्यते इति चेद्भवतु नाम दृष्टत्वात्। न चानेन विरोध इति सर्वाभिर्विरोधो वक्तुं पार्यतेऽव्यवस्थापत्तेरिति।&lt;br /&gt;
= एक आत्मामें युगपत् अनेक ऋद्धियाँ उत्पन्न नहीं होती, यह कोई नियम नहीं है, क्योंकि, गणधरोंके एक साथ सातों ही ऋद्धियोंका सद्भाव पाया जाता है। प्रश्न-आहारक ऋद्धिके साथ मनःपर्ययका तो विरोध देखा जाता है। उत्तर-यदि आहारक ऋद्धिके साथ मनःपर्ययज्ञानका विरोध देखनेमें आता है तो रहा आवे। किन्तु मनःपर्ययके साथ विरोध है, इसलिए आहारक ऋद्धिका दूसरोसम्पूर्ण ऋद्धियोंके साथ विरोध है ऐसा नहीं कहा जा सकता है। अन्यथा अव्यवस्थाकी आपत्ति आ जायेगी। (विशेष देखो `गणधर')।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,३,२५/३२/३ पमत्तसंजदस्स अणिमादिलद्धिसंपण्णस्स विउव्विदसमए आहारसरीरुट्ठावणसंभवाभावादो।&lt;br /&gt;
= अणिमादि लब्धियोंसे सम्पन्न प्रमत्त संयत जीवके विक्रिया करते समय आहारक शरीरकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[गोम्मट्टसार जीवकाण्ड]] / मूल गाथा संख्या २४२/५०५ वै गुव्विय आहारयकिरिया ण समं पमत्तविरदम्हि। जोगोवि एक्ककाले एक्केव य होदि नियमेण।।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; गोम्मटसार जीवकाण्ड/ &amp;lt;/span&amp;gt;मं.प्र. २४२/५०५ प्रमत्तविरते वैक्रियकयोगक्रिया आहारकयोगक्रिया च समं युगपन्न संभवतः। यदा आहारकयोगमवलम्ब्य प्रमत्तसंयतस्य गमनादिक्रिया प्रवर्तते तदा विक्रियर्द्धिबलेन वैक्रियकयोगमवलम्ब्य क्रिया तस्य न घटते, आहारकर्धिविक्रियर्द्ध्योर्युगपदवृत्तिविरोधात् अनेन गणधरादिनामितरर्द्धियुगपद्वृत्तिसम्भवो दर्शितः।&lt;br /&gt;
= छट्ठे गुणस्थानमें वैक्रियिक और आहारक शरीरकी क्रिया युगपत् नहीं होती। और योग भी नियमसे एक कालमें एक ही होता है। प्रमत्त विरत षष्ठ गुणस्थानवर्ती मुनिकैं समकालविषैं युगपत् वैक्रियक योगकी क्रिया अर आहारक काययोगकी क्रिया नाहीं। ऐसा नाहीं कि एक ही काल विषैं आहारक शरीरको धारि गमनागमनादि क्रियाकौ करै अर तभी विक्रिया ऋद्धिके बलसे वैक्रियककाययोगको धारि विक्रिया सम्बन्धी कार्यकौ भी करैं। दोऊमें सौ एक ही होइ। यातैं यहू जान्या कि गणधरादिकनिकैं और ऋद्धि युगपत् प्रवर्त्तै तो विरुद्ध नाहीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
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		<title>ऋद्धि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=106304"/>
		<updated>2022-12-18T07:51:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;तपश्चरणके प्रभावसे कदाचित् किन्हीं योगीजनोंको कुछ चामत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। उन्हें ऋद्धि कहते हैं। इसके अनेकों भेद-प्रभेद हैं। उन सबका परिचय इस अधिकारमें दिया गया है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;hr width=800 /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[ ऋद्धि#1 | ऋद्धिके भेद-निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ #1.1 | ऋद्धियोंके वर्गीकरणका चित्र]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ ऋद्धि#1.2 | उपरोक्त भेदों प्रभेदोंके प्रमाण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol &amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;[[ ऋद्धि#2 |  बुद्धि ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;  केवल, अवधि व मनःपर्ययज्ञान ऋद्धियाँ&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/ul&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt; - दे. [[वह वह नाम]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;   &lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.1 | बुद्धि ऋद्धि सामान्यका लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.2 | बीजबुद्धि निर्देश :]]&lt;br /&gt;
         &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धि का लक्षण&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धिके लक्षण सम्बन्धी दृष्टिभेद&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धिकी अचिन्त्य शक्ति व शंका&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.3 | कोष्ठ बुद्धिका लक्षण व शक्ति निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.4 | पादानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेष]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(अनुसारिणी, प्रतिसारिणी व उभयसारिणी)&lt;br /&gt;
         &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.5 | संभिन्न श्रोतृत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;  [[  ऋद्धि#2.6 |दूरास्वादन आदि, पाँच ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
               &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;चतुर्दश पूर्वी व दश पूर्वी - दे. श&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;अष्टांग निमित्तज्ञान - दे. निमित्त २&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.7 | प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व सामान्य व विशेषके लक्षण (औत्पत्तिकी, परिणामिकी, वैनयिकी, कर्मजा)&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकीमें अन्तर&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि व ज्ञानसामान्यमें अन्तर &lt;br /&gt;
         &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt; प्रत्येक बुद्धि ऋद्धि - दे. बुद्ध&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.8 | वादित्व बुद्धि ऋद्धि]]&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#3 | विक्रिया ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.1 | विक्रिया ऋद्धि की विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.2 | अणिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.3 | महिमा, गरिमा व लघिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.4 | प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रियाके लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.5 | ईशित्व व वशित्व विक्रिया निर्देश]]&lt;br /&gt;
                      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व के लक्षण&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्वमें अन्तर&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्वमें विक्रियापना कैसे है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.6 | अप्रतिघात, अंतर्धान व काम रूपित्व]]&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#4 | चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.1 | चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.2 | चारण ऋद्धिकी विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.3 | आकाशचारण व आकाशगामित्व]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; आकाशगामित्व ऋद्धिका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण ऋद्धिका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्वमें अन्तर&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.4 | जलचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारणका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धिमें अन्तर&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.5 | जंघा चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.6 | अग्नि, धूम, मेघ, तंतु, वायु व श्रेणी चारण ऋद्धियों का निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.7 | धारा व ज्योतिष चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.8 | फल, पुष्प, बीज व पत्रचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#5 |  तपऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
           &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.1 | उग्रतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;li&amp;gt; उग्रोग्र तप व अवस्थित उग्रतपके लक्षण&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	   &amp;lt;ul&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt;उग्रतप ऋद्धिमें अधिकसे अधिक उपवास करनेकी सीमा व तत्सम्बन्धी शंका - दे. प्रोषधोपवास २&amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.2 | घोरतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.3 | घोर पराक्रमतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.4 | घोर ब्रह्मचर्यतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर व अघोर गुण ब्रह्मचारीके लक्षण&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण व घोर पराक्रम तपमें अन्तर&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.5 | दीप्ततप व महातप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#6 |  बल ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#6.1 | मनोबल, वचनबल व कालबल ऋद्धिके लक्षण]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#7 |  औषध ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.1 | औषध ऋद्धि सामान्य]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.2 | आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल व विट औषध]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt;उपरोक्त चारोंके लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; आमर्शौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्यमें अन्तर।&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.3 | सर्वौषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.4 | आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#8 |  रस ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.1 | आशीर्विष रस ऋद्धि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(शुभ व अशुभ आशीर्विशके लक्षण)&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.2 | दृष्टि विष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टिविष रस ऋद्धिका लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धिका लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोर ब्रह्मचर्य तप में अन्तर&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; क्षीर, मधु, सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धियोंके लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थोंका क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#9 |  क्षेत्र ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#9.1 | अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धिके लक्षण]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#10 |  ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.1 | शुभ ऋद्धिकी प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभ ऋद्धियोंकी प्रयत्न पूर्वक ही]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.2 |एक व्यक्तिमें युगपत् अनेक ऋद्धियोंकी सम्भावना]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.3 | परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;परिहार विशुद्धि, आहारक व मनःपर्ययका परस्पर विरोध - दे. परिहारविशुद्धि&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;आहारक व वैक्रियकमें विरोध - दे. ऊपरवाला शीर्षक&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;तैजस व आहारक ऋद्धि निर्देश - दे. वह वह नाम&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;गणधरदेवमें युगपत् सर्वऋद्धियाँ - दे. गणधर&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;साधुजन ऋद्धिका भोग नहीं करते - दे. श्रुतकेवली १/२&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; ऋद्धिके भेद निर्देश&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li id=&amp;quot;1.1&amp;quot; &amp;gt; ऋद्धियोंके वर्गीकरणका चित्र&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads &amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads&amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt; उपरोक्त भेद-प्रभेदोंके प्रमाण&lt;br /&gt;
&amp;lt;dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/१८/५८); ([[सर्वार्थसिद्धि]] अध्याय संख्या  ३/३६/२३०/२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१२); ([[नियमसार]] / [[नियमसार तात्त्पर्यवृत्ति | तात्त्पर्यवृत्ति ]] गाथा संख्या ११२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बुद्धि ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६९-९७१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११/२) (पदानुसारी-[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५) दशपूर्वित्व - ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६९/५) अष्टांग महानिमित्तज्ञान - ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१००२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या ९/४,१,१४/१९/७२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१४/३) प्रज्ञाश्रमणत्व- ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;विक्रिया सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;(दे. ऊपर क्रिया व विक्रिया दोनोंके भेद) क्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। विक्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-१०२५); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/५/४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१३)। चारण-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३५,१०४८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/२१/७९); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०,८८)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;तप सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४९-१०५०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। उग्रतप-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७/५)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। घोरब्रह्मचर्य-([[षट्खण्डागम]] पुस्तक संख्या  ९/४,१/२८-२९/९३-९४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बल –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२४/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;औषध –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६७) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;रस सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७७); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/४)। आशार्विष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८६/४) दृष्टिविष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८७/२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;क्षेत्र –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८८); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. बुद्धि ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt; बुद्धि ऋद्धि सामान्यका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२ बुद्धिरवगमो ज्ञान तद्विषया अष्टादशविधा ऋद्धयः।&lt;br /&gt;
= बुद्धि नाम अवगम या ज्ञानका है। उसको विषय करनेवाली १८ ऋद्धियाँ हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; बीजबुद्धि निर्देश&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;li&amp;gt;बीजबुद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७५-९७७ णोइंदियसुदणाणावरणाणं वोरअंतरायाए। तिविहाणं पगदीणं उक्कस्सखउवसमविमुद्धस्स ।९७५। संखेज्जसरूवाणं सद्दाणं तत्थ लिंगसंजुत्तं। एक्कं चिय बीजपदं लद्धूण परोपदेसेण ।९७६। तम्मि पदे आधारे सयलमुदं चिंतिऊण गेण्हेदि। कस्स वि महेसिणो जा बुद्धि सा बीजबुद्धि त्ति ।९७७।&lt;br /&gt;
= नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तराय, इन तीन प्रकारकी प्रकृतियोंके उत्कृष्ट क्षयोपशमसे विशुद्ध हुए किसी भी महर्षिकी जो बुद्धि, संख्यातस्वरूप शब्दोंके बीचमें-से लिंग सहित एक ही बीजभूत पदको परके उपदेशसे प्राप्त करके उस पदके आश्रयसे सम्पूर्ण श्रुतको विचारकर ग्रहण करती है, वह बीजबुद्धि है। ९७५-९७७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२६)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/२)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६-१; ५९-९ बीजमिव बीजं। जहाबीजं मूलंकुर-पत्त-पोर-क्खंद-पसव-तुस-कुसुम-खीरतं दुलाणमाहारं तहा दुवालसगत्थाहारं जं पदं तं बीजतुल्लत्तादो बीजं। बीजपदविसयमदिणाणं पि बीजं, कज्जे कारणोवचारादो। एसा कुदो होदि। विसिट्ठोग्गहावरणीयक्खओवसमादो। (५९-९)&lt;br /&gt;
= बीजके समान बीज कहा जाता है। जिस प्रकार बीज, मूल, अंकुर, पत्र, पोर, स्कन्ध, प्रसव, तुष, कुसुम, क्षीर और तंदुल आदिकोंका आधार है; उसी प्रकार बारह अंगोंके अर्थका आधारभूत जो पद है वह बीज तुल्य होनेसे बीज है। बीजपद विषयक मतिज्ञान भी कार्यमें कारणके उपचारसे बीज है ।५६।.....यह बीज बुद्धि कहाँसे होती है। वह विशिष्ट अवग्रहावरणीयके क्षयोपशमसे होती है।&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धिके लक्षण सम्बन्धी दृष्टिभेद&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५७/६ बीजपदट्ठिदरपदेसादो हेट्ठिमसुदणाणुप्पत्तीए कारणं होदूण पच्छा उवरिमसुदणाणुप्पत्तिणिमित्ता बीजबुद्धि त्ति के वि आइरिया भणंति। तण्ण घडदे, कोट्ठबुद्धियादिचदुण्हं णाणाणमक्कमेणेक्कम्हि जीवे सव्वदा अणुप्पत्तिप्पसंगादो।.....ण च एक्कम्हि जीवे सव्वदा चदुण्हं बुद्धीण अक्कमेण अणुप्पत्ती चेव।....त्ति सुत्तगाहाए वक्खाणम्मि गणहरदेवाणं चदुरमलबुद्धीणं दंसणादो। किंच अत्थि गणहरदेवेसु चत्तारि बुद्धीओ अण्णहा दुवासंगाणमणुप्पत्तिप्पसंगादो।&lt;br /&gt;
= बीजपदसे अधिष्ठित प्रदेशसे अधस्तनश्रुतके ज्ञानकी उत्पत्तिका कारण होकर पीछे उपरिम श्रुतके ज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित होनेवाली बीज बुद्धि है। (अर्थात् पहले बीजपदके अल्पमात्र अर्थको जानकर, पीछे उसके आश्रय पर विषयका विस्तार करनेवाली बुद्धि बीजबुद्धि है, न कि केवल शब्द-विस्तार ग्रहण करनेवाली) ऐसा कितने ही आचार्य कहते हैं। किन्तु वह घटित नहीं होता। क्योंकि, ऐसा माननेपर कोष्ठबुद्धि आदि चार ज्ञानोंकी (कोष्ठबुद्धि तथा अनुसारी, प्रतिसारी व तदुभयसारी ये तीन पदानुसारीके भेद)। युगपत् एक जीवमें सर्वदा उत्पत्ति न हो सकनेका प्रसंग आवेगा। और एक जीवमें सर्वदा चार बुद्धियोंकी एक साथ उत्पत्ति हो ही नहीं, ऐसा है नहीं क्योंकि - (सात ऋद्धियोंका निर्देश करनेवाली) सूत्रगाथाके व्याख्यानमें (कही गयीं) गणधर देवोंके चार निर्मल बुद्धियाँ देखी जाती हैं। तथा गणधर देवोंके चार बुद्धियाँ होती हैं, क्योंकि उनके बिना (उनके द्वारा) बारह अंगोंकी उत्पत्ति न हो सकनेका प्रसंग आवेगा।&lt;br /&gt;
 &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धिकी अचिन्त्य शक्ति व शंका&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६/३ &amp;quot;संखेज्जसद्दअणंतलिंगेहिं सह बीजपदं जाणंती, बीजबुद्धि त्ति भणिदं होदि। णा बीजबुद्धि अणंतत्थ पडिबद्धअणंतलिंगबीजपदमवगच्छदि, खओसमियत्तादो त्ति। ण खओवसमिएण परोक्खेण सुदणाणेण इत्यादि (देखो केवल भाषार्थ)&lt;br /&gt;
= संख्यात शब्दोंके अनन्त अर्थोंमें सम्बद्ध अनन्त लिंगोंके साथ बीजपदको जाननेवाली बीज बुद्धि है, यह तात्पर्य है। प्रश्न-बीज बुद्धि अनन्त अर्थोंसे सम्बद्ध अनन्त लिंगरूप बीजपदको नहीं जानती, क्योंकि वह क्षायोपशमिक है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, जिस प्रकार क्षयोपशमजन्य परोक्ष श्रुतज्ञानके द्वारा केवलज्ञानसे विषय किये गये अनन्त अर्थोंका परोक्ष रूपसे ग्रहण किया जाता है, उसी प्रकार मतिज्ञानके द्वारा भी सामान्य रूपसे अनन्त अर्थोंको ग्रहण किया जाता है, क्योंकि इसमें कोई विरोध नहीं है। प्रश्न-यदि श्रुतज्ञानका विषय अनन्त संख्या है, तो `चौदह पूर्वीका विषय उत्कृष्ट संख्यात है' ऐसा जो परिकर्ममें कहा है, वह कैसे घटित होगा? उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट, उत्कृष्ट-संख्यातको ही जानता है, ऐसा यहाँ नियम नहीं है। प्रश्न-श्रुतज्ञान समस्त पदार्थोंको नहीं जानता है, क्योंकि, (पदार्थोंके अनन्तवें भाग प्रज्ञापनीय हैं और उसके भी अनन्तवें भाग द्वादशांग श्रुत के विषय हैं) इस प्रकारका वचन है? उत्तर-समस्त पदार्थों का अनन्तवाँ भाग द्रव्यश्रुतज्ञानका विषय भले ही हो, किन्तु भाव श्रुतज्ञानका विषय समस्त पदार्थ हैं; क्योंकि, ऐसा माने बिना तीर्थंकरोंके वचनातिशयके अभावका प्रसंग होगा।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; कोष्ठबुद्धिका लक्षण व शक्तिनिर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७८-९७९ &amp;quot;उक्कस्सिधारणाए जुत्तो पुरिसो गुरुवएसेणं। णाणाविहगंथेसु वित्थारे लिंगसद्दबीजाणि ।९७८। गहिऊण णियमदीए मिस्सेण विणा धरेदि मदिकोट्ठे। जो कोई तस्स बुद्धी णिद्दिट्ठा कोट्ठबुद्धी त्ति ।९७९।&lt;br /&gt;
= उत्कृष्ट धारणासे युक्त जो कोई पुरुष गुरुके उपदेशसे नाना प्रकारके ग्रन्थोंमें से विस्तारपूर्वक लिंग सहित शब्दरूप बीजोंको अपनी बुद्धिमें ग्रहण करके उन्हें मिश्रणके बिना बुद्धिरूपी कोठेमें धारण करता है, उसकी बुद्धि कोष्ठबुद्धि कही गयी है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २९२/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,६/५३/७ कोष्ठ्यः शालि-व्रीहि-यव-गोधूमादिनामाधारभूतः कुस्थली पल्यादिः। सा चासेसदव्वपज्जायधारणगुणेण कोट्ठसमाणा बुद्धी कोट्ठो, कोट्ठा च सा बुद्धी च कोट्ठबुद्धी। एदिस्से अल्पधारणकालो जहण्णेण संखेज्जाणि उक्कस्सेण असंखेज्जाणि वसाणि कुदो। `कालमसंखं संखं च धारणा' त्ति सुत्तुवलंभादो। कुदो एदं होदि। धारणावरणीयस्स तिव्वखओवसमेण।&lt;br /&gt;
= शालि, व्रीहि, जौ और गेहूँ आदिके आधारभूत कोथली, पल्ली आदिका नाम कोष्ठ है। समस्त द्रव्य व पर्यायोंको धारण करनेरूप गुणसे कोष्ठके समान होनेसे उस बुद्धिको भी कोष्ठ कहा जाता है। कोष्ठ रूप जो बुद्धि वह कोष्ठबुद्धि है। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,५,४०/२४३/११) इसका अर्थ धारणकाल जघन्यसे संख्यात वर्ष और उत्कर्षसे असंख्यात वर्ष है, क्योंकि, `असंख्यात और संख्यात काल तक धारणा रहती है' ऐसा सूत्र पाया जाता है। प्रश्न-यह कहाँसे होती है? उत्तर-धारणावरणीय कर्मके तीव्र क्षयोपशमसे होता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; पदानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेषके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०-९८३ बुद्धीविपक्खणाणं पदाणुसारी हवेदि तिविहप्पा। अणुसारी पडिसारी जहत्थणामा उभयसारी ।९८०। आदि अवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय उवरिमगंथं जा गिण्हदि सा मदी हु अणुसारी ।९८१। आदिअवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय हेट्ठिमगंथं बुज्झदि जा सा च पडिसारी ।९८२। णियमेण अणियमेण य जुगवं एगस्स बीजसद्दस्स। उवरिमहेट्ठिमगंथं जा बुज्झइ उभयसारी सा ।९८३।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/२ पदमनुसरति अनुकुरुते इति पदानुसारी बुद्धिः। बीजबुद्धीए बीजपदमवगंतूण एत्थ इदं एदेसिमक्खराणं लिंगं होदि ण होदि त्ति इहिदूणसयलसुदक्खर-पदाइमवगच्छंती पदाणुसारी। तेहि पदेहिंतो समुप्पज्जमाणं णाणं सुदणाणं ण अक्खरपदविसयं, तेसिमक्खरपदाणं बीजपदंताभावादो। सा च पदाणुसारी अणु-पदितदुभयसारिभेदेण तिविहो।....कुदो एदं होदि। ईहावायावरणीयाणं तिव्वक्खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/६०) - पदका जो अनुसरण या अनुकरण करती है वह पदानुसारी बुद्धि है। बीज बुद्धिसे बीजपदको जानकर, `यहाँ यह इन अक्षरोंका लिंग होता है और इनका नहीं', इस प्रकार विचारकर समस्त श्रुतके अक्षर पदोंको जाननेवाली पदानुसारी बुद्धि है (उन पदोंसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान श्रुतज्ञान है, वह अक्षरपदविषयक नहीं है; क्योंकि, उन अक्षरपदोंका बीजपदमें अन्तर्भाव है। प्रश्न-यह कैसे होती है? उत्तर-ईहावरणीय कर्मके तीव्र क्षयोपशमसे होती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]]  - विचक्षण पुरुषोंकी पदानुसारिणी बुद्धि अनुसारिणी, प्रतिसारिणी और उभयसारिणीके भेदसे तीन प्रकार है, इस बुद्धिके ये यथार्थ नाम हैं ।९८०। जो बुद्धि आदि मध्य अथवा अन्तमें गुरुके उपदेशसे एक बीजपदको ग्रहण करके उपरिम (अर्थात् उससे आगेके) ग्रन्थको ग्रहण करती है वह `अनुसारिणी' बुद्धि कहलाती है ।९८१। गुरुके उपदेशसे आदि मध्य अथवा अन्तमें एक बीजपदको ग्रहण करके जो बुद्धि अधस्तन (पीछे वाले) ग्रन्थको जानती है, वह `प्रतिसारिणी' बुद्धि है ।९८२। जो बुद्धि नियम अथवा अनियमसे एक बीजशब्दके (ग्रहण करनेपर) उपरिम और अधस्तन (अर्थात् उस पदके आगे व पीछेके सर्व) ग्रन्थको एक साथ जानती है वह `उभयसारिणी' बुद्धि है ।९८३।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;संभिन्नश्रोतृत्वका लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८४-९८६ सोदिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदं गोवंगाणामकम्मम्मि ।९८४। सोदुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणपएसे। संठियणरतिरियाणं बहुविहसद्दे समुट्ठंते ।९८५। अक्खरअणक्खरमए सोदूणं दसदिसासु पत्तेक्कं। जं दिज्जदि पडिवयणं तं चिय संभिण्णसोदित्तं ।९८६।&lt;br /&gt;
= श्रोत्रेन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्मका उदय होनेपर श्रोत्रेन्द्रियके उत्कृष्ट क्षेत्रसे बाहर दशों दिशाओंमें संख्यात योजन प्रमाण क्षेत्रमें स्थित मनुष्य एवं तिर्यंचोंके अक्षरानक्षरात्मक बहुत प्रकारके उठनेवाले शब्दोंको सुनकर जिससे (युगपत्) प्रत्युत्तर दिया जाता है, वह संभिन्नश्रोतृत्व नामक बुद्धि ऋद्धि कहलाती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६१/४); (सा.चा. २१३/१)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६२/६ कुदो एदं होदि। बहुबहुविहक्खिप्पावरणीयाणं खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= यह कहाँसे होता है? बहु, बहुविध और क्षिप्र (मति) ज्ञानावरणीयके क्षयोपशमसे होता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; दूरादास्वादन आदि ऋद्धियोंके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८७-९९७/१-जिब्भिंदिय सुदणाणावरणाणं वीयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८७। जिब्भुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणं। विविहरसाणं सादं जाणइ दूरसादित्तं ।९८८। २-पासिंदिय सुदणाणावरणाणं वारियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८९। पासुक्कस्सखिदोदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणिं। अट्ठविहप्पासाणिं जं जाणइ दूरपासत्तं ।९९०। ३-घाणिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९१। घाणुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। जं बहुविधगंधाणिं तं घायदि दूरघाणत्तं ।९९२। ४-सोदिंदियसुदणाणावरणाणं बीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउ वसमे उदिदं गोबंगणामकम्मम्मि ।९९३। सोदुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। चेट्ठंताणं माणुसतिरियाणं बहुवियप्पाणं ।९९४। अक्खरअणक्खरमए बहुविहसद्दे विसेससंजुत्ते। उप्पण्णे आयण्णइ जं भणिअं दूरसवणत्त ।९९५। ५-रूविंदियसुदणाणावरणाणं वीरिअंतराआए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९६। रूउक्कस्सखिदीदो बाहिरं संखेज्जजोयणठिदाइं। जं बहुविहदव्वाइं देक्खइ तं दूरदरिसिणं णाम ।९९७।&lt;br /&gt;
= वह वह इन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन तीन प्रकृतियोंके उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्मका उदय होनेपर उस उस इन्द्रियके उत्कृष्ट विषयक्षेत्रसे बाहर संख्यात योजनोंमें स्थित उस उस सम्बन्धी विषयको जान लेना उस उस नामकी ऋद्धि है। यथा-जिह्वा इन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरास्वादित्व', स्पर्शन इन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरस्पर्शत्व', घ्राणेन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरघ्राणत्व', श्रोत्रेन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरश्रवणत्व' और चक्षु रन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरदर्शित्व' ऋद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व सामान्य व विशेषके लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१७-१०२१ पयडीए सुदणाणावरणाए वीरयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उप्पज्जइ पण्णसमणद्धी ।१०१७। पण्णासवणर्द्धिजुदो चोद्दस्सपुव्वीसु विसयसुहुमत्तं। सव्वं हि सुदं जाणदि अकअज्झअणो वि णियमेण ।१०१८। भासंति तस्स बुद्धी पण्णासमणद्धी सा च चउभेदा। अउपत्तिअ-परिणामिय-वइणइकी-कम्मजा णेया ।१०१९। भवंतर सुदविणएणं समुल्लसिदभावा। णियणियजादिविसेसे उप्पण्णा पारिणामिकी णामा ।१०२०। वइणइकी विणएणं उप्पज्जदि बारसंगसुदजोग्गं। उवदेसेण विणा तवविसेसलाहेण कम्मजा तुरिमा ।१०२१।&lt;br /&gt;
= श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर `प्रज्ञाश्रमण' ऋद्धि उत्पन्न होती है। प्रज्ञाश्रमण ऋद्धिसे युक्त जो महर्षि अध्ययनके बिना किये ही चौदहपूर्वोंमें विषयकी सूक्ष्मताको लिए हुए सम्पूर्ण श्रुतको जानता है और उसको नियमपूर्वक निरूपण करता है उसकी बुद्धिको प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि कहते हैं। वह औत्पत्तिकी, पारिणामिकी, वैनयिकी और कर्मजा, इन भेदोंसे चार प्रकारकी जाननी चाहिए ।१०१७-१०१९। इनमें-से पूर्व भवमें किये गये श्रुतके विनयसे उत्पन्न होनेवाली औत्पत्तिकी (बुद्धि है) ।१०२०।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/२२/८२ विणएण सुदमधीदं किह वि पमादेण होदि विस्सरिदं। तमुवट्ठादि परभवे केवलणाणं च आहवदि ।२२। - एसो उप्पत्तिपण्णसमणो छम्मासोपवासगिलाणो वि तब्बुद्धिमाहप्पजाणावणट्ठ पुच्छावावदचोद्दसपुव्विस्स विउत्तरबाहओ।&lt;br /&gt;
= विनयसे अधीत श्रुतज्ञान यदि किसी प्रकार प्रमादसे विस्मृत हो जाता है तो उसे वह परभवमें उपस्थित करती है और केवलज्ञानको बुलाती है ।२२। यह औत्पत्तिकी प्रज्ञाश्रमण छह मासके उपवाससे कृश होता हुआ भी उस बुद्धिके माहात्म्यको प्रकट करनेके लिए पूछने रूप क्रियामें प्रवृत्त हुए चौदहपूर्वीको भी उत्तर देता है। निज-निज जाति विशेषोंमें उत्पन्न हुई बुद्धि `पारिणामिकी' है, द्वादशांग श्रुतके योग्य विनयसे उत्पन्न होनेवाली `वैनयिकी' और उपदेशके बिना ही विशेष तपकी प्राप्तिसे आविर्भूत हुई चतुर्थ `कर्मजा' प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि समझना चाहिए ।१०२०-१०२१।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२१६/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/१ उसहसेणादीणं-तित्थयरवयणविणिग्गयबीजपदट्ठावहारयाणं पण्णाए कत्थं तब्भावो। पारिणामियाए, विणय-उप्पत्तिकम्मेहि विणा उप्पत्तीदो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-तीर्थंकरोंके मुखसे निकले हुए बीजपदोंके अर्थका निश्चय करनेवाले वृषभसेनादि गणधरोंकी प्रज्ञाका कहाँ अन्तर्भाव होता है? उत्तर-उसका पारिणामिक प्रज्ञामें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, वह विनय, उत्पत्ति और कर्मके बिना उत्पन्न होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकीमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/२ पारिणामिय-उप्पत्तियाणं को विसेसो। जादि विसेसजणिदकम्मक्खओवसमुप्पण्णा पारिणामिया, जम्मंतरविणयजणिदसंसकारसमुप्पण्णा अउप्पत्तिया, त्ति अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-पारिणामिकी और औत्पत्तिकी प्रज्ञामें क्या भेद है? उत्तर-जाति विशेषमें उत्पन्न कर्म क्षयोपशमसे आविर्भूत हुई प्रज्ञा पारिणामिकी है, और जन्मान्तरमें विनयजनित संस्कारसे उत्पन्न प्रज्ञा औपपत्तिकी है, यह दोनोंमें विशेष है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि और ज्ञान सामान्यमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८४/२ पण्णाए णाणस्स य को विसेसो णाणहेदुजीवसत्ती गुरूवएसणि रवेक्खा पण्णा णाम, तक्कारियं णाणं। तदो अत्थि भेदो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-प्रज्ञा और ज्ञानके बीच क्या भेद है? उत्तर-गुरुके उपदेशसे निरपेक्ष ज्ञानकी हेतुभूत जीवकी शक्तिका नाम प्रज्ञा है, और उसका कार्य ज्ञान है; इस कारण दोनोंमें भेद है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;वादित्वका लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२३ सक्कादीणं वि पक्खं बहुवादेहिं णिरुत्तरं कुणदि। परदव्वाइं गवेसइ जीए वादित्तरिद्धी सा ।१०२३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके द्वारा शक्रादिके पक्षको भी बहुत वादसे निरुत्तर कर दिया जाता है और परके द्रव्योंकी गवेषणा (परीक्षा) करता है (अर्थात् दूसरोंके छिद्र या दोष ढूँढता है) वह वादित्व ऋद्धि कहलाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/५)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; विक्रिया ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;विक्रिया ऋद्धिकी विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-२५, १०३३ अणिमा-महिमा-लघिमा-गरिमा-पत्ती-य तह अ पाकम्मं। ईसत्तवसित्तताइं अप्पडिघादंतधाणाच ।१०२४। रिद्धी हु कामरूवा एवं रूवेहिं विविहभेएहिं। रिद्धी विकिरिया णामा समणाणं तवविसेसेणं ।१०२५। दुविहा किरियारिद्धी णहयलगामित्तचारणत्तेहिं ।१०३३।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५,४ अणिमा महिमा लहिमा पत्ती पागम्यं ईसित्तं वसित्तं कामरूवित्तमिदि विउव्वणमट्ठविहं।....एत्थ एगसंजोगादिणा विसदपंचवंचासविउव्वणभेदा उप्पाएदव्वा, तइक्कारणस्स वडचित्तयत्तादो (पृ. ७६/६)।&lt;br /&gt;
= अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, अप्रतिघात, अन्तर्धान और कामरूप इस प्रकारके अनेक भेदोंसे युक्त विक्रिया नामक ऋद्धि तपोविशेषसे श्रमणोंको हुआ करती है। [[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ....([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); (व.सु.श्रा. ५१३)। नभस्तलगामित्व और चारणत्वके भेदसे `क्रियाऋद्धि' दो प्रकार है। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, और कामरूपित्व - इस प्रकार विक्रिया ऋद्धि आठ प्रकार है। यहाँ एकसंयोग, द्विसंयोग आदिके द्वारा २५५ विक्रियाके भेद उत्पन्न करना चाहिए, क्योंकि, उनके कारण विचित्र हैं। एकसंयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = ८; और अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५&lt;br /&gt;
(विशेष देखो गणित II/४)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अणिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२६ अणुतणुकरणं अणिमा अणुछिद्दे पविसिदूण तत्थेव। विकरदि खंदावारं णिएसमविं चक्कवट्टिस्स ।१०२६।&lt;br /&gt;
= अणुके बराबर शरीरको करना अणिमा ऋद्धि है। इस ऋद्धिके प्रभावसे महर्षि अणुके बराबर छिद्रमें प्रविष्ट होकर वहाँ ही, चक्रवर्तीके कटक और निवेशकी विक्रिया द्वारा रचना करता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३४) ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; महिमा गरिमा व लघिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२७ मेरूवमाण देहा महिमा अणिलाउ लहुत्तरो लहिमा। वज्जाहिंतो गुरुवत्तणं च गरिमं त्ति भणंति ।१०२७।&lt;br /&gt;
= मेरुके बराबर शरीरके करनेको महिमा, वायुसे भी लघु (हलका) शरीर करनेको लघिमा और वज्रसे भी अधिक गुरुतायुक्त (भारी) शरीरके करनेको गरिमा ऋद्धि कहते हैं।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५); (च.सा. २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२८-१०२९ भूमोए चेट्ठंतो अंगुलिअग्गेण सूरिससिपहुदिं। मेरुसिहराणि अण्णं जं पावदि पत्तिरिद्धी सा ।१०२८। सलिले वि य भूमीए उन्मज्जणिमज्जणाणि जं कुणदि। भूमीए वि य सलिले गच्छदि पाकम्मरिद्धी सा ।१०२९।&lt;br /&gt;
= भूमिपर स्थित रहकर अंगुलिके अग्रभागसे सूर्य-चन्द्रादिकको, मेरुशिखरोंको तथा अन्य वस्तुको प्राप्त करना यह प्राप्ति ऋद्धि है ।१०२८। जिस ऋद्धिके प्रभावसे जलके समान पृथिवीपर उन्मज्जन-निमज्जन क्रियाको करता है और पृथिवीके समान जलपर भी गमन करता है वह प्राकाम्य ऋद्धि है ।१०२९।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/७ भूमिट्ठियस्स करेण चदाइच्चदबिंबच्छिवणसत्ती पत्ती णाम। कुलसेलमेरुमहीहर भूमीणं बाहमकाऊण तासु गमणसत्ती तवच्छरणबलेणुप्पणा पागम्मं णाम।&lt;br /&gt;
= (प्राप्तिका लक्षण उपरोक्तवत् ही है) - कुलाचल और मेरुपर्वतके पृथिवीकायिक जीवोंको बाधा न पहुँचाकर उनमें, तपश्चरणके बलसे उत्पन्न हुई गमनशक्तिको प्राकाम्य ऋद्धि कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/४ अनेकजातिक्रियागुणद्रव्याधीनं स्वाङ्गाद् भिन्नमभिन्नं च निर्माणं प्राकाम्यं सैन्यादिरूपमिति केचित्।&lt;br /&gt;
= कोई-कोई आचार्य; अनेक तरहकी क्रिया गुण वा द्रव्यके आधीन होनेवाले सेना आदि पदार्थोंको अपने शरीरसे भिन्न अथवा अभिन्न रूप बनानेकी शक्ति प्राप्त होनेको प्राकाम्य कहते हैं।&lt;br /&gt;
(विशेष दे. वैक्रियक ।१। पृथक् व अपृथक्विक्रिया)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३० णिस्सेसाण पहुत्तं जगाण ईसत्तणामरिद्धी सा। वसमेंति तवबलेणं जं जीओहा वसित्तरिद्धी सा ।१०३०।&lt;br /&gt;
= जिससे सब जगत् पर प्रभुत्व होता है, वह ईशित्वनामक ऋद्धि है और जिससे तपोबल द्वारा जीव समूह वशमें होते हैं, वह वशित्व ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/४) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/५)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/२ सव्वेसिं जीवाणं गामणयरखेडादीणं च भुंजणसत्ती समुप्पण्णा ईसित्तं णाम। माणुस-मायंग-हरि-तुरयादीणं सगिच्छाए विउव्वणसत्ती वसित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= सब जीवों तथा ग्राम, नगर, एवं खेडे आदिकोंके भोगनेकी जो शक्ति उत्पन्न होती है वह ईशित्व ऋद्धि कही जाती है। मनुष्य, हाथी, सिंह एवं घोड़े आदिक रूप अपनी इच्छासे विक्रिया करनेकी (अर्थात् उनका आकार बदल देनेकी) शक्तिका नाम वशित्व है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रियामें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/३ ण च वसित्तस्स ईसित्तिम्म पवेसो, अवसाणं पि हदाकारेण ईसित्तकरणुवलंभादो।&lt;br /&gt;
= वशित्वका ईशित्व ऋद्धिमें अन्तर्भाव नहीं हो सकता; क्योंकि, अवशीकृतोंका भी उनका आकार नष्ट किये बिना ईशित्वकरण पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;. ईशित्व व वशित्वमें विक्रियापना कैसे है?&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/५ ईसित्तवसित्ताणं कधं वेउव्विवत्तं। ण, विविहगुणइड्ढिजुत्तं वेउव्वियमिदि तेसिं वेउव्वियत्ताविरोहादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-ईशित्व और वशित्वके विक्रियापना कैसे सम्भव है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, नाना प्रकार गुण व ऋद्धि युक्त होनेका नाम विक्रिया है, अतएव उन दोनोंके विक्रियापनेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अप्रतिघात अन्तर्धान व कामरूपित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३१-१०३२ सेलसिलातरुपमुहाणब्भंतरं होइदूण गमणं व। जं वच्चदि सा ऋद्धी अप्पडिघादेत्ति गुणणामं ।१०३१। जं हवदि अद्दिसत्तं अंतद्धाणाभिधाणरिद्धी सा। जुगवें बहुरूवाणि जं विरयदि कामरूवरिद्धी सा ।१०३२।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे शैल, शिला और वृक्षादिके मध्यमें होकर आकाशके समान गमन किया जाता है, वह सार्थक नामवाली अप्रतिघात ऋद्धि है ।१०३१। जिस ऋद्धिसे अदृश्यता प्राप्त होती है, वह अन्तर्धाननामक ऋद्धि है; और जिससे युगपत् बहुत-से रूपोंको रचता है, वह कामरूप ऋद्धि है ।१०३२।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/६)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/४ इच्छिदरूवग्गहणसत्ती कामरूवित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= इच्छित रूपके ग्रहण करनेकी शक्तिका नाम कामरूपित्व है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/७ चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो एयट्ठो तह्मि कुसलो णिउणो चारणो।&lt;br /&gt;
= चरण, चारित्र, संजम, पापक्रियानिरोध इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण हैं वे चारण कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धिकी विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३४-१०३५, १०४८ &amp;quot;चारणरिद्धी बहुविहवियप्पसंदोह वित्थरिदा ।१०३४। जलजंधाफलपुप्फं पत्तग्गिसिहाण धूममेधाणं। धारामक्कडतंतूजोदीमरुदाण चारणा कमसो ।१०३५। अण्णो विविहा भंगा चारणरिद्धीए भाजिदा भेदा। तां सरूवंकहणे उवएसो अम्ह उच्छिण्णो ।१०४८।&lt;br /&gt;
= चारण ऋद्धि क्रमसे जलचारण, जंघाचारण, फलचारण, पुष्पचारण, पत्रचारण, अग्निशिखाचारण, धूमचारण, मेघचारण, धाराचारण, मर्कटतन्तुचारण, ज्योतिषचारण और मरुच्चारण इत्यादि अनेक प्रकारके विकल्प समूहोंसे विस्तारको प्राप्त हैं ।१०३४-१०३५। इस चारण ऋद्धिके विविध भंगोंसे युक्त विभक्त किये हुए और भी भेद होते हैं। परन्तु उनके स्वरूपका कथन करनेवाला उपदेश हमारे लिए नष्ट हो चुका है ।१०४८।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/पृ. ७८/१० तथा पृ. ८०/६ जल-जंघ-तंतु-फल-पुप्फ-बीय-आयास-सेडीभेएण अट्ठविहा चारणा। उत्तं च (गा.सं. २१)।७८-१०। चारणाणमेत्थ एगसंजोगादिकमेण विसदपंचपंचासभागा उप्पाएदव्वा। कधमेगं चारित्तं विचित्तसत्तिमुप्पाययं। ण परिणामभेएण णाणाभेदभिण्णचारित्तादो चारणबहुत्तं पडि विरोहाभावादो। कधं पुण चारणा अट्ठविहा त्ति जुज्जदे ण एस दोसो, णियमाभावादो, विसदपंचवंचासचारणाणं अट्ठविहचारणेहिंतो एयंतेण पुधत्ताभावादो च।&lt;br /&gt;
= जल, जंघा, तन्तु, फल, पुष्प, बीज, आकाश और श्रेणीके भेदसे चारण ऋद्धि धारक, आठ प्रकार हैं। कहा भी है। (गा. नं. २१ में भी यही आठ भेद कहे हैं।) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१।) यहाँ चारण ऋषियोंके एक संयोग, दो संयोग आदिके क्रमसे २५५ भंग उत्पन्न करना चाहिए। एक संयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = २८; अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५। (विशेष दे. गणित II/४) प्रश्न-एक ही चारित्र इन विचित्र शक्तियोंका उत्पादक कैसे हो सकता है? उत्तर-नहीं, क्योंकि परिणामके भेदसे नाना प्रकार चारित्र होनेके कारण चारणोंकी अधिकतामें कोई विरोध नहीं है। प्रश्न-जब चारणोंके भेद २५५ हैं तो फिर उन्हें आठ प्रकार का बतलाना कैसे युक्त है? उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, उनके आठ होनेका कोई नियम नहीं है। तथा २५५ चारण आठ प्रकार चारणोंसे पृथक् भी नहीं है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;. &amp;lt;b&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;आकाशगामित्व ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३-१०३४.....। अट्ठीओ आसीणो काउसग्गेण इदरेण ।१०३३। गच्छेदि जीए एसा रिद्धी गयणगामिणी णाम ।१०३४।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके द्वारा कायोत्सर्ग अथवा अन्य प्रकारसे ऊर्ध्व स्थित होकर या बैठकर जाता है वह आकाशगामिनी नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३१ पर्यङ्कावस्था निषण्णा वा कायोत्सर्ग शरीरा वा पादोद्धारनिक्षेपणविधिमन्तरेण आकाशगमनकुशला आकाशगामिनः।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= पर्यङ्कासनसे बैठकर अथवा अन्य किसी आसनसे बैठकर या कायोत्सर्ग शरीरसे [पैरोंको उठाकर रखकर (धवला)] तथा बिना पैरोंको उठाये रखे आकाशमें गमन करनेमें जो कुशल होते हैं, वे आकाशगामी हैं।&lt;br /&gt;
([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/५ आगासे जहिच्छाए गच्छंता इच्छिदपदेसं माणुसुत्तरं पव्वयावरुद्धं आगासगामिणो त्ति घेतव्वो। देवविज्जाहरणं णग्गहणं जिणसद्दणुउत्तीदो।&lt;br /&gt;
= आकाशमें इच्छानुसार मानुषोत्तर पर्वतसे घिरे हुए इच्छित प्रदेशोंमें गमन करनेवाले आकाशगामी हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। यहाँ देव व विद्याधरोंका ग्रहण नहीं है, क्योंकि `जिन' शब्दकी अनुवृत्ति है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/२ चउहि अंगुलेहिंतो अहियपमाणेण भूमीदो उवरि आयासे गच्छंतो आगासचारणं णाम।&lt;br /&gt;
= चार अंगुलसे अधिक प्रमाणमें भूमिसे ऊपर आकाशमें गमन करनेवाले ऋषि आकाशचारण कहे जाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण व आकाशगामित्वमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/६ &amp;quot;आगासचारणाणमागासगामीणं च को विसेसो। उच्चदे-चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो त्ति एयट्ठो, तह्मि कुसलो णिउणो चारणो। तवविसेसेण जणिदआगासट्ठियजीव(-वध) परिहरणकुसलत्तणेण सहिदो आगासचारणो। आगासगमणमेत्तजुत्तो आगासगामी। आगासगामित्तादो जीववधपरिहरणकुसलत्तणेण विसेसिदआगासगामित्तस्स विसेसुवलंभादो अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-आकाशचारण और आकाशगामीके क्या भेद हैं? उत्तर-चरण, चारित्र, संयम व पापक्रिया निरोध, इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण है वह चारण कहलाता है। तप विशेषसे उत्पन्न हुई, आकाशस्थित जीवोंके (वधके) परिहारकी कुशलतासे जो सहित है वह आकाशचारण है। और आकाशमें गमन करने मात्रसे आकाशगामी कहलाता है। (अर्थात् आकाशगामीको जीववध परिहारकी अपेक्षा नहीं होती)। सामान्य आकाशगामित्वकी अपेक्षा जीवोंके वध परिहारकी कुशलतासे विशेषित आकाशगामित्वके विशेषता पायी जानेसे दोनोंमें भेद हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जलचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारणका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-३; ८१-७ तत्थ भूमीए इव जलकाइयजीवाणं पीडमकाऊण जलमफुसंता जहिच्छाए जलगमणसत्था रिसओ जलचारणा णाम। पउणिपत्तं व जलपासेण विणा जलमज्झगामिणो जलचारणा त्ति किण्ण उच्चंति। ण एस दोसो, इच्छिज्जमाणत्तादो ।७९-३। ओसकखासधूमरोहिमादिचारणाणं जलचारणेसु अंतब्भावो, आउक्काइयजीवपरिहरणकुशलत्तं पडि साहम्मदंसणादो ।८१-७।&lt;br /&gt;
= जो ऋषि जलकायिक जीवोंको बाधा न पहुँचाकर जलको न छूते हुए इच्छानुसार भूमिके समान जलमें गमन करनेमें समर्थ हैं, वे जलचारण कहलाते हैं। (जलपर भी पादनिक्षेपपूर्वक गमन करते हैं)। प्रश्न-पद्मिनीपत्रके समान जलको न छूकर जलके मध्यमें गमन करनेवाले जलचारण क्यों नहीं कहलाते? उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा अभीष्ट है। ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३६) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२८) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/२)। ओस, ओला, कुहरा और बर्फ आदि पर गमन करनेवाले चारणोंका जलचारणोंमें अन्तर्भाव होता है। क्योंकि, इनमें जलकायिक जीवोंके परिहारकी कुशलता देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धिमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७१/५ जलचारण-पागम्मरिद्धीणं दोण्हं को विसेसो। घणपुढवि-मेरुसायराणमंतो सव्वसरीरेण पवेससत्ती पागम्मं णाम। तत्थ जीवपरिहरणकउसल्लं चारणत्तं।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-जलचारण और प्राकाम्य इन दोनों ऋद्धियोंमें क्या विशेषता है? उत्तर-सघन पृथिवी, मेरु और समुद्रके भीतर सब शरीरसे प्रवेश करनेकी शक्तिको प्राकाम्यऋद्धि कहते हैं, और यहाँ जीवोंके परिहारकी कुशलताका नाम चारण ऋद्धि है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जंघाचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  १०३७ चउरंगुलमेत्तमहिं छंडिय गयणम्मि कुडिलजाणु व्रिणा। जं बहुजोयणगमणं सा जंघाचारणा रिद्धी ।१०३७।&lt;br /&gt;
= चार अंगुल प्रमाण पृथिवीको छोड़कर आकाशमें घुटनोंको मोड़े बिना (या जल्दी जल्दी जंघाओंको उत्क्षेप निक्षेप करते हुए-[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) जो बहुत योजनों तक गमन करना है, वह जंघाचारण ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९/७; ८१/४ भूमीए पुढविकाइयजीवाणं बाहमकाऊण अणेगजोयणसयगामिणो जंघाचारणा णाम ।७९-७।....चिक्खल्लछारगोवर-भूसादिचारणाणं जंघाचारणेसु अंतब्भावो, भूमीदो चिक्खलादीणं कधंचि भेदाभावादो ।८१-४।&lt;br /&gt;
= भूमिमें पृथिवीकायिक जीवोंको बाधा न करके अनेक सौ योजन गमन करनेवाले जंघाचारण कहलाते हैं।....कीचड़ भस्म, गोबर और भूसे आदि परसे गमन करनेवालोंका जंघाचारणोंमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, भूमिसे कीचड़ आदिमें कथंचित् अभेद है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अग्नि, धूम, मेघ, तन्तु, वायु व श्रेणी चारण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४१-१०४३, १०४५, १०४७ अविराहिदूण जोवे अग्निसिहालंठिए विचित्ताणं। जं ताण उवरि गमणं अग्निसिहाचारणा रिद्धी ।१०४१। अधउड्ढतिरियपसरं धूमं अवलंबिऊण जं देंति। पदखेवे अक्खलिया सा रिद्धी धूमचारणा णाम ।१०४२। अविरा `हदूणजीवे अपुकाए बहुविहाण मेघाणं। जं उवरि गच्छिइ मुणी सा रिद्धी मेघचारणाणाम ।१०४३। मक्कडयतंतुपंतीउवरिं अदिलघुओ तुरदपदखेवे। गच्छेदि मुणिमहेसी सा मक्कडतंतुचारणा रिद्धी ।१०४५। णाणाविहगदिमारुदपदेसपंतीसु देंति पदखेवे। जं अक्खलिया मुणिणो सा मारुदचारणा रिद्धी ।१०४७।&lt;br /&gt;
= अग्निशिखामें स्थित जीवोंकी विराधना न करके उन विचित्र अग्नि-शिखाओं परसे गमन करनेको `अग्निशिखा चारण' ऋद्धि कहते हैं ।१०४१। जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनिजन नीचे ऊपर और तिरछे फैलनेवाले धुएँका अवलम्बन करके अस्खलित पादक्षेप देते हुए गमन करते हैं वह `धूमचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४२। जिस ऋद्धिसे मुनि अप्कायिक जीवोंको पीड़ा न पहुँचाकर बहुत प्रकारके मेघोंपरसे गमन करता है वह `मेघचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४३। जिसके द्वारा मुनि महर्षि शीघ्रतासे किये गये पद-विक्षेपमें अत्यन्त लघु होते हुए मकड़ीके तन्तुओंकी पंक्तिपरसे गमन करता है, वह `मकड़ीतन्तुचारण' ऋद्धि है ।१०४५। जिसके प्रभावसे मुनि नाना प्रकारकी गतिसे युक्त वायुके प्रदेशोंकी पंक्ति परसे अस्खलित होकर पदविक्षेप करते हैं; वह `मारुतचारण' ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०-१; ८१-८ धूमग्गि-गिरि-तरु-तंतुसंताणेसु उड्ढारोहणसत्तिसंजुत्ता सेडीचारणा णाम ।८०-१।.....धूमग्गिवाद-मेहादिचारणाणं तंतु-सेडिचारणेसु अंतब्भाओ, अणुलोमविलोमगमणेसु जीवपीडा अकरणसत्तिसंजुत्तादो।&lt;br /&gt;
= धूम, अग्नि, पर्वत, और वृक्षके तन्तु समूह परसे ऊपर चढ़नेकी शक्तिसे संयुक्त `श्रेणी चारण' है। .....धूम, अग्नि, वायु और मेघ आदिकके आश्रयसे चलनेवाले चारणोंका `तन्तु-श्रेणी' चारणोंमें अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि, वे अनुलोम और प्रतिलोम गमन करनेमें जीवोंको पीड़ा न करनेकी शक्तिसे संयुक्त हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; धारा व ज्योतिष चारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४४,१०४६ अविराहिय तल्लीणे जीवे घणमुक्कवारिधाराणं। उवरिं जं जादि मुणी सा धाराचारणा ऋद्धि ।१०४४। अघउड्ढतिरियपसरे किरणे अविलंबिदूण जोदीणं। जं गच्छेदि तवस्सी सा रिद्धी जोदि-चारणा णाम ।१०४६।&lt;br /&gt;
= जिसके प्रभावसे मुनि मेघोंसे छोड़ी गयी जलधाराओंमें स्थित जीवोंको पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपरसे जाते हैं, वह धारा चारण ऋद्धि है ।१०४४। जिससे तपस्वी नीचे ऊपर और तिरछे फैलनेवाली ज्योतिषी देवोंके विमानोंकी किरणोंका अवलम्बन करके गमन करता है वह ज्योतिश्चारण ऋद्धि है ।१०४६। (इन दोनोंका भी पूर्व वाले शीर्षकमें दिये धवला ग्रन्थके अनुसार तन्तु श्रेणी ऋद्धिमें अन्तर्भाव हो जाता है।)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; फल पुष्प बीज व पत्रचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३८-१०४० अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बणप्फलाण विविहाणं। उवरिम्मि जं पधावदि स च्चिय फलचारणा रिद्धी ।१०३८। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पुप्फाणं। उवरिम्मि जं पसप्पदि सा रिद्धो पुप्फचारणा णाम ।१०३०। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पत्ताण। जा उवरि वच्चदि मुणी सा रिद्धी पत्तचारणा णामा ।१०३९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिका धारक मुनि वनफलोंमें, फूलोंमें, तथा पत्तोंमें रहनेवाले जीवोंकी विराधना न करके उनके ऊपरसे जाता है वह फलचारण, पुष्पचारण तथा पत्रचारण नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-७; ८१-५ तंतुफलपुप्फबीजचारणाणं पि जलचारणाणं व वत्तव्वं ।७९-७।.....कुंथुद्देही-मुक्कण-पिपीलियादिचारणाणं फलचारणेसु अंतब्भावो, तस जीवपरिहरणकुसलत्तं पडि भेदाभावादो। पत्तंकुरत्तण पवालादिचारणाणं पुप्फचारणेसु अंतब्भावो, हरिदकायपरिहरणकुसलत्तेण साहम्मादो ।८१/५।&lt;br /&gt;
= तन्तुचारण, फलचारण, पुष्पचारण और बीजचारणका स्वरूप भी जलचारणोंके समान कहना चाहिए (अर्थात् उनमें रहने वाले जीवोंको पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपर गमन करना) ।७९-७।....कुंथुजीव, मुत्कण, और पिपीलिका आदि परसे संचार करनेवालोंका फलचारणोंमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, इनमें त्रसजीवोंके परिहारकी कुशलताकी अपेक्षा कोई भेद नहीं है ।। पत्र, अंकुर, तृण और प्रवाल आदि परसे संचार करनेवालोंका पुष्पचारणोंमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, हरितकाय जीवोंके परिहारकी कुशलताकी अपेक्षा इनमें समानता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तपऋद्धि निर्देशs&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; उग्रतपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७-५; ८९-६ उग्गतवा दुविहा उग्गुग्गतवा अवट्ठिदुग्गतवा चेदि। तत्थ जो एक्कोववासं काऊण पारिय दो उववासो करेदि, पुणरवि पारिय तिण्णि उववासे करेदि। एवमेगुत्तरवड्डीए जाव जीविदं तं तिगुत्तिगुत्तो होदूण उववासे करेंतो उग्गगतवो णाम। एदस्सुववास पारणाणयणे सुत्तं-&amp;quot;उत्तरगुणिते तु धने पुनरप्यष्टापितेऽत्र गुणमादिम्। उत्तरविशेषितं वर्ग्गितं च योज्यान्येन्मूलम् ।२३। इत्यादि....तत्थ दिक्खट्ठेमेगोववासं काऊण पारिय पुणो-एक्कहंतरेण गच्छंतस्स किंचिणिमित्तेण छट्ठोववासो जादो। पुणो तेण छट्ठोववासेण विहरंतस्स अट्ठमोववासो जादो। एवं दसमदुवालसादिक्कमेण हेट्ठा ण पदंतो जाव जीविदंतं जो विहरदि अवट्ठिदुग्गतवो णाम। एदं पि तवोविहाणं वीरियंतराइयक्खओवसमेण होदि।&lt;br /&gt;
= उग्रतप ऋद्धिके धारक दो प्रकार हैं-उग्रोग्रतप ऋद्धि धारक और अवस्थितउग्रतप ऋद्धि धारक। उनमें जो एक उपवासको करके पारणा कर दो उपवास करता है, पश्चात् फिर पारणा कर तीन उपवास करता है। इस प्रकार एक अधिक वृद्धिके साथ जीवन पर्यन्त तीन गुप्तियोंसे रक्षित होकर उपवास करनेवाला `उग्रोग्रतप' ऋद्धिका धारक है। इसके उपवास और पारणाओंका प्रमाण लानेके लिए सूत्र-(यहाँ चार गाथाएँ दी हैं जिनका भावार्थ यह है कि १४ दिन में १० उपवास व ४ पारणाएँ आते हैं। इसी क्रमसे आगे भी जानना) ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०-१०५१) दीक्षाके लिए एक उपवास करके पारणा करे, पश्चात् एक दिनके अंतरसे ऐसा करते हुए किसी निमित्तसे षष्टोपवास (बेला) हो गया। फिर (पूर्वाक्तवत् ही) उस षष्ठोपवाससे विहार करनेवाले के (कदाचित्) अष्टमोपवास (तेला) हो गया। इस प्रकार दशमद्वादशम आदि क्रमसे नीचे न गिरकर जो जीवन पर्यन्त विहार करता है, वह अवस्थित उग्रतप ऋद्धिका धारक कहा जाता है। यह भी तपका अनुष्ठान वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे होता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर तपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५५ जलसूलप्पमुहाणं रोगेणच्चंतपीडिअंगा वि। साहंति दुर्द्ध रतवं जोए सा घोरतवरिद्धी ।१०५५।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२६/९२/२ उववासेसुछम्मासोववासो, अवमोदरियासु एक्ककवलो उत्तिपरिसंखासु चच्चरे गोयराभिग्गहो, रसपरिच्चाग्गेसु उण्हजलजुदोयणभोयणं, विवित्तसयणासणेसु वय-वग्घ-तरच्छ-छवल्लादिसावयसेवियासुसज्झविज्झुडईसु णिवासो, कायकिलेसेसुतिव्वहिमवासादिणिवदंतविसएसु अब्भोकासरुक्खमूलादावणजोगग्गहणं। एवमब्भंतरतवेसु वि उक्कट्ठतवपरूवणा कायव्वा। एसो बारह विह वि तवो कायरजणाणं सज्झसजणणो त्ति घोरत्तवो। सो जेसिं ते घोरत्तवा। बारसविहतवउक्कट्ठवट्ठाए वट्टमाणा घोरतवा त्ति भणिद होदि। एसा वि तवजणिदरिद्धी चेव, अण्णहा एवं विहाचरणाणुववत्तीदो।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) जिस ऋद्धिके बलसे ज्वर और शूलादिक रोगसे शरीरके अत्यन्त पीड़ित होने पर भी साधुजन दुर्द्धर तपको सिद्ध करते हैं, वह घोर तपऋद्धि है ।१०५५। उपवासोंमें छह मासका उपवासः अवमोदर्य तपोंमें एक ग्रास; वृत्तिपरिसंख्याओंमें चौराहेमें भिक्षाकी प्रतिज्ञा; रसपरित्यागोंमें उष्ण जल युक्त ओदनका भोजन; विविक्तशय्यासनोंमें वृक, व्याघ्र, तरक्ष, छवल्ल आदि श्वापद अर्थात् हिंस्रजीवोंसे सेवित सह्य, विन्ध्य आदि (पर्वतोंकी) अटवियोंमें निवास; कायक्लेशोंमें तीव्र हिमालय आदिके अन्तर्गत देशोंमें, खुले आकाशके नीचे, अथवा वृक्षमूलमें; आतापन योग अर्थात् ध्यान ग्रहण करना। इसी प्रकार अभ्यन्तर तपोंमें भी उत्कृष्ट तपकी प्ररूपणा करनी चाहिए। ये बारह प्रकार ही तप कायर जनोंको भयोत्पादक हैं, इसी कारण घोर तप कहलाते हैं। वह तप जिनके होता है वे घोरतप ऋद्धिके धारक हैं। बारह प्रकारके तपोंकी उत्कृष्ट अवस्थामें वर्तमान साधु घोर तप कहलाते हैं, यह तात्पर्य है। यह भी तप जनित (तपसे उत्पन्न होनेवाली) ऋद्धि ही है, क्योंकि, बिना तपके इस प्रकारका आचरण बन नहीं सकता।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१२), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२२/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर पराक्रम तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५६-१०५७ णिरुवमवड्ढंततवा तिहुवणसंहरणकरसत्तिजुत्ता। कंटयसिलग्गिपव्वयधूमुक्कापहुदिवरिसणसमत्था ।१०५६। सहस त्ति सयलसायरसलिलुप्पीलस्स सोसणसमत्था। जायंति जीए मुणिणो घोरपरक्कमतव त्ति सा रिद्धी ।१०५७।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनि जन अनुपम एवं वृद्धिंगत तपसे सहित, तीनों लोकोंके संहार करनेकी शक्तिसे युक्त; कंटक, शिला, अग्नि, पर्वत, धुआँ तथा उल्का आदिके बरसानेमें समर्थ; और सहसा समपूर्ण समुद्रके सलिलसमूहके सुखानेकी शक्तिसे भी संयुक्त होते हैं वह घोर-पराक्रम-तप ऋद्धि है ।१०५६-१०५७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२७/९३/२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;घोर ब्रह्मचर्य तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५८-१०६० जीए ण होंति मुणिणो खेत्तम्मि वि चोरपहुदिबाधाओ। कालमहाजुद्धादी रिद्धी सघोरब्रह्मचारित्ता ।१५८। उक्कस्स खउवसमे चारित्तावरणमोहकम्मस्स। जा दुस्सिमणं णासइ रिद्धी सा घोरब्रह्मचारित्ता ।१०५९। अथवा-सव्वगुणेहिं अघोरं महेसिणो बह्मसद्दचारित्तं। विप्फुरिदाए जीए रिद्धी साघोरब्रह्मचारित्ता ।१०६०।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिसे मुनिके क्षेत्रमें भी चौरादिककी बाधाएँ और काल एवं महायुद्धादि नहीं होते हैं, वह `अघोर ब्रह्मचारित्व' ऋद्धि है ।१०५८। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/४) चारित्रमोहनीयका उत्कृष्ट क्षयोपशम होने पर जो ऋद्धि दुःस्वप्नको नष्ट करती है तथा जिस ऋद्धिके आविर्भूत होनेपर महर्षिजन सब गुणोंके साथ अघोर अर्थात् अविनश्वर ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं वह अघोर ब्रह्मचारित्व ऋद्धि है ।१०५९-१०६०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]]  तथा [[चारित्रसार]]  में इस लक्षणका निर्देश ही घोर गुण ब्रह्मचारीके लिए किया गया है) &lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९३-६; ९४-२ घोरा रउद्दा गुणा जेसिं ते घोरगुणा। कधं चउरासादिलक्खगुणाणं घोरत्तं। घोरकज्जकारिसत्तिजणणादो। ९४६।.....ब्रह्म चारित्रं पंचव्रत-समिति-त्रिगुप्त्यात्मकम्, शान्तिपुष्टिहेतुत्वात्। अघोरा शान्ता गुणा यस्मिन् तदघोरगुणं, अघोरगुणं, ब्रह्मचरन्तीति अघोरगुणब्रह्मचारिणः।.....एत्थ अकारो किण्ण सुणिज्जदे। संधिणिद्देसादो ।१९२। &lt;br /&gt;
= घोर अर्थात् रौद्र हैं गुण जिनके वे घोर गुण कहे जाते हैं। प्रश्न-चौरासी लाख गुणोंके घोरत्व कैसे सम्भव है। उत्तर-घोर कार्यकारी शक्तिको उत्पन्न करनेके कारण उनके घोरत्व सम्भव है। ब्रह्मका अर्थ पाँच व्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिस्वरूप चारित्र है, क्योंकि वह शान्तिके पोषणका हेतु है। अघोर अर्थात् शान्त हैं गुण जिसमें वह अघोर गुण है। अघोर गुण ब्रह्म (चारित्र) का आचरण करनेवाले अघोर गुण ब्रह्मचारी कहलाते हैं। (भावार्थ-अघोर शान्तको कहते हैं। जिनका ब्रह्म अर्थात् चारित्र शान्त है उनको अघोर गुण ब्रह्मचारी कहते हैं। ऐसे मुनि शान्ति और पुष्टिके कारण होते हैं, इसीलिए उनके तपश्चरणके माहात्म्यसे उपरोक्त ईति, भीति, युद्ध व दुर्भिक्षादि शान्त हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-`णमो घोरगुणबम्हचारीणं' इस सूत्रमें अघोर शब्दका अकार क्यों नहीं सुना जाता? उत्तर-सन्धियुक्त निर्देश होनेसे।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण और घोर पराक्रम तपमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/९३/८ ण गुण-परक्कमाण मेयत्तं, गुणजणि दसत्तीए परक्कमववएसादो।&lt;br /&gt;
= गुण और पराक्रमके एकत्व नहीं हैं, क्योंकि गुण से उत्पन्न हुई शक्तिकी पराक्रम संज्ञा है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तप्त दीप्त व महातप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५२-१०५४ बहुविहउववासेहिं रविसमवड्ढंतकायकिरणोघो। कायमणवयणबलिणो जीए सा दित्ततवरिद्धी ।१०५२। तत्ते लोहकढाहे पडिंअंबुकणं ब जीए भुत्तण्णं। झिज्जहिं धाऊहिं सा णियझाणाएहिं तत्ततवा ।१०५३। मंदरपंत्तिप्पमुहे महोववासे करेदि सव्वे वि। चउसण्णाण बलेणं जीए सा महातवा रिद्धी ।१०५४।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२३/९०/५ तेसिं ण केवलं दित्ति चेव वंड्ढदि किंतु बलो वि वड्ढदि।.....तेण ण तेसिं भुत्ति वि तेण कारणाभावादो। ण च भुक्खादुक्खवसमणट्ठं भुजंति, तदभावादो। तदभावो कुदीवगम्मदे।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके प्रभावसे, मन, वचन और कायसे बलिष्ठ ऋषिके बहुत प्रकारके उपवासों द्वारा सूर्यके समान दीप्ति अर्थात् शरीरकी किरणोंका समूह बढ़ता हो वह `दीप्त तप ऋद्धि' है ।१०५२। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/२)। (धवलामें उपरोक्तके अतिरिक्त यह और भी कहा है कि उनके केवल दीप्ति ही नहीं बढ़ती है, किन्तु बल भी बढ़ता है। इसीलिए उनके आहार भी नहीं होता, क्योंकि उसके कारणोंका अभाव है। यदि कहा जाय कि भूखके दुःखको शान्त करनेके लिए वे भोजन करते हैं सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उनके भूखके दुःखका अभाव है।) तपी हुई लोहेकी कड़ाहीमें गिरे हुए जलकणके समान जिस ऋद्धिसे खाया हुआ अन्न धातुओं सहित क्षीण हो जाता है, अर्थात् मल-मूत्रादि रूप परिणमन नहीं करता है, वह निज ध्यानसे उत्पन्न हुई तप्त `तप ऋद्धि' है ।१०५३। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२४/९१/१), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/३)। जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनि चार सम्यग्ज्ञानों (मति, श्रुत, अवधि व मनःपर्यय) के बलसे मन्दिर पंक्ति प्रमुख सब ही महान् उपवासोंको करता है वह `महा तप ऋद्धि' है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३/६३/२०३/११)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२५/९१/५ अणिमादिअट्ठगुणोवेदो जलचारणादिअट्ठविहचारणगुणालंकरियो फुरंतसरीरप्पहो दुविहअवखीणरिद्धिजुत्तो सव्वोसही सरूवो पाणिपत्तणिवदिदसव्वहारो अमियसादसरूवेण पल्लट्ठावणसमत्थो सयलिंदेहिंतो वि अणंतबलो आसी-दिट्ठिविसलद्धिसमण्णिओ तत्ततवो सयलविज्जाहरो मदि सुद ओहि मणपज्जवणाणेहि मुणिदतिहुवणवावारो मुणी महातवो णाम। कस्मात्। महत्त्वहेतुस्तपोविशेषो महानुच्यते उपचारेण, स येषां ते तपसः इति सिद्धत्वात्। अथवा महसां हेतुः तप उपचारेण महा इति भवति।&lt;br /&gt;
= जो अणिमादि आठ गुणोंसे सहित हैं, जलचारणादि आठ प्रकारके चारण गुणोंसे अलंकृत हैं, प्रकाशमान शरीर प्रभासे संयुक्त हैं, दो प्रकारकी अक्षीण ऋद्धिसे युक्त हैं, सर्वोषध स्वरूप हैं, पाणिपात्रमें गिरे हुए आहारको अमृत स्वरूपसे पलटानेमें समर्थ हैं, समस्त इन्द्रोंसे भी अनन्तगुणे बलके धारक हैं, आशीर्विष और दृष्टिविष लब्धियोंसे समन्वित हैं, तप्ततप ऋद्धिसे संयुक्त हैं, समस्त विद्याओंके धारक हैं; तथा मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय ज्ञानोंसे तीनों लोकोंके व्यापारकी जाननेवाले हैं, वे मुनि `महातप ऋद्धि' के धारक हैं। कारण कि महत्त्वके हsेतुभूत तपविशेषको उपचारसे महान् कहा जाता है। वह जिनके होता है वे महातप ऋषि हैं, ऐसा सिद्ध है। अथवा, महस् अर्थात् तेजोंका हेतुभूत जो तप है वह उपचार से महा होता है। (तात्पर्य यह कि सातों ऋद्धियोंकी उत्कृष्टताको प्राप्त होनेवाले ऋषि महातप युक्त समझे जाते हैं।)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; बल ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ४/१०६१-१०६६ बलरिद्धी तिविहप्पा मणवयणसरीरयाणभेएण। सुदणाणावरणाए पगडीए वीरयंतरायाए ।१०६१। उक्कसक्खउवसमे सुहुत्तमेत्तंतरम्मि सयलसुदं। चिंतइ जाणइ जीए सा रिद्धी मणबला णामा ।१०६२। जिब्भिंदियणोइंदिय-सुदणाणावरणविरियविग्घाणं। उक्कस्सखओवसमे मुहुत्तमेत्तंतरम्मि मुणी ।१०६३। सयलं पि सुदं जाणइ उच्चारइ जीए विप्फुरंतीए। असयो अहिकंठो सा रिद्धीउ णेया वयणबलणामा ।१०६४। उक्कस्सखउसमे पविसेसे विरियविग्धपगढीए। मासचउमासपमुहे काउसग्गे वि समहीणा ।१०६५। उच्चट्ठिय तेल्लोक्कं झत्ति कणिट्ठंगुलीए अण्णत्थं। घविदं जीए समत्था सा रिद्धी कायबलणामा ।१०६६।&lt;br /&gt;
= मन वचन और कायके भेदसे बल ऋद्धि तीन प्रकार है। इनमें-से जिस ऋद्धिके द्वारा श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन दो प्रकृतियोंका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर मुहूर्तमात्र कालके भीतर अर्थात् अन्तर्मुहूर्त्त कालमें सम्पूर्ण श्रुतका चिन्तवन करता है वह जानता है, वह `मनोबल' नामक ऋद्धि है ।१०६१-१०६२। जिह्वेन्द्रियावरण, नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर जिस ऋद्धिके प्रगट होनेसे मुनि श्रमरहित और अहीनकंठ होता हुआ मुहूर्त्तमात्र कालके भीतर सम्पूर्ण श्रुतको जानता व उसका उच्चारण करता है, उसे `वचनबल' नामकऋद्धि जानना चाहिए ।१०६३-१०६४। जिस ऋद्धिके बलसे वीर्यान्तराय प्रकृतिके उत्कृष्ट क्षयोपशमकी विशेषता होनेपर मुनि, मास व चतुर्मासादिरूप कायोत्सर्गको करते हुए भी श्रमसे रहित होते हैं, तथा शीघ्रतासे तीनों लोकोंको कनिष्ठ अँगुलीके ऊपर उठाकर अन्यत्र स्थापित करनेके लिए समर्थ होते हैं, वह `कायबल' नामक ऋद्धि है ।१०६५-१०६६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३५-३७/९८-९९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२२४/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; औषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;औषध ऋद्धि सामान्य&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४ औषधर्द्धिरष्टविधा-असाध्यानामप्यामयानां सर्वेषां विनिवृत्तिहेतुरामर्शक्ष्वेलजल्लमलविट्सर्वौषधिप्राप्तास्याविषदृष्टिविषविकल्पात्।&lt;br /&gt;
= असाध्य भी सर्व रोगोंकी निवृत्तिकी हेतुभूत औषध-ऋद्धि आठ प्रकारकी है - आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल, विट्, सर्व, आस्याविष और दृष्टिविष। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्ष क्ष्वेल जल मल व विट् औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६८-१०७२ रिसिकरचरणादीणं अल्लियमेत्तम्मि। जीए पासम्मि। जीवा होंति णिरोगा सा अम्मरिसोसही रिद्धी ।१०६८। जीए तालासेमच्छीमलसिंहाणआदिआ सिग्घं। जीवाणं रोगहरणा स च्चिय खेलोसही रिद्धो ।१०६९। सेयजलो अंगरयं जल्लं भण्णेत्ति जीए तेणावि। जीवाणं रोगहरणं रिद्धी जस्लोसही णामा ।१०७०। जीहीट्ठदं तणासासोंत्तादिमलं पि जीए सत्तीए। जोवाणं रोगहरणं मलोसही णाम सा रिद्धी ।१०७१।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके प्रभावसे जीव पासमें आनेपर ऋषिके हस्त व पादादिके स्पर्शमात्र से ही निरोग हो जाते हैं, वह `आमर्षौषध' ऋद्धि है ।१०६८। जिस ऋद्धिके प्रभावसे लार, कफ, अक्षिमल और नासिकामल शीघ्र ही जीवोंके रोगोंको नष्ट करता है वह `क्ष्वेलौषध ऋद्धि है ।१०६९। पसीनेके आश्रित अंगरज जल्ल कहा जाता है। जिस ऋद्धिके प्रभावसे उस अंगरजसे भी जीवों के रोग नष्ट होते हैं, वह `जल्लौषधि' ऋद्धि कहलाती है ।१०७०। जिस शक्तिसे जिह्वा, ओठ, दाँत, नासिका और श्रोत्रादिकका मल भी जीवोंके रोगोंको दूर करनेवाला होता है, वह `मलौषधि' नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२५); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०-३३/९५-९७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्षौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्यमें अन्तर&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०/९६/१ तवोमाहप्पेण जेसिं फासो सयलोसहरूवत्तं पत्तो तेसिमाम्मरिसो सहिपत्ता त्ति सण्णा।&lt;br /&gt;
= ण च एदेसिमघोरगुणबंभयारीणं अंतब्भावो, एदेसिं वाहिविणासणे चेव सत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= तप के प्रभावसे जिनका स्पर्श समस्त औषधियोंके स्वरूपको प्राप्त हो गया है, उनको आमर्षौषधि प्राप्त ऐसी संज्ञा है। इनका अघोरगुणब्रह्मचारियों में अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि, इनके अर्थात् अघोरगुण ब्रह्मचारियोंके केवल, व्याधिके नष्ट करनेमें ही शक्ति देखी जाती है। (पर उनका स्पर्श औषध रूप नहीं होता)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; सर्वौषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७३ जीए पस्सजलाणिलरीमणहादीणि वाहिहरणाणि। दुक्करवजुत्ताणं रिद्धी सव्वोही णामा ।१०७३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे दुष्कर तपसे युक्त मुनियोंका स्पर्श किया हुआ जल व वायु तथा उन के रोम और नखादिक व्याधिके हरनेवाले हो जाते हैं, वह सर्वौषधि नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/५)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३४/९७/६ रस-रुहिर-मांस-मेदट्ठि-मज्ज-सुक्क-पुप्फस-खरीसकालेज्ज-मुत्त-पित्तंतुच्चारादओ सव्वे ओसाहत्तं पत्ता जेसि ते सव्वोसहिषत्ता।&lt;br /&gt;
= रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र, पुप्फस, खरीष, कालेय, मूत्र, पित्त, अँतड़ी, उच्चार अर्थात् मल आदिक सब जिनके औषधिपनेको प्राप्त हो गये हैं वे सर्वौषधिप्राप्त जिन हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७४-१०७६ तित्तादिविविहम्मण्णं विसुजुत्तं जीए वयणमेत्तेण। पावेदि णिव्विसत्तं सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७४। अहवा बहुवाहाहिं परिभूदा झत्ति होंति णीरोगा। सोदुं वयणं जीए सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७५। रोगाविसेहिं पहदा दिट्ठीए जीए झत्ति पावंति। णीरोगणिव्विसत्तं सा भणिदा दिट्ठिणिव्विसा रिद्धी ।१०७६।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३,३६,३/२०३/३० उग्रविषसंपृक्तोऽप्याहारो येषामास्यगतो निर्विषीभवति यदीयास्यनिर्गतं वचःश्रवणाद्वा महाविषपरीता अपि निर्विषीभवन्ति ते आस्याविषाः।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) - जिस ऋद्धिसे तिक्तादिक रस व विषसे युक्त विविध प्रकारका अन्न वचनमात्रसे ही निर्विषताको प्राप्त हो जाता है, वह `वचननिर्विष' नामक ऋद्धि है ।१०७४। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) - उग्र विषसे मिला हुआ भी आहार जिनके मुखमें जाकर निर्विष हो जाता है, अथवा जिनके मुखसे निकले हुए वचनके सुनने मात्रसे महाविष व्याप्त भी कोई व्यक्ति निर्विष हो जाता है वे `आस्याविष' हैं। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/१)। ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) अथवा जिस ऋद्धिके प्रभावसे बहुत व्याधियोंसे युक्त जीव, ऋषिके वचनको सुनकर ही झटसे नीरोग हो जाया करते हैं, वह वचन निर्विष नामक ऋद्धि है ।१०७५। रोग और विषसे युक्त जीव जिस ऋद्धिके प्रभावसे झट देखने मात्रसे ही निरोगता और निर्विषताको प्राप्त कर लेते हैं; वह `दृष्टिनिर्विष' ऋद्धि है ।१०७६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/२)&amp;lt;/ol&amp;gt;&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आशीर्विष रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७८ मर इदि भणिदे जीओ मरेइ सहस त्ति जीए सत्तीए। दुक्खरतवजुदमुणिणा आसीविस णाम रिद्धी सा।&lt;br /&gt;
= जिस शक्तिसे दुष्कर तपसे युक्त मुनिके द्वारा `मर जाओ' इस प्रकार कहने पर जीव सहसा मर जाता है, वह आशीविष नामक ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८५/५ अविद्यमानस्यार्थस्य आशंसनमाशीः, आशीर्विष एषां ते आशीर्विषाः। जेसि जं पडि मरिहि त्ति वयणं णिप्पडिदं तं मारेदि, भिक्खं भमेत्तिवयणं भिक्खं भमावेदि, सीसं छिज्जउ त्ति वयणं सीस छिंददि, आसीविसा णाम समणा। कधं वयणस्स विससण्णा। विसमिव विसमिदि उवयारादो। आसी अविसममियं जेसिं ते आसीविसा। जेसिं वयणं थावर-जंगम-विसपूरिदजीवे पडुच्च `णिव्विसा होंतु' त्ति णिस्सरिदं ते जीवावेदि। वाहिवेयण-दालिद्दादिविलयं पडुच्च णिप्पडितं सं तं तं तं कज्जं करेदि ते वि आसीविसात्ति उत्तं होदि।&lt;br /&gt;
= अविद्यमान अर्थकी इच्छाका नाम आशिष है। आशिष है विष (वचन) जिनका वे आशीर्विष कहे जाते हैं। `मर जाओ' इस प्रकार जिनके प्रति निकला हुआ जिनका वचन उसे मारता है, `भिक्षाके लिए भ्रमण करो' ऐसा वचन भिक्षार्थ भ्रमण कराता है, `शिरका छेद हो' ऐसा वचन शिरको छेदता है, (अशुभ) आशीर्विष नामक साधु हैं। प्रश्न-वचनके विष संज्ञा कैसे सम्भव है? उत्तर-विषके समान विष है। इस प्रकार उपचारसे वचनको विष संज्ञा प्राप्त है। आशिष है अविष अर्थात् अमृत जिनका वे (शुभ) आशीर्विष हैं। स्थावर अथवा जंगम विषसे पूर्ण जीवोंके प्रति `निर्विष हो' इस प्रकार निकला हुआ जिनका वचन उन्हें जिलाता है, व्याधिवेदना और दारिद्र्य आदिके विनाश हेतु निकला हुआ जिनका वचन उस उस कार्यको करता है, वे भी आशीर्विष हैं, यह सूत्रका अभिप्राय है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. दृष्टिविष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;दृष्टिविष रस ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७९ जीए जीवो दिट्ठो महासिणा रोसभरिदहिदएण। अहदट्ठं व मरिज्जदि दिट्ठिविसा णाम सा रिद्धी ।१०७९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे रोषयुक्त हृदय वाले महर्षिसे देखा गया जीव सर्प द्वारा काटे गयेके समान मर जाता है, वह दृष्टिविष नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२७/१)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/७ दृष्टिरिति चक्षुर्मनसोर्ग्रहणं, तत्रोभयत्र दृष्टिशब्दप्रवृत्तिदर्शनात्। तत्साहचर्यात्कर्मणोऽपि। रुट्ठो जदि जोएदि चिंतेदि किरियं करेदि वा `मारेमि' त्ति तो मारेदि, अण्णं पि असुहकम्मं संरंभपुव्वावलोयणेण कुणमाणोदिट्ठविसो णाम।&lt;br /&gt;
= दृष्टि शब्दसे यहाँ चक्षु और मन (दोनों) का ग्रहण है, क्योंकि उन दोनोंमें दृष्टि शब्दकी प्रवृत्ति देखी जाती है। उसकी सहचरतासे क्रियाका भी ग्रहण है। रुष्ट होकर वह यदि `मारता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है व क्रिया करता है तो मारता है; तथा क्रोधपूर्वक अवलोकनसे अन्य भी अशुभ कार्यको करनेवाला (अशुभ) दृष्टिविष कहलाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृतरस ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/९ एवं दिट्ठअमियाणं पि जाणिदूण लक्खणं वत्तव्वं।&lt;br /&gt;
= इसी प्रकार दृष्टि अमृतोंका भी लक्षण जानकर कहना चाहिए। (अर्थात् प्रसन्न होकर वह यदि `नीरोग करता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है, व क्रिया करता है तो नीरोग करता है, तथा प्रसन्नतापूर्वक अवलोकनसे अन्य भी शुभ कार्यको करनेवाला दृष्टिअमृत कहलाता है)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोरब्रह्मचर्य तपमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/६ दिट्ठअमियाणमघोरगुणबंभयारीणं च को विसेसो। उवजोगसहेज्जदिट्ठीए दिट्ठिलद्धिजुत्ता दिट्ठिविसा णाम। अघोर गुणबंभयारीणं पुण लद्धी असंखेज्जा सव्वंगगया, एदेसिमंगलग्गवादे वि सयलोवद्दवविणासणसत्तिदंसणादो तदो। अत्थि भेदो। णवरि असुद्धलद्धोणं पउत्ती लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी। सुहाणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-दृष्टि-अमृत और अघोरगुणब्रह्मचारीके क्या भेद हैं? उत्तर-उपयोगकी सहायता युक्त दृष्टिमें स्थित लब्धिसे संयुक्त दृष्टिविष कहलाते हैं। किन्तु अघोरगुणब्रह्मचारियोंकी लब्धियाँ सर्वांगगत असंख्यात हैं। इनके शरीरसे स्पृष्ट वायुमें भी समस्त उपद्रवोंको नष्ट करनेकी शक्ति देखी जाती है इस कारण दोनोंमें भेद है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विशेष इतना है कि अशुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवों की इच्छाके वशसे होती है। किन्तु शुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारोंसे सम्भव है, क्योंकि, इनकी इच्छाके बिना भी उक्त लब्धियोंकी प्रवृत्ति देखी जाती है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षीर-मधु-सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८०-१०८७ करयलणि क्खिताणिं रुक्खाहारादियाणि तक्कालं। पावंति खीरभावं जीए खीरोसवी रिद्धी ।१०८०। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयण सवण मेत्तेणं। पसमदि णरतिरियाणं स च्चिय खीरोसवी ऋद्धी ।१०८१। मुणिकइणिक्खिताणि लुक्खाहारादियाणिहोंतिखणे। जीए महुररसाइं स च्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८२। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयणसवणमेत्तेण। णासदि णरतिरियाणं तच्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८३। मुणिपाणिसंठियाणिं रुक्खाहारादियाणि जीय खणे। पावंति अमियभावं एसा अमियासवी ऋद्धी ।१०८४। अहवा दुक्खादीणं महेसिवयणस्स सवणकालम्मि। णासंति जीए सिग्घं रिद्धी अमियआसवी णामा ।१०८५। रिसिपाणितलणिक्खित्तं रुक्खाहारादियं पि खणमेत्ते। पावेदि सप्पिरूवं जीए सा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८६। अहवा दुक्खप्पमुहं सवणेण मुणिंदव्ववयणस्स। उवसामदि जीवाणं एसा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८७।&lt;br /&gt;
= जिससे हस्ततलपर रखे हुए रूखे आहारादिक तत्कालही दुग्धपरिणाम को प्राप्त हो जाते हैं, वह `क्षीरस्रावी' ऋद्धि कही जाती है ।१०८०। अथवा जिस ऋद्धिसे मुनियोंके वचनोंके श्रवणमात्रसे ही मनुष्य तिर्यंचोंके दुःखादि शान्त हो जाते हैं उसे क्षीरस्रावी ऋद्धि समझना चाहिए ।१०८१। जिस ऋद्धिसे मुनिके हाथमें रखे गये रूखे आहारादिक क्षणभरमें मधुररससे युक्त हो जाते हैं, वह `मध्वास्रव' ऋद्धि है, ।१०८२। अथवा, जिस ऋषि-मुनिके वचनोंके श्रवणमात्रसे मनुष्यतिर्यंचके दुःखादिक नष्ट हो जाते हैं वह मध्वास्रावी ऋद्धि है ।१०८३। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि के हाथ में स्थित रूखे आहारादिक क्षणमात्र में अमृतपने को प्राप्त करते हैं, वह अमृतास्रवी नामक ऋद्धि है ।१०८४। अथवा जिस ऋद्धि से महर्षि के वचनों के श्रवण काल में शीघ्र ही दुःखादि नष्ट हो जाते हैं, वह अमृतस्रावी नामक ऋद्धि है ।१०८५।  जिस ऋद्धिसे ऋषिके हस्ततलमें निक्षिप्त रूखा आहारादिक भी क्षणमात्रमें घृतरूपको प्राप्त करता है, वह `सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८६। अथवा जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनीन्द्रके दिव्य वचनोंके सुननेसे ही जीवोंके दुःखादि शान्त हो जाते हैं, वह सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/४१/९१-१०१) (च.सा. २२७/२) &lt;br /&gt;
नोट-धवलामें हस्तपुटवाले लक्षण हैं। वचन वाले नहीं। [[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या व.[[चारित्रसार]]  में दोनों प्रकारके है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थोंका क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३८/१००/१ कधं रसंतरेसु ट्ठियदव्वाणं तक्खणादेव खीरासादसरूवेण परिणामो। ण, अमियसमुद्दम्मि णिवदिदविसस्सेव पंचमहव्वय-समिइ-तिगुत्तिकलावघडिदंजलिउदणिवदियाणं तदविरोहादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-अन्य रसोंमें स्थित द्रव्यका तत्काल ही क्षीर स्वरूपसे परिणमन कैसे सम्भव है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, जिस प्रकार अमृत समुद्रमें गिरे हुए विषका अमृत रूप परिणमन होनेमें कोई विरोध नहीं है, उसी प्रकार पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तियोंके समूह से घटित अंजलिपुटमें गिरे हुए सब आहारोंका क्षीर स्वरूप परिणमन करनेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षेत्र ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धिके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८९-१०९१ लाभंतरायकम्मक्खउवसमसंजुदए जीए फुडं। मुणिभुत्तमसेसमण्णं धामत्थं पियं ज कं पि ।१०८९। तद्दिवसे खज्जंतं खंधावारेण चक्कवट्टिस्स। झिज्जइ न लवेण वि सा अक्खीणमहाणसा रिद्धो ।१०९०। जीए चउधणुमाणे समचउरसालयम्मि णरतिरिया। मंतियसंखेज्जा सा अक्खीणमहालया रिद्धी ।१०९१।&lt;br /&gt;
= लाभान्तरायकर्मके क्षयोपशमसे संयुक्त जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनिके आहारसे शेष, भोजनशालामें रखे हुए अन्नमेंसे जिस किसी भी प्रिय वस्तुको यदि उस दिन चक्रवर्तीका सम्पूर्ण कटक भी खावे तो भी वह लेशमात्र क्षीण नहीं होता है, वह `अक्षीणमहानसिक' ऋद्धि है ।१०८९-१०९९। जिस ऋद्धिसे समचतुष्कोण चार धनुषप्रमाण क्षेत्रमें असंख्यात मनुष्य तिर्यंच समा जाते हैं, वह `अक्षीण महालय' ऋद्धि है ।१०९०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,४२/१०१/८/केवल अक्षीण महानसका निर्देश है, अक्षीण महालयका नहीं); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; शुभ ऋद्धिकी प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभकी प्रयत्न पूर्वक ही&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९५/१ असुहलद्धीणं पउत्तो लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी सुहाणं लद्धीणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= अशुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवोंकी इच्छाके वशसे होती है। किन्तु शुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारोंसे (इच्छासे व स्वतः) सम्भव है, क्योंकि, इच्छाके बिना भी उक्त लब्धियोंकी प्रवृत्ति देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; एक व्यक्तिमें युगपत् अनेक ऋद्धियोंकी सम्भावना&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १/१,१,५९/२९८/६ नैष नियमोऽप्यस्त्येकस्मिन्नक्रमेण नर्द्धयो भूयस्यो भवन्तीति। गणभृत्सु सप्तानामपि, ऋद्धीनामक्रमेण सत्त्वोपलम्भात्। आहारर्द्ध्या सह मनःपर्ययस्य विरोधो दृश्यते इति चेद्भवतु नाम दृष्टत्वात्। न चानेन विरोध इति सर्वाभिर्विरोधो वक्तुं पार्यतेऽव्यवस्थापत्तेरिति।&lt;br /&gt;
= एक आत्मामें युगपत् अनेक ऋद्धियाँ उत्पन्न नहीं होती, यह कोई नियम नहीं है, क्योंकि, गणधरोंके एक साथ सातों ही ऋद्धियोंका सद्भाव पाया जाता है। प्रश्न-आहारक ऋद्धिके साथ मनःपर्ययका तो विरोध देखा जाता है। उत्तर-यदि आहारक ऋद्धिके साथ मनःपर्ययज्ञानका विरोध देखनेमें आता है तो रहा आवे। किन्तु मनःपर्ययके साथ विरोध है, इसलिए आहारक ऋद्धिका दूसरोसम्पूर्ण ऋद्धियोंके साथ विरोध है ऐसा नहीं कहा जा सकता है। अन्यथा अव्यवस्थाकी आपत्ति आ जायेगी। (विशेष देखो `गणधर')।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,३,२५/३२/३ पमत्तसंजदस्स अणिमादिलद्धिसंपण्णस्स विउव्विदसमए आहारसरीरुट्ठावणसंभवाभावादो।&lt;br /&gt;
= अणिमादि लब्धियोंसे सम्पन्न प्रमत्त संयत जीवके विक्रिया करते समय आहारक शरीरकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[गोम्मट्टसार जीवकाण्ड]] / मूल गाथा संख्या २४२/५०५ वै गुव्विय आहारयकिरिया ण समं पमत्तविरदम्हि। जोगोवि एक्ककाले एक्केव य होदि नियमेण।।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; गोम्मटसार जीवकाण्ड/ &amp;lt;/span&amp;gt;मं.प्र. २४२/५०५ प्रमत्तविरते वैक्रियकयोगक्रिया आहारकयोगक्रिया च समं युगपन्न संभवतः। यदा आहारकयोगमवलम्ब्य प्रमत्तसंयतस्य गमनादिक्रिया प्रवर्तते तदा विक्रियर्द्धिबलेन वैक्रियकयोगमवलम्ब्य क्रिया तस्य न घटते, आहारकर्धिविक्रियर्द्ध्योर्युगपदवृत्तिविरोधात् अनेन गणधरादिनामितरर्द्धियुगपद्वृत्तिसम्भवो दर्शितः।&lt;br /&gt;
= छट्ठे गुणस्थानमें वैक्रियिक और आहारक शरीरकी क्रिया युगपत् नहीं होती। और योग भी नियमसे एक कालमें एक ही होता है। प्रमत्त विरत षष्ठ गुणस्थानवर्ती मुनिकैं समकालविषैं युगपत् वैक्रियक योगकी क्रिया अर आहारक काययोगकी क्रिया नाहीं। ऐसा नाहीं कि एक ही काल विषैं आहारक शरीरको धारि गमनागमनादि क्रियाकौ करै अर तभी विक्रिया ऋद्धिके बलसे वैक्रियककाययोगको धारि विक्रिया सम्बन्धी कार्यकौ भी करैं। दोऊमें सौ एक ही होइ। यातैं यहू जान्या कि गणधरादिकनिकैं और ऋद्धि युगपत् प्रवर्त्तै तो विरुद्ध नाहीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=106303</id>
		<title>ऋद्धि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=106303"/>
		<updated>2022-12-18T07:49:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;तपश्चरणके प्रभावसे कदाचित् किन्हीं योगीजनोंको कुछ चामत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। उन्हें ऋद्धि कहते हैं। इसके अनेकों भेद-प्रभेद हैं। उन सबका परिचय इस अधिकारमें दिया गया है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;hr width=800 /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[ ऋद्धि#1 | ऋद्धिके भेद-निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ #1.1 | ऋद्धियोंके वर्गीकरणका चित्र]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[ ऋद्धि#1.2 | उपरोक्त भेदों प्रभेदोंके प्रमाण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol &amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;[[ ऋद्धि#2 |  बुद्धि ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;  केवल, अवधि व मनःपर्ययज्ञान ऋद्धियाँ&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/ul&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt; - दे. वह वह नाम&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;   &lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.1 | बुद्धि ऋद्धि सामान्यका लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.2 | बीजबुद्धि निर्देश :]]&lt;br /&gt;
         &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धि का लक्षण&lt;br /&gt;
             &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धिके लक्षण सम्बन्धी दृष्टिभेद&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; बीजबुद्धिकी अचिन्त्य शक्ति व शंका&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.3 | कोष्ठ बुद्धिका लक्षण व शक्ति निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.4 | पादानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेष]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(अनुसारिणी, प्रतिसारिणी व उभयसारिणी)&lt;br /&gt;
         &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.5 | संभिन्न श्रोतृत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;  [[  ऋद्धि#2.6 |दूरास्वादन आदि, पाँच ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
               &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;चतुर्दश पूर्वी व दश पूर्वी - दे. श&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;अष्टांग निमित्तज्ञान - दे. निमित्त २&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.7 | प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व सामान्य व विशेषके लक्षण (औत्पत्तिकी, परिणामिकी, वैनयिकी, कर्मजा)&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकीमें अन्तर&lt;br /&gt;
               &amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि व ज्ञानसामान्यमें अन्तर &lt;br /&gt;
         &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt; प्रत्येक बुद्धि ऋद्धि - दे. बुद्ध&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#2.8 | वादित्व बुद्धि ऋद्धि]]&lt;br /&gt;
     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#3 | विक्रिया ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.1 | विक्रिया ऋद्धि की विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.2 | अणिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.3 | महिमा, गरिमा व लघिमा विक्रिया]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.4 | प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रियाके लक्षण]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.5 | ईशित्व व वशित्व विक्रिया निर्देश]]&lt;br /&gt;
                      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व के लक्षण&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्वमें अन्तर&lt;br /&gt;
                         &amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्वमें विक्रियापना कैसे है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#3.6 | अप्रतिघात, अंतर्धान व काम रूपित्व]]&lt;br /&gt;
       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#4 | चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.1 | चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.2 | चारण ऋद्धिकी विविधता]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.3 | आकाशचारण व आकाशगामित्व]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; आकाशगामित्व ऋद्धिका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण ऋद्धिका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्वमें अन्तर&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.4 | जलचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारणका लक्षण&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धिमें अन्तर&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.5 | जंघा चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.6 | अग्नि, धूम, मेघ, तंतु, वायु व श्रेणी चारण ऋद्धियों का निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.7 | धारा व ज्योतिष चारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#4.8 | फल, पुष्प, बीज व पत्रचारण निर्देश]]&lt;br /&gt;
           &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#5 |  तपऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
           &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.1 | उग्रतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;li&amp;gt; उग्रोग्र तप व अवस्थित उग्रतपके लक्षण&lt;br /&gt;
                   &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	   &amp;lt;ul&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt;उग्रतप ऋद्धिमें अधिकसे अधिक उपवास करनेकी सीमा व तत्सम्बन्धी शंका - दे. प्रोषधोपवास २&amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.2 | घोरतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.3 | घोर पराक्रमतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.4 | घोर ब्रह्मचर्यतप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर व अघोर गुण ब्रह्मचारीके लक्षण&lt;br /&gt;
                           &amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण व घोर पराक्रम तपमें अन्तर&lt;br /&gt;
                       &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#5.5 | दीप्ततप व महातप ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#6 |  बल ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#6.1 | मनोबल, वचनबल व कालबल ऋद्धिके लक्षण]]&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#7 |  औषध ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.1 | औषध ऋद्धि सामान्य]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.2 | आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल व विट औषध]]&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt;उपरोक्त चारोंके लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; आमर्शौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्यमें अन्तर।&lt;br /&gt;
                    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.3 | सर्वौषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#7.4 | आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#8 |  रस ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.1 | आशीर्विष रस ऋद्धि]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(शुभ व अशुभ आशीर्विशके लक्षण)&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#8.2 | दृष्टि विष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि निर्देश]]&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टिविष रस ऋद्धिका लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धिका लक्षण &lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोर ब्रह्मचर्य तप में अन्तर&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; क्षीर, मधु, सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धियोंके लक्षण&lt;br /&gt;
                        &amp;lt;li&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थोंका क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&lt;br /&gt;
                     &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#9 |  क्षेत्र ऋद्धि निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
             &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#9.1 | अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धिके लक्षण]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; [[  ऋद्धि#10 |  ऋद्धि सामान्य निर्देश]]&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.1 | शुभ ऋद्धिकी प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभ ऋद्धियोंकी प्रयत्न पूर्वक ही]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.2 |एक व्यक्तिमें युगपत् अनेक ऋद्धियोंकी सम्भावना]]&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt; [[  ऋद्धि#10.3 | परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं]]&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;परिहार विशुद्धि, आहारक व मनःपर्ययका परस्पर विरोध - दे. परिहारविशुद्धि&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;आहारक व वैक्रियकमें विरोध - दे. ऊपरवाला शीर्षक&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;तैजस व आहारक ऋद्धि निर्देश - दे. वह वह नाम&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;गणधरदेवमें युगपत् सर्वऋद्धियाँ - दे. गणधर&lt;br /&gt;
	&amp;lt;li&amp;gt;साधुजन ऋद्धिका भोग नहीं करते - दे. श्रुतकेवली १/२&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;hr width=&amp;quot;800&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; ऋद्धिके भेद निर्देश&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li id=&amp;quot;1.1&amp;quot; &amp;gt; ऋद्धियोंके वर्गीकरणका चित्र&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads &amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;img src=&amp;quot;C:\Users\DELL\Downloads&amp;quot; alt=&amp;quot;chart&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt; उपरोक्त भेद-प्रभेदोंके प्रमाण&lt;br /&gt;
&amp;lt;dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/१८/५८); ([[सर्वार्थसिद्धि]] अध्याय संख्या  ३/३६/२३०/२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१२); ([[नियमसार]] / [[नियमसार तात्त्पर्यवृत्ति | तात्त्पर्यवृत्ति ]] गाथा संख्या ११२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बुद्धि ऋद्धि सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९६९-९७१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २११/२) (पदानुसारी-[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५) दशपूर्वित्व - ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६९/५) अष्टांग महानिमित्तज्ञान - ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१००२); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या ९/४,१,१४/१९/७२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१४/३) प्रज्ञाश्रमणत्व- ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;विक्रिया सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;(दे. ऊपर क्रिया व विक्रिया दोनोंके भेद) क्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। विक्रिया-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-१०२५); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/५/४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); ([[वसुनन्दि श्रावकाचार]] गाथा संख्या  ५१३)। चारण-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३५,१०४८); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/२१/७९); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०,८८)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;तप सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४९-१०५०); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। उग्रतप-([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७/५)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)। घोरब्रह्मचर्य-([[षट्खण्डागम]] पुस्तक संख्या  ९/४,१/२८-२९/९३-९४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;बल –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६१); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२४/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;औषध –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६७) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;रस सामान्य –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७७); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/४)। आशार्विष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८६/४) दृष्टिविष-([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८७/२)।&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dt&amp;gt;क्षेत्र –:&amp;lt;/dt&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;dd&amp;gt;([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८८); ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/dd&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/dl&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. बुद्धि ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt; बुद्धि ऋद्धि सामान्यका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२२ बुद्धिरवगमो ज्ञान तद्विषया अष्टादशविधा ऋद्धयः।&lt;br /&gt;
= बुद्धि नाम अवगम या ज्ञानका है। उसको विषय करनेवाली १८ ऋद्धियाँ हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; बीजबुद्धि निर्देश&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;li&amp;gt;बीजबुद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७५-९७७ णोइंदियसुदणाणावरणाणं वोरअंतरायाए। तिविहाणं पगदीणं उक्कस्सखउवसमविमुद्धस्स ।९७५। संखेज्जसरूवाणं सद्दाणं तत्थ लिंगसंजुत्तं। एक्कं चिय बीजपदं लद्धूण परोपदेसेण ।९७६। तम्मि पदे आधारे सयलमुदं चिंतिऊण गेण्हेदि। कस्स वि महेसिणो जा बुद्धि सा बीजबुद्धि त्ति ।९७७।&lt;br /&gt;
= नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तराय, इन तीन प्रकारकी प्रकृतियोंके उत्कृष्ट क्षयोपशमसे विशुद्ध हुए किसी भी महर्षिकी जो बुद्धि, संख्यातस्वरूप शब्दोंके बीचमें-से लिंग सहित एक ही बीजभूत पदको परके उपदेशसे प्राप्त करके उस पदके आश्रयसे सम्पूर्ण श्रुतको विचारकर ग्रहण करती है, वह बीजबुद्धि है। ९७५-९७७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२६)। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/२)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६-१; ५९-९ बीजमिव बीजं। जहाबीजं मूलंकुर-पत्त-पोर-क्खंद-पसव-तुस-कुसुम-खीरतं दुलाणमाहारं तहा दुवालसगत्थाहारं जं पदं तं बीजतुल्लत्तादो बीजं। बीजपदविसयमदिणाणं पि बीजं, कज्जे कारणोवचारादो। एसा कुदो होदि। विसिट्ठोग्गहावरणीयक्खओवसमादो। (५९-९)&lt;br /&gt;
= बीजके समान बीज कहा जाता है। जिस प्रकार बीज, मूल, अंकुर, पत्र, पोर, स्कन्ध, प्रसव, तुष, कुसुम, क्षीर और तंदुल आदिकोंका आधार है; उसी प्रकार बारह अंगोंके अर्थका आधारभूत जो पद है वह बीज तुल्य होनेसे बीज है। बीजपद विषयक मतिज्ञान भी कार्यमें कारणके उपचारसे बीज है ।५६।.....यह बीज बुद्धि कहाँसे होती है। वह विशिष्ट अवग्रहावरणीयके क्षयोपशमसे होती है।&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धिके लक्षण सम्बन्धी दृष्टिभेद&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५७/६ बीजपदट्ठिदरपदेसादो हेट्ठिमसुदणाणुप्पत्तीए कारणं होदूण पच्छा उवरिमसुदणाणुप्पत्तिणिमित्ता बीजबुद्धि त्ति के वि आइरिया भणंति। तण्ण घडदे, कोट्ठबुद्धियादिचदुण्हं णाणाणमक्कमेणेक्कम्हि जीवे सव्वदा अणुप्पत्तिप्पसंगादो।.....ण च एक्कम्हि जीवे सव्वदा चदुण्हं बुद्धीण अक्कमेण अणुप्पत्ती चेव।....त्ति सुत्तगाहाए वक्खाणम्मि गणहरदेवाणं चदुरमलबुद्धीणं दंसणादो। किंच अत्थि गणहरदेवेसु चत्तारि बुद्धीओ अण्णहा दुवासंगाणमणुप्पत्तिप्पसंगादो।&lt;br /&gt;
= बीजपदसे अधिष्ठित प्रदेशसे अधस्तनश्रुतके ज्ञानकी उत्पत्तिका कारण होकर पीछे उपरिम श्रुतके ज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित होनेवाली बीज बुद्धि है। (अर्थात् पहले बीजपदके अल्पमात्र अर्थको जानकर, पीछे उसके आश्रय पर विषयका विस्तार करनेवाली बुद्धि बीजबुद्धि है, न कि केवल शब्द-विस्तार ग्रहण करनेवाली) ऐसा कितने ही आचार्य कहते हैं। किन्तु वह घटित नहीं होता। क्योंकि, ऐसा माननेपर कोष्ठबुद्धि आदि चार ज्ञानोंकी (कोष्ठबुद्धि तथा अनुसारी, प्रतिसारी व तदुभयसारी ये तीन पदानुसारीके भेद)। युगपत् एक जीवमें सर्वदा उत्पत्ति न हो सकनेका प्रसंग आवेगा। और एक जीवमें सर्वदा चार बुद्धियोंकी एक साथ उत्पत्ति हो ही नहीं, ऐसा है नहीं क्योंकि - (सात ऋद्धियोंका निर्देश करनेवाली) सूत्रगाथाके व्याख्यानमें (कही गयीं) गणधर देवोंके चार निर्मल बुद्धियाँ देखी जाती हैं। तथा गणधर देवोंके चार बुद्धियाँ होती हैं, क्योंकि उनके बिना (उनके द्वारा) बारह अंगोंकी उत्पत्ति न हो सकनेका प्रसंग आवेगा।&lt;br /&gt;
 &amp;lt;li&amp;gt; बीज बुद्धिकी अचिन्त्य शक्ति व शंका&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,७/५६/३ &amp;quot;संखेज्जसद्दअणंतलिंगेहिं सह बीजपदं जाणंती, बीजबुद्धि त्ति भणिदं होदि। णा बीजबुद्धि अणंतत्थ पडिबद्धअणंतलिंगबीजपदमवगच्छदि, खओसमियत्तादो त्ति। ण खओवसमिएण परोक्खेण सुदणाणेण इत्यादि (देखो केवल भाषार्थ)&lt;br /&gt;
= संख्यात शब्दोंके अनन्त अर्थोंमें सम्बद्ध अनन्त लिंगोंके साथ बीजपदको जाननेवाली बीज बुद्धि है, यह तात्पर्य है। प्रश्न-बीज बुद्धि अनन्त अर्थोंसे सम्बद्ध अनन्त लिंगरूप बीजपदको नहीं जानती, क्योंकि वह क्षायोपशमिक है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, जिस प्रकार क्षयोपशमजन्य परोक्ष श्रुतज्ञानके द्वारा केवलज्ञानसे विषय किये गये अनन्त अर्थोंका परोक्ष रूपसे ग्रहण किया जाता है, उसी प्रकार मतिज्ञानके द्वारा भी सामान्य रूपसे अनन्त अर्थोंको ग्रहण किया जाता है, क्योंकि इसमें कोई विरोध नहीं है। प्रश्न-यदि श्रुतज्ञानका विषय अनन्त संख्या है, तो `चौदह पूर्वीका विषय उत्कृष्ट संख्यात है' ऐसा जो परिकर्ममें कहा है, वह कैसे घटित होगा? उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट, उत्कृष्ट-संख्यातको ही जानता है, ऐसा यहाँ नियम नहीं है। प्रश्न-श्रुतज्ञान समस्त पदार्थोंको नहीं जानता है, क्योंकि, (पदार्थोंके अनन्तवें भाग प्रज्ञापनीय हैं और उसके भी अनन्तवें भाग द्वादशांग श्रुत के विषय हैं) इस प्रकारका वचन है? उत्तर-समस्त पदार्थों का अनन्तवाँ भाग द्रव्यश्रुतज्ञानका विषय भले ही हो, किन्तु भाव श्रुतज्ञानका विषय समस्त पदार्थ हैं; क्योंकि, ऐसा माने बिना तीर्थंकरोंके वचनातिशयके अभावका प्रसंग होगा।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; कोष्ठबुद्धिका लक्षण व शक्तिनिर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९७८-९७९ &amp;quot;उक्कस्सिधारणाए जुत्तो पुरिसो गुरुवएसेणं। णाणाविहगंथेसु वित्थारे लिंगसद्दबीजाणि ।९७८। गहिऊण णियमदीए मिस्सेण विणा धरेदि मदिकोट्ठे। जो कोई तस्स बुद्धी णिद्दिट्ठा कोट्ठबुद्धी त्ति ।९७९।&lt;br /&gt;
= उत्कृष्ट धारणासे युक्त जो कोई पुरुष गुरुके उपदेशसे नाना प्रकारके ग्रन्थोंमें से विस्तारपूर्वक लिंग सहित शब्दरूप बीजोंको अपनी बुद्धिमें ग्रहण करके उन्हें मिश्रणके बिना बुद्धिरूपी कोठेमें धारण करता है, उसकी बुद्धि कोष्ठबुद्धि कही गयी है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/२८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २९२/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,६/५३/७ कोष्ठ्यः शालि-व्रीहि-यव-गोधूमादिनामाधारभूतः कुस्थली पल्यादिः। सा चासेसदव्वपज्जायधारणगुणेण कोट्ठसमाणा बुद्धी कोट्ठो, कोट्ठा च सा बुद्धी च कोट्ठबुद्धी। एदिस्से अल्पधारणकालो जहण्णेण संखेज्जाणि उक्कस्सेण असंखेज्जाणि वसाणि कुदो। `कालमसंखं संखं च धारणा' त्ति सुत्तुवलंभादो। कुदो एदं होदि। धारणावरणीयस्स तिव्वखओवसमेण।&lt;br /&gt;
= शालि, व्रीहि, जौ और गेहूँ आदिके आधारभूत कोथली, पल्ली आदिका नाम कोष्ठ है। समस्त द्रव्य व पर्यायोंको धारण करनेरूप गुणसे कोष्ठके समान होनेसे उस बुद्धिको भी कोष्ठ कहा जाता है। कोष्ठ रूप जो बुद्धि वह कोष्ठबुद्धि है। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,५,४०/२४३/११) इसका अर्थ धारणकाल जघन्यसे संख्यात वर्ष और उत्कर्षसे असंख्यात वर्ष है, क्योंकि, `असंख्यात और संख्यात काल तक धारणा रहती है' ऐसा सूत्र पाया जाता है। प्रश्न-यह कहाँसे होती है? उत्तर-धारणावरणीय कर्मके तीव्र क्षयोपशमसे होता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; पदानुसारी ऋद्धि सामान्य व विशेषके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८०-९८३ बुद्धीविपक्खणाणं पदाणुसारी हवेदि तिविहप्पा। अणुसारी पडिसारी जहत्थणामा उभयसारी ।९८०। आदि अवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय उवरिमगंथं जा गिण्हदि सा मदी हु अणुसारी ।९८१। आदिअवसाणमज्झे गुरूवदेसेण एक्कबीजपदं। गेण्हिय हेट्ठिमगंथं बुज्झदि जा सा च पडिसारी ।९८२। णियमेण अणियमेण य जुगवं एगस्स बीजसद्दस्स। उवरिमहेट्ठिमगंथं जा बुज्झइ उभयसारी सा ।९८३।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/२ पदमनुसरति अनुकुरुते इति पदानुसारी बुद्धिः। बीजबुद्धीए बीजपदमवगंतूण एत्थ इदं एदेसिमक्खराणं लिंगं होदि ण होदि त्ति इहिदूणसयलसुदक्खर-पदाइमवगच्छंती पदाणुसारी। तेहि पदेहिंतो समुप्पज्जमाणं णाणं सुदणाणं ण अक्खरपदविसयं, तेसिमक्खरपदाणं बीजपदंताभावादो। सा च पदाणुसारी अणु-पदितदुभयसारिभेदेण तिविहो।....कुदो एदं होदि। ईहावायावरणीयाणं तिव्वक्खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/६०) - पदका जो अनुसरण या अनुकरण करती है वह पदानुसारी बुद्धि है। बीज बुद्धिसे बीजपदको जानकर, `यहाँ यह इन अक्षरोंका लिंग होता है और इनका नहीं', इस प्रकार विचारकर समस्त श्रुतके अक्षर पदोंको जाननेवाली पदानुसारी बुद्धि है (उन पदोंसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान श्रुतज्ञान है, वह अक्षरपदविषयक नहीं है; क्योंकि, उन अक्षरपदोंका बीजपदमें अन्तर्भाव है। प्रश्न-यह कैसे होती है? उत्तर-ईहावरणीय कर्मके तीव्र क्षयोपशमसे होती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]]  - विचक्षण पुरुषोंकी पदानुसारिणी बुद्धि अनुसारिणी, प्रतिसारिणी और उभयसारिणीके भेदसे तीन प्रकार है, इस बुद्धिके ये यथार्थ नाम हैं ।९८०। जो बुद्धि आदि मध्य अथवा अन्तमें गुरुके उपदेशसे एक बीजपदको ग्रहण करके उपरिम (अर्थात् उससे आगेके) ग्रन्थको ग्रहण करती है वह `अनुसारिणी' बुद्धि कहलाती है ।९८१। गुरुके उपदेशसे आदि मध्य अथवा अन्तमें एक बीजपदको ग्रहण करके जो बुद्धि अधस्तन (पीछे वाले) ग्रन्थको जानती है, वह `प्रतिसारिणी' बुद्धि है ।९८२। जो बुद्धि नियम अथवा अनियमसे एक बीजशब्दके (ग्रहण करनेपर) उपरिम और अधस्तन (अर्थात् उस पदके आगे व पीछेके सर्व) ग्रन्थको एक साथ जानती है वह `उभयसारिणी' बुद्धि है ।९८३।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०१/३०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,८/६०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१२/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;संभिन्नश्रोतृत्वका लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८४-९८६ सोदिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदं गोवंगाणामकम्मम्मि ।९८४। सोदुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणपएसे। संठियणरतिरियाणं बहुविहसद्दे समुट्ठंते ।९८५। अक्खरअणक्खरमए सोदूणं दसदिसासु पत्तेक्कं। जं दिज्जदि पडिवयणं तं चिय संभिण्णसोदित्तं ।९८६।&lt;br /&gt;
= श्रोत्रेन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण, और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्मका उदय होनेपर श्रोत्रेन्द्रियके उत्कृष्ट क्षेत्रसे बाहर दशों दिशाओंमें संख्यात योजन प्रमाण क्षेत्रमें स्थित मनुष्य एवं तिर्यंचोंके अक्षरानक्षरात्मक बहुत प्रकारके उठनेवाले शब्दोंको सुनकर जिससे (युगपत्) प्रत्युत्तर दिया जाता है, वह संभिन्नश्रोतृत्व नामक बुद्धि ऋद्धि कहलाती है।&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६१/४); (सा.चा. २१३/१)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,९/६२/६ कुदो एदं होदि। बहुबहुविहक्खिप्पावरणीयाणं खओवसमेण।&lt;br /&gt;
= यह कहाँसे होता है? बहु, बहुविध और क्षिप्र (मति) ज्ञानावरणीयके क्षयोपशमसे होता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; दूरादास्वादन आदि ऋद्धियोंके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/९८७-९९७/१-जिब्भिंदिय सुदणाणावरणाणं वीयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८७। जिब्भुक्कस्सखिदीदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणं। विविहरसाणं सादं जाणइ दूरसादित्तं ।९८८। २-पासिंदिय सुदणाणावरणाणं वारियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९८९। पासुक्कस्सखिदोदो बाहिं संखेज्जजोयणठियाणिं। अट्ठविहप्पासाणिं जं जाणइ दूरपासत्तं ।९९०। ३-घाणिंदियसुदणाणावरणाणं वीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९१। घाणुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। जं बहुविधगंधाणिं तं घायदि दूरघाणत्तं ।९९२। ४-सोदिंदियसुदणाणावरणाणं बीरियंतरायाए। उक्कस्सक्खउ वसमे उदिदं गोबंगणामकम्मम्मि ।९९३। सोदुक्कस्सखिदोदो बाहिरसंखेज्जजोयणपएसे। चेट्ठंताणं माणुसतिरियाणं बहुवियप्पाणं ।९९४। अक्खरअणक्खरमए बहुविहसद्दे विसेससंजुत्ते। उप्पण्णे आयण्णइ जं भणिअं दूरसवणत्त ।९९५। ५-रूविंदियसुदणाणावरणाणं वीरिअंतराआए। उक्कस्सक्खउवसमे उदिदंगोवंगणामकम्मम्मि ।९९६। रूउक्कस्सखिदीदो बाहिरं संखेज्जजोयणठिदाइं। जं बहुविहदव्वाइं देक्खइ तं दूरदरिसिणं णाम ।९९७।&lt;br /&gt;
= वह वह इन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन तीन प्रकृतियोंके उत्कृष्ट क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्मका उदय होनेपर उस उस इन्द्रियके उत्कृष्ट विषयक्षेत्रसे बाहर संख्यात योजनोंमें स्थित उस उस सम्बन्धी विषयको जान लेना उस उस नामकी ऋद्धि है। यथा-जिह्वा इन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरास्वादित्व', स्पर्शन इन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरस्पर्शत्व', घ्राणेन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरघ्राणत्व', श्रोत्रेन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरश्रवणत्व' और चक्षु रन्द्रियावरणके क्षयोपशमसे `दूरदर्शित्व' ऋद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमणत्व सामान्य व विशेषके लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०१७-१०२१ पयडीए सुदणाणावरणाए वीरयंतरायाए। उक्कस्सक्खउवसमे उप्पज्जइ पण्णसमणद्धी ।१०१७। पण्णासवणर्द्धिजुदो चोद्दस्सपुव्वीसु विसयसुहुमत्तं। सव्वं हि सुदं जाणदि अकअज्झअणो वि णियमेण ।१०१८। भासंति तस्स बुद्धी पण्णासमणद्धी सा च चउभेदा। अउपत्तिअ-परिणामिय-वइणइकी-कम्मजा णेया ।१०१९। भवंतर सुदविणएणं समुल्लसिदभावा। णियणियजादिविसेसे उप्पण्णा पारिणामिकी णामा ।१०२०। वइणइकी विणएणं उप्पज्जदि बारसंगसुदजोग्गं। उवदेसेण विणा तवविसेसलाहेण कम्मजा तुरिमा ।१०२१।&lt;br /&gt;
= श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर `प्रज्ञाश्रमण' ऋद्धि उत्पन्न होती है। प्रज्ञाश्रमण ऋद्धिसे युक्त जो महर्षि अध्ययनके बिना किये ही चौदहपूर्वोंमें विषयकी सूक्ष्मताको लिए हुए सम्पूर्ण श्रुतको जानता है और उसको नियमपूर्वक निरूपण करता है उसकी बुद्धिको प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि कहते हैं। वह औत्पत्तिकी, पारिणामिकी, वैनयिकी और कर्मजा, इन भेदोंसे चार प्रकारकी जाननी चाहिए ।१०१७-१०१९। इनमें-से पूर्व भवमें किये गये श्रुतके विनयसे उत्पन्न होनेवाली औत्पत्तिकी (बुद्धि है) ।१०२०।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/२२/८२ विणएण सुदमधीदं किह वि पमादेण होदि विस्सरिदं। तमुवट्ठादि परभवे केवलणाणं च आहवदि ।२२। - एसो उप्पत्तिपण्णसमणो छम्मासोपवासगिलाणो वि तब्बुद्धिमाहप्पजाणावणट्ठ पुच्छावावदचोद्दसपुव्विस्स विउत्तरबाहओ।&lt;br /&gt;
= विनयसे अधीत श्रुतज्ञान यदि किसी प्रकार प्रमादसे विस्मृत हो जाता है तो उसे वह परभवमें उपस्थित करती है और केवलज्ञानको बुलाती है ।२२। यह औत्पत्तिकी प्रज्ञाश्रमण छह मासके उपवाससे कृश होता हुआ भी उस बुद्धिके माहात्म्यको प्रकट करनेके लिए पूछने रूप क्रियामें प्रवृत्त हुए चौदहपूर्वीको भी उत्तर देता है। निज-निज जाति विशेषोंमें उत्पन्न हुई बुद्धि `पारिणामिकी' है, द्वादशांग श्रुतके योग्य विनयसे उत्पन्न होनेवाली `वैनयिकी' और उपदेशके बिना ही विशेष तपकी प्राप्तिसे आविर्भूत हुई चतुर्थ `कर्मजा' प्रज्ञाश्रमण ऋद्धि समझना चाहिए ।१०२०-१०२१।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८१/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२१६/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/१ उसहसेणादीणं-तित्थयरवयणविणिग्गयबीजपदट्ठावहारयाणं पण्णाए कत्थं तब्भावो। पारिणामियाए, विणय-उप्पत्तिकम्मेहि विणा उप्पत्तीदो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-तीर्थंकरोंके मुखसे निकले हुए बीजपदोंके अर्थका निश्चय करनेवाले वृषभसेनादि गणधरोंकी प्रज्ञाका कहाँ अन्तर्भाव होता है? उत्तर-उसका पारिणामिक प्रज्ञामें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, वह विनय, उत्पत्ति और कर्मके बिना उत्पन्न होती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; पारिणामिकी व औत्पत्तिकीमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८३/२ पारिणामिय-उप्पत्तियाणं को विसेसो। जादि विसेसजणिदकम्मक्खओवसमुप्पण्णा पारिणामिया, जम्मंतरविणयजणिदसंसकारसमुप्पण्णा अउप्पत्तिया, त्ति अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-पारिणामिकी और औत्पत्तिकी प्रज्ञामें क्या भेद है? उत्तर-जाति विशेषमें उत्पन्न कर्म क्षयोपशमसे आविर्भूत हुई प्रज्ञा पारिणामिकी है, और जन्मान्तरमें विनयजनित संस्कारसे उत्पन्न प्रज्ञा औपपत्तिकी है, यह दोनोंमें विशेष है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; प्रज्ञाश्रमण बुद्धि और ज्ञान सामान्यमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१८/८४/२ पण्णाए णाणस्स य को विसेसो णाणहेदुजीवसत्ती गुरूवएसणि रवेक्खा पण्णा णाम, तक्कारियं णाणं। तदो अत्थि भेदो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-प्रज्ञा और ज्ञानके बीच क्या भेद है? उत्तर-गुरुके उपदेशसे निरपेक्ष ज्ञानकी हेतुभूत जीवकी शक्तिका नाम प्रज्ञा है, और उसका कार्य ज्ञान है; इस कारण दोनोंमें भेद है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;2.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;वादित्वका लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२३ सक्कादीणं वि पक्खं बहुवादेहिं णिरुत्तरं कुणदि। परदव्वाइं गवेसइ जीए वादित्तरिद्धी सा ।१०२३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके द्वारा शक्रादिके पक्षको भी बहुत वादसे निरुत्तर कर दिया जाता है और परके द्रव्योंकी गवेषणा (परीक्षा) करता है (अर्थात् दूसरोंके छिद्र या दोष ढूँढता है) वह वादित्व ऋद्धि कहलाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१७/५)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; विक्रिया ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;विक्रिया ऋद्धिकी विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२४-२५, १०३३ अणिमा-महिमा-लघिमा-गरिमा-पत्ती-य तह अ पाकम्मं। ईसत्तवसित्तताइं अप्पडिघादंतधाणाच ।१०२४। रिद्धी हु कामरूवा एवं रूवेहिं विविहभेएहिं। रिद्धी विकिरिया णामा समणाणं तवविसेसेणं ।१०२५। दुविहा किरियारिद्धी णहयलगामित्तचारणत्तेहिं ।१०३३।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५,४ अणिमा महिमा लहिमा पत्ती पागम्यं ईसित्तं वसित्तं कामरूवित्तमिदि विउव्वणमट्ठविहं।....एत्थ एगसंजोगादिणा विसदपंचवंचासविउव्वणभेदा उप्पाएदव्वा, तइक्कारणस्स वडचित्तयत्तादो (पृ. ७६/६)।&lt;br /&gt;
= अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, अप्रतिघात, अन्तर्धान और कामरूप इस प्रकारके अनेक भेदोंसे युक्त विक्रिया नामक ऋद्धि तपोविशेषसे श्रमणोंको हुआ करती है। [[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ....([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/१); (व.सु.श्रा. ५१३)। नभस्तलगामित्व और चारणत्वके भेदसे `क्रियाऋद्धि' दो प्रकार है। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)। अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, और कामरूपित्व - इस प्रकार विक्रिया ऋद्धि आठ प्रकार है। यहाँ एकसंयोग, द्विसंयोग आदिके द्वारा २५५ विक्रियाके भेद उत्पन्न करना चाहिए, क्योंकि, उनके कारण विचित्र हैं। एकसंयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = ८; और अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५&lt;br /&gt;
(विशेष देखो गणित II/४)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अणिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२६ अणुतणुकरणं अणिमा अणुछिद्दे पविसिदूण तत्थेव। विकरदि खंदावारं णिएसमविं चक्कवट्टिस्स ।१०२६।&lt;br /&gt;
= अणुके बराबर शरीरको करना अणिमा ऋद्धि है। इस ऋद्धिके प्रभावसे महर्षि अणुके बराबर छिद्रमें प्रविष्ट होकर वहाँ ही, चक्रवर्तीके कटक और निवेशकी विक्रिया द्वारा रचना करता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३४) ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; महिमा गरिमा व लघिमा विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२७ मेरूवमाण देहा महिमा अणिलाउ लहुत्तरो लहिमा। वज्जाहिंतो गुरुवत्तणं च गरिमं त्ति भणंति ।१०२७।&lt;br /&gt;
= मेरुके बराबर शरीरके करनेको महिमा, वायुसे भी लघु (हलका) शरीर करनेको लघिमा और वज्रसे भी अधिक गुरुतायुक्त (भारी) शरीरके करनेको गरिमा ऋद्धि कहते हैं।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/५); (च.सा. २१९/२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;प्राप्ति व प्राकाम्य विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०२८-१०२९ भूमोए चेट्ठंतो अंगुलिअग्गेण सूरिससिपहुदिं। मेरुसिहराणि अण्णं जं पावदि पत्तिरिद्धी सा ।१०२८। सलिले वि य भूमीए उन्मज्जणिमज्जणाणि जं कुणदि। भूमीए वि य सलिले गच्छदि पाकम्मरिद्धी सा ।१०२९।&lt;br /&gt;
= भूमिपर स्थित रहकर अंगुलिके अग्रभागसे सूर्य-चन्द्रादिकको, मेरुशिखरोंको तथा अन्य वस्तुको प्राप्त करना यह प्राप्ति ऋद्धि है ।१०२८। जिस ऋद्धिके प्रभावसे जलके समान पृथिवीपर उन्मज्जन-निमज्जन क्रियाको करता है और पृथिवीके समान जलपर भी गमन करता है वह प्राकाम्य ऋद्धि है ।१०२९।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७५/७ भूमिट्ठियस्स करेण चदाइच्चदबिंबच्छिवणसत्ती पत्ती णाम। कुलसेलमेरुमहीहर भूमीणं बाहमकाऊण तासु गमणसत्ती तवच्छरणबलेणुप्पणा पागम्मं णाम।&lt;br /&gt;
= (प्राप्तिका लक्षण उपरोक्तवत् ही है) - कुलाचल और मेरुपर्वतके पृथिवीकायिक जीवोंको बाधा न पहुँचाकर उनमें, तपश्चरणके बलसे उत्पन्न हुई गमनशक्तिको प्राकाम्य ऋद्धि कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/४ अनेकजातिक्रियागुणद्रव्याधीनं स्वाङ्गाद् भिन्नमभिन्नं च निर्माणं प्राकाम्यं सैन्यादिरूपमिति केचित्।&lt;br /&gt;
= कोई-कोई आचार्य; अनेक तरहकी क्रिया गुण वा द्रव्यके आधीन होनेवाले सेना आदि पदार्थोंको अपने शरीरसे भिन्न अथवा अभिन्न रूप बनानेकी शक्ति प्राप्त होनेको प्राकाम्य कहते हैं।&lt;br /&gt;
(विशेष दे. वैक्रियक ।१। पृथक् व अपृथक्विक्रिया)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रिया&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३० णिस्सेसाण पहुत्तं जगाण ईसत्तणामरिद्धी सा। वसमेंति तवबलेणं जं जीओहा वसित्तरिद्धी सा ।१०३०।&lt;br /&gt;
= जिससे सब जगत् पर प्रभुत्व होता है, वह ईशित्वनामक ऋद्धि है और जिससे तपोबल द्वारा जीव समूह वशमें होते हैं, वह वशित्व ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/४) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/५)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/२ सव्वेसिं जीवाणं गामणयरखेडादीणं च भुंजणसत्ती समुप्पण्णा ईसित्तं णाम। माणुस-मायंग-हरि-तुरयादीणं सगिच्छाए विउव्वणसत्ती वसित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= सब जीवों तथा ग्राम, नगर, एवं खेडे आदिकोंके भोगनेकी जो शक्ति उत्पन्न होती है वह ईशित्व ऋद्धि कही जाती है। मनुष्य, हाथी, सिंह एवं घोड़े आदिक रूप अपनी इच्छासे विक्रिया करनेकी (अर्थात् उनका आकार बदल देनेकी) शक्तिका नाम वशित्व है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; ईशित्व व वशित्व विक्रियामें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/३ ण च वसित्तस्स ईसित्तिम्म पवेसो, अवसाणं पि हदाकारेण ईसित्तकरणुवलंभादो।&lt;br /&gt;
= वशित्वका ईशित्व ऋद्धिमें अन्तर्भाव नहीं हो सकता; क्योंकि, अवशीकृतोंका भी उनका आकार नष्ट किये बिना ईशित्वकरण पाया जाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;. ईशित्व व वशित्वमें विक्रियापना कैसे है?&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/५ ईसित्तवसित्ताणं कधं वेउव्विवत्तं। ण, विविहगुणइड्ढिजुत्तं वेउव्वियमिदि तेसिं वेउव्वियत्ताविरोहादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-ईशित्व और वशित्वके विक्रियापना कैसे सम्भव है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, नाना प्रकार गुण व ऋद्धि युक्त होनेका नाम विक्रिया है, अतएव उन दोनोंके विक्रियापनेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;3.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अप्रतिघात अन्तर्धान व कामरूपित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३१-१०३२ सेलसिलातरुपमुहाणब्भंतरं होइदूण गमणं व। जं वच्चदि सा ऋद्धी अप्पडिघादेत्ति गुणणामं ।१०३१। जं हवदि अद्दिसत्तं अंतद्धाणाभिधाणरिद्धी सा। जुगवें बहुरूवाणि जं विरयदि कामरूवरिद्धी सा ।१०३२।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे शैल, शिला और वृक्षादिके मध्यमें होकर आकाशके समान गमन किया जाता है, वह सार्थक नामवाली अप्रतिघात ऋद्धि है ।१०३१। जिस ऋद्धिसे अदृश्यता प्राप्त होती है, वह अन्तर्धाननामक ऋद्धि है; और जिससे युगपत् बहुत-से रूपोंको रचता है, वह कामरूप ऋद्धि है ।१०३२।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१९/६)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१५/७६/४ इच्छिदरूवग्गहणसत्ती कामरूवित्तं णाम।&lt;br /&gt;
= इच्छित रूपके ग्रहण करनेकी शक्तिका नाम कामरूपित्व है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;चारण व आकाशगामित्व ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/७ चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो एयट्ठो तह्मि कुसलो णिउणो चारणो।&lt;br /&gt;
= चरण, चारित्र, संजम, पापक्रियानिरोध इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण हैं वे चारण कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; चारण ऋद्धिकी विविधता&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३४-१०३५, १०४८ &amp;quot;चारणरिद्धी बहुविहवियप्पसंदोह वित्थरिदा ।१०३४। जलजंधाफलपुप्फं पत्तग्गिसिहाण धूममेधाणं। धारामक्कडतंतूजोदीमरुदाण चारणा कमसो ।१०३५। अण्णो विविहा भंगा चारणरिद्धीए भाजिदा भेदा। तां सरूवंकहणे उवएसो अम्ह उच्छिण्णो ।१०४८।&lt;br /&gt;
= चारण ऋद्धि क्रमसे जलचारण, जंघाचारण, फलचारण, पुष्पचारण, पत्रचारण, अग्निशिखाचारण, धूमचारण, मेघचारण, धाराचारण, मर्कटतन्तुचारण, ज्योतिषचारण और मरुच्चारण इत्यादि अनेक प्रकारके विकल्प समूहोंसे विस्तारको प्राप्त हैं ।१०३४-१०३५। इस चारण ऋद्धिके विविध भंगोंसे युक्त विभक्त किये हुए और भी भेद होते हैं। परन्तु उनके स्वरूपका कथन करनेवाला उपदेश हमारे लिए नष्ट हो चुका है ।१०४८।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/पृ. ७८/१० तथा पृ. ८०/६ जल-जंघ-तंतु-फल-पुप्फ-बीय-आयास-सेडीभेएण अट्ठविहा चारणा। उत्तं च (गा.सं. २१)।७८-१०। चारणाणमेत्थ एगसंजोगादिकमेण विसदपंचपंचासभागा उप्पाएदव्वा। कधमेगं चारित्तं विचित्तसत्तिमुप्पाययं। ण परिणामभेएण णाणाभेदभिण्णचारित्तादो चारणबहुत्तं पडि विरोहाभावादो। कधं पुण चारणा अट्ठविहा त्ति जुज्जदे ण एस दोसो, णियमाभावादो, विसदपंचवंचासचारणाणं अट्ठविहचारणेहिंतो एयंतेण पुधत्ताभावादो च।&lt;br /&gt;
= जल, जंघा, तन्तु, फल, पुष्प, बीज, आकाश और श्रेणीके भेदसे चारण ऋद्धि धारक, आठ प्रकार हैं। कहा भी है। (गा. नं. २१ में भी यही आठ भेद कहे हैं।) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१।) यहाँ चारण ऋषियोंके एक संयोग, दो संयोग आदिके क्रमसे २५५ भंग उत्पन्न करना चाहिए। एक संयोगी = ८; द्विसंयोगी = २८; त्रिसंयोगी = ५६; चतुःसंयोगी = ७०; पंचसंयोगी = ५६; षट्संयोगी = २८; सप्तसंयोगी = २८; अष्टसंयोगी = १। कुल भंग = २५५। (विशेष दे. गणित II/४) प्रश्न-एक ही चारित्र इन विचित्र शक्तियोंका उत्पादक कैसे हो सकता है? उत्तर-नहीं, क्योंकि परिणामके भेदसे नाना प्रकार चारित्र होनेके कारण चारणोंकी अधिकतामें कोई विरोध नहीं है। प्रश्न-जब चारणोंके भेद २५५ हैं तो फिर उन्हें आठ प्रकार का बतलाना कैसे युक्त है? उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, उनके आठ होनेका कोई नियम नहीं है। तथा २५५ चारण आठ प्रकार चारणोंसे पृथक् भी नहीं है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;. &amp;lt;b&amp;gt;आकाशचारण व आकाशगामित्व&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
   &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;आकाशगामित्व ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३३-१०३४.....। अट्ठीओ आसीणो काउसग्गेण इदरेण ।१०३३। गच्छेदि जीए एसा रिद्धी गयणगामिणी णाम ।१०३४।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके द्वारा कायोत्सर्ग अथवा अन्य प्रकारसे ऊर्ध्व स्थित होकर या बैठकर जाता है वह आकाशगामिनी नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/३१ पर्यङ्कावस्था निषण्णा वा कायोत्सर्ग शरीरा वा पादोद्धारनिक्षेपणविधिमन्तरेण आकाशगमनकुशला आकाशगामिनः।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= पर्यङ्कासनसे बैठकर अथवा अन्य किसी आसनसे बैठकर या कायोत्सर्ग शरीरसे [पैरोंको उठाकर रखकर (धवला)] तथा बिना पैरोंको उठाये रखे आकाशमें गमन करनेमें जो कुशल होते हैं, वे आकाशगामी हैं।&lt;br /&gt;
([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/५); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/४)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/५ आगासे जहिच्छाए गच्छंता इच्छिदपदेसं माणुसुत्तरं पव्वयावरुद्धं आगासगामिणो त्ति घेतव्वो। देवविज्जाहरणं णग्गहणं जिणसद्दणुउत्तीदो।&lt;br /&gt;
= आकाशमें इच्छानुसार मानुषोत्तर पर्वतसे घिरे हुए इच्छित प्रदेशोंमें गमन करनेवाले आकाशगामी हैं, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। यहाँ देव व विद्याधरोंका ग्रहण नहीं है, क्योंकि `जिन' शब्दकी अनुवृत्ति है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०/२ चउहि अंगुलेहिंतो अहियपमाणेण भूमीदो उवरि आयासे गच्छंतो आगासचारणं णाम।&lt;br /&gt;
= चार अंगुलसे अधिक प्रमाणमें भूमिसे ऊपर आकाशमें गमन करनेवाले ऋषि आकाशचारण कहे जाते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; आकाशचारण व आकाशगामित्वमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१९/८४/६ &amp;quot;आगासचारणाणमागासगामीणं च को विसेसो। उच्चदे-चरणं चारित्तं संजमो पावकिरियाणिरोहो त्ति एयट्ठो, तह्मि कुसलो णिउणो चारणो। तवविसेसेण जणिदआगासट्ठियजीव(-वध) परिहरणकुसलत्तणेण सहिदो आगासचारणो। आगासगमणमेत्तजुत्तो आगासगामी। आगासगामित्तादो जीववधपरिहरणकुसलत्तणेण विसेसिदआगासगामित्तस्स विसेसुवलंभादो अत्थि विसेसो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-आकाशचारण और आकाशगामीके क्या भेद हैं? उत्तर-चरण, चारित्र, संयम व पापक्रिया निरोध, इनका एक ही अर्थ है। इसमें जो कुशल अर्थात् निपुण है वह चारण कहलाता है। तप विशेषसे उत्पन्न हुई, आकाशस्थित जीवोंके (वधके) परिहारकी कुशलतासे जो सहित है वह आकाशचारण है। और आकाशमें गमन करने मात्रसे आकाशगामी कहलाता है। (अर्थात् आकाशगामीको जीववध परिहारकी अपेक्षा नहीं होती)। सामान्य आकाशगामित्वकी अपेक्षा जीवोंके वध परिहारकी कुशलतासे विशेषित आकाशगामित्वके विशेषता पायी जानेसे दोनोंमें भेद हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जलचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारणका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-३; ८१-७ तत्थ भूमीए इव जलकाइयजीवाणं पीडमकाऊण जलमफुसंता जहिच्छाए जलगमणसत्था रिसओ जलचारणा णाम। पउणिपत्तं व जलपासेण विणा जलमज्झगामिणो जलचारणा त्ति किण्ण उच्चंति। ण एस दोसो, इच्छिज्जमाणत्तादो ।७९-३। ओसकखासधूमरोहिमादिचारणाणं जलचारणेसु अंतब्भावो, आउक्काइयजीवपरिहरणकुशलत्तं पडि साहम्मदंसणादो ।८१-७।&lt;br /&gt;
= जो ऋषि जलकायिक जीवोंको बाधा न पहुँचाकर जलको न छूते हुए इच्छानुसार भूमिके समान जलमें गमन करनेमें समर्थ हैं, वे जलचारण कहलाते हैं। (जलपर भी पादनिक्षेपपूर्वक गमन करते हैं)। प्रश्न-पद्मिनीपत्रके समान जलको न छूकर जलके मध्यमें गमन करनेवाले जलचारण क्यों नहीं कहलाते? उत्तर-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा अभीष्ट है। ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३६) ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२८) ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/२)। ओस, ओला, कुहरा और बर्फ आदि पर गमन करनेवाले चारणोंका जलचारणोंमें अन्तर्भाव होता है। क्योंकि, इनमें जलकायिक जीवोंके परिहारकी कुशलता देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; जलचारण व प्राकाम्य ऋद्धिमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७१/५ जलचारण-पागम्मरिद्धीणं दोण्हं को विसेसो। घणपुढवि-मेरुसायराणमंतो सव्वसरीरेण पवेससत्ती पागम्मं णाम। तत्थ जीवपरिहरणकउसल्लं चारणत्तं।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-जलचारण और प्राकाम्य इन दोनों ऋद्धियोंमें क्या विशेषता है? उत्तर-सघन पृथिवी, मेरु और समुद्रके भीतर सब शरीरसे प्रवेश करनेकी शक्तिको प्राकाम्यऋद्धि कहते हैं, और यहाँ जीवोंके परिहारकी कुशलताका नाम चारण ऋद्धि है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; जंघाचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  १०३७ चउरंगुलमेत्तमहिं छंडिय गयणम्मि कुडिलजाणु व्रिणा। जं बहुजोयणगमणं सा जंघाचारणा रिद्धी ।१०३७।&lt;br /&gt;
= चार अंगुल प्रमाण पृथिवीको छोड़कर आकाशमें घुटनोंको मोड़े बिना (या जल्दी जल्दी जंघाओंको उत्क्षेप निक्षेप करते हुए-[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) जो बहुत योजनों तक गमन करना है, वह जंघाचारण ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/३)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९/७; ८१/४ भूमीए पुढविकाइयजीवाणं बाहमकाऊण अणेगजोयणसयगामिणो जंघाचारणा णाम ।७९-७।....चिक्खल्लछारगोवर-भूसादिचारणाणं जंघाचारणेसु अंतब्भावो, भूमीदो चिक्खलादीणं कधंचि भेदाभावादो ।८१-४।&lt;br /&gt;
= भूमिमें पृथिवीकायिक जीवोंको बाधा न करके अनेक सौ योजन गमन करनेवाले जंघाचारण कहलाते हैं।....कीचड़ भस्म, गोबर और भूसे आदि परसे गमन करनेवालोंका जंघाचारणोंमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, भूमिसे कीचड़ आदिमें कथंचित् अभेद है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; अग्नि, धूम, मेघ, तन्तु, वायु व श्रेणी चारण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४१-१०४३, १०४५, १०४७ अविराहिदूण जोवे अग्निसिहालंठिए विचित्ताणं। जं ताण उवरि गमणं अग्निसिहाचारणा रिद्धी ।१०४१। अधउड्ढतिरियपसरं धूमं अवलंबिऊण जं देंति। पदखेवे अक्खलिया सा रिद्धी धूमचारणा णाम ।१०४२। अविरा `हदूणजीवे अपुकाए बहुविहाण मेघाणं। जं उवरि गच्छिइ मुणी सा रिद्धी मेघचारणाणाम ।१०४३। मक्कडयतंतुपंतीउवरिं अदिलघुओ तुरदपदखेवे। गच्छेदि मुणिमहेसी सा मक्कडतंतुचारणा रिद्धी ।१०४५। णाणाविहगदिमारुदपदेसपंतीसु देंति पदखेवे। जं अक्खलिया मुणिणो सा मारुदचारणा रिद्धी ।१०४७।&lt;br /&gt;
= अग्निशिखामें स्थित जीवोंकी विराधना न करके उन विचित्र अग्नि-शिखाओं परसे गमन करनेको `अग्निशिखा चारण' ऋद्धि कहते हैं ।१०४१। जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनिजन नीचे ऊपर और तिरछे फैलनेवाले धुएँका अवलम्बन करके अस्खलित पादक्षेप देते हुए गमन करते हैं वह `धूमचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४२। जिस ऋद्धिसे मुनि अप्कायिक जीवोंको पीड़ा न पहुँचाकर बहुत प्रकारके मेघोंपरसे गमन करता है वह `मेघचारण' नामक ऋद्धि है ।१०४३। जिसके द्वारा मुनि महर्षि शीघ्रतासे किये गये पद-विक्षेपमें अत्यन्त लघु होते हुए मकड़ीके तन्तुओंकी पंक्तिपरसे गमन करता है, वह `मकड़ीतन्तुचारण' ऋद्धि है ।१०४५। जिसके प्रभावसे मुनि नाना प्रकारकी गतिसे युक्त वायुके प्रदेशोंकी पंक्ति परसे अस्खलित होकर पदविक्षेप करते हैं; वह `मारुतचारण' ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०२/२७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २१८/१)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/८०-१; ८१-८ धूमग्गि-गिरि-तरु-तंतुसंताणेसु उड्ढारोहणसत्तिसंजुत्ता सेडीचारणा णाम ।८०-१।.....धूमग्गिवाद-मेहादिचारणाणं तंतु-सेडिचारणेसु अंतब्भाओ, अणुलोमविलोमगमणेसु जीवपीडा अकरणसत्तिसंजुत्तादो।&lt;br /&gt;
= धूम, अग्नि, पर्वत, और वृक्षके तन्तु समूह परसे ऊपर चढ़नेकी शक्तिसे संयुक्त `श्रेणी चारण' है। .....धूम, अग्नि, वायु और मेघ आदिकके आश्रयसे चलनेवाले चारणोंका `तन्तु-श्रेणी' चारणोंमें अन्तर्भाव हो जाता है, क्योंकि, वे अनुलोम और प्रतिलोम गमन करनेमें जीवोंको पीड़ा न करनेकी शक्तिसे संयुक्त हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; धारा व ज्योतिष चारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०४४,१०४६ अविराहिय तल्लीणे जीवे घणमुक्कवारिधाराणं। उवरिं जं जादि मुणी सा धाराचारणा ऋद्धि ।१०४४। अघउड्ढतिरियपसरे किरणे अविलंबिदूण जोदीणं। जं गच्छेदि तवस्सी सा रिद्धी जोदि-चारणा णाम ।१०४६।&lt;br /&gt;
= जिसके प्रभावसे मुनि मेघोंसे छोड़ी गयी जलधाराओंमें स्थित जीवोंको पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपरसे जाते हैं, वह धारा चारण ऋद्धि है ।१०४४। जिससे तपस्वी नीचे ऊपर और तिरछे फैलनेवाली ज्योतिषी देवोंके विमानोंकी किरणोंका अवलम्बन करके गमन करता है वह ज्योतिश्चारण ऋद्धि है ।१०४६। (इन दोनोंका भी पूर्व वाले शीर्षकमें दिये धवला ग्रन्थके अनुसार तन्तु श्रेणी ऋद्धिमें अन्तर्भाव हो जाता है।)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; फल पुष्प बीज व पत्रचारण निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०३८-१०४० अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बणप्फलाण विविहाणं। उवरिम्मि जं पधावदि स च्चिय फलचारणा रिद्धी ।१०३८। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पुप्फाणं। उवरिम्मि जं पसप्पदि सा रिद्धो पुप्फचारणा णाम ।१०३०। अविराहिदूण जीवे तल्लीणे बहुविहाण पत्ताण। जा उवरि वच्चदि मुणी सा रिद्धी पत्तचारणा णामा ।१०३९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिका धारक मुनि वनफलोंमें, फूलोंमें, तथा पत्तोंमें रहनेवाले जीवोंकी विराधना न करके उनके ऊपरसे जाता है वह फलचारण, पुष्पचारण तथा पत्रचारण नामक ऋद्धि है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,१७/७९-७; ८१-५ तंतुफलपुप्फबीजचारणाणं पि जलचारणाणं व वत्तव्वं ।७९-७।.....कुंथुद्देही-मुक्कण-पिपीलियादिचारणाणं फलचारणेसु अंतब्भावो, तस जीवपरिहरणकुसलत्तं पडि भेदाभावादो। पत्तंकुरत्तण पवालादिचारणाणं पुप्फचारणेसु अंतब्भावो, हरिदकायपरिहरणकुसलत्तेण साहम्मादो ।८१/५।&lt;br /&gt;
= तन्तुचारण, फलचारण, पुष्पचारण और बीजचारणका स्वरूप भी जलचारणोंके समान कहना चाहिए (अर्थात् उनमें रहने वाले जीवोंको पीड़ा न पहुँचाकर उनके ऊपर गमन करना) ।७९-७।....कुंथुजीव, मुत्कण, और पिपीलिका आदि परसे संचार करनेवालोंका फलचारणोंमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, इनमें त्रसजीवोंके परिहारकी कुशलताकी अपेक्षा कोई भेद नहीं है ।। पत्र, अंकुर, तृण और प्रवाल आदि परसे संचार करनेवालोंका पुष्पचारणोंमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि, हरितकाय जीवोंके परिहारकी कुशलताकी अपेक्षा इनमें समानता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तपऋद्धि निर्देशs&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; उग्रतपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२२/८७-५; ८९-६ उग्गतवा दुविहा उग्गुग्गतवा अवट्ठिदुग्गतवा चेदि। तत्थ जो एक्कोववासं काऊण पारिय दो उववासो करेदि, पुणरवि पारिय तिण्णि उववासे करेदि। एवमेगुत्तरवड्डीए जाव जीविदं तं तिगुत्तिगुत्तो होदूण उववासे करेंतो उग्गगतवो णाम। एदस्सुववास पारणाणयणे सुत्तं-&amp;quot;उत्तरगुणिते तु धने पुनरप्यष्टापितेऽत्र गुणमादिम्। उत्तरविशेषितं वर्ग्गितं च योज्यान्येन्मूलम् ।२३। इत्यादि....तत्थ दिक्खट्ठेमेगोववासं काऊण पारिय पुणो-एक्कहंतरेण गच्छंतस्स किंचिणिमित्तेण छट्ठोववासो जादो। पुणो तेण छट्ठोववासेण विहरंतस्स अट्ठमोववासो जादो। एवं दसमदुवालसादिक्कमेण हेट्ठा ण पदंतो जाव जीविदंतं जो विहरदि अवट्ठिदुग्गतवो णाम। एदं पि तवोविहाणं वीरियंतराइयक्खओवसमेण होदि।&lt;br /&gt;
= उग्रतप ऋद्धिके धारक दो प्रकार हैं-उग्रोग्रतप ऋद्धि धारक और अवस्थितउग्रतप ऋद्धि धारक। उनमें जो एक उपवासको करके पारणा कर दो उपवास करता है, पश्चात् फिर पारणा कर तीन उपवास करता है। इस प्रकार एक अधिक वृद्धिके साथ जीवन पर्यन्त तीन गुप्तियोंसे रक्षित होकर उपवास करनेवाला `उग्रोग्रतप' ऋद्धिका धारक है। इसके उपवास और पारणाओंका प्रमाण लानेके लिए सूत्र-(यहाँ चार गाथाएँ दी हैं जिनका भावार्थ यह है कि १४ दिन में १० उपवास व ४ पारणाएँ आते हैं। इसी क्रमसे आगे भी जानना) ([[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५०-१०५१) दीक्षाके लिए एक उपवास करके पारणा करे, पश्चात् एक दिनके अंतरसे ऐसा करते हुए किसी निमित्तसे षष्टोपवास (बेला) हो गया। फिर (पूर्वाक्तवत् ही) उस षष्ठोपवाससे विहार करनेवाले के (कदाचित्) अष्टमोपवास (तेला) हो गया। इस प्रकार दशमद्वादशम आदि क्रमसे नीचे न गिरकर जो जीवन पर्यन्त विहार करता है, वह अवस्थित उग्रतप ऋद्धिका धारक कहा जाता है। यह भी तपका अनुष्ठान वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे होता है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/८); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२०/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर तपऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५५ जलसूलप्पमुहाणं रोगेणच्चंतपीडिअंगा वि। साहंति दुर्द्ध रतवं जोए सा घोरतवरिद्धी ।१०५५।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२६/९२/२ उववासेसुछम्मासोववासो, अवमोदरियासु एक्ककवलो उत्तिपरिसंखासु चच्चरे गोयराभिग्गहो, रसपरिच्चाग्गेसु उण्हजलजुदोयणभोयणं, विवित्तसयणासणेसु वय-वग्घ-तरच्छ-छवल्लादिसावयसेवियासुसज्झविज्झुडईसु णिवासो, कायकिलेसेसुतिव्वहिमवासादिणिवदंतविसएसु अब्भोकासरुक्खमूलादावणजोगग्गहणं। एवमब्भंतरतवेसु वि उक्कट्ठतवपरूवणा कायव्वा। एसो बारह विह वि तवो कायरजणाणं सज्झसजणणो त्ति घोरत्तवो। सो जेसिं ते घोरत्तवा। बारसविहतवउक्कट्ठवट्ठाए वट्टमाणा घोरतवा त्ति भणिद होदि। एसा वि तवजणिदरिद्धी चेव, अण्णहा एवं विहाचरणाणुववत्तीदो।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) जिस ऋद्धिके बलसे ज्वर और शूलादिक रोगसे शरीरके अत्यन्त पीड़ित होने पर भी साधुजन दुर्द्धर तपको सिद्ध करते हैं, वह घोर तपऋद्धि है ।१०५५। उपवासोंमें छह मासका उपवासः अवमोदर्य तपोंमें एक ग्रास; वृत्तिपरिसंख्याओंमें चौराहेमें भिक्षाकी प्रतिज्ञा; रसपरित्यागोंमें उष्ण जल युक्त ओदनका भोजन; विविक्तशय्यासनोंमें वृक, व्याघ्र, तरक्ष, छवल्ल आदि श्वापद अर्थात् हिंस्रजीवोंसे सेवित सह्य, विन्ध्य आदि (पर्वतोंकी) अटवियोंमें निवास; कायक्लेशोंमें तीव्र हिमालय आदिके अन्तर्गत देशोंमें, खुले आकाशके नीचे, अथवा वृक्षमूलमें; आतापन योग अर्थात् ध्यान ग्रहण करना। इसी प्रकार अभ्यन्तर तपोंमें भी उत्कृष्ट तपकी प्ररूपणा करनी चाहिए। ये बारह प्रकार ही तप कायर जनोंको भयोत्पादक हैं, इसी कारण घोर तप कहलाते हैं। वह तप जिनके होता है वे घोरतप ऋद्धिके धारक हैं। बारह प्रकारके तपोंकी उत्कृष्ट अवस्थामें वर्तमान साधु घोर तप कहलाते हैं, यह तात्पर्य है। यह भी तप जनित (तपसे उत्पन्न होनेवाली) ऋद्धि ही है, क्योंकि, बिना तपके इस प्रकारका आचरण बन नहीं सकता।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१२), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२२/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; घोर पराक्रम तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५६-१०५७ णिरुवमवड्ढंततवा तिहुवणसंहरणकरसत्तिजुत्ता। कंटयसिलग्गिपव्वयधूमुक्कापहुदिवरिसणसमत्था ।१०५६। सहस त्ति सयलसायरसलिलुप्पीलस्स सोसणसमत्था। जायंति जीए मुणिणो घोरपरक्कमतव त्ति सा रिद्धी ।१०५७।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनि जन अनुपम एवं वृद्धिंगत तपसे सहित, तीनों लोकोंके संहार करनेकी शक्तिसे युक्त; कंटक, शिला, अग्नि, पर्वत, धुआँ तथा उल्का आदिके बरसानेमें समर्थ; और सहसा समपूर्ण समुद्रके सलिलसमूहके सुखानेकी शक्तिसे भी संयुक्त होते हैं वह घोर-पराक्रम-तप ऋद्धि है ।१०५६-१०५७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२७/९३/२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;घोर ब्रह्मचर्य तप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५८-१०६० जीए ण होंति मुणिणो खेत्तम्मि वि चोरपहुदिबाधाओ। कालमहाजुद्धादी रिद्धी सघोरब्रह्मचारित्ता ।१५८। उक्कस्स खउवसमे चारित्तावरणमोहकम्मस्स। जा दुस्सिमणं णासइ रिद्धी सा घोरब्रह्मचारित्ता ।१०५९। अथवा-सव्वगुणेहिं अघोरं महेसिणो बह्मसद्दचारित्तं। विप्फुरिदाए जीए रिद्धी साघोरब्रह्मचारित्ता ।१०६०।&amp;quot;&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिसे मुनिके क्षेत्रमें भी चौरादिककी बाधाएँ और काल एवं महायुद्धादि नहीं होते हैं, वह `अघोर ब्रह्मचारित्व' ऋद्धि है ।१०५८। ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/३); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/४) चारित्रमोहनीयका उत्कृष्ट क्षयोपशम होने पर जो ऋद्धि दुःस्वप्नको नष्ट करती है तथा जिस ऋद्धिके आविर्भूत होनेपर महर्षिजन सब गुणोंके साथ अघोर अर्थात् अविनश्वर ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं वह अघोर ब्रह्मचारित्व ऋद्धि है ।१०५९-१०६०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]]  तथा [[चारित्रसार]]  में इस लक्षणका निर्देश ही घोर गुण ब्रह्मचारीके लिए किया गया है) &lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१६); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९३-६; ९४-२ घोरा रउद्दा गुणा जेसिं ते घोरगुणा। कधं चउरासादिलक्खगुणाणं घोरत्तं। घोरकज्जकारिसत्तिजणणादो। ९४६।.....ब्रह्म चारित्रं पंचव्रत-समिति-त्रिगुप्त्यात्मकम्, शान्तिपुष्टिहेतुत्वात्। अघोरा शान्ता गुणा यस्मिन् तदघोरगुणं, अघोरगुणं, ब्रह्मचरन्तीति अघोरगुणब्रह्मचारिणः।.....एत्थ अकारो किण्ण सुणिज्जदे। संधिणिद्देसादो ।१९२। &lt;br /&gt;
= घोर अर्थात् रौद्र हैं गुण जिनके वे घोर गुण कहे जाते हैं। प्रश्न-चौरासी लाख गुणोंके घोरत्व कैसे सम्भव है। उत्तर-घोर कार्यकारी शक्तिको उत्पन्न करनेके कारण उनके घोरत्व सम्भव है। ब्रह्मका अर्थ पाँच व्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिस्वरूप चारित्र है, क्योंकि वह शान्तिके पोषणका हेतु है। अघोर अर्थात् शान्त हैं गुण जिसमें वह अघोर गुण है। अघोर गुण ब्रह्म (चारित्र) का आचरण करनेवाले अघोर गुण ब्रह्मचारी कहलाते हैं। (भावार्थ-अघोर शान्तको कहते हैं। जिनका ब्रह्म अर्थात् चारित्र शान्त है उनको अघोर गुण ब्रह्मचारी कहते हैं। ऐसे मुनि शान्ति और पुष्टिके कारण होते हैं, इसीलिए उनके तपश्चरणके माहात्म्यसे उपरोक्त ईति, भीति, युद्ध व दुर्भिक्षादि शान्त हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२३/३)।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-`णमो घोरगुणबम्हचारीणं' इस सूत्रमें अघोर शब्दका अकार क्यों नहीं सुना जाता? उत्तर-सन्धियुक्त निर्देश होनेसे।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot; start=2&amp;gt;&amp;lt;li&amp;gt; घोर गुण और घोर पराक्रम तपमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/९३/८ ण गुण-परक्कमाण मेयत्तं, गुणजणि दसत्तीए परक्कमववएसादो।&lt;br /&gt;
= गुण और पराक्रमके एकत्व नहीं हैं, क्योंकि गुण से उत्पन्न हुई शक्तिकी पराक्रम संज्ञा है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; तप्त दीप्त व महातप ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०५२-१०५४ बहुविहउववासेहिं रविसमवड्ढंतकायकिरणोघो। कायमणवयणबलिणो जीए सा दित्ततवरिद्धी ।१०५२। तत्ते लोहकढाहे पडिंअंबुकणं ब जीए भुत्तण्णं। झिज्जहिं धाऊहिं सा णियझाणाएहिं तत्ततवा ।१०५३। मंदरपंत्तिप्पमुहे महोववासे करेदि सव्वे वि। चउसण्णाण बलेणं जीए सा महातवा रिद्धी ।१०५४।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२३/९०/५ तेसिं ण केवलं दित्ति चेव वंड्ढदि किंतु बलो वि वड्ढदि।.....तेण ण तेसिं भुत्ति वि तेण कारणाभावादो। ण च भुक्खादुक्खवसमणट्ठं भुजंति, तदभावादो। तदभावो कुदीवगम्मदे।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके प्रभावसे, मन, वचन और कायसे बलिष्ठ ऋषिके बहुत प्रकारके उपवासों द्वारा सूर्यके समान दीप्ति अर्थात् शरीरकी किरणोंका समूह बढ़ता हो वह `दीप्त तप ऋद्धि' है ।१०५२। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/२)। (धवलामें उपरोक्तके अतिरिक्त यह और भी कहा है कि उनके केवल दीप्ति ही नहीं बढ़ती है, किन्तु बल भी बढ़ता है। इसीलिए उनके आहार भी नहीं होता, क्योंकि उसके कारणोंका अभाव है। यदि कहा जाय कि भूखके दुःखको शान्त करनेके लिए वे भोजन करते हैं सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उनके भूखके दुःखका अभाव है।) तपी हुई लोहेकी कड़ाहीमें गिरे हुए जलकणके समान जिस ऋद्धिसे खाया हुआ अन्न धातुओं सहित क्षीण हो जाता है, अर्थात् मल-मूत्रादि रूप परिणमन नहीं करता है, वह निज ध्यानसे उत्पन्न हुई तप्त `तप ऋद्धि' है ।१०५३। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१०); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२४/९१/१), ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२१/३)। जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनि चार सम्यग्ज्ञानों (मति, श्रुत, अवधि व मनःपर्यय) के बलसे मन्दिर पंक्ति प्रमुख सब ही महान् उपवासोंको करता है वह `महा तप ऋद्धि' है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३/६३/२०३/११)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२५/९१/५ अणिमादिअट्ठगुणोवेदो जलचारणादिअट्ठविहचारणगुणालंकरियो फुरंतसरीरप्पहो दुविहअवखीणरिद्धिजुत्तो सव्वोसही सरूवो पाणिपत्तणिवदिदसव्वहारो अमियसादसरूवेण पल्लट्ठावणसमत्थो सयलिंदेहिंतो वि अणंतबलो आसी-दिट्ठिविसलद्धिसमण्णिओ तत्ततवो सयलविज्जाहरो मदि सुद ओहि मणपज्जवणाणेहि मुणिदतिहुवणवावारो मुणी महातवो णाम। कस्मात्। महत्त्वहेतुस्तपोविशेषो महानुच्यते उपचारेण, स येषां ते तपसः इति सिद्धत्वात्। अथवा महसां हेतुः तप उपचारेण महा इति भवति।&lt;br /&gt;
= जो अणिमादि आठ गुणोंसे सहित हैं, जलचारणादि आठ प्रकारके चारण गुणोंसे अलंकृत हैं, प्रकाशमान शरीर प्रभासे संयुक्त हैं, दो प्रकारकी अक्षीण ऋद्धिसे युक्त हैं, सर्वोषध स्वरूप हैं, पाणिपात्रमें गिरे हुए आहारको अमृत स्वरूपसे पलटानेमें समर्थ हैं, समस्त इन्द्रोंसे भी अनन्तगुणे बलके धारक हैं, आशीर्विष और दृष्टिविष लब्धियोंसे समन्वित हैं, तप्ततप ऋद्धिसे संयुक्त हैं, समस्त विद्याओंके धारक हैं; तथा मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय ज्ञानोंसे तीनों लोकोंके व्यापारकी जाननेवाले हैं, वे मुनि `महातप ऋद्धि' के धारक हैं। कारण कि महत्त्वके हsेतुभूत तपविशेषको उपचारसे महान् कहा जाता है। वह जिनके होता है वे महातप ऋषि हैं, ऐसा सिद्ध है। अथवा, महस् अर्थात् तेजोंका हेतुभूत जो तप है वह उपचार से महा होता है। (तात्पर्य यह कि सातों ऋद्धियोंकी उत्कृष्टताको प्राप्त होनेवाले ऋषि महातप युक्त समझे जाते हैं।)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; बल ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या ४/१०६१-१०६६ बलरिद्धी तिविहप्पा मणवयणसरीरयाणभेएण। सुदणाणावरणाए पगडीए वीरयंतरायाए ।१०६१। उक्कसक्खउवसमे सुहुत्तमेत्तंतरम्मि सयलसुदं। चिंतइ जाणइ जीए सा रिद्धी मणबला णामा ।१०६२। जिब्भिंदियणोइंदिय-सुदणाणावरणविरियविग्घाणं। उक्कस्सखओवसमे मुहुत्तमेत्तंतरम्मि मुणी ।१०६३। सयलं पि सुदं जाणइ उच्चारइ जीए विप्फुरंतीए। असयो अहिकंठो सा रिद्धीउ णेया वयणबलणामा ।१०६४। उक्कस्सखउसमे पविसेसे विरियविग्धपगढीए। मासचउमासपमुहे काउसग्गे वि समहीणा ।१०६५। उच्चट्ठिय तेल्लोक्कं झत्ति कणिट्ठंगुलीए अण्णत्थं। घविदं जीए समत्था सा रिद्धी कायबलणामा ।१०६६।&lt;br /&gt;
= मन वचन और कायके भेदसे बल ऋद्धि तीन प्रकार है। इनमें-से जिस ऋद्धिके द्वारा श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तराय इन दो प्रकृतियोंका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर मुहूर्तमात्र कालके भीतर अर्थात् अन्तर्मुहूर्त्त कालमें सम्पूर्ण श्रुतका चिन्तवन करता है वह जानता है, वह `मनोबल' नामक ऋद्धि है ।१०६१-१०६२। जिह्वेन्द्रियावरण, नोइन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावरण और वीर्यान्तरायका उत्कृष्ट क्षयोपशम होनेपर जिस ऋद्धिके प्रगट होनेसे मुनि श्रमरहित और अहीनकंठ होता हुआ मुहूर्त्तमात्र कालके भीतर सम्पूर्ण श्रुतको जानता व उसका उच्चारण करता है, उसे `वचनबल' नामकऋद्धि जानना चाहिए ।१०६३-१०६४। जिस ऋद्धिके बलसे वीर्यान्तराय प्रकृतिके उत्कृष्ट क्षयोपशमकी विशेषता होनेपर मुनि, मास व चतुर्मासादिरूप कायोत्सर्गको करते हुए भी श्रमसे रहित होते हैं, तथा शीघ्रतासे तीनों लोकोंको कनिष्ठ अँगुलीके ऊपर उठाकर अन्यत्र स्थापित करनेके लिए समर्थ होते हैं, वह `कायबल' नामक ऋद्धि है ।१०६५-१०६६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/१९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३५-३७/९८-९९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  /२२४/१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; औषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;औषध ऋद्धि सामान्य&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२४ औषधर्द्धिरष्टविधा-असाध्यानामप्यामयानां सर्वेषां विनिवृत्तिहेतुरामर्शक्ष्वेलजल्लमलविट्सर्वौषधिप्राप्तास्याविषदृष्टिविषविकल्पात्।&lt;br /&gt;
= असाध्य भी सर्व रोगोंकी निवृत्तिकी हेतुभूत औषध-ऋद्धि आठ प्रकारकी है - आमर्ष, क्ष्वेल, जल्ल, मल, विट्, सर्व, आस्याविष और दृष्टिविष। &lt;br /&gt;
([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/१)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्ष क्ष्वेल जल मल व विट् औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०६८-१०७२ रिसिकरचरणादीणं अल्लियमेत्तम्मि। जीए पासम्मि। जीवा होंति णिरोगा सा अम्मरिसोसही रिद्धी ।१०६८। जीए तालासेमच्छीमलसिंहाणआदिआ सिग्घं। जीवाणं रोगहरणा स च्चिय खेलोसही रिद्धो ।१०६९। सेयजलो अंगरयं जल्लं भण्णेत्ति जीए तेणावि। जीवाणं रोगहरणं रिद्धी जस्लोसही णामा ।१०७०। जीहीट्ठदं तणासासोंत्तादिमलं पि जीए सत्तीए। जोवाणं रोगहरणं मलोसही णाम सा रिद्धी ।१०७१।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके प्रभावसे जीव पासमें आनेपर ऋषिके हस्त व पादादिके स्पर्शमात्र से ही निरोग हो जाते हैं, वह `आमर्षौषध' ऋद्धि है ।१०६८। जिस ऋद्धिके प्रभावसे लार, कफ, अक्षिमल और नासिकामल शीघ्र ही जीवोंके रोगोंको नष्ट करता है वह `क्ष्वेलौषध ऋद्धि है ।१०६९। पसीनेके आश्रित अंगरज जल्ल कहा जाता है। जिस ऋद्धिके प्रभावसे उस अंगरजसे भी जीवों के रोग नष्ट होते हैं, वह `जल्लौषधि' ऋद्धि कहलाती है ।१०७०। जिस शक्तिसे जिह्वा, ओठ, दाँत, नासिका और श्रोत्रादिकका मल भी जीवोंके रोगोंको दूर करनेवाला होता है, वह `मलौषधि' नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२५); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०-३३/९५-९७); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/२)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol start=2&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आमर्षौषधि व अघोरगुण ब्रह्मचर्यमें अन्तर&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३०/९६/१ तवोमाहप्पेण जेसिं फासो सयलोसहरूवत्तं पत्तो तेसिमाम्मरिसो सहिपत्ता त्ति सण्णा।&lt;br /&gt;
= ण च एदेसिमघोरगुणबंभयारीणं अंतब्भावो, एदेसिं वाहिविणासणे चेव सत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= तप के प्रभावसे जिनका स्पर्श समस्त औषधियोंके स्वरूपको प्राप्त हो गया है, उनको आमर्षौषधि प्राप्त ऐसी संज्ञा है। इनका अघोरगुणब्रह्मचारियों में अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि, इनके अर्थात् अघोरगुण ब्रह्मचारियोंके केवल, व्याधिके नष्ट करनेमें ही शक्ति देखी जाती है। (पर उनका स्पर्श औषध रूप नहीं होता)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; सर्वौषध ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७३ जीए पस्सजलाणिलरीमणहादीणि वाहिहरणाणि। दुक्करवजुत्ताणं रिद्धी सव्वोही णामा ।१०७३।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे दुष्कर तपसे युक्त मुनियोंका स्पर्श किया हुआ जल व वायु तथा उन के रोम और नखादिक व्याधिके हरनेवाले हो जाते हैं, वह सर्वौषधि नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/२९); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२५/५)&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३४/९७/६ रस-रुहिर-मांस-मेदट्ठि-मज्ज-सुक्क-पुप्फस-खरीसकालेज्ज-मुत्त-पित्तंतुच्चारादओ सव्वे ओसाहत्तं पत्ता जेसि ते सव्वोसहिषत्ता।&lt;br /&gt;
= रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र, पुप्फस, खरीष, कालेय, मूत्र, पित्त, अँतड़ी, उच्चार अर्थात् मल आदिक सब जिनके औषधिपनेको प्राप्त हो गये हैं वे सर्वौषधिप्राप्त जिन हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;7.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आस्यनिर्विष व दृष्टिनिर्विष औषध ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  /४/१०७४-१०७६ तित्तादिविविहम्मण्णं विसुजुत्तं जीए वयणमेत्तेण। पावेदि णिव्विसत्तं सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७४। अहवा बहुवाहाहिं परिभूदा झत्ति होंति णीरोगा। सोदुं वयणं जीए सा रिद्धी वयणणिव्विसा णामा ।१०७५। रोगाविसेहिं पहदा दिट्ठीए जीए झत्ति पावंति। णीरोगणिव्विसत्तं सा भणिदा दिट्ठिणिव्विसा रिद्धी ।१०७६।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३,३६,३/२०३/३० उग्रविषसंपृक्तोऽप्याहारो येषामास्यगतो निर्विषीभवति यदीयास्यनिर्गतं वचःश्रवणाद्वा महाविषपरीता अपि निर्विषीभवन्ति ते आस्याविषाः।&lt;br /&gt;
= ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) - जिस ऋद्धिसे तिक्तादिक रस व विषसे युक्त विविध प्रकारका अन्न वचनमात्रसे ही निर्विषताको प्राप्त हो जाता है, वह `वचननिर्विष' नामक ऋद्धि है ।१०७४। ([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या ) - उग्र विषसे मिला हुआ भी आहार जिनके मुखमें जाकर निर्विष हो जाता है, अथवा जिनके मुखसे निकले हुए वचनके सुनने मात्रसे महाविष व्याप्त भी कोई व्यक्ति निर्विष हो जाता है वे `आस्याविष' हैं। ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/१)। ([[तिलोयपण्णत्ति]] ) अथवा जिस ऋद्धिके प्रभावसे बहुत व्याधियोंसे युक्त जीव, ऋषिके वचनको सुनकर ही झटसे नीरोग हो जाया करते हैं, वह वचन निर्विष नामक ऋद्धि है ।१०७५। रोग और विषसे युक्त जीव जिस ऋद्धिके प्रभावसे झट देखने मात्रसे ही निरोगता और निर्विषताको प्राप्त कर लेते हैं; वह `दृष्टिनिर्विष' ऋद्धि है ।१०७६।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३२); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/२)&amp;lt;/ol&amp;gt;&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; आशीर्विष रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७८ मर इदि भणिदे जीओ मरेइ सहस त्ति जीए सत्तीए। दुक्खरतवजुदमुणिणा आसीविस णाम रिद्धी सा।&lt;br /&gt;
= जिस शक्तिसे दुष्कर तपसे युक्त मुनिके द्वारा `मर जाओ' इस प्रकार कहने पर जीव सहसा मर जाता है, वह आशीविष नामक ऋद्धि कही जाती है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०३/३४); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२६/५)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२०/८५/५ अविद्यमानस्यार्थस्य आशंसनमाशीः, आशीर्विष एषां ते आशीर्विषाः। जेसि जं पडि मरिहि त्ति वयणं णिप्पडिदं तं मारेदि, भिक्खं भमेत्तिवयणं भिक्खं भमावेदि, सीसं छिज्जउ त्ति वयणं सीस छिंददि, आसीविसा णाम समणा। कधं वयणस्स विससण्णा। विसमिव विसमिदि उवयारादो। आसी अविसममियं जेसिं ते आसीविसा। जेसिं वयणं थावर-जंगम-विसपूरिदजीवे पडुच्च `णिव्विसा होंतु' त्ति णिस्सरिदं ते जीवावेदि। वाहिवेयण-दालिद्दादिविलयं पडुच्च णिप्पडितं सं तं तं तं कज्जं करेदि ते वि आसीविसात्ति उत्तं होदि।&lt;br /&gt;
= अविद्यमान अर्थकी इच्छाका नाम आशिष है। आशिष है विष (वचन) जिनका वे आशीर्विष कहे जाते हैं। `मर जाओ' इस प्रकार जिनके प्रति निकला हुआ जिनका वचन उसे मारता है, `भिक्षाके लिए भ्रमण करो' ऐसा वचन भिक्षार्थ भ्रमण कराता है, `शिरका छेद हो' ऐसा वचन शिरको छेदता है, (अशुभ) आशीर्विष नामक साधु हैं। प्रश्न-वचनके विष संज्ञा कैसे सम्भव है? उत्तर-विषके समान विष है। इस प्रकार उपचारसे वचनको विष संज्ञा प्राप्त है। आशिष है अविष अर्थात् अमृत जिनका वे (शुभ) आशीर्विष हैं। स्थावर अथवा जंगम विषसे पूर्ण जीवोंके प्रति `निर्विष हो' इस प्रकार निकला हुआ जिनका वचन उन्हें जिलाता है, व्याधिवेदना और दारिद्र्य आदिके विनाश हेतु निकला हुआ जिनका वचन उस उस कार्यको करता है, वे भी आशीर्विष हैं, यह सूत्रका अभिप्राय है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;8.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;. दृष्टिविष व दृष्टि अमृत रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;दृष्टिविष रस ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०७९ जीए जीवो दिट्ठो महासिणा रोसभरिदहिदएण। अहदट्ठं व मरिज्जदि दिट्ठिविसा णाम सा रिद्धी ।१०७९।&lt;br /&gt;
= जिस ऋद्धिके बलसे रोषयुक्त हृदय वाले महर्षिसे देखा गया जीव सर्प द्वारा काटे गयेके समान मर जाता है, वह दृष्टिविष नामक ऋद्धि है।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/१); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२७/१)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/७ दृष्टिरिति चक्षुर्मनसोर्ग्रहणं, तत्रोभयत्र दृष्टिशब्दप्रवृत्तिदर्शनात्। तत्साहचर्यात्कर्मणोऽपि। रुट्ठो जदि जोएदि चिंतेदि किरियं करेदि वा `मारेमि' त्ति तो मारेदि, अण्णं पि असुहकम्मं संरंभपुव्वावलोयणेण कुणमाणोदिट्ठविसो णाम।&lt;br /&gt;
= दृष्टि शब्दसे यहाँ चक्षु और मन (दोनों) का ग्रहण है, क्योंकि उन दोनोंमें दृष्टि शब्दकी प्रवृत्ति देखी जाती है। उसकी सहचरतासे क्रियाका भी ग्रहण है। रुष्ट होकर वह यदि `मारता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है व क्रिया करता है तो मारता है; तथा क्रोधपूर्वक अवलोकनसे अन्य भी अशुभ कार्यको करनेवाला (अशुभ) दृष्टिविष कहलाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृतरस ऋद्धिका लक्षण&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२१/८६/९ एवं दिट्ठअमियाणं पि जाणिदूण लक्खणं वत्तव्वं।&lt;br /&gt;
= इसी प्रकार दृष्टि अमृतोंका भी लक्षण जानकर कहना चाहिए। (अर्थात् प्रसन्न होकर वह यदि `नीरोग करता हूँ' इस प्रकार देखता है, (या) सोचता है, व क्रिया करता है तो नीरोग करता है, तथा प्रसन्नतापूर्वक अवलोकनसे अन्य भी शुभ कार्यको करनेवाला दृष्टिअमृत कहलाता है)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt; दृष्टि अमृत रस ऋद्धि व अघोरब्रह्मचर्य तपमें अन्तर&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९४/६ दिट्ठअमियाणमघोरगुणबंभयारीणं च को विसेसो। उवजोगसहेज्जदिट्ठीए दिट्ठिलद्धिजुत्ता दिट्ठिविसा णाम। अघोर गुणबंभयारीणं पुण लद्धी असंखेज्जा सव्वंगगया, एदेसिमंगलग्गवादे वि सयलोवद्दवविणासणसत्तिदंसणादो तदो। अत्थि भेदो। णवरि असुद्धलद्धोणं पउत्ती लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी। सुहाणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-दृष्टि-अमृत और अघोरगुणब्रह्मचारीके क्या भेद हैं? उत्तर-उपयोगकी सहायता युक्त दृष्टिमें स्थित लब्धिसे संयुक्त दृष्टिविष कहलाते हैं। किन्तु अघोरगुणब्रह्मचारियोंकी लब्धियाँ सर्वांगगत असंख्यात हैं। इनके शरीरसे स्पृष्ट वायुमें भी समस्त उपद्रवोंको नष्ट करनेकी शक्ति देखी जाती है इस कारण दोनोंमें भेद है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विशेष इतना है कि अशुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवों की इच्छाके वशसे होती है। किन्तु शुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारोंसे सम्भव है, क्योंकि, इनकी इच्छाके बिना भी उक्त लब्धियोंकी प्रवृत्ति देखी जाती है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षीर-मधु-सर्पि व अमृतस्रावी रस ऋद्धि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८०-१०८७ करयलणि क्खिताणिं रुक्खाहारादियाणि तक्कालं। पावंति खीरभावं जीए खीरोसवी रिद्धी ।१०८०। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयण सवण मेत्तेणं। पसमदि णरतिरियाणं स च्चिय खीरोसवी ऋद्धी ।१०८१। मुणिकइणिक्खिताणि लुक्खाहारादियाणिहोंतिखणे। जीए महुररसाइं स च्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८२। अहवा दुक्खप्पहुदी जीए मुणिवयणसवणमेत्तेण। णासदि णरतिरियाणं तच्चिय महुवासवी रिद्धी ।१०८३। मुणिपाणिसंठियाणिं रुक्खाहारादियाणि जीय खणे। पावंति अमियभावं एसा अमियासवी ऋद्धी ।१०८४। अहवा दुक्खादीणं महेसिवयणस्स सवणकालम्मि। णासंति जीए सिग्घं रिद्धी अमियआसवी णामा ।१०८५। रिसिपाणितलणिक्खित्तं रुक्खाहारादियं पि खणमेत्ते। पावेदि सप्पिरूवं जीए सा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८६। अहवा दुक्खप्पमुहं सवणेण मुणिंदव्ववयणस्स। उवसामदि जीवाणं एसा सप्पियासवी रिद्धी ।१०८७।&lt;br /&gt;
= जिससे हस्ततलपर रखे हुए रूखे आहारादिक तत्कालही दुग्धपरिणाम को प्राप्त हो जाते हैं, वह `क्षीरस्रावी' ऋद्धि कही जाती है ।१०८०। अथवा जिस ऋद्धिसे मुनियोंके वचनोंके श्रवणमात्रसे ही मनुष्य तिर्यंचोंके दुःखादि शान्त हो जाते हैं उसे क्षीरस्रावी ऋद्धि समझना चाहिए ।१०८१। जिस ऋद्धिसे मुनिके हाथमें रखे गये रूखे आहारादिक क्षणभरमें मधुररससे युक्त हो जाते हैं, वह `मध्वास्रव' ऋद्धि है, ।१०८२। अथवा, जिस ऋषि-मुनिके वचनोंके श्रवणमात्रसे मनुष्यतिर्यंचके दुःखादिक नष्ट हो जाते हैं वह मध्वास्रावी ऋद्धि है ।१०८३। जिस ऋद्धि के प्रभाव से मुनि के हाथ में स्थित रूखे आहारादिक क्षणमात्र में अमृतपने को प्राप्त करते हैं, वह अमृतास्रवी नामक ऋद्धि है ।१०८४। अथवा जिस ऋद्धि से महर्षि के वचनों के श्रवण काल में शीघ्र ही दुःखादि नष्ट हो जाते हैं, वह अमृतस्रावी नामक ऋद्धि है ।१०८५।  जिस ऋद्धिसे ऋषिके हस्ततलमें निक्षिप्त रूखा आहारादिक भी क्षणमात्रमें घृतरूपको प्राप्त करता है, वह `सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८६। अथवा जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनीन्द्रके दिव्य वचनोंके सुननेसे ही जीवोंके दुःखादि शान्त हो जाते हैं, वह सर्पिरास्रावी ऋद्धि है ।१०८७।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/२); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२८/४१/९१-१०१) (च.सा. २२७/२) &lt;br /&gt;
नोट-धवलामें हस्तपुटवाले लक्षण हैं। वचन वाले नहीं। [[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या व.[[चारित्रसार]]  में दोनों प्रकारके है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; रस ऋद्धि द्वारा पदार्थोंका क्षीरादि रूप परिणमन कैसे सम्भव है?&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,३८/१००/१ कधं रसंतरेसु ट्ठियदव्वाणं तक्खणादेव खीरासादसरूवेण परिणामो। ण, अमियसमुद्दम्मि णिवदिदविसस्सेव पंचमहव्वय-समिइ-तिगुत्तिकलावघडिदंजलिउदणिवदियाणं तदविरोहादो।&lt;br /&gt;
= प्रश्न-अन्य रसोंमें स्थित द्रव्यका तत्काल ही क्षीर स्वरूपसे परिणमन कैसे सम्भव है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, जिस प्रकार अमृत समुद्रमें गिरे हुए विषका अमृत रूप परिणमन होनेमें कोई विरोध नहीं है, उसी प्रकार पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तियोंके समूह से घटित अंजलिपुटमें गिरे हुए सब आहारोंका क्षीर स्वरूप परिणमन करनेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; क्षेत्र ऋद्धि निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;9.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;अक्षीण महानस व अक्षीण महालय ऋद्धिके लक्षण&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[तिलोयपण्णत्ति]] अधिकार संख्या  ४/१०८९-१०९१ लाभंतरायकम्मक्खउवसमसंजुदए जीए फुडं। मुणिभुत्तमसेसमण्णं धामत्थं पियं ज कं पि ।१०८९। तद्दिवसे खज्जंतं खंधावारेण चक्कवट्टिस्स। झिज्जइ न लवेण वि सा अक्खीणमहाणसा रिद्धो ।१०९०। जीए चउधणुमाणे समचउरसालयम्मि णरतिरिया। मंतियसंखेज्जा सा अक्खीणमहालया रिद्धी ।१०९१।&lt;br /&gt;
= लाभान्तरायकर्मके क्षयोपशमसे संयुक्त जिस ऋद्धिके प्रभावसे मुनिके आहारसे शेष, भोजनशालामें रखे हुए अन्नमेंसे जिस किसी भी प्रिय वस्तुको यदि उस दिन चक्रवर्तीका सम्पूर्ण कटक भी खावे तो भी वह लेशमात्र क्षीण नहीं होता है, वह `अक्षीणमहानसिक' ऋद्धि है ।१०८९-१०९९। जिस ऋद्धिसे समचतुष्कोण चार धनुषप्रमाण क्षेत्रमें असंख्यात मनुष्य तिर्यंच समा जाते हैं, वह `अक्षीण महालय' ऋद्धि है ।१०९०।&lt;br /&gt;
([[राजवार्तिक | राजवार्तिक]] अध्याय संख्या  ३/३६/३/२०४/९); ([[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,४२/१०१/८/केवल अक्षीण महानसका निर्देश है, अक्षीण महालयका नहीं); ([[चारित्रसार]] पृष्ठ संख्या  २२८/१)&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;ऋद्धि सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&lt;br /&gt;
     &amp;lt;ol type=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; शुभ ऋद्धिकी प्रवृत्ति स्वतः भी होती है पर अशुभकी प्रयत्न पूर्वक ही&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  ९/४,१,२९/९५/१ असुहलद्धीणं पउत्तो लद्धिमंताणमिच्छावसवट्टणी सुहाणं लद्धीणं पउत्ती पुण दोहि वि पयारेहि संभवदि, तदिच्छाए विणा वि पउत्तिदंसणादो।&lt;br /&gt;
= अशुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति लब्धियुक्त जीवोंकी इच्छाके वशसे होती है। किन्तु शुभ लब्धियोंकी प्रवृत्ति दोनों ही प्रकारोंसे (इच्छासे व स्वतः) सम्भव है, क्योंकि, इच्छाके बिना भी उक्त लब्धियोंकी प्रवृत्ति देखी जाती है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; एक व्यक्तिमें युगपत् अनेक ऋद्धियोंकी सम्भावना&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १/१,१,५९/२९८/६ नैष नियमोऽप्यस्त्येकस्मिन्नक्रमेण नर्द्धयो भूयस्यो भवन्तीति। गणभृत्सु सप्तानामपि, ऋद्धीनामक्रमेण सत्त्वोपलम्भात्। आहारर्द्ध्या सह मनःपर्ययस्य विरोधो दृश्यते इति चेद्भवतु नाम दृष्टत्वात्। न चानेन विरोध इति सर्वाभिर्विरोधो वक्तुं पार्यतेऽव्यवस्थापत्तेरिति।&lt;br /&gt;
= एक आत्मामें युगपत् अनेक ऋद्धियाँ उत्पन्न नहीं होती, यह कोई नियम नहीं है, क्योंकि, गणधरोंके एक साथ सातों ही ऋद्धियोंका सद्भाव पाया जाता है। प्रश्न-आहारक ऋद्धिके साथ मनःपर्ययका तो विरोध देखा जाता है। उत्तर-यदि आहारक ऋद्धिके साथ मनःपर्ययज्ञानका विरोध देखनेमें आता है तो रहा आवे। किन्तु मनःपर्ययके साथ विरोध है, इसलिए आहारक ऋद्धिका दूसरोसम्पूर्ण ऋद्धियोंके साथ विरोध है ऐसा नहीं कहा जा सकता है। अन्यथा अव्यवस्थाकी आपत्ति आ जायेगी। (विशेष देखो `गणधर')।&lt;br /&gt;
&amp;lt;li id=&amp;quot;10.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt; परन्तु विरोधी ऋद्धियाँ युगपत् सम्भव नहीं&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[धवला]] पुस्तक संख्या  १३/५,३,२५/३२/३ पमत्तसंजदस्स अणिमादिलद्धिसंपण्णस्स विउव्विदसमए आहारसरीरुट्ठावणसंभवाभावादो।&lt;br /&gt;
= अणिमादि लब्धियोंसे सम्पन्न प्रमत्त संयत जीवके विक्रिया करते समय आहारक शरीरकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[गोम्मट्टसार जीवकाण्ड]] / मूल गाथा संख्या २४२/५०५ वै गुव्विय आहारयकिरिया ण समं पमत्तविरदम्हि। जोगोवि एक्ककाले एक्केव य होदि नियमेण।।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; गोम्मटसार जीवकाण्ड/ &amp;lt;/span&amp;gt;मं.प्र. २४२/५०५ प्रमत्तविरते वैक्रियकयोगक्रिया आहारकयोगक्रिया च समं युगपन्न संभवतः। यदा आहारकयोगमवलम्ब्य प्रमत्तसंयतस्य गमनादिक्रिया प्रवर्तते तदा विक्रियर्द्धिबलेन वैक्रियकयोगमवलम्ब्य क्रिया तस्य न घटते, आहारकर्धिविक्रियर्द्ध्योर्युगपदवृत्तिविरोधात् अनेन गणधरादिनामितरर्द्धियुगपद्वृत्तिसम्भवो दर्शितः।&lt;br /&gt;
= छट्ठे गुणस्थानमें वैक्रियिक और आहारक शरीरकी क्रिया युगपत् नहीं होती। और योग भी नियमसे एक कालमें एक ही होता है। प्रमत्त विरत षष्ठ गुणस्थानवर्ती मुनिकैं समकालविषैं युगपत् वैक्रियक योगकी क्रिया अर आहारक काययोगकी क्रिया नाहीं। ऐसा नाहीं कि एक ही काल विषैं आहारक शरीरको धारि गमनागमनादि क्रियाकौ करै अर तभी विक्रिया ऋद्धिके बलसे वैक्रियककाययोगको धारि विक्रिया सम्बन्धी कार्यकौ भी करैं। दोऊमें सौ एक ही होइ। यातैं यहू जान्या कि गणधरादिकनिकैं और ऋद्धि युगपत् प्रवर्त्तै तो विरुद्ध नाहीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>प्रतिक्रमण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A3&amp;diff=106287"/>
		<updated>2022-12-17T13:44:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;व्यक्ति को  अपनी जीवनयात्रा में कषाय वश पद-पद पर अंतरंग व बाह्य दोष लगा करते हैं, जिनका शोधन एक श्रेयोमार्गी के लिए आवश्यक है ।  भूतकाल में जो दोष लगे हैं उनके शोधनार्थ, प्रायश्चित्त पश्चात्ताप  व गुरु के समक्ष अपनी निंदा-गर्हा करना प्रतिक्रमण कहलाता है । दिन, रात्रि, पक्ष, मास, संवत्सर आदि में लगे दोषों को दूर करने की अपेक्षा वह कई प्रकार हैं ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;भेद  व लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण  सामान्य का लक्षण &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.1&amp;quot;&amp;gt; निरुक्त्यर्थ &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             सर्वार्थसिद्धि/9/22/440/6 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादुष्कृताभिधानादभिव्यक्तप्रतिक्रियं  प्रतिक्रमणम्&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;‘मेरा दोष  मिथ्या हो’ गुरु से ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त  करना प्रतिक्रमण है । ( राजवार्तिक/9/22/3/621/18 ), ( तत्त्वसार/7/239 )&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             गोम्मटसार जीवकांड / जीवतत्त्व प्रदीपिका/367/790/2   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रम्यते प्रमादकृतदैवसिकादिदोषो निराक्रियते अनेनेति प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;प्रमाद  के द्वारा किये दोषों का जिसके द्वारा निराकरण किया जाता है, उसको प्रतिक्रमण कहते हैं ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.2&amp;quot;&amp;gt; दोष  निवृत्ति &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             राजवार्तिक/6/24/11/530/13   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अतीतदोषनिवर्तनं प्रतिक्रमणम् ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कृत दोषों की निवृति प्रतिक्रमण है ।  ( समयसार / तात्पर्यवृत्ति/306/388/9 ) ( भावपाहुड़ टीका/77/221/14 ) । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             धवला  8/3,41/84/6  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पंचमहव्वएसु चउरासीदिलक्खणगुणगणकललिएसु  समुप्पण्णकलंकपक्खालणं पिडक्कमणं णाम ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चौरासी लाख गुणों के समूह से संयुक्त पाँच  महाव्रतों में उत्पन्न हुए मल को धोने का नाम प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना / विजयोदया टीका/421/615/12   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अचेलतादिकल्पस्थितस्य यद्यतिचारो भवेत् प्रतिक्रमणं कर्तव्यमित्येषोऽष्टमः  स्थितिकल्पः । &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अचेलतादि कल्प में रहते हुए जो मुनि को अतिचार लगते हैं उनके  निवारणार्थ प्रतिक्रमण करना अष्टम स्थितिकल्प है । &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.3&amp;quot;&amp;gt; मिथ्या मे  दुष्कृत &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            मू.आ./26 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;दव्वे  खेत्ते काले भावे य किदावराहसोहणयं । णिंदणगरहणजुत्तो मणवचकायेण पडिकमणं ।26.&amp;lt;/span&amp;gt; =  &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव में किया गया जो व्रत में दोष उसका शोधना, आचार्यादि के  समीप आलोचनापूर्वक अपने दोषों को प्रकट करना, वह मुनिराज का  प्रतिक्रमण गुण होता है ।26।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             नियमसार 153   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;वयणमयं पडिकमणं ... जाण सज्झाउं ।153।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;वचनमय प्रतिक्रमण ... यह स्वाध्याय जान । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             धवला/13/5,4,26/60/8  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;गुरणमालोचणाएविणा  ससंवेणणिव्वेयस्स पुणो ण करेमि त्ति जमवराहादो णियत्तणं पडिक्कमणं णाम  पायच्छित्तं । &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गुरुओं के सामने आलोचना किये बिना संवेग और निर्वेद से युक्त साधु का फिर कभी ऐसा न करूँगा यह कहकर अपने अपराध से निवृत्त होना प्रतिक्रमण नाम का  प्रायश्चित्त है । ( अनगारधर्मामृत/7/47 ) ( भावपाहुड़/78/223/5 ) ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना/ वि/6/32/19&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; स्वकृतादशुभयोगात्प्रतिनिवृत्तिः प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; स्वतः के द्वारा किये हुए अशुभ योग से परावर्त होना अर्थात् ‘मेरे अपराध मिथ्या होवें’ ऐसा कहकर पश्चात्ताप करना  प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt; निश्चय प्रतिक्रमण का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.2.1&amp;quot;&amp;gt;शुद्ध नय की  अपेक्षा &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            सा.सा./मू./383  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;कम्मं जं पुव्वकयं सुहासुहमणेयवित्थरविसेसं । ततो णियत्तए अप्पयं तु जो सो  पडिक्कमणं ।383।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पूर्वकृत जो अनेक प्रकार के विस्तार वाला शुभ व अशुभ कर्म है, उससे जो आत्मा अपने को दूर रखता है वह आत्मा  प्रतिक्रमण है ।383।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             नियमसार/83-84   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;मोत्तूण वयणरयणं रागादीभाववरणणं किच्चा । अप्पाणं जो झायदि जस्स दु होदित्ति  पडिकमणं ।83। आराहणाइ वट्टइ मोचूण विराहणं विसेसेण । सो पडिकमणं उच्चइ पडिकमणमओ हवे  जम्हा ।84। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; वचन रचना को छोड़कर, रागादि भावों का निवारण करके, जो आत्मा को ध्याता है,  उसे प्रतिक्रमण होता है ।83। जो (जीव) विराधना को विशेषतः छोड़कर  आराधना में वर्तता है, वह (जीव) प्रतिक्रमण कहलाता है,  कारण कि वह प्रतिक्रमणमय है । 84। (इसी प्रकार अनाचार को छोड़कर आचार  में, उन्मार्ग का त्याग करके जिनमार्ग में, शल्यभाव को छोड़कर निःशल्य भाव से, अगुप्ति भाव को  छोड़कर त्रिगुप्ति गुप्त से, आर्त-रौद्र ध्यान को छोड़कर धर्म अथवा शुक्ल ध्यान को, मिथ्यादर्शन आदि को छोड़कर सम्यक् दर्शन को भाता है वह जीव प्रतिक्रमण है । ( नियमसार/85-91 ) ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना / विजयोदया टीका/10/49/10 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; कृतातिचारस्य यतेस्तदतिचारपराङ्मुखतो योगत्रयेण हा दुष्टं कृतं चिंतितमनुमंतं  चेति परिणामः प्रतिक्रमणम् ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब मुनि को चारित्र पालते समय दोष लगते हैं तब मन-वचन-योग से मैंने हा !दुष्ट कार्य किया, कराया व करने वालों का अनुमोदन किया,यह अयोग्य किया, ऐसे आत्मा के परिणाम को प्रतिक्रमण कहते हैं । &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2.2&amp;quot;&amp;gt; निश्चय नय  की अपेक्षा &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             नियमसार/82   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;उत्तमअट्ठ आदा तम्हि हिदा हणदि मुणिवराकम्मं । तम्हा दु झाणमेव हि उत्तम अट्ठस्स  पडिकमणं ।92।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;उत्तमार्थ (अर्थात् उत्तम पदार्थ सच्चिदानंदरूप कारण  समयसारस्वरूप) आत्मा में स्थित मुनिवर कर्म का घात करते हैं, इसलिए ध्यान ही वास्तव में उत्तमार्थ का प्रतिक्रमण  है ।82।( नयचक्र बृहद्/346 ) ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             तिलोयपण्णत्ति/9/49   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;पडिकमणं पडिसरणं पडिहरणं धारणा णियत्ती य । णिंदणगरुहणसोही लब्भंति णियादभावणए  ।49।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निजात्मा भावना से प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, प्रतिहरण, धारणा,  निवृत्ति, निंदन, गर्हण और शुद्धि को प्राप्त होते हैं ।49।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             योगसार (अमितगति)/5/50   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;कृतानां कर्मणां पूर्वं सर्वेषां पाकमीयुषां । आत्मीयत्वपरित्यागः  प्रतिक्रमणमीर्यते ।50। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पहिले किये हुए कर्मों के प्रदत्त फलों को अपना न मानना  प्रतिक्रमण कहा जाता है । 50। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति/207/281/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;निजशुद्धात्मपरिणतिलक्षणा या तु क्रिया सा निश्चयेन बृहत्प्रतिक्रमणा भण्यते ।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; निज शुद्धात्म परिणति है लक्षण जिसका ऐसी जो क्रिया है, वह निश्चय नय से बृहत्प्रतिक्रमण कही जाती है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण  के भेद&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.3.1&amp;quot;&amp;gt;दैवसिक आदि  की अपेक्षा &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            मू.आ./120,613 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;पढमं सव्वदिचारं विदियं तिविहं हवैं पडिक्कमणं ।  पाणस्स परिच्चयणं जावज्जीवुत्तमट्ठं च ।120। पडिकमणं देवसियं रादिय इरियापधं च  बोधव्वं । पक्खिय चादुम्मासिय संवच्छरमुत्तमट्ठं च ।613।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पहला सर्वातिचार  प्रतिक्रमण है अर्थात् दीक्षा ग्रहण से लेकर सब तपश्चरण के काल तक जो दोष लगे हों  उनकी शुद्धि करना, दूसरा त्रिविध प्रतिक्रमण है वह जल के  बिनातीन प्रकार के आहार का त्याग करने में जो अतिचार लगे थे उनका शोधन करना और  तीसरा उत्तमार्थ प्रतिक्रमण है उसमें जीवन पर्यंत जल पीने का त्याग किया था,  उसके दोषों की शुद्धि करना है ।120। अतिचारों से निवृत्ति होना वह  प्रतिक्रमण है। वह दैवसिक, रात्रिक, ऐर्यापथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, सांवत्सरिकऔर  उत्तमार्थ प्रतिक्रमण ऐसे सात प्रकार हैं /613/( कषायपाहुड़ 1 ); (6,1/88/113/6) (गो.जो./जी.प्र./367/710/3) ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.3.2&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य, क्षेत्र आदि की अपेक्षा&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना / विजयोदया टीका/116/275/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमणं प्रतिनिवृत्तिः षोढा भिद्यते नामस्थापनाद्रव्यक्षेत्रकालभावविकल्पेन ।  .... केषांचिद्वयाख्यानं । चतुर्विधमित्यपरे ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अशुभ से निवृत्त होना प्रतिक्रमण  है, उसके छह भेद हैं - नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र,  काल और भाव प्रतिक्रमण । ऐसे कितने आचार्यों का मत है । कोई आचार्य  प्रतिक्रमण के चार भेद कहते हैं ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt;नाम  स्थापनादि प्रतिक्रमण के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         भगवती आराधना / विजयोदया टीका/116/275/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अयोग्यनाम्नामनुच्चारणं नामप्रतिक्रमणं । ... आप्ताभासप्रतिमायां पुरः स्थिताया  यदभिमुखतया कृतांजलिपुटता, शिरोवनति  ... न कर्तव्यम् । एवं सा स्थापना परिहुता भवति । त्रस-स्थावरस्थापनानामविनाशनं  अमर्द्दनं अताडनं वा परिहारप्रतिक्रमणं । ... उद्गमोत्पादनैषणादोषदुष्टनां वसतीनं  उपकरणानां, भिक्षाणां च परिहरणं, अयोग्यानां  चाहारादीनां, गृद्धदर्पस्य च कारणानां संक्लेशहेतूनां वा  निरसनं द्रव्यप्रतिक्रमणं । उदक-कर्द्दमत्रसस्थावरनिचितेषु क्षेत्रेषु  गमनादिवर्जनं क्षेत्रप्रतिक्रमणं । यस्मिन्वा क्षेत्रे वसतो रत्नत्रयहानिर्भवति  तस्य वा परिहारः । ... रात्रिसंध्यात्रयस्वाध्यायावश्यककालेषु  गमनागमनादिव्यापाराकारणात् कालप्रतिक्रमणं । ... आर्तरौद्रमित्यादयोऽशुभपरिणामाः,  पुण्यास्रवभूताश्च शुभपरिणामा; इह भावशब्देन,  गृह्यंते, तेभ्यो निवृत्तिर्भावप्रतिक्रमणं  इति ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अयोग्य नामों का उच्चारण न करना यह नाम प्रतिक्रमण है । ... आप्ताभास की  प्रतिमा के आगे खड़े होकर हाथ जोड़ना, मस्तक नवाना, द्रव्य से पूजा करना, इस प्रकार के स्थापना का त्याग  करना, अथवा त्रस, वा स्थावर जीवों की  स्थापनाओं का नाश करना, मर्दन तथा ताड़न आदि का त्याग करना  स्थापना प्रतिक्रमण है ।... उद्गमादि दोष युक्त वसतिका, उपकरण  व आहार का त्याग करना, अयोग्य अभिलाषा, उन्मत्तता तथा संक्लेश परिणाम को बढ़ाने वाले आहारादिका त्याग करना,  यह सब द्रव्य प्रतिक्रमण है । पानी, कीचड़,  त्रसजीव, स्थावर जीवों से व्याप्त प्रदेश,  तथा रत्नत्रय की हानि जहाँ हो ऐसे प्रदेश का त्याग करना क्षेत्र  प्रतिक्रमण है । .... रात्रि, तीनों संध्याओं में, स्वाध्यायकाल, आवश्यक क्रिया के कालों में आने-जाने  का त्याग करना यह काल प्रतिक्रमण है । ... आर्त-रौद्र इत्यादिक अशुभ परिणाम व  पुण्यास्रव के कारणभूत शुभ परिणाम का त्याग करना भाव प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         भगवती आराधना / विजयोदया टीका/509/728/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;हा दुष्कृतमिति वा मनःप्रतिक्रमणं । सूत्रोच्चारणं वाक्य-प्रतिक्रमणं । कायेन तदनाचरणं  कायप्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;किये हुए अतिचारों का मन से त्याग करना यह मनःप्रतिक्रमण है।  हाय ! मैने पाप कार्य किया है ऐसा मन से विचार करना यह मनःप्रतिक्रमण है। सूत्रों  का उच्चारण करना यह वाक्य प्रतिक्रमण है। शरीर के द्वारा दुष्कृत्यों का आचरण न करना यह कायकृत प्रतिक्रमण है । &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;* आलोचना व  प्रतिक्रमण रूप उभय प्रायश्चित्त -&amp;lt;/strong&amp;gt; देखें [[ प्रायश्चित्त#3.1 | प्रायश्चित्त - 3.1]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5&amp;quot; id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt; अप्रतिक्रमण का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         समयसार / तात्पर्यवृत्ति/307/389/17   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अप्रतिक्रमणं द्विविधं भवति ज्ञानिजनाश्रितं अज्ञानिजनाश्रितं चेति । अज्ञानिजनाश्रितं  यदप्रतिक्रमणं तद्विषयकषायपरिणतिरूपं भवति । ज्ञानिजीवाश्रितमप्रतिक्रमणं तु  शुद्धात्मसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानलक्षणं त्रिगुप्तिरूपं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अप्रतिक्रमण दो  प्रकार का है - ज्ञानीजनों के आश्रित और अज्ञानी जनों के आश्रित । अज्ञानी जनों के  आश्रित जो अप्रतिक्रमण है वह विषय कषाय की परिणति रूप है अर्थात् हेयोपादेय के  विवेकशून्य सर्वथा अत्यागरूप निरर्गल प्रवृत्ति है । परंतु ज्ञानी जीवों के आश्रित जो अप्रतिक्रमण है वह शुद्धात्मा के सम्यग्श्रद्धान, ज्ञान व आचरण लक्षण  वाले अभेद रत्नत्रयरूप या त्रिगुप्तिरूप है । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         समयसार / तात्पर्यवृत्ति/283/363/8   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पूर्वानुभूतविषयानुभवरागादिस्मरणरूपमप्रतिक्रमणं द्विविधं, .... द्रव्यभावरूपेण ... ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पूर्वानुभूत विषयों का  अनुभव व रागादिरूप अप्रतिक्रमण दो प्रकार का है - द्रव्य व भाव अप्रतिक्रमण ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        ( ''समयसार/ पं.  जयचंद/284-285'') अतीत काल में जो पर द्रव्यों का ग्रहण किया था उनको वर्तमान में  अच्छा जानना, उनका  संस्कार रहना, उनके प्रति ममत्व भाव का होना सो द्रव्य अप्रतिक्रमण है । उन द्रव्यों के निमित्त से जो रागादि भाव (अतीत काल में) हुए थे,  उनको वर्तमान में भले जानना, उनका संस्कार  रहना, उनके प्रति ममत्व भाव रहना सो भाव अप्रतिक्रमण है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt; प्रतिक्रमण विधि&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.1&amp;quot; id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt; आदि व अंत तीर्थों में प्रतिक्रमण की नितांत आवश्यकता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मूं.आ./628, 630 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;इरियागोयरसुमिणादिसव्वमाचरदु मा व आचरदु ।  पुरिमचरिमादु सव्वे सव्वं णियमा पडिकमंदि ।628। पुरिमचरिमादु जम्हा चलचित्ता चेव  मोहलक्खा य । तो सव्वपडिक्कमणं अंधलघोडय दिट्ठंतो ।630।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;ऋषभदेव और महावीर प्रभु  के शिष्य इन सब ईर्यागोचरी स्वप्नादि से उत्पन्न हुए अतिचारों को प्राप्त हो अथवा  मत प्राप्त हो तो भी प्रतिक्रमण के सब दंडकों को उच्चारण करते हैं ।628। आदि व अंत  के तीर्थंकर के शिष्य चलायमान चित्त वाले होते हैं, मूढ  बुद्धि होते हैं इसलिए वे सब प्रतिक्रमण दंडक उच्चारण करते हैं । इसमें अंधे घोडे का दृष्टांत है कि सब औषधियों के करने से वह सूझता है ।630। (मू.आ./626)  (म.आ./वि./421/696/5) .&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.2&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; शिष्यों का प्रतिक्रमण आलोचना पूर्वक और गुरुका आलोचना के बिना ही होता है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./618 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;काऊण  य किदियम्मं पडिलेहिय अंजलीकरणसुद्धो । आलोचिज्ज सुविहिदो गारव माणं च मोत्तूण  ।618। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;विनयकर्म करके, शरीर,  आसन को पीछी व नेत्र से शुद्ध करके, अंजलि  क्रिया में शुद्ध हुआ निर्मल प्रवृत्ति वाला साधु ऋद्धि आदि गौरव और जाति आदि के  मान को छोड़कर गुरु से अपने अपराधों का निवदेन करें ।618।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         राजवार्तिक/9/22/4/621/22   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;इदमयुक्तं वर्तते । ‘किमत्रायुक्तम्  । अनालोचयतः न किंचिदपि प्रायश्चित्तम्’ इत्युक्तम्,  पुनरुपदिष्टम्—‘प्रतिक्रमणंमात्रमेव शुद्धिकरम्​​​​​​​​’इति  एतदयुक्तम् । अथ तत्राप्यालोचनापूर्वकत्वमभ्युपगम्यते, तदुभयोपदेशो  व्यर्थः, नैष दोषः, सर्व प्रति  क्रमणमालोचनापूर्वकमेव, किंतु पूर्वं गुरुणाभ्यनुज्ञातं  शिष्येणैव कर्त्तव्यम्, इदं पुनर्गुरुणैवानुष्ठेयम् ।&amp;lt;/span&amp;gt; =  &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;शंका -&amp;lt;/strong&amp;gt; पहिले कहा है कि आलोचना किये बिना कुछ भी प्रायश्चित नहीं होता और अब कह  रहे हैं कि प्रतिक्रमण मात्र ही शुद्धिकारी है । इसलिए ऐसा कहना अयुक्त है । यहाँ  भी आलोचना पूर्वक ही जाना जाता है इसलिए तदुभय प्रायश्चित्त का निर्देश करना  व्यर्थ है । &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर-&amp;lt;/strong&amp;gt; यह कोई दोष नहीं है - वास्तव में सभी प्रतिक्रमण आलोचना पूर्वक ही होते हैं। &lt;br /&gt;
 किंतु यहाँ इतनी विशेषता है कि तदुभय प्रायश्चित्त गुरु की आज्ञा  से शिष्य करता है । जहाँ केवल प्रतिक्रमण से दोषशुद्धि होती है वहाँ वह स्वयं गुरु के द्वारा ही किया जाता है क्योंकि गुरु स्वयं किसी अन्य से  आलोचना नहीं करता ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.3&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt; अल्प दोष में गुरु साक्षी आवश्यक नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         धवला 13/5,4,26/60/9 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; एदं (पडिक्कमणं  पायच्छित्तं) कत्थ होदि । अप्पावराहे गुरुहि विणा वट्ठ माणम्हि होदि&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब अपराध  छोटा-सा हो और गुरु समीप न हों, तब यह (प्रतिक्रमण नामका)  प्रायश्चित है ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         चारित्रसार/141/4   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अस्थितानां योगानां धर्मकथादिव्याक्षेपहेतुसंनिधानेन विस्मरणे सत्यालोचनं पुनरनुष्ठायकस्य  संवेगनिर्वेदपदस्य गुरुविरहित स्यास्याल्पापराधस्य पुनर्न करोमि मिथ्या मे  दुष्कृतमित्येवमादिभिर्दोषान्निवर्त्तनं प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्म कथादि में कोई विघ्न के कारण उपस्थित हो जाने पर यदि कोई मुनि अपने स्थिर योगों को भूल जाय तो पहिले  आलोचना करते हैं और फिर वे यदि संवेग और वैराग्य में तत्पर रहें, समीप में गुरु न हों तथा छोटा-सा अपराध लगा हो तो ‘मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूँगा, यह मेरा पाप मिथ्या हो’ इस प्रकार दोषों से अलग रहना प्रतिक्रमण कहलाता है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.4&amp;quot; id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण करने का विषय व विधि&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./616-617  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;पडिकमिदव्बं दव्वं सच्चित्ताचित्तमिस्सियं तिविहं । खेत्तं च गिहादीयं कालो दिवसादिकालम्हि ।116। मिच्छत्तपडिक्कमणं वह चेव असंजमे पडिक्कमणं । कसाएसु  पडिक्कमणं लोगेसु य अप्पसत्थेसु ।617।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सचित्त, अचित्त, मिश्ररूप जो त्यागने  योग्य द्रव्य हैं वह प्रतिक्रमितव्य हैं, घर आदि क्षेत्र हैं, दिवस मुहूर्त आदि काल हैं। जिस  द्रव्य आदि से पापास्रव हो वह त्यागने योग्य है । 616। मिथ्यात्व का प्रतिक्रमण, उसी तरह असंयम का प्रतिक्रमण, क्रोधादि कषायों का प्रतिक्रमण, और अशुभ योगों का प्रतिक्रमण करना चाहिए  ।617।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        देखें [[ प्रतिक्रमण#2.2  | प्रतिक्रमण - 2.2 ]](गुरु समक्ष विनय सहित, शरीर व आसन को पीछी व नेत्र से शुद्ध करके करना चाहिए ) ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        देखें [[ कृतिकर्म#4.3  | कृतिकर्म - 4.3 ]](दैवसिकादि प्रतिक्रमण में सिद्ध भक्ति आदि पाठों का उच्चारण करना चाहिए)  । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./663-665&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt; भत्ते पाणे गामंतरे य चदुमासिवरिसचरिमेसु । णाऊण ठंति धीरा घणिदं दुक्खक्खयट्ठाए  ।663। काओसग्गम्हिठिदो चिंतिदु इरियावधस्स अतिचारं । तं सव्वं समाणित्ता धम्मं  सुक्कं च चिंतेज्जो ।664। तह दिवसियरादियपक्खियचदुमासिवरिसचरिमेसु । तं सव्वं  समाणित्ता धम्मं सुक्कं च झायेज्जो ।665।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; भक्त पान ग्रामांतर, चातुर्मासिक, वार्षिक, उत्तमार्थ जानकर धीर पुरुष अतिशय कर दुख के क्षय निमित्त कायोत्सर्ग में  तिष्ठते हैं ।663। कायोत्सर्ग में निष्ठा, ईर्यापथ के अतिचार  के नाश को चिंतवन करता मुनि उन सब नियमों को समाप्त कर धर्मध्यान और शुक्लध्यान  चिंतवन करो ।664। इसी प्रकार दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, वार्षिक,  उत्तमार्थ - इन सब नियमों को पूर्ण कर धर्मध्यान और शुक्लध्यान  ध्यावै ।665।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.5&amp;quot; id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt; प्रतिक्रमण योग्य काल&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        देखें [[ प्रतिक्रमण#1.3  | प्रतिक्रमण - 1.3 ]](दिन, रात्रि,  पक्ष, वर्ष, व आयु के  अंत में दैवसिकादि प्रतिक्रमण किये जाते हैं ।)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         अनगारधर्मामृत/1/44   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;योगप्रतिक्रमविधिः प्रागुक्तो व्यावहारिकः । कालक्रमनियमोऽत्र न  स्वाध्यायादिवद्यतः ।44। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;रात्रि योग तथा प्रतिक्रमण का जो पहले विधान किया गया है, वह व्यावहारिक है  क्योंकि इनके विषय में काल के क्रम का अर्थात् समयानुपूर्वी का या काल और क्रम का नियम नहीं है । जिस प्रकार स्वाध्यायादि (स्वाध्याय, देव-वंदन और भक्त-प्रत्याख्यान) के विषय में काल और क्रम नियमित माने गये  हैं उस प्रकार रात्रियोग और प्रतिक्रमण के विषय में नहीं ।44।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण  में कायोत्सर्ग के काल का प्रमाण - &amp;lt;/strong&amp;gt;देखें [[ व्युत्सर्ग#1.6  | व्युत्सर्ग - 1.6 ]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण  प्रायश्चित किसको कब दिया जाता है,तथा प्रतिक्रमण के अतिचार  - &amp;lt;/strong&amp;gt;देखें [[ प्रायश्चित्त#4.2  | प्रायश्चित्त - 4.2 ]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण  निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.1&amp;quot; id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण  व सामायिक में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         भगवती आराधना / विजयोदया टीका/116/276/8   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सामायिकस्य प्रतिक्रमणस्य च को भेदः । सावद्ययोगनिवृत्तिः सामायिकं ।  प्रतिक्रमणमपि अशुभमनोवाक्कायनिवृत्तिरेव तत्कथं षडावश्यकव्यवस्था । अत्रोच्यते-  सव्वं सावज्जजोगं पच्चाक्खामाति वचनाद्धिंसादिभेदमनुपादाय सामान्येन  सर्वसावद्ययोगनिवृत्तिः सामायिकं । हिंसादिभेदेन सावद्ययोगविकल्पं कृत्वा ततो  निवृत्तिः प्रतिक्रमणं । ... इंद त्वन्याय्यं प्रतिविधानं . योगशब्देन वीर्यपरिणाम  उच्यते । स च ... क्षायोपशमिको भावस्ततो निवृत्तिर- शुभकर्मादाननिमित्तयोगरूपेण  अपरिणतिरात्मनः सामायिकं । मिथ्यात्वासंयमकषायाश्च दर्शनचारित्रमोहोदयजा औदयिका  ।... तेम्यो विरतिर्व्यावृत्तिः प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt; - सामायिक और प्रतिक्रमण  में क्या भेद हैं ? सावद्य  मन वचन काय की प्रवृत्तियों से विरक्त होना यह सामायिक का लक्षण है और अशुभ मनोवाक्काय की निवृत्ति होना यह  प्रतिक्रमण है । अर्थात् प्रतिक्रमण और सामायिक इनमें कुछ भी भेद नहीं है । इसलिए  छः आवश्यक क्रियाओं की व्यवस्था कैसे होगी ? &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर -&amp;lt;/strong&amp;gt; ‘सर्वसावद्य योगों का मैं त्याग करता हूँ’ ऐसा वचन  अर्थात् प्रतिज्ञा सामायिक में की जाती है । हिंसादिकों के भेद पृथक् न ग्रहण कर  सामान्य से सर्व पापों का त्याग करना सामायिक है   और हिंसादि भेद से सावद्य योग के विकल्प करके उससे विरक्त होना प्रतिक्रमण  है । ... इस रीति से ऊपर के प्रश्न का कोई विद्वान उत्तर देते हैं परंतु यह उनका  उत्तर अयोग्य है । योग शब्द से वीर्य परिणाम ऐसा अर्थ होता है । वह वीर्य परिणाम  वीर्यांतराय कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है, इसलिए वह  क्षायोपशमिक भाव है । ऐसे योग से निवृत्त होना यह सामायिक है । मिथ्यात्व, असंयम और कषाय ये दर्शन व चारित्र मोहनीय कर्म के उदय से आत्मा में  उत्पन्न होते हैं ।... ऐसे परिणामों से विरक्ति होना यह प्रतिक्रमण कहा गया है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.2&amp;quot; id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण व प्रत्याख्यान में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         कषायपाहुड़ 1/1,1/115/1  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पच्चक्खाणपडिक्कमणाणं को भेओ । उच्चदे,  संगगट्ठियदोसाणं दव्व-खेत्त-काल-भावविसयाणं परिच्चाओ । पच्चक्खाणं  णाम । पच्चक्खाणादो अपच्छक्खाणं गंतूण पुणोपच्चक्खाणस्सागमणं पडिक्कमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न  -&amp;lt;/strong&amp;gt; प्रत्याख्यान और प्रतिक्रमण में क्या भेद है । &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर -&amp;lt;/strong&amp;gt; द्रव्य, क्षेत्र , काल और भाव के निमित्त से अपने शरीर में  लगे हुए दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान है   तथा प्रत्याख्यान से अप्रत्याख्यान को प्राप्त होकर पुनः प्रत्याख्यान को  प्राप्त होना प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.3&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt; प्रतिक्रमण के भेदों का परस्पर में अंतर्भाव&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         कषायपाहुड़ 1/1,1/88/113/6  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;सव्वायिचारिय-तिविहाहारचायियपडिक्कमणाणि  उत्तमट्ठाणपडिक्कामणम्मि णिवदंति । अट्ठावीसमूलगुणाइचारविंसयसव्वपडिक्कामणाणि  इरियावहयपडिक्कमम्मि णिवदंति; अवगयअइचारविसयत्तादो ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सर्वातिचारिक और त्रिविधाहार त्यागिक नाम के प्रतिक्रमण उत्तम स्थान प्रतिक्रमण में अंतर्भूत होते हैं । अट्ठाईस मूलगुणों के अतिचार विषयक समस्त प्रतिक्रमण ईर्यापथ प्रतिक्रमण में अंतर्भूत होते हैं, क्योंकि प्रतिक्रमण अवगत अतिचारों को विषय करता है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निश्चय  व्यवहार प्रतिक्रमण की मुख्यता गौणता &amp;lt;/strong&amp;gt;- देखें [[ चारित्र ]]।7&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&amp;lt;/ul&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	  &lt;br /&gt;
	  &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य श्रुत के 14पूर्वों में-से चौथा अंगबाह्य - देखें [[ शब्द_लिंगज_श्रुतज्ञान_विशेष#III.1.5 | शब्द लिंगज श्रुतज्ञान विशेष - III.1.5]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;(1) अंगबाह्यश्रुत के चौदह भेदों में चौथा भेद । द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि में हुए पाप की शुद्धि के लिए किये जाने वाले प्रतिक्रमण का इसमें कथन किया गया है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 10.125, 131 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) मुनि के षडावश्यकों में एक आवश्यक कर्त्तव्य । इसमें द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के विषय में किये हुए प्रमाद का मन, वचन और काय की शुद्धि से निराकरण किया जाता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 34.145  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;(3) प्रायश्चित्त । यह आभ्यंतर तप के नौ भेदों में दूसरा भेद है । इसमें लगे हुए दोषों का प्रायश्चित्त किया जाता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 20.171,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 64.33 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: प]]&lt;br /&gt;
[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A3&amp;diff=106286</id>
		<title>प्रतिक्रमण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A3&amp;diff=106286"/>
		<updated>2022-12-17T13:28:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;==सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;व्यक्ति को  अपनी जीवनयात्रा में कषाय वश पद-पद पर अंतरंग व बाह्य दोष लगा करते हैं, जिनका शोधन एक श्रेयोमार्गी के लिए आवश्यक है ।  भूतकाल में जो दोष लगे हैंउनके शोधनार्थ, प्रायश्चित्त पश्चात्ताप  व गुरुके समक्ष अपनी निंदा-गर्हा करना प्रतिक्रमण कहलाता है । दिन, रात्रि, पक्ष, मास, संवत्सर आदि में लगे दोषों को दूर करने की अपेक्षा वह कई प्रकार हैं ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;भेद  व लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण  सामान्य का लक्षण &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.1&amp;quot;&amp;gt; निरुक्त्यर्थ &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             सर्वार्थसिद्धि/9/22/440/6 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादुष्कृताभिधानादभिव्यक्तप्रतिक्रियं  प्रतिक्रमणम्&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;‘मेरा दोष  मिथ्या हो’ गुरु से ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त  करना प्रतिक्रमण है । ( राजवार्तिक/9/22/3/621/18 ), ( तत्त्वसार/7/239 )&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             गोम्मटसार जीवकांड / जीवतत्त्व प्रदीपिका/367/790/2   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रम्यते प्रमादकृतदैवसिकादिदोषो निराक्रियते अनेनेति प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;प्रमाद  के द्वारा किये दोषों का जिसके द्वारा निराकरण किया जाता है, उसको प्रतिक्रमण कहते हैं ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.2&amp;quot;&amp;gt; दोष  निवृत्ति &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             राजवार्तिक/6/24/11/530/13   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अतीतदोषनिवर्तनं प्रतिक्रमणम् ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कृत दोषों की निवृति प्रतिक्रमण है ।  ( समयसार / तात्पर्यवृत्ति/306/388/9 ) ( भावपाहुड़ टीका/77/221/14 ) । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             धवला  8/3,41/84/6  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पंचमहव्वएसु चउरासीदिलक्खणगुणगणकललिएसु  समुप्पण्णकलंकपक्खालणं पिडक्कमणं णाम ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चौरासी लाख गुणों के समूह से संयुक्त पाँच  महाव्रतों में उत्पन्न हुए मल को धोने का नाम प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना / विजयोदया टीका/421/615/12   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अचेलतादिकल्पस्थितस्य यद्यतिचारो भवेत् प्रतिक्रमणं कर्तव्यमित्येषोऽष्टमः  स्थितिकल्पः । &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अचेलतादि कल्प में रहते हुए जो मुनि को अतिचार लगते हैं उनके  निवारणार्थ प्रतिक्रमण करना अष्टम स्थितिकल्प है । &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.3&amp;quot;&amp;gt; मिथ्या मे  दुष्कृत &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            मू.आ./26 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;दव्वे  खेत्ते काले भावे य किदावराहसोहणयं । णिंदणगरहणजुत्तो मणवचकायेण पडिकमणं ।26.&amp;lt;/span&amp;gt; =  &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव में किया गया जो व्रत में दोष उसका शोधना, आचार्यादि के  समीप आलोचनापूर्वक अपने दोषों को प्रकट करना, वह मुनिराज का  प्रतिक्रमण गुण होता है ।26।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             नियमसार 153   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;वयणमयं पडिकमणं ... जाण सज्झाउं ।153।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;वचनमय प्रतिक्रमण ... यह स्वाध्याय जान । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             धवला/13/5,4,26/60/8  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;गुरणमालोचणाएविणा  ससंवेणणिव्वेयस्स पुणो ण करेमि त्ति जमवराहादो णियत्तणं पडिक्कमणं णाम  पायच्छित्तं । &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गुरुओं के सामने आलोचना किये बिना संवेग और निर्वेद से युक्त साधु का फिर कभी ऐसा न करूँगा यह कहकर अपने अपराध से निवृत्त होना प्रतिक्रमण नाम का  प्रायश्चित्त है । ( अनगारधर्मामृत/7/47 ) ( भावपाहुड़/78/223/5 ) ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना/ वि/6/32/19&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; स्वकृतादशुभयोगात्प्रतिनिवृत्तिः प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; स्वतः के द्वारा किये हुए अशुभ योग से परावर्त होना अर्थात् ‘मेरे अपराध मिथ्या होवें’ ऐसा कहकर पश्चात्ताप करना  प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt; निश्चय प्रतिक्रमण का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.2.1&amp;quot;&amp;gt;शुद्ध नय की  अपेक्षा &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            सा.सा./मू./383  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;कम्मं जं पुव्वकयं सुहासुहमणेयवित्थरविसेसं । ततो णियत्तए अप्पयं तु जो सो  पडिक्कमणं ।383।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पूर्वकृत जो अनेक प्रकार के विस्तार वाला शुभ व अशुभ कर्म है, उससे जो आत्मा अपने को दूर रखता है वह आत्मा  प्रतिक्रमण है ।383।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             नियमसार/83-84   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;मोत्तूण वयणरयणं रागादीभाववरणणं किच्चा । अप्पाणं जो झायदि जस्स दु होदित्ति  पडिकमणं ।83। आराहणाइ वट्टइ मोचूण विराहणं विसेसेण । सो पडिकमणं उच्चइ पडिकमणमओ हवे  जम्हा ।84। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; वचन रचना को छोड़कर, रागादि भावों का निवारण करके, जो आत्मा को ध्याता है,  उसे प्रतिक्रमण होता है ।83। जो (जीव) विराधना को विशेषतः छोड़कर  आराधना में वर्तता है, वह (जीव) प्रतिक्रमण कहलाता है,  कारण कि वह प्रतिक्रमणमय है । 84। (इसी प्रकार अनाचार को छोड़कर आचार  में, उन्मार्ग का त्याग करके जिनमार्ग में, शल्यभाव को छोड़कर निःशल्य भाव से, अगुप्ति भाव को  छोड़कर त्रिगुप्ति गुप्त से, आर्त-रौद्र ध्यान को छोड़कर धर्म अथवा शुक्ल ध्यान को, मिथ्यादर्शन आदि को छोड़कर सम्यक् दर्शन को भाता है वह जीव प्रतिक्रमण है । ( नियमसार/85-91 ) ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना / विजयोदया टीका/10/49/10 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; कृतातिचारस्य यतेस्तदतिचारपराङ्मुखतो योगत्रयेण हा दुष्टं कृतं चिंतितमनुमंतं  चेति परिणामः प्रतिक्रमणम् ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब मुनि को चारित्र पालते समय दोष लगते हैं तब मन-वचन-योग से मैंने हा !दुष्ट कार्य किया, कराया व करने वालों का अनुमोदन किया,यह अयोग्य किया, ऐसे आत्मा के परिणाम को प्रतिक्रमण कहते हैं । &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2.2&amp;quot;&amp;gt; निश्चय नय  की अपेक्षा &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             नियमसार/82   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;उत्तमअट्ठ आदा तम्हि हिदा हणदि मुणिवराकम्मं । तम्हा दु झाणमेव हि उत्तम अट्ठस्स  पडिकमणं ।92।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;उत्तमार्थ (अर्थात् उत्तम पदार्थ सच्चिदानंदरूप कारण  समयसारस्वरूप) आत्मा में स्थित मुनिवर कर्म का घात करते हैं, इसलिए ध्यान ही वास्तव में उत्तमार्थ का प्रतिक्रमण  है ।82।( नयचक्र बृहद्/346 ) ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             तिलोयपण्णत्ति/9/49   &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;पडिकमणं पडिसरणं पडिहरणं धारणा णियत्ती य । णिंदणगरुहणसोही लब्भंति णियादभावणए  ।49।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निजात्मा भावना से प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, प्रतिहरण, धारणा,  निवृत्ति, निंदन, गर्हण और शुद्धि को प्राप्त होते हैं ।49।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             योगसार (अमितगति)/5/50   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;कृतानां कर्मणां पूर्वं सर्वेषां पाकमीयुषां । आत्मीयत्वपरित्यागः  प्रतिक्रमणमीर्यते ।50। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पहिले किये हुए कर्मों के प्रदत्त फलों को अपना न मानना  प्रतिक्रमण कहा जाता है । 50। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति/207/281/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;निजशुद्धात्मपरिणतिलक्षणा या तु क्रिया सा निश्चयेन बृहत्प्रतिक्रमणा भण्यते ।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; निज शुद्धात्म परिणति है लक्षण जिसका ऐसी जो क्रिया है, वह निश्चय नय से बृहत्प्रतिक्रमण कही जाती है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण  के भेद&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.3.1&amp;quot;&amp;gt;दैवसिक आदि  की अपेक्षा &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            मू.आ./120,613 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;पढमं सव्वदिचारं विदियं तिविहं हवैं पडिक्कमणं ।  पाणस्स परिच्चयणं जावज्जीवुत्तमट्ठं च ।120। पडिकमणं देवसियं रादिय इरियापधं च  बोधव्वं । पक्खिय चादुम्मासिय संवच्छरमुत्तमट्ठं च ।613।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पहला सर्वातिचार  प्रतिक्रमण है अर्थात् दीक्षा ग्रहण से लेकर सब तपश्चरण के काल तक जो दोष लगे हों  उनकी शुद्धि करना, दूसरा त्रिविध प्रतिक्रमण है वह जल के  बिनातीन प्रकार के आहार का त्याग करने में जो अतिचार लगे थे उनका शोधन करना और  तीसरा उत्तमार्थ प्रतिक्रमण है उसमें जीवन पर्यंत जल पीने का त्याग किया था,  उसके दोषों की शुद्धि करना है ।120। अतिचारों से निवृत्ति होना वह  प्रतिक्रमण है। वह दैवसिक, रात्रिक, ऐर्यापथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, सांवत्सरिकऔर  उत्तमार्थ प्रतिक्रमण ऐसे सात प्रकार हैं /613/( कषायपाहुड़ 1 ); (6,1/88/113/6) (गो.जो./जी.प्र./367/710/3) ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.3.2&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य, क्षेत्र आदि की अपेक्षा&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
             भगवती आराधना / विजयोदया टीका/116/275/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमणं प्रतिनिवृत्तिः षोढा भिद्यते नामस्थापनाद्रव्यक्षेत्रकालभावविकल्पेन ।  .... केषांचिद्वयाख्यानं । चतुर्विधमित्यपरे ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अशुभ से निवृत्त होना प्रतिक्रमण  है, उसके छह भेद हैं - नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र,  काल और भाव प्रतिक्रमण । ऐसे कितने आचार्यों का मत है । कोई आचार्य  प्रतिक्रमण के चार भेद कहते हैं ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt;नाम  स्थापनादि प्रतिक्रमण के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         भगवती आराधना / विजयोदया टीका/116/275/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अयोग्यनाम्नामनुच्चारणं नामप्रतिक्रमणं । ... आप्ताभासप्रतिमायां पुरः स्थिताया  यदभिमुखतया कृतांजलिपुटता, शिरोवनति  ... न कर्तव्यम् । एवं सा स्थापना परिहुता भवति । त्रस-स्थावरस्थापनानामविनाशनं  अमर्द्दनं अताडनं वा परिहारप्रतिक्रमणं । ... उद्गमोत्पादनैषणादोषदुष्टनां वसतीनं  उपकरणानां, भिक्षाणां च परिहरणं, अयोग्यानां  चाहारादीनां, गृद्धदर्पस्य च कारणानां संक्लेशहेतूनां वा  निरसनं द्रव्यप्रतिक्रमणं । उदक-कर्द्दमत्रसस्थावरनिचितेषु क्षेत्रेषु  गमनादिवर्जनं क्षेत्रप्रतिक्रमणं । यस्मिन्वा क्षेत्रे वसतो रत्नत्रयहानिर्भवति  तस्य वा परिहारः । ... रात्रिसंध्यात्रयस्वाध्यायावश्यककालेषु  गमनागमनादिव्यापाराकारणात् कालप्रतिक्रमणं । ... आर्तरौद्रमित्यादयोऽशुभपरिणामाः,  पुण्यास्रवभूताश्च शुभपरिणामा; इह भावशब्देन,  गृह्यंते, तेभ्यो निवृत्तिर्भावप्रतिक्रमणं  इति ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अयोग्य नामों का उच्चारण न करना यह नाम प्रतिक्रमण है । ... आप्ताभास की  प्रतिमा के आगे खड़े होकर हाथ जोड़ना, मस्तक नवाना, द्रव्य से पूजा करना, इस प्रकार के स्थापना का त्याग  करना, अथवा त्रस, वा स्थावर जीवों की  स्थापनाओं का नाश करना, मर्दन तथा ताड़न आदि का त्याग करना  स्थापना प्रतिक्रमण है ।... उद्गमादि दोष युक्त वसतिका, उपकरण  व आहार का त्याग करना, अयोग्य अभिलाषा, उन्मत्तता तथा संक्लेश परिणाम को बढ़ाने वाले आहारादिका त्याग करना,  यह सब द्रव्य प्रतिक्रमण है । पानी, कीचड़,  त्रसजीव, स्थावर जीवों से व्याप्त प्रदेश,  तथा रत्नत्रय की हानि जहाँ हो ऐसे प्रदेश का त्याग करना क्षेत्र  प्रतिक्रमण है । .... रात्रि, तीनों संध्याओं में, स्वाध्यायकाल, आवश्यक क्रिया के कालों में आने-जाने  का त्याग करना यह काल प्रतिक्रमण है । ... आर्त-रौद्र इत्यादिक अशुभ परिणाम व  पुण्यास्रव के कारणभूत शुभ परिणाम का त्याग करना भाव प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         भगवती आराधना / विजयोदया टीका/509/728/14   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;हा दुष्कृतमिति वा मनःप्रतिक्रमणं । सूत्रोच्चारणं वाक्य-प्रतिक्रमणं । कायेन तदनाचरणं  कायप्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;किये हुए अतिचारों का मन से त्याग करना यह मनःप्रतिक्रमण है।  हाय ! मैने पाप कार्य किया है ऐसा मन से विचार करना यह मनःप्रतिक्रमण है। सूत्रों  का उच्चारण करना यह वाक्य प्रतिक्रमण है। शरीर के द्वारा दुष्कृत्यों का आचरण न करना यह कायकृत प्रतिक्रमण है । &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5&amp;quot; id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt; अप्रतिक्रमण का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         समयसार / तात्पर्यवृत्ति/307/389/17   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अप्रतिक्रमणं द्विविधं भवति ज्ञानिजनाश्रितं अज्ञानिजनाश्रितं चेति । अज्ञानिजनाश्रितं  यदप्रतिक्रमणं तद्विषयकषायपरिणतिरूपं भवति । ज्ञानिजीवाश्रितमप्रतिक्रमणं तु  शुद्धात्मसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानलक्षणं त्रिगुप्तिरूपं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अप्रतिक्रमण दो  प्रकार का है - ज्ञानीजनों के आश्रित और अज्ञानी जनों के आश्रित । अज्ञानी जनों के  आश्रित जो अप्रतिक्रमण है वह विषय कषाय की परिणति रूप है अर्थात् हेयोपादेय के  विवेकशून्य सर्वथा अत्यागरूप निरर्गल प्रवृत्ति है । परंतु ज्ञानी जीवों के आश्रित जो अप्रतिक्रमण है वह शुद्धात्मा के सम्यग्श्रद्धान, ज्ञान व आचरण लक्षण  वाले अभेद रत्नत्रयरूप या त्रिगुप्तिरूप है । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         समयसार / तात्पर्यवृत्ति/283/363/8   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पूर्वानुभूतविषयानुभवरागादिस्मरणरूपमप्रतिक्रमणं द्विविधं, .... द्रव्यभावरूपेण ... ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पूर्वानुभूत विषयों का  अनुभव व रागादिरूप अप्रतिक्रमण दो प्रकार का है - द्रव्य व भाव अप्रतिक्रमण ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         समयसार/ पं.  जयचंद/284-285 अतीत काल में जो पर द्रव्यों का ग्रहण किया था उनको वर्तमान में  अच्छा जानना, उनका  संस्कार रहना, उनके प्रति ममत्व भाव का होना सो द्रव्य अप्रतिक्रमण है । उन द्रव्यों के निमित्त से जो रागादि भाव (अतीत काल में) हुए थे,  उनको वर्तमान में भले जानना, उनका संस्कार  रहना, उनके प्रति ममत्व भाव रहना सो भाव अप्रतिक्रमण है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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        मूं.आ./628, 630 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;इरियागोयरसुमिणादिसव्वमाचरदु मा व आचरदु ।  पुरिमचरिमादु सव्वे सव्वं णियमा पडिकमंदि ।628। पुरिमचरिमादु जम्हा चलचित्ता चेव  मोहलक्खा य । तो सव्वपडिक्कमणं अंधलघोडय दिट्ठंतो ।630।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;ऋषभदेव और महावीर प्रभु  के शिष्य इन सब ईर्यागोचरी स्वप्नादि से उत्पन्न हुए अतिचारों को प्राप्त हो अथवा  मत प्राप्त हो तो भी प्रतिक्रमण के सब दंडकों को उच्चारण करते हैं ।628। आदि व अंत  के तीर्थंकर के शिष्य चलायमान चित्त वाले होते हैं, मूढ  बुद्धि होते हैं इसलिए वे सब प्रतिक्रमण दंडक उच्चारण करते हैं । इसमें अंधे घोडे का दृष्टांत है कि सब औषधियों के करने से वह सूझता है ।630। (मू.आ./626)  (म.आ./वि./421/696/5) .&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.2&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; शिष्यों का प्रतिक्रमण आलोचना पूर्वक और गुरुका आलोचना के बिना ही होता है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./618 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;काऊण  य किदियम्मं पडिलेहिय अंजलीकरणसुद्धो । आलोचिज्ज सुविहिदो गारव माणं च मोत्तूण  ।618। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;विनयकर्म करके, शरीर,  आसन को पीछी व नेत्र से शुद्ध करके, अंजलि  क्रिया में शुद्ध हुआ निर्मल प्रवृत्ति वाला साधु ऋद्धि आदि गौरव और जाति आदि के  मान को छोड़कर गुरु से अपने अपराधों का निवदेन करें ।618।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         राजवार्तिक/9/22/4/621/22   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;इदमयुक्तं वर्तते । ‘किमत्रायुक्तम्  । अनालोचयतः न किंचिदपि प्रायश्चित्तम्’ इत्युक्तम्,  पुनरुपदिष्टम्—‘प्रतिक्रमणंमात्रमेव शुद्धिकरम्​​​​​​​​’इति  एतदयुक्तम् । अथ तत्राप्यालोचनापूर्वकत्वमभ्युपगम्यते, तदुभयोपदेशो  व्यर्थः, नैष दोषः, सर्व प्रति  क्रमणमालोचनापूर्वकमेव, किंतु पूर्वं गुरुणाभ्यनुज्ञातं  शिष्येणैव कर्त्तव्यम्, इदं पुनर्गुरुणैवानुष्ठेयम् ।&amp;lt;/span&amp;gt; =  &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;शंका -&amp;lt;/strong&amp;gt; पहिले कहा है कि आलोचना किये बिना कुछ भी प्रायश्चित नहीं होता और अब कह  रहे हैं कि प्रतिक्रमण मात्र ही शुद्धिकारी है । इसलिए ऐसा कहना अयुक्त है । यहाँ  भी आलोचना पूर्वक ही जाना जाता है इसलिए तदुभय प्रायश्चित्त का निर्देश करना  व्यर्थ है । &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर-&amp;lt;/strong&amp;gt; यह कोई दोष नहीं है - वास्तव में सभी प्रतिक्रमण आलोचना पूर्वक ही होते हैं। &lt;br /&gt;
 किंतु यहाँ इतनी विशेषता है कि तदुभय प्रायश्चित्त गुरु की आज्ञा  से शिष्य करता है । जहाँ केवल प्रतिक्रमण से दोषशुद्धि होती है वहाँ वह स्वयं गुरु के द्वारा ही किया जाता है क्योंकि गुरु स्वयं किसी अन्य से  आलोचना नहीं करता ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.3&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt; अल्प दोष में गुरु साक्षी आवश्यक नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         धवला 13/5,4,26/60/9 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; एदं (पडिक्कमणं  पायच्छित्तं) कत्थ होदि । अप्पावराहे गुरुहि विणा वट्ठ माणम्हि होदि&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब अपराध  छोटा-सा हो और गुरु समीप न हों, तब यह (प्रतिक्रमण नामका)  प्रायश्चित है ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         चारित्रसार/141/4   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अस्थितानां योगानां धर्मकथादिव्याक्षेपहेतुसंनिधानेन विस्मरणे सत्यालोचनं पुनरनुष्ठायकस्य  संवेगनिर्वेदपदस्य गुरुविरहित स्यास्याल्पापराधस्य पुनर्न करोमि मिथ्या मे  दुष्कृतमित्येवमादिभिर्दोषान्निवर्त्तनं प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्म कथादि में कोई विघ्न के कारण उपस्थित हो जाने पर यदि कोई मुनि अपने स्थिर योगों को भूल जाय तो पहिले  आलोचना करते हैं और फिर वे यदि संवेग और वैराग्य में तत्पर रहें, समीप में गुरु न हों तथा छोटा-सा अपराध लगा हो तो ‘मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूँगा, यह मेरा पाप मिथ्या हो’ इस प्रकार दोषों से अलग रहना प्रतिक्रमण कहलाता है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.4&amp;quot; id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण करने का विषय व विधि&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./616-617  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;पडिकमिदव्बं दव्वं सच्चित्ताचित्तमिस्सियं तिविहं । खेत्तं च गिहादीयं कालो दिवसादिकालम्हि ।116। मिच्छत्तपडिक्कमणं वह चेव असंजमे पडिक्कमणं । कसाएसु  पडिक्कमणं लोगेसु य अप्पसत्थेसु ।617।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सचित्त, अचित्त, मिश्ररूप जो त्यागने  योग्य द्रव्य हैं वह प्रतिक्रमितव्य हैं, घर आदि क्षेत्र हैं, दिवस मुहूर्त आदि काल हैं। जिस  द्रव्य आदि से पापास्रव हो वह त्यागने योग्य है । 616। मिथ्यात्व का प्रतिक्रमण, उसी तरह असंयम का प्रतिक्रमण, क्रोधादि कषायों का प्रतिक्रमण, और अशुभ योगों का प्रतिक्रमण करना चाहिए  ।617।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        देखें [[ प्रतिक्रमण#2.2  | प्रतिक्रमण - 2.2 ]](गुरु समक्ष विनय सहित, शरीर व आसन को पीछी व नेत्र से शुद्ध करके करना चाहिए ) ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        देखें [[ कृतिकर्म#4.3  | कृतिकर्म - 4.3 ]](दैवसिकादि प्रतिक्रमण में सिद्ध भक्ति आदि पाठों का उच्चारण करना चाहिए)  । &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./663-665&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt; भत्ते पाणे गामंतरे य चदुमासिवरिसचरिमेसु । णाऊण ठंति धीरा घणिदं दुक्खक्खयट्ठाए  ।663। काओसग्गम्हिठिदो चिंतिदु इरियावधस्स अतिचारं । तं सव्वं समाणित्ता धम्मं  सुक्कं च चिंतेज्जो ।664। तह दिवसियरादियपक्खियचदुमासिवरिसचरिमेसु । तं सव्वं  समाणित्ता धम्मं सुक्कं च झायेज्जो ।665।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; भक्त पान ग्रामांतर, चातुर्मासिक, वार्षिक, उत्तमार्थ जानकर धीर पुरुष अतिशय कर दुख के क्षय निमित्त कायोत्सर्ग में  तिष्ठते हैं ।663। कायोत्सर्ग में निष्ठा, ईर्यापथ के अतिचार  के नाश को चिंतवन करता मुनि उन सब नियमों को समाप्त कर धर्मध्यान और शुक्लध्यान  चिंतवन करो ।664। इसी प्रकार दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, वार्षिक,  उत्तमार्थ - इन सब नियमों को पूर्ण कर धर्मध्यान और शुक्लध्यान  ध्यावै ।665।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.5&amp;quot; id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt; प्रतिक्रमण योग्य काल&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        देखें [[ प्रतिक्रमण#1.3  | प्रतिक्रमण - 1.3 ]](दिन, रात्रि,  पक्ष, वर्ष, व आयु के  अंत में दैवसिकादि प्रतिक्रमण किये जाते हैं ।)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         अनगारधर्मामृत/1/44   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;योगप्रतिक्रमविधिः प्रागुक्तो व्यावहारिकः । कालक्रमनियमोऽत्र न  स्वाध्यायादिवद्यतः ।44। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;रात्रि योग तथा प्रतिक्रमण का जो पहले विधान किया गया है, वह व्यावहारिक है  क्योंकि इनके विषय में काल के क्रम का अर्थात् समयानुपूर्वी का या काल और क्रम का नियम नहीं है । जिस प्रकार स्वाध्यायादि (स्वाध्याय, देव-वंदन और भक्त-प्रत्याख्यान) के विषय में काल और क्रम नियमित माने गये  हैं उस प्रकार रात्रियोग और प्रतिक्रमण के विषय में नहीं ।44।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण  में कायोत्सर्ग के काल का प्रमाण - &amp;lt;/strong&amp;gt;देखें [[ व्युत्सर्ग#1.6  | व्युत्सर्ग - 1.6 ]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण  प्रायश्चित किसको कब दिया जाता है,तथा प्रतिक्रमण के अतिचार  - &amp;lt;/strong&amp;gt;देखें [[ प्रायश्चित्त#4.2  | प्रायश्चित्त - 4.2 ]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण  निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.1&amp;quot; id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;प्रतिक्रमण  व सामायिक में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         भगवती आराधना / विजयोदया टीका/116/276/8   &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सामायिकस्य प्रतिक्रमणस्य च को भेदः । सावद्ययोगनिवृत्तिः सामायिकं ।  प्रतिक्रमणमपि अशुभमनोवाक्कायनिवृत्तिरेव तत्कथं षडावश्यकव्यवस्था । अत्रोच्यते-  सव्वं सावज्जजोगं पच्चाक्खामाति वचनाद्धिंसादिभेदमनुपादाय सामान्येन  सर्वसावद्ययोगनिवृत्तिः सामायिकं । हिंसादिभेदेन सावद्ययोगविकल्पं कृत्वा ततो  निवृत्तिः प्रतिक्रमणं । ... इंद त्वन्याय्यं प्रतिविधानं . योगशब्देन वीर्यपरिणाम  उच्यते । स च ... क्षायोपशमिको भावस्ततो निवृत्तिर- शुभकर्मादाननिमित्तयोगरूपेण  अपरिणतिरात्मनः सामायिकं । मिथ्यात्वासंयमकषायाश्च दर्शनचारित्रमोहोदयजा औदयिका  ।... तेम्यो विरतिर्व्यावृत्तिः प्रतिक्रमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt; - सामायिक और प्रतिक्रमण  में क्या भेद हैं ? सावद्य  मन वचन काय की प्रवृत्तियों से विरक्त होना यह सामायिक का लक्षण है और अशुभ मनोवाक्काय की निवृत्ति होना यह  प्रतिक्रमण है । अर्थात् प्रतिक्रमण और सामायिक इनमें कुछ भी भेद नहीं है । इसलिए  छः आवश्यक क्रियाओं की व्यवस्था कैसे होगी ? &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर -&amp;lt;/strong&amp;gt; ‘सर्वसावद्य योगों का मैं त्याग करता हूँ’ ऐसा वचन  अर्थात् प्रतिज्ञा सामायिक में की जाती है । हिंसादिकों के भेद पृथक् न ग्रहण कर  सामान्य से सर्व पापों का त्याग करना सामायिक है   और हिंसादि भेद से सावद्य योग के विकल्प करके उससे विरक्त होना प्रतिक्रमण  है । ... इस रीति से ऊपर के प्रश्न का कोई विद्वान उत्तर देते हैं परंतु यह उनका  उत्तर अयोग्य है । योग शब्द से वीर्य परिणाम ऐसा अर्थ होता है । वह वीर्य परिणाम  वीर्यांतराय कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है, इसलिए वह  क्षायोपशमिक भाव है । ऐसे योग से निवृत्त होना यह सामायिक है । मिथ्यात्व, असंयम और कषाय ये दर्शन व चारित्र मोहनीय कर्म के उदय से आत्मा में  उत्पन्न होते हैं ।... ऐसे परिणामों से विरक्ति होना यह प्रतिक्रमण कहा गया है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.2&amp;quot; id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रतिक्रमण व प्रत्याख्यान में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         कषायपाहुड़ 1/1,1/115/1  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पच्चक्खाणपडिक्कमणाणं को भेओ । उच्चदे,  संगगट्ठियदोसाणं दव्व-खेत्त-काल-भावविसयाणं परिच्चाओ । पच्चक्खाणं  णाम । पच्चक्खाणादो अपच्छक्खाणं गंतूण पुणोपच्चक्खाणस्सागमणं पडिक्कमणं ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न  -&amp;lt;/strong&amp;gt; प्रत्याख्यान और प्रतिक्रमण में क्या भेद है । &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर -&amp;lt;/strong&amp;gt; द्रव्य, क्षेत्र , काल और भाव के निमित्त से अपने शरीर में  लगे हुए दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान है   तथा प्रत्याख्यान से अप्रत्याख्यान को प्राप्त होकर पुनः प्रत्याख्यान को  प्राप्त होना प्रतिक्रमण है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.3&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt; प्रतिक्रमण के भेदों का परस्पर में अंतर्भाव&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
         कषायपाहुड़ 1/1,1/88/113/6  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;सव्वायिचारिय-तिविहाहारचायियपडिक्कमणाणि  उत्तमट्ठाणपडिक्कामणम्मि णिवदंति । अट्ठावीसमूलगुणाइचारविंसयसव्वपडिक्कामणाणि  इरियावहयपडिक्कमम्मि णिवदंति; अवगयअइचारविसयत्तादो ।&amp;lt;/span&amp;gt; = &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सर्वातिचारिक और त्रिविधाहार त्यागिक नाम के प्रतिक्रमण उत्तम स्थान प्रतिक्रमण में अंतर्भूत होते हैं । अट्ठाईस मूलगुणों के अतिचार विषयक समस्त प्रतिक्रमण ईर्यापथ प्रतिक्रमण में अंतर्भूत होते हैं, क्योंकि प्रतिक्रमण अवगत अतिचारों को विषय करता है ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निश्चय  व्यवहार प्रतिक्रमण की मुख्यता गौणता &amp;lt;/strong&amp;gt;- देखें [[ चारित्र ]]।7&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&amp;lt;/ul&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
	  &lt;br /&gt;
	  &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य श्रुत के 14पूर्वों में-से चौथा अंगबाह्य - देखें [[ शब्द_लिंगज_श्रुतज्ञान_विशेष#III.1.5 | शब्द लिंगज श्रुतज्ञान विशेष - III.1.5]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
	  &lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;(1) अंगबाह्यश्रुत के चौदह भेदों में चौथा भेद । द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि में हुए पाप की शुद्धि के लिए किये जाने वाले प्रतिक्रमण का इसमें कथन किया गया है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 10.125, 131 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) मुनि के षडावश्यकों में एक आवश्यक कर्त्तव्य । इसमें द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के विषय में किये हुए प्रमाद का मन, वचन और काय की शुद्धि से निराकरण किया जाता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 34.145  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;(3) प्रायश्चित्त । यह आभ्यंतर तप के नौ भेदों में दूसरा भेद है । इसमें लगे हुए दोषों का प्रायश्चित्त किया जाता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 20.171,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 64.33 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: प]]&lt;br /&gt;
[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE&amp;diff=106285</id>
		<title>अप्रतिकर्म</title>
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		<updated>2022-12-17T13:27:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 205 परमोपेक्षासंयमबलेन देहप्रतिकाररहितत्वादिप्रतिकर्म भवति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= परमोपेक्षा संयम के बल से देह के प्रतिकार रहित होने से अप्रतिकर्म होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;br /&gt;
[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%8D&amp;diff=106284</id>
		<title>अप्रणीतवाक्</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%8D&amp;diff=106284"/>
		<updated>2022-12-17T13:14:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p&amp;gt;दे [[वचन]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
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&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A4%AE&amp;diff=106114</id>
		<title>आगम</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A4%AE&amp;diff=106114"/>
		<updated>2022-12-15T12:58:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आचार्य परंपरा से आगत मूल सिद्धांत को आगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैनागम यद्यपि मूल में अत्यंत विस्तृत है पर काल दोष से इसका अधिकांश भाग नष्ट हो गया है। उस आगम की सार्थकता उसकी शब्द रचना के कारण नहीं बल्कि उसके भाव प्रतिपादन के कारण है। इसलिए शब्द रचना को उपचार मात्र से आगम कहा गया है। इसके भाव को ठीक-ठीक ग्रहण करने के लिए पाँच प्रकार से इसका अर्थ करने की विधि है - शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ व भावार्थ, शब्द का अर्थ यद्यपि क्षेत्र कालादि के अनुसार बदल जाता है पर भावार्थ वही रहता है, इसी से शब्द बदल जाने पर भी आगम अनादि कहा जाता है आगम भी प्रमाण स्वीकार किया गया है क्योंकि पक्षपात रहित वीतराग गुरुओं द्वारा प्रतिपादित होनेसे पूर्वापर विरोध से रहित है। शब्द रचना की अपेक्षा यद्यपि वह पौरुषेय है पर अनादिगत भावकी अपेक्षा अपौरुषेय है। आगम की अधिकतर रचना सूत्रो में होती है क्योंकि सूत्रों द्वारा बहुत अधिक अर्थ थोड़े शब्दो में ही किया जाना संभव है। पीछे से अल्पबुद्धियों के लिए आचार्यों ने उन सूत्रों की टीकाएँ रची हैं। वे ही टीकाएँ भी उन्हीं मूल सूत्रों के भाव का प्रतिपादन करने के कारण प्रामाणिक हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;आगम सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.1 | 	आगम सामान्य का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.2 | 	आगमाभास का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.3 | 	नोआगम का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम व नोआगमादि द्रव्य भाव निक्षेप तथा स्थित जित आदि द्रव्य निक्षेप - देखें [[ निक्षेप_5#5.1 ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम की अनंतता - देखें [[ आगम#1.11 | आगम - 1.11]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के नंदा भद्रा आदि भेद - देखें [[ वाचना ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.4 | 	शब्द या आगम प्रमाण का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.5 | 	शब्द प्रमाण का श्रुतज्ञान में अंतर्भाव]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.6 | 	आगम अनादि है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.7 | 	आगम गणधरादि गुरु परंपरा से आगत है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.8 | 	आगम ज्ञान के अतिचार]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.9 | 	श्रुत के अतिचार]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.10 | 	 द्रव्य श्रुत के अपुनरूक्त अक्षर]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.11 | 	 श्रुत का बहुत कम भाग लिखने में आया है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.12 | 	 आगम की बहुत सी बातें नष्ट हो चुकी हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.13 | 	 आगम के विस्तार का कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.14 | 	 आगम के विच्छेद संबंधी भविष्यवाणी]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के चारों अनुयोगों संबंधी - देखें [[ अनुयोग ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	मोक्षमार्ग में आगम ज्ञान का स्थान - देखें [[ स्वाध्याय ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम परंपरा की समयानुक्रमिक सारणी - दे [[इतिहास#7 |इतिहास-7]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम ज्ञान में विनय का स्थान - देखें [[ विनय#2 | विनय - 2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के आदान प्रदान में पात्र अपात्र का विचार - देखें [[ उपदेश#3 | उपदेश - 3]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के पठन पाठन संबंधी - देखें [[ स्वाध्याय ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	पठित ज्ञान के संस्कार साथ जाते हैं - देखें [[ संस्कार#1.2 |संस्कार-1.2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;द्रव्य भाव और ज्ञान निर्देश व समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के ज्ञान में सम्यक दर्शन स्थान - देखें [[ ज्ञान#III.2 | ज्ञान - III.2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम ज्ञान में चारित्र का स्थान - देखें [[ चारित्र#5 | चारित्र - 5]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.1 | 	वास्तव में भाव श्रुत ही ज्ञान है द्रव्यश्रुत ज्ञान नहीं ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.2 | 	भाव का ग्रहण ही आगम है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	श्रुतज्ञान के अंग पूर्वादि भेदों का परिचय - देखें [[ श्रुतज्ञान#III | श्रुतज्ञान - III]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.3 | 	द्रव्य श्रुत को ज्ञान कहने का कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.4 | 	द्रव्य श्रुत के भेदादि जानने का प्रयोजन]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.5 | 	आगमों को श्रुतज्ञान कहना उपचार है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	निश्चय व्यवहार सम्यग्ज्ञान - देखें [[ ज्ञान#4.1 | ज्ञान - IV]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम का अर्थ करने की विधि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.1 | पाँच प्रकार अर्थ करने का विधान]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	शब्दार्थ - देखें [[ आगम#4 | आगम - 4]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.2 | 	मतार्थ करने का कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.3 | 	नय निक्षेपार्थ करने की विधि]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सूक्ष्मादि पदार्थ केवल आगम प्रमाण से जाने जाते हैं, वे तर्क का विषय नहीं - देखें [[ न्याय#1 | न्याय - 1]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.4 | 	आगमार्थ करने की विधि -]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.1 | पूर्वापर मिलान पूर्वक]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.2 |  परंपरा का ध्यान रखकर]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.3 |  शब्द का नहीं भाव का ग्रहण करना चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	आगम की परीक्षा में अनुभव की प्रधानता - देखें [[ अनुभव ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.4 | 	भावार्थ करने की विधि]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.5 | 	आगम में व्याकरण की प्रधानता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.6 | 	आगम में व्याकरण की गौणता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.7 | 	अर्थ समझने संबंधी कुछ विशेष नियम]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.8 | 	विरोधी बातें आने पर दोनों का संग्रह कर लें]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.9 | 	व्याख्यान की अपेक्षा सूत्र वचन प्रमाण होता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.10 | 	यथार्थ का निर्णय हो जाने पर भूल सुधार लेनी चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;शब्दार्थ संबंधी विषय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.1 | शब्द में अर्थ प्रतिपादन की योग्यता व शंका]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.2 | भिन्न-भिन्न शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.3 | जितने शब्द हैं उतने वाच्य पदार्थ भी हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.4 | अर्थ व शब्द में वाच्य वाचक भाव कैसे हो सकता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.5 | शब्द अल्प हैं और अर्थ अनंत हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.6 | अर्थ प्रतिपादन की अपेक्षा शब्दमें प्रमाण व नयपना ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.7 | शब्द का अर्थ देश कालानुसार करना चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.8 | भिन्न क्षेत्र कालादि में शब्द का अर्थ भिन्न भी होता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #4.8.1 |  कालकी अपेक्षा।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #4.8.2 |  शास्त्रोंकी अपेक्षा।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #4.8.3 |  क्षेत्रकी अपेक्षा।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.9 | शब्दार्थ गौणता संबंधी उदाहरण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम की प्रमाणिकता में हेतु&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.1 | आगम की प्रामाणिकता निर्देश]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.2 | वक्ता की प्रामाणिकता से वचन की प्रामाणिकता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.3 | आगम की प्रामाणिकता के उदाहरण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.4 | अर्हत् व अतिशय ज्ञान वालों के द्वारा प्रणीत होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.5 | वीतराग द्वारा प्रणीत होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.6 | गणधरादि आचार्यों द्वारा कथित होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.7 | प्रत्यक्षज्ञानियों द्वारा कथित होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.8 | आचार्य परंपरा से आगत होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.9 | समन्वयात्मक होने के कारण प्रमाण है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.10 | विचित्र द्रव्यों आदि का प्ररूपक होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.11 | पूर्वापर अविरोधी होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.12 | युक्ति से अबाधित होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.13 | प्रथमानुपयोग की प्रामाणिकता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम की प्रामाणिकता के हेतुओं संबंधी शंका समाधान&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.1 | अर्वाचीन पुरुषों द्वारा लिखित आगम प्रामाणिक कैसे हो सकते हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.2 | पूर्वापर विरोध होते हुए भी प्रामाणिक कैसे]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.3 | आगम व स्वभाव तर्क के विषय ही नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.4 | छद्मस्थो का ज्ञान प्रामाणिकता का माप नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.5 | आगम में भूल सुधार व्याकरण व सूक्ष्म विषयो में करने को कहा है प्रयोजन भूत तत्त्वो में नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.6 | पौरुषेय होने के कारण अप्रमाणिक नहीं कहा जा सकता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.7 | आगम कथंचित् अपौरुषेय तथा नित्य है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.8 | आगम को प्रमाण मानने का प्रयोजन]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;सूत्र निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.1 | सूत्र का अर्थ द्रव्य व भाव श्रुत]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.2 | सूत्र का अर्थ श्रुतकेवली]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.3 | सूत्र का अर्थ अल्पाक्षर व महानार्थक]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.4 | वृत्ति सूत्र का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.5 | जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित न हों वह सूत्र नहीं असूत्र है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.6 | सूत्र वही है जो गणधर आदि के द्वारा कथित हो ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.7 | सूत्र तो जिनदेव कथित ही है परंतु गणधर कथित भी सूत्र के समान है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.8 | प्रत्येक बुद्ध कथित में भी कथंचित् सूत्रत्त्व पाया जाता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सूत्रोपसंयत - देखें [[ समाचार ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सूत्रसम - देखें [[ निक्षेप ]]5/8&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt;आगम सामान्य का लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नियमसार / मूल या टीका गाथा . 8 तस्स मुहग्गदवयणं पुव्वावरदोसविरहियं सुद्धं। आगमिदि परिकहियं तेण दु कहिया हवंति तच्चत्था ॥8॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उनके मुख से निकली हुई वाणी जो कि पूर्वापर दोष (विरोध) रहित और शुद्ध है, उसे आगम कहा है और उसे तत्त्वार्थ कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;रत्नकरंडश्रावकाचार श्लोक 9 आप्तोपज्ञमनुल्लङ्ध्यमदृष्टेविरोधकम्। तत्त्वोपदेशकृत्सार्व शास्त्रं कापथघट्टनम् ॥9॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो आप्त कहा हुआ है, वादी प्रतिवादी द्वारा खंडन करने में न आवे, प्रत्यक्ष अनुमानादि प्रमाणों से विरोध रहित हो, वस्तु स्वरूप का उपदेश करने वाला हो, सब जीवों का हित करने वाला और मिथ्यामार्ग का खंडन करने वाला हो, वह सत्यार्थ शास्त्र है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,2/9,11/12 पूर्वापरविरुद्धादेर्व्यपेतो दोषसंहते। द्योतकः सर्वभावनामाप्तव्याहतिरागमः ॥9॥ आगमो ह्यात्पवचनमाप्तं दोषक्षयं विदुः। त्यक्तदोषोऽनृतं वाक्यं न ब्रूयाद्धेत्वसंभवात् ॥10॥ रागाद्वा द्वेषाद्वा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतम्। यस्य तु नैते दोषास्तस्यानृत् कारणं नास्ति ॥11॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पूर्वापर विरूद्धादि दोषों के समूह से रहित और संपूर्ण पदार्थों के द्योतक आप्त वचन को आगम कहते हैं ॥9॥ आप्त के वचन को आगम जानना चाहिए और जिसने जन्म जरा आदि 18 दोषों का नाश कर दिया है उसे आप्त जानना चाहिए। इस प्रकार जो त्यक्तदोष होता है वह असत्य वचन नहीं बोलता, क्योंकि उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण ही संभव नहीं है ॥10॥ राग से द्वेष से अथवा मोह से असत्य वचन बोला जाता है, परंतु जिसके ये रागादि दोष नहीं हैं उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण नहीं पाया जाता है ॥11॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/12/7/54/8 आप्तेन हि क्षीणदोषेण प्रत्यक्षज्ञानेन प्रणीत आगमो भवति न सर्वः। यदि सर्वः स्यात, अविशेषः स्यात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसके सर्व दोष क्षीण हो गये हैं ऐसे प्रत्यक्ष ज्ञानियों के द्वारा प्रणीत आगम ही आगम है, सर्व नहीं। क्योंकि, यदि ऐसा हो तो आगम और अनागम में कोई भेद नहीं रह जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/20/7 आगमो सिद्धंतो पवयणमिदि एयट्ठो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम, सिद्धांत और प्रवचन ये शब्द एकार्थवाची हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परीक्षामुख परिच्छेद 3/99 आप्तवचनादिनिबंधनमर्थज्ञानमागमः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के वचनादि से होने वाले पदार्थों के ज्ञान को आगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नि.स./ता.वृ.8 में उद्धृत/21 अन्यूनमनतिरिक्तं याथातथ्यं विना च विपरीतात्। निःसंदेहं वेद यदाहुस्तज्ज्ञानमागमिन:।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो न्यूनता बिना, अधिकता बिना, विपरीता बिना यथातथ्य वस्तुस्वरूप को निःसंदेह रूप से जानता है उसे आगमवंतों का ज्ञान कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 173/255 वीतरागसर्वज्ञप्रणीतषड़्द्रव्यादि सम्यक्श्रद्धानज्ञानव्रताद्यनुष्ठानभेदरत्नत्रयस्वरूपं यत्र प्रतिपाद्यते तदागमशास्रं भण्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वीतराग सर्वज्ञ देव के द्वारा कहे गये षड्द्रव्य व सप्त तत्त्व आदि का सम्यक्श्रद्धान व ज्ञान तथा व्रतादि के अनुष्ठान रूप चारित्र, इस प्रकार भेद रत्नत्रय का स्वरूप जिसमें प्रतिपादित किया गया है उसको आगम या शास्त्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 21/262/7 आ सामस्त्येनानंतधर्मविशिष्टतया ज्ञायन्तेऽवबुद्ध्यंते जीवाजीवादयः पदार्था यया सा आज्ञा आगमः शासनं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसके द्वारा समस्त अनंत धर्मों से विशिष्ट जीव अजीवादि पदार्थ जाने जाते हैं ऐसी आप्त आज्ञा आगम है, शासन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( स्याद्वादमंजरी श्लोक 28/322/3)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;न्यायदीपिका अधिकार 3/73/112 आप्तवाक्यनिबंधनमर्थज्ञानमागमः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के वाक्य के अनुरूप आगम के ज्ञान को आगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt;आगमाभासका लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प.मू.6/51-54/69 रागद्वेषमोहाक्रांतपुरुषवचनाज्जातमागमाभासम्। यथा नद्यास्तीरे मोदकराशयः संति धावध्वं माणवकाः। अंगुल्यग्रहस्तियूथशतमस्ति इति च विसंवादात् ॥51-54॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= रागी, द्वेषी और अज्ञानी मनुष्यों के वचनों से उत्पन्न हुए आगम को आगमाभास कहते हैं। जैसे कि बालको दौड़ो नदी के किनारे बहुत-से लड्डू पड़े हुए हैं। ये वचन हैं। और जिस प्रकार यह है कि अंगुली के आगे के हिस्से पर हाथियों के सौ समुदाय हैं। विवाद होने के कारण ये सब आगमाभास हैं। अर्थात् लोग इनमें विवाद करते हैं। इसलिए ये आगम झूठे हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;नोआगम का लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/20/7 आगमादो अण्णो णो-आगमो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम से भिन्न पदार्थ को नोआगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt;शब्द या आगम प्रमाण का लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;न्या./सू./मू.1/1/7/15 आप्तोपदेशः शब्दः ॥7॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के उपदेश को शब्द प्रमाण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt;शब्द प्रमाण का श्रुतज्ञान में अंतर्भाव&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/20/15/78/18 शाब्दप्रमाणं श्रुतमेव।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द प्रमाण तो श्रुत है ही।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; गोम्मटसार जीवकांड/ &amp;lt;/span&amp;gt;भा.313 आगम नाम परोक्ष प्रमाण श्रुतज्ञान का भेद है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.6&amp;quot;&amp;gt;आगम अनादि है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;जंबूदीव-पण्णत्तिसंगहो अधिकार 13/80-83 देवासुरिंदमहिय अणंतसुहपिंडमोक्खफलपउरं। कम्ममलपडलदलणं पुण्ण पवित्तं सिवं भद्दं ॥80॥ पुव्वंगभेदभिण्णं अणंतअत्थेहिं सजुदं दिव्वं। णिच्चं कलिकलुसहरं णिकाचिदमणुत्तरं विमलं ॥81॥ संदेहतिमिरदलणं बहुविहगुणजुत्तंसग्गसोवाणं। मोक्खग्गदारभूदं णिम्मलबुद्धिसंदोहं ॥82॥ सव्वण्हुमुहविणिग्गयपुव्वावरदोसरहिदपरिसुद्धं। अक्खयमणादिणिहणं सुदणाणपमाणं णिद्दिट्ठं ॥83॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पूर्व व अंग रूप भेदों में विभक्त, यह श्रुतज्ञान-प्रमाण देवेंद्रों व असुरेंद्रों से पूजित, अनंत सुख के पिंड रूप मोक्ष फल से संयुक्त, कर्मरूप पटल के मल को नष्ट करनेवाला, पुण्य पवित्र, शिव, भद्र, अनंत अर्थो से संयुक्त दिव्य नित्य, कलि रूप कलुष को दूर करने वाला, निकाचित, अनुत्तर, विमल, संदेहरूप अंधकार को नष्ट करने वाला, बहुत प्रकार के गुणों से युक्त, स्वर्ग की सीढ़ी, मोक्ष के मुख्य द्वारभूत, निर्मल, एवं उत्तम बुद्धि के समुदाय रूप, सर्व के मुखसे निकला हुआ, पूर्वापर विरोध रूप दोष से रहित विशुद्ध अक्षय और अनादि कहा गया है ॥80-83॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.7&amp;quot;&amp;gt;आगम गणधरादि गुरु परंपरासे आगत है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 6/13/2/523/29 तदुपदिष्टं बुद्ध्यतिशयर्द्धियुक्तगणधरावधारितं श्रुतम् ॥2॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= केवली भगवान के द्वारा कहा गया तथा अतिशय बुद्धि ऋद्धि के धारक गणधर देवों के द्वारा जो धारण किया गया है उसको श्रुत कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.8&amp;quot;&amp;gt;आगमज्ञानके अतिचार&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 16/62/15 अक्षरपदादीनां न्यूनताकरणं, अतिवृद्धिकरणं, विपरीत पौर्वापर्यरचनाविपरीतार्थनिरूपणा ग्रंथार्थयोर्वैपरीत्यं अमी ज्ञानातिचाराः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अक्षर, शब्द, वाक्य, वरण, इत्यादिकों को कम करना बढ़ाना, पीछे का संदर्भ आगे लाना, आगे का पीछे करना, विपरीत अर्थ का निरूपण करना, ग्रंथ व अर्थ में विपरीतता करना ये सब ज्ञानातिचार हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 487/707)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.9&amp;quot;&amp;gt;श्रुतके अतिचार&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 16/62/15 द्रव्यक्षेत्रकालभावशुद्धिमंतरेण श्रुतस्य पठनं श्रुतातिचारः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= द्रव्यशुद्धि, क्षेत्र शुद्धि, कालशुद्धि, भावशुद्धि के बिना शास्त्रका पढ़ना यह श्रुतातिचार है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.10&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यश्रुतके अपुनरुक्त अक्षर&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;देखें [[ अक्षर#33  | अक्षर ]] 33 व्यंजन, 27 स्वर और चार अयोगवाह, इस प्रकार सब अक्षर 64 होते हैं। उन अक्षरोंके संयोगोकी गणना 2&amp;lt;sup&amp;gt;64&amp;lt;/sup&amp;gt; =18446744073709551616 होती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5/14/18-20/266/4 सोलससदचोत्तीसं कोडी तेसीद चेव लक्खाइं। सत्तसहस्सट्ठसदा अट्ठासीदा य पदवण्णा ॥18॥ एदं पि संजोगक्खरसंखाए अवट्ठिदं, वुत्तपमाणादो अक्खरेहि वड्ढि-हाणीणभावादो।...बारससदकोडीओ तेसीदि हवंति तह य लक्खाइं। अट्ठावण्णसहस्सं पंचेव पदाणि सुदणाणे ॥20॥ एत्तियाणिपदाणि घेतूण सगलसुदणाणं होदि। एदेसु पदेसु संजोगक्खराणि चैव सरिसाणि ण संजोगक्खरावयवक्खराणि; तत्थ संखाणियमाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= “16348307888 इतने मध्यम पदके वर्ण होते हैं ॥18॥...यह भी संयोगी अक्षरोंकी अपेक्षा (उत्तरोक्तवत्) अवस्थित हैं। क्योंकि उसमें उक्त प्रमाण से अक्षरों की अपेक्षा वृद्धि और हानि नहीं होती।...श्रुतज्ञान के एक सौ बारह करोड़ तिरासी-लाख अट्ठावन हजार और पाँच (1128358005) ही (कुल मध्यम) पद होते हैं ॥19॥ इतने पदों का आश्रय कर सकल श्रुतज्ञान होता है, इन पदों में संयोगी अक्षर ही समान हैं, संयोगी अक्षरों के अवयव अक्षर नहीं, क्योंकि, उनकी संख्या का कोई नियम नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/20/410-415; 1/20/424 की टिप्पणी जगरूप सहाय कृत) ( हरिवंश पुराण सर्ग 10/143) ( कषायपाहुड़ पुस्तक 1/$70/89-96)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1-1/$72/92/2 मज्झिमपदं...एदेणपुव्वंगाणं पदसंखा परूविज्जदे।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= मध्यम पदके द्वारा पूर्व और अंगों पदोंकी संख्याका प्ररूपण किया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धवला पुस्तक /9/पृ.	नाम पद	अक्षर प्रमाण	प्रमाणलानेका उपाय&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;194	कुल अक्षर	64	उपरोक्तवत्&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;194	अपुनरुक्त संयोगी अक्षर	18446744073709551616	एक द्वि आदि संयोगी भंगों का जोड़ 64X6\1X2 इत्यादि&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;195	अगंश्रुतके सर्व पदोंमें अक्षर	1128358005	अपुनरूक्त अक्षर\मध्यम पद&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;195	मध्यम पदोंमें अक्षर	16348307888	नियत (इनसे पूर्व और अंगोके विभागका निरूपण होता है)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;196	शेष अक्षर	80108175	शेष अक्षर + 32&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;196	14 प्रकीर्णकों के प्रमाण या खंड पदमें	2503380 * 12\32&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / गोम्मट्टसार जीवकांड जीव तत्त्व प्रदीपिका| जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 336/733/1) ( धवला पुस्तक 13/5,5,45/247/266)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.11&amp;quot;&amp;gt;श्रुतका बहुत कम भाग लिखनेमें आया है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,102/363/3 अत्थदो पुणो तेसिं विसेसा गणहरेहि विण वारिज्जदे।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अर्थकी अपेक्षा जो उन दोनोंकी त्रय कायिक लब्ध्यपर्याप्तक जीव तथा पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवोंकी संख्या प्ररूपणा में विशेष है, उनका गणधर भी निवारण नहीं कर सकते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 334/731 पण्णवणिज्जाभावा अणंतभागो दु अणभिलप्पाणं। पण्णवणिज्जाणं पुण अणंतभागो सुदणिबद्धो ॥334॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अनभिलप्यानां कहिए वचनगोचर नाहीं, केवलज्ञानके गोचर जे भाव कहिए जीवादिक पदार्थ तिनके अनंतवें भागमात्र जीवादिक अर्थ ते प्रज्ञापनीया कहिए तीर्थँकर की सातिशय दिव्य ध्वनिकरि कहने में आवै ऐसे हैं। बहुरि तीर्थंकर की दिव्य ध्वनिकरि पदार्थ कहने में आवैं हैं तिनके अनंतवें भाग मात्र द्वादशांग श्रुत विषैं व्याख्यान कीजिए है। जो श्रुतकेवली को भी गोचर नाहीं ऐसा पदार्थ कहनेकी शक्ति केवलज्ञान विषैं पाइये है। ऐसा जानना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(सन्मति तर्क 2/16) (राजवार्तिक अध्याय 1/26/4/87) ( धवला पुस्तक 9/4/2,7,214/3/171) ( धवला पुस्तक 12/4/1,7/17/57)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / उत्तरार्ध श्लोक 616 वृद्धैः प्रोक्तमतः सूत्रे तत्त्वं वागतिशायि यत्। द्वादशांगांगबाह्यं वा श्रुतं स्थूलार्थगोचरम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इसलिए पूर्वाचार्यों ने सूत्र में कहा है कि जो तत्व है वह वचनातीत है और द्वादशांग तथा अंग बाह्यरूप शास्त्र-श्रुत ज्ञान स्थूल पदार्थ को विषय करने वाला है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.12&amp;quot;&amp;gt;आगम की बहुत सी बातें नष्ट हो चुकी हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,44/126/4 दोसु वि उवएसेसु को एत्थ समंजसो, एत्थ ण बाहइ जिब्भमेलाइरियवच्छवो, अलद्धोवदेसत्तादो दोण्णमेक्कस्स बाहाणुपलंभादो। किंतुदोसुएक्केण होदव्वं। तं जाणिय वत्तव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उक्त (एक ही विषय में) दो (पृथक्-पृथक्) उपदेशो में कौन सा उपदेश यथार्थ है, इस विषय में एलाचार्यका शिष्य (वीरसेन स्वामी) अपनी जीभ नहीं चलाता अर्थात् कुछ नहीं कहता, क्योंकि इस विषय का कोई न तो उपदेश प्राप्त है और न दो में-से एक में कोई बाधा उत्पन्न होती है। किंतु दो में-से एक ही सत्य होना चाहिए। उसे जानकर कहना उचित है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; तिलोयपण्णत्ति अधिकार/श्लो. (यहाँ निम्न विषयोंके उपदेश नष्ट होनेका निर्देश किया गया है।) नरक लोकके प्रकरण में श्रेणी बद्ध बिलोंके नाम (2/54); समवशरण में नाट्यशालाओं की लंबाई चौड़ाई (4/757); प्रथम और द्वितीय मानस्तंभ पीठों का विस्तार (4/772); समवशरण में स्तूपों की लंबाई और विस्तार (4/847); नारदों की ऊंचाई आयु और तीर्थँकर देवों के प्रत्यक्ष भावादिक (4/1471); उत्सर्पिणी काल के शेष कुलकरों की ऊँचाई (4/1572); श्री देवी के प्रकीर्णक आदि चारों के प्रमाण (4/1688); हैमवत के क्षेत्र  में शब्दवान पर्वत पर स्थित जिन भवन की ऊँचाई आदि के (4/1710); पांडुक वन पर स्थित जिन भवन में सभापुर के आगे वाले पीठ के विस्तार का प्रमाण (4/1897); उपरोक्त जिन भवन में स्थित पीठ की ऊँचाई के प्रमाण (4/1902); उपरोक्त जिन भवन में चैत्य वृक्षों के आगे स्थित पीठ के विस्तारादि (4/1910); सौमनस वनवर्ती वापिका में स्थित सौधर्म इंद्र के विहार प्रासाद की लंबाई का प्रमाण (4/1950); सौमनस गजदंत के कूटों के विस्तार और लंबाई (4/2032); विद्युतत्प्रभगजदंत के कूटों के विस्तार और लंबाई (4/2047); विदेह देवकुरु में यमक पर्वतों पर और भी दिव्य प्रासाद हैं, उनकी ऊँचाई व विस्तारादि (4/2082); विदेहस्थ शाल्मली व जंबू वृक्षस्थलों की प्रथम भूमि में स्थित 4 वापिकाओं पर प्रतिदिशा में आठ-आठ कूट हैं, उनके विस्तार (4/2182); ऐरावत क्षेत्र में शलाका पुरुषों के नामदिक (4/2266); लवण समुद्र में पातालों के पार्श्व भागो में स्थित कौस्तुभ और कोस्तुभाभास पर्वतों का विस्तार (4/2462); धातकी खंड में मंदर पर्वतों के उत्तर-दक्षिण भागो में भद्रशालों का विस्तार (4/2589); मानुषोत्तर पर्वत  पर 14 गुफाएँ है, उनके विस्तारादि (4/2753); पुष्करार्ध में सुमेरु पर्वत के उत्तर दक्षिण भागो में भद्रशाल वनों का विस्तार (4/2822); जंबूद्वीप से लेकर अरुणाभास तक बीस द्वीप समुद्रों के अतिरिक्त शेष द्वीप समुद्रोंके अधिपति देवों के नाम (5/48); स्वयंभूरमण समुद्र में स्थित पर्वतकी ऊँचाई आदि (5/240); अंजनक, हिंगुलक आदि द्वीपों में स्थित व्यंतरोंके प्रसादों की ऊँचाई आदि (6/66); व्यंतर इंद्रों के जो प्रकीर्णक, आभियोग्य और विल्विषक देव होते हैं उनके प्रमाण (6/76); तारों के नाम (7/32,496); गृहों का सुमेरु से अंतराल व वापियों आदि का कथन (7/458); सौधर्मादिक के सोमादिक लोकपालों के आभियोग्य प्रकीर्णक और किल्विषक देव होते हैं; उनका प्रमाण (8/296); उत्तरेंद्रों के लोकपालों के विमानों की संख्या (8/302); सौधर्मादिक के प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषकों की देवियों का प्रमाण (8/329); सौधर्मादिक के प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषकों की देवियों की आयु (8/523); सौधर्मोदिक के आत्मरक्षक व परिषद्की देवियों की आयु (8/540)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.13&amp;quot;&amp;gt;आगम के विस्तार का कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/8/30 सर्वसत्त्वानुग्रहार्थो हि सतां प्रयास इति, अधिगमाभ्युपायभेदोद्देशः कृतः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सज्जनों का प्रयास सब जीवों का उपकार करना है, इसलिए यहाँ अलग-अलग से ज्ञान के उपाय के भेदों का निर्देश किया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 1/1,1,5/153/8 नैष दोषः मंदबुद्धिसत्त्वानुग्रहार्थत्वात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,70/311/2 द्विरस्ति-शब्दोपादानमनर्थ कमिति चेन्न, विस्तररुचिसत्त्वानुग्रहार्थत्वात्। संक्षेपरुचयो नानुगृहीताश्चेन्न, विस्तररुचिसत्त्वानुग्रहस्य संक्षेपरुचिसत्त्वानुग्रहाविनाभावित्वात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - (छोटा सूत्र बनाना ही पर्याप्त था, क्योंकि सूत्र का शेष भाग उसका अविनाभावी है।)  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि मंदबुद्धि प्राणियों के अनुग्रह के लिए शेष भाग को सूत्र में ग्रहण किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सूत्र में दो बार अस्ति शब्द का ग्रहण निरर्थक है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि विस्तार  से समझने की रूचि रखने वाले शिष्यों के अनुग्रह के लिए सूत्र में दो बार अस्ति शब्द का ग्रहण किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - इस सूत्र में संक्षेप से समझने की रुचि रखने वाले शिष्य अनुगृहीत नहीं किये गये हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि संक्षेप  से समझने की रुचि रखनेवाले जीवों का अनुग्रह विस्तार से समझने की रुचि रखने वाले शिष्यों का अविनाभावी है। अर्थात् विस्तार से कथन कर देने पर संक्षेप रुचि वाले शिष्यों  का काम चल जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 15)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.14&amp;quot;&amp;gt;आगमके विच्छेद संबंधी भविष्य वाणी&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तिलोयपण्णत्ति अधिकार 4/1413 बीस सहस्स तिसदा सत्तारस वच्छराणि सुदतित्थं धम्मपयट्टणहेदू वीच्छिस्सदि कालदोसेण&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो श्रुत तीर्थ धर्म प्रवर्तन का कारण है, वह बीस हजार तीन सौ सत्तरह (20317) वर्षों में काल दोष से व्युच्छेद को प्राप्त हो जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;द्रव्य भाव आगम ज्ञान निर्देश व समन्वय&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt;वास्तव में  भावश्रुत ही ज्ञान है द्रव्यश्रुत ज्ञान नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,4,26/64/12 ण च दव्वसुदेण एत्थ एहियारो, पोग्गलवियारस्स जडस्स णाणोपलिंग भुदस्स मुदत्तबिरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= (ध्यान के प्रकरण में) द्रव्यश्रुतका यहाँ अधिकार नहीं है, क्योंकि ज्ञान के उपलिंग भूत पुद्गल के विकार-स्वरूप जड़ वस्तु को श्रुत मानने में विरोध आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt;भावका ग्रहण ही आगम है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;न्यायदीपिका अधिकार 3/$73 आप्तवाक्यनिबंधन ज्ञानमित्युच्यमानेऽपि, आप्तवाक्यकर्मकेश्रावणप्रत्यक्षेऽतिव्याप्तिः। तात्पर्यमेव वचसीत्यभियुक्तवचनात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के वचनों से होने वाले ज्ञान को आगम का लक्षण कहने में भी आप्त के वाक्यों को सुनकर जो श्रावण प्रत्यक्ष होता है उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति है, अतः `अर्थ' यह पद दिया है। `अर्थ' पद तात्पर्य में रूढ है। अर्थात् प्रयोजनार्थक है क्योंकि `अर्थ ही-तात्पर्य ही वचनों में है' ऐसा आचार्य वचन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य श्रुत को ज्ञान कहने का कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,45/162/3 कथं शब्दस्य तत्स्थापनायाश्च श्रुतव्यपदेशः। नैष दोषः, कारणे कार्योपचारात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द और उसकी स्थापना की श्रुतसंज्ञा कैसे हो सकती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, कारण में कार्य का उपचार करने से शब्द या उसकी स्थापना की श्रुत संज्ञा बन जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 13/5,5,21/210/8)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 34/45 शब्दश्रुताधारेण ज्ञप्तिरर्थपरिच्छित्तिर्ज्ञानं भण्यते स्फूटं। पूर्वोक्तद्रव्यश्रुतस्यापि व्यवहारेण ज्ञानव्यपदेशो भवति न तु निश्चयेनेति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द श्रुत के आश्रय से ज्ञप्ति रूप अर्थ के निश्चय को निश्चय नय से ज्ञान कहा है। पूर्वोक्त शब्द श्रुत की अर्थात् द्रव्यश्रुत की ज्ञानसंज्ञा (कारण में कार्य के उपचार से) व्यवहार नय से है निश्चय नय से नहीं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य श्रुत के भेदादि जानने का प्रयोजन&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 173/254/19 श्रुतभावनायाः फलं जीवादितत्त्वविषये संक्षेपेण हेयोपादेयतत्त्वविषये वा संशयविमोहविभ्रमरहितो निश्चलपरिणामो भवति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= श्रुत की भावना अर्थात् आगमाभ्यास करने से, जीवादि तत्त्वों के विषय में वा संक्षेप से हेय उपादेय तत्त्व के विषय में संशय, विमोह व विभ्रम से रहित निश्चल परिणाम होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt;आगमको श्रुतज्ञान कहना उपचार है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;श्लोकवार्तिक पुस्तक 1/1/20/2-3/598..। श्रवणं हि श्रुत ज्ञानं न पुनः शब्दमात्र कम् ॥2॥ तच्चोपचारतो ग्राह्य श्रुतशब्दप्रयोगतः ॥3॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= `श्रुत' पद से तात्पर्य किसी विशेष ज्ञान से है। हां वाच्यों के प्रतिपादक शब्द भी श्रुतपद से पकड़े जाते हैं। किंतु केवल शब्दों में ही श्रुत शब्द को परिपूर्ण नहीं कर देना चाहिए ॥2॥ उपचार से वह शब्दात्मक श्रुत (आगम) भी शुद्ध शब्द करके ग्रहण करने योग्य है...क्योंकि गुरु के शब्दों से शिष्यों को श्रुतज्ञान (वह विशेष ज्ञान) उत्पन्न होता है। इस कारण यह कारण में कार्य का उपचार है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(और भी देखें [[ आगम#2.3 | आगम - 2.3]])&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगमका अर्थ करनेकी विधि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;पाँच प्रकार अर्थ करने का विधान&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 120/177 शब्दार्थव्याख्यानेन शब्दार्थों ज्ञात्व्यः। व्यवहारनिश्चयरूपेण नयार्थो ज्ञातव्यः। सांख्यं प्रति मतार्थो ज्ञातव्यः। आगमार्थस्तु प्रसिद्धः। हेयोपादानव्याख्यानरूपेण भावार्थोऽपि ज्ञातव्यः। इति शब्दनयमतागमभावार्थाः व्याख्यानकाले यथासंभवं सर्वत्र ज्ञातव्याः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्दार्थ के व्याख्यान रूप से शब्दार्थ जानना चाहिए। व्यवहार निश्चयनयरूप से नयार्थ जानना चाहिए। सांख्यों के प्रतिमतार्थ जानना चाहिए। आगमार्थ प्रसिद्ध है। हेय उपादेय के व्याख्यान रूप से भावार्थ जानना चाहिए। इस प्रकार शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ आगमार्थ तथा भावार्थ को व्याख्यान के समय यथासंभव सर्वत्र जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 1/4; 27/60) ( द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 2/9/)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;मतार्थ करनेका कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,30/229/9 तदभिप्रायकदनार्थं वास्य सूत्रस्यावतारः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इन दोनों एकांतियों के अभिप्राय के खंडन करनेके लिये ही...प्रकृत सूत्र का अवतार हुआ है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सप्तभंग तरंगिनी पृष्ठ 77/1 ननु...सर्व वस्तु स्यादेकं स्यादनेकमिति कथं संगच्छते। सर्वस्यवस्तुनः केनापि रूपेणैकाभावात्।...तदुक्तम् `उपयोगो लक्षणम्' इति सूत्रे, तत्वार्थश्लोकवार्तिके- न हि वयं सदृशपरिणाममनेकव्यक्तिव्यापिनं युगपदुपगच्छामोऽन्यत्रोपचारात् इति...पूर्वोदाहृतपूर्वाचार्यवचनानां च सर्वथैक्य निराकरणपरत्वाद अन्यथा सत्ता सामान्यस्य सर्वथानेकत्वे पृथ्कत्वैकांतपक्ष एवाहतस्स्यात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सर्व वस्त कथंचित एक हैं कथंचित् अनेक हैं यह कैसे संगत हो सकता है, क्योंकि किसी प्रकार से सर्व वस्तुओं की एकता नहीं हो सकती? तत्त्वार्थ सूत्र में कहा भी है `उपयोगों लक्षणं' अर्थात् ज्ञान दर्शन रूप उपयोग ही जीव का लक्षण है। इस सूत्र के अंतर्गत तत्त्वार्थ श्लोक वार्तिकमें `अन्य व्यक्ति में उपचार से एक काल में ही सदृश परिणाम रूप अनेक व्यक्ति व्यापी एक सत्त्व हम नहीं मानते' ऐसा कहा है- &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - पूर्व उदाहरणों में आचार्यों के वचनों से जो सर्वथा एकत्व ही माना है उसी के निराकरण में तात्पर्य है न कि कथंचित् एकत्व के निराकरण में। और ऐसा न मानने से सर्वथा सत्ता सामान्य के अनेकत्व मानने से पृथक्त्व एकांत पक्ष का ही आदर होगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;नय निक्षेपार्थ करनेकी विधि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/6/20 नामादिनिक्षेपविधिनोपक्षिप्तानां जीवादीनां तत्त्वं प्रमाणाभ्यां नयैश्चाधिगम्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिन जीवादि पदार्थों का नाम आदि निक्षेप विधि के द्वारा विस्तार से कथन किया है उनका स्वरूप प्रमाण और नयों के द्वारा जाना जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/10/16 प्रमाण-नय-निक्षेपैर्योऽर्थो नाभिसमीक्ष्यते। युक्तं चायुक्तवद्भाति तस्यायुक्तं च युक्तवत् ॥10॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिस पदार्थ का प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा, नैगमादि नयों के द्वारा, नामादि निक्षेपों के द्वारा सूक्ष्म दृष्टि से विचार नहीं किया जाता है, वह पदार्थ कभी युक्त (संगत) होते हुए भी अयुक्त (असंगत) सा प्रतीत होता है और कभी अयुक्त होते हुए भी युक्त की तरह-सा प्रतीत होता है ॥10॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/3/10 विशेषार्थ&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम के किसी श्लोक गाथा, वाक्य, व पद के ऊपर से अर्थ का निर्णय करने के लिए निर्दोष पद्धति से श्लोकादिक का उच्चारण करना चाहिए, तदनंतर पदच्छेद करना चाहिए, उसके बाद उसका अर्थ कहना चाहिए, अनंतर पद-निक्षेप अर्थात् नामादि विधि से नयों का अवलंबन लेकर पदार्थ का ऊहापोह करना चाहिए। तभी पदार्थ के स्वरूप का निर्णय होता है। पदार्थ निर्णय के इस क्रम को दृष्टि में रखकर गाथा के अर्थ पद का उच्चारण करके, और उसमें निक्षेप करके, नयों के द्वारा, तत्त्व निर्णय का उपदेश दिया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;मो.मा./प्र./7/368/7  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - तो कहा करिये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - निश्चय नय करि जो निरूपण किया होय, ताकौं तो सत्यार्थ न मानि ताका तो श्रद्धान अंगीकार करना, अर व्यवहार नय करि जो निरूपण किया होय ताकौ असत्यार्थ मानि ताका श्रद्धान छोडना...तातैं व्यवहार नयका श्रद्धान छोड़ि निश्चयनय का श्रद्धान करना योग्य है। व्यवहार नय करि स्वद्रव्य परद्रव्य कौं वा तिनकें भावनिकौं वा कारण कार्यादि कौं काहूलो काहूँ विषै मिलाय निरूपण करै है। सो ऐसे ही श्रद्धान से मिथ्यात्व है तातैं याका त्याग करना। बहुरि निश्चय नय तिनकौ यथावत् निरूपै है, काहू को काहू विषै न मिलावै है। ऐसा ही श्रद्धान तैं सम्यक्त्व हो है। तातै ताका श्रद्धान करना।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जो ऐसैं हैं, तो जिनमार्ग विषैं दोऊ नयनिका ग्रहण करना कह्या, सो कैसे?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - जिनमार्ग विषै कहीं तौ निश्चय नयकी मुख्यता लिये व्याख्यान है ताकौं तो `सत्यार्थ ऐसे ही है' ऐसा जानना। बहुरी कहीं व्यवहार नयकी मुख्यता लिये व्याख्यान है ताकौ `ऐसे है नाहिं निमित्तादिकी अपेक्षा उपचार किया है' ऐसा जानना। इस प्रकार जाननेका नाम ही दोऊ नयनिका ग्रहण है। बहुरि दोऊ नयनिके व्याख्यान कूँ समान सत्यार्थ जानि ऐसे भी है ऐसे भी है, ऐसा भ्रम रूप प्रवर्तने करि तौ दोऊ नयनिका ग्रहण किया नाहीं।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जो व्यवहार नय असत्यार्थ है, तौ ताका उपदेश जिनमार्ग विषैं काहें को दिया। एक निश्चय नय ही का निरूपण करना था?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - निश्चय नयको अंगीकार करावनैं कूँ व्यवहार करि उपदेश दीजिये हैं। बहुरी व्यवहार नय है, सो अंगीकार करने योग्य नाहीं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(और भी देखें [[ आगम#3.8 | आगम - 3.8]])&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;आगमार्थ करनेकी विधि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.1&amp;quot;&amp;gt;पूर्वापर मिलान पूर्वक&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्र.सं/टी.22/66 [अन्यद्वा परमागमाविरोधेन विचारणीयं...किंतु विवादो न कर्तव्यः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= परमागम के अविरोध पूर्वक विचारना चाहिए, किंतु कथन में विवाद नहीं करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 335 शेषविशेषव्याख्यानं ज्ञातव्यं चोक्तवक्ष्यमाणतया। सूत्रे पदानुवृत्तिर्ग्राह्मा सूत्रांतरादिति न्यायात् ॥335॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र में पदों की अनुवृत्ति दूसरे सूत्रों से ग्रहण करनी चाहिए, इस न्यायसे यहाँ पर भी शेष विशेष कथन उक्त और वक्ष्यमाण पूर्वापर संबंध से जानना चाहिए। रहस्यपूर्ण चिट्ठी पं. टोडरमलजी कृत/512 कथन तो अनेक प्रकार होय परंतु यह सर्व आगम अध्यात्म शास्त्रन सो विरोध न होय वैसे विवक्षा भेद करि जानना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.2&amp;quot;&amp;gt;परंपरा का ध्यान रख कर&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,184/481/1 एदीए गाहाए एदस्स वक्खाणस्स किण्ण विरोहा। होउ णाम।...ण, जुत्तिसिद्धस्य आइरियपरंपरागयस्स एदीए गाहाए णाभद्दत्तं काऊण सक्किज्जदि, अइप्पसंगादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि ऐसा है तो (देश संयत में तेरह करोड़ मनुष्य हैं) इस गाथा के साथ इस पूर्वोक्त व्याख्यान का विरोध क्यों नहीं आ जायेगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि उक्त गाथा के साथ पूर्वोक्त व्याख्यान का विरोध प्राप्त होता है तो होओ...जो युक्ति सिद्ध है और आचार्य परंपरा से आया हुआ है उसमें इस गाथा से असमीचीनता नहीं लायी जा सकती, अन्यथा अतिप्रसंग दोष आ जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 4/1,4,4/156/2) रहस्यपूर्ण चिट्ठी पं.टोडरमल/पृ.512 देखें [[ आगम#3.4.1 | आगम - 3.4.1]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.3&amp;quot;&amp;gt;शब्दका नहीं भावका ग्रहण करना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/33/144 अन्यार्थस्यान्यार्थेन संबंधाभावात्। लोकसमय विरोध इति चेत्। विरुध्याताम्। तत्त्वमिह मीमांस्यते, न भैषज्यमातुरेच्छानुवर्ति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अन्य अर्थ का अन्य अर्थ के साथ संबंध का अभाव है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - इससे लोक समय का (व्याकरण शास्त्र) का विरोध होता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि विरोध होता है तो होने दो, इससे हानि नहीं, क्योंकि यहाँ तत्त्व की मीमांसा की जा रही है। दवाई कुछ पीड़ित मनुष्य की इच्छा का अनुकरण करनेवाली नहीं होती।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 2/6/3,8/109 द्रव्यलिंग नामकर्मोदयापादितं तदिह नाधिकृतम्, आत्मापरिणामप्रकरणात्।....द्रव्यलेश्या पुद्गलविपाकिकर्मोदयापादितेति सा नेह परिगृह्यत आत्मनो भावप्रकरणात् ।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= चूँकि आत्मभावों का प्रकरण है, अतः नामकर्म के उदय से होने वाले द्रव्यलिंग की यहाँ विवक्षा नहीं है।...द्रव्य लेश्या पुद्गल विपाकी शरीर नाम कर्म के उदय से होती है अतः आत्मभावों के प्रकरण में उसका ग्रहण नहीं किया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,60/303/6 अन्यैराचार्यैरव्याख्यातमिममर्थं भणंतः कथं न सूत्रप्रत्यनीकाः। न, सूत्रवशवर्तिनां तद्विरोधात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अन्य आचार्यों के द्वारा नहीं व्याख्यान किये इस अर्थ का इस प्रकार व्याख्यान करते हुए आप सूत्र के विरुद्ध जा रहे हैं ऐसा क्यों नहीं माना जाये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं...सूत्र के वशवर्ती आचार्यों का ही पूर्वोक्त (मेरे) कथन से विरोध आता है। (अर्थात् मैं गलत नहीं अपितु वही गलत है।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,123/408/5 आइरियवयणमणेयंतमिदि चे, होदु णाम, णत्थि मज्झेत्थ अग्गही।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आचार्यों के वचन अनेक प्रकार के होते हैं तो होओ. इसमें हमारा आग्रह नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,3/197/6 सव्वभावाणं पारिणामियत्तं पसज्जदीदि चे होदुं, ण कोई दोसो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सभी भावों के पारिणामिकपने का प्रसंग आता है तो आने दो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1,56/101/2 चक्षुषा दृश्यते वा तं तत् चक्खुदंसणं चक्षुर्द्दर्शनमिति वेति ब्रुवते। चक्खिंदियणाणादो जो पुव्वमेव सुवसतीए सामण्णाए अणुहओ चक्खुणाणुप्पत्तिणिमित्तो तं चक्खुदंसणमिदि उत्तं होदि।...बालजणबीहणट्ठं चक्खूणं जं दिस्सदि तं चक्खूदंसणमिदि परूवणादो। गाहएगलभंजणकाऊण अज्जुवत्थो किण्ण घेप्पदि। ण, तत्थ पुव्वुत्तासेसदोसप्पसंगादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो चक्षुओं को प्रकाशित होता है अथवा आँख द्वारा देखा जाता है वह चक्षुदर्शन है इसका अर्थ ऐसा समझना चाहिए कि चक्षु इंद्रिय ज्ञान से पूर्व ही सामान्य स्वशक्ति का अनुभव होता है जो कि चक्षु ज्ञान की उत्पत्ति में निमित्तभूत है वह चक्षुदर्शन है।...बालक जनों को ज्ञान कराने के लिए अंतरंग में बाह्य पदार्थों के उपचार से `चक्षुओं को जो दीखता है वही चक्षु दर्शन है' ऐसा प्ररूपण किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - गाथाका गला न घोट कर सीधा अर्थ क्यों नही करते?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं करते, क्योंकि वैसा करने में पूर्वोक्त समस्त दोषों का प्रसंग आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 86 शब्दाब्रह्मोपासनं भावज्ञानावष्टंभदृढीकृतपरिणामेन सम्यगधीयमानमुपायांतरम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= (मोह क्षय करनेमें) परम शब्द ब्रह्म की उपासना का, भावज्ञान के अवलंबन द्वारा दृढ किये गये परिणाम से सम्यक् प्रकार अभ्यास करना सो उपायांतर है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / आत्मख्याति गाथा 277 नाचारादिशब्दश्रुतं, एकांतेन ज्ञानस्याश्रयः तत्सद्भावेऽपि...शुद्धभावेन ज्ञानस्याभावात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आचारादि शब्दश्रुत एकांत से ज्ञानका आश्रय नहीं है, क्योंकि आचारांगादिक का सद्भाव होने पर भी शुद्धात्मा का अभाव होने से ज्ञान का अभाव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 3/9 स्वसमय एव शुद्धात्मनः स्वरूपं न पुनः परसमय...इति पातनिका लक्षणं सर्वत्र ज्ञातव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= स्व समय ही शुद्धात्मा का स्वरूप है पर समय नहीं।...इस प्रकार पातनिका का लक्षण सर्वत्र जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.4&amp;quot;&amp;gt;भावार्थ करनेकी विधि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 27/61 कर्मोपाधिजनितमिथ्यात्वरागादिरूप समस्तविभावपरिणामांस्त्यवत्वा निरुपाधिकेवलज्ञानादिगुणयुक्तशुद्धजीवास्तिकाय एव निश्चयनयेनोपादेयत्वेन भावयितव्यं इत भावार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 52/101 अस्मिन्नधिकारे यद्यप्यष्टविधज्ञानोपयोगचतुर्विधदर्शनोपयोगव्याख्यानकाले शुद्धाशुद्धविवक्षा न कृता तथापि निश्चयनयेनादिमध्यांतवर्जिते परमानंदमालिनी परमचैतन्यशालिनि भगवत्यात्मनि यदनाकुलत्वलक्षणं पारमार्थिकसुखं तस्योपादेयभूतस्योपादानकारणभूतं यत्केवलज्ञानदर्शनद्वयं तदेवोपादेयमिति श्रद्धेयं ज्ञेयं तथैवार्तरौद्धादिसमस्तविकल्पजालत्यागेन ध्येयमिति भावार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कर्मोपाधि जनित मिथ्यात्व रागादि रूप समस्त विभाव परिणामों को छोड़कर निरुपाधि केवलज्ञानादि गुणों से युक्त जो शुद्ध जीवास्तिकाय है, उसी को निश्चय नय से उपादेय रूप से मानना चाहिए यह भावार्थ है। वा यद्यपि इस अधिकार में आठ प्रकार के ज्ञानोपयोग तथा चार प्रकार के दर्शनोपयोग का व्याख्यान करते समय शुद्धाशुद्ध की विवक्षा नहीं की गयी है। फिर भी निश्चय नय से आदि मध्य अंत से रहित ऐसी परमानंदमालिनी परमचैतन्यशालिनी भगवान् आत्मा में जो अनाकुलत्व लक्षणवाला पारमार्थिक सुख है, उस उपादेय भूत का उपादान कारण जो केवलज्ञान व केवल दर्शन हैं, ये दोनों ही उपादेय हैं. यही श्रद्धेय है, यही ज्ञेय हैं, तथा इस ही को आर्त रोद्र आदि समस्त विकल्प जाल को त्यागकर ध्येय बनाना चाहिए। ऐसा भावार्थ है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 61/113)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 2/10 शुद्धनयाश्रितं जीवस्वरूपमुपादेयम् शेषं च हेयम्। इति हेयोपादेयरूपेण भावार्थोऽप्यवबोद्धव्यः।...एवं...यथासंभव व्याख्यानकाले सर्वत्र ज्ञातव्य।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शुद्ध नय के आश्रित जो जीव का स्वरूप है वह तो उपादये यानी-ग्रहण करने योग्य है और शेष सब त्याज्य है। इस प्रकार हेयोपादेय रूप से भावार्थ भी समझना चाहिए। तथा व्याख्यान के समय में सब जगह जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.5&amp;quot;&amp;gt;आगम में व्याकरण की प्रधानता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/2/9-10/3 धाउपरूवणा किमट्ठं कीरदे। ण, अणवयधाउस्स सिस्सस्स अत्थावगमाणुव्वत्तादो। उक्तं च `शब्दात्पदप्रसिद्धः पदसिद्धेरर्थनिर्णयो भवति। अर्थात्तत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानात्परं श्रेयः ॥2॥ इति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - धातु का निरूपण किस लिए किया जा रहा है (यह तो सिद्धांत ग्रंथ है)?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जो शिष्य धातु से अपरिचित है, उसे धातु के परिज्ञान के बिना अर्थ का परिज्ञान नहीं हो सकता और अर्थबोध के लिए विवक्षित शब्द का अर्थज्ञान कराना आवश्यक है, इसलिए यहाँ धातु का निरूपण किया गया है। कहा भी है-शब्द से पद की सिद्धि होती है, पद की सिद्धि से अर्थ का निर्णय होता है, अर्थ के निर्णय से तत्त्वज्ञान अर्थात् हेयोपादेय विवेक की प्राप्ति होती है और तत्त्वज्ञान से परम कल्याण होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;महापुराण सर्ग संख्या 38/119 शब्दविद्यार्थशास्त्रादि चाध्येयं नास्यं दुष्यति। सुसंस्कारप्रबोधाय वैयात्यख्यातयेऽपि च ॥119॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उत्तम संस्कारों को जागृत करने के लिए और विद्वत्ता प्राप्त करने के लिए इस व्याकरण आदि शब्द शास्त्र और न्याय आदि अर्थशास्त्र का भी अभ्यास करना चाहिए क्योंकि आचार विषयक ज्ञान होने पर इनके अध्ययन करने में कोई दोष नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;मो.मा.प्र.8/432/17 बहुरि व्याकरण न्यायादिक शास्त्र है, तिनका भी थोरा बहुत अभ्यास करना। जातैं इनका ज्ञान बिन बड़े शास्त्रनि का अर्थ भासै नाहीं। बहुरि वस्तु का भी स्वरूप इनकी पद्धति माने जैसा भासै तैसा भाषादिक करि भासै नाहीं। तातै परंपरा कार्यकारी जानि इनका भी अभ्यास करना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.6&amp;quot;&amp;gt;आगम में व्याकरण की गौणता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 1/3 प्राथमिकशिष्यप्रतिसुखबोधार्थमत्र ग्रंथे संधेर्नियमो नास्तीति सर्वत्र ज्ञातव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्राथमिक शिष्यों को सरलता से ज्ञान हो जावे इसलिए ग्रंथ में संधि का नियम नहीं रखा गया है ऐसा सर्वत्र जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.7&amp;quot;&amp;gt;अर्थ समझने संबंधी कुछ विशेष नियम&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 1/1,1,111/349/4 सिद्धासिद्धाश्रया हि कथामार्गा ।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,117/362/10 सामान्यबोधनाश्च विशेषेष्वतिष्ठंते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कथन परंपराएँ प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध इन दोनों के आश्रय से प्रवृत्त होती हैं। सामान्य विषय का बोध कराने वाले वाक्य विशेषो में रहा करते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 2/1,1/441/17 विशेषविधिना सामान्यविधिर्बाध्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 2/1,1,/442/20 परा विधिर्बाधको भवति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विशेष विधिसे सामान्य विधि बाधित हो जाती है।...पर विधि बाधक होती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 3/1,2,2/18/10 व्याख्यातो विशेषप्रतिपत्तिरिति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,82/315/1 जहा उद्देसो तहा णिद्देसो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= व्याख्या से विशेष की प्रतिपत्ति होती है। उद्देश के अनुसार निर्देश होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 4/1,5,145/403/4 गौण-मुख्ययोर्मूख्ये संप्रत्ययः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= गौण और मुख्यमें विवाद होनेपर मुख्यमें ही संप्रत्यय होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परीक्षामुख परिच्छेद 3/19 तर्कात्तन्निर्णयः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तर्कसे इसका (क्रमभावका) निर्णय होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक 70 भावार्थ-साधन व्याप्त साध्य रूप धर्म के मिल जाने पर पक्ष की सिद्धि हुआ करती है।...दृष्टांत को ही साधन व्याप्त साध्य रूप धर्म कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 72 नामैकदेशेन नामग्रहणम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= नाम के एकदेश से ही पूरे नाम का ग्रहण हो जाता है, जैसे रा.ल कहने से रामलाल।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 494...। व्यतिरेकेण विना यन्नान्वयपक्षः स्वपक्षरक्षार्थम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= व्यतिरेक के बिना केवल अन्वय पक्ष अपने पक्ष की रक्षा के लियए समर्थ नहीं होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.8&amp;quot;&amp;gt;विरोधी बातें आने पर दोनों का संग्रह कर लेना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 1/1,1,27/222/2 उस्सुतं लिहंता आहिरिया कथं वज्जभीरुणो। इदि चे ण एस दोसो, दोण्हं मज्झे एक्कस्सेव संगहे कीरणामे वज्जभीरुत्तं णिवट्टति। दोण्हं पि संगहकरेंताणमाइरियाणं वज्ज-भीरुत्ताविणासाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,37/262/2 उवदेसमंतरेण तदवगमाभावा दोण्हं पि संगहो कायव्वो। दोण्हं संगहं करेंतो संसयमिच्छाइट्ठी होदि त्ति तण्ण, सुत्तुद्दिट्ठमेव अत्थि त्ति सद्दहंतस्स संदेहाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - उत्सूत्र लिखने वाले आचार्य पापभीरु कैसे माने जा सकते हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि दोनों का वचनो में-से किसी एक ही वचन के संग्रह करने पर पापभीरूता निकल जाती है अर्थात् उच्छंखलता आ जाती है। अतएव दोनों प्रकार के वचनों का संग्रह करने वाले आचार्यों के पापभीरुता नष्ट नहीं होती है, अर्थात् बनी रहती है। उपदेश के बिना दोनों में-से कौन वचनसूत्र रूप है यह नहीं जाना जा सकता, इसलिए दोनों वचनोंका संग्रह कर लेना चाहिए।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों वचनों का संग्रह करनेवाला संशय मिथ्यादृष्टि हो जायेगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि संग्रह करनेवाले के `यह सूत्र कथित ही हैं इस प्रकार का श्रद्धान पाया जाता है, अतएव उसके संदेह नहीं हो सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,13/110/173 सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं तु सद्दहदि। सद्दहदि असब्भावं अजाणमाणो गुरु णियोगा ॥110॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सम्यग्दृष्टि जीव जिनेंद्र भगवान के द्वारा उपदिष्ट प्रवचन का तो श्रद्धान करता ही है, किंतु किसी तत्त्व को नहीं जानता हुआ गुरु के उपदेश से विपरीत अर्थ का भी श्रद्धान कर लेता है ॥110॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 27), ( लब्धिसार / मूल या टीका गाथा 105)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.9&amp;quot;&amp;gt;व्याख्यान की अपेक्षा सूत्र वचन प्रमाण होता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 2/1,15/$463/417/7 सुत्तेण वक्खाणं बाहज्जदि ण वक्खाणेण वक्खाणं। एत्थ पुणो दो वि परूवेयेव्वा दोण्हमेक्कदरस्स सुत्ताणुसारितागमाभावादो।...एत्थ पुण विसंयोजणापक्खो चेव पहाणभावेणावलंबियव्वो पवाइज्जमाणत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र के द्वारा व्याख्यान बाधित हो जाता है, परंतु एक व्याख्यान के द्वारा दूसरा व्याख्यान बाधित नहीं होता। इसलिए उपशम सम्यग्दृष्टि के अनंतानुबंधी की विसंयोजना नहीं होती यह वचन अप्रमाण नहीं है। फिर भी यहाँ दोनों ही उपदेशों का ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि दोनों में-से अमुक उपदेश सूत्रानुसारी है, इस प्रकारके ज्ञान करने का कोई साधन नहीं पाया जाता।...फिर भी यहाँ उपशम सम्यग्दृष्टि के अनंतानुबंधी की विसंयोजना होती है, यह पक्ष ही प्रधान रूप से स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार का उपदेश परंपरा से चला आ रहा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.10&amp;quot;&amp;gt;यथार्थ का निर्णय हो जाने पर भूल सुधार लेनी चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,37/143/262 सुत्तादो तं सम्मं दरिसिज्जंतं जदा ण सद्दहदि। सो चेय हवदि मिच्छाइट्ठी हु तदो पहुडि जीवो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र से भले प्रकार आचार्यादिक के द्वारा समझाये जाने पर भी यदि जो जीव विपरीत अर्थ को छोड़कर समीचीन अर्थका श्रद्धान नहीं करता तो उसी समयसे वह सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यादृष्टि हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 28) ( लब्धिसार / मूल या टीका गाथा 106)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,120/381/5 एत्थ उवदेसं लद्धूणं एदं चेव वक्खाणं सच्चमण्णं असच्चमिदि णिच्छओ कायव्वो। एदे च दो वि उवएसा सुत्तसिद्धा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यहाँ पर उपदेश को प्राप्त करके यही व्याख्यान सत्य है, अन्य व्याख्यान असत्य है, ऐसा निश्चय करना चाहिए। ये दोनों ही उपदेश सूत्र सिद्ध हैं। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 14/5,6,66/4), ( धवला पुस्तक 14/5,6,116/151/6), ( धवला पुस्तक 14/5,6,652/508/6), ( धवला पुस्तक 15/317/9)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;शब्दार्थ संबंधी विषय&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;शब्द में अर्थ प्रतिपादन की योग्यता व शंका&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परीक्षामुख परिच्छेद 3/100,101 सहजयोग्यतासंकेतवशाद्धि शब्दादयो वस्तु प्रतिपत्तिहेतवः ॥100॥ यथा मेवदिय सन्ति ।।101।।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द और अर्थ में वाचक वाच्य शक्ति है। उसमें संकेत होने से अर्थात् इस शब्द का वाच्य यह अर्थ है ऐसा ज्ञान हो जाने से शब्द आदि से पदार्थों का ज्ञान होता है। जिस प्रकार मेरु आदि पदार्थ हैं अर्थात् मेरु शब्द के उच्चारण करने से ही जंबूद्वीप के मध्य में स्थित मेरुका ज्ञान हो जाता है। (इसी प्रकार अन्य पदार्थों को भी समझ लेना चाहिए।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;भिन्न-भिन्न शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/33/144 शब्दभेदश्चेदस्ति अर्थभेदेनाप्यवश्यं भवितव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यदि शब्दों में भेद है तो अर्थों में भेद अवश्य होना चाहिए। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(राजवार्तिक अध्याय 1/33/10/98/31)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/6/5/34/18 शब्दभेदे ध्रुवोऽर्थभेद इति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द का भेद होने पर अर्थ अर्थात् वाच्य पदार्थ का भेद ध्रुव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;जितने शब्द हैं उतने वाच्य पदार्थ भी हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आप्त.भी./मू.27 संज्ञिनः प्रतिषेधो न प्रतिषेध्यादृते क्वचित् ॥27॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो संज्ञावान पदार्थ प्रतिषेध्य कहिए निषेध करने योग्य वस्तु तिस बिना प्रतिषेध कहूँ नाहीं होय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/6/5/34/18 में उद्धृत (यावन्मात्राः शब्दाः तावन्मात्राः परमार्थाः भवंति) जित्तियमित्ता सद्दा तित्तियमित्ता होंति परमत्था।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जितने शब्द होते हैं उतने ही परम अर्थ हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कार्तिकेयानुप्रेक्षा / मूल या टीका गाथा 252 कि बहुणा उत्तेण य जेत्तिय-मेत्ताणि संति णामाणि, तेत्तिय-मेत्ता अत्था संति य णियमेण परमत्था।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अधिक कहने से क्या? जितने नाम हैं उतने ही नियम से परमार्थ रूप पदार्थ हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;अर्थ व शब्द में वाच्यवाचक संबंध कैसे&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; कषायपाहुड़ पुस्तक 1/13-14/$198-200/238/1 शब्दोऽर्थस्य निस्संबंधस्य कथ वाचक इति चेत्। प्रमाणमर्थस्य निस्संबंधस्य कथं ग्राहकमिति समानमेतत्। प्रमाणार्थयोर्जन्यजनकलक्षणः प्रतिबंधोऽस्तीति चेत्; न; वस्तुसामर्थ्यस्यांतः समुत्पत्तिविरोधात् ॥$198॥ प्रमाणार्थयोः स्वभावत एव ग्राह्यग्राहकमभावश्चेत्; तर्हि शब्दार्थयोः स्वभावत एव वाच्यवाचकभावः किमिति नेष्यते अविशेषात्। प्रमाणेन स्वभावतोऽर्थसंबद्धेन किमितींद्रियमालोको वा अपेक्ष्यत इति समानमेतत्। शब्दार्थसबंधः कृत्रिमत्वाद्वा पुरुषव्यापारमपेक्षते ॥$199॥...&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;अथ स्यात्, न शब्दो वस्तु धर्मः; तस्य ततो भेदात्। नाभेदः भिंनेंद्रियग्राह्यत्वात् भिन्नार्थक्रियाकारित्वात् भिन्नसाधनत्वात् उपायोपेयभावोपलंभाच्च। न विशेष्याद्भिन्नं विशेषणम्; अव्यवस्थापत्तेः। ततो न वाचकभेदाद्वाच्यभेद इति; न; प्रकाश्याद्भिन्नामेव प्रमाण-प्रदीप-सूर्य-मणींद्वादीनां प्रकाशकत्वोपलंभात्, सर्वथैकत्वे तदनुपलंभात् ततो भिन्नोऽपि शब्दोऽर्थप्रतिपादक इति प्रतिपत्तव्यम् ॥$200॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,45/179/3 अथ स्यान्न, नशब्दो...अव्यवस्थापत्ते; (ऊपर कषायपाहुड़ में भी यही शंका की गयी है) नैष दोषः, भिन्नानामपि वस्त्राभरणादीनां विशेषणत्वोपलंभात्।...कृतो योग्यता शब्दार्थानाम्। स्वपराभ्याम्। न चैकांतेनान्यत एव तदुत्पत्तिः, स्वती विवर्तमानानामर्थानां सहायकत्वेन वर्तमानबाह्यार्थोपलंभात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द व अर्थ में कोई संबंध न होते हुए भी वह अर्थ का वाचक कैसे हो सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण का अर्थ के साथ कोई संबंध न होते हुए भी वह अर्थ का ग्राहक कैसे हो सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण व अर्थ में जन्यजनक लक्षण पाया जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, वस्तु की सामर्थ्य की अन्य से उत्पत्ति मानने में विरोध आता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण व अर्थ में तो स्वभाव से ही ग्राह्यग्राहक संबंध है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - तो शब्द व अर्थ में भी स्वभाव से ही वाच्य-वाचक संबंध क्यों नहीं मान लेते?  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि इसमें स्वभाव से ही वाच्यवाचक भाव है तो वह पुरूषव्यापार की अपेक्षा क्यों करता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण यदि स्वभाव से ही अर्थ के साथ संबद्ध है तो फिर वह इंद्रियव्यापार व आलोक (प्रकाश) की अपेक्षा क्यों करता है? इस प्रकार प्रमाण व शब्द दोनों में शंका व समाधान समान हैं। अतः प्रमाण की भाँति ही शब्द में भी अर्थ प्रतिपादन की शक्ति माननी चाहिए। अथवा, शब्द और पदार्थ का संबंध कृत्रिम है। अर्थात् पुरुष के द्वारा किया हुआ है, इसलिए वह पुरुष के व्यापार की अपेक्षा रखता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द वस्तु का धर्म नहीं है, क्योंकि उसका वस्तु से भेद है। उन दोनों में अभेद नहीं कहा जा सकता क्योंकि दोनों भिन्न इंद्रियों के विषय हैं, और वस्तु उपेय है। इन दोनों में विशेष्य विशेषण भाव की अपेक्षा भी एकत्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि विशेष्य से भिन्न विशेषण नहीं होता है, कारण कि ऐसा मानने से अव्यवस्था की आपत्ति आती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; [धवला पुस्तक 9/4,1,45/179/3 पर यही शंका करते हुए शंकाकार ने उपरोक्त हेतुओँ के अतिरिक्त ये हेतु और भी उपस्थित किये हैं - दोनों भिन्न इंद्रियों के विषय हैं। वस्तु त्वगिंद्रिय से ग्राह्य है और शब्द त्वगिंद्रिय से ग्राह्य नहीं है। दूसरे, उन दोनों में अभेद मानने से `छुरा' और `मोदक' शब्दों का उच्चारण करने पर क्रम से मुख कटने तथा पूर्ण होने का प्रसंग आता है; अतः दोनों में सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता।] (और भी देखें [[ नय#4.5 | नय - 4.5]]) अतः शब्द वस्तु का धर्म न होने से उसके भेद से अर्थभेद नहीं हो सकता?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, जिस प्रकार प्रमाण, प्रदीप, सूर्य, मणि और चंद्रमा आदि पदार्थ घट पट आदि प्रकाश्यभूत पदार्थों से भिन्न रहकर ही उनके प्रकाशक देखे जाते हैं, तथा यदि उन्हें सर्वथा अभिन्न माना जाय तो उनके प्रकाश्य-प्रकाशक भाव नहीं बन सकता है; उसी प्रकार शब्द अर्थ से भिन्न होकर भी अर्थ का वाचक होता है, ऐसा समझना चाहिए। दूसरे, विशेष्य से अभिन्न भी वस्त्राभरणादिकों को विशेषणता पायी जाती है। (जैसे-घड़ीवाला या लाल पगड़ीवाला)  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द व अर्थ में यह योग्यता कहाँ से आती है कि नियत शब्द नियत ही अर्थका प्रतिपादक हो?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - स्व व पर से उनके यह योग्यता आती है। सर्वथा अन्य से ही उसकी उत्पत्ति हो, ऐसा नहीं है; क्योंकि, स्वयं वर्तने वाले पदार्थों की सहायता से वर्तते हुए बाह्य पदार्थ पाये जाते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/13-14/$215-216/265-268 अथ स्यात् न पदवाक्यान्यर्थप्रतिपादिकानि; तेषामसत्त्वात। कुतस्तदसत्त्वम्। [अनुपलंभात् सोऽपि कुतः।] वर्णानां क्रमोत्पन्नानामनित्यानामेतेषां नामधेयाति (पाठ छूटा हुआ है) समुदायाभावात्। न च तत्समुदय (पाठ छूटा हुआ है) अनुपलंभात्। न च वर्णादर्थप्रतिपत्तिः; प्रतिवर्णमर्थप्रतिपत्तिप्रसंगात्। नित्यानित्योभयपक्षेषु संकेतग्रहणानुपपत्तेश्च न पदवाक्येभ्योऽर्थप्रतिपत्तिः। नासंकेतितः शब्दोऽर्थप्रतिपादकः अनुपलंभात्। ततो न शब्दार्थप्रतिपत्तिरिति सिद्धम् ॥$215॥ न च वर्ण-पद-वाक्यव्यतिरिक्तः नित्योऽक्रम अमूर्तो निरवयवः सर्वगतः अर्थप्रतिपत्तिनिमित्तं स्फोट इति; अनुपलंभात् ॥$216॥...न; बहिरंगशब्दात्मकनिमित्तं च (तेभ्यः) क्रमेणोत्पन्नवर्णप्रत्ययेभ्यः अक्रमस्थितिभ्यः समुत्पन्नपदवाक्याभ्यामर्थविषयप्रत्ययोत्पत्त्युपलंभात्। न च वर्णप्रत्ययानां क्रमोत्पन्नानां पदवाक्यप्रत्ययोत्पत्तिनिमित्तानामक्रमेण स्थितिर्विरुद्धा; उपलभ्यमानत्वात्।...न चानेकांते एकांतवाद इव संकेतग्रहणमनुपपन्नम्; सर्वव्यवहाराणा [मनेकांत एवं सुघटत्वात्। ततः] वाच्यवाचकभावो घटत इति स्थितम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - क्रम से उत्पन्न होने वाले अनित्य वर्णों का समुदाय असत् होने से पद और वाक्यों का ही जब अभाव है, तो वे अर्थप्रतिपादक कैसे हो सकते हैं? और केवल वर्णों से ही अर्थ का ज्ञान हो जाय ऐसा है नहीं, क्योंकि `घ' `ट' आदि प्रत्येक वर्ण से अर्थ के ज्ञान का प्रसंग आता है? सर्वथा नित्य, सर्वथा अनित्य और सर्वथा उभय इन तीनों पक्षो में ही संकेत का ग्रहण नहीं बन सकता इसलिए पद और वाक्यों से अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता; क्योंकि संकेत रहित शब्द पदार्थ का प्रतिपादक होता हुआ नहीं देखा जाता? वर्ण, पद और वाक्य से भिन्न, नित्य, क्रमरहित, अमूर्त, निरवयव, सर्वगत `स्फोट' नाम के तत्त्व को पदार्थों की प्रतिपत्ति का कारण मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि, उस प्रकार की कोई वस्तु उपलब्ध नहीं हो रही है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, बाह्य शब्दात्मक निमित्तों से क्रमपूर्वक जो `घ' `ट' आदि वर्ण ज्ञान उत्पन्न होते हैं, और जो ज्ञान में अक्रम से स्थित रहते हैं, उनसे उत्पन्न होनेवाले पद और वाक्यों  से अर्थ विषयक ज्ञान की उत्पत्ति देखी जाती है। पद और वाक्यों के ज्ञान की उत्पत्ति में कारणभूत तथा क्रम से उत्पन्न वर्ण विषयक ज्ञानों की अक्रम से स्थिति मानने में भी विरोध नहीं आता; क्योंकि, वह उपलब्ध होती है। तथा जिस प्रकार एकांतवाद में संकेत का ग्रहण नहीं बनता है, उसी प्रकार अनेकांत में भी न बनता हो, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि समस्त व्यवहार अनेकांतवाद में ही सुघटित होते हैं। (अर्थात् वर्ण व वर्णज्ञान कथंचित् भिन्न भी है और कथंचित् अभिन्न भी) अतः वाच्यवाचक भाव बनता है, यह सिद्ध होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;शब्द अल्प हैं और अर्थ अनंत हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/26/4/87/23 शब्दाश्च सर्वे संख्येया एव, द्रव्यपर्यायाः पुनः संख्येयाऽसंख्येयानंतभेदाः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सर्व शब्द तो संख्यात ही होते हैं। परंतु द्रव्यों की पर्यायों के संख्यात असंख्यात व अनंतभेद होते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;अर्थ प्रतिपादन की अपेक्षा शब्द में प्रमाण व नयपना&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 4/42/13/252/22 यदा वक्ष्यमाणैः कालादिभिरस्तित्वादीनां धर्माणां भेदेन विवक्षा तदैकस्य शब्दस्यानेकार्थप्रत्यायनशक्त्याभावात् क्रमः। यदा तु तेषामेव धर्माणां कालदिभिरभेदेन वृत्तमात्मरूपमुच्यते तदैकेनापि शब्देन एकधर्मप्रत्यायनमुखेन तदात्मकत्वापन्नस्य अनेकाशेषरूपस्य प्रतिपादनसंभवात् यौगपद्यम्। तत्र यदा यौगपद्यं तदा सकलादेशः; स एव प्रमाणमित्युच्येते।...यदा तु क्रमः तदा विकलादेशः स एव नय इति व्यपदिश्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जब अस्तित्व आदि अनेक धर्म कालादि की अपेक्षा भिन्न-भिन्न विवक्षित होते हैं, उस समय एक शब्द में अनेक अर्थों के प्रतिपादन की शक्ति न होने से क्रम से प्रतिपादन होता है। इसे विकलादेश कहते हैं। परंतु जब उन्हीं अस्तित्वादि धर्मों की कालादिक की दृष्टि से अभेद विवक्षा होती है, तब एक भी शब्द के द्वारा एक धर्ममुखेन तादात्म्य रूप से एकत्व  को प्राप्त सभी धर्मों का अखंड भावसे युगपत् कथन हो जाता है। यह सकलादेश कहलाता है। विकलादेश नय रूप है और सकलादेश प्रमाण रूप है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;शब्द का अर्थ देशकालानुसार करना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/179/29 में उद्धृत “स्वाभाविकसामर्थ्यसमयाभ्यामर्थबोध निबंधनं शब्दः।” &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= स्वाभाविक शक्ति तथा संकेत से अर्थ का ज्ञान कराने वाले को शब्द कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;भिन्न क्षेत्र-कालादि में शब्द का अर्थ भिन्न भी होता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8.1&amp;quot;&amp;gt;कालकी अपेक्षा&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/178/30 कालापेक्षया पुनर्यथा जैनानां प्रायश्चित्तविधौ...प्राचीनकाले षड्गुरुशब्देन शतमशीत्यधिकमुपवासानामुच्यते स्म, सांप्रतकाले तु तद्विपरीते तेनैव षड्गुरुशब्देन उपवासत्रयमेव संकेत्यते जीतकल्पव्यवहारनुसारात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जितकल्प व्यवहार के अनुसार प्रायश्चित्त विधि में प्राचीन समय में `षड्गुरु' शब्द का अर्थ एक सौ अस्सी उपवास किया जाता था, परंतु आजकल उसी `षड्गुरु' का अर्थ केवल तीन उपवास किया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8.2&amp;quot;&amp;gt;शास्त्रोंकी अपेक्षा&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/179/4 शास्त्रापेक्षया तु यथा पुराणेषु द्वादशीशब्देनैकादशी। त्रिपुरार्णवे च अलिशब्देन मदाराभिषिक्तं च मैथुनशब्देन मधुसर्पिषोर्ग्रहणम् इत्यादि।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पुराणों में उपवास के नियमों का वर्णन करते समय `द्वादशी' का अर्थ एकादशी किया जाता हैं; शाक्त लोगों के ग्रंथो में `अलि' शब्द मदिरा और `मैथुन' शब्द शहद और घी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8.3&amp;quot;&amp;gt;क्षेत्र की अपेक्षा&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/178/28 चौरशब्दोऽन्यत्र तस्करे रूढोऽपि दाक्षिणात्यानामोदने प्रसिद्धः। यथा च कुमारशब्दः पूर्वदेशे आश्विनमासे रूढः। एवं कर्कटीशब्दादयोऽपि तत्तद्देशापेक्षया योन्यादिवाचका ज्ञेयाः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= `चौर' शब्द का साधारण अर्थ तस्कर होता है, परंतु दक्षिण देश में इस शब्द का अर्थ चावल होता है। `कुमार' शब्द का सामान्य अर्थ युवराज होने पर भी पूर्व देश में इसका अर्थ आश्विन मास किया जाता है। `कर्कटी' शब्दका अर्थ ककड़ी होनेपर भी कहीं-कहीं इसका अर्थ योनि किया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.9&amp;quot;&amp;gt;शब्दार्थ की गौणता संबंधी उदाहरण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सप्तभंग तरंगिनी पृष्ठ 70/4 उक्तिश्चावाच्यतैकांतेनावाच्यमिति युज्यते। इति स्वामिसमंतभद्राचार्यवचनं कथं संघटते।...न तदर्थापरिज्ञानात्। अयं खलु तदर्थः, सत्त्वाद्येकैकधर्ममुखेन वाच्यमेव वस्तु युगपत्प्रधानभूतसत्त्वासत्त्वोभयधर्मावच्छिन्नत्वेनावाच्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अवाच्याता का जो कथन है वह एकांत रूप से अकथनीय है. ऐसा मानने से `अवाच्यता युक्त न होगी', यह श्री समंतभद्राचार्य का कथन कैसे संगत होगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसी शंका भी नहीं की जा सकती, क्योंकि तुमने स्वामी समंतभद्राचार्यजी के वचनों को नहीं समझा। उस वचन का निश्चय रूप से अर्थ यह है कि सत्त्व आदि धर्मों में-से एक-एक धर्म के द्वारा जो पदार्थ वाच्य है अर्थात् कहने योग्य है, वही पदार्थ प्रधान भूत सत्त्व असत्त्व इस उभय धर्म सहित रूप से अवाच्य है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 2/7/5/11/2 रूढिशब्देषु हि क्रियोपात्तकाला व्युत्पत्त्यर्थैव न तंत्रम्। यथा गच्छतीति गौरिति।...&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 2/12/2/126/30 कथं तर्ह्यस्य निष्पत्तिः `त्रस्यंतीति त्रसाः' इति। व्युत्पत्तिमात्रमेव नार्थः प्राधान्येनाश्रीयते गोशब्दप्रवृत्तिवत्। ...एवंरूढिविशेषबललाभात् क्वचिदेव वर्तते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जितने रूढि शब्द हैं उनकी भूत भविष्यत् वर्तमान काल के आधीन जो भी क्रिया हैं वे केवल उन्हें सिद्ध करने के लिए हैं। उनसे जो अर्थ द्योतित होता है वह नहीं लिया जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जो भयभीत होकर गति करे सो त्रस यह व्युत्पत्ति अर्थ ठीक नहीं हैं। (क्योंकि गर्भस्थ अंडस्थ आदि जीव त्रस होते हुए भी भयभीत होकर गमन नहीं करते।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - `त्रस्यंतीति त्रसाः' यह केवल ”गच्छतीति गौः” की तरह व्युत्पत्ति मात्र है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(राजवार्तिक अध्याय 2/13/1/127) (राजवार्तिक अध्याय 2/36/3/145)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगमकी प्रमाणिकतामें हेतु&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;आगमकी प्रामाणिकताका निर्देश&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,75/314/5 चेत्स्वाभाव्यात्प्रत्यक्षस्येव।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जैसे प्रत्यक्ष स्वभावतः प्रमाण है उसी प्रकार आर्ष भी स्वभावतः प्रमाण है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;वक्ता की प्रामाणिकता से वचन की प्रमाणिकता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,22/196/4 वक्तृप्रामाण्याद्वचनप्रामाण्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वक्ता की प्रमाणता से वचन में प्रमाणता आती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( जंबूदीव-पण्णत्तिसंगहो अधिकार 13/84)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पद्मनंदि पंचविंशतिका अधिकार 4/10 सर्वविद्वीतरागोक्तो धर्मः सूनृततां व्रजेत्। प्रामाण्यतो यतः पुंसो वाचः प्रामाण्यमिष्यते ॥10॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो धर्म सर्वज्ञ और वीतराग के द्वारा कहा गया है वही यथार्थता को प्राप्त हो सकता है, क्योंकि पुरुष की प्रमाणता से ही वचन में प्रमाणता मानी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt;आगम की प्रामाणिकता के उदाहरण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 4/1,5,320/382/11 तं कधं णव्वदे। आइरियपरंपारगदोवदेसादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यह कैसे जाना जाता है कि उपशम सम्यक्त्वक शलाकाएँ पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र होती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - आचार्य परंपरागत उपदेश से यह जाना जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 5/1,6,36/31/5/) ( धवला पुस्तक 14/164/6; 169/2; 170/13; 173/19; 208/11; 209/11; 370/10; 510/2)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 6/1,9-1,28/65/2 एइंदियादिसु अव्वत्तचेट्ठेसु कधं सुहवदुहवभावा णज्जंते। ण तत्थ तेसिमव्वत्ताणमागमेण अत्थित्तसिद्धीदो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अव्यक्त चेष्टा वाले एकेंद्रिय आदि जीवों में सुभग और दुर्भग भाव कैसे जाने जाते हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि एकेंद्रिय आदि में अव्यक्त रूप से विद्यमान उन भावों का अस्तित्व आगमसे सिद्ध है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 7/2,1,56/96/8 ण दंसणमत्थि विसयाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1.56/98/1 अत्थि दंसणं, सुत्तम्मिअट्ठकम्मणिद्देसाददो।...इच्चादिउवसंहारसुत्तदंसणादो च।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दर्शन है नहीं, क्योंकि उसका कोई विषय नही है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - दर्शन है क्योंकि, सूत्र में आठ कर्मों का निर्देश किया गया है।...इस प्रकार के अनेक उपसंहार सूत्र देखने से भी, यही सिद्ध होता है कि दर्शन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt;अर्हत् व अतिशय ज्ञान वालों के द्वारा प्रणीत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 8/16/562 तदसिद्धिरिति चेत्; न; अतिशयज्ञानाकरत्वात् ॥16॥ अन्यत्राप्यतिशयज्ञानदर्शनादिति चेत्; न; अतएव तेषां सभवात् ॥17॥...आर्हतमेव प्रवचनं तेषां प्रभवः। उक्तं च-सुनिश्चितं न; परतंत्रयुक्तिषु स्फुरंति याः काश्चन सूक्तसंपदः। तवैव ताः पूर्वमहार्णवोत्थिता जगत्प्रमाणं जिनवाक्यविप्रुषः (द्वात्रि.1/3) श्रद्धामात्रमिति चेत्; न; भूयसामुपलब्धेः रत्नाकरवत् ॥18॥ तदुद्भवत्वात्तेषामपि प्रामाण्यमिति चेत्; न; निःसारत्वात् काचादिवत् ॥19॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अर्हत् का आगम पुरुष कृत होने से अप्रमाण है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा कहना युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि वह अतिशय ज्ञानों का आकार है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अतिशय ज्ञान अन्यत्र भी देखे जाते हैं? अतएव अर्हत् आगम को ही ज्ञान का आकार कहना उपयुक्त नहीं है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - अन्यत्र देखे जानेवाले अतिशय ज्ञानों का मूल उद्भव स्थान आर्हत प्रवचन ही है। कहा भी है कि `यह अच्छी तरह निश्चित है कि अन्य मतों में जो युक्तिवाद और अच्छी बातें चमकती हैं वे तुम्हारी ही हैं। वे चतुर्दश पूर्व रूपी महासागर से निकली हुई जिनवाक्य रूपी बिंदुएँ हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह सर्व बातें केवल श्रद्धान मात्र गम्य हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - श्रद्धा मात्र गम्य नहीं अपितु युक्ति सिद्ध हैं जैसे गाँव, नगर या बाजारों में कुछ रत्न देखे जाते हैं फिर भी उनकी उत्पत्ति का स्थान रत्नाकर समुद्र ही माना जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि वे व्याकरण आदि अर्हत्प्रवचन से निकले हैं तो उनकी तरह प्रमाण भी होने चाहिए?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि वे निस्सार हैं। जैसे नकली रत्न क्षार और सीप आदि भी रत्नाकर से उत्पन्न होते हैं परंतु निःसार होने से त्याज्य हैं। उसी तरह जिनशासन समुद्र से निकले वेदादि निःसार होने से प्रमाण नहीं हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 6/27/5/532 अतिशयज्ञानदृष्टत्वात्, भगवतामर्हतामतिशयवज्ज्ञानं युगपत्सर्वार्थावभासनसमर्थं प्रत्यक्षम्, तेन दृष्टं तद्दृष्टं यच्छास्त्रं तद् यथार्थोपदेशकम्, अतस्तत्प्रमाण्याद् ज्ञानावरणाद्यास्रवनियमप्रसिद्धिः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शास्त्र अतिशय ज्ञानवाले युगपत् सर्वावभासन समर्थ प्रत्यक्षज्ञानी केवली के द्वारा प्रतीत है, अतः प्रमाण है। इसलिए शास्त्र में वर्णित ज्ञानावरणादिक के आस्रव के कारण आगमानुगृहीत है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गोम्मट्टसार जीवकांड / जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 196/438/1 किं बहुना सर्वतत्त्वानां प्रवक्तरिपुरुषे आप्ते सिद्धेसति तद्वाक्यस्यागमस्य सूक्ष्मांतरितदूरार्थेषु प्रामाण्यसुप्रसिद्धेः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बहुत कहने करि कहा? सर्व तत्त्वनिका वक्ता पुरुष जो है आप्तता की सिद्धि होतै तिस आप्त के वचन रूप जो आगम ताकी सूक्ष्म अंतरित दूरी पदार्थनिविषैं प्रमाणता की सिद्धि हो है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 6/27/527 अर्हंत सर्वज्ञ...के वचन प्रमाणभूत हैं...स्वभाव विषै तर्क नाहीं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;वीतराग द्वारा प्रणीत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,22/196/5 विगताशेषदोषावरणत्वात् प्राप्ताशेषवस्तुविषयबोधस्तस्य व्याख्यातेति प्रतिपत्तव्यम् अन्यथास्यापौरुषेयत्वस्यापि पौरुषेयवदप्रामाण्यप्रसंगात्&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसने संपूर्ण भावकर्म व द्रव्यकर्म को दूर कर देने से संपूर्ण वस्तु विषयक ज्ञान को प्राप्त कर लिया है वही आगम का व्याख्याता हो सकता है। ऐसा समझना चाहिए। अन्यथा पौरुषेयत्व रहित इस आगम को भी पौरुषेय आगम के समान अप्रमाणता का प्रसंग आ जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,2/10-11/12 आगमो ह्याप्तवचनमाप्तं दोषक्षयं विदुः। त्यक्तदोषोऽनृतं वाक्यं न ब्रूयाद्धेत्वसंभवात् ॥10॥ रागाद्वा द्वेषादा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्युनृतम्। यस्य तु नैते दोषास्तस्यनृतकारणं नास्ति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के वचन को आगम जानना चाहिए और जिसने जन्म जरादि अठारह दोषों का नाश कर दिया है उसे आप्त जानना चाहिए। इस प्रकार जो त्यक्त दोष होता है, वह असत्य वचन नहीं बोलता है, क्योंकि उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण ही संभव नहीं है ॥10॥ राग से, द्वेष से, अथवा मोह से असत्य वचन बोला जाता है, परंतु जिसके ये रागादि दोष नहीं हैं उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण भी नहीं पाया जाता है ॥10॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 10/4,2,460/280/2)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 10/5,5,121/382/1 पमाणत्तं कुदो णव्वदे। रागदोषमोहभावेण पमाणीभूदपुरिसपरंपराए आगमत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सूत्र की प्रमाणता कैसे जानी जाती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - राग, द्वेष और मोह का अभाव हो जाने से प्रमाणीभूत पुरुष परंपरा से प्राप्त होने के कारण उसकी प्रमाणता जानी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 17/237/9 तदेवमाप्तेन सर्वविदा प्रणीत आगमः प्रमाणमेव। तदप्रामाण्यं हि प्रमाणयकदोषनिबंधनम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सर्वज्ञ आप्त-द्वारा बनाया आगम ही प्रमाण है। जिस आगम का बनाने वाला सदोष होता है, वही आगम अप्रमाण होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अनगार धर्मामृत अधिकार 2/20 जिनोक्ते वा कुतो हेतुबाधगंधोऽपि शंक्यते। रागादिना विना को हि करोति वितथं वचः ॥20॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कौन पुरुष होगा जो कि रागद्वेष के बिना वितथ मिथ्या वचन बोले। अतएव वीतराग के वचनों मे अंश मात्र भी बाधा की संभावना किस तरह हो सकती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.6&amp;quot;&amp;gt;गणधरादि आचार्यों-द्वारा कथित होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$119/153 णेदाओ गाहाओ सुत्तं गणहरपत्तेयबुद्ध-सुदकेवलि-अभिण्णदसपुव्वीसु गुणहरभडारयस्स अभावादो; ण; णिद्दोसपक्खरसहेउपमाणेहि सुत्तेण सरिसत्तमत्थि त्ति गुणहराइरियगाहाणं पि सुत्तत्तुवलंभावादो..एदं सव्वं पि सुत्तलक्खणं जिणवयणकमलविणिग्गयअत्थपदाणं चेव संभवइ ण गणहरमुहविणिग्गयगंथरयणाए, ण सच्च (सुत्त) सारिच्छमस्सिदूण तत्थ वि सुत्तत्तं पडि विरोहाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - (कषाय प्राभृत संबंधी) एक सौ अस्सी गाथाएँ सूत्र नहीं हो सकती है, क्योंकि गुणधर भट्टारक न गणधर हैं, न प्रत्येक बुद्ध हैं, न श्रुतकेवली हैं, और न अभिन्न दशपूर्वी ही हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि गुणधर भट्टाकर की गाथाएं निर्दोष हैं, अल्प अक्षरवाली हैं, सहेतुक हैं, अतः वे सूत्र के समान हैं, इसलिए गुणधर आचार्य की गाथाओं में सूत्रत्व पाया जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह संपूर्ण सूत्र लक्षण तो जिनदेव के मुखकमल से निकले हुए अर्थ पदों में ही संभव हैं, गणधर के मुख से निकली ग्रंथ रचना में नहीं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि गणधर के वचन भी सूत्रके समान होते हैं। इसलिए उनके वचनों मे सूत्रत्व होनेके प्रति विरोध का अभाव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.7&amp;quot;&amp;gt;प्रत्यक्ष ज्ञानियों के द्वारा प्रणीत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 8/26/405 व्याख्यातो सप्रपंचः बंधपदार्थः। अविधमनःपर्ययकेवलज्ञानप्रत्यक्षप्रमाणगम्यस्तदुपदिष्टागमानुमेयः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इस प्रकार विस्तार के साथ बंध पदार्थ का व्याख्यान किया। यह अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान और केवलज्ञान रूप प्रत्यय-प्रमाण-गम्य है, और इन ज्ञान वाले जीवों के द्वारा उपदिष्ट आगम से अनुमेय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.8&amp;quot;&amp;gt;आचार्य परंपरा से आगत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,121/382/1 पमाणत्तं कुदो णव्वदे।..पमाणीभूदपुरिसपरंपराए आगमदत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सूत्र में प्रमाणता कैसे जानी जाती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाणीभूत पुरुष परंपरा से प्राप्त होने के कारण उसकी प्रमाणता जानी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.9&amp;quot;&amp;gt;समन्वयात्मक होनेके कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$63/82/2 तं च उवदेसं लहिय वत्तव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उपदेश ग्रहण करके अर्थ कहना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/222/4 दोण्हं वयणाणं मज्झे कं वयणं सच्चमिदि चे सुदकेलवी केवली वा जाणादि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों प्रकार के वचनों में-से किसको सत्य माना जाये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - इस बात को केवली या श्रुतकेवली ही जान सकते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 1/1,1,37/262/1) ( धवला पुस्तक 7/2/11,75/540/4)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,71/333/3 दोण्हं सुत्ताणं विरोहे संतेत्थप्पावलंबणस्स णाइयत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= दो सूत्रों के मध्य विरोध होने पर चुप्पी का अवलंबन करना ही न्याय है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 9/4,1,44/126/4), ( धवला पुस्तक 14/5,6,116/151/5)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 14/5,6,116/11 सच्चमेदमेक्केणेव होदव्वमिदि, किंतु अणेणेव होदव्वमिदि ण वट्टमाणकाले णिच्छओ कादुं सक्किज्जदे, जिण-गणहरपत्तेयबुद्ध-पण्णसमण-सुदकेवलिआदीणमभावादो॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यह सत्य है कि इन दोनों में-से कोई एक अल्पबहुत्व होना चाहिए किंतु यही अल्पबहुत्व होना चाहिए इसका वर्तमान काल में निश्चय करना शक्य नहीं है, क्योंकि इस समय जिन, गणधर, प्रत्येकबुद्ध, प्रज्ञाश्रमण, और श्रुतकेवलो आदिका अभाव है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / गोम्मट्टसार जीवकांड जीव तत्त्व प्रदीपिका| जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 288/616/2-4) (और भी देखें [[ आगम#3.9 | आगम - 3.9]])&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.10&amp;quot;&amp;gt;विचित्र द्रव्यों आदि का प्ररूपक होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 235 आगमेन तावत्सर्वाण्यपि द्रव्याणि प्रमीयंते..विचित्र गुणपर्यायविशिष्टानि च प्रतीयंते, सहक्रमप्रवृत्तानेकधर्मव्यापकानेकांतमयत्वेनैवागमस्य प्रमात्वोपपत्तेः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम-द्वारा सभी द्रव्य प्रमेय (ज्ञेय) होते हैं। आगम से वे द्रव्य विचित्र गुण पर्यायवाले प्रतीत होते हैं. क्योंकि आगम को सहप्रवृत्त और क्रमप्रवृत्त अनेक धर्मों के व्यापक अनेकांतमय होने से प्रमाणता की उपपत्ति है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.11&amp;quot;&amp;gt;पूर्वापर अविरोधी होनेके कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री पृ. 62 (निर्णय सागर बंबई) `अविरोधश्च यस्मादिष्टं (प्रयोजनभूतं) मोक्षादिकं तत्त्वं ते प्रसिद्धेन प्रमाणेन न बाध्यते। तथा हि यत्र यस्याभिमतं तत्त्वं प्रमाणेन न बाध्यते स तत्र युक्तिशास्त्राविरोधी वाक्...।”&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इष्ट अर्थात् प्रयोजनभूत मोक्ष आदित्तत्त्व किसी भी प्रसिद्ध प्रमाण से बाधित न होने के कारण अविरोधी हैं। जहाँ पर जिसका अभिमत प्रमाण से बाधित नहीं होता, वह वहाँ युक्ति और शास्त्र से अविरोधी वचन वाला होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अनगार धर्मामृत अधिकार 2/18/133 दृष्टेऽर्थेऽध्यक्षतो वाक्यमनुमेयेऽनुमानतः। पूर्वापरा, विरोधेन परोक्षे च प्रमाण्यताम् ॥18॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम में तीन प्रकार के पदार्थ बताये हैं - दृष्ट, अनुमेय और परोक्ष। इनमें-से जिस तरह के पदार्थ को बताने के लिए आगम में जो वाक्य आया हो उसको उसी तरह से प्रमाण करना चाहिए। यदि दृष्ट विषय में आया हो तो प्रत्यक्ष से और अनुमेय विषय में आया हो तो अनुमान से तथा परोक्ष विषय में आया हो तो पूर्वापर का अविरोध देखकर प्रमाणित करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$30/44/4 कथं णामसण्णिदाण पदवक्काणं पमाणत्तं। ण, तेसु विसंवादाणुवलंभादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - नाम शब्द से बोधित होने वाले पद और वाक्यों को प्रमाणता कैसे?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, इन पदों में विसंवाद नहीं पाया जाता, इसलिए वे प्रमाण हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.12&amp;quot;&amp;gt;युक्ति से बाधित नहीं होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री.पृ.62 ( निर्णय सागर बंबई) “यत्र यस्याभिमतं तत्त्वं प्रमाणेन न बाध्यते स तत्र युक्तिशास्त्राविरोधिवाक्।”&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जहाँ जिसका अभिमत तत्त्व प्रमाण से बाधित नहीं होता, वहाँ वह युक्ति और शास्त्र से अविरोधी वचन वाला है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तिलोयपण्णत्ति अधिकार 7/613/766/3 तदो ण एत्थ इदमित्थमेवेति एयंतपरिग्गहेण असग्गाहो कायव्वो, परमगुरुपरंपरागउवएसस्स जुत्तिबलेण विहडावेदुमसक्कियत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= `यह ऐसा ही है' इस प्रकार एकांत कदाग्रह नहीं करना चाहिए, क्योंकि गुरु पंरपरासे आये उपदेश को युक्ति के बल से विघटित नहीं किया जा सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1,56/98/10 आगमपमाणेण होदु णाम दंसणस्स अत्थित्तं ण जुत्तीए चे। ण, जुत्तोहि आगमस्स बाहाभावादो आगमेण वि जच्चा जुत्ती ण बाहिज्जदि ति चे। सच्चं ण बाहिज्जदि जच्चा जुत्ती, किंतु इमा बहाहिज्जदि जच्चात्ताभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आगम प्रमाण से भले दर्शन का अस्तित्व हो, किंतु युक्ति से तो दर्शन का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - होता है, क्योंकि युक्तियों से आगम की बाधा नहीं होती।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आगम से भी तो जात्य अर्थात् उत्तम युक्ति की बाधा नहीं होनी चाहिए?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - सचमुच ही आगम से युक्ति की बाधा नहीं होती, किंतु प्रस्तुत युक्ति की बाधा अवश्य होती है, क्योंकि वह उत्तम युक्ति नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 12/4,2,13,55/399/13 ण च जुत्तिविरुद्धत्तादो ण सुत्तमेदमिदिवोत्तुं सकिज्जदे, सुत्तविरुद्धाए जुत्तित्ताभावादो। ण च अप्पमाणेण पमाणं बाहिज्जदे, विरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - युक्ति विरुद्ध होने से यह सूत्र ही नहीं है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा कहना शक्य नहीं है। क्योंकि जो युक्ति सूत्र के विरुद्ध हो वह वास्तव में युक्ति ही संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त अप्रमाण के द्वारा प्रमाण को बाधा नहीं पहुँचायी जा सकती क्योंकि वैसा होने में विरोध है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / गोम्मट्टसार जीवकांड जीव तत्त्व प्रदीपिका| जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 196/436/15) &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 12/4,2,14,38/494/15 ण च सुत्तपडिकूलं वक्खाणं होदि, वक्खाणाभासहत्तादो। ण च जुत्तीए सुत्तस्स बाहा संभवदि, संयलबाहादीदस्स सुत्तववएसादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र के प्रतिकूल व्याख्यान होता नहीं है। क्योंकि वह व्याख्यानाभास कहा जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि कहा जाय कि युक्ति से सूत्र को बाधा पहुँचायी जा सकती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - सो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि जो समस्त बाधाओँ से रहित है उसकी सूत्र संज्ञा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 14/5,6,552/459/10)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.13&amp;quot;&amp;gt;प्रथमानुपयोग की प्रमाणिकता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;नोट- भगवती आराधना मूलमें स्थल-स्थल पर अनेकों कथानक दृष्टांत रूप में दिये गये हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि प्रथमानुयोग जो बहुत पीछे से लिपिबद्ध हुआ वह पहले से आचार्यों को ज्ञात था।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम की प्रमाणिकता के हेतुओं संबंधी शंका समाधान&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.1&amp;quot;&amp;gt;अर्वाचीन पुरुषों-द्वारा लिखित आगम प्रमाणिक कैसे हो सकते हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,22/197/1 अप्रमाणमिदानींतनः आगमः आरातीयपुरुषव्याख्यातार्थत्वादिति चेन्न, ऐदंयुगीनज्ञानविज्ञानसंपन्नतया प्राप्तप्रामाण्यराचार्यैर्व्याख्यातार्थत्वात्। कथं छद्मस्थानां सत्यवादित्वमिति चेन्न, यथाश्रुतव्याख्यातृणां तदविरोधात्। प्रमाणीभूतगुरुपर्वक्रमेणायातोऽयमर्थ इति कथमवसीयत इति चेन्न, दृष्टिविषये सर्वत्राविसंवादात्। अदृष्टविषयेऽप्यविसंवादिनागमभावेनैकत्वे सति सुनिश्चितासंभवद्बाधकप्रमाणकत्वात्। ऐदंयुगीनज्ञानविज्ञानसंपन्नभूयसामाचार्याणामुपदेशाद्वा तदवगतेः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आधुनिक आगम अप्रमाण है, क्योंकि अर्वाचीन पुरुषों ने इसके व्याख्यान का अर्थ किया है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस काल संबंधी ज्ञान-विज्ञान से युक्त होने के कारण प्रमाणता को प्राप्त आचार्यों के द्वारा इसके अर्थ का व्याख्यान किया गया है, इसलिए आधुनिक आगम भी प्रमाण है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - छद्मस्थों के सत्यवादीपना कैसे माना जा सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि श्रुत के अनुसार व्याख्यान करने वाले आचार्यों के प्रमाणता मानने में विरोध नहीं है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आगम का विवक्षित अर्थ प्रामाणिक गुरुपरंपरा से प्राप्त हुआ है वह कैसे निश्चित किया जाये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षभूत विषय में तो सब जगह विसंवाद उत्पन्न नहीं होने से निश्चय किया जा सकता है। और परोक्ष विषय में भी, जिसमें परोक्ष विषय का वर्णन किया गया है। वह भाग अविसंवादी आगम के दूसरे भागों के साथ आगम की अपेक्षा एकता को प्राप्त होने पर अनुमानादि प्रमाणों के द्वारा बाधक प्रमाणों का अभाव सुनिश्चित होने से उसका निश्चय किया जा सकता है। अथवा आधुनिक ज्ञान विज्ञान से युक्त आचार्यों के उपदेश से उसकी प्रामाणिकता जाननी चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$64/82 जिणउवदिट्ठतासो होदु दव्वागमो पमाणं, किंतु अप्पमाणीभूदपुरिसपव्वोलोकमेण आगयत्तादो अप्पमाणं वट्टमाणकालदव्वागमो, त्ति ण पच्चबट्ठादुं जुत्तं; राग-द्वेष-भयादीदआयरियपव्वोलीकमेण आगयस्स अपमाणत्तविरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जिनेंद्रदेव के द्वारा उपदिष्ट होने से द्रव्यागम प्रमाण होओ, किंतु वह अप्रमाणीभूत पुरुष परंपरा से आया हुआ है...अतएव वर्तमान कालीन द्रव्यागम में अप्रमाण है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि द्रव्यागम राग, द्वेष और भय से रहित आचार्य परंपरा से आया हुआ है, इसलिए उसे अप्रमाण मानने में विरोध आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.2&amp;quot;&amp;gt;पूर्वापर विरोध होते हुए भी प्रामाणिक कैसे है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/221/4 दोण्हं वयणाणं मज्झे एक्कमेवसुत्तं होदि, तदो जिणा ण अण्णहा वाइयो, तदो तव्वयणाणं विप्पडिसेहो इदि चे सच्चमेयं, किंतु ण तव्वयणाणि एयाइं आइल्लु आइरिय-वयाणाइं, तदो एयाणं विरोहस्सत्थि संभवो इदि।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों प्रकार के वचनों में-से कोई एक ही सूत्र रूप हो सकता है? क्योंकि जिन अन्यथावादी नहीं होते, अतः इनके वचनों में विरोध नहीं होना चाहिए?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कहना सत्य है कि वचनों में विरोध नहीं होना चाहिए। परंतु ये जिनेंद्र देव के वचन न होकर उनके पश्चात् आचार्यों के वचन हैं, इसलिए उनमें विरोध होना संभव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 8/2,28/56/10 कसायपाहुडसुत्तेणेदं सुत्तं विरुज्झदि त्ति वुत्ते सच्चं विरुज्झई ...कधं सुत्ताणं विरोहो। ण, सुत्तोवसंहारणमसयलसुदधारयाइरियपरतंताणं विरोहसंभवदंसणादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - कषायप्राभृत के सूत्र से तो यह सूत्र विरोध का प्राप्त होता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ...सचमुच में यह सूत्र कषायप्राभृत के सूत्र से विरुद्ध है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - ...सूत्र में विरोध कैसे आ सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - अल्प श्रुतज्ञान के धारक आचार्यों के परतंत्र सूत्र व उपसंहारों के विरोध की संभावना देखी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/221/7 कथ सुत्तत्तणमिदि। आइरियपरंपराए णिरंतरमागयाणं...बुद्धिसु ओहट्टंतीसु ...वज्जभीरुहि गहिदत्थेहि आइरिएहि पोत्थएसु चडावियाणं असुत्तत्तण-विरोहादो। जदि एवं, तो एयाणं पि वयणाणं तदवयत्तादो सुत्तत्तणं पावदि त्त चे भवदु दोण्हं मज्झे एक्कस्स सुत्तत्तणं, ण दोण्हं पि परोप्पर-विरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - तो फिर (उन विरोधि वचनों को) ...सूत्रपना कैसे प्राप्त होता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - आचार्य परंपरा से निरंतर चले आ रहे (सूत्रोंको) ...बुद्धि क्षीण होनेपर...पाप भीरु (तथा) जिन्होंने गुरु परंपरा से श्रुतार्थ ग्रहण किया था, उन आचार्यो ने तीर्थं व्युच्छेद के भय से उस समय अवशिष्ट रहे हुए...अर्थ को पोथियों में लिपिबद्ध किया, अतएव उनमें असूत्रपना नहीं आ सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 13/5,5,120/381/5)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि ऐसा है तो दोनों ही वचनों को द्वादशांग का अवयव होने से सूत्रपना प्राप्त हो जायेगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों में से किसी एक वचन को सूत्रपना भले ही प्राप्त होओ, किंतु दोनों को सूत्रपना प्राप्त नहीं हो सकता है, क्योंकि उन दोनों वचनों मे परस्पर विरोध पाया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 1/1,1,36/261/1)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,120/381/7 विरुद्धाणं दोण्णमत्थाणं कधं सुत्तं होदि त्ति वुत्ते-सच्चं, जं सुत्तं तमविरुद्धत्थपरूपयं चेव। किंतु णेदं सुत्तं सुत्तमिव सुत्तमिदि एदस्स उवयारेण सुत्तत्तब्भुवगमोदो। किं पुण सुत्तं। गणहर...पत्तेयबुद्ध-सुदकेवलि..अभिण्णदसपुव्विकहियं ॥34॥ ण च भूदबलिभडारओ गणहरो पत्तेयबुद्धो सुदकेवली अभिण्णदसपुव्वी वा जेणेदं सुत्तं होज्ज।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - विरुद्ध दो अर्थों का कथन करने वाला सूत्र कैसे हो सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कहना सत्य है, क्योंकि जो सूत्र है वह अविरुद्ध अर्थ का ही प्ररूपण करने वाला होता है। किंतु यह सूत्र नहीं है, क्योंकि सूत्र के समान जो होता है वह सूत्र कहलाता है, इस प्रकार इसमें उपचार से सूत्रपना स्वीकार किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - तो फिर सूत्र क्या है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - जिसका गणधर देवों ने, प्रत्येकबुद्धों ने ...श्रुतकेवलियों ने...तथा अभिन्नदशपूर्वियों ने कथन किया वह सूत्र है। परंतु भूतबली भट्टारक न गणधर हैं, न प्रत्येक बुद्ध हैं, न श्रुतकेवली हैं, न अभिन्नदशपूर्वी ही हैं; जिससे कि यह सूत्र हो सके।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 3/3-22/$513/292/1 पुव्विल्लवक्खाणं ण भद्दयं, सुत्तविरुद्धत्तादो। ण, वक्खाणभेदसंदरिसणट्ठं तप्पवुत्तीदो पडिवक्खणयणिरायरणमुहेण पउत्तणओ ण भद्दओ। ण च एत्थ पडिवक्खणिरायणमत्थि तम्हा वे वि णिरवज्जे त्ति घेत्तव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - पूर्वोक्त व्याख्यान समीचीन नहीं हैं? क्योंकि वे सूत्र विरुद्ध हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं क्योंकि व्याख्यान भेद के दिखलाने के लिए पूर्वोक्त व्याख्यान की प्रवृत्ति हुई है। जो नय प्रतिपक्ष नय के निराकरण में प्रवृत्ति करता है, वह समीचीन नहीं होता है। परंतु यहाँ पर प्रतिपक्ष नय का निराकरण नहीं किया गया है, अतः दोनों उपदेश निर्दोष हैं ऐसा प्रकृत में ग्रहण करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.3&amp;quot;&amp;gt;आगम व स्वभाव तर्क के विषय ही नहीं है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,25/206/6 आगमस्यातर्कगोचरत्वात्&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम तर्क का विषय नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 4/14/5,6,116/151/8)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,24/204/3 प्रतिज्ञावाक्यत्वाद्धेतुप्रयोगः कर्तव्यः प्रतिज्ञामात्रतः साध्यसिद्ध्यनुपपत्तिरिति चेन्नेदं प्रतिज्ञावाक्यं प्रमाणत्वात्, ण हि प्रमाणांतरमपेक्षतेऽनवस्थापत्तेः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - (`नरक गति है') इत्यादि प्रतिज्ञा वाक्य होने से इनके अस्तित्व की सिद्धि के लिए हेतु का प्रयोग करना चाहिए, `क्योंकि केवल प्रतिज्ञा वाक्य से साध्य की सिद्धि नहीं हो सकती?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, (`नरकगति हैं' इत्यादि) वचन प्रतिज्ञा वाक्य न होकर प्रमाण वाक्य है। जो स्वयं प्रमाण स्वरूप होते हैं वे दूसरे प्रमाण की अपेक्षा नहीं करते हैं। यदि स्वयं प्रमाण होते हुए भी दूसरे प्रमाणों की अपेक्षा की जावे तो अनवस्था दोष आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,41/271/3 ते तादृक्षाः संतीति कथमवगम्यत इति, चेन्न, आगमस्यातर्कगोचरत्वात्। न हि प्रमाणप्रकाशितार्थावगतिः प्रमाणांतरप्रकारमपेक्षते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - साधारण जीव उक्त लक्षण (अभी तक जिन्होंने त्रस पर्याय नहीं प्राप्त की) होते हैं यह कैसे जाना जाता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आगम तर्क का विषय नहीं है। एक प्रमाण से प्रकाशित अर्थज्ञान दूसरे प्रमाण के प्रकाश की अपेक्षा नही करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 6/1,9-6,6/151/1 आगमो हि णाम केवलणाणपुरस्सरो पाएण अणिंदियत्थविसओ अचिंतियसहाओ जुत्तिगोयरादीदि।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो केवलज्ञान पूर्वक उत्पन्न हुआ है, प्रायः अतींद्रिय पदार्थों को विषय करनेवाला है, अचिंत्य स्वभावी है और युक्ति के विषय से परे हैं, उसका नाम आगम है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.4&amp;quot;&amp;gt;छद्मस्थों का ज्ञान प्रमाणिकता का माप नहीं है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तिलोयपण्णत्ति अधिकार 7/613/पृ.766/पं.4 अदिंदिएसु पदत्थेसु छदुमत्थवियप्पाणभविसंवादणियमाभावादो। तम्हा पुव्वाइरियवक्खाणापरिच्चाएण एसा वि दिसा हेदुवादाणुसारिवियुपण्णसिस्साणुग्गहण-अवुप्पण्णजणउप्पायणट्ठं चदरिसेदव्वा। तदो ण एत्थ संपदायविरोधो कायव्वो त्ति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अतिंद्रिय पदार्थों के विषय  में अल्पज्ञों के द्वारा किये गये विकल्पों के विरोध न होने का कोई नियम भी नहीं है। इसलिए पूर्वाचार्यों के व्याख्यान का परित्याग न कर हेतुवाद का अनुसरण करनेवाले अव्युत्पन्न शिष्यों के अनुग्रह और अव्युत्पन्न जनों के व्युत्पादन के लिए इस दिशा का दिखलाना योग्य ही है, अतएव यहाँ संप्रदाय विरोध की भी आशंका नहीं करनी चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,137/389/2 न च केवलज्ञानविषयीकृतेष्वर्थेषु सकलेष्वपि रजोजुषां ज्ञानानि प्रवर्त्तंते येनानुपलंभाज्जिनवचसस्याप्रमाणत्वमुच्येत।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= केवलज्ञान के द्वारा विषय किये गये सभी अर्थों में छद्मस्थों के ज्ञान प्रवृत्त भी नहीं होते हैं। इसलिए यदि छद्मस्थों को कोई अर्थ नहीं उपलब्ध होते हैं तो जिनवचनों को अप्रमाण नहीं कहा जा सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 15/317/9 सयलसुदविसयावगमें पयडिजीवभेदेण णाणाभेदभिण्णे असंते एदं ण होदि त्ति वोत्तुमसक्कियत्तादो। तम्हा सुत्ताणुसारिणा सुत्ताविरुद्धवक्खाणमवलंबेयव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= समस्त श्रुतविषयक ज्ञान होने पर तथा प्रकृति एवं जीव के भेद से नाना रूप भेद के न होने पर यह नहीं हो सकता `ऐसा कहना शक्य नहीं है। इस कारण सूत्र का अनुसरण करने वाले प्राणी को सूत्र से अविरुद्ध व्याख्यान का अवलंबन करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पद्मनंदि पंचविंशतिका अधिकार 1/125 यः कल्पयेत् किमपि सर्वविदोऽपि वाचि संदिह्य तत्त्वमसमंजसमात्मबुद्ध्या। खे पत्रिणां विचरतां सदृशेक्षितानां संख्यां प्रति प्रविदधाति स वादमंधः ॥125॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो सर्वज्ञ के भी वचनों में संदिग्ध होकर अपनी बुद्धि से तत्त्व के विषय में भी कुछ कल्पना करता है, वह अज्ञानी पुरुष निर्मल नेत्रों वाले व्यक्ति के द्वारा देखे गये आकाश में विचरते हुए पक्षियों की संख्या के विषय में विवाद करने वाले अंधे के समान आचरण करता है ॥125॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( पद्मनंदि पंचविंशतिका अधिकार 13/34)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.5&amp;quot;&amp;gt;आगम में भूल सुधार व्याकरण व सूक्ष्म विषयो में करनेको कहा है प्रयोजनभूत तत्त्वो में नहीं &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नियमसार / मूल या टीका गाथा .187 णियभावणाणिमित्तं मए कदं णियमसारणाम् सुदं। णच्चा जिणोवदेसं पुव्वावरदोष विम्मुक्कं ॥187॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पूर्वापर दोष रहित जिनोपदेश को जानकर मैंने निज भावना के निमित्त से नियमसार नाम का शास्त्र किया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नियमसार / मूल या टीका गाथा 187/क.310 अस्मिन् लक्षणशास्त्रस्य विरुद्धं पदमस्ति चेत्। लुप्त्वा तत्कवयो भद्राः कुर्वंतु पदमुत्तमम् ॥310॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इसमें यदि कोई पद लक्षण शास्त्र से विरुद्ध हो तो भद्र कवि उसका लोप करके उत्तम पद कहना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,5/38/2 अइंदियत्थविसए छदुवेत्थवियप्पिदजुत्तीणं णिण्णयहेयत्ताणुववत्तादो। तम्हा उवएसं लद्धूण विसेसणिण्णयो एत्थ कायव्वो त्ति। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अतींद्रिय पदार्थों के विषय में छद्मस्थ जीवों के द्वारा कल्पित युक्तियों के विकल्प रहित निर्णय के लिए हेतुता नहीं पायी जाती है। इसलिए उपदेश को प्राप्त करके इस विषय में निर्णय करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश 2/214/316/2  &amp;lt;/span&amp;gt;लिंगवचनक्रियाकारकसंधिसमासविशेष्यविशेषणवाक्यसमाप्त्यादिकं दूषणमत्र न ग्राह्यं विद्वद्भिरिति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= लिंग, वचन, क्रिया, कारण, संधि, विशेष्य विशेषण के दोष विद्वद्जन ग्रहण न करें।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;वसुनंदि श्रावकाचार गाथा 545 जं किं पि एत्थ भणियं अयाणमाणेण पवयणविरुद्धं। खमिऊण पवयणधरा सोहित्ता तं पयासंतु ॥545॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अजानकार होने से जो कुछ भी इसमें प्रवचन विरुद्ध कहा गया हो, सो प्रवचन के धारक (जानकार) आचार्य मुझे क्षमा करें और शोध कर प्रकाशित करें।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.6&amp;quot;&amp;gt;पौरुषेय होने के कारण अप्रमाण नहीं कहा जा सकता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/20/7/71/32 ततश्च पुरुषकृतित्वादप्रामाण्यं स्याद्।...न चापुरुषकृतित्वं प्रमाण्यकारणम्; चौर्याद्युपदेशस्यास्मर्यमाणकर्तृकस्य प्रामाण्यप्रसंगात्। अनित्यस्य च प्रत्यक्षादेः प्रामाण्ये को विरोधः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - पुरुषकृत होने के कारण श्रुत अप्रमाण होगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - अपौरुषैयता प्रमाणता का कारण नहीं है। अन्यथा चोरी आदि के उपदेश भी प्रमाण हो जायेंगे क्योंकि इनका कोई आदि प्रणेता ज्ञात नहीं है। त्यक्ष आदि प्रमाण अनित्य हैं पर इससे उनकी प्रमाणता में कोई कसर नहीं आती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.7&amp;quot;&amp;gt;आगम कथंचित् अपौरुषेय तथा नित्य है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,50/286/2 अभूत इति भूतम्, भवनीति भव्यम्, भविष्यतीति भविष्यत्, अतीतानागत-वर्तमानकालेष्यस्तीत्यर्थः। एवं सत्यागम्यस्य नित्यत्वम्। सत्येवमागमस्यापौरुषेयत्वं प्रसजतीति चेत्-न, वाच्य-वाचकभावेनवर्ण-पद-पंक्तिभिश्च प्रवाहरूपेण चापौरुषेयत्वाभ्युपगमात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम अतीत काल में था इसलिए उसकी भूत संज्ञा है, वर्तमान काल में है इसलिए उसकी भव्य संज्ञा है और भविष्यत् काल मे रहेगा इसलिए उसकी भविष्य संज्ञा है और आगम अतीत, अनागत और वर्तमान काल में है, यह उक्त कथन का तात्पर्य है। इस प्रकार वह आगम नित्य है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा होने पर आगम को अपौरुषेयता का प्रसंग आता है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि वाच्य वाचक भाव से तथा वर्ण, पद व पंक्तियों के द्वारा प्रवाह रूप से आने के कारण आगम को अपौरुषेय स्वीकार किया गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 736 वेदाः प्रमाणमत्र तु हेतुः केवलमपौरुषेयत्वम्। आगम गोचरतया हेतोरन्याश्रितादहेतुरत्वम् ॥736॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वेद प्रमाण है यहाँ पर केवल अपौरुषेयपना हेतु है, किंतु अपौरुषेय रूप हेतु को आगम गोचर होने से अन्याश्रित है इस लिए वह समीचीन हेतु नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.8&amp;quot;&amp;gt;आगमको प्रमाण मानने का प्रयोजन &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; आप्तमीमांसा श्लोक 2/पृ.9 प्रयोजन विशेष होय तहाँ प्रमाण संप्लव इष्ट है। पहले प्रमाण सिद्ध प्रामाण्य आगम तैं सिद्ध भया तौऊ तथा हेतुकू प्रत्यक्ष देखि अनुमान तैं सिद्धि करैं पीछैं ताकूं प्रत्यक्ष जाणैं तहाँ प्रयोजन विशेष होय है, ऐसैं प्रमाण संप्लव होय है। केवल आगम ही तैं तथा आगमाश्रित हेतुजनित अनुमान तैं प्रमाण कहि काहै कं प्रमाण संप्लव कहनां।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;सूत्र निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.1&amp;quot;&amp;gt;सूत्रका अर्थ द्रव्य व भाव श्रुत&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;1. द्रव्य श्रुत&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 34 श्रुतं हि, तावत्सूत्रं। तच्च भगवदर्हत्सर्वज्ञोपज्ञं स्यात्कारकेतनं पौद्गलिकं शब्दब्रह्म। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= श्रुत ही सूत्र है, और वह सूत्र भगवान् अर्हंत सर्वज्ञ के द्वारा स्वयं जानकर उपदिष्ट, स्यात्कार चिह्न युक्त पौद्गलिक शब्द ब्रह्म है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 8/74/6 सूत्रं तु सूचनाकारि ग्रंथे तंतुव्यवस्थयोः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र शब्द ग्रंथ, तंतु और व्यवस्था इन तीन अर्थों को सूचित करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;2. भाव श्रुत&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 15/पृ.40 सूत्रं परिच्छित्तिरूपं भावश्रुत ज्ञानसमय इति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= परिच्छिति रूप भावश्रुत ज्ञान समय को सूत्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.2&amp;quot;&amp;gt;सूत्र का अर्थ श्रुतकेवली&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 14/5,6,12/8/6 सुत्तं सुदकेवली।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र का अर्थ श्रुतकेवली है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.3&amp;quot;&amp;gt;सूत्र का अर्थ अल्पाक्षर व महानार्थक&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,54/117/259 अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद् गूढनिर्णयम्। निर्दोषहेतुमत्तथ्यं सूत्रमित्युच्यते बुधैः ॥117॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो थोड़े अक्षरों से संयुक्त हो, संदेह से रहित हो, परमार्थ सहित हो, गूढ पदार्थों का निर्णय करने वाला हो, निर्दोष हो, युक्तियुक्त हो और यथार्थ हो, उसे पंडित जन सूत्र कहते हैं ॥117॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/68/154) (आवश्यक निर्युक्ति सू.886)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/73/171 अर्थस्य सूचनात्सभ्यक् सूतेर्वार्थस्य सूरिणा। सूत्रमुक्तमनल्पार्थं सूत्रकारेण तत्त्वतः ॥73॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो भले प्रकार अर्थ का सूचन करे, अथवा अर्थ को जन्म दे उस बहुअर्थ गर्भित रचना को सूत्रकार आचार्य ने निश्चय से सूत्र कहा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(वृ.कल्पभाष्य गा.314) (पाराशरोपपुराण अ.18), (मध्व भाष्य 1/11), (मुग्धबोध व्याकरण टीका), (न्यायवार्तिक तात्पर्य टी.1/1/12), (प्रमाणमीमांसा पृ.35) (कल्पभाष्य गा.285)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आवश्यकनिर्युक्ति सू.880 अल्पग्रंथमहत्त्वं द्वात्रिंशद्दोषविरहितं यं च। लक्षणयुक्तं सूत्रं अष्टेन च गुणेन उपमेयं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अल्प परिमाण हो, महत्त्वपूर्ण हो, बत्तीस दोषों से रहित हो, आठ गुणों से युक्त हो, वह सूत्र है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(अनुयोगद्वारसूत्र गा.सू.127), (बृहत्कल्पभाष्य/गा.277,282), (व्यावहारभाष्य 190)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.4&amp;quot;&amp;gt;वृत्तिसूत्र का लक्षण &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 2/2/$29/14/6 सुत्तस्सेव विवरणाए संखित्त सद्दरयणाए संगहियसुत्तसेसत्थाए वित्तिसुत्तववएसादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो सूत्र का ही व्याख्यान करता है, किंतु जिसकी शब्द रचना संक्षिप्त है, और जिसमें सूत्र के समस्त अर्थ को संगृहीत कर लिया गया है, उसे वृत्ति सूत्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.5&amp;quot;&amp;gt;जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित न हों वह सूत्र नहीं असूत्र है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$133/168/5 सूचिदाणेगत्था। अवरा असुत्तगाहा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित हों वह सूत्र गाथा है, और जिससे विपरीत अर्थ अर्थात् जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित न हों वह असूत्र गाथा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.6&amp;quot;&amp;gt;सूत्र वहीं है जो गणधरादि के द्वारा कथित हो&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 34 सुत्तं गणधरगधिद तहेव पत्तेयबुद्धकहियं च। सुदकेवलिणा कहियं अभिण्णदसपुव्विगधिदं च ॥34॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= गणधर रचित आगम को सूत्र कहतै हैं। प्रत्येक बुद्धऋषियोंके द्वारा कहे गये आगम को भी सूत्र कहते हैं, श्रुतकेवली और अभिन्नदशपूर्व धारक आचार्यों के रचे हुआ आगम ग्रंथ को भी सूत्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 277) ( धवला पुस्तक 13/5,5,120/34/381), ( कषायपाहुड़ पुस्तक 1/67/153)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.6&amp;quot;&amp;gt;सूत्र तो जिनदेव कथित ही है परंतु गणधर कथित भी सूत्र के समान है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$120/154 एदं सव्वं पि सुत्तलक्खणं जिणवयणकमलविणिग्गयअत्थपदाणं चेव संभवइ ण गणहरमुहविणिग्गयगंथरयणाए, तत्त्थ महापरिमाणत्तुवलंभादो; ण; सच्च (सुत्त-) सारिच्छमस्सिदूण।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह संपूर्ण सूत्र लक्षण तो जिनदेव के मुख कमल से निकले हुए अर्थ पदो में संभव है, गणधर के मुखकमल से निकली ग्रंथ रचना में नहीं, क्योंकि उनमें महापरिमाण पाया जाता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि गणधर के वचन भी सूत्र के समान होते हैं। इसलिए उनकी रचना में भी सूत्रत्व के प्रति कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.8&amp;quot;&amp;gt;प्रत्येक-बुद्ध कथित में भी कथंचित् सूत्रत्व पाया जाता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/15/$119/153/6 णेदाओ गाहाओ सुत्तं गणहर पत्तेय-बुद्ध-सुदकेवलि-अभिण्णदसपुव्वीसु गुणहरभडारस्स अभावादो; ण; णिद्दोसपक्खरसहेउपताणेहि सुत्तेण सरिसत्तममत्थित्ति गुणहराइरियगाहाणं पि सुत्तत्तुवलंभादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह (कषाय पाहुड की 180) गाथाएँ सूत्र नहीं हो सकतीं, क्योंकि (इनके कर्ता) गुणधर भट्टारक न गणधर हैं, न प्रत्येक बुद्ध हैं, न श्रुतकेवली हैं, और न अभिन्नदशपूर्वी ही हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि निर्दोषत्व, अल्पाक्षरत्व, और सहेतुकत्व रूप प्रमाणों के द्वारा गुणधर भट्टारक की गाथाओं की सूत्र संज्ञा के साथ समानता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p&amp;gt; सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित, समस्त प्राणियों का हितैषी, सर्व दोष रहित शास्त्र । इसमें नय तथा प्रमाणों द्वारा पदार्थ के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भाव और चारों पुरुषार्थों का वर्णन किया गया है । यह प्रमाणपुरुषोदित रचना है । इसके मूलकर्ता तीर्थंकर महावीर और उत्तरकर्त्ता गौतम गणधर हैं । उनके पश्चात् अनेक आचार्य हुए जो प्रमाणभूत है । ऐसे आचार्यों में तीन केवली, पाँच चौदह पूर्वों के ज्ञाता (श्रुतकेवली) पाँच ग्यारह अगो के धारक, ग्यारह दसपूर्वों के जानकार और चार आचारांग के ज्ञाता इस प्रकार पांच प्रकार के मुनि हुए है । मुनियों के नाम है― तीन केवली, इंद्रभूति (गौतम) सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी, पांच श्रुतकेवली― विष्णु, नंदिमित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु, ग्यारह दसपूर्वधारी आचार्य-विशाख, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जय, नाग, सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजय, बुद्धिमान (बुद्धिल), गंगदेव और धर्मसेन, पाँच ग्यारह अंगधारी आचार्य-नक्षत्र, जयमाल (यशपाल), पांडु ध्रुवसेन और कंसाचार्य । चार आचारांग के ज्ञाता मुनि-सुभद्र, (यशोभद्र) भद्रबाहु, यशोबाहु और लोहाचार्य । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 2.137-149,9.121, 24.126, 67.191-192,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 1.55-65  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: आ]]  [[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A4%AE&amp;diff=106112</id>
		<title>आगम</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%97%E0%A4%AE&amp;diff=106112"/>
		<updated>2022-12-15T12:39:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आचार्य परंपरा से आगत मूल सिद्धांत को आगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैनागम यद्यपि मूल में अत्यंत विस्तृत है पर काल दोष से इसका अधिकांश भाग नष्ट हो गया है। उस आगम की सार्थकता उसकी शब्द रचना के कारण नहीं बल्कि उसके भाव प्रतिपादन के कारण है। इसलिए शब्द रचना को उपचार मात्र से आगम कहा गया है। इसके भाव को ठीक-ठीक ग्रहण करने के लिए पाँच प्रकार से इसका अर्थ करने की विधि है - शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ व भावार्थ, शब्द का अर्थ यद्यपि क्षेत्र कालादि के अनुसार बदल जाता है पर भावार्थ वही रहता है, इसी से शब्द बदल जाने पर भी आगम अनादि कहा जाता है आगम भी प्रमाण स्वीकार किया गया है क्योंकि पक्षपात रहित वीतराग गुरुओं द्वारा प्रतिपादित होनेसे पूर्वापर विरोध से रहित है। शब्द रचना की अपेक्षा यद्यपि वह पौरुषेय है पर अनादिगत भावकी अपेक्षा अपौरुषेय है। आगम की अधिकतर रचना सूत्रो में होती है क्योंकि सूत्रों द्वारा बहुत अधिक अर्थ थोड़े शब्दो में ही किया जाना संभव है। पीछे से अल्पबुद्धियों के लिए आचार्यों ने उन सूत्रों की टीकाएँ रची हैं। वे ही टीकाएँ भी उन्हीं मूल सूत्रों के भाव का प्रतिपादन करने के कारण प्रामाणिक हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;आगम सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.1 | 	आगम सामान्य का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.2 | 	आगमाभास का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.3 | 	नोआगम का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम व नोआगमादि द्रव्य भाव निक्षेप तथा स्थित जित आदि द्रव्य निक्षेप - देखें [[ निक्षेप_5#5.1 ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम की अनंतता - देखें [[ आगम#1.11 | आगम - 1.11]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के नंदा भद्रा आदि भेद - देखें [[ वाचना ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.4 | 	शब्द या आगम प्रमाण का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.5 | 	शब्द प्रमाण का श्रुतज्ञान में अंतर्भाव]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.6 | 	आगम अनादि है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.7 | 	आगम गणधरादि गुरु परंपरा से आगत है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.8 | 	आगम ज्ञान के अतिचार]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.9 | 	श्रुत के अतिचार]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.10 | 	 द्रव्य श्रुत के अपुनरूक्त अक्षर]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.11 | 	 श्रुत का बहुत कम भाग लिखनेमें आया है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.12 | 	 आगम की बहुत सी बातें नष्ट हो चुकी हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.13 | 	 आगम के विस्तार का कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #1.14 | 	 आगम के विच्छेद संबंधी भविष्यवाणी]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के चारों अनुयोगों संबंधी - देखें [[ अनुयोग ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	मोक्षमार्ग में आगम ज्ञान का स्थान - देखें [[ स्वाध्याय ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम परंपरा की समयानुक्रमिक सारणी - दे [[इतिहास#7 |इतिहास-7]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम ज्ञान में विनय का स्थान - देखें [[ विनय#2 | विनय - 2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के आदान प्रदान में पात्र अपात्र का विचार - देखें [[ उपदेश#3 | उपदेश - 3]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के पठन पाठन संबंधी - देखें [[ स्वाध्याय ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	पठित ज्ञान के संस्कार साथ जाते हैं - देखें [[ संस्कार#1.2 |संस्कार-1.2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;द्रव्य भाव और ज्ञान निर्देश व समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम के ज्ञान में सम्यक दर्शन स्थान - देखें [[ ज्ञान#III.2 | ज्ञान - III.2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	आगम ज्ञान में चारित्र का स्थान - देखें [[ चारित्र#5 | चारित्र - 5]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.1 | 	वास्तव में भाव श्रुत ही ज्ञान है द्रव्यश्रुत ज्ञान नहीं ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.2 | 	भाव का ग्रहण ही आगम है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	श्रुतज्ञान के अंग पूर्वादि भेदों का परिचय - देखें [[ श्रुतज्ञान#III | श्रुतज्ञान - III]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.3 | 	द्रव्य श्रुत को ज्ञान कहने का कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.4 | 	द्रव्य श्रुत के भेदादि जानने का प्रयोजन]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #2.5 | 	आगमों को श्रुतज्ञान कहना उपचार है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	निश्चय व्यवहार सम्यग्ज्ञान - देखें [[ ज्ञान#4.1 | ज्ञान - IV]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम का अर्थ करने की विधि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.1 | पाँच प्रकार अर्थ करने का विधान]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	शब्दार्थ - देखें [[ आगम#4 | आगम - 4]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.2 | 	मतार्थ करने का कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.3 | 	नय निक्षेपार्थ करने की विधि]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सूक्ष्मादि पदार्थ केवल आगम प्रमाण से जाने जाते हैं, वे तर्क का विषय नहीं - देखें [[ न्याय#1 | न्याय - 1]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #3.4 | 	आगमार्थ करने की विधि -]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.1 | पूर्वापर मिलान पूर्वक]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.2 |  परंपरा का ध्यान रखकर]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.3 |  शब्द का नहीं भाव का ग्रहण करना चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	आगम की परीक्षा में अनुभव की प्रधानता - देखें [[ अनुभव ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.4 | 	भावार्थ करने की विधि]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.5 | 	आगम में व्याकरण की प्रधानता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.6 | 	आगम में व्याकरण की गौणता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.7 | 	अर्थ समझने संबंधी कुछ विशेष नियम]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.8 | 	विरोधी बातें आने पर दोनोंका संग्रह कर लें]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.9 | 	व्याख्यान की अपेक्षा सूत्र वचन प्रमाण होता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #3.4.10 | 	यथार्थ का निर्णय हो जाने पर भूल सुधार लेनी चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;शब्दार्थ संबंधी विषय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.1 | शब्द में अर्थ प्रतिपादन की योग्यता व शंका]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.2 | भिन्न-भिन्न शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.3 | जितने शब्द हैं उतने वाच्य पदार्थ भी हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.4 | अर्थ व शब्द में वाच्य वाचक भाव कैसे हो सकता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.5 | शब्द अल्प हैं और अर्थ अनंत हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.6 | अर्थ प्रतिपादन की अपेक्षा शब्दमें प्रमाण व नयपना ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.7 | शब्द का अर्थ देश कालानुसार करना चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.8 | भिन्न क्षेत्र कालादि में शब्द का अर्थ भिन्न भी होता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #4.8.1 |  कालकी अपेक्षा।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #4.8.2 |  शास्त्रोंकी अपेक्षा।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li&amp;gt;[[ #4.8.3 |  क्षेत्रकी अपेक्षा।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #4.9 | शब्दार्थ गौणता संबंधी उदाहरण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम की प्रमाणिकता में हेतु&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.1 | आगम की प्रामाणिकता निर्देश]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.2 | वक्ता की प्रामाणिकता से वचन की प्रामाणिकता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.3 | आगम की प्रामाणिकता के उदाहरण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.4 | अर्हत् व अतिशय ज्ञान वालों के द्वारा प्रणीत होनेके कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.5 | वीतराग द्वारा प्रणीत होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.6 | गणधरादि आचार्यों द्वारा कथित होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.7 | प्रत्यक्षज्ञानियों द्वारा कथित होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.8 | आचार्य परंपरा से आगत होने के कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.9 | समन्वयात्मक होने के कारण प्रमाण है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.10 | विचित्र द्रव्यों आदि का प्ररूपक होनेके कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.11 | पूर्वापर अविरोधी होनेके कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.12 | युक्ति से अबाधित होनेके कारण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #5.13 | प्रथमानुपयोग की प्रामाणिकता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम की प्रामाणिकता के हेतुओं संबंधी शंका समाधान&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.1 | अर्वाचीन पुरुषों द्वारा लिखित आगम प्रामाणिक कैसे हो सकते हैं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.2 | पूर्वापर विरोध होते हुए भी प्रामाणिक कैसे]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.3 | आगम व स्वभाव तर्क के विषय ही नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.4 | छद्मस्थो का ज्ञान प्रामाणिकता का माप नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.5 | आगम में भूल सुधार व्याकरण व सूक्ष्म विषयो में करनेको कहा है प्रयोजन भूत तत्त्वो में नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.6 | पौरुषेय होने के कारण अप्रमाणिक नहीं कहा जा सकता]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.7 | आगम कथंचित् अपौरुषेय तथा नित्य है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #6.8 | आगम को प्रमाण माननेका प्रयोजन]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;सूत्र निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.1 | सूत्रका अर्थ द्रव्य व भाव श्रुत]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.2 | सूत्रका अर्थ श्रुतकेवली]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.3 | सूत्रका अर्थ अल्पाक्षर व महानार्थक]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.4 | वृत्ति सूत्रका लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.5 | जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित न हों वह सूत्र नहीं असूत्र है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.6 | सूत्र वही है जो गणधर आदिके द्वारा कथित हो ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.7 | सूत्र तो जिनदेव कथित ही है परंतु गणधर कथित भी सूत्र के समान है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;[[ #7.8 | प्रत्येक बुद्ध कथित में भी कथंचित् सूत्रत्त्व पाया जाता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सूत्रोपसंयत - देखें [[ समाचार ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सूत्रसम - देखें [[ निक्षेप ]]5/8&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम सामान्य निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt;आगम सामान्यका लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नियमसार / मूल या टीका गाथा . 8 तस्स मुहग्गदवयणं पुव्वावरदोसविरहियं सुद्धं। आगमिदि परिकहियं तेण दु कहिया हवंति तच्चत्था ॥8॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उनके मुखसे निकली हुई वाणी जो कि पूर्वापर दोष (विरोध) रहित और शुद्ध है, उसे आगम कहा है और उसे तत्त्वार्थ कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;रत्नकरंडश्रावकाचार श्लोक 9 आप्तोपज्ञमनुल्लङ्ध्यमदृष्टेविरोधकम्। तत्त्वोपदेशकृत्सार्व शास्त्रं कापथघट्टनम् ॥9॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो आप्त कहा हुआ है, वादी प्रतिवादी द्वारा खंडन करने में न आवे, प्रत्यक्ष अनुमानादि प्रमाणों से विरोध रहित हो, वस्तु स्वरूप का उपदेश करने वाला हो, सब जीवोंका हित करनेवाला और मिथ्यामार्ग का खंडन करनेवाला हो, वह सत्यार्थ शास्त्र है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,2/9,11/12 पूर्वापरविरुद्धादेर्व्यपेतो दोषसंहते। द्योतकः सर्वभावनामाप्तव्याहतिरागमः ॥9॥ आगमो ह्यात्पवचनमाप्तं दोषक्षयं विदुः। त्यक्तदोषोऽनृतं वाक्यं न ब्रूयाद्धेत्वसंभवात् ॥10॥ रागाद्वा द्वेषाद्वा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतम्। यस्य तु नैते दोषास्तस्यानृत् कारणं नास्ति ॥11॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पूर्वापर विरूद्धादि दोषों के समूह से रहित और संपूर्ण पदार्थों के द्योतक आप्त वचन को आगम कहते हैं ॥9॥ आप्त के वचन को आगम जानना चाहिए और जिसने जन्म जरा आदि 18 दोषों का नाश कर दिया है उसे आप्त जानना चाहिए। इस प्रकार जो त्यक्तदोष होता है वह असत्य वचन नहीं बोलता, क्योंकि, उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण ही संभव नहीं है ॥10॥ राग से द्वेष से अथवा मोह से असत्य वचन बोला जाता है, परंतु जिसके ये रागादि दोष नहीं हैं उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण नहीं पाया जाता है ॥11॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/12/7/54/8 आप्तेन हि क्षीणदोषेण प्रत्यक्षज्ञानेन प्रणीत आगमो भवति न सर्वः। यदि सर्वः स्यात, अविशेषः स्यात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसके सर्व दोष क्षीण हो गये हैं ऐसे प्रत्यक्ष ज्ञानियों के द्वारा प्रणीत आगम ही आगम है, सर्व नहीं। क्योंकि, यदि ऐसा हो तो आगम और अनागम में कोई भेद नहीं रह जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/20/7 आगमो सिद्धंतो पवयणमिदि एयट्ठो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम, सिद्धांत और प्रवचन ये शब्द एकार्थवाची हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परीक्षामुख परिच्छेद 3/99 आप्तवचनादिनिबंधनमर्थज्ञानमागमः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के वचनादि से होने वाले पदार्थों के ज्ञान को आगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नि.स./ता.वृ.8 में उद्धृत/21 अन्यूनमनतिरिक्तं याथातथ्यं विना च विपरीतात्। निःसंदेहं वेद यदाहुस्तज्ज्ञानमागमिन:।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो न्यूनता बिना, अधिकता बिना, विपरीता बिना यथातथ्य वस्तुस्वरूप को निःसंदेह रूप से जानता है उसे आगमवंतों का ज्ञान कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 173/255 वीतरागसर्वज्ञप्रणीतषड़्द्रव्यादि सम्यक्श्रद्धानज्ञानव्रताद्यनुष्ठानभेदरत्नत्रयस्वरूपं यत्र प्रतिपाद्यते तदागमशास्रं भण्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वीतराग सर्वज्ञ देव के द्वारा कहे गये षड्द्रव्य व सप्त तत्त्व आदि का सम्यक्श्रद्धान व ज्ञान तथा व्रतादि के अनुष्ठान रूप चारित्र, इस प्रकार भेद रत्नत्रय का स्वरूप जिसमें प्रतिपादित किया गया है उसको आगम या शास्त्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 21/262/7 आ सामस्त्येनानंतधर्मविशिष्टतया ज्ञायन्तेऽवबुद्ध्यंते जीवाजीवादयः पदार्था यया सा आज्ञा आगमः शासनं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसके द्वारा समस्त अनंत धर्मों से विशिष्ट जीव अजीवादि पदार्थ जाने जाते हैं ऐसी आप्त आज्ञा आगम है, शासन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( स्याद्वादमंजरी श्लोक 28/322/3)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;न्यायदीपिका अधिकार 3/73/112 आप्तवाक्यनिबंधनमर्थज्ञानमागमः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्तके वाक्य के अनुरूप आगम के ज्ञान को आगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt;आगमाभासका लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प.मू.6/51-54/69 रागद्वेषमोहाक्रांतपुरुषवचनाज्जातमागमाभासम्। यथा नद्यास्तीरे मोदकराशयः संति धावध्वं माणवकाः। अंगुल्यग्रहस्तियूथशतमस्ति इति च विसंवादात् ॥51-54॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= रागी, द्वेषी और अज्ञानी मनुष्यों के वचनों से उत्पन्न हुए आगम को आगमाभास कहते हैं। जैसे कि बालको दौड़ो नदी के किनारे बहुत-से लड्डू पड़े हुए हैं। ये वचन हैं। और जिस प्रकार यह है कि अंगुलीके आगे के हिस्से पर हाथियों के सौ समुदाय हैं। विवाद होनेके कारण ये सब आगमाभास हैं। अर्थात् लोग इनमें विवाद करते हैं। इसलिए ये आगम झूठे हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;नोआगमका लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/20/7 आगमादो अण्णो णो-आगमो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम से भिन्न पदार्थ को नोआगम कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt;शब्द या आगम प्रमाण का लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;न्या./सू./मू.1/1/7/15 आप्तोपदेशः शब्दः ॥7॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के उपदेश को शब्द प्रमाण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt;शब्द प्रमाण का श्रुतज्ञान में अंतर्भाव&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/20/15/78/18 शाब्दप्रमाणं श्रुतमेव।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द प्रमाण तो श्रुत है ही।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; गोम्मटसार जीवकांड/ &amp;lt;/span&amp;gt;भा.313 आगम नाम परोक्ष प्रमाण श्रुतज्ञान का भेद है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.6&amp;quot;&amp;gt;आगम अनादि है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;जंबूदीव-पण्णत्तिसंगहो अधिकार 13/80-83 देवासुरिंदमहिय अणंतसुहपिंडमोक्खफलपउरं। कम्ममलपडलदलणं पुण्ण पवित्तं सिवं भद्दं ॥80॥ पुव्वंगभेदभिण्णं अणंतअत्थेहिं सजुदं दिव्वं। णिच्चं कलिकलुसहरं णिकाचिदमणुत्तरं विमलं ॥81॥ संदेहतिमिरदलणं बहुविहगुणजुत्तंसग्गसोवाणं। मोक्खग्गदारभूदं णिम्मलबुद्धिसंदोहं ॥82॥ सव्वण्हुमुहविणिग्गयपुव्वावरदोसरहिदपरिसुद्धं। अक्खयमणादिणिहणं सुदणाणपमाणं णिद्दिट्ठं ॥83॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पूर्व व अंग रूप भेदों में विभक्त, यह श्रुतज्ञान-प्रमाण देवेंद्रों व असुरेंद्रों से पूजित, अनंत सुख के पिंड रूप मोक्ष फल से संयुक्त, कर्मरूप पटल के मल को नष्ट करनेवाला, पुण्य पवित्र, शिव, भद्र, अनंत अर्थो से संयुक्त दिव्य नित्य, कलि रूप कलुष को दूर करने वाला, निकाचित, अनुत्तर, विमल, संदेहरूप अंधकार को नष्ट करने वाला, बहुत प्रकार के गुणों से युक्त, स्वर्ग की सीढ़ी, मोक्ष के मुख्य द्वारभूत, निर्मल, एवं उत्तम बुद्धि के समुदाय रूप, सर्व के मुखसे निकला हुआ, पूर्वापर विरोध रूप दोष से रहित विशुद्ध अक्षय और अनादि कहा गया है ॥80-83॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.7&amp;quot;&amp;gt;आगम गणधरादि गुरु परंपरासे आगत है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 6/13/2/523/29 तदुपदिष्टं बुद्ध्यतिशयर्द्धियुक्तगणधरावधारितं श्रुतम् ॥2॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= केवली भगवान के द्वारा कहा गया तथा अतिशय बुद्धि ऋद्धि के धारक गणधर देवों के द्वारा जो धारण किया गया है उसको श्रुत कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.8&amp;quot;&amp;gt;आगमज्ञानके अतिचार&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 16/62/15 अक्षरपदादीनां न्यूनताकरणं, अतिवृद्धिकरणं, विपरीत पौर्वापर्यरचनाविपरीतार्थनिरूपणा ग्रंथार्थयोर्वैपरीत्यं अमी ज्ञानातिचाराः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अक्षर, शब्द, वाक्य, वरण, इत्यादिकों को कम करना बढ़ाना, पीछे का संदर्भ आगे लाना, आगे का पीछे करना, विपरीत अर्थ का निरूपण करना, ग्रंथ व अर्थ में विपरीतता करना ये सब ज्ञानातिचार हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 487/707)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.9&amp;quot;&amp;gt;श्रुतके अतिचार&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 16/62/15 द्रव्यक्षेत्रकालभावशुद्धिमंतरेण श्रुतस्य पठनं श्रुतातिचारः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= द्रव्यशुद्धि, क्षेत्र शुद्धि, कालशुद्धि, भावशुद्धि के बिना शास्त्रका पढ़ना यह श्रुतातिचार है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.10&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यश्रुतके अपुनरुक्त अक्षर&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;देखें [[ अक्षर#33  | अक्षर ]] 33 व्यंजन, 27 स्वर और चार अयोगवाह, इस प्रकार सब अक्षर 64 होते हैं। उन अक्षरोंके संयोगोकी गणना 2&amp;lt;sup&amp;gt;64&amp;lt;/sup&amp;gt; =18446744073709551616 होती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5/14/18-20/266/4 सोलससदचोत्तीसं कोडी तेसीद चेव लक्खाइं। सत्तसहस्सट्ठसदा अट्ठासीदा य पदवण्णा ॥18॥ एदं पि संजोगक्खरसंखाए अवट्ठिदं, वुत्तपमाणादो अक्खरेहि वड्ढि-हाणीणभावादो।...बारससदकोडीओ तेसीदि हवंति तह य लक्खाइं। अट्ठावण्णसहस्सं पंचेव पदाणि सुदणाणे ॥20॥ एत्तियाणिपदाणि घेतूण सगलसुदणाणं होदि। एदेसु पदेसु संजोगक्खराणि चैव सरिसाणि ण संजोगक्खरावयवक्खराणि; तत्थ संखाणियमाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= “16348307888 इतने मध्यम पदके वर्ण होते हैं ॥18॥...यह भी संयोगी अक्षरोंकी अपेक्षा (उत्तरोक्तवत्) अवस्थित हैं। क्योंकि उसमें उक्त प्रमाण से अक्षरों की अपेक्षा वृद्धि और हानि नहीं होती।...श्रुतज्ञान के एक सौ बारह करोड़ तिरासी-लाख अट्ठावन हजार और पाँच (1128358005) ही (कुल मध्यम) पद होते हैं ॥19॥ इतने पदों का आश्रय कर सकल श्रुतज्ञान होता है, इन पदों में संयोगी अक्षर ही समान हैं, संयोगी अक्षरों के अवयव अक्षर नहीं, क्योंकि, उनकी संख्या का कोई नियम नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/20/410-415; 1/20/424 की टिप्पणी जगरूप सहाय कृत) ( हरिवंश पुराण सर्ग 10/143) ( कषायपाहुड़ पुस्तक 1/$70/89-96)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1-1/$72/92/2 मज्झिमपदं...एदेणपुव्वंगाणं पदसंखा परूविज्जदे।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= मध्यम पदके द्वारा पूर्व और अंगों पदोंकी संख्याका प्ररूपण किया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धवला पुस्तक /9/पृ.	नाम पद	अक्षर प्रमाण	प्रमाणलानेका उपाय&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;194	कुल अक्षर	64	उपरोक्तवत्&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;194	अपुनरुक्त संयोगी अक्षर	18446744073709551616	एक द्वि आदि संयोगी भंगों का जोड़ 64X6\1X2 इत्यादि&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;195	अगंश्रुतके सर्व पदोंमें अक्षर	1128358005	अपुनरूक्त अक्षर\मध्यम पद&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;195	मध्यम पदोंमें अक्षर	16348307888	नियत (इनसे पूर्व और अंगोके विभागका निरूपण होता है)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;196	शेष अक्षर	80108175	शेष अक्षर + 32&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;196	14 प्रकीर्णकों के प्रमाण या खंड पदमें	2503380 * 12\32&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / गोम्मट्टसार जीवकांड जीव तत्त्व प्रदीपिका| जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 336/733/1) ( धवला पुस्तक 13/5,5,45/247/266)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.11&amp;quot;&amp;gt;श्रुतका बहुत कम भाग लिखनेमें आया है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,102/363/3 अत्थदो पुणो तेसिं विसेसा गणहरेहि विण वारिज्जदे।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अर्थकी अपेक्षा जो उन दोनोंकी त्रय कायिक लब्ध्यपर्याप्तक जीव तथा पंचेंद्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवोंकी संख्या प्ररूपणा में विशेष है, उनका गणधर भी निवारण नहीं कर सकते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 334/731 पण्णवणिज्जाभावा अणंतभागो दु अणभिलप्पाणं। पण्णवणिज्जाणं पुण अणंतभागो सुदणिबद्धो ॥334॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अनभिलप्यानां कहिए वचनगोचर नाहीं, केवलज्ञानके गोचर जे भाव कहिए जीवादिक पदार्थ तिनके अनंतवें भागमात्र जीवादिक अर्थ ते प्रज्ञापनीया कहिए तीर्थँकर की सातिशय दिव्य ध्वनिकरि कहने में आवै ऐसे हैं। बहुरि तीर्थंकर की दिव्य ध्वनिकरि पदार्थ कहने में आवैं हैं तिनके अनंतवें भाग मात्र द्वादशांग श्रुत विषैं व्याख्यान कीजिए है। जो श्रुतकेवली को भी गोचर नाहीं ऐसा पदार्थ कहनेकी शक्ति केवलज्ञान विषैं पाइये है। ऐसा जानना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(सन्मति तर्क 2/16) (राजवार्तिक अध्याय 1/26/4/87) ( धवला पुस्तक 9/4/2,7,214/3/171) ( धवला पुस्तक 12/4/1,7/17/57)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / उत्तरार्ध श्लोक 616 वृद्धैः प्रोक्तमतः सूत्रे तत्त्वं वागतिशायि यत्। द्वादशांगांगबाह्यं वा श्रुतं स्थूलार्थगोचरम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इसलिए पूर्वाचार्यों ने सूत्र में कहा है कि जो तत्व है वह वचनातीत है और द्वादशांग तथा अंग बाह्यरूप शास्त्र-श्रुत ज्ञान स्थूल पदार्थ को विषय करने वाला है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.12&amp;quot;&amp;gt;आगम की बहुत सी बातें नष्ट हो चुकी हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,44/126/4 दोसु वि उवएसेसु को एत्थ समंजसो, एत्थ ण बाहइ जिब्भमेलाइरियवच्छवो, अलद्धोवदेसत्तादो दोण्णमेक्कस्स बाहाणुपलंभादो। किंतुदोसुएक्केण होदव्वं। तं जाणिय वत्तव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उक्त (एक ही विषय में) दो (पृथक्-पृथक्) उपदेशो में कौन सा उपदेश यथार्थ है, इस विषय में एलाचार्यका शिष्य (वीरसेन स्वामी) अपनी जीभ नहीं चलाता अर्थात् कुछ नहीं कहता, क्योंकि इस विषय का कोई न तो उपदेश प्राप्त है और न दो में-से एक में कोई बाधा उत्पन्न होती है। किंतु दो में-से एक ही सत्य होना चाहिए। उसे जानकर कहना उचित है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; तिलोयपण्णत्ति अधिकार/श्लो. (यहाँ निम्न विषयोंके उपदेश नष्ट होनेका निर्देश किया गया है।) नरक लोकके प्रकरण में श्रेणी बद्ध बिलोंके नाम (2/54); समवशरण में नाट्यशालाओं की लंबाई चौड़ाई (4/757); प्रथम और द्वितीय मानस्तंभ पीठों का विस्तार (4/772); समवशरण में स्तूपों की लंबाई और विस्तार (4/847); नारदों की ऊंचाई आयु और तीर्थँकर देवों के प्रत्यक्ष भावादिक (4/1471); उत्सर्पिणी काल के शेष कुलकरों की ऊँचाई (4/1572); श्री देवी के प्रकीर्णक आदि चारों के प्रमाण (4/1688); हैमवत के क्षेत्र  में शब्दवान पर्वत पर स्थित जिन भवन की ऊँचाई आदि के (4/1710); पांडुक वन पर स्थित जिन भवन में सभापुर के आगे वाले पीठ के विस्तार का प्रमाण (4/1897); उपरोक्त जिन भवन में स्थित पीठ की ऊँचाई के प्रमाण (4/1902); उपरोक्त जिन भवन में चैत्य वृक्षों के आगे स्थित पीठ के विस्तारादि (4/1910); सौमनस वनवर्ती वापिका में स्थित सौधर्म इंद्र के विहार प्रासाद की लंबाई का प्रमाण (4/1950); सौमनस गजदंत के कूटों के विस्तार और लंबाई (4/2032); विद्युतत्प्रभगजदंत के कूटों के विस्तार और लंबाई (4/2047); विदेह देवकुरु में यमक पर्वतों पर और भी दिव्य प्रासाद हैं, उनकी ऊँचाई व विस्तारादि (4/2082); विदेहस्थ शाल्मली व जंबू वृक्षस्थलों की प्रथम भूमि में स्थित 4 वापिकाओं पर प्रतिदिशा में आठ-आठ कूट हैं, उनके विस्तार (4/2182); ऐरावत क्षेत्र में शलाका पुरुषों के नामदिक (4/2266); लवण समुद्र में पातालों के पार्श्व भागो में स्थित कौस्तुभ और कोस्तुभाभास पर्वतों का विस्तार (4/2462); धातकी खंड में मंदर पर्वतों के उत्तर-दक्षिण भागो में भद्रशालों का विस्तार (4/2589); मानुषोत्तर पर्वत  पर 14 गुफाएँ है, उनके विस्तारादि (4/2753); पुष्करार्ध में सुमेरु पर्वत के उत्तर दक्षिण भागो में भद्रशाल वनों का विस्तार (4/2822); जंबूद्वीप से लेकर अरुणाभास तक बीस द्वीप समुद्रों के अतिरिक्त शेष द्वीप समुद्रोंके अधिपति देवों के नाम (5/48); स्वयंभूरमण समुद्र में स्थित पर्वतकी ऊँचाई आदि (5/240); अंजनक, हिंगुलक आदि द्वीपों में स्थित व्यंतरोंके प्रसादों की ऊँचाई आदि (6/66); व्यंतर इंद्रों के जो प्रकीर्णक, आभियोग्य और विल्विषक देव होते हैं उनके प्रमाण (6/76); तारों के नाम (7/32,496); गृहों का सुमेरु से अंतराल व वापियों आदि का कथन (7/458); सौधर्मादिक के सोमादिक लोकपालों के आभियोग्य प्रकीर्णक और किल्विषक देव होते हैं; उनका प्रमाण (8/296); उत्तरेंद्रों के लोकपालों के विमानों की संख्या (8/302); सौधर्मादिक के प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषकों की देवियों का प्रमाण (8/329); सौधर्मादिक के प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषकों की देवियों की आयु (8/523); सौधर्मोदिक के आत्मरक्षक व परिषद्की देवियों की आयु (8/540)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.13&amp;quot;&amp;gt;आगम के विस्तार का कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/8/30 सर्वसत्त्वानुग्रहार्थो हि सतां प्रयास इति, अधिगमाभ्युपायभेदोद्देशः कृतः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सज्जनों का प्रयास सब जीवों का उपकार करना है, इसलिए यहाँ अलग-अलग से ज्ञान के उपाय के भेदों का निर्देश किया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 1/1,1,5/153/8 नैष दोषः मंदबुद्धिसत्त्वानुग्रहार्थत्वात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,70/311/2 द्विरस्ति-शब्दोपादानमनर्थ कमिति चेन्न, विस्तररुचिसत्त्वानुग्रहार्थत्वात्। संक्षेपरुचयो नानुगृहीताश्चेन्न, विस्तररुचिसत्त्वानुग्रहस्य संक्षेपरुचिसत्त्वानुग्रहाविनाभावित्वात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - (छोटा सूत्र बनाना ही पर्याप्त था, क्योंकि सूत्र का शेष भाग उसका अविनाभावी है।)  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि मंदबुद्धि प्राणियों के अनुग्रह के लिए शेष भाग को सूत्र में ग्रहण किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सूत्र में दो बार अस्ति शब्द का ग्रहण निरर्थक है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि विस्तार  से समझने की रूचि रखने वाले शिष्यों के अनुग्रह के लिए सूत्र में दो बार अस्ति शब्द का ग्रहण किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - इस सूत्र में संक्षेप से समझने की रुचि रखने वाले शिष्य अनुगृहीत नहीं किये गये हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि संक्षेप  से समझने की रुचि रखनेवाले जीवों का अनुग्रह विस्तार से समझने की रुचि रखने वाले शिष्यों का अविनाभावी है। अर्थात् विस्तार से कथन कर देने पर संक्षेप रुचि वाले शिष्यों  का काम चल जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 15)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;1.14&amp;quot;&amp;gt;आगमके विच्छेद संबंधी भविष्य वाणी&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तिलोयपण्णत्ति अधिकार 4/1413 बीस सहस्स तिसदा सत्तारस वच्छराणि सुदतित्थं धम्मपयट्टणहेदू वीच्छिस्सदि कालदोसेण&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो श्रुत तीर्थ धर्म प्रवर्तन का कारण है, वह बीस हजार तीन सौ सत्तरह (20317) वर्षों में काल दोष से व्युच्छेद को प्राप्त हो जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;द्रव्य भाव आगम ज्ञान निर्देश व समन्वय&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt;वास्तव में  भावश्रुत ही ज्ञान है द्रव्यश्रुत ज्ञान नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,4,26/64/12 ण च दव्वसुदेण एत्थ एहियारो, पोग्गलवियारस्स जडस्स णाणोपलिंग भुदस्स मुदत्तबिरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= (ध्यान के प्रकरण में) द्रव्यश्रुतका यहाँ अधिकार नहीं है, क्योंकि ज्ञान के उपलिंग भूत पुद्गल के विकार-स्वरूप जड़ वस्तु को श्रुत मानने में विरोध आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt;भावका ग्रहण ही आगम है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;न्यायदीपिका अधिकार 3/$73 आप्तवाक्यनिबंधन ज्ञानमित्युच्यमानेऽपि, आप्तवाक्यकर्मकेश्रावणप्रत्यक्षेऽतिव्याप्तिः। तात्पर्यमेव वचसीत्यभियुक्तवचनात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के वचनों से होने वाले ज्ञान को आगम का लक्षण कहने में भी आप्त के वाक्यों को सुनकर जो श्रावण प्रत्यक्ष होता है उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति है, अतः `अर्थ' यह पद दिया है। `अर्थ' पद तात्पर्य में रूढ है। अर्थात् प्रयोजनार्थक है क्योंकि `अर्थ ही-तात्पर्य ही वचनों में है' ऐसा आचार्य वचन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य श्रुत को ज्ञान कहने का कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,45/162/3 कथं शब्दस्य तत्स्थापनायाश्च श्रुतव्यपदेशः। नैष दोषः, कारणे कार्योपचारात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द और उसकी स्थापना की श्रुतसंज्ञा कैसे हो सकती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, कारण में कार्य का उपचार करने से शब्द या उसकी स्थापना की श्रुत संज्ञा बन जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 13/5,5,21/210/8)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 34/45 शब्दश्रुताधारेण ज्ञप्तिरर्थपरिच्छित्तिर्ज्ञानं भण्यते स्फूटं। पूर्वोक्तद्रव्यश्रुतस्यापि व्यवहारेण ज्ञानव्यपदेशो भवति न तु निश्चयेनेति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द श्रुत के आश्रय से ज्ञप्ति रूप अर्थ के निश्चय को निश्चय नय से ज्ञान कहा है। पूर्वोक्त शब्द श्रुत की अर्थात् द्रव्यश्रुत की ज्ञानसंज्ञा (कारण में कार्य के उपचार से) व्यवहार नय से है निश्चय नय से नहीं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;द्रव्य श्रुत के भेदादि जानने का प्रयोजन&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 173/254/19 श्रुतभावनायाः फलं जीवादितत्त्वविषये संक्षेपेण हेयोपादेयतत्त्वविषये वा संशयविमोहविभ्रमरहितो निश्चलपरिणामो भवति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= श्रुत की भावना अर्थात् आगमाभ्यास करने से, जीवादि तत्त्वों के विषय में वा संक्षेप से हेय उपादेय तत्त्व के विषय में संशय, विमोह व विभ्रम से रहित निश्चल परिणाम होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt;आगमको श्रुतज्ञान कहना उपचार है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;श्लोकवार्तिक पुस्तक 1/1/20/2-3/598..। श्रवणं हि श्रुत ज्ञानं न पुनः शब्दमात्र कम् ॥2॥ तच्चोपचारतो ग्राह्य श्रुतशब्दप्रयोगतः ॥3॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= `श्रुत' पद से तात्पर्य किसी विशेष ज्ञान से है। हां वाच्यों के प्रतिपादक शब्द भी श्रुतपद से पकड़े जाते हैं। किंतु केवल शब्दों में ही श्रुत शब्द को परिपूर्ण नहीं कर देना चाहिए ॥2॥ उपचार से वह शब्दात्मक श्रुत (आगम) भी शुद्ध शब्द करके ग्रहण करने योग्य है...क्योंकि गुरु के शब्दों से शिष्यों को श्रुतज्ञान (वह विशेष ज्ञान) उत्पन्न होता है। इस कारण यह कारण में कार्य का उपचार है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(और भी देखें [[ आगम#2.3 | आगम - 2.3]])&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगमका अर्थ करनेकी विधि&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;पाँच प्रकार अर्थ करने का विधान&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 120/177 शब्दार्थव्याख्यानेन शब्दार्थों ज्ञात्व्यः। व्यवहारनिश्चयरूपेण नयार्थो ज्ञातव्यः। सांख्यं प्रति मतार्थो ज्ञातव्यः। आगमार्थस्तु प्रसिद्धः। हेयोपादानव्याख्यानरूपेण भावार्थोऽपि ज्ञातव्यः। इति शब्दनयमतागमभावार्थाः व्याख्यानकाले यथासंभवं सर्वत्र ज्ञातव्याः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्दार्थ के व्याख्यान रूप से शब्दार्थ जानना चाहिए। व्यवहार निश्चयनयरूप से नयार्थ जानना चाहिए। सांख्यों के प्रतिमतार्थ जानना चाहिए। आगमार्थ प्रसिद्ध है। हेय उपादेय के व्याख्यान रूप से भावार्थ जानना चाहिए। इस प्रकार शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ आगमार्थ तथा भावार्थ को व्याख्यान के समय यथासंभव सर्वत्र जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 1/4; 27/60) ( द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 2/9/)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;मतार्थ करनेका कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,30/229/9 तदभिप्रायकदनार्थं वास्य सूत्रस्यावतारः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इन दोनों एकांतियों के अभिप्राय के खंडन करनेके लिये ही...प्रकृत सूत्र का अवतार हुआ है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सप्तभंग तरंगिनी पृष्ठ 77/1 ननु...सर्व वस्तु स्यादेकं स्यादनेकमिति कथं संगच्छते। सर्वस्यवस्तुनः केनापि रूपेणैकाभावात्।...तदुक्तम् `उपयोगो लक्षणम्' इति सूत्रे, तत्वार्थश्लोकवार्तिके- न हि वयं सदृशपरिणाममनेकव्यक्तिव्यापिनं युगपदुपगच्छामोऽन्यत्रोपचारात् इति...पूर्वोदाहृतपूर्वाचार्यवचनानां च सर्वथैक्य निराकरणपरत्वाद अन्यथा सत्ता सामान्यस्य सर्वथानेकत्वे पृथ्कत्वैकांतपक्ष एवाहतस्स्यात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सर्व वस्त कथंचित एक हैं कथंचित् अनेक हैं यह कैसे संगत हो सकता है, क्योंकि किसी प्रकार से सर्व वस्तुओं की एकता नहीं हो सकती? तत्त्वार्थ सूत्र में कहा भी है `उपयोगों लक्षणं' अर्थात् ज्ञान दर्शन रूप उपयोग ही जीव का लक्षण है। इस सूत्र के अंतर्गत तत्त्वार्थ श्लोक वार्तिकमें `अन्य व्यक्ति में उपचार से एक काल में ही सदृश परिणाम रूप अनेक व्यक्ति व्यापी एक सत्त्व हम नहीं मानते' ऐसा कहा है- &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - पूर्व उदाहरणों में आचार्यों के वचनों से जो सर्वथा एकत्व ही माना है उसी के निराकरण में तात्पर्य है न कि कथंचित् एकत्व के निराकरण में। और ऐसा न मानने से सर्वथा सत्ता सामान्य के अनेकत्व मानने से पृथक्त्व एकांत पक्ष का ही आदर होगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;नय निक्षेपार्थ करनेकी विधि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/6/20 नामादिनिक्षेपविधिनोपक्षिप्तानां जीवादीनां तत्त्वं प्रमाणाभ्यां नयैश्चाधिगम्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिन जीवादि पदार्थों का नाम आदि निक्षेप विधि के द्वारा विस्तार से कथन किया है उनका स्वरूप प्रमाण और नयों के द्वारा जाना जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/10/16 प्रमाण-नय-निक्षेपैर्योऽर्थो नाभिसमीक्ष्यते। युक्तं चायुक्तवद्भाति तस्यायुक्तं च युक्तवत् ॥10॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिस पदार्थ का प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा, नैगमादि नयों के द्वारा, नामादि निक्षेपों के द्वारा सूक्ष्म दृष्टि से विचार नहीं किया जाता है, वह पदार्थ कभी युक्त (संगत) होते हुए भी अयुक्त (असंगत) सा प्रतीत होता है और कभी अयुक्त होते हुए भी युक्त की तरह-सा प्रतीत होता है ॥10॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/3/10 विशेषार्थ&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम के किसी श्लोक गाथा, वाक्य, व पद के ऊपर से अर्थ का निर्णय करने के लिए निर्दोष पद्धति से श्लोकादिक का उच्चारण करना चाहिए, तदनंतर पदच्छेद करना चाहिए, उसके बाद उसका अर्थ कहना चाहिए, अनंतर पद-निक्षेप अर्थात् नामादि विधि से नयों का अवलंबन लेकर पदार्थ का ऊहापोह करना चाहिए। तभी पदार्थ के स्वरूप का निर्णय होता है। पदार्थ निर्णय के इस क्रम को दृष्टि में रखकर गाथा के अर्थ पद का उच्चारण करके, और उसमें निक्षेप करके, नयों के द्वारा, तत्त्व निर्णय का उपदेश दिया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;मो.मा./प्र./7/368/7  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - तो कहा करिये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - निश्चय नय करि जो निरूपण किया होय, ताकौं तो सत्यार्थ न मानि ताका तो श्रद्धान अंगीकार करना, अर व्यवहार नय करि जो निरूपण किया होय ताकौ असत्यार्थ मानि ताका श्रद्धान छोडना...तातैं व्यवहार नयका श्रद्धान छोड़ि निश्चयनय का श्रद्धान करना योग्य है। व्यवहार नय करि स्वद्रव्य परद्रव्य कौं वा तिनकें भावनिकौं वा कारण कार्यादि कौं काहूलो काहूँ विषै मिलाय निरूपण करै है। सो ऐसे ही श्रद्धान से मिथ्यात्व है तातैं याका त्याग करना। बहुरि निश्चय नय तिनकौ यथावत् निरूपै है, काहू को काहू विषै न मिलावै है। ऐसा ही श्रद्धान तैं सम्यक्त्व हो है। तातै ताका श्रद्धान करना।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जो ऐसैं हैं, तो जिनमार्ग विषैं दोऊ नयनिका ग्रहण करना कह्या, सो कैसे?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - जिनमार्ग विषै कहीं तौ निश्चय नयकी मुख्यता लिये व्याख्यान है ताकौं तो `सत्यार्थ ऐसे ही है' ऐसा जानना। बहुरी कहीं व्यवहार नयकी मुख्यता लिये व्याख्यान है ताकौ `ऐसे है नाहिं निमित्तादिकी अपेक्षा उपचार किया है' ऐसा जानना। इस प्रकार जाननेका नाम ही दोऊ नयनिका ग्रहण है। बहुरि दोऊ नयनिके व्याख्यान कूँ समान सत्यार्थ जानि ऐसे भी है ऐसे भी है, ऐसा भ्रम रूप प्रवर्तने करि तौ दोऊ नयनिका ग्रहण किया नाहीं।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जो व्यवहार नय असत्यार्थ है, तौ ताका उपदेश जिनमार्ग विषैं काहें को दिया। एक निश्चय नय ही का निरूपण करना था?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - निश्चय नयको अंगीकार करावनैं कूँ व्यवहार करि उपदेश दीजिये हैं। बहुरी व्यवहार नय है, सो अंगीकार करने योग्य नाहीं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(और भी देखें [[ आगम#3.8 | आगम - 3.8]])&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;आगमार्थ करनेकी विधि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.1&amp;quot;&amp;gt;पूर्वापर मिलान पूर्वक&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्र.सं/टी.22/66 [अन्यद्वा परमागमाविरोधेन विचारणीयं...किंतु विवादो न कर्तव्यः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= परमागम के अविरोध पूर्वक विचारना चाहिए, किंतु कथन में विवाद नहीं करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 335 शेषविशेषव्याख्यानं ज्ञातव्यं चोक्तवक्ष्यमाणतया। सूत्रे पदानुवृत्तिर्ग्राह्मा सूत्रांतरादिति न्यायात् ॥335॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र में पदों की अनुवृत्ति दूसरे सूत्रों से ग्रहण करनी चाहिए, इस न्यायसे यहाँ पर भी शेष विशेष कथन उक्त और वक्ष्यमाण पूर्वापर संबंध से जानना चाहिए। रहस्यपूर्ण चिट्ठी पं. टोडरमलजी कृत/512 कथन तो अनेक प्रकार होय परंतु यह सर्व आगम अध्यात्म शास्त्रन सो विरोध न होय वैसे विवक्षा भेद करि जानना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.2&amp;quot;&amp;gt;परंपरा का ध्यान रख कर&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,184/481/1 एदीए गाहाए एदस्स वक्खाणस्स किण्ण विरोहा। होउ णाम।...ण, जुत्तिसिद्धस्य आइरियपरंपरागयस्स एदीए गाहाए णाभद्दत्तं काऊण सक्किज्जदि, अइप्पसंगादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि ऐसा है तो (देश संयत में तेरह करोड़ मनुष्य हैं) इस गाथा के साथ इस पूर्वोक्त व्याख्यान का विरोध क्यों नहीं आ जायेगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि उक्त गाथा के साथ पूर्वोक्त व्याख्यान का विरोध प्राप्त होता है तो होओ...जो युक्ति सिद्ध है और आचार्य परंपरा से आया हुआ है उसमें इस गाथा से असमीचीनता नहीं लायी जा सकती, अन्यथा अतिप्रसंग दोष आ जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 4/1,4,4/156/2) रहस्यपूर्ण चिट्ठी पं.टोडरमल/पृ.512 देखें [[ आगम#3.4.1 | आगम - 3.4.1]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.3&amp;quot;&amp;gt;शब्दका नहीं भावका ग्रहण करना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/33/144 अन्यार्थस्यान्यार्थेन संबंधाभावात्। लोकसमय विरोध इति चेत्। विरुध्याताम्। तत्त्वमिह मीमांस्यते, न भैषज्यमातुरेच्छानुवर्ति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अन्य अर्थ का अन्य अर्थ के साथ संबंध का अभाव है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - इससे लोक समय का (व्याकरण शास्त्र) का विरोध होता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि विरोध होता है तो होने दो, इससे हानि नहीं, क्योंकि यहाँ तत्त्व की मीमांसा की जा रही है। दवाई कुछ पीड़ित मनुष्य की इच्छा का अनुकरण करनेवाली नहीं होती।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 2/6/3,8/109 द्रव्यलिंग नामकर्मोदयापादितं तदिह नाधिकृतम्, आत्मापरिणामप्रकरणात्।....द्रव्यलेश्या पुद्गलविपाकिकर्मोदयापादितेति सा नेह परिगृह्यत आत्मनो भावप्रकरणात् ।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= चूँकि आत्मभावों का प्रकरण है, अतः नामकर्म के उदय से होने वाले द्रव्यलिंग की यहाँ विवक्षा नहीं है।...द्रव्य लेश्या पुद्गल विपाकी शरीर नाम कर्म के उदय से होती है अतः आत्मभावों के प्रकरण में उसका ग्रहण नहीं किया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,60/303/6 अन्यैराचार्यैरव्याख्यातमिममर्थं भणंतः कथं न सूत्रप्रत्यनीकाः। न, सूत्रवशवर्तिनां तद्विरोधात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अन्य आचार्यों के द्वारा नहीं व्याख्यान किये इस अर्थ का इस प्रकार व्याख्यान करते हुए आप सूत्र के विरुद्ध जा रहे हैं ऐसा क्यों नहीं माना जाये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं...सूत्र के वशवर्ती आचार्यों का ही पूर्वोक्त (मेरे) कथन से विरोध आता है। (अर्थात् मैं गलत नहीं अपितु वही गलत है।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,123/408/5 आइरियवयणमणेयंतमिदि चे, होदु णाम, णत्थि मज्झेत्थ अग्गही।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आचार्यों के वचन अनेक प्रकार के होते हैं तो होओ. इसमें हमारा आग्रह नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,3/197/6 सव्वभावाणं पारिणामियत्तं पसज्जदीदि चे होदुं, ण कोई दोसो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सभी भावों के पारिणामिकपने का प्रसंग आता है तो आने दो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1,56/101/2 चक्षुषा दृश्यते वा तं तत् चक्खुदंसणं चक्षुर्द्दर्शनमिति वेति ब्रुवते। चक्खिंदियणाणादो जो पुव्वमेव सुवसतीए सामण्णाए अणुहओ चक्खुणाणुप्पत्तिणिमित्तो तं चक्खुदंसणमिदि उत्तं होदि।...बालजणबीहणट्ठं चक्खूणं जं दिस्सदि तं चक्खूदंसणमिदि परूवणादो। गाहएगलभंजणकाऊण अज्जुवत्थो किण्ण घेप्पदि। ण, तत्थ पुव्वुत्तासेसदोसप्पसंगादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो चक्षुओं को प्रकाशित होता है अथवा आँख द्वारा देखा जाता है वह चक्षुदर्शन है इसका अर्थ ऐसा समझना चाहिए कि चक्षु इंद्रिय ज्ञान से पूर्व ही सामान्य स्वशक्ति का अनुभव होता है जो कि चक्षु ज्ञान की उत्पत्ति में निमित्तभूत है वह चक्षुदर्शन है।...बालक जनों को ज्ञान कराने के लिए अंतरंग में बाह्य पदार्थों के उपचार से `चक्षुओं को जो दीखता है वही चक्षु दर्शन है' ऐसा प्ररूपण किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - गाथाका गला न घोट कर सीधा अर्थ क्यों नही करते?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं करते, क्योंकि वैसा करने में पूर्वोक्त समस्त दोषों का प्रसंग आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 86 शब्दाब्रह्मोपासनं भावज्ञानावष्टंभदृढीकृतपरिणामेन सम्यगधीयमानमुपायांतरम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= (मोह क्षय करनेमें) परम शब्द ब्रह्म की उपासना का, भावज्ञान के अवलंबन द्वारा दृढ किये गये परिणाम से सम्यक् प्रकार अभ्यास करना सो उपायांतर है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / आत्मख्याति गाथा 277 नाचारादिशब्दश्रुतं, एकांतेन ज्ञानस्याश्रयः तत्सद्भावेऽपि...शुद्धभावेन ज्ञानस्याभावात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आचारादि शब्दश्रुत एकांत से ज्ञानका आश्रय नहीं है, क्योंकि आचारांगादिक का सद्भाव होने पर भी शुद्धात्मा का अभाव होने से ज्ञान का अभाव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 3/9 स्वसमय एव शुद्धात्मनः स्वरूपं न पुनः परसमय...इति पातनिका लक्षणं सर्वत्र ज्ञातव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= स्व समय ही शुद्धात्मा का स्वरूप है पर समय नहीं।...इस प्रकार पातनिका का लक्षण सर्वत्र जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.4&amp;quot;&amp;gt;भावार्थ करनेकी विधि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 27/61 कर्मोपाधिजनितमिथ्यात्वरागादिरूप समस्तविभावपरिणामांस्त्यवत्वा निरुपाधिकेवलज्ञानादिगुणयुक्तशुद्धजीवास्तिकाय एव निश्चयनयेनोपादेयत्वेन भावयितव्यं इत भावार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 52/101 अस्मिन्नधिकारे यद्यप्यष्टविधज्ञानोपयोगचतुर्विधदर्शनोपयोगव्याख्यानकाले शुद्धाशुद्धविवक्षा न कृता तथापि निश्चयनयेनादिमध्यांतवर्जिते परमानंदमालिनी परमचैतन्यशालिनि भगवत्यात्मनि यदनाकुलत्वलक्षणं पारमार्थिकसुखं तस्योपादेयभूतस्योपादानकारणभूतं यत्केवलज्ञानदर्शनद्वयं तदेवोपादेयमिति श्रद्धेयं ज्ञेयं तथैवार्तरौद्धादिसमस्तविकल्पजालत्यागेन ध्येयमिति भावार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कर्मोपाधि जनित मिथ्यात्व रागादि रूप समस्त विभाव परिणामों को छोड़कर निरुपाधि केवलज्ञानादि गुणों से युक्त जो शुद्ध जीवास्तिकाय है, उसी को निश्चय नय से उपादेय रूप से मानना चाहिए यह भावार्थ है। वा यद्यपि इस अधिकार में आठ प्रकार के ज्ञानोपयोग तथा चार प्रकार के दर्शनोपयोग का व्याख्यान करते समय शुद्धाशुद्ध की विवक्षा नहीं की गयी है। फिर भी निश्चय नय से आदि मध्य अंत से रहित ऐसी परमानंदमालिनी परमचैतन्यशालिनी भगवान् आत्मा में जो अनाकुलत्व लक्षणवाला पारमार्थिक सुख है, उस उपादेय भूत का उपादान कारण जो केवलज्ञान व केवल दर्शन हैं, ये दोनों ही उपादेय हैं. यही श्रद्धेय है, यही ज्ञेय हैं, तथा इस ही को आर्त रोद्र आदि समस्त विकल्प जाल को त्यागकर ध्येय बनाना चाहिए। ऐसा भावार्थ है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 61/113)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 2/10 शुद्धनयाश्रितं जीवस्वरूपमुपादेयम् शेषं च हेयम्। इति हेयोपादेयरूपेण भावार्थोऽप्यवबोद्धव्यः।...एवं...यथासंभव व्याख्यानकाले सर्वत्र ज्ञातव्य।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शुद्ध नय के आश्रित जो जीव का स्वरूप है वह तो उपादये यानी-ग्रहण करने योग्य है और शेष सब त्याज्य है। इस प्रकार हेयोपादेय रूप से भावार्थ भी समझना चाहिए। तथा व्याख्यान के समय में सब जगह जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.5&amp;quot;&amp;gt;आगम में व्याकरण की प्रधानता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,1/2/9-10/3 धाउपरूवणा किमट्ठं कीरदे। ण, अणवयधाउस्स सिस्सस्स अत्थावगमाणुव्वत्तादो। उक्तं च `शब्दात्पदप्रसिद्धः पदसिद्धेरर्थनिर्णयो भवति। अर्थात्तत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानात्परं श्रेयः ॥2॥ इति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - धातु का निरूपण किस लिए किया जा रहा है (यह तो सिद्धांत ग्रंथ है)?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जो शिष्य धातु से अपरिचित है, उसे धातु के परिज्ञान के बिना अर्थ का परिज्ञान नहीं हो सकता और अर्थबोध के लिए विवक्षित शब्द का अर्थज्ञान कराना आवश्यक है, इसलिए यहाँ धातु का निरूपण किया गया है। कहा भी है-शब्द से पद की सिद्धि होती है, पद की सिद्धि से अर्थ का निर्णय होता है, अर्थ के निर्णय से तत्त्वज्ञान अर्थात् हेयोपादेय विवेक की प्राप्ति होती है और तत्त्वज्ञान से परम कल्याण होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;महापुराण सर्ग संख्या 38/119 शब्दविद्यार्थशास्त्रादि चाध्येयं नास्यं दुष्यति। सुसंस्कारप्रबोधाय वैयात्यख्यातयेऽपि च ॥119॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उत्तम संस्कारों को जागृत करने के लिए और विद्वत्ता प्राप्त करने के लिए इस व्याकरण आदि शब्द शास्त्र और न्याय आदि अर्थशास्त्र का भी अभ्यास करना चाहिए क्योंकि आचार विषयक ज्ञान होने पर इनके अध्ययन करने में कोई दोष नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;मो.मा.प्र.8/432/17 बहुरि व्याकरण न्यायादिक शास्त्र है, तिनका भी थोरा बहुत अभ्यास करना। जातैं इनका ज्ञान बिन बड़े शास्त्रनि का अर्थ भासै नाहीं। बहुरि वस्तु का भी स्वरूप इनकी पद्धति माने जैसा भासै तैसा भाषादिक करि भासै नाहीं। तातै परंपरा कार्यकारी जानि इनका भी अभ्यास करना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.6&amp;quot;&amp;gt;आगम में व्याकरण की गौणता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचास्तिकाय संग्रह / तात्पर्यवृत्ति / गाथा 1/3 प्राथमिकशिष्यप्रतिसुखबोधार्थमत्र ग्रंथे संधेर्नियमो नास्तीति सर्वत्र ज्ञातव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्राथमिक शिष्यों को सरलता से ज्ञान हो जावे इसलिए ग्रंथ में संधि का नियम नहीं रखा गया है ऐसा सर्वत्र जानना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.7&amp;quot;&amp;gt;अर्थ समझने संबंधी कुछ विशेष नियम&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 1/1,1,111/349/4 सिद्धासिद्धाश्रया हि कथामार्गा ।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,117/362/10 सामान्यबोधनाश्च विशेषेष्वतिष्ठंते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कथन परंपराएँ प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध इन दोनों के आश्रय से प्रवृत्त होती हैं। सामान्य विषय का बोध कराने वाले वाक्य विशेषो में रहा करते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 2/1,1/441/17 विशेषविधिना सामान्यविधिर्बाध्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 2/1,1,/442/20 परा विधिर्बाधको भवति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विशेष विधिसे सामान्य विधि बाधित हो जाती है।...पर विधि बाधक होती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 3/1,2,2/18/10 व्याख्यातो विशेषप्रतिपत्तिरिति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,82/315/1 जहा उद्देसो तहा णिद्देसो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= व्याख्या से विशेष की प्रतिपत्ति होती है। उद्देश के अनुसार निर्देश होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 4/1,5,145/403/4 गौण-मुख्ययोर्मूख्ये संप्रत्ययः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= गौण और मुख्यमें विवाद होनेपर मुख्यमें ही संप्रत्यय होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परीक्षामुख परिच्छेद 3/19 तर्कात्तन्निर्णयः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तर्कसे इसका (क्रमभावका) निर्णय होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक 70 भावार्थ-साधन व्याप्त साध्य रूप धर्म के मिल जाने पर पक्ष की सिद्धि हुआ करती है।...दृष्टांत को ही साधन व्याप्त साध्य रूप धर्म कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 72 नामैकदेशेन नामग्रहणम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= नाम के एकदेश से ही पूरे नाम का ग्रहण हो जाता है, जैसे रा.ल कहने से रामलाल।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 494...। व्यतिरेकेण विना यन्नान्वयपक्षः स्वपक्षरक्षार्थम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= व्यतिरेक के बिना केवल अन्वय पक्ष अपने पक्ष की रक्षा के लियए समर्थ नहीं होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.8&amp;quot;&amp;gt;विरोधी बातें आने पर दोनों का संग्रह कर लेना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 1/1,1,27/222/2 उस्सुतं लिहंता आहिरिया कथं वज्जभीरुणो। इदि चे ण एस दोसो, दोण्हं मज्झे एक्कस्सेव संगहे कीरणामे वज्जभीरुत्तं णिवट्टति। दोण्हं पि संगहकरेंताणमाइरियाणं वज्ज-भीरुत्ताविणासाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,37/262/2 उवदेसमंतरेण तदवगमाभावा दोण्हं पि संगहो कायव्वो। दोण्हं संगहं करेंतो संसयमिच्छाइट्ठी होदि त्ति तण्ण, सुत्तुद्दिट्ठमेव अत्थि त्ति सद्दहंतस्स संदेहाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - उत्सूत्र लिखने वाले आचार्य पापभीरु कैसे माने जा सकते हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि दोनों का वचनो में-से किसी एक ही वचन के संग्रह करने पर पापभीरूता निकल जाती है अर्थात् उच्छंखलता आ जाती है। अतएव दोनों प्रकार के वचनों का संग्रह करने वाले आचार्यों के पापभीरुता नष्ट नहीं होती है, अर्थात् बनी रहती है। उपदेश के बिना दोनों में-से कौन वचनसूत्र रूप है यह नहीं जाना जा सकता, इसलिए दोनों वचनोंका संग्रह कर लेना चाहिए।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों वचनों का संग्रह करनेवाला संशय मिथ्यादृष्टि हो जायेगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि संग्रह करनेवाले के `यह सूत्र कथित ही हैं इस प्रकार का श्रद्धान पाया जाता है, अतएव उसके संदेह नहीं हो सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,13/110/173 सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं तु सद्दहदि। सद्दहदि असब्भावं अजाणमाणो गुरु णियोगा ॥110॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सम्यग्दृष्टि जीव जिनेंद्र भगवान के द्वारा उपदिष्ट प्रवचन का तो श्रद्धान करता ही है, किंतु किसी तत्त्व को नहीं जानता हुआ गुरु के उपदेश से विपरीत अर्थ का भी श्रद्धान कर लेता है ॥110॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 27), ( लब्धिसार / मूल या टीका गाथा 105)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.9&amp;quot;&amp;gt;व्याख्यान की अपेक्षा सूत्र वचन प्रमाण होता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 2/1,15/$463/417/7 सुत्तेण वक्खाणं बाहज्जदि ण वक्खाणेण वक्खाणं। एत्थ पुणो दो वि परूवेयेव्वा दोण्हमेक्कदरस्स सुत्ताणुसारितागमाभावादो।...एत्थ पुण विसंयोजणापक्खो चेव पहाणभावेणावलंबियव्वो पवाइज्जमाणत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र के द्वारा व्याख्यान बाधित हो जाता है, परंतु एक व्याख्यान के द्वारा दूसरा व्याख्यान बाधित नहीं होता। इसलिए उपशम सम्यग्दृष्टि के अनंतानुबंधी की विसंयोजना नहीं होती यह वचन अप्रमाण नहीं है। फिर भी यहाँ दोनों ही उपदेशों का ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि दोनों में-से अमुक उपदेश सूत्रानुसारी है, इस प्रकारके ज्ञान करने का कोई साधन नहीं पाया जाता।...फिर भी यहाँ उपशम सम्यग्दृष्टि के अनंतानुबंधी की विसंयोजना होती है, यह पक्ष ही प्रधान रूप से स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार का उपदेश परंपरा से चला आ रहा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;3.4.10&amp;quot;&amp;gt;यथार्थ का निर्णय हो जाने पर भूल सुधार लेनी चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,37/143/262 सुत्तादो तं सम्मं दरिसिज्जंतं जदा ण सद्दहदि। सो चेय हवदि मिच्छाइट्ठी हु तदो पहुडि जीवो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र से भले प्रकार आचार्यादिक के द्वारा समझाये जाने पर भी यदि जो जीव विपरीत अर्थ को छोड़कर समीचीन अर्थका श्रद्धान नहीं करता तो उसी समयसे वह सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यादृष्टि हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 28) ( लब्धिसार / मूल या टीका गाथा 106)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,120/381/5 एत्थ उवदेसं लद्धूणं एदं चेव वक्खाणं सच्चमण्णं असच्चमिदि णिच्छओ कायव्वो। एदे च दो वि उवएसा सुत्तसिद्धा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यहाँ पर उपदेश को प्राप्त करके यही व्याख्यान सत्य है, अन्य व्याख्यान असत्य है, ऐसा निश्चय करना चाहिए। ये दोनों ही उपदेश सूत्र सिद्ध हैं। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 14/5,6,66/4), ( धवला पुस्तक 14/5,6,116/151/6), ( धवला पुस्तक 14/5,6,652/508/6), ( धवला पुस्तक 15/317/9)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;शब्दार्थ संबंधी विषय&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;शब्द में अर्थ प्रतिपादन की योग्यता व शंका&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परीक्षामुख परिच्छेद 3/100,101 सहजयोग्यतासंकेतवशाद्धि शब्दादयो वस्तु प्रतिपत्तिहेतवः ॥100॥ यथा मेवदिय सन्ति ।।101।।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द और अर्थ में वाचक वाच्य शक्ति है। उसमें संकेत होने से अर्थात् इस शब्द का वाच्य यह अर्थ है ऐसा ज्ञान हो जाने से शब्द आदि से पदार्थों का ज्ञान होता है। जिस प्रकार मेरु आदि पदार्थ हैं अर्थात् मेरु शब्द के उच्चारण करने से ही जंबूद्वीप के मध्य में स्थित मेरुका ज्ञान हो जाता है। (इसी प्रकार अन्य पदार्थों को भी समझ लेना चाहिए।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;भिन्न-भिन्न शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/33/144 शब्दभेदश्चेदस्ति अर्थभेदेनाप्यवश्यं भवितव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यदि शब्दों में भेद है तो अर्थों में भेद अवश्य होना चाहिए। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(राजवार्तिक अध्याय 1/33/10/98/31)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/6/5/34/18 शब्दभेदे ध्रुवोऽर्थभेद इति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शब्द का भेद होने पर अर्थ अर्थात् वाच्य पदार्थ का भेद ध्रुव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;जितने शब्द हैं उतने वाच्य पदार्थ भी हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आप्त.भी./मू.27 संज्ञिनः प्रतिषेधो न प्रतिषेध्यादृते क्वचित् ॥27॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो संज्ञावान पदार्थ प्रतिषेध्य कहिए निषेध करने योग्य वस्तु तिस बिना प्रतिषेध कहूँ नाहीं होय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/6/5/34/18 में उद्धृत (यावन्मात्राः शब्दाः तावन्मात्राः परमार्थाः भवंति) जित्तियमित्ता सद्दा तित्तियमित्ता होंति परमत्था।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जितने शब्द होते हैं उतने ही परम अर्थ हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कार्तिकेयानुप्रेक्षा / मूल या टीका गाथा 252 कि बहुणा उत्तेण य जेत्तिय-मेत्ताणि संति णामाणि, तेत्तिय-मेत्ता अत्था संति य णियमेण परमत्था।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अधिक कहने से क्या? जितने नाम हैं उतने ही नियम से परमार्थ रूप पदार्थ हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;अर्थ व शब्द में वाच्यवाचक संबंध कैसे&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; कषायपाहुड़ पुस्तक 1/13-14/$198-200/238/1 शब्दोऽर्थस्य निस्संबंधस्य कथ वाचक इति चेत्। प्रमाणमर्थस्य निस्संबंधस्य कथं ग्राहकमिति समानमेतत्। प्रमाणार्थयोर्जन्यजनकलक्षणः प्रतिबंधोऽस्तीति चेत्; न; वस्तुसामर्थ्यस्यांतः समुत्पत्तिविरोधात् ॥$198॥ प्रमाणार्थयोः स्वभावत एव ग्राह्यग्राहकमभावश्चेत्; तर्हि शब्दार्थयोः स्वभावत एव वाच्यवाचकभावः किमिति नेष्यते अविशेषात्। प्रमाणेन स्वभावतोऽर्थसंबद्धेन किमितींद्रियमालोको वा अपेक्ष्यत इति समानमेतत्। शब्दार्थसबंधः कृत्रिमत्वाद्वा पुरुषव्यापारमपेक्षते ॥$199॥...&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;अथ स्यात्, न शब्दो वस्तु धर्मः; तस्य ततो भेदात्। नाभेदः भिंनेंद्रियग्राह्यत्वात् भिन्नार्थक्रियाकारित्वात् भिन्नसाधनत्वात् उपायोपेयभावोपलंभाच्च। न विशेष्याद्भिन्नं विशेषणम्; अव्यवस्थापत्तेः। ततो न वाचकभेदाद्वाच्यभेद इति; न; प्रकाश्याद्भिन्नामेव प्रमाण-प्रदीप-सूर्य-मणींद्वादीनां प्रकाशकत्वोपलंभात्, सर्वथैकत्वे तदनुपलंभात् ततो भिन्नोऽपि शब्दोऽर्थप्रतिपादक इति प्रतिपत्तव्यम् ॥$200॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,45/179/3 अथ स्यान्न, नशब्दो...अव्यवस्थापत्ते; (ऊपर कषायपाहुड़ में भी यही शंका की गयी है) नैष दोषः, भिन्नानामपि वस्त्राभरणादीनां विशेषणत्वोपलंभात्।...कृतो योग्यता शब्दार्थानाम्। स्वपराभ्याम्। न चैकांतेनान्यत एव तदुत्पत्तिः, स्वती विवर्तमानानामर्थानां सहायकत्वेन वर्तमानबाह्यार्थोपलंभात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द व अर्थ में कोई संबंध न होते हुए भी वह अर्थ का वाचक कैसे हो सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण का अर्थ के साथ कोई संबंध न होते हुए भी वह अर्थ का ग्राहक कैसे हो सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण व अर्थ में जन्यजनक लक्षण पाया जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, वस्तु की सामर्थ्य की अन्य से उत्पत्ति मानने में विरोध आता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण व अर्थ में तो स्वभाव से ही ग्राह्यग्राहक संबंध है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - तो शब्द व अर्थ में भी स्वभाव से ही वाच्य-वाचक संबंध क्यों नहीं मान लेते?  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि इसमें स्वभाव से ही वाच्यवाचक भाव है तो वह पुरूषव्यापार की अपेक्षा क्यों करता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाण यदि स्वभाव से ही अर्थ के साथ संबद्ध है तो फिर वह इंद्रियव्यापार व आलोक (प्रकाश) की अपेक्षा क्यों करता है? इस प्रकार प्रमाण व शब्द दोनों में शंका व समाधान समान हैं। अतः प्रमाण की भाँति ही शब्द में भी अर्थ प्रतिपादन की शक्ति माननी चाहिए। अथवा, शब्द और पदार्थ का संबंध कृत्रिम है। अर्थात् पुरुष के द्वारा किया हुआ है, इसलिए वह पुरुष के व्यापार की अपेक्षा रखता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द वस्तु का धर्म नहीं है, क्योंकि उसका वस्तु से भेद है। उन दोनों में अभेद नहीं कहा जा सकता क्योंकि दोनों भिन्न इंद्रियों के विषय हैं, और वस्तु उपेय है। इन दोनों में विशेष्य विशेषण भाव की अपेक्षा भी एकत्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि विशेष्य से भिन्न विशेषण नहीं होता है, कारण कि ऐसा मानने से अव्यवस्था की आपत्ति आती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; [धवला पुस्तक 9/4,1,45/179/3 पर यही शंका करते हुए शंकाकार ने उपरोक्त हेतुओँ के अतिरिक्त ये हेतु और भी उपस्थित किये हैं - दोनों भिन्न इंद्रियों के विषय हैं। वस्तु त्वगिंद्रिय से ग्राह्य है और शब्द त्वगिंद्रिय से ग्राह्य नहीं है। दूसरे, उन दोनों में अभेद मानने से `छुरा' और `मोदक' शब्दों का उच्चारण करने पर क्रम से मुख कटने तथा पूर्ण होने का प्रसंग आता है; अतः दोनों में सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता।] (और भी देखें [[ नय#4.5 | नय - 4.5]]) अतः शब्द वस्तु का धर्म न होने से उसके भेद से अर्थभेद नहीं हो सकता?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, जिस प्रकार प्रमाण, प्रदीप, सूर्य, मणि और चंद्रमा आदि पदार्थ घट पट आदि प्रकाश्यभूत पदार्थों से भिन्न रहकर ही उनके प्रकाशक देखे जाते हैं, तथा यदि उन्हें सर्वथा अभिन्न माना जाय तो उनके प्रकाश्य-प्रकाशक भाव नहीं बन सकता है; उसी प्रकार शब्द अर्थ से भिन्न होकर भी अर्थ का वाचक होता है, ऐसा समझना चाहिए। दूसरे, विशेष्य से अभिन्न भी वस्त्राभरणादिकों को विशेषणता पायी जाती है। (जैसे-घड़ीवाला या लाल पगड़ीवाला)  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - शब्द व अर्थ में यह योग्यता कहाँ से आती है कि नियत शब्द नियत ही अर्थका प्रतिपादक हो?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - स्व व पर से उनके यह योग्यता आती है। सर्वथा अन्य से ही उसकी उत्पत्ति हो, ऐसा नहीं है; क्योंकि, स्वयं वर्तने वाले पदार्थों की सहायता से वर्तते हुए बाह्य पदार्थ पाये जाते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/13-14/$215-216/265-268 अथ स्यात् न पदवाक्यान्यर्थप्रतिपादिकानि; तेषामसत्त्वात। कुतस्तदसत्त्वम्। [अनुपलंभात् सोऽपि कुतः।] वर्णानां क्रमोत्पन्नानामनित्यानामेतेषां नामधेयाति (पाठ छूटा हुआ है) समुदायाभावात्। न च तत्समुदय (पाठ छूटा हुआ है) अनुपलंभात्। न च वर्णादर्थप्रतिपत्तिः; प्रतिवर्णमर्थप्रतिपत्तिप्रसंगात्। नित्यानित्योभयपक्षेषु संकेतग्रहणानुपपत्तेश्च न पदवाक्येभ्योऽर्थप्रतिपत्तिः। नासंकेतितः शब्दोऽर्थप्रतिपादकः अनुपलंभात्। ततो न शब्दार्थप्रतिपत्तिरिति सिद्धम् ॥$215॥ न च वर्ण-पद-वाक्यव्यतिरिक्तः नित्योऽक्रम अमूर्तो निरवयवः सर्वगतः अर्थप्रतिपत्तिनिमित्तं स्फोट इति; अनुपलंभात् ॥$216॥...न; बहिरंगशब्दात्मकनिमित्तं च (तेभ्यः) क्रमेणोत्पन्नवर्णप्रत्ययेभ्यः अक्रमस्थितिभ्यः समुत्पन्नपदवाक्याभ्यामर्थविषयप्रत्ययोत्पत्त्युपलंभात्। न च वर्णप्रत्ययानां क्रमोत्पन्नानां पदवाक्यप्रत्ययोत्पत्तिनिमित्तानामक्रमेण स्थितिर्विरुद्धा; उपलभ्यमानत्वात्।...न चानेकांते एकांतवाद इव संकेतग्रहणमनुपपन्नम्; सर्वव्यवहाराणा [मनेकांत एवं सुघटत्वात्। ततः] वाच्यवाचकभावो घटत इति स्थितम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - क्रम से उत्पन्न होने वाले अनित्य वर्णों का समुदाय असत् होने से पद और वाक्यों का ही जब अभाव है, तो वे अर्थप्रतिपादक कैसे हो सकते हैं? और केवल वर्णों से ही अर्थ का ज्ञान हो जाय ऐसा है नहीं, क्योंकि `घ' `ट' आदि प्रत्येक वर्ण से अर्थ के ज्ञान का प्रसंग आता है? सर्वथा नित्य, सर्वथा अनित्य और सर्वथा उभय इन तीनों पक्षो में ही संकेत का ग्रहण नहीं बन सकता इसलिए पद और वाक्यों से अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता; क्योंकि संकेत रहित शब्द पदार्थ का प्रतिपादक होता हुआ नहीं देखा जाता? वर्ण, पद और वाक्य से भिन्न, नित्य, क्रमरहित, अमूर्त, निरवयव, सर्वगत `स्फोट' नाम के तत्त्व को पदार्थों की प्रतिपत्ति का कारण मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि, उस प्रकार की कोई वस्तु उपलब्ध नहीं हो रही है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, बाह्य शब्दात्मक निमित्तों से क्रमपूर्वक जो `घ' `ट' आदि वर्ण ज्ञान उत्पन्न होते हैं, और जो ज्ञान में अक्रम से स्थित रहते हैं, उनसे उत्पन्न होनेवाले पद और वाक्यों  से अर्थ विषयक ज्ञान की उत्पत्ति देखी जाती है। पद और वाक्यों के ज्ञान की उत्पत्ति में कारणभूत तथा क्रम से उत्पन्न वर्ण विषयक ज्ञानों की अक्रम से स्थिति मानने में भी विरोध नहीं आता; क्योंकि, वह उपलब्ध होती है। तथा जिस प्रकार एकांतवाद में संकेत का ग्रहण नहीं बनता है, उसी प्रकार अनेकांत में भी न बनता हो, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि समस्त व्यवहार अनेकांतवाद में ही सुघटित होते हैं। (अर्थात् वर्ण व वर्णज्ञान कथंचित् भिन्न भी है और कथंचित् अभिन्न भी) अतः वाच्यवाचक भाव बनता है, यह सिद्ध होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;शब्द अल्प हैं और अर्थ अनंत हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/26/4/87/23 शब्दाश्च सर्वे संख्येया एव, द्रव्यपर्यायाः पुनः संख्येयाऽसंख्येयानंतभेदाः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सर्व शब्द तो संख्यात ही होते हैं। परंतु द्रव्यों की पर्यायों के संख्यात असंख्यात व अनंतभेद होते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;अर्थ प्रतिपादन की अपेक्षा शब्द में प्रमाण व नयपना&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 4/42/13/252/22 यदा वक्ष्यमाणैः कालादिभिरस्तित्वादीनां धर्माणां भेदेन विवक्षा तदैकस्य शब्दस्यानेकार्थप्रत्यायनशक्त्याभावात् क्रमः। यदा तु तेषामेव धर्माणां कालदिभिरभेदेन वृत्तमात्मरूपमुच्यते तदैकेनापि शब्देन एकधर्मप्रत्यायनमुखेन तदात्मकत्वापन्नस्य अनेकाशेषरूपस्य प्रतिपादनसंभवात् यौगपद्यम्। तत्र यदा यौगपद्यं तदा सकलादेशः; स एव प्रमाणमित्युच्येते।...यदा तु क्रमः तदा विकलादेशः स एव नय इति व्यपदिश्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जब अस्तित्व आदि अनेक धर्म कालादि की अपेक्षा भिन्न-भिन्न विवक्षित होते हैं, उस समय एक शब्द में अनेक अर्थों के प्रतिपादन की शक्ति न होने से क्रम से प्रतिपादन होता है। इसे विकलादेश कहते हैं। परंतु जब उन्हीं अस्तित्वादि धर्मों की कालादिक की दृष्टि से अभेद विवक्षा होती है, तब एक भी शब्द के द्वारा एक धर्ममुखेन तादात्म्य रूप से एकत्व  को प्राप्त सभी धर्मों का अखंड भावसे युगपत् कथन हो जाता है। यह सकलादेश कहलाता है। विकलादेश नय रूप है और सकलादेश प्रमाण रूप है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;शब्द का अर्थ देशकालानुसार करना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/179/29 में उद्धृत “स्वाभाविकसामर्थ्यसमयाभ्यामर्थबोध निबंधनं शब्दः।” &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= स्वाभाविक शक्ति तथा संकेत से अर्थ का ज्ञान कराने वाले को शब्द कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;भिन्न क्षेत्र-कालादि में शब्द का अर्थ भिन्न भी होता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8.1&amp;quot;&amp;gt;कालकी अपेक्षा&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/178/30 कालापेक्षया पुनर्यथा जैनानां प्रायश्चित्तविधौ...प्राचीनकाले षड्गुरुशब्देन शतमशीत्यधिकमुपवासानामुच्यते स्म, सांप्रतकाले तु तद्विपरीते तेनैव षड्गुरुशब्देन उपवासत्रयमेव संकेत्यते जीतकल्पव्यवहारनुसारात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जितकल्प व्यवहार के अनुसार प्रायश्चित्त विधि में प्राचीन समय में `षड्गुरु' शब्द का अर्थ एक सौ अस्सी उपवास किया जाता था, परंतु आजकल उसी `षड्गुरु' का अर्थ केवल तीन उपवास किया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8.2&amp;quot;&amp;gt;शास्त्रोंकी अपेक्षा&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/179/4 शास्त्रापेक्षया तु यथा पुराणेषु द्वादशीशब्देनैकादशी। त्रिपुरार्णवे च अलिशब्देन मदाराभिषिक्तं च मैथुनशब्देन मधुसर्पिषोर्ग्रहणम् इत्यादि।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पुराणों में उपवास के नियमों का वर्णन करते समय `द्वादशी' का अर्थ एकादशी किया जाता हैं; शाक्त लोगों के ग्रंथो में `अलि' शब्द मदिरा और `मैथुन' शब्द शहद और घी के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.8.3&amp;quot;&amp;gt;क्षेत्र की अपेक्षा&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 14/178/28 चौरशब्दोऽन्यत्र तस्करे रूढोऽपि दाक्षिणात्यानामोदने प्रसिद्धः। यथा च कुमारशब्दः पूर्वदेशे आश्विनमासे रूढः। एवं कर्कटीशब्दादयोऽपि तत्तद्देशापेक्षया योन्यादिवाचका ज्ञेयाः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= `चौर' शब्द का साधारण अर्थ तस्कर होता है, परंतु दक्षिण देश में इस शब्द का अर्थ चावल होता है। `कुमार' शब्द का सामान्य अर्थ युवराज होने पर भी पूर्व देश में इसका अर्थ आश्विन मास किया जाता है। `कर्कटी' शब्दका अर्थ ककड़ी होनेपर भी कहीं-कहीं इसका अर्थ योनि किया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;4.9&amp;quot;&amp;gt;शब्दार्थ की गौणता संबंधी उदाहरण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सप्तभंग तरंगिनी पृष्ठ 70/4 उक्तिश्चावाच्यतैकांतेनावाच्यमिति युज्यते। इति स्वामिसमंतभद्राचार्यवचनं कथं संघटते।...न तदर्थापरिज्ञानात्। अयं खलु तदर्थः, सत्त्वाद्येकैकधर्ममुखेन वाच्यमेव वस्तु युगपत्प्रधानभूतसत्त्वासत्त्वोभयधर्मावच्छिन्नत्वेनावाच्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अवाच्याता का जो कथन है वह एकांत रूप से अकथनीय है. ऐसा मानने से `अवाच्यता युक्त न होगी', यह श्री समंतभद्राचार्य का कथन कैसे संगत होगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसी शंका भी नहीं की जा सकती, क्योंकि तुमने स्वामी समंतभद्राचार्यजी के वचनों को नहीं समझा। उस वचन का निश्चय रूप से अर्थ यह है कि सत्त्व आदि धर्मों में-से एक-एक धर्म के द्वारा जो पदार्थ वाच्य है अर्थात् कहने योग्य है, वही पदार्थ प्रधान भूत सत्त्व असत्त्व इस उभय धर्म सहित रूप से अवाच्य है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 2/7/5/11/2 रूढिशब्देषु हि क्रियोपात्तकाला व्युत्पत्त्यर्थैव न तंत्रम्। यथा गच्छतीति गौरिति।...&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 2/12/2/126/30 कथं तर्ह्यस्य निष्पत्तिः `त्रस्यंतीति त्रसाः' इति। व्युत्पत्तिमात्रमेव नार्थः प्राधान्येनाश्रीयते गोशब्दप्रवृत्तिवत्। ...एवंरूढिविशेषबललाभात् क्वचिदेव वर्तते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जितने रूढि शब्द हैं उनकी भूत भविष्यत् वर्तमान काल के आधीन जो भी क्रिया हैं वे केवल उन्हें सिद्ध करने के लिए हैं। उनसे जो अर्थ द्योतित होता है वह नहीं लिया जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जो भयभीत होकर गति करे सो त्रस यह व्युत्पत्ति अर्थ ठीक नहीं हैं। (क्योंकि गर्भस्थ अंडस्थ आदि जीव त्रस होते हुए भी भयभीत होकर गमन नहीं करते।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - `त्रस्यंतीति त्रसाः' यह केवल ”गच्छतीति गौः” की तरह व्युत्पत्ति मात्र है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(राजवार्तिक अध्याय 2/13/1/127) (राजवार्तिक अध्याय 2/36/3/145)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगमकी प्रमाणिकतामें हेतु&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;आगमकी प्रामाणिकताका निर्देश&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,75/314/5 चेत्स्वाभाव्यात्प्रत्यक्षस्येव।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जैसे प्रत्यक्ष स्वभावतः प्रमाण है उसी प्रकार आर्ष भी स्वभावतः प्रमाण है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;वक्ता की प्रामाणिकता से वचन की प्रमाणिकता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,22/196/4 वक्तृप्रामाण्याद्वचनप्रामाण्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वक्ता की प्रमाणता से वचन में प्रमाणता आती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( जंबूदीव-पण्णत्तिसंगहो अधिकार 13/84)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पद्मनंदि पंचविंशतिका अधिकार 4/10 सर्वविद्वीतरागोक्तो धर्मः सूनृततां व्रजेत्। प्रामाण्यतो यतः पुंसो वाचः प्रामाण्यमिष्यते ॥10॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो धर्म सर्वज्ञ और वीतराग के द्वारा कहा गया है वही यथार्थता को प्राप्त हो सकता है, क्योंकि पुरुष की प्रमाणता से ही वचन में प्रमाणता मानी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt;आगम की प्रामाणिकता के उदाहरण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 4/1,5,320/382/11 तं कधं णव्वदे। आइरियपरंपारगदोवदेसादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यह कैसे जाना जाता है कि उपशम सम्यक्त्वक शलाकाएँ पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र होती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - आचार्य परंपरागत उपदेश से यह जाना जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 5/1,6,36/31/5/) ( धवला पुस्तक 14/164/6; 169/2; 170/13; 173/19; 208/11; 209/11; 370/10; 510/2)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 6/1,9-1,28/65/2 एइंदियादिसु अव्वत्तचेट्ठेसु कधं सुहवदुहवभावा णज्जंते। ण तत्थ तेसिमव्वत्ताणमागमेण अत्थित्तसिद्धीदो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अव्यक्त चेष्टा वाले एकेंद्रिय आदि जीवों में सुभग और दुर्भग भाव कैसे जाने जाते हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि एकेंद्रिय आदि में अव्यक्त रूप से विद्यमान उन भावों का अस्तित्व आगमसे सिद्ध है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; धवला पुस्तक 7/2,1,56/96/8 ण दंसणमत्थि विसयाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1.56/98/1 अत्थि दंसणं, सुत्तम्मिअट्ठकम्मणिद्देसाददो।...इच्चादिउवसंहारसुत्तदंसणादो च।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दर्शन है नहीं, क्योंकि उसका कोई विषय नही है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - दर्शन है क्योंकि, सूत्र में आठ कर्मों का निर्देश किया गया है।...इस प्रकार के अनेक उपसंहार सूत्र देखने से भी, यही सिद्ध होता है कि दर्शन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt;अर्हत् व अतिशय ज्ञान वालों के द्वारा प्रणीत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 8/16/562 तदसिद्धिरिति चेत्; न; अतिशयज्ञानाकरत्वात् ॥16॥ अन्यत्राप्यतिशयज्ञानदर्शनादिति चेत्; न; अतएव तेषां सभवात् ॥17॥...आर्हतमेव प्रवचनं तेषां प्रभवः। उक्तं च-सुनिश्चितं न; परतंत्रयुक्तिषु स्फुरंति याः काश्चन सूक्तसंपदः। तवैव ताः पूर्वमहार्णवोत्थिता जगत्प्रमाणं जिनवाक्यविप्रुषः (द्वात्रि.1/3) श्रद्धामात्रमिति चेत्; न; भूयसामुपलब्धेः रत्नाकरवत् ॥18॥ तदुद्भवत्वात्तेषामपि प्रामाण्यमिति चेत्; न; निःसारत्वात् काचादिवत् ॥19॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अर्हत् का आगम पुरुष कृत होने से अप्रमाण है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा कहना युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि वह अतिशय ज्ञानों का आकार है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - अतिशय ज्ञान अन्यत्र भी देखे जाते हैं? अतएव अर्हत् आगम को ही ज्ञान का आकार कहना उपयुक्त नहीं है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - अन्यत्र देखे जानेवाले अतिशय ज्ञानों का मूल उद्भव स्थान आर्हत प्रवचन ही है। कहा भी है कि `यह अच्छी तरह निश्चित है कि अन्य मतों में जो युक्तिवाद और अच्छी बातें चमकती हैं वे तुम्हारी ही हैं। वे चतुर्दश पूर्व रूपी महासागर से निकली हुई जिनवाक्य रूपी बिंदुएँ हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह सर्व बातें केवल श्रद्धान मात्र गम्य हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - श्रद्धा मात्र गम्य नहीं अपितु युक्ति सिद्ध हैं जैसे गाँव, नगर या बाजारों में कुछ रत्न देखे जाते हैं फिर भी उनकी उत्पत्ति का स्थान रत्नाकर समुद्र ही माना जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि वे व्याकरण आदि अर्हत्प्रवचन से निकले हैं तो उनकी तरह प्रमाण भी होने चाहिए?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि वे निस्सार हैं। जैसे नकली रत्न क्षार और सीप आदि भी रत्नाकर से उत्पन्न होते हैं परंतु निःसार होने से त्याज्य हैं। उसी तरह जिनशासन समुद्र से निकले वेदादि निःसार होने से प्रमाण नहीं हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 6/27/5/532 अतिशयज्ञानदृष्टत्वात्, भगवतामर्हतामतिशयवज्ज्ञानं युगपत्सर्वार्थावभासनसमर्थं प्रत्यक्षम्, तेन दृष्टं तद्दृष्टं यच्छास्त्रं तद् यथार्थोपदेशकम्, अतस्तत्प्रमाण्याद् ज्ञानावरणाद्यास्रवनियमप्रसिद्धिः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शास्त्र अतिशय ज्ञानवाले युगपत् सर्वावभासन समर्थ प्रत्यक्षज्ञानी केवली के द्वारा प्रतीत है, अतः प्रमाण है। इसलिए शास्त्र में वर्णित ज्ञानावरणादिक के आस्रव के कारण आगमानुगृहीत है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गोम्मट्टसार जीवकांड / जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 196/438/1 किं बहुना सर्वतत्त्वानां प्रवक्तरिपुरुषे आप्ते सिद्धेसति तद्वाक्यस्यागमस्य सूक्ष्मांतरितदूरार्थेषु प्रामाण्यसुप्रसिद्धेः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बहुत कहने करि कहा? सर्व तत्त्वनिका वक्ता पुरुष जो है आप्तता की सिद्धि होतै तिस आप्त के वचन रूप जो आगम ताकी सूक्ष्म अंतरित दूरी पदार्थनिविषैं प्रमाणता की सिद्धि हो है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 6/27/527 अर्हंत सर्वज्ञ...के वचन प्रमाणभूत हैं...स्वभाव विषै तर्क नाहीं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;वीतराग द्वारा प्रणीत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,22/196/5 विगताशेषदोषावरणत्वात् प्राप्ताशेषवस्तुविषयबोधस्तस्य व्याख्यातेति प्रतिपत्तव्यम् अन्यथास्यापौरुषेयत्वस्यापि पौरुषेयवदप्रामाण्यप्रसंगात्&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसने संपूर्ण भावकर्म व द्रव्यकर्म को दूर कर देने से संपूर्ण वस्तु विषयक ज्ञान को प्राप्त कर लिया है वही आगम का व्याख्याता हो सकता है। ऐसा समझना चाहिए। अन्यथा पौरुषेयत्व रहित इस आगम को भी पौरुषेय आगम के समान अप्रमाणता का प्रसंग आ जायेगा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,2/10-11/12 आगमो ह्याप्तवचनमाप्तं दोषक्षयं विदुः। त्यक्तदोषोऽनृतं वाक्यं न ब्रूयाद्धेत्वसंभवात् ॥10॥ रागाद्वा द्वेषादा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्युनृतम्। यस्य तु नैते दोषास्तस्यनृतकारणं नास्ति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आप्त के वचन को आगम जानना चाहिए और जिसने जन्म जरादि अठारह दोषों का नाश कर दिया है उसे आप्त जानना चाहिए। इस प्रकार जो त्यक्त दोष होता है, वह असत्य वचन नहीं बोलता है, क्योंकि उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण ही संभव नहीं है ॥10॥ राग से, द्वेष से, अथवा मोह से असत्य वचन बोला जाता है, परंतु जिसके ये रागादि दोष नहीं हैं उसके असत्य वचन बोलने का कोई कारण भी नहीं पाया जाता है ॥10॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 10/4,2,460/280/2)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 10/5,5,121/382/1 पमाणत्तं कुदो णव्वदे। रागदोषमोहभावेण पमाणीभूदपुरिसपरंपराए आगमत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सूत्र की प्रमाणता कैसे जानी जाती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - राग, द्वेष और मोह का अभाव हो जाने से प्रमाणीभूत पुरुष परंपरा से प्राप्त होने के कारण उसकी प्रमाणता जानी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 17/237/9 तदेवमाप्तेन सर्वविदा प्रणीत आगमः प्रमाणमेव। तदप्रामाण्यं हि प्रमाणयकदोषनिबंधनम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सर्वज्ञ आप्त-द्वारा बनाया आगम ही प्रमाण है। जिस आगम का बनाने वाला सदोष होता है, वही आगम अप्रमाण होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अनगार धर्मामृत अधिकार 2/20 जिनोक्ते वा कुतो हेतुबाधगंधोऽपि शंक्यते। रागादिना विना को हि करोति वितथं वचः ॥20॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कौन पुरुष होगा जो कि रागद्वेष के बिना वितथ मिथ्या वचन बोले। अतएव वीतराग के वचनों मे अंश मात्र भी बाधा की संभावना किस तरह हो सकती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.6&amp;quot;&amp;gt;गणधरादि आचार्यों-द्वारा कथित होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$119/153 णेदाओ गाहाओ सुत्तं गणहरपत्तेयबुद्ध-सुदकेवलि-अभिण्णदसपुव्वीसु गुणहरभडारयस्स अभावादो; ण; णिद्दोसपक्खरसहेउपमाणेहि सुत्तेण सरिसत्तमत्थि त्ति गुणहराइरियगाहाणं पि सुत्तत्तुवलंभावादो..एदं सव्वं पि सुत्तलक्खणं जिणवयणकमलविणिग्गयअत्थपदाणं चेव संभवइ ण गणहरमुहविणिग्गयगंथरयणाए, ण सच्च (सुत्त) सारिच्छमस्सिदूण तत्थ वि सुत्तत्तं पडि विरोहाभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - (कषाय प्राभृत संबंधी) एक सौ अस्सी गाथाएँ सूत्र नहीं हो सकती है, क्योंकि गुणधर भट्टारक न गणधर हैं, न प्रत्येक बुद्ध हैं, न श्रुतकेवली हैं, और न अभिन्न दशपूर्वी ही हैं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि गुणधर भट्टाकर की गाथाएं निर्दोष हैं, अल्प अक्षरवाली हैं, सहेतुक हैं, अतः वे सूत्र के समान हैं, इसलिए गुणधर आचार्य की गाथाओं में सूत्रत्व पाया जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह संपूर्ण सूत्र लक्षण तो जिनदेव के मुखकमल से निकले हुए अर्थ पदों में ही संभव हैं, गणधर के मुख से निकली ग्रंथ रचना में नहीं?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि गणधर के वचन भी सूत्रके समान होते हैं। इसलिए उनके वचनों मे सूत्रत्व होनेके प्रति विरोध का अभाव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.7&amp;quot;&amp;gt;प्रत्यक्ष ज्ञानियों के द्वारा प्रणीत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 8/26/405 व्याख्यातो सप्रपंचः बंधपदार्थः। अविधमनःपर्ययकेवलज्ञानप्रत्यक्षप्रमाणगम्यस्तदुपदिष्टागमानुमेयः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इस प्रकार विस्तार के साथ बंध पदार्थ का व्याख्यान किया। यह अवधिज्ञान, मनःपर्यय ज्ञान और केवलज्ञान रूप प्रत्यय-प्रमाण-गम्य है, और इन ज्ञान वाले जीवों के द्वारा उपदिष्ट आगम से अनुमेय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.8&amp;quot;&amp;gt;आचार्य परंपरा से आगत होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,121/382/1 पमाणत्तं कुदो णव्वदे।..पमाणीभूदपुरिसपरंपराए आगमदत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - सूत्र में प्रमाणता कैसे जानी जाती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - प्रमाणीभूत पुरुष परंपरा से प्राप्त होने के कारण उसकी प्रमाणता जानी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.9&amp;quot;&amp;gt;समन्वयात्मक होनेके कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$63/82/2 तं च उवदेसं लहिय वत्तव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उपदेश ग्रहण करके अर्थ कहना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/222/4 दोण्हं वयणाणं मज्झे कं वयणं सच्चमिदि चे सुदकेलवी केवली वा जाणादि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों प्रकार के वचनों में-से किसको सत्य माना जाये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - इस बात को केवली या श्रुतकेवली ही जान सकते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 1/1,1,37/262/1) ( धवला पुस्तक 7/2/11,75/540/4)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,71/333/3 दोण्हं सुत्ताणं विरोहे संतेत्थप्पावलंबणस्स णाइयत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= दो सूत्रों के मध्य विरोध होने पर चुप्पी का अवलंबन करना ही न्याय है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 9/4,1,44/126/4), ( धवला पुस्तक 14/5,6,116/151/5)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 14/5,6,116/11 सच्चमेदमेक्केणेव होदव्वमिदि, किंतु अणेणेव होदव्वमिदि ण वट्टमाणकाले णिच्छओ कादुं सक्किज्जदे, जिण-गणहरपत्तेयबुद्ध-पण्णसमण-सुदकेवलिआदीणमभावादो॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यह सत्य है कि इन दोनों में-से कोई एक अल्पबहुत्व होना चाहिए किंतु यही अल्पबहुत्व होना चाहिए इसका वर्तमान काल में निश्चय करना शक्य नहीं है, क्योंकि इस समय जिन, गणधर, प्रत्येकबुद्ध, प्रज्ञाश्रमण, और श्रुतकेवलो आदिका अभाव है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / गोम्मट्टसार जीवकांड जीव तत्त्व प्रदीपिका| जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 288/616/2-4) (और भी देखें [[ आगम#3.9 | आगम - 3.9]])&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.10&amp;quot;&amp;gt;विचित्र द्रव्यों आदि का प्ररूपक होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 235 आगमेन तावत्सर्वाण्यपि द्रव्याणि प्रमीयंते..विचित्र गुणपर्यायविशिष्टानि च प्रतीयंते, सहक्रमप्रवृत्तानेकधर्मव्यापकानेकांतमयत्वेनैवागमस्य प्रमात्वोपपत्तेः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम-द्वारा सभी द्रव्य प्रमेय (ज्ञेय) होते हैं। आगम से वे द्रव्य विचित्र गुण पर्यायवाले प्रतीत होते हैं. क्योंकि आगम को सहप्रवृत्त और क्रमप्रवृत्त अनेक धर्मों के व्यापक अनेकांतमय होने से प्रमाणता की उपपत्ति है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.11&amp;quot;&amp;gt;पूर्वापर अविरोधी होनेके कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री पृ. 62 (निर्णय सागर बंबई) `अविरोधश्च यस्मादिष्टं (प्रयोजनभूतं) मोक्षादिकं तत्त्वं ते प्रसिद्धेन प्रमाणेन न बाध्यते। तथा हि यत्र यस्याभिमतं तत्त्वं प्रमाणेन न बाध्यते स तत्र युक्तिशास्त्राविरोधी वाक्...।”&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इष्ट अर्थात् प्रयोजनभूत मोक्ष आदित्तत्त्व किसी भी प्रसिद्ध प्रमाण से बाधित न होने के कारण अविरोधी हैं। जहाँ पर जिसका अभिमत प्रमाण से बाधित नहीं होता, वह वहाँ युक्ति और शास्त्र से अविरोधी वचन वाला होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अनगार धर्मामृत अधिकार 2/18/133 दृष्टेऽर्थेऽध्यक्षतो वाक्यमनुमेयेऽनुमानतः। पूर्वापरा, विरोधेन परोक्षे च प्रमाण्यताम् ॥18॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम में तीन प्रकार के पदार्थ बताये हैं - दृष्ट, अनुमेय और परोक्ष। इनमें-से जिस तरह के पदार्थ को बताने के लिए आगम में जो वाक्य आया हो उसको उसी तरह से प्रमाण करना चाहिए। यदि दृष्ट विषय में आया हो तो प्रत्यक्ष से और अनुमेय विषय में आया हो तो अनुमान से तथा परोक्ष विषय में आया हो तो पूर्वापर का अविरोध देखकर प्रमाणित करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$30/44/4 कथं णामसण्णिदाण पदवक्काणं पमाणत्तं। ण, तेसु विसंवादाणुवलंभादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - नाम शब्द से बोधित होने वाले पद और वाक्यों को प्रमाणता कैसे?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, इन पदों में विसंवाद नहीं पाया जाता, इसलिए वे प्रमाण हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.12&amp;quot;&amp;gt;युक्ति से बाधित नहीं होने के कारण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री.पृ.62 ( निर्णय सागर बंबई) “यत्र यस्याभिमतं तत्त्वं प्रमाणेन न बाध्यते स तत्र युक्तिशास्त्राविरोधिवाक्।”&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जहाँ जिसका अभिमत तत्त्व प्रमाण से बाधित नहीं होता, वहाँ वह युक्ति और शास्त्र से अविरोधी वचन वाला है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तिलोयपण्णत्ति अधिकार 7/613/766/3 तदो ण एत्थ इदमित्थमेवेति एयंतपरिग्गहेण असग्गाहो कायव्वो, परमगुरुपरंपरागउवएसस्स जुत्तिबलेण विहडावेदुमसक्कियत्तादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= `यह ऐसा ही है' इस प्रकार एकांत कदाग्रह नहीं करना चाहिए, क्योंकि गुरु पंरपरासे आये उपदेश को युक्ति के बल से विघटित नहीं किया जा सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1,56/98/10 आगमपमाणेण होदु णाम दंसणस्स अत्थित्तं ण जुत्तीए चे। ण, जुत्तोहि आगमस्स बाहाभावादो आगमेण वि जच्चा जुत्ती ण बाहिज्जदि ति चे। सच्चं ण बाहिज्जदि जच्चा जुत्ती, किंतु इमा बहाहिज्जदि जच्चात्ताभावादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आगम प्रमाण से भले दर्शन का अस्तित्व हो, किंतु युक्ति से तो दर्शन का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - होता है, क्योंकि युक्तियों से आगम की बाधा नहीं होती।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आगम से भी तो जात्य अर्थात् उत्तम युक्ति की बाधा नहीं होनी चाहिए?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - सचमुच ही आगम से युक्ति की बाधा नहीं होती, किंतु प्रस्तुत युक्ति की बाधा अवश्य होती है, क्योंकि वह उत्तम युक्ति नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 12/4,2,13,55/399/13 ण च जुत्तिविरुद्धत्तादो ण सुत्तमेदमिदिवोत्तुं सकिज्जदे, सुत्तविरुद्धाए जुत्तित्ताभावादो। ण च अप्पमाणेण पमाणं बाहिज्जदे, विरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - युक्ति विरुद्ध होने से यह सूत्र ही नहीं है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा कहना शक्य नहीं है। क्योंकि जो युक्ति सूत्र के विरुद्ध हो वह वास्तव में युक्ति ही संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त अप्रमाण के द्वारा प्रमाण को बाधा नहीं पहुँचायी जा सकती क्योंकि वैसा होने में विरोध है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार जीवकांड / गोम्मट्टसार जीवकांड जीव तत्त्व प्रदीपिका| जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 196/436/15) &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 12/4,2,14,38/494/15 ण च सुत्तपडिकूलं वक्खाणं होदि, वक्खाणाभासहत्तादो। ण च जुत्तीए सुत्तस्स बाहा संभवदि, संयलबाहादीदस्स सुत्तववएसादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र के प्रतिकूल व्याख्यान होता नहीं है। क्योंकि वह व्याख्यानाभास कहा जाता है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि कहा जाय कि युक्ति से सूत्र को बाधा पहुँचायी जा सकती है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - सो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि जो समस्त बाधाओँ से रहित है उसकी सूत्र संज्ञा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 14/5,6,552/459/10)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;5.13&amp;quot;&amp;gt;प्रथमानुपयोग की प्रमाणिकता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;नोट- भगवती आराधना मूलमें स्थल-स्थल पर अनेकों कथानक दृष्टांत रूप में दिये गये हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि प्रथमानुयोग जो बहुत पीछे से लिपिबद्ध हुआ वह पहले से आचार्यों को ज्ञात था।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;आगम की प्रमाणिकता के हेतुओं संबंधी शंका समाधान&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.1&amp;quot;&amp;gt;अर्वाचीन पुरुषों-द्वारा लिखित आगम प्रमाणिक कैसे हो सकते हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,22/197/1 अप्रमाणमिदानींतनः आगमः आरातीयपुरुषव्याख्यातार्थत्वादिति चेन्न, ऐदंयुगीनज्ञानविज्ञानसंपन्नतया प्राप्तप्रामाण्यराचार्यैर्व्याख्यातार्थत्वात्। कथं छद्मस्थानां सत्यवादित्वमिति चेन्न, यथाश्रुतव्याख्यातृणां तदविरोधात्। प्रमाणीभूतगुरुपर्वक्रमेणायातोऽयमर्थ इति कथमवसीयत इति चेन्न, दृष्टिविषये सर्वत्राविसंवादात्। अदृष्टविषयेऽप्यविसंवादिनागमभावेनैकत्वे सति सुनिश्चितासंभवद्बाधकप्रमाणकत्वात्। ऐदंयुगीनज्ञानविज्ञानसंपन्नभूयसामाचार्याणामुपदेशाद्वा तदवगतेः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आधुनिक आगम अप्रमाण है, क्योंकि अर्वाचीन पुरुषों ने इसके व्याख्यान का अर्थ किया है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस काल संबंधी ज्ञान-विज्ञान से युक्त होने के कारण प्रमाणता को प्राप्त आचार्यों के द्वारा इसके अर्थ का व्याख्यान किया गया है, इसलिए आधुनिक आगम भी प्रमाण है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - छद्मस्थों के सत्यवादीपना कैसे माना जा सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि श्रुत के अनुसार व्याख्यान करने वाले आचार्यों के प्रमाणता मानने में विरोध नहीं है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - आगम का विवक्षित अर्थ प्रामाणिक गुरुपरंपरा से प्राप्त हुआ है वह कैसे निश्चित किया जाये?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षभूत विषय में तो सब जगह विसंवाद उत्पन्न नहीं होने से निश्चय किया जा सकता है। और परोक्ष विषय में भी, जिसमें परोक्ष विषय का वर्णन किया गया है। वह भाग अविसंवादी आगम के दूसरे भागों के साथ आगम की अपेक्षा एकता को प्राप्त होने पर अनुमानादि प्रमाणों के द्वारा बाधक प्रमाणों का अभाव सुनिश्चित होने से उसका निश्चय किया जा सकता है। अथवा आधुनिक ज्ञान विज्ञान से युक्त आचार्यों के उपदेश से उसकी प्रामाणिकता जाननी चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$64/82 जिणउवदिट्ठतासो होदु दव्वागमो पमाणं, किंतु अप्पमाणीभूदपुरिसपव्वोलोकमेण आगयत्तादो अप्पमाणं वट्टमाणकालदव्वागमो, त्ति ण पच्चबट्ठादुं जुत्तं; राग-द्वेष-भयादीदआयरियपव्वोलीकमेण आगयस्स अपमाणत्तविरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - जिनेंद्रदेव के द्वारा उपदिष्ट होने से द्रव्यागम प्रमाण होओ, किंतु वह अप्रमाणीभूत पुरुष परंपरा से आया हुआ है...अतएव वर्तमान कालीन द्रव्यागम में अप्रमाण है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि द्रव्यागम राग, द्वेष और भय से रहित आचार्य परंपरा से आया हुआ है, इसलिए उसे अप्रमाण मानने में विरोध आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.2&amp;quot;&amp;gt;पूर्वापर विरोध होते हुए भी प्रामाणिक कैसे है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/221/4 दोण्हं वयणाणं मज्झे एक्कमेवसुत्तं होदि, तदो जिणा ण अण्णहा वाइयो, तदो तव्वयणाणं विप्पडिसेहो इदि चे सच्चमेयं, किंतु ण तव्वयणाणि एयाइं आइल्लु आइरिय-वयाणाइं, तदो एयाणं विरोहस्सत्थि संभवो इदि।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों प्रकार के वचनों में-से कोई एक ही सूत्र रूप हो सकता है? क्योंकि जिन अन्यथावादी नहीं होते, अतः इनके वचनों में विरोध नहीं होना चाहिए?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कहना सत्य है कि वचनों में विरोध नहीं होना चाहिए। परंतु ये जिनेंद्र देव के वचन न होकर उनके पश्चात् आचार्यों के वचन हैं, इसलिए उनमें विरोध होना संभव है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 8/2,28/56/10 कसायपाहुडसुत्तेणेदं सुत्तं विरुज्झदि त्ति वुत्ते सच्चं विरुज्झई ...कधं सुत्ताणं विरोहो। ण, सुत्तोवसंहारणमसयलसुदधारयाइरियपरतंताणं विरोहसंभवदंसणादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - कषायप्राभृत के सूत्र से तो यह सूत्र विरोध का प्राप्त होता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ...सचमुच में यह सूत्र कषायप्राभृत के सूत्र से विरुद्ध है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - ...सूत्र में विरोध कैसे आ सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - अल्प श्रुतज्ञान के धारक आचार्यों के परतंत्र सूत्र व उपसंहारों के विरोध की संभावना देखी जाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/221/7 कथ सुत्तत्तणमिदि। आइरियपरंपराए णिरंतरमागयाणं...बुद्धिसु ओहट्टंतीसु ...वज्जभीरुहि गहिदत्थेहि आइरिएहि पोत्थएसु चडावियाणं असुत्तत्तण-विरोहादो। जदि एवं, तो एयाणं पि वयणाणं तदवयत्तादो सुत्तत्तणं पावदि त्त चे भवदु दोण्हं मज्झे एक्कस्स सुत्तत्तणं, ण दोण्हं पि परोप्पर-विरोहादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - तो फिर (उन विरोधि वचनों को) ...सूत्रपना कैसे प्राप्त होता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - आचार्य परंपरा से निरंतर चले आ रहे (सूत्रोंको) ...बुद्धि क्षीण होनेपर...पाप भीरु (तथा) जिन्होंने गुरु परंपरा से श्रुतार्थ ग्रहण किया था, उन आचार्यो ने तीर्थं व्युच्छेद के भय से उस समय अवशिष्ट रहे हुए...अर्थ को पोथियों में लिपिबद्ध किया, अतएव उनमें असूत्रपना नहीं आ सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 13/5,5,120/381/5)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यदि ऐसा है तो दोनों ही वचनों को द्वादशांग का अवयव होने से सूत्रपना प्राप्त हो जायेगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - दोनों में से किसी एक वचन को सूत्रपना भले ही प्राप्त होओ, किंतु दोनों को सूत्रपना प्राप्त नहीं हो सकता है, क्योंकि उन दोनों वचनों मे परस्पर विरोध पाया जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 1/1,1,36/261/1)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,120/381/7 विरुद्धाणं दोण्णमत्थाणं कधं सुत्तं होदि त्ति वुत्ते-सच्चं, जं सुत्तं तमविरुद्धत्थपरूपयं चेव। किंतु णेदं सुत्तं सुत्तमिव सुत्तमिदि एदस्स उवयारेण सुत्तत्तब्भुवगमोदो। किं पुण सुत्तं। गणहर...पत्तेयबुद्ध-सुदकेवलि..अभिण्णदसपुव्विकहियं ॥34॥ ण च भूदबलिभडारओ गणहरो पत्तेयबुद्धो सुदकेवली अभिण्णदसपुव्वी वा जेणेदं सुत्तं होज्ज।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - विरुद्ध दो अर्थों का कथन करने वाला सूत्र कैसे हो सकता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - यह कहना सत्य है, क्योंकि जो सूत्र है वह अविरुद्ध अर्थ का ही प्ररूपण करने वाला होता है। किंतु यह सूत्र नहीं है, क्योंकि सूत्र के समान जो होता है वह सूत्र कहलाता है, इस प्रकार इसमें उपचार से सूत्रपना स्वीकार किया गया है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - तो फिर सूत्र क्या है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - जिसका गणधर देवों ने, प्रत्येकबुद्धों ने ...श्रुतकेवलियों ने...तथा अभिन्नदशपूर्वियों ने कथन किया वह सूत्र है। परंतु भूतबली भट्टारक न गणधर हैं, न प्रत्येक बुद्ध हैं, न श्रुतकेवली हैं, न अभिन्नदशपूर्वी ही हैं; जिससे कि यह सूत्र हो सके।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 3/3-22/$513/292/1 पुव्विल्लवक्खाणं ण भद्दयं, सुत्तविरुद्धत्तादो। ण, वक्खाणभेदसंदरिसणट्ठं तप्पवुत्तीदो पडिवक्खणयणिरायरणमुहेण पउत्तणओ ण भद्दओ। ण च एत्थ पडिवक्खणिरायणमत्थि तम्हा वे वि णिरवज्जे त्ति घेत्तव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - पूर्वोक्त व्याख्यान समीचीन नहीं हैं? क्योंकि वे सूत्र विरुद्ध हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं क्योंकि व्याख्यान भेद के दिखलाने के लिए पूर्वोक्त व्याख्यान की प्रवृत्ति हुई है। जो नय प्रतिपक्ष नय के निराकरण में प्रवृत्ति करता है, वह समीचीन नहीं होता है। परंतु यहाँ पर प्रतिपक्ष नय का निराकरण नहीं किया गया है, अतः दोनों उपदेश निर्दोष हैं ऐसा प्रकृत में ग्रहण करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.3&amp;quot;&amp;gt;आगम व स्वभाव तर्क के विषय ही नहीं है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,25/206/6 आगमस्यातर्कगोचरत्वात्&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम तर्क का विषय नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 4/14/5,6,116/151/8)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,24/204/3 प्रतिज्ञावाक्यत्वाद्धेतुप्रयोगः कर्तव्यः प्रतिज्ञामात्रतः साध्यसिद्ध्यनुपपत्तिरिति चेन्नेदं प्रतिज्ञावाक्यं प्रमाणत्वात्, ण हि प्रमाणांतरमपेक्षतेऽनवस्थापत्तेः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - (`नरक गति है') इत्यादि प्रतिज्ञा वाक्य होने से इनके अस्तित्व की सिद्धि के लिए हेतु का प्रयोग करना चाहिए, `क्योंकि केवल प्रतिज्ञा वाक्य से साध्य की सिद्धि नहीं हो सकती?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि, (`नरकगति हैं' इत्यादि) वचन प्रतिज्ञा वाक्य न होकर प्रमाण वाक्य है। जो स्वयं प्रमाण स्वरूप होते हैं वे दूसरे प्रमाण की अपेक्षा नहीं करते हैं। यदि स्वयं प्रमाण होते हुए भी दूसरे प्रमाणों की अपेक्षा की जावे तो अनवस्था दोष आता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,41/271/3 ते तादृक्षाः संतीति कथमवगम्यत इति, चेन्न, आगमस्यातर्कगोचरत्वात्। न हि प्रमाणप्रकाशितार्थावगतिः प्रमाणांतरप्रकारमपेक्षते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - साधारण जीव उक्त लक्षण (अभी तक जिन्होंने त्रस पर्याय नहीं प्राप्त की) होते हैं यह कैसे जाना जाता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि आगम तर्क का विषय नहीं है। एक प्रमाण से प्रकाशित अर्थज्ञान दूसरे प्रमाण के प्रकाश की अपेक्षा नही करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 6/1,9-6,6/151/1 आगमो हि णाम केवलणाणपुरस्सरो पाएण अणिंदियत्थविसओ अचिंतियसहाओ जुत्तिगोयरादीदि।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो केवलज्ञान पूर्वक उत्पन्न हुआ है, प्रायः अतींद्रिय पदार्थों को विषय करनेवाला है, अचिंत्य स्वभावी है और युक्ति के विषय से परे हैं, उसका नाम आगम है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.4&amp;quot;&amp;gt;छद्मस्थों का ज्ञान प्रमाणिकता का माप नहीं है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तिलोयपण्णत्ति अधिकार 7/613/पृ.766/पं.4 अदिंदिएसु पदत्थेसु छदुमत्थवियप्पाणभविसंवादणियमाभावादो। तम्हा पुव्वाइरियवक्खाणापरिच्चाएण एसा वि दिसा हेदुवादाणुसारिवियुपण्णसिस्साणुग्गहण-अवुप्पण्णजणउप्पायणट्ठं चदरिसेदव्वा। तदो ण एत्थ संपदायविरोधो कायव्वो त्ति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अतिंद्रिय पदार्थों के विषय  में अल्पज्ञों के द्वारा किये गये विकल्पों के विरोध न होने का कोई नियम भी नहीं है। इसलिए पूर्वाचार्यों के व्याख्यान का परित्याग न कर हेतुवाद का अनुसरण करनेवाले अव्युत्पन्न शिष्यों के अनुग्रह और अव्युत्पन्न जनों के व्युत्पादन के लिए इस दिशा का दिखलाना योग्य ही है, अतएव यहाँ संप्रदाय विरोध की भी आशंका नहीं करनी चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,137/389/2 न च केवलज्ञानविषयीकृतेष्वर्थेषु सकलेष्वपि रजोजुषां ज्ञानानि प्रवर्त्तंते येनानुपलंभाज्जिनवचसस्याप्रमाणत्वमुच्येत।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= केवलज्ञान के द्वारा विषय किये गये सभी अर्थों में छद्मस्थों के ज्ञान प्रवृत्त भी नहीं होते हैं। इसलिए यदि छद्मस्थों को कोई अर्थ नहीं उपलब्ध होते हैं तो जिनवचनों को अप्रमाण नहीं कहा जा सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 15/317/9 सयलसुदविसयावगमें पयडिजीवभेदेण णाणाभेदभिण्णे असंते एदं ण होदि त्ति वोत्तुमसक्कियत्तादो। तम्हा सुत्ताणुसारिणा सुत्ताविरुद्धवक्खाणमवलंबेयव्वं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= समस्त श्रुतविषयक ज्ञान होने पर तथा प्रकृति एवं जीव के भेद से नाना रूप भेद के न होने पर यह नहीं हो सकता `ऐसा कहना शक्य नहीं है। इस कारण सूत्र का अनुसरण करने वाले प्राणी को सूत्र से अविरुद्ध व्याख्यान का अवलंबन करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पद्मनंदि पंचविंशतिका अधिकार 1/125 यः कल्पयेत् किमपि सर्वविदोऽपि वाचि संदिह्य तत्त्वमसमंजसमात्मबुद्ध्या। खे पत्रिणां विचरतां सदृशेक्षितानां संख्यां प्रति प्रविदधाति स वादमंधः ॥125॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो सर्वज्ञ के भी वचनों में संदिग्ध होकर अपनी बुद्धि से तत्त्व के विषय में भी कुछ कल्पना करता है, वह अज्ञानी पुरुष निर्मल नेत्रों वाले व्यक्ति के द्वारा देखे गये आकाश में विचरते हुए पक्षियों की संख्या के विषय में विवाद करने वाले अंधे के समान आचरण करता है ॥125॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( पद्मनंदि पंचविंशतिका अधिकार 13/34)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.5&amp;quot;&amp;gt;आगम में भूल सुधार व्याकरण व सूक्ष्म विषयो में करनेको कहा है प्रयोजनभूत तत्त्वो में नहीं &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नियमसार / मूल या टीका गाथा .187 णियभावणाणिमित्तं मए कदं णियमसारणाम् सुदं। णच्चा जिणोवदेसं पुव्वावरदोष विम्मुक्कं ॥187॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पूर्वापर दोष रहित जिनोपदेश को जानकर मैंने निज भावना के निमित्त से नियमसार नाम का शास्त्र किया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नियमसार / मूल या टीका गाथा 187/क.310 अस्मिन् लक्षणशास्त्रस्य विरुद्धं पदमस्ति चेत्। लुप्त्वा तत्कवयो भद्राः कुर्वंतु पदमुत्तमम् ॥310॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इसमें यदि कोई पद लक्षण शास्त्र से विरुद्ध हो तो भद्र कवि उसका लोप करके उत्तम पद कहना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 3/1,2,5/38/2 अइंदियत्थविसए छदुवेत्थवियप्पिदजुत्तीणं णिण्णयहेयत्ताणुववत्तादो। तम्हा उवएसं लद्धूण विसेसणिण्णयो एत्थ कायव्वो त्ति। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अतींद्रिय पदार्थों के विषय में छद्मस्थ जीवों के द्वारा कल्पित युक्तियों के विकल्प रहित निर्णय के लिए हेतुता नहीं पायी जाती है। इसलिए उपदेश को प्राप्त करके इस विषय में निर्णय करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश 2/214/316/2  &amp;lt;/span&amp;gt;लिंगवचनक्रियाकारकसंधिसमासविशेष्यविशेषणवाक्यसमाप्त्यादिकं दूषणमत्र न ग्राह्यं विद्वद्भिरिति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= लिंग, वचन, क्रिया, कारण, संधि, विशेष्य विशेषण के दोष विद्वद्जन ग्रहण न करें।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;वसुनंदि श्रावकाचार गाथा 545 जं किं पि एत्थ भणियं अयाणमाणेण पवयणविरुद्धं। खमिऊण पवयणधरा सोहित्ता तं पयासंतु ॥545॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अजानकार होने से जो कुछ भी इसमें प्रवचन विरुद्ध कहा गया हो, सो प्रवचन के धारक (जानकार) आचार्य मुझे क्षमा करें और शोध कर प्रकाशित करें।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.6&amp;quot;&amp;gt;पौरुषेय होने के कारण अप्रमाण नहीं कहा जा सकता&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 1/20/7/71/32 ततश्च पुरुषकृतित्वादप्रामाण्यं स्याद्।...न चापुरुषकृतित्वं प्रमाण्यकारणम्; चौर्याद्युपदेशस्यास्मर्यमाणकर्तृकस्य प्रामाण्यप्रसंगात्। अनित्यस्य च प्रत्यक्षादेः प्रामाण्ये को विरोधः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - पुरुषकृत होने के कारण श्रुत अप्रमाण होगा?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - अपौरुषैयता प्रमाणता का कारण नहीं है। अन्यथा चोरी आदि के उपदेश भी प्रमाण हो जायेंगे क्योंकि इनका कोई आदि प्रणेता ज्ञात नहीं है। त्यक्ष आदि प्रमाण अनित्य हैं पर इससे उनकी प्रमाणता में कोई कसर नहीं आती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.7&amp;quot;&amp;gt;आगम कथंचित् अपौरुषेय तथा नित्य है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,5,50/286/2 अभूत इति भूतम्, भवनीति भव्यम्, भविष्यतीति भविष्यत्, अतीतानागत-वर्तमानकालेष्यस्तीत्यर्थः। एवं सत्यागम्यस्य नित्यत्वम्। सत्येवमागमस्यापौरुषेयत्वं प्रसजतीति चेत्-न, वाच्य-वाचकभावेनवर्ण-पद-पंक्तिभिश्च प्रवाहरूपेण चापौरुषेयत्वाभ्युपगमात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगम अतीत काल में था इसलिए उसकी भूत संज्ञा है, वर्तमान काल में है इसलिए उसकी भव्य संज्ञा है और भविष्यत् काल मे रहेगा इसलिए उसकी भविष्य संज्ञा है और आगम अतीत, अनागत और वर्तमान काल में है, यह उक्त कथन का तात्पर्य है। इस प्रकार वह आगम नित्य है।  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - ऐसा होने पर आगम को अपौरुषेयता का प्रसंग आता है।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि वाच्य वाचक भाव से तथा वर्ण, पद व पंक्तियों के द्वारा प्रवाह रूप से आने के कारण आगम को अपौरुषेय स्वीकार किया गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचाध्यायी / श्लोक 736 वेदाः प्रमाणमत्र तु हेतुः केवलमपौरुषेयत्वम्। आगम गोचरतया हेतोरन्याश्रितादहेतुरत्वम् ॥736॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वेद प्रमाण है यहाँ पर केवल अपौरुषेयपना हेतु है, किंतु अपौरुषेय रूप हेतु को आगम गोचर होने से अन्याश्रित है इस लिए वह समीचीन हेतु नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;6.8&amp;quot;&amp;gt;आगमको प्रमाण मानने का प्रयोजन &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; आप्तमीमांसा श्लोक 2/पृ.9 प्रयोजन विशेष होय तहाँ प्रमाण संप्लव इष्ट है। पहले प्रमाण सिद्ध प्रामाण्य आगम तैं सिद्ध भया तौऊ तथा हेतुकू प्रत्यक्ष देखि अनुमान तैं सिद्धि करैं पीछैं ताकूं प्रत्यक्ष जाणैं तहाँ प्रयोजन विशेष होय है, ऐसैं प्रमाण संप्लव होय है। केवल आगम ही तैं तथा आगमाश्रित हेतुजनित अनुमान तैं प्रमाण कहि काहै कं प्रमाण संप्लव कहनां।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class='HindiText'&amp;gt;&amp;lt;b&amp;gt;सूत्र निर्देश&amp;lt;/b&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.1&amp;quot;&amp;gt;सूत्रका अर्थ द्रव्य व भाव श्रुत&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;1. द्रव्य श्रुत&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 34 श्रुतं हि, तावत्सूत्रं। तच्च भगवदर्हत्सर्वज्ञोपज्ञं स्यात्कारकेतनं पौद्गलिकं शब्दब्रह्म। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= श्रुत ही सूत्र है, और वह सूत्र भगवान् अर्हंत सर्वज्ञ के द्वारा स्वयं जानकर उपदिष्ट, स्यात्कार चिह्न युक्त पौद्गलिक शब्द ब्रह्म है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 8/74/6 सूत्रं तु सूचनाकारि ग्रंथे तंतुव्यवस्थयोः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र शब्द ग्रंथ, तंतु और व्यवस्था इन तीन अर्थों को सूचित करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;2. भाव श्रुत&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;समयसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 15/पृ.40 सूत्रं परिच्छित्तिरूपं भावश्रुत ज्ञानसमय इति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= परिच्छिति रूप भावश्रुत ज्ञान समय को सूत्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.2&amp;quot;&amp;gt;सूत्र का अर्थ श्रुतकेवली&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 14/5,6,12/8/6 सुत्तं सुदकेवली।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सूत्र का अर्थ श्रुतकेवली है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.3&amp;quot;&amp;gt;सूत्र का अर्थ अल्पाक्षर व महानार्थक&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 9/4,1,54/117/259 अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद् गूढनिर्णयम्। निर्दोषहेतुमत्तथ्यं सूत्रमित्युच्यते बुधैः ॥117॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो थोड़े अक्षरों से संयुक्त हो, संदेह से रहित हो, परमार्थ सहित हो, गूढ पदार्थों का निर्णय करने वाला हो, निर्दोष हो, युक्तियुक्त हो और यथार्थ हो, उसे पंडित जन सूत्र कहते हैं ॥117॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/68/154) (आवश्यक निर्युक्ति सू.886)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/73/171 अर्थस्य सूचनात्सभ्यक् सूतेर्वार्थस्य सूरिणा। सूत्रमुक्तमनल्पार्थं सूत्रकारेण तत्त्वतः ॥73॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो भले प्रकार अर्थ का सूचन करे, अथवा अर्थ को जन्म दे उस बहुअर्थ गर्भित रचना को सूत्रकार आचार्य ने निश्चय से सूत्र कहा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(वृ.कल्पभाष्य गा.314) (पाराशरोपपुराण अ.18), (मध्व भाष्य 1/11), (मुग्धबोध व्याकरण टीका), (न्यायवार्तिक तात्पर्य टी.1/1/12), (प्रमाणमीमांसा पृ.35) (कल्पभाष्य गा.285)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आवश्यकनिर्युक्ति सू.880 अल्पग्रंथमहत्त्वं द्वात्रिंशद्दोषविरहितं यं च। लक्षणयुक्तं सूत्रं अष्टेन च गुणेन उपमेयं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अल्प परिमाण हो, महत्त्वपूर्ण हो, बत्तीस दोषों से रहित हो, आठ गुणों से युक्त हो, वह सूत्र है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(अनुयोगद्वारसूत्र गा.सू.127), (बृहत्कल्पभाष्य/गा.277,282), (व्यावहारभाष्य 190)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.4&amp;quot;&amp;gt;वृत्तिसूत्र का लक्षण &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 2/2/$29/14/6 सुत्तस्सेव विवरणाए संखित्त सद्दरयणाए संगहियसुत्तसेसत्थाए वित्तिसुत्तववएसादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो सूत्र का ही व्याख्यान करता है, किंतु जिसकी शब्द रचना संक्षिप्त है, और जिसमें सूत्र के समस्त अर्थ को संगृहीत कर लिया गया है, उसे वृत्ति सूत्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.5&amp;quot;&amp;gt;जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित न हों वह सूत्र नहीं असूत्र है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$133/168/5 सूचिदाणेगत्था। अवरा असुत्तगाहा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित हों वह सूत्र गाथा है, और जिससे विपरीत अर्थ अर्थात् जिसके द्वारा अनेक अर्थ सूचित न हों वह असूत्र गाथा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.6&amp;quot;&amp;gt;सूत्र वहीं है जो गणधरादि के द्वारा कथित हो&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 34 सुत्तं गणधरगधिद तहेव पत्तेयबुद्धकहियं च। सुदकेवलिणा कहियं अभिण्णदसपुव्विगधिदं च ॥34॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= गणधर रचित आगम को सूत्र कहतै हैं। प्रत्येक बुद्धऋषियोंके द्वारा कहे गये आगम को भी सूत्र कहते हैं, श्रुतकेवली और अभिन्नदशपूर्व धारक आचार्यों के रचे हुआ आगम ग्रंथ को भी सूत्र कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 277) ( धवला पुस्तक 13/5,5,120/34/381), ( कषायपाहुड़ पुस्तक 1/67/153)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.6&amp;quot;&amp;gt;सूत्र तो जिनदेव कथित ही है परंतु गणधर कथित भी सूत्र के समान है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/1,15/$120/154 एदं सव्वं पि सुत्तलक्खणं जिणवयणकमलविणिग्गयअत्थपदाणं चेव संभवइ ण गणहरमुहविणिग्गयगंथरयणाए, तत्त्थ महापरिमाणत्तुवलंभादो; ण; सच्च (सुत्त-) सारिच्छमस्सिदूण।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह संपूर्ण सूत्र लक्षण तो जिनदेव के मुख कमल से निकले हुए अर्थ पदो में संभव है, गणधर के मुखकमल से निकली ग्रंथ रचना में नहीं, क्योंकि उनमें महापरिमाण पाया जाता है?  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि गणधर के वचन भी सूत्र के समान होते हैं। इसलिए उनकी रचना में भी सूत्रत्व के प्रति कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class='HindiText' id=&amp;quot;7.8&amp;quot;&amp;gt;प्रत्येक-बुद्ध कथित में भी कथंचित् सूत्रत्व पाया जाता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1/15/$119/153/6 णेदाओ गाहाओ सुत्तं गणहर पत्तेय-बुद्ध-सुदकेवलि-अभिण्णदसपुव्वीसु गुणहरभडारस्स अभावादो; ण; णिद्दोसपक्खरसहेउपताणेहि सुत्तेण सरिसत्तममत्थित्ति गुणहराइरियगाहाणं पि सुत्तत्तुवलंभादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;=  &amp;lt;b&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/b&amp;gt; - यह (कषाय पाहुड की 180) गाथाएँ सूत्र नहीं हो सकतीं, क्योंकि (इनके कर्ता) गुणधर भट्टारक न गणधर हैं, न प्रत्येक बुद्ध हैं, न श्रुतकेवली हैं, और न अभिन्नदशपूर्वी ही हैं।  &amp;lt;b&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/b&amp;gt; - नहीं, क्योंकि निर्दोषत्व, अल्पाक्षरत्व, और सहेतुकत्व रूप प्रमाणों के द्वारा गुणधर भट्टारक की गाथाओं की सूत्र संज्ञा के साथ समानता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p&amp;gt; सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित, समस्त प्राणियों का हितैषी, सर्व दोष रहित शास्त्र । इसमें नय तथा प्रमाणों द्वारा पदार्थ के द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भाव और चारों पुरुषार्थों का वर्णन किया गया है । यह प्रमाणपुरुषोदित रचना है । इसके मूलकर्ता तीर्थंकर महावीर और उत्तरकर्त्ता गौतम गणधर हैं । उनके पश्चात् अनेक आचार्य हुए जो प्रमाणभूत है । ऐसे आचार्यों में तीन केवली, पाँच चौदह पूर्वों के ज्ञाता (श्रुतकेवली) पाँच ग्यारह अगो के धारक, ग्यारह दसपूर्वों के जानकार और चार आचारांग के ज्ञाता इस प्रकार पांच प्रकार के मुनि हुए है । मुनियों के नाम है― तीन केवली, इंद्रभूति (गौतम) सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी, पांच श्रुतकेवली― विष्णु, नंदिमित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु, ग्यारह दसपूर्वधारी आचार्य-विशाख, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जय, नाग, सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजय, बुद्धिमान (बुद्धिल), गंगदेव और धर्मसेन, पाँच ग्यारह अंगधारी आचार्य-नक्षत्र, जयमाल (यशपाल), पांडु ध्रुवसेन और कंसाचार्य । चार आचारांग के ज्ञाता मुनि-सुभद्र, (यशोभद्र) भद्रबाहु, यशोबाहु और लोहाचार्य । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 2.137-149,9.121, 24.126, 67.191-192,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 1.55-65  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: आ]]  [[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3&amp;diff=106111</id>
		<title>अपूर्वकरण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3&amp;diff=106111"/>
		<updated>2022-12-15T11:59:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जीवों के परिणामों में क्रम पूर्वक विशुद्धि की वृद्धियों के स्थानों को गुणस्थान कहते हैं। मोक्षमार्ग में 14 गुणस्थानों का निर्देश किया गया है। तहाँ अपूर्वकरण नाम का आठवाँ गुणस्थान है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान के स्वामित्व संबंधी गुणस्थान, जीव समास, मार्गणा स्थानादि 20 प्ररूपणाएँ। - देखें [[ सत् ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान की सत् (अस्तित्व), संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अंतर, भाव व अल्पबहुत्व रूप आठ प्ररूपणाएँ। -देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान में कर्म प्रकृतियों का बंध, उदय व सत्त्व।-देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान में कषाय, योग व संज्ञाओं का सद्भाव तथा तत्संबंधी शंकाएँ।-देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान की पुनः पुनः प्राप्ति की सीमा।-देखें [[ संयम#2 | संयम - 2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान में मृत्यु का विधि-निषेध।-देखें [[ मरण#3 | मरण - 3]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सभी गुणस्थानों में आय के अनुसार व्यय होने का नियम।-देखें [[ मार्गणा ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; अपूर्वकरण गुणस्थान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पंचसंग्रह / प्राकृत / अधिकार 1/17-19 भिण्णसमयट्ठिएहि दु जीवेहि ण होइ सव्वहा सरिसो। करणेहिं एसमयट्ठिएहिं सरिसो विसरिओ वा ॥17॥ एयम्मि गुणट्ठाणो विसरिसमयट्ठिएहिं जीवेहिं। पुव्वमपत्ता जम्हा होंति अपुव्वा हु परिणामा ॥18॥ तारिसपरिणामट्ठियजीवा हु जिणेहिं गलियतिमिरेहिं। मोहस्सऽपुव्वकरणाखवणुवसमणुज्जया भणिया ॥19॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इस गुणस्थान में, भिन्न समयवर्ती जीवों में करण अर्थात् परिणामों की अपेक्षा कभी भी सादृश्य नहीं पाया जाता। किंतु एक समयवर्ती जीवों में सादृश्य और वैसादृश्य दोनों ही पाये जाते हैं ॥14॥ इस गुणस्थान में यतः विभिन्न समय स्थित जीवों के पूर्व में अप्राप्त अपूर्व परिणाम होते हैं, अतः उन्हें अपूर्वकरण कहते हैं ॥18॥ इस प्रकार के अपूर्वकरण परिणामों में स्थित जीव मोहकर्म के क्षपण या उपशमन करने में उद्यत होते हैं, ऐसा अज्ञान तिमिर वीतरागी जिनों ने कहा है ॥17-19॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 1/1,1,17/116-118/183), ( गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 51,52,54/140), (पंचसंग्रह / संस्कृत / अधिकार 1/35-37)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/180/1 करणाः परिणामाः, न पूर्वाः अपूर्वाः। नानाजीवापेक्षया प्रतिसमयमादितः क्रमप्रवृद्धासंख्येयलोकपरिणामस्यास्य गुणस्यांतर्विवक्षितसमयवर्तिप्राणिनो व्यतिरिच्यान्यसमवयवर्तिप्राणिभिरप्राप्या अपूर्वा अत्रतनपरिणामैरसमाना इति यावत्। अपूर्वाश्च ते करणाश्चापूर्वकरणाः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= करण शब्द का अर्थ परिणाम है, और जो पूर्व अर्थात् पहिले नहीं हुए उन्हें अपूर्व कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि नाना जीवों की अपेक्षा आदि से लेकर प्रत्येक समय में क्रम से बढ़ते हुए असंख्यातलोक प्रमाण परिणाम वाले इस गुणस्थान के अंतर्गत विवक्षित समयवर्ती जीवों को छोड़कर अन्य समयवर्ती जीवों के द्वारा अप्राप्य परिणाम अपूर्व कहलाते हैं। अर्थात् विवक्षित समयवर्ती जीवों के परिणामों से भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम असमान अर्थात् विलक्षण होते हैं। इस तरह प्रत्येक समय में होनेवाले अपूर्व परिणामों को अपूर्वकरण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अभिधान राजेंद्रकोश/अपुव्वकरण &amp;quot;अपूर्वमपूर्वां क्रियां गच्छतीत्यपूर्वकरणम्। तत्र च प्रथमसमय एव स्थितिघातरसघातगुणश्रेणिगुणसंक्रमाः अन्यश्च स्थितिबंधः इत्येते पंचाप्यधिकारा यौगपद्येन पूर्वमप्रवृत्ताः प्रवर्त्तंते इत्यपूर्वकरणम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अपूर्व-अपूर्व क्रिया को प्राप्त करता होने से अपूर्वकरण है। तहाँ प्रथम समय से ही-स्थितिकांडकघात, अनुभागकांडकघात, गुणश्रेणीनिर्जरा, गुणसंक्रमण और स्थितिबंधापसरण ये पाँच अधिकार युगपत् प्रवर्त्तते हैं। क्योंकि ये इससे पहिले नहीं प्रवर्तते इसलिए इसे अपूर्वकरण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 13/14 स एवातीतसंज्वलनकषायमंदोदये सत्यपूर्वपरमाह्लादैकसुखानुभूतिलक्षणापूर्वकरणोपशमकक्षपकसंज्ञोऽष्टमगुणस्थानवर्त्ती भवति&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वही (सप्तगुणस्थानवर्ती साधु) अतीत संज्वलन कषाय का मंद उदय होने पर अपूर्व, परम आह्लाद सुख के अनुभवरूप अपूर्वकरण में उपशमक या क्षपक नामक अष्टम गुणस्थानवर्ती होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	अपूर्वकरण के चार आवश्यक, परिणाम तथा अनिवृत्तिकरण के साथ इसका भेद।-देखें [[ कारण#5 | कारण - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	अपूर्वकरण लब्धि। देखें [[ करण#5 | करण - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;इस गुणस्थान में क्षायिक व औपशमिक दो ही भाव संभव है &amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/182/4 पंचसु गुणेषु कोऽत्रनगुणश्चेत्क्षपकस्य क्षायिकः उपशमकस्यौपशमिकः।.....सम्यक्त्वापेक्षया तुक्षपकस्य क्षायिको भावः दर्शनमोहनीयक्षयमविधाय क्षपकश्रेण्यारोहणानुपत्तेः। उपशमकस्यौपशमिकः क्षायिको वा भावः, दर्शनमोहोपशमक्षयाभ्यां विनोपशमश्रेण्यारोहणानुपलंभात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न-पाँच प्रकार के भावों में-से इस गुणस्थान में कौन-सा भाव पाया जाता है? उत्तर-(चारित्र की अपेक्षा) क्षपक के क्षायिक और उपशम के औपशमिक भाव पाया जाता है।....सम्यग्दर्शन की अपेक्षा तो क्षपक के क्षायिक भाव होता है, क्योंकि जिसने दर्शनमोहनीय का क्षय नहीं किया है, वह क्षपक श्रेणी पर नहीं चढ़ सकता है। और उपशम के औपशमिक या क्षायिकभाव होता है, क्योंकि जिसने दर्शनमोहनीय का उपशम अथवा क्षय नहीं किया है, वह उपशमश्रेणी पर नहीं चढ़ सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;इस गुणस्थान में एक भी कर्म का उपशम या क्षय नहीं होता &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 9/1/19/590/11 तत्र कर्मप्रकृतीनां नोपशमो नापि क्षयः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तहाँ अपूर्वकरण गुणस्थान में, कर्म प्रकृतियों का न उपशम है और न क्षय।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/211/3 अपुव्वकरणे ण एक्कं पि कम्ममुवसमदि। किंतु अपुव्वकरणो पडिसमयणंतगुण-विसोहीए वढ्ढंतो अंतोमुहुत्तेण एक्केक्कंट्ठिदिखंडयं घादेंतो संखेज्जसहस्साणि ट्ठिदिखंडयाणि घादेदि, तत्तियमेत्ताणि ट्ठिदिबंधोसरणाणि करेदि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अपूर्वकरण गुणस्थान में एक भी कर्म का उपशम नहीं होता है। किंतु अपूर्वकरण गुणस्थानवाला जीव प्रत्येक समय में अनंतगुणी विशुद्धि से बढ़ता हुआ एक-एक अंतर्मुहूर्त में एक एक स्थितिखंडों का घात करता हुआ संख्यात हजार स्थितिखंडों का घात करता है। उतने ही स्थिति बंधापसरणों को करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/216/9 सो ण एक्कं वि कम्मं क्खवेदि, किंतु समयं पडि असंखेज्जगुणसरूवेण पदेस णिज्जरं करेदि। अंतोमुहुत्तेण एक्केक्कं ट्ठिदिकंडयं घादेंतो अप्पणो कालब्भंतरे संखेज्जसहस्साणि ट्ठिदिखंडयाणि घादेदि। तत्तियाणि चेव ट्ठिदिबंधोसरणाणि वि करेदि। तेहिंतो संखेग्जसहस्सगुणे अणुभागकंडयवादे करदि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वह एक भी कर्म का क्षय नहीं करता है, किंतु प्रत्येक समय में असंख्यातगुणित रूप से कर्मप्रदेशों की निर्जरा करता है। एक-एक अंतर्मुहूर्त में एक स्थिति कांडक का घात करता हुआ अपने काल के भीतर संख्यात हजार स्थिति कांडकों का घात करता है। और उतने ही स्थिति बंधापसरण करता है। तथा उनसे संख्यात हजार गुणे अनुभागकांडकों का घात करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4&amp;quot; id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; उपशम व क्षय किये बिना भी इसमें वे भाव कैसे संभव हैं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 9/1/19/590/12 पूर्वत्रोत्तरत्र च उपशमं क्षयं वापेक्ष्य उपशमकः क्षपक इति च घृतघटवदुपचर्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगे होने वाले उपशम या क्षय की दृष्टि से इस गुणस्थान में भी उपशमक और क्षपक व्यवहार घी के घड़े की तरह हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/181/4 अक्षपकानुपशमकानां कथं तद्व्यपदेशश्चेन्न, भाविनि भूतवदुपचारतस्तत्सिद्धेः। सत्येवमतिप्रसंगः स्यादिति चेन्न, असति प्रतिबंधरि मरणे नियमेन चारित्रमोहक्षपणोपशमकारिणां तदुन्मुखानामुपचारभाजामुपलंभात्। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न-आठवें गुणस्थान में न तो कर्मो का क्षय ही होता है, और न उपशम ही फिर इस गुणस्थानवर्ती जीवों को क्षपक और उपशमक कैसे कहा जा सकता है? उत्तर-नहीं; क्योंकि भावी अर्थ में भूतकालीन अर्थ के समान उपचार कर लेने से आठवें गुणस्थान में क्षपक और उपशमक व्यवहार की सिद्धि हो जाती है। प्रश्न-इस प्रकार मानने पर तो अतिप्रसंग दोष प्राप्त हो जायेगा। उत्तर-नहीं, क्योंकि प्रतिबंधक मरण के अभाव में नियम से चारित्र-मोह का उपशम करनेवाले तथा चारित्रमोह का क्षय करने वाले, अतएव उपशमन व क्षपण के सन्मुख हुए और उपचार से क्षपक या उपशमक संज्ञा को प्राप्त होने वाले जीवों के आठवें गुणस्थान में भी क्षपक या उपशमक संज्ञा बन जाती है&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 5/1,7,9/205/4)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,9/205/2 उवसमसमणसत्तिसमण्णिदअपुव्वकरणस्य तदत्थित्ताविरोहा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उपशमन शक्तिसे समन्वित अपूर्वकरणसंयतके औपशमिक भावके अस्तित्वको माननेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,9/206/1 अपुव्वकरणस्स अविट्ठकम्मस्स कंध खइयो भावो। ण तस्स वि कम्मक्खयणिमित्तपरिणामुवलंभादो।....उवयारेण वा अपुव्वकरणस्स खइओ भावो। उवयारे आसयिज्जमाणे अइप्पसंगो किण्ण होदीदि चे ण, पच्चासत्तीदो अइप्पसंगपडिसेहादो। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न:- किसी भी कर्म के नष्ट नहीं करने वाले अपूर्वकरण संयत के क्षायिकभाव कैसे माना जा सकता है? उत्तर-नहीं, क्योंकि उसके भी कर्म क्षय के निमित्तभूत परिणाम पाये जाते हैं।....अथवा उपचार से अपूर्वकरणसंयत के क्षायिकभाव मानना चाहिए। प्रश्न-इस प्रकार सर्वत्र उपचार का आश्रय करने पर अतिप्रसंग दोष क्यों न आयेगा? उत्तर-नहीं, क्योंकि प्रत्यासत्ति अर्थात् समीपवर्ती अर्थ के प्रसंग से अतिप्रसंग दोष का प्रतिबंध हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1,49/93/5 खवगुवसामगअपुव्वकरणपढमसमयप्पहुडि थोवथोवक्खवणुवसामणकज्जणिप्पत्तिदंसणादो। पडिसमयं कज्जणिप्पत्तीए विणा चरिमसमए चेव णिप्पज्जमाणकज्जाणुवलंभादो च।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= क्षपक व उपशामक अपूर्वकरण के प्रथम समय से लगाकर थोड़े-थोड़े क्षपण व उपशामन रूप कार्य की निष्पत्ति देखी जाती है। यदि प्रत्येक समय कार्य की निष्पत्ति न हो तो अंतिम समय में भी कार्य पूरा होता नहीं पाया जा सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;देखें [[ सम्यग्दर्शन#IV.2.10  | सम्यग्दर्शन - IV.2.10 ]]दर्शनमोह का उपशम करने वाला जीव उपद्रव आने पर भी उसका उपशम किये बिना नहीं रहता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
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&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: करणानुयोग]]&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; चौदह गुणस्थानों में आठवाँ गुणस्थान । इस गुणस्थान में जीव के प्रतिक्षण अपूर्व-अपूर्व (नये-नये) परिणाम होते हैं । इस करण मे अवकरण के समान जीव स्थिति और अनुभाग बंध तो कम करता ही रहता है साथ ही वह स्थिति और अनुभाग बंध का संक्रमण और निर्जरा करता हुआ उन दीपों के अग्रभाग को भी नष्ट कर देता है । ऐसे जीव उपशमक और क्षपक दोनों प्रकारों के होते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 20. 252-255,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 3.8 0, 83, 142  &amp;lt;/span&amp;gt;देखें [[ गुणस्थान ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3&amp;diff=106110</id>
		<title>अपूर्वकरण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3&amp;diff=106110"/>
		<updated>2022-12-15T11:38:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जीवों के परिणामों में क्रमपूर्वक विशुद्धि की वृद्धियों के स्थानों को गुणस्थान कहते हैं। मोक्षमार्ग में 14 गुणस्थानों का निर्देश किया गया है। तहाँ अपूर्वकरण नाम का आठवाँ गुणस्थान है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान के स्वामित्व संबंधी गुणस्थान, जीव समास, मार्गणा स्थानादि 20 प्ररूपणाएँ। - देखें [[ सत् ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान की सत् (अस्तित्व), संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अंतर, भाव व अल्पबहुत्व रूप आठ प्ररूपणाएँ। -देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान में कर्म प्रकृतियों का बंध, उदय व सत्त्व।-देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान में कषाय, योग व संज्ञाओं का सद्भाव तथा तत्संबंधी शंकाएँ।-देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान की पुनः पुनः प्राप्ति की सीमा।-देखें [[ संयम#2 | संयम - 2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान में मृत्यु का विधि-निषेध।-देखें [[ मरण#3 | मरण - 3]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	सभी गुणस्थानों में आय के अनुसार व्यय होनेका नियम।-देखें [[ मार्गणा ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; अपूर्वकरण गुणस्थान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पंचसंग्रह / प्राकृत / अधिकार 1/17-19 भिण्णसमयट्ठिएहि दु जीवेहि ण होइ सव्वहा सरिसो। करणेहिं एसमयट्ठिएहिं सरिसो विसरिओ वा ॥17॥ एयम्मि गुणट्ठाणो विसरिसमयट्ठिएहिं जीवेहिं। पुव्वमपत्ता जम्हा होंति अपुव्वा हु परिणामा ॥18॥ तारिसपरिणामट्ठियजीवा हु जिणेहिं गलियतिमिरेहिं। मोहस्सऽपुव्वकरणाखवणुवसमणुज्जया भणिया ॥19॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इस गुणस्थानमें, भिन्न समयवर्ती जीवोंमें करण अर्थात् परिणामोंकी अपेक्षा कभी भी सादृश्य नहीं पाया जाता। किंतु एक समयवर्ती जीवोंमें सादृश्य और वैसादृश्य दोनों ही पाये जाते हैं ॥14॥ इस गुणस्थानमें यतः विभिन्न समयस्थित जीवोंके पूर्वमें अप्राप्त अपूर्व परिणाम होते हैं, अतः उन्हें अपूर्वकरण कहते हैं ॥18॥ इस प्रकारके अपूर्वकरण परिणामोंमें स्थित जीव मोहकर्मके क्षपण या उपशमन करनेमें उद्यत होते हैं, ऐसा अज्ञान तिमिर वीतरागी जिनोंने कहा है ॥17-19॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 1/1,1,17/116-118/183), ( गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 51,52,54/140), (पंचसंग्रह / संस्कृत / अधिकार 1/35-37)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/180/1 करणाः परिणामाः, न पूर्वाः अपूर्वाः। नानाजीवापेक्षया प्रतिसमयमादितः क्रमप्रवृद्धासंख्येयलोकपरिणामस्यास्य गुणस्यांतर्विवक्षितसमयवर्तिप्राणिनो व्यतिरिच्यान्यसमवयवर्तिप्राणिभिरप्राप्या अपूर्वा अत्रतनपरिणामैरसमाना इति यावत्। अपूर्वाश्च ते करणाश्चापूर्वकरणाः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= करण शब्दका अर्थ परिणाम है, और जो पूर्व अर्थात् पहिले नहीं हुए उन्हें अपूर्व कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि नाना जीवोंकी अपेक्षा आदिसे लेकर प्रत्येक समयमें क्रमसे बढ़ते हुए असंख्यातलोक प्रमाण परिणामवाले इस गुणस्थानके अंतर्गत विवक्षित समयवर्ती जीवोंको छोड़कर अन्य समयवर्ती जीवोंके द्वारा अप्राप्य परिणाम अपूर्व कहलाते हैं। अर्थात् विवक्षित समयवर्ती जीवोंके परिणामोंसे भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम असमान अर्थात् विलक्षण होते हैं। इस तरह प्रत्येक समयमें होनेवाले अपूर्व परिणामोंको अपूर्वकरण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अभिधान राजेंद्रकोश/अपुव्वकरण &amp;quot;अपूर्वमपूर्वां क्रियां गच्छतीत्यपूर्वकरणम्। तत्र च प्रथमसमय एव स्थितिघातरसघातगुणश्रेणिगुणसंक्रमाः अन्यश्च स्थितिबंधः इत्येते पंचाप्यधिकारा यौगपद्येन पूर्वमप्रवृत्ताः प्रवर्त्तंते इत्यपूर्वकरणम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अपूर्व-अपूर्व क्रियाको प्राप्त करता होनेसे अपूर्वकरण है। तहाँ प्रथम समयसे ही-स्थितिकांडकघात, अनुभागकांडकघात, गुणश्रेणीनिर्जरा, गुणसंक्रमण और स्थितिबंधापसरण ये पाँच अधिकार युगपत् प्रवर्त्तते हैं। क्योंकि ये इससे पहिले नहीं प्रवर्तते इसलिए इसे अपूर्वकरण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 13/14 स एवातीतसंज्वलनकषायमंदोदये सत्यपूर्वपरमाह्लादैकसुखानुभूतिलक्षणापूर्वकरणोपशमकक्षपकसंज्ञोऽष्टमगुणस्थानवर्त्ती भवति&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वही (सप्तगुणस्थानवर्ती साधु) अतीत संज्वलन कषायका मंद उदय होनेपर अपूर्व, परम आह्लाद सुखके अनुभवरूप अपूर्वकरणमें उपशमक या क्षपक नामक अष्टम गुणस्थानवर्ती होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	अपूर्वकरणके चार आवश्यक, परिणाम तथा अनिवृत्तिकरणके साथ इसका भेद।-देखें [[ कारण#5 | कारण - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	अपूर्वकरण लब्धि। देखें [[ करण#5 | करण - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;इस गुणस्थान में क्षायिक व औपशमिक दो ही भाव संभव है &amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/182/4 पंचसु गुणेषु कोऽत्रनगुणश्चेत्क्षपकस्य क्षायिकः उपशमकस्यौपशमिकः।.....सम्यक्त्वापेक्षया तुक्षपकस्य क्षायिको भावः दर्शनमोहनीयक्षयमविधाय क्षपकश्रेण्यारोहणानुपत्तेः। उपशमकस्यौपशमिकः क्षायिको वा भावः, दर्शनमोहोपशमक्षयाभ्यां विनोपशमश्रेण्यारोहणानुपलंभात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न-पाँच प्रकारके भावोंमें-से इस गुणस्थानमें कौन-सा भाव पाया जाता है? उत्तर-(चारित्रकी अपेक्षा) क्षपकके क्षायिक और उपशमके औपशमिक भाव पाया जाता है।....सम्यग्दर्शनकी अपेक्षा तो क्षपकके क्षायिक भाव होता है, क्योंकि, जिसने दर्शनमोहनीयका क्षय नहीं किया है, वह क्षपक श्रेणीपर नहीं चढ़ सकता है। और उपशमके औपशमिक या क्षायिकभाव होता है, क्योंकि, जिसने दर्शनमोहनीयका उपशम अथवा क्षय नहीं किया है, वह उपशमश्रेणीपर नहीं चढ़ सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;इस गुणस्थानमें एक भी कर्मका उपशम या क्षय नहीं होता &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 9/1/19/590/11 तत्र कर्मप्रकृतीनां नोपशमो नापि क्षयः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तहाँ अपूर्वकरण गुणस्थानमें, कर्म प्रकृतियोंका न उपशम है और न क्षय।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/211/3 अपुव्वकरणे ण एक्कं पि कम्ममुवसमदि। किंतु अपुव्वकरणो पडिसमयणंतगुण-विसोहीए वढ्ढंतो अंतोमुहुत्तेण एक्केक्कंट्ठिदिखंडयं घादेंतो संखेज्जसहस्साणि ट्ठिदिखंडयाणि घादेदि, तत्तियमेत्ताणि ट्ठिदिबंधोसरणाणि करेदि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अपूर्वकरण गुणस्थानमें एक भी कर्मका उपशम नहीं होता है। किंतु अपूर्वकरण गुणस्थानवाला जीव प्रत्येक समयमें अनंतगुणी विशुद्धिसे बढ़ता हुआ एक-एक अंतर्मुहूर्तमें एक एक स्थितिखंडोंका घात करता हुआ संख्यात हजार स्थितिखंडोंका घात करता है। उतने ही स्थिति बंधापसरणोंको करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/216/9 सो ण एक्कं वि कम्मं क्खवेदि, किंतु समयं पडि असंखेज्जगुणसरूवेण पदेस णिज्जरं करेदि। अंतोमुहुत्तेण एक्केक्कं ट्ठिदिकंडयं घादेंतो अप्पणो कालब्भंतरे संखेज्जसहस्साणि ट्ठिदिखंडयाणि घादेदि। तत्तियाणि चेव ट्ठिदिबंधोसरणाणि वि करेदि। तेहिंतो संखेग्जसहस्सगुणे अणुभागकंडयवादे करदि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वह एक भी कर्गका क्षय नहीं करता है, किंतु प्रत्येक समयमें असंख्यातगुणित रूपसे कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा करता है। एक-एक अंतर्मुहूर्तमें एक स्थिति कांडकका घात करता हुआ अपने कालके भीतर संख्यात हजार स्थिति कांडकोंका घात करता है। और उतने ही स्थिति बंधापसरण करता है। तथा उनसे संख्यात हजारगुणे अनुभागकांडकोंका घात करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4&amp;quot; id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; उपशम व क्षय किये बिना भी इसमें वे भाव कैसे संभव हैं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 9/1/19/590/12 पूर्वत्रोत्तरत्र च उपशमं क्षयं वापेक्ष्य उपशमकः क्षपक इति च घृतघटवदुपचर्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगे होनेवाले उपशम या क्षयकी दृष्टिसे इस गुणस्थानमें भी उपशमक और क्षपक व्यवहार घीके घड़ेकी तरह हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/181/4 अक्षपकानुपशमकानां कथं तद्व्यपदेशश्चेन्न, भाविनि भूतवदुपचारतस्तत्सिद्धेः। सत्येवमतिप्रसंगः स्यादिति चेन्न, असति प्रतिबंधरि मरणे नियमेन चारित्रमोहक्षपणोपशमकारिणां तदुन्मुखानामुपचारभाजामुपलंभात्। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न-आठवें गुणस्थानमें न तो कर्मोका क्षय ही होता है, और न उपशम ही फिर इस गुणस्थानवर्ती जीवोंको क्षपक और उपशमक कैसे कहा जा सकता है? उत्तर-नहीं; क्योंकि, भावी अर्थमें भूतकालीन अर्थके समान उपचार कर लेनेसे आठवें गुणस्थानमें क्षपक और उपशमक व्यवहारकी सिद्धि हो जाती है। प्रश्न-इस प्रकार माननेपर तो अतिप्रसंग दोष प्राप्त हो जायेगा। उत्तर-नहीं, क्योंकि प्रतिबंधक मरणके अभावमें नियमसे चारित्र-मोहका उपशम करनेवाले तथा चारित्रमोहका क्षय करने वाले, अतएव उपशमन व क्षपणके सन्मुख हुए और उपचारसे क्षपक या उपशमक संज्ञाको प्राप्त होनेवाले जीवोंके आठवें गुणस्थानमें भी क्षपक या उपशमक संज्ञा बन जाती है&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 5/1,7,9/205/4)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,9/205/2 उवसमसमणसत्तिसमण्णिदअपुव्वकरणस्य तदत्थित्ताविरोहा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उपशमन शक्तिसे समन्वित अपूर्वकरणसंयतके औपशमिक भावके अस्तित्वको माननेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,9/206/1 अपुव्वकरणस्स अविट्ठकम्मस्स कंध खइयो भावो। ण तस्स वि कम्मक्खयणिमित्तपरिणामुवलंभादो।....उवयारेण वा अपुव्वकरणस्स खइओ भावो। उवयारे आसयिज्जमाणे अइप्पसंगो किण्ण होदीदि चे ण, पच्चासत्तीदो अइप्पसंगपडिसेहादो। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न किसी भी कर्मके नष्ट नहीं करनेवाले अपूर्वकरणसंयतके क्षायिकभाव कैसे माना जा सकता है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, उसके भी कर्म क्षयके निमित्तभूत परिणाम पाये जाते हैं।....अथवा उपचारसे अपूर्वकरणसंयतके क्षायिकभाव मानना चाहिए। प्रश्न-इस प्रकार सर्वत्र उपचारका आश्रय करनेपर अतिप्रसंग दोष क्यों न आयेगा? उत्तर-नहीं, क्योंकि प्रत्यासत्ति अर्थात् समीपवर्ती अर्थके प्रसंगसे अतिप्रसंग दोषका प्रतिबंध हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1,49/93/5 खवगुवसामगअपुव्वकरणपढमसमयप्पहुडि थोवथोवक्खवणुवसामणकज्जणिप्पत्तिदंसणादो। पडिसमयं कज्जणिप्पत्तीए विणा चरिमसमए चेव णिप्पज्जमाणकज्जाणुवलंभादो च।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= क्षपक व उपशामक अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लगाकर थोड़े-थोड़े क्षपण व उपशामन रूप कार्यकी निष्पत्ति देखी जाती है। यदि प्रत्येक समय कार्यकी निष्पत्ति न हो तो अंतिम सयमें भी कार्य पूरा होता नहीं पाया जा सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;देखें [[ सम्यग्दर्शन#IV.2.10  | सम्यग्दर्शन - IV.2.10 ]]दर्शनमोहका उपशम करने वाला जीव उपद्रव आने पर भी उसका उपशम किये बिना नहीं रहता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; चौदह गुणस्थानों में आठवाँ गुणस्थान । इस गुणस्थान में जीव के प्रतिक्षण अपूर्व-अपूर्व (नये-नये) परिणाम होते हैं । इस करण मे अवकरण के समान जीव स्थिति और अनुभाग बंध तो कम करता ही रहता है साथ ही वह स्थिति और अनुभाग बंध का संक्रमण और निर्जरा करता हुआ उन दीपों के अग्रभाग को भी नष्ट कर देता है । ऐसे जीव उपशमक और झपक दोनों प्रकारों के होते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 20. 252-255,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 3.8 0, 83, 142  &amp;lt;/span&amp;gt;देखें [[ गुणस्थान ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3&amp;diff=106109</id>
		<title>अपूर्वकरण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3&amp;diff=106109"/>
		<updated>2022-12-15T11:33:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p&amp;gt;जीवों के परिणामों में क्रमपूर्वक विशुद्धि की वृद्धियों के स्थानों को गुणस्थान कहते हैं। मोक्षमार्ग में 14 गुणस्थानों का निर्देश किया गया है। तहाँ अपूर्वकरण नाम का आठवाँ गुणस्थान है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;•	इस गुणस्थान के स्वामित्व संबंधी गुणस्थान, जीव समास, मार्गणा स्थानादि 20 प्ररूपणाएँ। - देखें [[ सत् ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	इस गुणस्थान की सत् (अस्तित्व), संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अंतर, भाव व अल्पबहुत्व रूप आठ प्ररूपणाएँ। -देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	इस गुणस्थान में कर्म प्रकृतियों का बंध, उदय व सत्त्व।-देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	इस गुणस्थान में कषाय, योग व संज्ञाओं का सद्भाव तथा तत्संबंधी शंकाएँ।-देखें [[ वह वह नाम ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	इस गुणस्थान की पुनः पुनः प्राप्ति की सीमा।-देखें [[ संयम#2 | संयम - 2]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	इस गुणस्थान में मृत्यु का विधि-निषेध।-देखें [[ मरण#3 | मरण - 3]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	सभी गुणस्थानों में आय के अनुसार व्यय होनेका नियम।-देखें [[ मार्गणा ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; अपूर्वकरण गुणस्थान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पंचसंग्रह / प्राकृत / अधिकार 1/17-19 भिण्णसमयट्ठिएहि दु जीवेहि ण होइ सव्वहा सरिसो। करणेहिं एसमयट्ठिएहिं सरिसो विसरिओ वा ॥17॥ एयम्मि गुणट्ठाणो विसरिसमयट्ठिएहिं जीवेहिं। पुव्वमपत्ता जम्हा होंति अपुव्वा हु परिणामा ॥18॥ तारिसपरिणामट्ठियजीवा हु जिणेहिं गलियतिमिरेहिं। मोहस्सऽपुव्वकरणाखवणुवसमणुज्जया भणिया ॥19॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इस गुणस्थानमें, भिन्न समयवर्ती जीवोंमें करण अर्थात् परिणामोंकी अपेक्षा कभी भी सादृश्य नहीं पाया जाता। किंतु एक समयवर्ती जीवोंमें सादृश्य और वैसादृश्य दोनों ही पाये जाते हैं ॥14॥ इस गुणस्थानमें यतः विभिन्न समयस्थित जीवोंके पूर्वमें अप्राप्त अपूर्व परिणाम होते हैं, अतः उन्हें अपूर्वकरण कहते हैं ॥18॥ इस प्रकारके अपूर्वकरण परिणामोंमें स्थित जीव मोहकर्मके क्षपण या उपशमन करनेमें उद्यत होते हैं, ऐसा अज्ञान तिमिर वीतरागी जिनोंने कहा है ॥17-19॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 1/1,1,17/116-118/183), ( गोम्मट्टसार जीवकांड / मूल गाथा 51,52,54/140), (पंचसंग्रह / संस्कृत / अधिकार 1/35-37)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/180/1 करणाः परिणामाः, न पूर्वाः अपूर्वाः। नानाजीवापेक्षया प्रतिसमयमादितः क्रमप्रवृद्धासंख्येयलोकपरिणामस्यास्य गुणस्यांतर्विवक्षितसमयवर्तिप्राणिनो व्यतिरिच्यान्यसमवयवर्तिप्राणिभिरप्राप्या अपूर्वा अत्रतनपरिणामैरसमाना इति यावत्। अपूर्वाश्च ते करणाश्चापूर्वकरणाः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= करण शब्दका अर्थ परिणाम है, और जो पूर्व अर्थात् पहिले नहीं हुए उन्हें अपूर्व कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि नाना जीवोंकी अपेक्षा आदिसे लेकर प्रत्येक समयमें क्रमसे बढ़ते हुए असंख्यातलोक प्रमाण परिणामवाले इस गुणस्थानके अंतर्गत विवक्षित समयवर्ती जीवोंको छोड़कर अन्य समयवर्ती जीवोंके द्वारा अप्राप्य परिणाम अपूर्व कहलाते हैं। अर्थात् विवक्षित समयवर्ती जीवोंके परिणामोंसे भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम असमान अर्थात् विलक्षण होते हैं। इस तरह प्रत्येक समयमें होनेवाले अपूर्व परिणामोंको अपूर्वकरण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अभिधान राजेंद्रकोश/अपुव्वकरण &amp;quot;अपूर्वमपूर्वां क्रियां गच्छतीत्यपूर्वकरणम्। तत्र च प्रथमसमय एव स्थितिघातरसघातगुणश्रेणिगुणसंक्रमाः अन्यश्च स्थितिबंधः इत्येते पंचाप्यधिकारा यौगपद्येन पूर्वमप्रवृत्ताः प्रवर्त्तंते इत्यपूर्वकरणम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अपूर्व-अपूर्व क्रियाको प्राप्त करता होनेसे अपूर्वकरण है। तहाँ प्रथम समयसे ही-स्थितिकांडकघात, अनुभागकांडकघात, गुणश्रेणीनिर्जरा, गुणसंक्रमण और स्थितिबंधापसरण ये पाँच अधिकार युगपत् प्रवर्त्तते हैं। क्योंकि ये इससे पहिले नहीं प्रवर्तते इसलिए इसे अपूर्वकरण कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 13/14 स एवातीतसंज्वलनकषायमंदोदये सत्यपूर्वपरमाह्लादैकसुखानुभूतिलक्षणापूर्वकरणोपशमकक्षपकसंज्ञोऽष्टमगुणस्थानवर्त्ती भवति&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वही (सप्तगुणस्थानवर्ती साधु) अतीत संज्वलन कषायका मंद उदय होनेपर अपूर्व, परम आह्लाद सुखके अनुभवरूप अपूर्वकरणमें उपशमक या क्षपक नामक अष्टम गुणस्थानवर्ती होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	अपूर्वकरणके चार आवश्यक, परिणाम तथा अनिवृत्तिकरणके साथ इसका भेद।-देखें [[ कारण#5 | कारण - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	अपूर्वकरण लब्धि। देखें [[ करण#5 | करण - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;इस गुणस्थान में क्षायिक व औपशमिक दो ही भाव संभव है &amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/182/4 पंचसु गुणेषु कोऽत्रनगुणश्चेत्क्षपकस्य क्षायिकः उपशमकस्यौपशमिकः।.....सम्यक्त्वापेक्षया तुक्षपकस्य क्षायिको भावः दर्शनमोहनीयक्षयमविधाय क्षपकश्रेण्यारोहणानुपत्तेः। उपशमकस्यौपशमिकः क्षायिको वा भावः, दर्शनमोहोपशमक्षयाभ्यां विनोपशमश्रेण्यारोहणानुपलंभात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न-पाँच प्रकारके भावोंमें-से इस गुणस्थानमें कौन-सा भाव पाया जाता है? उत्तर-(चारित्रकी अपेक्षा) क्षपकके क्षायिक और उपशमके औपशमिक भाव पाया जाता है।....सम्यग्दर्शनकी अपेक्षा तो क्षपकके क्षायिक भाव होता है, क्योंकि, जिसने दर्शनमोहनीयका क्षय नहीं किया है, वह क्षपक श्रेणीपर नहीं चढ़ सकता है। और उपशमके औपशमिक या क्षायिकभाव होता है, क्योंकि, जिसने दर्शनमोहनीयका उपशम अथवा क्षय नहीं किया है, वह उपशमश्रेणीपर नहीं चढ़ सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;इस गुणस्थानमें एक भी कर्मका उपशम या क्षय नहीं होता &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 9/1/19/590/11 तत्र कर्मप्रकृतीनां नोपशमो नापि क्षयः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तहाँ अपूर्वकरण गुणस्थानमें, कर्म प्रकृतियोंका न उपशम है और न क्षय।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/211/3 अपुव्वकरणे ण एक्कं पि कम्ममुवसमदि। किंतु अपुव्वकरणो पडिसमयणंतगुण-विसोहीए वढ्ढंतो अंतोमुहुत्तेण एक्केक्कंट्ठिदिखंडयं घादेंतो संखेज्जसहस्साणि ट्ठिदिखंडयाणि घादेदि, तत्तियमेत्ताणि ट्ठिदिबंधोसरणाणि करेदि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अपूर्वकरण गुणस्थानमें एक भी कर्मका उपशम नहीं होता है। किंतु अपूर्वकरण गुणस्थानवाला जीव प्रत्येक समयमें अनंतगुणी विशुद्धिसे बढ़ता हुआ एक-एक अंतर्मुहूर्तमें एक एक स्थितिखंडोंका घात करता हुआ संख्यात हजार स्थितिखंडोंका घात करता है। उतने ही स्थिति बंधापसरणोंको करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,27/216/9 सो ण एक्कं वि कम्मं क्खवेदि, किंतु समयं पडि असंखेज्जगुणसरूवेण पदेस णिज्जरं करेदि। अंतोमुहुत्तेण एक्केक्कं ट्ठिदिकंडयं घादेंतो अप्पणो कालब्भंतरे संखेज्जसहस्साणि ट्ठिदिखंडयाणि घादेदि। तत्तियाणि चेव ट्ठिदिबंधोसरणाणि वि करेदि। तेहिंतो संखेग्जसहस्सगुणे अणुभागकंडयवादे करदि। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वह एक भी कर्गका क्षय नहीं करता है, किंतु प्रत्येक समयमें असंख्यातगुणित रूपसे कर्मप्रदेशोंकी निर्जरा करता है। एक-एक अंतर्मुहूर्तमें एक स्थिति कांडकका घात करता हुआ अपने कालके भीतर संख्यात हजार स्थिति कांडकोंका घात करता है। और उतने ही स्थिति बंधापसरण करता है। तथा उनसे संख्यात हजारगुणे अनुभागकांडकोंका घात करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4&amp;quot; id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; उपशम व क्षय किये बिना भी इसमें वे भाव कैसे संभव हैं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 9/1/19/590/12 पूर्वत्रोत्तरत्र च उपशमं क्षयं वापेक्ष्य उपशमकः क्षपक इति च घृतघटवदुपचर्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आगे होनेवाले उपशम या क्षयकी दृष्टिसे इस गुणस्थानमें भी उपशमक और क्षपक व्यवहार घीके घड़ेकी तरह हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 1/1,1,16/181/4 अक्षपकानुपशमकानां कथं तद्व्यपदेशश्चेन्न, भाविनि भूतवदुपचारतस्तत्सिद्धेः। सत्येवमतिप्रसंगः स्यादिति चेन्न, असति प्रतिबंधरि मरणे नियमेन चारित्रमोहक्षपणोपशमकारिणां तदुन्मुखानामुपचारभाजामुपलंभात्। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न-आठवें गुणस्थानमें न तो कर्मोका क्षय ही होता है, और न उपशम ही फिर इस गुणस्थानवर्ती जीवोंको क्षपक और उपशमक कैसे कहा जा सकता है? उत्तर-नहीं; क्योंकि, भावी अर्थमें भूतकालीन अर्थके समान उपचार कर लेनेसे आठवें गुणस्थानमें क्षपक और उपशमक व्यवहारकी सिद्धि हो जाती है। प्रश्न-इस प्रकार माननेपर तो अतिप्रसंग दोष प्राप्त हो जायेगा। उत्तर-नहीं, क्योंकि प्रतिबंधक मरणके अभावमें नियमसे चारित्र-मोहका उपशम करनेवाले तथा चारित्रमोहका क्षय करने वाले, अतएव उपशमन व क्षपणके सन्मुख हुए और उपचारसे क्षपक या उपशमक संज्ञाको प्राप्त होनेवाले जीवोंके आठवें गुणस्थानमें भी क्षपक या उपशमक संज्ञा बन जाती है&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( धवला पुस्तक 5/1,7,9/205/4)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,9/205/2 उवसमसमणसत्तिसमण्णिदअपुव्वकरणस्य तदत्थित्ताविरोहा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उपशमन शक्तिसे समन्वित अपूर्वकरणसंयतके औपशमिक भावके अस्तित्वको माननेमें कोई विरोध नहीं है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 5/1,7,9/206/1 अपुव्वकरणस्स अविट्ठकम्मस्स कंध खइयो भावो। ण तस्स वि कम्मक्खयणिमित्तपरिणामुवलंभादो।....उवयारेण वा अपुव्वकरणस्स खइओ भावो। उवयारे आसयिज्जमाणे अइप्पसंगो किण्ण होदीदि चे ण, पच्चासत्तीदो अइप्पसंगपडिसेहादो। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= प्रश्न किसी भी कर्मके नष्ट नहीं करनेवाले अपूर्वकरणसंयतके क्षायिकभाव कैसे माना जा सकता है? उत्तर-नहीं, क्योंकि, उसके भी कर्म क्षयके निमित्तभूत परिणाम पाये जाते हैं।....अथवा उपचारसे अपूर्वकरणसंयतके क्षायिकभाव मानना चाहिए। प्रश्न-इस प्रकार सर्वत्र उपचारका आश्रय करनेपर अतिप्रसंग दोष क्यों न आयेगा? उत्तर-नहीं, क्योंकि प्रत्यासत्ति अर्थात् समीपवर्ती अर्थके प्रसंगसे अतिप्रसंग दोषका प्रतिबंध हो जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 7/2,1,49/93/5 खवगुवसामगअपुव्वकरणपढमसमयप्पहुडि थोवथोवक्खवणुवसामणकज्जणिप्पत्तिदंसणादो। पडिसमयं कज्जणिप्पत्तीए विणा चरिमसमए चेव णिप्पज्जमाणकज्जाणुवलंभादो च।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= क्षपक व उपशामक अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लगाकर थोड़े-थोड़े क्षपण व उपशामन रूप कार्यकी निष्पत्ति देखी जाती है। यदि प्रत्येक समय कार्यकी निष्पत्ति न हो तो अंतिम सयमें भी कार्य पूरा होता नहीं पाया जा सकता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;देखें [[ सम्यग्दर्शन#IV.2.10  | सम्यग्दर्शन - IV.2.10 ]]दर्शनमोहका उपशम करने वाला जीव उपद्रव आने पर भी उसका उपशम किये बिना नहीं रहता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;br /&gt;
[[Category: करणानुयोग]]&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p&amp;gt; चौदह गुणस्थानों में आठवाँ गुणस्थान । इस गुणस्थान में जीव के प्रतिक्षण अपूर्व-अपूर्व (नये-नये) परिणाम होते हैं । इस करण मे अवकरण के समान जीव स्थिति और अनुभाग बंध तो कम करता ही रहता है साथ ही वह स्थिति और अनुभाग बंध का संक्रमण और निर्जरा करता हुआ उन दीपों के अग्रभाग को भी नष्ट कर देता है । ऐसे जीव उपशमक और झपक दोनों प्रकारों के होते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 20. 252-255,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 3.8 0, 83, 142  &amp;lt;/span&amp;gt;देखें [[ गुणस्थान ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106094</id>
		<title>धर्मध्यान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106094"/>
		<updated>2022-12-14T17:58:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मन को एकाग्र करना ध्यान है।  वैसे तो किसी न किसी विषय में हर समय ही मन अटका रहने के कारण व्यक्ति को कोई न  कोई ध्यान बना ही रहता है, परंतु राग-द्वेष मूलक होने से श्रेयोमार्ग में वे सब  अनिष्ट हैं। साधक साम्यता का अभ्यास करने के लिए जिस ध्यान को ध्याता है वह  धर्मध्यान है। अभ्यास दशा समाप्त हो जाने पर पूर्ण ज्ञातादृष्टा भावरूप शुक्लध्यान  हो जाता है। इसलिए किसी अपेक्षा धर्म व शुक्ल दोनों ध्यान समान है। धर्मध्यान दो प्रकार का है-बाह्य व आध्यात्मिक। वचन व काय पर से सर्व प्रत्यक्ष होने रूप बाह्य और मानसिक चिंतवनरूप आध्यात्मिक है। वह आध्यात्मिक भी आज्ञा, अपाय आदि के चिंतवन  के भेद से दस भेदरूप है। ये दसों भेद जैसा कि उनके लक्षणों पर से प्रगट है, आज्ञा, अपाय, विपाक व संस्थान इन चार में गर्भित हो जाते हैं‒उपाय विचय तो अपाय में समा जाता है और जीव, अजीव, भव, विराग व हेतु विचय-संस्थान विचय में समा जाते हैं। तहाँ इन सबको भी दो में गर्भित किया जा सकता है‒व्यवहार व निश्चय। आज्ञा, अपाय व विपाक तो परावलंब ही होने से व्यवहार ही है पर संस्थानविचय चार भेदरूप है‒पिंडस्थ (शरीराकृति का चिंतवन); पदस्थ (मंत्राक्षरों का चिंतवन), रूपस्थ (पुरुषाकार आत्मा का चिंतवन) और रूपातीत अर्थात् मात्र ज्ञाता द्रष्टाभाव। यहाँ पहले तीन धर्मध्यानरूप हैं और अंतिम शुक्लध्यानरूप। पहले तीनों में ‘पिंडस्थ’  व ‘पदस्थ’ तो परावलंबी होने से व्यवहार है और ‘रूपस्थ’ स्वालंबी होने से निश्चय है। निश्चय ध्यान ही वास्तविक है पर व्यवहार भी उसका साधन होने से इष्ट है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान व  उसके भेदों का सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1 |  धर्मध्यान सामान्य के लक्षण।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1.1 | धर्म से युक्त ध्यान ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1.2 | शास्त्र, स्वाध्याय व तत्त्व चिंतवन ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1.3 | रत्नत्रय व संयम आदि में चित्त को लगाना ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1.4 | परमेष्ठी आदि की भक्ति ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.2 |  धर्मध्यान के चिह्न।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.3 |  धर्मध्यान योग्य सामग्री।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान योग्य मुद्रा, आसन,  क्षेत्र, पीठ व दिशा।‒देखें [[ कृतिकर्म#3 | कृतिकर्म - 3]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान योग्य काल।‒देखें [[ ध्यान#3 | ध्यान - 3]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान की विधि।‒देखें [[ ध्यान#3 | ध्यान - 3]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान संबंधी धारणाएँ‒देखें [[ पिंडस्थ ]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.4 |  धर्मध्यान के भेद आज्ञा, अपाय  आदि व बाह्य आध्यात्मिक आदि।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.5 |  आज्ञा, विचय आदि 10 ध्यानों  के लक्षण।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.6 |  संस्थान विचय के पिंडस्थ आदि  भेदों का निर्देश।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.7 | संस्थान विचय के पिंडस्थ आदि भेदों का निर्देश ]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; पिंडस्थ आदि ध्यान।‒देखें [[ वह वह  नाम ]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; बाह्य व आध्यात्मिक ध्यान का  लक्षण।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान  में सम्यक्त्व व भावों आदि का निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान में आवश्यक ज्ञान  की सीमा।‒देखें [[ ध्याता#1 | ध्याता - 1]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.1 |  धर्मध्यान में विषय परिवर्तन  क्रम।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.2 |  धर्मध्यान में संभव भाव व  लेश्याएँ।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान योग्य ध्याता।‒देखें [[ ध्याता#2 | ध्याता - 2]], [[ ध्याता#4 | ध्याता - 4]] |&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; सम्यग्दृष्टि को ही संभव  है।‒देखें [[ ध्याता#2 | ध्याता - 2]], [[ ध्याता#4 | ध्याता - 4]] |&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.3 |  मिथ्यादृष्टि को संभव नहीं।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.4 |  गुणस्थानों की अपेक्षा स्वामित्व।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; साधु व श्रावक को निश्चय ध्यान  का कथंचित् विधि, निषेध।‒देखें [[ अनुभव#5 | अनुभव - 5]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.5 |  धर्मध्यान के स्वामित्व संबंधी  शंकाएँ]]—&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.5.1 |  मिथ्यादृष्टि को भी तो देखा  जाता है?]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.5.2 |  प्रमत्त जनों को ध्यान कैसे  संभव है?]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.5.3 |  कषायरहित जीवों में ही मानना  चाहिए?]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
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    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान में संहनन संबंधी  चर्चा।‒देखें [[ संहनन ]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान व  अनुप्रेक्षादि में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.1 |  ध्यान, अनुप्रेक्षा, भावना व  चिंता में अंतर।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.2 |  अथवा अनुप्रेक्षादि को  अपायविचय में गर्भित समझना चाहिए।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.3 |  ध्यान व कायोत्सर्ग में अंतर।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.4 |  माला जपना आदि ध्यान नहीं है।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; प्राणायाम, समाधि आदि ध्यान  नहीं।‒देखें [[ प्राणायाम ]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ol start=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.5 |  धर्मध्यान व शुक्लध्यान में  कथंचित् भेदाभेद।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान  का फल पुण्य व मोक्ष तथा उसका समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.1 |  धर्मध्यान का फल अतिशय पुण्य।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.2 |  धर्मध्यान का फल संवर,  निर्जरा व कर्मक्षय।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.3 |  धर्मध्यान का फल मोक्ष।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान का महिमा।–देखें [[ ध्यान#2 | ध्यान - 2]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.4 |  एक ही धर्मध्यान से मोहनीय का  उपशम व क्षय दोनों कैसे संभव है?]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.5 |  पुण्यास्रव व मोक्ष दोनों  होने का समन्वय।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.6 |  पर पदार्थों के चिंतवन से  कर्मक्षय कैसे संभव है?]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; पंचमकाल में  भी धर्मध्यान की सफलता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.1 |  यदि ध्यान से मोक्ष होता है  तो अब क्यों नहीं होता?]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.2 |  यदि इस काल में मोक्ष नहीं तो  ध्यान करने से क्या प्रयोजन।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.3 |  पंचम काल में भी अध्यात्म ध्यान  का कथंचित् सद्भाव व असद्भाव।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.4 |  परंतु इस काल में भी ध्यान  का सर्वथा अभाव नहीं है।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.5 |  पंचमकाल में शुक्लध्यान नहीं  पर धर्मध्यान अवश्य संभव है।]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निश्चय व्यवहार  धर्मध्यान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; साधु व श्रावक के योग्य  शुद्धोपयोग।‒देखें [[ अनुभव ]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.1 |  निश्चय धर्मध्यान का  लक्षण। ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; निश्चय धर्मध्यान  योग्य ध्येय व भावनाएँ।‒देखें [[ ध्येय ]]।  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.2 |  व्यवहार धर्मध्यान  का लक्षण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; बाह्य व आध्यात्मिक ध्यान  के लक्षण।‒देखें [[ धर्मध्यान#1 | धर्मध्यान - 1]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; व्यवहार ध्यान योग्य  अनेकों ध्येय।‒देखें [[ ध्येय ]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; सब ध्येयों में आत्मा  प्रधान है।‒देखें [[ ध्येय ]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; परम ध्यान के अपर नाम।‒देखें [[ मोक्षमार्ग#2.5 | मोक्षमार्ग - 2.5]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #6.3 | निश्चय ही ध्यान  सार्थक है व्यवहार नहीं। ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #6.4 | व्यवहारध्यान  कथंचित् अज्ञान है। ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #6.5 | व्यवहारध्यान निश्चय  का साधन है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #6.6 | निश्चय व व्यवहार ध्यान  में साध्य साधकपने का समन्वय।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #6.7 | निश्चय व व्यवहार ध्यान  में ‘निश्चय’ शब्द की आंशिक प्रवृत्ति।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #6.8 | निरीह भाव से किया गया  सभी उपयोग एक आत्मोपयोग ही है।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; सविकल्प अवस्था से  निर्विकल्पावस्था में चढ़ने का क्रम।‒देखें [[ धर्म#6.4 | धर्म - 6.4]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;धर्मध्यान व  उसके भेदों का सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान  सामान्य का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.1&amp;quot;&amp;gt; धर्म से  युक्त ध्यान&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1709/1541  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;धम्मस्स लक्खणंसे  अज्जक्लहुगत्तमद्दवोवसमा। उवदेसणा य सुत्ते णिसग्गजाओ रुचीओ दे।1709।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिससे  धर्म का परिज्ञान होता है वह धर्मध्यान का लक्षण समझना चाहिए। आर्जव, लघुत्व,  मार्दव और उपदेश ये इसके लक्षण हैं। (मूल आराधना /679)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/28/445/11  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धर्मो व्याख्यात:।  धर्मादनपेत धर्म्यम् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;धर्म का व्याख्यान पहले कर आये हैं (उत्तम क्षमादि  लक्षणवाला धर्म है) जो धर्म से युक्त होता है वह धर्म्य है। &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; (सर्वार्थसिद्धि/9/36/450/4); (राजवार्तिक/9/28/3/627/30); (राजवार्तिक/9/36/11/632/11); (महापुराण/21/133); (तत्त्वानुशासन/54);  (भावपाहुड़ टीका/78/226/17) &amp;lt;/span&amp;gt;।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;strong&amp;gt;नोट&amp;lt;/strong&amp;gt;—यहाँ धर्म  के अनेकों लक्षणों के लिए (देखो धर्म/1) उन सभी प्रकार के धर्मों से युक्त  प्रवृत्ति का नाम धर्मध्यान है, ऐसा समझना चाहिए। इस लक्षण की सिद्धि के लिए‒दे.([[धर्मध्यान#4.5.2 | धर्मध्यान - 4.5.2]])।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.2&amp;quot;&amp;gt; शास्त्र, स्वाध्याय व तत्त्व चिंतवन&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/मूल/97 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;पावारंभणिवित्ती  पुण्णारंभपउत्तिकरणं पि। णाण धम्मज्झाणं जिणभणियं सव्वजीवाणं।97।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पाप कार्य  की निवृत्ति और पुण्य कार्यों में प्रवृत्ति का मूलकारण एक सम्यग्ज्ञान है,  इसलिए मुमुक्षु जीवों के लिए सम्यग्ज्ञान (जिनागमाभ्यास-गाथा 98) ही धर्मध्यान  श्री जिनेंद्रदेव ने कहा है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1710  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;आलंबणं च वायण पुच्छण  परिवट्टणाणुपेहाओ। धम्मस्स तेण अविसुद्धाओ सव्वाणुपेहाओ।1710। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;वाचना, पृच्छना,  अनुप्रेक्षा, आम्नाय और परिवर्तन ये स्वाध्याय के भेद हैं। ये भेद धर्मध्यान  के आधार भी हैं। इस धर्मध्यान के साथ अनुप्रेक्षाओं का अविरोध है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1875/1680 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 21/67 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/81 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानसार/17  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;जीवादयो ये पदार्था:  ध्यातव्या: ते यथास्थिता: चैव। धर्मध्यानं भणितं रागद्वेषौप्रमुच्य... ।17।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;राग द्वेष  को त्यागकर अर्थात् साम्यभाव से जीवादि पदार्थों का, वे जैसे-जैसे अपने स्वरूप  में स्थित हैं, वैसे-वैसे ध्यान या चिंतवन करना धर्मध्यान कहा गया है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/3/29  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;पुण्याशयवशाज्जातं  शुद्धलेश्यावलंबनात् । चिंतनाद्वस्तुतत्त्वस्य प्रशस्तं ध्यानमुच्यते।29।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पुण्यरूप  आशय के वश से तथा शुद्धलेश्या के अवलंबन से और वस्तु के यथार्थ स्वरूप चिंतवन  से उत्पन्न हुआ ध्यान प्रशस्त कहलाता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/25/18 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.3&amp;quot;&amp;gt; रत्नत्रय व  संयम आदि में चित्त को लगाना&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            मूलाचार/678-680&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt; दंसणणाणचरित्ते  उवओगे संजमे विउस्सगो। पचक्खाणे करणे पणिधाणे तह य समिदीसु।678। विज्जाचरणमहव्वदसमाधिगुणबंभचेरछक्काए।  खमणिग्गह अज्जवमद्दवमुत्ती विणए च सद्दहणे।679। एवंगुणो महत्थो मणसंकल्पो पसत्थ  वीसत्थो। संकप्पोत्ति वियाणह जिणसासणसम्मदं सव्वं।680।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दर्शन ज्ञान चारित्र  में, उपयोग में, संयम में, कायोत्सर्ग में, शुभ योग में, धर्मध्यान में, समिति  में, द्वादशांग में, भिक्षाशुद्धि में, महाव्रतों में, संन्यास में, गुण में,  ब्रह्मचर्य में, पृथिवी आदि छह काय जीवों की रक्षा में, क्षमा में, इंद्रिय  निग्रह में, आर्जव में, मार्दव में, सब परिग्रह त्याग में, विनय में, श्रद्धान  में; इन सबमें जो मन का परिणाम है, वह कर्मक्षय का कारण है, सबके विश्वास योग्य  है। इस प्रकार जिनशासन में माना गया सब संकल्प है; उसको तुम शुभ ध्यान जानो।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.1.4&amp;quot;&amp;gt;परमेष्ठी  आदि की भक्ति&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/48/205/3   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पंचपरमेष्ठिभक्त्यादितदनुकूलशुभानुष्ठानं पुनर्बहिरंगधर्मध्यानं भवति।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पंच  परमेष्ठी की भक्ति आदि तथा उसके अनुकूल शुभानुष्ठान (पूजा, दान, अभ्युत्थान,  विनय आदि) बहिरंग धर्मध्यान होता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचास्तिकाय / तात्पर्यवृत्ति/150/217/16 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान  के चिह्न&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 54-55/76  &amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;आगमउवदेसाणा णिसग्गदो जं जिणप्पणीयाणं। भावाणं सद्दहणं धम्मज्भाणस्स तल्लिगं।54।  जिणसाहु-गुणक्कित्तण-पसंसणा-विणय-दाणसंपण्णा। सुद सीलसंजमरदा धम्मज्झाणे  मुणेयव्वा।55।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आगम, उपदेश और जिनाज्ञा के अनुसार निसर्ग से जो जिन भगवान् के  द्वारा कहे गये पदार्थों का श्रद्धान होता है वह धर्मध्यान का लिंग है।54। जिन और  साधु के गुणों का कीर्तन करना, प्रशंसा करना, विनय-दानसंपन्नता, श्रुत, शील और  संयम में रत होना, ये सब बातें धर्मध्यान में होती हैं।55।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        म.सु./21/159-161 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रसन्नचित्तता  धर्मसंवेग: शुभयोगता सुश्रुतत्वं समाधानं आज्ञाधिगमजा: रुचि:।159। भवंत्येतानि  लिंगानि धर्म्यस्यांतर्गतानि वै। सानुप्रेक्षाश्च पूर्वोक्ता विविधा:  शुभभावना:।160। बाह्यं च लिंगमंगानां संनिवेश: पुरोदित:। प्रसन्नवक्त्रता सौम्या  दृष्टिश्चेत्यादि लक्ष्यताम् ।161।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;प्रसन्नचित्त रहना, धर्म से प्रेम करना,  शुभयोग रखना, उत्तम शास्त्रों का अभ्यास करना, चित्त स्थिर रखना और शास्त्राज्ञा  तथा स्वकीय ज्ञान से एक प्रकार की विशेष रुचि (प्रतीति अथवा श्रद्धा) उत्पन्न  होना, ये धर्मध्यान के बाह्य चिह्न हैं, और अनुप्रेक्षाएँ तथा पहले कही हुई अनेक  प्रकार की शुभ भावनाएँ उसके अंतरंग चिह्न हैं।159-160। पहले कहा हुआ अंगों का  सन्निवेश होना, अर्थात् पहले जिन पर्यंकादि आसनों का वर्णन कर चुके हैं (देखें [[ कृतिकर्म ]])  उन आसनों को धारण करना, मुख की प्रसन्नता होना, और दृष्टि का सौम्य होना आदि सब  भी धर्मध्यान के बाह्य चिह्न समझने चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/41/15-1 में उद्धृत- &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अलौल्यमारोग्यमनिष्ठुरत्वं  गंध: शुभो मूत्रपुरीषमल्पम् । कांति: प्रसाद: स्वरसौम्यता च योगप्रवृत्ते:  प्रथमं हि चिह्नम् ।1। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;विषय लंपटता का न होना शरीर नीरोग होना, निष्ठुरता का  न होना, शरीर में से शुभ गंध आना, मलमूत्र का अल्प होना, शरीर की कांति  शक्तिहीन न होना, चित्त की प्रसन्नता, शब्दों का उच्चारण सौम्य होना–ये चिह्न  योग की प्रवृत्ति करने वाले के अर्थात् ध्यान करने वाले के प्रारंभ दशा में  होते हैं। (विशेष देखें [[ ध्याता ]])। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;धर्मध्यान  योग्य सामग्री&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/57/229/3 में उद्धृत– &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;‘तथा  चोक्तं–’वैराग्यं तत्त्वविज्ञानं नैर्ग्रंथ्यं समचित्तता। परीषहजयश्चेति पंचैते  ध्यानहेतव:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सो ही कहा है कि–वैराग्य, तत्त्वों का ज्ञान, परिग्रहत्याग, साम्यभाव  और परीषहजय ये पाँच ध्यान के कारण हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/75,218  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;संगत्याग: कषायाणां  निग्रहो व्रतधारणम् । मनोऽक्षाणां जयश्चेति सामग्रीध्यानजन्मनि।75। ध्यानस्य  च पुनर्मुख्यो हेतुरेतच्चतुष्टयम् । गुरूपदेश: श्रद्धानं सदाभ्यास: स्थिरं मन:।218। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;परिग्रह त्याग, कषायनिग्रह, व्रतधारण, इंद्रिय व मनोविजय, ये सब ध्यान की उत्पत्ति  में सहायभूत सामग्री हैं।75। गुरूपदेश, श्रद्धान, निरंतर अभ्यास और मन की  स्थिरता, ये चार ध्यान की सिद्धि के मुख्य कारण हैं। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/3/15-25 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        देखें [[ ध्यान#3 | ध्यान - 3]] (धर्मध्यान के योग्य  उत्कृष्ट मध्यम व जघन्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव रूप सामग्री विशेष)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान  के भेद&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.4.1&amp;quot;&amp;gt;आज्ञा, अपाय,  विचय आदि ध्यान&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वार्थसूत्र/9/36  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय  धर्म्यम् ।36।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान, इनकी विचारणा के लिए मन को  एकाग्र करना धर्म्यध्यान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1708/1536 &amp;lt;/span&amp;gt;); (मूल आराधना /398); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/33/5 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/70/12 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/134 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/33/5 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/98 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/48/202/3 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भावपाहुड़ टीका/119/269/24 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा टीका/480/366/4 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/1/7/14/40/16  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धर्मध्यानं  दशविधम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/172/4  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्वसंवेद्यमाध्यात्मिकम्  । तद्दशविधं अपायविचयं, उपायविचयं, जीवविचयं, अजीवविचयं, विपाकविचयं, विरागविचयं,  भवविचयं, संस्थानविचयं, आज्ञाविचयं, हेतुविचयं चेति। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आध्यात्मिक धर्मध्यान दश  प्रकार का है–अपायविचय, उपायविचय, जीवविचय, अजीवविचय, विपाकविचय, विरागविचय,  भवविचय, संस्थानविचय, आज्ञाविचय और हेतुविचय। &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt;(हरिवंशपुराण/56/38-50 &amp;lt;/span&amp;gt;), (भावपाहुड़ टीका 119/270/2)&amp;lt;/span&amp;gt;।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.4.2&amp;quot;&amp;gt; निश्चय व्यवहार  या बाह्य व आध्यात्मिक आदि भेद&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/172/3 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; धर्म्यध्यानं  बाह्याध्यात्मिकभेदेन द्विप्रकारम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;धर्म्यध्यान बाह्य और आध्यात्मिक के भेद  से दो प्रकार का है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/36 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/47-49/96  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मुख्योपचारभेदेन  धर्म्यध्यानमिह द्विधा।47। ध्यानान्यपि त्रिधा।48। उत्तमम् ...जघन्यं...मध्यमम्  ।49। निश्चयाद् व्यवहारच्च ध्यानं द्विविधमागमे।...।96।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मुख्य और उपचार के भेद  से धर्म्यध्यान दो प्रकार का है।47। अथवा उत्कृष्ट मध्यम व जघन्य के भेद से  तीन प्रकार का है।49। अथवा निश्चय व व्यवहार के भेद से दो प्रकार का है।96।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5&amp;quot; id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt;आज्ञा विचय  आदि ध्यानों के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.1&amp;quot;&amp;gt; अजीव विचय&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/44  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;द्रव्याणामप्यजीवानां  धर्माधर्मादिसंज्ञिनाम् । स्वभावचिंतनं धर्म्यमजीवविचयं मतम् ।44।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;धर्म-अधर्म  आदि अजीव द्रव्यों के स्वभाव का चिंतवन करना, सो अजीव विचय नाम का धर्म्यध्यान  है।44।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5.2-3&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.2-3&amp;quot;&amp;gt;2-3. अपाय व  उपाय विचय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1712/1544  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;कल्लाणपावगाण  उपाये विचिणादि जिणमदमुवेच्च। विचिणादि व अवाए जीवाण सुभे य असुभे य।1712। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिनमत  को प्राप्त कर कल्याण करने वाले जो उपाय हैं उनका चिंतवन करता है, अथवा जीवों  के जो शुभाशुभ भाव होते हैं, उनसे अपाय का चिंतवन करता है। (मूल आराधना /400); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 40/72 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 39/72 &amp;lt;/span&amp;gt;  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;रागद्दोसकसायासवादिकिरियासु वट्टमाणाणं। इहपरलोगावाए ज्झाएज्जो वज्जपरिवज्जी।39।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पाप को त्याग करने वाला साधु राग, द्वेष, कषाय और आस्रव आदि क्रियाओं में  विद्यमान जीवों के इहलोक और परलोक से अपाय का चिंतवन करे।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/36/449/11  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;जात्यंधवंमिथ्यादृष्टय:  सर्वज्ञप्रणीतमार्गाद्विमुखमोक्षार्थिन सम्यङ्मार्गापरिज्ञानात् सुदूरमेवापयंतीति  संमार्गापयाचिंतनमपायविचय:। अथवा–मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रेभ्य: कथं नाम इमे  प्राणिनोऽपेयुरिति स्मृतिसमन्वाहारोऽपायविचय:। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादृष्टि जीव जंमांध  पुरुष के समान सर्वज्ञ प्रणीत मार्ग से विमुख होते हैं, उन्हें सन्मार्ग का  परिज्ञान न होने से वे मोक्षार्थी पुरुषों को दूर से ही त्याग देते हैं, इस  प्रकार सन्मार्ग के अपाय का चिंतवन करना अपायविचय धर्म्यध्यान है। अथवा–ये  प्राणी मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र  से कैसे दूर होंगे इस प्रकार निरंतर चिंतन करना अपाय विचय धर्मध्यान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/6-7/630/16 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/141-142 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/वि/1708/1536/18 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वसार/7/41 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/34/1-17 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/39-41 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; संसारहेतव:  प्रायस्त्रियोगानां प्रवृत्तय:। अपायो वर्जनं तासां स मे स्यात्कथमित्यलम् ।39।  चिंताप्रबंधसंबंध: शुभलेश्यानुरंजित:। अपायविचयाख्यं तत्प्रथमं धर्म्यमभीप्सितम्  ।40। उपायविचयं तासां पुण्यानामात्मसात्क्रिया। उपाय: स कथं मे स्यादिति संकल्पसंतति:।41।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मन, वचन और काय इन तीन योगों की प्रवृत्ति ही, प्राय: संसार का कारण है सो इन  प्रवृत्तियों का मेरे अपाय अर्थात् त्याग किस प्रकार हो सकता है, इस प्रकार  शुभलेश्या से अनुरंजित जो चिंता का प्रबंध है वह अपायविचय नाम का प्रथम धर्म्यध्यान  माना गया है।39-40। पुण्य रूप योगप्रवृत्तियों को अपने आधीन करना उपाय कहलाता है,  वह उपाय मेरे किस प्रकार हो सकता है, इस प्रकार के संकल्पों की जो संतति है वह  उपाय विचय नाम का दूसरा धर्म्यध्यान है।41। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/173/3 &amp;lt;/span&amp;gt;), (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/वि/1708/1536/17 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/48/202/9 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.4&amp;quot;&amp;gt; आज्ञाविचय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1711/1543  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;पंचेव अत्थिकाया छज्जीवणिकाए  दव्वमण्णे य। आणागब्भे भावे आणाविचएण विचिणादि।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पाँच अस्तिकाय, छह जीवनिकाय,  काल, द्रव्य तथा इसी प्रकार आज्ञाग्राह्य अन्य जितने पदार्थ हैं, उनका यह  आज्ञाविचय ध्यान के द्वारा चिंतवन करता है। (मूलाचार/399); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 38/71 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/135-140 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 35-37/71 &amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;तत्थमइदुब्वलेण  य। तव्विजाइरियविरहदो वा वि। णेयगहत्तणेण य णाणावरदिएणं च।35। हेदूदाहरणासंभवे य  सरिंसुट्टठुज्जाणबुज्झेज्जो। सव्वणुसयमवितत्थं तहाविहं चिंतए मदिमं।36।  अणुवगहपराग्गहपरायणा जं जिणा जयप्पवरा। जियरायदोसमोहा ण अण्णहावाइणो तेण।37। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मति  की दुर्बलता होने से, अध्यात्म विद्या के जानकार आचार्यों का विरह होने से,  ज्ञेय की गहनता होने से, ज्ञान को आवरण करने वाले कर्म की तीव्रता होने से, और  हेतु तथा उदाहरण संभव न होने से, नदी और सुखोद्यान आदि चिंतवन करने योग्य स्थान  में मतिमान् ध्याता ‘सर्वज्ञ प्रतिपादित मत सत्य है’ ऐसा चिंतवन करे।35-36।  यत: जगत् में श्रेष्ठ जिनभगवान्, जो उनको नहीं प्राप्त हुए ऐसे अन्य जीवों का  भी अनुग्रह करने में तत्पर रहते हैं, और उन्होंने राग-द्वेष और मोह पर विजय  प्राप्त कर ली है, इसलिए वे अन्यथा वादी नहीं हो सकते।37।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/36/449/6  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;उपदेष्टुरभावांमंदबुद्धित्वात्कर्मोदयात्सूक्ष्मत्वाच्च  पदार्थानां हेतुदृष्टांतोपरमे सति सर्वज्ञप्रणीतमागमं प्रमाणीकृत्य इत्थमेवेदं  नान्यथावादिनो जिना:’ इति गहनपदार्थश्रद्धानादर्थावधारणमाज्ञाविचय:। अथवा स्वयं  विदितपदार्थ तत्त्वस्रू सत: परं प्रति पिपादयिषो: स्वसिद्धांताविरोधेन  तत्त्वसमर्थनार्थं तर्कनयप्रमाणयोजनपर: स्मृतिसमन्वहार:  सर्वज्ञाज्ञाप्रकाशनार्थत्वादाज्ञाविचय इत्युच्यते।449।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;उपदेष्टा आचार्यों का  अभाव होने से, स्वयं मंदबुद्धि होने से, कर्मों का उदय होने से और पदार्थों के  सूक्ष्म होने से, तथा तत्त्व के समर्थन में हेतु तथा दृष्टांत का अभाव होने  से, सर्वज्ञप्रणीत आगम को प्रमाण करके, ‘यह इसी प्रकार है, क्योंकि जिन अन्यथावादी  नहीं होते’, इस प्रकार गहनपदार्थ के श्रद्धान द्वारा अर्थ का अवधारण करना  आज्ञाविचय धर्मध्यान है। अथवा स्वयं पदार्थों के रहस्य को जानता है, और दूसरों  के प्रति उसका प्रतिपादन करना चाहता है, इसलिए स्वसिद्धांत के अविरोध द्वारा  तत्त्व का समर्थन करने के लिए, उसके जो तर्क नय और प्रमाण की योजनारूप निरंतर  चिंतन होता है, वह सर्वज्ञ की आज्ञा को प्रकाशित करने वाला होने से आज्ञाविचय  कहा जाता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/4-5/630/8 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/49 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/201/5 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वसार/7/40 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/33/6-22 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/48/202/6 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.5.5&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; जीवविचय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/42-43  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अनादिनिधना जीवा द्रव्यार्थादन्यथान्यथा।  असंख्येयप्रदेशास्ते स्वोपयोगत्वलक्षणा: ।42। अचेतनोपकरणा: स्वकृतोचितभोगिन:।  इत्यादिचेतनाध्यानं यज्जीवविचयं हि तत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यार्थिकनय से जीव अनादि निधन  है, और पर्यायार्थिक नय से सादिसनिधन है, असंख्यात प्रदेशी है, उपयोग लक्षणस्वरूप  है, शरीररूप अचेतन उपकरण से युक्त है, और अपने द्वारा किये गये कर्म के फल को  भोगते हैं...इत्यादि रूप से जीव का जो ध्यान करना है वह जीवविचय नाम का तीसरा  धर्मध्यान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/173/5 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.5.6&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; भवविचय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/47  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;प्रेत्यभावो भवोऽमीषां चतुर्गतिषु  देहिनाम् । दु:खात्मेत्यादिचिंता तु भवादिविचयं पुन:।47।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चारों गतियों में  भ्रमण करने वाले इन जीवों को मरने के बाद जो पर्याय होती है वह भव कहलाता है। यह  भव दु:खरूप है। इस प्रकार चिंतवन करना सो भवविचय नाम का सातवाँ धर्मध्यान  है।(&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/176/1 &amp;lt;/span&amp;gt;) &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.5.7&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; विपाकविचय&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1713/1545  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;एयाणेयभवगदं जीवाणं पुण्णपावकम्मफलं।  उदओदीरण संकमबंधे मोक्खं च विचिणादि।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जीवों को जो एक और अनेक भव में पुण्य और  पापकर्म का फल प्राप्त होता है उसका तथा उदय, उदीरणा, संक्रमण, बंध और मोक्ष का  चिंतवन करता है। (मूलाचार/401); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 42/72 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/36/450/2 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/8-9/630-632 में विस्तृत कथन  &amp;lt;/span&amp;gt;), (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना / विजयोदया टीका/1708/1536/21 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/143-147 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वसार/7/42 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/35/1-31 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/48/202/10 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/45  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यच्चतुर्विधबंधस्य  कर्मणोऽष्टविधस्य तु विपाकचितनं धर्म्यं विपाकविचयं विदु:।45।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;ज्ञानावरणादि आठ  कर्मों के प्रकृति, स्थिति और अनुभाग रूप चार प्रकार के बंधों के विपाक फल का  विचार करना, सो विपाक विचय नामका पाँचवा धर्मध्यान है।(&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/174/2 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.5.8&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; विराग विचय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/46  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;शरीरमशुचिर्भोगा किंपाकफलपाकिन:।  विरागबुद्धिरित्यादि विरागवियं स्मृतम् ।46।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शरीर अपवित्र है और भोग किंपाकफल  के समान तदात्व मनोहर हैं, इसलिए इनसे विरक्तबुद्धि का होना ही श्रेयस्कर है,  इत्यादि चिंतन करना विरागविचय नाम का छठा धर्म्यध्यान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/171/1 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.5.9&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.9&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; संस्थान  विचय &amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            (देखो आगे पृथक् शीर्षक)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.5.10&amp;quot; id=&amp;quot;1.5.10&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; हेतु विचय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/50  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तर्कानुसारिण: पुंस: स्याद्वादप्रक्रियाश्रयात्  । सन्मार्गाश्रयणध्यानं यद्धेतुविचयं हि तत् ।50। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;और तर्क का अनुसरण करने वाले पुरुष स्याद्वाद की प्रक्रिया का आश्रय लेते हुए समीचीन मार्ग का आश्रय करते हैं, इस प्रकार चिंतवन  करना सो हेतुविचय नामका दसवाँ धर्म्यध्यान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/202/3 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.6&amp;quot; id=&amp;quot;1.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; संस्थानविचय  धर्मध्यान का स्वरूप&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/गाथा 43-50/72/13 &amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;तिण्णं लोगाणं  संठाणपमाणाआउयादिचिंतणं संठाणविचयं णाम चउत्थं धम्मज्झाणं। एत्थ  गाहाओ—जिणदेसियाइ लक्खणसंठाणासणविहाणमाणाइं। उप्पादट्ठिदिभंगादिपज्यपा जे य दव्वाणं।43।  पंचत्थिकायमइयं लोयमणाइणिहणं जिणक्खादं। णामादिभेयविहियं तिविहमहोलोगभागदिं।44।  खिदिवलयदीवसायरणयरविमाणभवणादिसंठाणं। वोमादि पडिट्ठाणं णिययं लोगटि्ठदिविहाणं।45।  उवजोगलक्खणमणाइणिहणमत्थंतरं सरीरादो। जीवमरूविं कारिं भोइं य सयस्स कम्मस्स।46।  तस्स य सकम्मजणियं जम्माइजलं कसायपायालं। वसणसयसावमीणं मोहावत्तं महाभीमं।47।  णाणमयकण्णहारं वरचारित्तमयमहापोयं। संसारसागरमणोरपारमसुहं विचिंतेज्जो।48। सव्वणयसमूहमयं  ज्झायज्जो समयसब्भावं।49। ज्झाणोवरमे वि मुणी णिच्चमणिच्चादि चिंतणापरमो।  होइ सुभावियचित्तो धम्मज्झाणे किह व पुव्वं।50।&amp;lt;/span&amp;gt;=&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; तीन लोकों के संस्थान, प्रमाण और आयु आदि का चिंतवन करना संस्थान विचय नाम का चौथा धर्म ध्यान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/36/450/3 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/10/632/9 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना / विजयोदया टीका/1708/1536/23 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वसार/7/43 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/36/184-186 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/48/203/2 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; जिनदेव के द्वारा कहे गये छह द्रव्यों के लक्षण, संस्थान, रहने का स्थान, भेद, प्रमाण उनकी उत्पाद स्थिति और व्यय आदिरूप पर्यायों का  चिंतवन करना।43। पंचास्तिकाय का चिंतवन करना।44। (देखें  पीछे[[ जीव ]]अजीव विचय के  लक्षण)। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; अधोलोक आदि भागरूप से तीन प्रकार के (अधो, मध्य व ऊर्ध्व) लोक का,  तथा पृथिवी, वलय, द्वीप, सागर, नगर, विमान, भवन आदि के संस्थानों (आकारों) का एवं  उसका आकाश में प्रतिष्ठान, नियत और लोकस्थिति आदि भेद का चिंतवन करे।44-45। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1714/1545 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (मूलाचार/402); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/480 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/148-150 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/36/1-10,82-90 &amp;lt;/span&amp;gt;); (विशेष  देखें [[ लोक ]]) &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; जीव उपयोग लक्षणवाला है, अनादिनिधन है, शरीर से भिन्न है, अरूपी है,  तथा अपने कर्मों का कर्ता और भोक्ता है।46। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/151 &amp;lt;/span&amp;gt;) (और देखें  पीछे जीव विचय  का लक्षण ) &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; उस जीव के कर्म से उत्पन्न हुआ जन्म, मरण आदि यही जल है, कषाय यही  पाताल है, सैकड़ों व्यसनरूपी छोटे मत्स्य हैं; मोहरूपी आवर्त हैं, और अत्यंत  भयंकर है, ज्ञानरूपी कर्णधार है, उत्कृष्ट चारित्रमय महापोत है। ऐसे इस अशुभ और  अनादि अनंत (आध्यात्मिक) संसार का चिंतवन करे।47-48। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/152-153 &amp;lt;/span&amp;gt;) &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; बहुत कहने से क्या लाभ, यह जितना जीवादि पदार्थों का विस्तार कहा है, उस सबसे  युक्त और सर्व नय समूह मय समय सद्भाव का (द्वादशांग मय सकल श्रुत का) ध्यान करे।49। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/154 &amp;lt;/span&amp;gt;)  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; ऐसा ध्यान करके उसके अंत में मुनि निरंतर अनित्यादि भावनाओं के चिंतवन  में तत्पर होता है। जिससे वह पहले की भाँति धर्मध्यान में सुभावित चित्त होता है।50।  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1714/1545 &amp;lt;/span&amp;gt;); (मूलाचार/402); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/177/1 &amp;lt;/span&amp;gt;); (विराग विचय का लक्षणी) &amp;lt;strong&amp;gt;नोट&amp;lt;/strong&amp;gt;—(अनुप्रेक्षाओं  के भेद व लक्षण‒देखें [[ अनुप्रेक्षा ]]) &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/36/श्लो.नं. &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; (नरक के दु:खों का चिंतवन  करे)।11-81। (विशेष देखो नरक) (भव विचय का लक्षण) &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; (स्वर्ग सुख तथा देवेंद्रों  के वैभव आदि का चिंतवन।90-182। (विशेष देखें [[ स्वर्ग ]]) &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; (सिद्धलोक का तथा सिद्धों  के स्वरूप का चिंतवन करे।183। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; (अंत में कर्ममल से रहित अपनी निर्मल आत्मा  का चिंतवन करे)।185। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.7&amp;quot; id=&amp;quot;1.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; संस्थान विचय के पिंडस्थ  आदि भेदों का निर्देश &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/37/1  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तथा भाषाकार  की उत्थानिका‒पिंडस्थं च पदस्थं च स्वरूपस्थं रूपवर्जितम् । चतुर्धा ध्यानमाम्नातं  भव्यराजीवभास्करै:।1।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस संस्थान विचय नाम धर्मध्यान में चार भेद कहे हैं,  उनका वर्णन किया जाता है‒जो भव्यरूपी कमलों को प्रफुल्लित करने के लिए सूर्य के  समान योगीश्वर हैं उन्होंने ध्यान को पिंडस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत  ऐसे चार प्रकार का कहा है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भावपाहुड़ टीका/86/236/13 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/48/205/3 में उद्धृत  &amp;lt;/span&amp;gt;—&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पदस्थं मंत्रवाक्यस्थं  पिंडस्थं स्वात्मचिंतनम् । रूपस्थं सर्वचिद्रूपं रूपातीतं निरंजनम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/49/209/7  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पदस्थपिंडस्थरूपस्थध्यानत्रयस्य  ध्येयभूतमर्हत्सर्वज्ञस्वरूपं दर्शयामीति।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मंत्रवाक्यों में स्थिति पदस्थ,  निजात्मा का चिंतवन पिंडस्थ, सर्वचिद्रूप का चिंतवन रूपस्थ और निरंजन का  (त्रिकाली शुद्धात्मा का) ध्यान रूपातीत है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भावपाहुड़ टीका/86/236  &amp;lt;/span&amp;gt;पर उद्धृत)  पदस्थ, पिंडस्थ व रूपस्थ में अर्हंत सर्वज्ञ ध्येय होते हैं। &amp;lt;strong&amp;gt;नोट‒&amp;lt;/strong&amp;gt;उपरोक्त  चार भेदों में पिंडस्थ ध्यान तो अर्हंत भगवान् की शरीराकृति का विचार करता है,  पदस्थ ध्यान पंचपरमेष्ठी के वाचक अक्षरों व मंत्रों का अनेक प्रकार से विचार  करता है, रूपस्थ ध्यान निज आत्मा का पुरुषाकाररूप से विचार करता है और रूपातीत  ध्यान विचार व चिंतवन से अतीत मात्र ज्ञाता द्रष्टा रूप से ज्ञान का भवन है  (देखें [[ उन उनके लक्षण व विशेष ]]) तहाँ पहिले तीन ध्यान तो धर्मध्यान में गर्भित हैं  और चौथा ध्यान पूर्ण निर्विकल्प होने से शुक्लध्यान रूप है (देखें [[ शुक्लध्यान ]])  इस प्रकार संस्थान विचय धर्मध्यान का विषय बहुत व्यापक है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;1.8&amp;quot; id=&amp;quot;1.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; बाह्य व आध्यात्मिक ध्यान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/56/36-38  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;लक्षणं द्विविधं तस्य बाह्याध्यात्मिकभेदत:।  सूत्रार्थमार्गणं शीलं गुणमालानुरागिता।36। जंभाजृंभाक्षुतोद्गारप्राणापानादिमंदता।  निभृतात्मव्रतात्मत्वं तत्र बाह्यं प्रकीर्तितम् ।37। दशधाऽऽध्यात्मिकं धर्म्यमपायविचयादिकम्  ।...।38।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;बाह्य और अभ्यंतर के भेद से धर्म्यध्यान का लक्षण दो प्रकार का है।  शास्त्र के अर्थ की खोज करना, शीलव्रत का पालन करना, गुणों के समूह में अनुराग  रखना, अँगड़ाई, जमुहाई, छींक, डकार और श्वासोच्छवास में मंदता होना, शरीर को निश्चल  रखना तथा आत्मा को व्रतों से युक्त करना, यह धर्म्यध्यान का बाह्य लक्षण है। और  आभ्यंतर लक्षण अपाय विचय आदि के भेद से दस प्रकार का है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/172/3  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धर्म्यध्यानं बाह्याध्यात्मिकभेदेन द्विप्रकारम्  । तत्र परानुमेयं बाह्यं सूत्रार्थगवेषणं  दृढव्रतशीलगुणानुरागानिभृतकरचरणवदनकायपरिस्पंदवाग्व्यापारं जृंभज्रंभोदारक्षवयुप्राणपातोद्रेकादिविरमणलक्षणं  भवति। स्वसंवेद्यमाध्यात्मिकम्, तदृशविधम्‒।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;बाह्य और आभ्यंतर के भेद से  धर्मध्यान दो प्रकार का है। जिसे अन्य लोग भी अनुमान से जान सकें उसे बाह्य  धर्मध्यान कहते हैं। सूत्रों के अर्थ की गवेषणा (विचार व मनन), व्रतों को दृढ़  रखना, शील गुणों में अनुराग रखना, हाथ, पैर, मुँह, काय का परिस्पंदन और वचनव्यापार  का बंद करना, जभाई, जंभाई के उद्गार प्रगट करना, छींकना तथा प्राण-अपान का  उद्रेक आदि सब क्रियाओं का त्याग करना बाह्य धर्मध्यान है। जिसे केवल अपना आत्मा  ही जान सके उसे आध्यात्मिक कहते हैं। वह आज्ञाविचय आदि के भेद से दस प्रकार का  है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान में सम्यक्त्व व भावों आदि का निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.1&amp;quot; id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान में विषय परिवर्तन निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति/196/262/9  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अथ ध्यानसंतान: कथ्यते‒यत्रांतर्मुहूर्त्तपर्यंतं  ध्यानं तदनंतरमंतर्मुहूर्तपर्यंते तत्त्वचिंता, पुनरप्यंतर्मुहूर्तपर्यंतं  ध्यानम् । पुनरपि तत: चिंतेति प्रमत्ताप्रमत्तगुणस्थानवदंतर्मुहूर्तेऽंतमुहूर्ते  गते सति परावर्तनमस्ति स ध्यानसंतानो भण्यते।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;ध्यान की संतान बताते हैं‒जहाँ अंतर्मुहूर्तपर्यंत  ध्यान होता है, तदनंतर अंतर्मुहूर्त पर्यंत तत्त्वचिंता होती है। पुन:  अंतर्मुहूर्तपर्यंत ध्यान होता है, पुन: तत्त्वचिंता होती है। इस प्रकार  प्रमत्त व अप्रमत्त गुणस्थान की भाँति अंतर्मुहूर्त में परावर्तन होता रहता है,  उसे ही ध्यान की संतान कहते हैं। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/203/2 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2.2&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान में संभव भाव व लेश्याएँ&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/53/76  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;होंति कम्मविसुद्धाओ लेस्साओ पीय  पउमसुक्काओ। धम्मज्झाणोवगयस्स तिव्वमंदादिभेयाओ।53।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;धर्मध्यान को प्राप्त  हुए जीव के तीव्र मंद आदि भेदों को लिये हुए, क्रम से विशुद्धि को प्राप्त हुई  पीत, पद्म और शुक्ल लेश्याएँ होती हैं। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/156 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/203  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वमेतत् धर्मध्यानं पीतपद्मशुक्ललेश्या  बलाधानम् ...परोक्षज्ञानत्वात् क्षायोपशमिकभावम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सर्व ही प्रकार के धर्मध्यान  पीत पद्म व शुक्ललेश्या के बल से होता हैं, तथा परोक्षज्ञानगोचर होने से क्षायोपशमिक  हैं।(&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/156-157 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/41/14  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धर्मध्यानस्य विज्ञेया स्थितिरांतर्मुहूर्तकी।  क्षायोपशमिको भावो लेश्या शुक्लैव शाश्वती।14।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस धर्मध्यान की स्थिति अंतर्मुहूर्त  है, इसका भाव क्षायोपशमिक है और लेश्या सदा शुक्ल ही रहती है। (यहाँ धर्मध्यान  के अंतिम पाये से अभिप्राय है)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2.3&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; वास्तविक धर्मध्यान मिथ्यादृष्टि को संभव नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; नयचक्र बृहद्/179  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;झाणस्स भावणाविय ण हु सो आराहओ हवे नियमा। जो  ण विजाणइ वत्थुं पमाणणयणिच्छियं किच्चा।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो प्रमाण व नय के द्वारा वस्तु का  निश्चय करके उसे नहीं जानता, वह ध्यान की भावना के द्वारा भी आराधक नहीं हो  सकता। ऐसा नियम है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/6/4  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;‘रत्नत्रयमनासाद्य य: साक्षाद्धयातुमिच्छति।  खपुष्पै: कुरुते मूढ: स वंध्यासुतशेखरम् /4।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/4/18,30  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SankritText&amp;quot;&amp;gt;दुर्दृशामपि न ध्यानसिद्धि: स्वप्नेऽपि  जायते। गृह्णतां दृष्टिवैकल्याद्वस्तुजातं यदृच्छयो ।18। ध्यानतंत्रे निषेध्यंते  नैते मिथ्यादृश: परम् । मुनयोऽपि जिनेशाज्ञाप्रत्यनीकाश्चलाशया:/30। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो पुरुष  साक्षात् रत्नत्रय को प्राप्त न होकर ध्यान करना चाहता है, वह मूर्ख आकाश के  फूलों से वंध्यापुत्र के लिए सेहरा बनाना चाहता है।4। दृष्टि की विकलता से वस्तु समूह  को अपनी इच्छानुसार ग्रहण करने वाले मिथ्यादृष्टियों के ध्यान की सिद्धि स्वप्न  में भी नहीं होती है।18। सिद्धांत में ध्यानमात्र केवल मिथ्यादृष्टियों के ही  नहीं निषेधते हैं, किंतु जो जिनेंद्र भगवान् की आज्ञा के प्रतिकूल हैं तथा  जिनका चित्त चलित है और जैन साधु कहाते हैं, उनके भी ध्यान का निषेध किया जाता  है, क्योंकि उनके ध्यान की सिद्धि नहीं होती/30।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/209  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नोपलब्धिरसिद्धास्य स्वादुसंवेदनात्स्वयम्  । अन्यादेशस्य संस्कारमंतरेण सुदर्शनात् ।209।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;संसारी जीवों के मैं सुखी  दु:खी इत्यादि रूप से सुख-दु:ख के स्वाद का अनुभव होने के कारण अशुद्धोपलब्धि असिद्ध  नहीं है, क्योंकि उनके स्वयं ही दूसरी अपेक्षा का (स्वरूपसंवेदन का) संस्कार  नहीं होता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2.4&amp;quot; id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; गुणस्थानों की अपेक्षा धर्मध्यान का स्वामित्व&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/36/450/5  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धर्म्यध्यानं चतुर्विकल्पमवसेयम् ।  तदविरतदेशविरतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां भवति।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/37/453/6  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;श्रेण्यारोहणात्प्राग्धर्म्यं श्रेण्यो  शुक्ले इति व्याख्याते।&amp;lt;/span&amp;gt; =&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; धर्मध्यान चार प्रकार का जानना चाहिए। यह अविरत,  देशविरत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्त संयत जीवों के होता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/13/632/18 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/28/28 &amp;lt;/span&amp;gt;)। = &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; श्रेणी चढ़ने से पूर्व धर्मध्यान होता है और दोनों श्रेणियों  में आदि के दो शुक्लध्यान होते हैं। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/37/2/633/3 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/74/10   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजदपमत्तसंजद-अप्पमत्तसंजद-अपुव्वसंजद-अणियट्टिसंजद-सुहुमसांपराइयखवगोवसामएसु  धम्मज्झाणस्स पवुत्ती होदि त्ति जिणावएसादो। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; असंयतसम्यग्दृष्टि,  संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, क्षपक व उपशामक अपूर्वकरणसंयत, क्षपक व  उपशामक अनिवृत्तिकरणसंयत, क्षपक व उपशामक सूक्ष्मसांपरायसंयत जीवों के धर्मध्यान  की प्रवृत्ति होती है; ऐसा जिनदेव का उपदेश है। (इससे जाना जाता है कि धर्मध्यान  कषाय सहित जीवों के होता है और शुक्लध्यान उपशांत या क्षीणकषाय जीवों के) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/9/37/453/4 &amp;lt;/span&amp;gt;);  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/37/2/632/32 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2.5&amp;quot; id=&amp;quot;2.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान के स्वामित्व संबंधी शंकाएँ&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2.5.1&amp;quot; id=&amp;quot;2.5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; मिथ्यादृष्टियों को भी तो धर्मध्यान देखा जाता है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/हिं/1/36/747 &amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न—&amp;lt;/strong&amp;gt;मिथ्यादृष्टि अन्यमती  तथा भद्रपरिणामी व्रत, शील, संयमादि तथा जीवनि की दया का अभिप्रायकरि तथा भगवान्  की सामान्य भक्ति करि धर्मबुद्धितै चित्तकूं एकाग्रकरि चिंतवन करै है, तिनिके  शुभ धर्मध्यान कहिये कि नाहीं? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर—&amp;lt;/strong&amp;gt;इहाँ मोक्षमार्ग का प्रकरण है। तातै  जिस ध्यान तै कर्म की निर्जरा होय सो ही यहाँ गिणिये है। सो सम्यग्दृष्टि बिना  कर्म की निर्जरा होय नाहीं। मिथ्यादृष्टि के शुभध्यान शुभबंध ही का कारण है।  अनादि तै कई बार ऐसा ध्यानकरि शुभकर्म बांधे हैं, परंतु निर्जरा बिना  मोक्षमार्ग नाहीं। तातै मिथ्यादृष्टि का ध्यान मोक्षमार्ग में सराह्य नाहीं। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/पं.सदासुखदास/पृ.316 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/155  &amp;lt;/span&amp;gt;का भाषाकारकृत भावार्थ‒धर्मध्यान को धारण  करने के लिए कम से कम सम्यग्दृष्टि अवश्य होना चाहिए। मंदकषायी मिथ्यादृष्टि  जीवों के जो ध्यान होता है उसे शुभ भावना कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2.5.2&amp;quot; id=&amp;quot;2.5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; प्रमत्तजनों को ध्यान कैसे संभव है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/13/632/17  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कश्चिदाह‒धर्म्यमप्रमत्तसंयत्तस्यैवेति;  तन्न; किं कारणम् । पूर्वेषां विनिवृत्तिप्रसंगात् । असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयत-प्रमत्तसंयतानामपि  धर्मध्यानमिष्यते सम्यक्त्वप्रभवत्वात् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;—धर्मध्यान तो  अप्रमत्तसंयतों के ही होता है। &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;—नहीं, क्योंकि, ऐसा मानने से पहले के  गुणस्थानों में धर्मध्यान का निषेध प्राप्त होता है। परंतु सम्यक्त्व के  प्रभाव से असंयत सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और प्रमत्तसंयतजनों में भी धर्मध्यान  होना इष्ट है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;2.5.3&amp;quot; id=&amp;quot;2.5.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; कषाय रहित जीवों में ही ध्यान मानना चाहिए&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/14/632/21  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कश्चिदाह-उपशांतक्षीणकषाययोश्च  धर्म्यध्यानं भवति न पूर्वेषामेवेति; तन्न; किं कारणम् । शुक्लभावप्रसंगात् ।  उपशांतक्षीणकषाययोर्हि शुक्लध्यानमिष्यते तस्याभाव: प्रसज्येत। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न—&amp;lt;/strong&amp;gt;उपशांत  व क्षीणकषाय इन दो गुणस्थानों में धर्म्यध्यान होता, इससे पहिले गुणस्थानों  में बिलकुल नहीं होता ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर—&amp;lt;/strong&amp;gt;नहीं, क्योंकि, ऐसा मानने से शुक्लध्यान  के अभाव का प्रसंग प्राप्त होता है। उपशांत व क्षीण कषायगुणस्थान में शुक्लध्यान  होना इष्ट है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान व अनुप्रेक्षादि में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.1&amp;quot; id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;ध्यान, अनुप्रेक्षा, भावना व चिंता में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1710/1543  &amp;lt;/span&amp;gt;(देखें [[ धर्मध्यान#1.1.2 | धर्मध्यान - 1/1/2]])&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;‒धर्मध्यान आधेय  है और अनुप्रेक्षा उसका आधार है। अर्थात् धर्मध्यान करते समय अनुप्रेक्षाओं का  चिंतवन किया जाता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना/1714/1545 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/ &amp;lt;/span&amp;gt;गाथा 12/64  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;जं थिरमज्झवसाणं तं ज्झाणं जं चलंतयं चित्तं। तं होइ भावणा वा अणुपेहा वा अहव  चिंता।12। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो परिणामों की स्थिरता होती है उसका नाम ध्यान है, और जो चित्त का  एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में चलायमान होना है वह या तो भावना है, या अनुप्रेक्षा  है या चिंता है।12। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/9 &amp;lt;/span&amp;gt;)। (देखें [[ शुक्लध्यान -1/4]])।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/36/12/632/14   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्यादेतत्-अनुप्रेक्षा अपि धर्मध्यानेऽंतर्भवंतीति पृथगासामुपदेशोऽनर्थक  इति; तन्न; किं कारणम् । ज्ञानप्रवृत्तिविकल्पत्वात् । अनित्यादिविषयचिंतनं  यदा ज्ञानं तदा अनुप्रेक्षाव्यपदेशो भवति, यदा तत्रैकाग्रचिंतानिरोधस्तदा धर्म्यध्यानम्  ।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;—अनुप्रेक्षाओं का भी ध्यान में ही अंतर्भाव हो जाता है, अत:  उनका पृथक् व्यपदेश करना निरर्थक है? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;—नहीं, क्योंकि, ध्यान व  अनुप्रेक्षा ये दोनों ज्ञानप्रवृत्ति के विकल्प है। जब अनित्यादि विषयों में  बार-बार चिंतनधारा चालू रहती है तब वे ज्ञानरूप है और जब उनमें एकाग्र चिंतानिरोध  होकर चिंतनधारा केंद्रित हो जाती है, तब वे ध्यान कहलाती हैं। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/25/16  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;एकाग्रचिंतानिरोधो यस्तद्धयानभावनापरा।  अनुप्रेक्षार्थचिंता वा तज्झैरभ्युपगम्यते।16। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;ज्ञान का एक ज्ञेय में निश्चल  ठहरना ध्यान है और उससे भिन्न भावना है, जिसे विज्ञजन अनुप्रेक्षा या अर्थचिंता  भी कहते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भावपाहुड़  &amp;lt;/span&amp;gt;टीका/78/229/1 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;एकस्मिन्निष्टे वस्तुनि निश्चला  मतिर्ध्यानम् । आर्तरौद्रधर्मापेक्षया तु मतिश्चंचला अशुभा शुभा वा सा भावना  कथ्यते, चित्तं चिंतनं अनेकनययुक्तानुप्रेक्षणं ख्यापनं श्रुतज्ञानपदालोचनं वा  कथ्यते न तु ध्यानम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;किसी एक इष्ट वस्तु में मति का निश्चल होना ध्यान  है। आर्त, रौद्र और धर्मध्यान की अपेक्षा अर्थात् इन तीनों ध्यानों में मति  चंचल रहती है उसे वास्तव में अशुभ या शुभ भावना कहना चाहिए। अनेक नययुक्त अर्थ का  पुन:-पुन: चिंतन करना अनुप्रेक्षा, ख्यापन श्रुतज्ञान के पदों की आलोचना कहलाता  है, ध्यान नहीं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.2&amp;quot; id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; अथवा अनुप्रेक्षादि को अपायविचय धर्मध्यान में गर्भित  समझना चाहिए&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/142  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तदपायप्रतिकारचिंतोपायानुचिंतनम् ।  अत्रैवांतर्गतं ध्येयं अनुप्रेक्षादिलक्षणम् ।142।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अथवा उन अपायों (दु:खों)  के दूर करने की चिंता से उन्हें दूर करने वाले अनेक उपायों का चिंतवन करना भी  अपायविचय कहलाता है। बारह अनुप्रेक्षा तथा दशधर्म आदि का चिंतवन करना इसी  अपायविचय नाम के धर्मध्यान में शामिल समझना चाहिए।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.3&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; ध्यान व कायोत्सर्ग में अंतर&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,27/88/3 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; टि्ठयस्स णिसण्णस्स णिव्वण्णस्स वा  साहुस्स कसाएहि सह देहपरिच्चागो काउसग्गो णाम। णेदं ज्झाणस्संतो णिवददि;  बारहाणुवेक्खासु वावदचित्तस्स वि काओस्सग्गुववत्तीदो। एवं तवोकम्मं परूविदं।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;स्थित  या बैठे हुए कायोत्सर्ग करने वाले साधु का कषायों के साथ शरीर का त्याग करना  कायोत्सर्ग नाम का तप:कर्म है। इसका ध्यान में अंतर्भाव नहीं होता, क्योंकि  जिसका बारह अनुप्रेक्षाओं के चिंतवन में चित्त लगा हुआ है, उसके भी कायोत्सर्ग  की उत्पत्ति देखी जाती है। इस प्रकार तप:कर्म का कथन समाप्त हुआ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.4&amp;quot; id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; माला जपना आदि ध्यान नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/9/27/24/627/10  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्यान्मतं मात्रकालपरिगणनं ध्यानमिति:  तन्न; किं कारणम् । ध्यानातिक्रमात् । मात्राभिर्यदि कालगणनं क्रियते ध्यानमेव  न स्याद्वैयग्रयात् ।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;—समयमात्राओं का गिनना ध्यान है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर—&amp;lt;/strong&amp;gt;नहीं,  क्योंकि, ऐसा मानने से ध्यान के लक्षण का अतिक्रमण हो जाता है, क्योंकि, इसमें  एकाग्रता नहीं है। गिनती करने में व्यग्रता स्पष्ट ही है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.5&amp;quot; id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान व शुक्लध्यान में कथंचित् भेदाभेद&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.5.1&amp;quot; id=&amp;quot;3.5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; विषय व स्थिरता आदि की अपेक्षा दोनों समान हैं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            बा.अनु./64 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;सुद्धुवजोगेण पुणो धम्मं सुक्कं च होदि  जीवस्स। तम्हा संवरहेदू झाणोत्ति विचिंतये णिच्चं।64।&amp;lt;/span&amp;gt;=&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; शुद्धोपयोग से ही जीव  को धर्म्यध्यान व शुक्लध्यान होते हैं। इसलिए संवर का कारण ध्यान है, ऐसा  निरंतर विचारते रहना चाहिए। (देखें [[ मोक्षमार्ग#2.4 | मोक्षमार्ग - 2.4]]); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/180 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/74/1  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;जदि सव्वो समयसब्भावो धम्मज्झाणस्सेव  विसओ होदि तो सुक्कज्झाणेण णिव्विसएण होदव्वमिदि ? ण एस दोसो दोण्णं पि ज्झाणाणं  विसयं पडिभेदाभावादो। जदि एवं तो दोण्णं ज्झाणाणमेयत्तं पसज्जदे। कुदो। ...खज्जंतो  वि...फाडिज्जंतो वि ...कवलिज्जंतो वि...लालिज्जंतओ वि जिस्से अवत्थाए ज्झेयादो  ण चलदि सा जीवावत्था ज्झाणं णाम। एसो वि त्थिरभावो उभयत्थ सरिसो, अण्णहाज्झाणभावाणुववत्तीदो  त्ति। एत्थ परिहारो वुच्चदे‒सच्चं एदेहि दोहि विसरूवेहि दोण्णं ज्झाणाणं  भेदाभावादो।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;—&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; यदि समस्त समयसद्भाव (संस्थानविचय) धर्म्यध्यान  का ही विषय है तो शुक्लध्यान का कोई विषय शेष नहीं रहता ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;—यह कोई  दोष नहीं है, क्योंकि दोनों ही ध्यानों में विषय की अपेक्षा कोई भेद नहीं है।  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/210/3 &amp;lt;/span&amp;gt;) &amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;—यदि ऐसा है तो दोनों ही ध्यानों में अभेद प्राप्त  होता है ? क्योंकि (व्याघ्रादि द्वारा) भक्षण किया गया भी, (करोतों द्वारा)  फाड़ा गया भी, (दावानल द्वारा) ग्रसा गया भी, (अप्सराओं द्वारा) लालित किया गया  भी, जो जिस अवस्था में ध्येय से चलायमान नहीं होता, वह जीव की अवस्था ध्यान  कहलाती है। इस प्रकार का यह भाव दोनों ध्यानों में समान है, अन्यथा ध्यानरूप  परिणाम की उत्पत्ति नहीं हो सकती ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;—यह बात सत्य है, कि इन दोनों  प्रकार के स्वरूपों की अपेक्षा दोनों ही ध्यानों में कोई भेद नहीं है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
                &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/131  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;साधारणमिदं ध्येयं ध्यानयोर्धर्म्यशुक्लयो:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;विषय की अपेक्षा तो अभी तक जिन ध्यान करने योग्य पदार्थों का (देखें [[ धर्मध्यान  सामान्य व विशेष के लक्षण ]]) वर्णन किया गया है, वे सब धर्म्यध्यान और शुक्लध्यान  इन दोनों ही ध्यानों के साधारण ध्येय हैं। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/180 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;3.5.2&amp;quot; id=&amp;quot;3.5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; स्वामी, स्थितिकाल, फल व विशुद्धि की अपेक्षा भेद है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/75/8 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; तदो सकसायाकसायसामिभेदेण  अचिरकालचिरकालावट्ठाणेण य दोण्णं ज्झाणाणं सिद्धो भेआ।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/80/13  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;अट्ठावीसभेयभिण्णमोहणीयस्स सव्वुवसमावट्ठाणफलं  पुधत्तविदक्कवीचारसुक्कज्झाणं। मोहसव्वुसमो पुण धम्मज्झाणफलं; सकासायत्तणेण  धम्मज्झाणिणो सुहुमसांपराइयस्स चरिमसमएं मोहणीयस्स सव्वुवसमुवलंभादो। तिण्णं  घादिकम्माणं णिम्मूलविणासफलमेयत्तविदक्कअवीचारज्झाणं। मोहणीय विणासो पुण धम्मज्झाणफलं;  सुहुसांपरायचरिमसमए तस्स विणासुवलंभादो।&amp;lt;/span&amp;gt;=&lt;br /&gt;
            &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
              सकषाय और अकषायरूप स्वामी के भेद से  तथा‒ (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/210/4 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/l.&amp;gt;&lt;br /&gt;
               अचिरकाल और चिरकाल तक अवस्थिति रहने के कारण इन दोनों ध्यानों  का भेद सिद्ध है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/210/4 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/l.&amp;gt;&lt;br /&gt;
               अट्ठाईस प्रकार के मोहनीय कर्म की  सर्वोपशमना हो जाने पर उसमें स्थित रखना पृथक्त्व-वितर्कवीचार नामक शुक्लध्यान  का फल है, परंतु मोहनीय का सर्वोपशमन करना धर्मध्यान का फल है। क्योंकि,  कषायसहित धर्मध्यानी के सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान के अंतिम समय में मोहनीय  कर्म की सर्वोपशमना देखी जाती है।&amp;lt;/l.&amp;gt;&lt;br /&gt;
               तीन घातिकर्मों का समूलविनाश करना एकवितर्क  अवीचार (शुक्ल) ध्यान का फल है, परंतु मोहनीय का विनाश करना धर्मध्यान का फल  है। क्योंकि, सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान के अंतिम समय में उसका विनाश देखा  जाता है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/21/131  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;विशुद्धिस्वामिभेदात्तु  तद्विशेषोऽवधार्यताम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;/l.&amp;gt;&lt;br /&gt;
               इन दोनों में स्वामी व विशुद्धि के भेद से परस्पर  विशेषता समझनी चाहिए।(&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/180 &amp;lt;/span&amp;gt;) &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
              देखें [[ धर्मध्यान#4.5.3 | धर्मध्यान - 4.5.3]]&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/l.&amp;gt;&lt;br /&gt;
               धर्मध्यान शुक्लध्यान का कारण  है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
                देखें [[ समयसार ]]‒धर्मध्यान कारण समयसार है और शुक्लध्यान  कार्य समयसार है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
              &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/l.&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/li&lt;br /&gt;
&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4&amp;quot; id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान का फल पुण्य व मोक्ष तथा उनका समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.1&amp;quot; id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान का फल अतिशय पुण्य&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/56/77 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; होंति सुहासव संवर णिज्जरामरसुहाई विउलाइं। ज्झाणवरस्स फलाइं सुहाणुबंधीणि धम्मस्स।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;उत्कृष्ट  धर्मध्यान के शुभास्रव, संवर, निर्जरा, और देवों का सुख ये शुभानुबंधी विपुल फल  होते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/41/16  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अथावसाने स्वतनुं विहाय ध्यानेन संन्यस्तसमस्तसंगा:।  ग्रैवेयकानुत्तरपुण्यवासे सर्वार्थसिद्धौ च भवंति भव्या:। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो भव्य पुरुष इस  पर्याय के अंत समय में समस्त परिग्रहों को छोड़कर धर्मध्यान से अपना शरीर  छोड़ते हैं, वे पुरुष पुण्य के स्थानरूप ऐसे ग्रैवेयक व अनुत्तर विमानों में तथा  सर्वार्थसिद्धि में उत्पन्न होते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.2&amp;quot; id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्मध्यान का फल संवर निर्जरा व कर्मक्षय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/26,57/68,77 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;णवकम्माणादाणं, पोराणवि णिज्जरासुहादाणं। चारित्तभावणाए ज्झाणमयत्तेण य समेइ।26।  जह वा घणसंघाया खणेण पवणाहया विलिज्जंति। ज्झाणप्पवणोवहया तह कम्मघणा विलिज्जंति।57।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चारित्र  भावना के बल से जो ध्यान में लीन है, उसके नूतन कर्मों का ग्रहण नहीं होता,  पुराने कर्मों की निर्जरा होती है और शुभकर्मों का आस्रव होता है।26। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5/4/26/56/77- &amp;lt;/span&amp;gt;देखें [[ ऊपरवाला  शीर्षक ]]) अथवा जैसे मेघपटल पवन से ताड़ित होकर क्षणमात्र में विलीन हो जाते हैं,  वैसे ही (धर्म्य) ध्यानरूपी पवन से उपहत्त होकर कर्ममेघ भी विलीन हो जाते हैं।57। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        (देखें [[ आगे धर्म्यध्यान#6.3  | आगे धर्म्यध्यान - 6.3 ]]में &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तिलोयपण्णत्ति  &amp;lt;/span&amp;gt;), (स्वभावसंसक्त  मुनि का ध्यान निर्जरा का हेतु है।)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        (देखें [[ पीछे ]]धर्म्यध्यान/3/5/2) ; (सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान  के अंत में कर्मों की सर्वोपशमना तथा मोहनीय कर्म का क्षय धर्म्यध्यान का फल  है।)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव 22/12  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;ध्यानशुद्धिं, मन:शुद्धि: करोत्येव न केवलम्  । विच्छिनत्त्यपि नि:शंकं कर्मजालानि देहिनाम् ।15।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मन की शुद्धता केवल ध्यान  की शुद्धता को ही नहीं करती है, किंतु जीवों के कर्मजाल को भी नि:संदेह काटती  है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचास्तिकाय / तात्पर्यवृत्ति/173/253/25 पर उद्धृत  &amp;lt;/span&amp;gt;‒&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;एकाग्रचिंतनं ध्यानं  फलं संवरनिर्जरे।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;एकाग्र चिंतवन करना तो (धर्म्य) ध्यान है और संवर निर्जरा  उसका फल है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.3&amp;quot; id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; धर्म्यध्यान का फल मोक्ष&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वार्थसूत्र/9/29 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; परे मोक्षहेतू।29।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अंत के दो ध्यान (धर्म्य  व शुक्लध्यान) मोक्ष के हेतु हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/172/2  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;संसारलतामूलोच्छेदनहेतुभूतं प्रशस्तध्यानं।  तद्द्विविधं, धर्म्यं शुक्लं चेति।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;संसारलता के मूलोच्छेद का हेतुभूत प्रशस्त  ध्यान है। वह दो प्रकार का है‒धर्म्य व शुक्ल।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.4&amp;quot; id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; एक धर्मध्यान से मोहनीय के उपशम व क्षय दोनों होने का  समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/81/3  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;मोहणीयस्स उवसमो जदि धम्मज्झाणफलो तो ण क्खदी, एयादो दोण्णं कज्जाणमुप्पत्तिविरोहादो।  ण धम्मज्झाणादो अणेयभेयभिण्णादो अणेयकज्जाणमुप्पत्तीए विरोहाभावादो।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न‒&amp;lt;/strong&amp;gt;मोहनीय  कर्म का उपशम करना यदि धर्म्यध्यान का फल हो तो इसी से मोहनीय का क्षय नहीं हो  सकता। क्योंकि एक कारण से दो कार्यों की उत्पत्ति मानने में विरोध आता है? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;‒नहीं,  क्योंकि धर्म्यध्यान अनेक प्रकार का है। इसलिए उससे अनेक प्रकार के कार्यों की  उत्पत्ति मानने में कोई विरोध नहीं आता।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.5&amp;quot; id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt; धर्म्यध्यान से पुण्यास्रव व मोक्ष दोनों होने का  समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.5.1&amp;quot; id=&amp;quot;4.5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; साक्षात् नहीं परंपरा मोक्ष का कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/3/32  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;शुभध्यानफलोद्भूतां श्रियं त्रिदशसंभवाम् ।  निर्विशंति नरा नाके क्रमाद्यांति परं पदम् ।32।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मनुष्य शुभध्यान के फल से  उत्पन्न हुई स्वर्ग की लक्ष्मी को स्वर्ग में भोगते हैं और क्रम से मोक्ष को  प्राप्त होते हैं। और भी देखें [[ आगे धर्म्यध्यान#5.2 | आगे धर्म्यध्यान - 5.2]]।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.5.2&amp;quot; id=&amp;quot;4.5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; अचरम शरीरियों को स्वर्ग और चरम शरीरियों को  मोक्षप्रदायक है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/77/1  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;किंफलमेदं धम्मज्झाणं। अक्खवएसु विउलामरसुहफलं गुणसेडीए कम्मणिज्जरा फलं च।  खवएसु पुण असंखेज्जगुणसेडीए कम्मपदेसणिज्जरणफलं सुहकम्माणमुक्कस्साणुभागविहाणफलं  च। अतएव धर्म्यादनपेतं धर्म्यध्यानमिति सिद्धम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;‒इस धर्म्यध्यान  का क्या फल है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर‒&amp;lt;/strong&amp;gt;अक्षपक जीवों को (या अचरम शरीरियों को) देवपर्याय  संबंधी विपुलसुख मिलना उसका फल है, और गुणश्रेणी में कर्मों की निर्जरा होना  भी उसका फल है। तथा क्षपक जीवों के तो असंख्यात गुणश्रेणीरूप से कर्मप्रदेशों की  निर्जरा होना और शुभकर्मों के उत्कृष्ट अनुभाग का होना उसका फल है। अतएव जो धर्म  से अनपेत है व धर्मध्यान है यह बात सिद्ध होती है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/197,224  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;ध्यातोऽर्हत्सिद्धरूपेण चरमांगस्य  मुक्तये। तद्धयानोपात्तपुण्यस्य स एवान्यस्य भुक्तये।197। ध्यानाभ्यासप्रकर्षेण  त्रुट्यन्मोहस्य योगिन:। चरमांगस्य मुक्ति: स्यात्तदैवान्यस्य च क्रमात् ।224।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अर्हद्रूप  अथवा सिद्धरूप से ध्यान किया गया (यह आत्मा) चरमशरीरी ध्याता के मुक्ति का और  उससे भिन्न अन्य ध्याता के भुक्ति (भोग) का कारण बनता है, जिसने उस ध्यान से  विशिष्ट पुण्य का उपार्जन किया है।197। ध्यान के अभ्यास की प्रकर्षता से मोह  को नाश करने वाले चरमशरीरी योगी के तो उस भव में मुक्ति होती है और चरम शरीरी नहीं  है उनके क्रम से मुक्ति होती है।224।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
          &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.5.3&amp;quot; id=&amp;quot;4.5.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; क्योंकि मोक्ष का साक्षात् हेतुभूत शुक्लध्यान  धर्म्यध्यान पूर्वक ही होता है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
            &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/42/3  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;अथ धर्म्यमतिक्रांत: शुद्धिं चात्यंतिकीं  श्रित:। ध्यातुमारभते वीर: शुक्लमत्यंतनिर्मलम् ।3।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस धर्म्यध्यान के  अनंतर धर्म्यध्यान से अतिक्रांत होकर अत्यंत शुद्धता को प्राप्त हुआ धीर  वीर मुनि अत्यंत निर्मल शुक्लध्यान के ध्यावने का प्रारंभ करता है। विशेष  देखें [[ धर्मध्यान#6.6 | धर्मध्यान - 6.6]]। (पंचास्तिका संग्रह /150)‒(देखें [[ समयसार ]])‒धर्मध्यान कारण समयसार है और शुक्लध्यान  कार्यसमयसार।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;4.6&amp;quot; id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; परपदार्थों के चिंतवन से कर्मक्षय कैसे संभव है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/70/4 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;कधं ते णिग्गुणा कम्मक्खयकारिणो। ण तेसिं रागादिणिरोहे णिमित्तकारणाणं  तदविरोहादो।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न‒&amp;lt;/strong&amp;gt;जब कि नौ पदार्थ निर्गुण होते हैं, अर्थात् अतिशय  रहित होते हैं, ऐसी हालत में वे कर्मक्षय के कर्ता कैसे हो सकते हैं ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर‒&amp;lt;/strong&amp;gt;नहीं,  क्योंकि वे रागादि के निरोध करने में निमित्तकारण हैं, इसलिए उन्हें कर्मक्षय का  निमित्त मानने में विरोध नहीं आता। (अर्थात् उन जीवादि नौ पदार्थों के स्वभाव का  चिंतवन करने से साम्यभाव जागृत होता है।)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;5&amp;quot; id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; पंचमकाल में भी धर्मध्यान की सफलता&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;5.1&amp;quot; id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; यदि ध्यान से मोक्ष होता है तो अब क्यों नहीं होता&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/1/97/92/4  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यद्यंतर्मुहूर्तपरमात्मध्यानेन  मोक्षो भवति तर्हि इदानीं अस्माकं तद्धयानं कुर्वाणानां किं न भवति।  परिहारमाहयादृशं तेषां प्रथमसंहननसहितानां शुक्लध्यानं भवति तादृशमिदानीं नास्तीति।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न‒&amp;lt;/strong&amp;gt;यदि  अंतर्मुहूर्तमात्र परमात्मध्यान से मोक्ष होता है तो ध्यान करने वाले भी हमें  आज वह क्यों नहीं होता ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;‒जिस प्रकार का शुक्लध्यान प्रथम संहनन  वाले जीवों को होता है वैसा अब नहीं होता।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;5.2&amp;quot; id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; यदि इस काल में मोक्ष नहीं तो ध्यान करने से क्या  प्रयोजन&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/57/233/11  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अथ मतं‒मोक्षार्थं ध्यानं क्रियते,  न चाद्यकाले मोक्षोऽस्ति; ध्यानेन किं प्रयोजनम् । नैवं अद्यकालेऽपि परंपरया  मोक्षोऽस्ति। कथमिति चेत्, स्वशुद्धात्मभावनाबलेन संसारस्थितिं स्तोकं कृत्वा  देवलोकं गच्छति, तस्मादागत्य मनुष्यभवे रत्नत्रयभावनां लब्ध्वा शीघ्रं  मोक्षं गच्छतीति। येऽपि भरतसगररामपांडवादयो मोक्षं गतास्तेऽपि पूर्वभवेऽभेदरत्नत्रयभावनया  संसारस्थितिं स्तोकं कृत्वा पश्चान्मोक्षं गता:। तद्भवे सर्वेषां मोक्षो  भवतीति नियमो नास्ति।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न‒&amp;lt;/strong&amp;gt;मोक्ष के लिए ध्यान किया जाता है, और मोक्ष  इस पंचमकाल में होता नहीं है, इस कारण ध्यान के करने से क्या प्रयोजन? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर‒&amp;lt;/strong&amp;gt;इस  पंचमकाल में भी परंपरा से मोक्ष है। &amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न‒&amp;lt;/strong&amp;gt;सो कैसे है? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर‒&amp;lt;/strong&amp;gt;ध्यानी  पुरुष निज शुद्धात्मा की भावना के बल से संसार की स्थिति को अल्प करके स्वर्ग  में जाता है। वहाँ से मनुष्यभव में आकर रत्नत्रय की भावना को प्राप्त होकर शीघ्र  ही मोक्ष को चला जाता है। जो भरतचक्रवर्ती, सगरचक्रवर्ती, रामचंद्र तथा पांडव  युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम आदि मोक्ष को गये हैं, उन्होंने भी पूर्वभव में अभेदरत्नत्रय  की भावना से अपने संसार की स्थिति को घटा लिया था। इस कारण उसी भव में मोक्ष गये।  उसी भव में सबको मोक्ष हो जाता हो, ऐसा नियम नहीं है। (और भी देखो/7/12)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;5.3&amp;quot; id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; पंचमकाल में अध्यात्मध्यान का कथंचित् सद्भाव व  असद्भाव&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; नयचक्र बृहद्/343  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;मज्झिमजहणुक्कस्सा सराय इव वीयरायसामग्गी।  तम्हा सुद्धचरित्ता पंचमकाले वि देसदो अत्थि।343।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सराग की भाँति वीतरागता की  सामग्री जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट होती है। इसलिए पंचमकाल में भी शुद्धचरित्र  कहा गया है। (और भी देखें [[ अनुभव#5 | अनुभव - 5]]/2)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; नियमसार / तात्पर्यवृत्ति/154/ &amp;lt;/span&amp;gt;क.264 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;असारे संसारे कलिविलसिते  पापबहुले, न मुक्तिर्मार्गेऽस्मिन्ननयजिननाथस्य भवति। अतोऽध्यात्मं ध्यानं  कथमिह भवन्निर्मलधियां, निजात्मश्रद्धानं भवभयहरं स्वीकृतमिदम् ।264।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;असार  संसार में, पाप से भरपूर कलिकाल का विलास होने पर, इस निर्दोष जिननाथ के मार्ग में  मुक्ति नहीं है। इसलिए इस काल में अध्यात्मध्यान कैसे हो सकता है ? इसलिए  निर्मल बुद्धिवाले भवभय का नाश करने वाली ऐसी इस निजात्मश्रद्धा को अंगीकृत करते  हैं। &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;5.4&amp;quot; id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; परंतु इस काल में ध्यान का सर्वथा अभाव नहीं है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; मोक्षपाहुड़/76  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स।  तं अप्पसहावट्ठिदे ण हु मण्णइ सो वि अण्णाणी।76।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भरतक्षेत्र में दु:षमकाल  अर्थात् पंचमकाल में भी आत्मस्वभावस्थित साधु को धर्मध्यान होता है। जो ऐसा  नहीं मानता वह अज्ञानी है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/60 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/82 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/4/37  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दु:षमत्वादयं काल: कार्यसिद्धेर्न साधकम् ।  इत्युक्त्वा स्वस्य चान्येषां कैश्चिद्धयानं निषिध्यते।37।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कोई-कोई साधु  ऐसा कहकर अपने तथा पर के ध्यान का निषेध करते हैं कि इस दु:षमा पंचमकाल में ध्यान  की योग्यता किसी के भी नहीं है। (उन अज्ञानियों के ध्यान की सिद्धि कैसे हो सकती  है ?)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;5.5&amp;quot; id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; पंचमकाल में शुक्लध्यान नहीं पर धर्मध्यान अवश्य  संभव है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/83  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;अत्रेदानीं निषेधंति शुक्लध्यानं जिनोत्तमा:।  धर्मध्यानं पुन: प्राहु: श्रेणिभ्यां प्राग्विवर्तिनाम् ।83। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;यहाँ (भरतक्षेत्र  में) इस (पंचम) काल में जिनेंद्रदेव शुक्लध्यान का निषेध करते हैं परंतु  श्रेणी से पूर्ववर्तियों के धर्मध्यान बतलाते हैं। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/57/231/11 &amp;lt;/span&amp;gt;) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचास्तिकाय / तात्पर्यवृत्ति/146/211/17 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6&amp;quot; id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निश्चय व्यवहार धर्मध्यान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.1&amp;quot; id=&amp;quot;6.1&amp;quot;&amp;gt;निश्चय धर्मध्यान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; मोक्षपाहुड़/84 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt; पुरिसायारो अप्पा जोई वरणाणदसणसमग्गा। जो  ज्झायदि सो जोई पावहरो भवदि णिद्दंदो’।84।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो योगी शुद्धज्ञानदर्शन समग्र  पुरुषाकार आत्मा को ध्याता है वह निर्द्वंद तथा पापों का विनाश करने वाला होता  है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह/55-56  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;जं किंचिवि चिंतंतो णिरीहवित्ती हवे जदा  साहू। लद्धूण य एयत्तं तदाहु तं णिच्छयं झाणं।55। मा चिट्ठह मा जंपह मा चिंतह  किंवि जेण होइ थिरो। अप्पा अप्पम्मि रओ इणमेव परं हवे झाणं।56।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;ध्येय में  एकाग्र चित्त होकर जिस किसी भी पदार्थ का ध्यान करता हुआ साधु जब निस्पृह वृत्ति  होता है उस समय वह उसका ध्यान निश्चय होता है।55। हे भव्य पुरुषो ! तुम कुछ भी  चेष्टा मत करो, कुछ भी मत बोलो और कुछ भी मत विचारो, अर्थात् काय, वचन व मन  तीनों की प्रवृत्ति को रोको; जिससे कि तुम्हारा आत्मा अपने आत्मा में स्थिर  होवे। आत्मा में लीन होना परमध्यान है।56।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/482  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;वज्जिय-सयल-वियप्पो अप्पसरूवे मणं  णिरुंधंतो। जं चिंतदि साणं दे तं धम्मं उत्तमं ज्झाणं।482।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सकल विकल्पों को  छोड़कर और आत्मस्वरूप में मन को रोककर आनंदसहित जो चिंतन होता है वही उत्तम  धर्मध्यान है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/ &amp;lt;/span&amp;gt;श्लो.नं./भावार्थ‒&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयादधुना स्वात्मालंबनं  तन्निरुच्यते।141। पूर्वं श्रुतेन संस्कारं स्वात्मन्यारोपयेत्तत:। तत्रैकाग्य्रं  समासाद्य न किंचिदपि चिंतयेत् ।144।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अब निश्चयनय से स्वात्मलंबन स्वरूपध्यान  का निरूपण करते हैं।141। श्रुत के द्वारा आत्मा में आत्मसंस्कार को आरोपित  करके, तथा उसमें ही एकाग्रता को प्राप्त होकर अन्य कुछ भी चिंतवन न करे।144।  शरीर और मैं अन्य-अन्य हैं।149। मैं सदा सत्, चित्, ज्ञाता, द्रष्टा, उदासीन,  देह परिमाण व आकाशवत् अमूर्तिक हूँ।153। दृष्ट जगत् न इष्ट है न द्विष्ट किंतु  उपेक्ष्य है।157। इस प्रकार अपने आत्मा को अन्य शरीरादिक से भिन्न करके अन्य  कुछ भी चिंतवन न करे।159। यह चिंताभाव तुच्छाभाव रूप नहीं है, बल्कि समतारूप  आत्मा के स्वसंवेदनरूप है।160। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/31/20-37 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        द्रव्य संग्रह टीका/48/204/11 में अनंत ज्ञानादि का धारक तथा अनंत  सुखरूप हूँ, इत्यादि भावना अंतरंग धर्मध्यान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचास्तिकाय / तात्पर्यवृत्ति/150-151/218/1 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6.2&amp;quot; id=&amp;quot;6.2&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; व्यवहार धर्मध्यान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/141  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;व्यवहारनयादेवं ध्यानमुक्तं पराश्रयम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस  प्रकार व्यवहार नय से पराश्रित धर्मध्यान का लक्षण कहा है। (अर्थात् धर्मध्यान  सामान्य व उसके आज्ञा अपाय विचय आदि भेद सब व्यवहार ध्यान में गर्भित हैं।)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6.3&amp;quot; id=&amp;quot;6.3&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निश्चय ही ध्यान सार्थक है व्यवहार नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/193-194  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;देहा वा दविणा वा सुहदुक्खा  वाधसत्तुमित्तजणा। जीवस्स ण संति धुवा धुवोवओगअप्पगो अप्पा।193। जो एवं  जाणित्ताज्झादि परं अप्पगं विसुद्धप्पा। साकारोऽनाकार: क्षपयति स  मोहदुर्ग्रंथिम् ।194।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शरीर, धन, सुख, दु:ख अथवा शत्रु, मित्रजन से सब ही जीव के  कुछ नहीं हैं, ध्रुव तो उपयोगात्मक आत्मा है।193। जो ऐसा जानकर विशुद्धात्मा  होता हुआ परम आत्मा का ध्यान करता है, वह साकार हो या अनाकार, मोहदुर्ग्रंथि का  क्षय करता है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तिलोयपण्णत्ति/9/21,40  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;दंसणणाणसमग्गं ज्झाणं णो अण्णदव्वसंसत्तं।  जायदि णिज्जरहेदू सभावसहिदस्स साहुस्स।21। ज्झाणे जदि णियआदा णाणादो णावभासदे  जस्स। ज्झाणं होदि ण तं पुण जाण पमादो, हु मोहमुच्छा वा।40।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शुद्ध स्वभाव से  सहित साधु का दर्शन-ज्ञान से परिपूर्ण ध्यान निर्जरा का कारण होता है, अन्य  द्रव्यों से संसक्त वह निर्जरा का कारण नहीं होता।21। जिस जीव के ध्यान में यदि  ज्ञान से निज आत्मा का प्रतिभास नहीं होता है तो वह ध्यान नहीं है। उसे प्रमाद,  मोह अथवा मूर्च्छा ही जानना चाहिए।40। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वानुशासन/169 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        आराधनासार/83&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt; यावद्विकल्प: कश्चिदपि जायते योगिनो ध्यानयुक्तस्य।  तावन्न शून्यं ध्यानं, चिंता वा भावनाथवा।83।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब तक ध्यानयुक्त योगी को किसी  प्रकार का भी विकल्प उत्पन्न होता रहता है, तब तक उसे शून्य ध्यान नहीं है, या  तो चिंता है या भावना है। (और भी देखें [[ धर्म्यध्यान#3.1 | धर्म्यध्यान - 3.1]])&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/28/19  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;अविक्षिप्तं यदा चेत: स्वतत्त्वाभिमुखं  भवेत् । मनस्तदैव निर्विघ्ना ध्यानसिद्धिरुदाहृता।19।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस समय मुनि का चित्त  क्षोभरहित हो आत्मस्वरूप के सम्मुख होता है, उस काल ही ध्यान की सिद्धि  निर्विघ्न होती है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका/194  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अमुना यथोदितेन विधिना शुद्धात्मानं  ध्रुवमधिगच्छतस्तस्मिन्नेव प्रवृत्ते: शुद्धात्मत्वं स्यात् । ततोऽनंतशक्तिचिंमात्रस्य  परमस्यात्मन एकाग्रसंचेतनलक्षणं ध्यानं स्यात् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस यथोक्त विधि के द्वारा जो  शुद्धात्मा को ध्रुव जानता है, उसे उसी में प्रवृत्ति के द्वारा शुद्धात्मत्व  होता है, इसलिए अनंत शक्तिवाले चिन्मात्र परम आत्मा का एकाग्रसंचेतन लक्षण ध्यान  होता है।(&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका/196 &amp;lt;/span&amp;gt;), (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; नियमसार / तात्पर्यवृत्ति/119 &amp;lt;/span&amp;gt;) &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका/243  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यो हि न खलु ज्ञानात्मानमात्मानमेकमग्रं  भावयति सोऽवश्यं ज्ञेयभूतं द्रव्यमन्यदासीदति।...तथाभूतश्च बध्यत एव न तु  मुच्यते।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो वास्तव में ज्ञानात्मक आत्मारूप एक अग्र को नहीं भाता, वह अवश्य  ज्ञेयभूत अन्य द्रव्य का आश्रय करता है और ऐसा होता हुआ बंध को ही प्राप्त  होता है, परंतु मुक्त नहीं होता।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; नियमसार / तात्पर्यवृत्ति/144,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;य: खलु...व्यावहारिकधर्मध्यानपरिणत:  अत एव चरणकरणप्रधान, ...किंतु स निरपेक्षतपोधन: साक्षान्मोक्षकारणं स्वात्माश्रयावश्यककर्म  निश्चयत: परमातत्त्वविश्रांतरूपं निश्चयधर्मध्यानं शुक्लध्यानं च न जानीते,  अत: परद्रव्यगतत्वादन्यवश इत्युक्त:।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो वास्तव में व्यावहारिक धर्मध्यान  में परिणत रहता है, इसलिए चरणकरणप्रधान है; किंतु वह निरपेक्ष तपोधन साक्षात्  मोक्ष के कारणभूत स्वात्माश्रित आवश्यककर्म को, निश्चय से परमात्मतत्त्व में  विश्रांतिरूप निश्चयधर्मध्यान को तथा शुक्लध्यान को नहीं जानता; इसलिए  परद्रव्य में परिणत होने से उसे अन्यवश कहा गया है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6.4&amp;quot; id=&amp;quot;6.4&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; व्यवहार ध्यान कथंचित् अज्ञान है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; समयसार / आत्मख्याति/191  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;एतेन कर्मबंधविषयचिंताप्रबंधात्मकविशुद्धधर्मध्यानांधबुद्धयो  बोध्यंते।&amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस कथन से कर्मबंध में चिंताप्रबंधस्वरूप विशुद्ध धर्मध्यान  से जिनकी बुद्धि अंधी है, उनको समझाया है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6.5&amp;quot; id=&amp;quot;6.5&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; व्यवहार ध्यान निश्चय का साधन है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        द्रव्य-संग्रह/टीका/49/209/4  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयध्यानस्य परंपरया कारणभूतं यच्छुभोपयोगलक्षणं व्यवहारध्यानम् ।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयध्यान  का परंपरा से कारणभूत जो शुभोपयोग लक्षण व्यवहारध्यान है। (द्रव्य संग्रह/टीका/53/221/2)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6.6&amp;quot; id=&amp;quot;6.6&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निश्चय व व्यवहार ध्यान में साध्यसाधकपने का समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,4,26/22/67 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt; विसमं हि समारोहइ दव्वालंवणो जहा  पुरिसो। सुत्तादिकयालंबो तहा झाणवरं समारुहइ।22।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस प्रकार कोई पुरुष नसैनी  (सीढ़ी) आदि द्रव्य के आलंबन से विषमभूमि पर भी  आरोहण करता है, उसी प्रकार ध्याता भी सूत्र आदि  के आलंबन से उत्तम ध्यान को प्राप्त होता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; भगवती आराधना / विजयोदया टीका/1877/1681/12 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/33/2,4  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;अविद्यावासनावेशविशेषविवशात्मनाम् । योज्यमानमपि  स्वस्मिन् न चेत: कुरुते स्थितिम् ।2। अलक्ष्यं लक्ष्यसंबंधात् स्थूलात्सूक्ष्मं  विचिंतयेत् । सालंबाच्च निरालंबं तत्त्ववित्तत्त्वमंजसा।4।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आत्मा के स्वरूप  को यथार्थ जानकर, अपने में जोड़ता हुआ भी अविद्या की वासना से विवश है आत्मा  जिनका, उनका चित्त स्थिरता को नहीं धारण करता है।2। तब लक्ष्य के संबंध से  अलक्ष्य को अर्थात् इंद्रियगोचर के संबंध से इंद्रियातीत पदार्थों को तथा  स्थूल के आलंबन से सूक्ष्म को चिंतवन करता है। इस प्रकार सालंब ध्यान से  निरालंब के साथ तन्मय हो जाता है।4। (और भी देखें [[ चारित्र#7.10 | चारित्र - 7.10]])&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचास्तिकाय / तात्पर्यवृत्ति/152/220/9  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अयमत्र भावार्थ:‒प्राथमिकानां  चित्तस्थिरीकरणार्थं विषयाभिलाषरूपध्यानवंचनार्थं च परंपरया मुक्तिकारणं पंचपरमेष्ठयादिपरद्रव्यं  ध्येयं भवति, दृढतरध्यानाभ्यासेन चित्ते स्थिरे जाते सति निजशुद्धात्मस्वरूपमेव  ध्येयं।...इति परस्परसापेक्षनिश्चयव्यवहारनयाभ्यां साध्यसाधकभावं ज्ञात्वा  ध्येयविषये विवादो न कर्तव्य:।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;प्राथमिक जनों को चित्त स्थिर करने के लिए तथा  विषयाभिलाषरूप दुर्ध्यान से बचने के लिए परंपरा मुक्ति के कारणभूत पंच परमेष्ठी  आदि परद्रव्य ध्येय होते हैं। तथा दृढतर ध्यान के अभ्यास द्वारा चित्त के  स्थिर हो जाने पर निजशुद्ध आत्मस्वरूप ही ध्येय होता है। ऐसा भावार्थ है। इस  प्रकार परस्पर सापेक्ष निश्चय व्यवहारनयों के द्वारा साध्यसाधक भाव को जानकर  ध्येय के विषय में विवाद नहीं करना चाहिए। (द्रव्यसंग्रह/टीका/55/223/12)( (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/33/154/2 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचास्तिकाय / तात्पर्यवृत्ति/150/217/14  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यदायं जीव:...सरागसम्यग्दृष्टिर्भूत्वा  पंचपरमेष्ठिभक्त्यादिरूपेण पराश्रितधर्म्यध्यानबहिरंगसहकारित्वेनानंतज्ञानादिस्वरूपोऽहमित्यादिभावनास्वरूपमात्माश्रितं  धर्म्यध्यानं प्राप्य आगमकथितक्रमेणासंयतसम्यग्दृष्टयादिगुणस्थानचतुष्टयमध्ये  क्वापि गुणस्थाने दर्शनमोहक्षयेणक्षायिक सम्यक्त्वं कृत्वा तदनंतरमपूर्वकरणादिगुणस्थानेषु  प्रकृतिपुरुषनिर्मलविवेकज्यातिरूपप्रथमशुक्लध्यानमनुभूय...मोहक्षपणं कृत्वा...भावमोक्षं  प्राप्नोति।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अनादिकाल से अशुद्ध हुआ यह जीव सरागसम्यग्दृष्टि होकर पंचपरमेष्ठी  आदि की भक्ति आदि रूप से पराश्रित धर्म्यध्यान के बहिरंग सहकारीपने से ‘मैं अनंत  ज्ञानादि स्वरूप हूँ’ ऐसे आत्माश्रित धर्मध्यान को प्राप्त होता है, तत्पश्चात्  आगम कथित क्रम से असंयत सम्यग्दृष्टि आदि अप्रमत्तसंयत पर्यंत चार गुणस्थानों  में से किसी एक गुणस्थान में दर्शनमोह का क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि हो  जाता है। तदनंतर अपूर्वकरण आदि गुणस्थानों में प्रकृति व पुरुष (कर्म व जीव)  संबंधी निर्मल विवेक ज्यातिरूप प्रथम शुक्लध्यान का अनुभव करने के द्वारा  वीतराग चारित्र को प्राप्त करके मोह का क्षय करता है, और अंत में भावमोक्ष  प्राप्त कर लेता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6.7&amp;quot; id=&amp;quot;6.7&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निश्चय व व्यवहार ध्यान में निश्चय शब्द की आंशिक  प्रवृत्ति&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; द्रव्यसंग्रह टीका/55-56/224/6 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; निश्चयशब्देन तु प्राथमिकापेक्षया व्यवहाररत्नत्रयानुकूलनिश्चयो ग्राह्य:।  निष्पन्नयोगपुरुषापेक्षया तु शुद्धोपयोग लक्षणविवक्षितैदेशशुद्धनिश्चयो  ग्राह्य:। विशेषनिश्चय: पुनरग्रे वक्ष्यमाणस्तिष्ठतीति सूत्रार्थ:।55। ‘मा  चिट्ठह...।’ इदमेवात्मसुखरूपे तन्मयत्वं निश्चयेन परमुत्कृष्टध्यानं भवति।&amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;’निश्चय’  शब्द से अभ्यास करने वाले पुरुष की अपेक्षा से व्यवहार रत्नत्रय के अनुकूल  निश्चय ग्रहण करना चाहिए और जिसके ध्यान सिद्ध हो गया है उस पुरुष की अपेक्षा  शुद्धोपयोगरूप विवक्षित एकदेशशुद्ध निश्चय ग्रहण करना चाहिए। विशेष निश्चय आगे  के सूत्र में कहा है, कि मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को रोककर आत्मा के सुखरूप में  तन्मय हो जाना निश्चय से परम उत्कृष्ट ध्यान है। (विशेष देखें [[ अनुभव#5 | अनुभव - 5]]/7)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; name=&amp;quot;6.8&amp;quot; id=&amp;quot;6.8&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; निरीहभाव से किया गया सभी उपयोग एक आत्म उपयोग ही है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/861-865  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अस्ति ज्ञानोपयोगस्य स्वभावमहिमोदय:।  आत्मपरोभयाकारभावश्च प्रदीपवत् ।761। निर्विशेषाद्यथात्मानमिव ज्ञेयमवैति च।  तथा मूर्तानमूर्तांश्च धर्मादीनवगच्छति।862। स्वस्मिन्नेवोपयुक्तो वा  नोपयुक्त: स एव हि। पर स्मिन्नुपयुक्तो वा नोपयुक्त: स एव हि।863। स्वस्मिन्नेवोपयुक्तोऽपि  नोत्कर्षाय स वस्तुत:। उपयुक्त: परत्रापि नापकर्षाय तत्त्वत:।864। तस्मात् स्वस्थितयेऽन्यस्मादेकाकारचिकीर्षया।  मासीदसि महाप्राज्ञ: सार्थमर्थमवैहि भो:।865।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निजमहिमा से ही ज्ञान प्रदीपवत् स्व,  पर व उभय का युगपत् अवभासक है।861। वह किसी प्रकार का भी भेदभाव न करके अपनी तरह  ही अपने विषयभूत मूर्त व अमूर्त धर्म अधर्मादि द्रव्यों को भी जानता है।862। अत:  केवलनिजात्मोपयोगी अथवा परपदार्थोपयोगी ही न होकर निश्चय से वह उभयविषयोपयोगी  है।863। उस सम्यग्दृष्टि को स्व में उपयुक्त होने से कुछ उत्कर्ष (विशेष संवर  निर्जरा) और पर में उपयुक्त होने से कुछ अपकर्ष (बंध) होता हो, ऐसा नहीं है।864।  इसलिए परपदार्थों के साथ अभिन्नता देखकर तुम दु:खी मत होओ। प्रयोजनभूत अर्थ को  समझो। और भी देखें [[ ध्यान#4.5  | ध्यान - 4.5 ]](अर्हंत का ध्यान वास्तव में तद्गूणपूर्ण आत्मा  का ध्यान ही है)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p&amp;gt; उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त वस्तु के स्वरूप/स्वभाव ला चिंतन । मूलत: इसके चार भेद हैं― आज्ञाविचय अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण &amp;lt;/span&amp;gt;कार के अनुसार इसके दस भेद हैं― अपायविचय, उपायविचय, जीवविचय, अजीवविचय, विपाक-विचय, विरागविचय, भवविचय, संस्थानविचय, आज्ञाविचय और हेतुविचय । धर्मध्याता सम्यग्दृष्टि होता है । वह ज्ञान, वैराग्य, धैर्य और क्षमा से युक्त होता है । अनुप्रेक्षाओं का चिंतन करता रहता है । उसके पीत, पद्म और शुक्ल लेश्याएँ होती है । यह ध्यान अप्रमत्त-अवस्था का अवलंबन कर अंतर्मुहूर्त मात्र स्थित रहता है । उक्त लेश्याओं के द्वारा वृद्धि को प्राप्त यह ध्यान चौथे, पांचवें और छठे गुणस्थान में भी होता है । अशुभ कर्मों की निर्जरा, स्वर्ग और परंपरा से अपवर्ग की प्राप्ति इसके फल है । इस ध्यान का ध्येय अर्हंतदेव होता है । इसके लिए जहाँ न अधिक गर्मी हो और न शीत हो ऐसे गुफा, नदी-तट, पर्वत, उद्यान और वन ऐसे स्थान अपेक्षित है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 20. 208-210, 226-228,21.131-134, 155-163, 36.161  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण  56.36 -52 &amp;lt;/span&amp;gt;, &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वीरवर्द्धमान चरित्र 6.51-52  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106062</id>
		<title>अपान</title>
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		<updated>2022-12-14T13:45:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 5/19/288 आत्मना बाह्यो वायुरभ्यंतरीक्रियमाणो निःश्वासलक्षणोऽपान इत्याख्यायते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आत्मा जिस बाहरी वायु को भीतर करता है निःश्वास लक्षण उस वायु को अपान कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(राजवार्तिक अध्याय 5/19/36/473) ( गोम्मट्टसार जीवकांड / गोम्मट्टसार जीवकांड जीव तत्त्व प्रदीपिका| जीव तत्त्व प्रदीपिका  टीका गाथा 606/1062/12)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: करणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
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		<title>अपाय</title>
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		<updated>2022-12-14T13:44:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 7/9/347 अभ्युदयनिःश्रेयसार्थानां क्रियाणां विनाशकः प्रयोगोऽपायः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= स्वर्ग और मोक्ष की क्रियाओ का विनाश करने वाली प्रवृत्ति अपाय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 7/9/1/537 अभ्युदयनिःश्रेयसार्थानां क्रियासाधनानां नाशकोऽनर्थः अपाय इत्युच्यते। अथवा ऐहलौकिकादिसप्तविधं भयमपाय इति कथ्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनों का अनर्थ अपाय है। अथवा इहलोकमय परलोकमय आदि सात प्रकार के भय अपाय हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपाय</title>
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		<updated>2022-12-14T13:41:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 7/9/347 अभ्युदयनिःश्रेयसार्थानां क्रियाणां विनाशकः प्रयोगोऽपायः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= स्वर्ग और मोक्ष की क्रियाओ का विनाश करने वाली प्रवृत्ति अपाय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;राजवार्तिक अध्याय 7/9/1/537 अभ्युदयनिःश्रेयसार्थानां क्रियासाधनानां नाशकोऽनर्थः अपाय इत्युच्यते। अथवा ऐहलौकिकादिसप्तविधं भयमपाय इति कथ्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनों का अनर्थ अपाय है। अथवा इहलोकमय परलोकमय आदि सात प्रकार के भय अपाय हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA&amp;diff=106059</id>
		<title>अपाप</title>
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		<updated>2022-12-14T13:21:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;p&amp;gt;भावी तेरहवें तीर्थंकर/अपर नाम `निष्पाप' व `पुण्यमूर्ति' व `निष्कषाय'। विशेष देखें [[ तीर्थंकर#5 | तीर्थंकर - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p&amp;gt; भविष्यत् काल के ग्यारहवें तीर्थंकर । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 76.478-481 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106058</id>
		<title>उपादान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106058"/>
		<updated>2022-12-14T12:57:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; न्यायविनिश्चय/ &amp;lt;/span&amp;gt;वृ. 1/133/486/4 विविक्षतं वस्तु उपादानम् उत्तरस्य कार्यस्य सजातीयं कारणं प्रकल्पयेत्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विवक्षित उत्तर कार्य का सजातीय कारण कल्पित किया गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री/पृ. 210 त्यक्तात्यक्तात्यरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते। कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥ यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा। तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो (द्रव्य) तीनों कालों में अपने रूप को छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्व रूप से और अपूर्व रूप से वर्त रहा है वह उपादान कारण है, ऐसा जानना चाहिए। जो अपने स्वरूप को छोड़ता ही है और जो उसे सर्वथा नहीं छोड़ता वह अर्थ का उपादान नहीं होता जैसे क्षणिक और शाश्वत। भावार्थ-द्रव्य में दो अंश हैं-एक शाश्वत और एक क्षणिक। गुण शाश्वत होने के कारण अपने स्वरूप को त्रिकाल नहीं छोड़ते और पर्याय क्षणिक होने के कारण अपने स्वरूप को प्रतिक्षण छोड़ती है। यह दोनों ही अंश उस द्रव्य से पृथक् कोई अर्थांतर रूप नहीं हैं। इन दोनों से समवेत द्रव्य ही कार्य का उपादान कारण है। अर्थांतरभूत रूप से स्वीकार किये गये शाश्वत-पदार्थ या क्षणिक पदार्थ कभी भी उपादान नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सर्वथा शाश्वत पदार्थ में परिणमन का अभाव होने के कारण कार्य ही नहीं तब कारण किसे कहें। और सर्वथा क्षणिक पदार्थ प्रतिक्षण विनष्ट ही हो जाता है तब उसे कारणपना कैसे बन सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(ज्ञानदर्पण 57-58)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;अष्टसहस्री श्लो. 58 की टीका-&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;quot;परिणाम क्षणिक उपादान है और गुण शाश्वत उपादान है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;निमित्त, उपादान चिट्ठी पं. बनारसीदास-&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;quot;उपादान वस्तु की सहन शक्ति है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;2. उपादान की मुख्यता गौणता - देखें [[ कारण#II | कारण - II]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106057</id>
		<title>उपादान</title>
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		<updated>2022-12-14T12:55:56Z</updated>

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&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; न्यायविनिश्चय/ &amp;lt;/span&amp;gt;वृ. 1/133/486/4 विविक्षतं वस्तु उपादानम् उत्तरस्य कार्यस्य सजातीयं कारणं प्रकल्पयेत्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विवक्षित उत्तर कार्यका सजातीय कारण कल्पित किया गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री/पृ. 210 त्यक्तात्यक्तात्यरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते। कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥ यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा। तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो (द्रव्य) तीनों कालोंमें अपने रूपको छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्व रूपसे और अपूर्व रूपसे वर्त रहा है वह उपादान कारण है, ऐसा जानना चाहिए। जो अपने स्वरूपको छोड़ता ही है और जो उसे सर्वथा नहीं छोड़ता वह अर्थका उपादान नहीं होता जैसे क्षणिक और शाश्वत। भावार्थ-द्रव्यमें दो अंश हैं-एक शाश्वत और एक क्षणिक। गुण शाश्वत होनेके कारण अपने स्वरूपको त्रिकाल नहीं छोड़ते और पर्याय क्षणिक होनेके कारण अपने स्वरूपको प्रतिक्षण छोड़ती है। यह दोनों ही अंश उस द्रव्यसे पृथक् कोई अर्थांतर रूप नहीं हैं। इन दोनोंसे समवेत द्रव्य ही कार्यका उपादान कारण है। अर्थांतरभूत रूपसे स्वीकार किये गये शाश्वत-पदार्थ या क्षणिकपदार्थ कभी भी उपादान नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सर्वथा शाश्वत पदार्थ में परिणमनका अभाव होनेके कारण कार्य ही नहीं तब कारण किसे कहें। और सर्वथा क्षणिक पदार्थ प्रतिक्षण विनष्ट ही हो जाता है तब उसे कारणपना कैसे बन सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(ज्ञानदर्पण 57-58)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;अष्टसहस्री श्लो. 58 की टीका-&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;quot;परिणाम क्षणिक उपादान है और गुण शाश्वत उपादान है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;निमित्त, उपादान चिट्ठी पं. बनारसीदास-&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;quot;उपादान वस्तुकी सहन शक्ति है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;2. उपादानकी मुख्यता गौणता - देखें [[ कारण#II | कारण - II]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>उपादान</title>
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&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विवक्षित उत्तर कार्यका सजातीय कारण कल्पित किया गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री/पृ. 210 त्यक्तात्यक्तात्यरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते। कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥ यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा। तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो (द्रव्य) तीनों कालोंमें अपने रूपको छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्व रूपसे और अपूर्व रूपसे वर्त रहा है वह उपादान कारण है, ऐसा जानना चाहिए। जो अपने स्वरूपको छोड़ता ही है और जो उसे सर्वथा नहीं छोड़ता वह अर्थका उपादान नहीं होता जैसे क्षणिक और शाश्वत। भावार्थ-द्रव्यमें दो अंश हैं-एक शाश्वत और एक क्षणिक। गुण शाश्वत होनेके कारण अपने स्वरूपको त्रिकाल नहीं छोड़ते और पर्याय क्षणिक होनेके कारण अपने स्वरूपको प्रतिक्षण छोड़ती है। यह दोनों ही अंश उस द्रव्यसे पृथक् कोई अर्थांतर रूप नहीं हैं। इन दोनोंसे समवेत द्रव्य ही कार्यका उपादान कारण है। अर्थांतरभूत रूपसे स्वीकार किये गये शाश्वत-पदार्थ या क्षणिकपदार्थ कभी भी उपादान नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सर्वथा शाश्वत पदार्थ में परिणमनका अभाव होनेके कारण कार्य ही नहीं तब कारण किसे कहें। और सर्वथा क्षणिक पदार्थ प्रतिक्षण विनष्ट ही हो जाता है तब उसे कारणपना कैसे बन सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(ज्ञानदर्पण 57-58)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;अष्टसहस्री श्लो. 58 की टीका-&amp;quot;परिणाम क्षणिक उपादान है और गुण शाश्वत उपादान है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;निमित्त, उपादान चिट्ठी पं. बनारसीदास-&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;quot;उपादान वस्तुकी सहन शक्ति है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;2. उपादानकी मुख्यता गौणता - देखें [[ कारण#II | कारण - II]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106055</id>
		<title>उपादान</title>
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		<updated>2022-12-14T12:53:40Z</updated>

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&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विवक्षित उत्तर कार्यका सजातीय कारण कल्पित किया गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अष्टसहस्री/पृ. 210 त्यक्तात्यक्तात्यरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्तते। कालत्रयेऽपि तद् द्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ॥ यत् स्वरूपं त्यजत्येव यन्न त्यजति सर्वथा। तन्नोपादानमर्थस्य क्षणिकं शाश्वतं यथा।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो (द्रव्य) तीनों कालोंमें अपने रूपको छोड़ता हुआ और नहीं छोड़ता हुआ पूर्व रूपसे और अपूर्व रूपसे वर्त रहा है वह उपादान कारण है, ऐसा जानना चाहिए। जो अपने स्वरूपको छोड़ता ही है और जो उसे सर्वथा नहीं छोड़ता वह अर्थका उपादान नहीं होता जैसे क्षणिक और शाश्वत। भावार्थ-द्रव्यमें दो अंश हैं-एक शाश्वत और एक क्षणिक। गुण शाश्वत होनेके कारण अपने स्वरूपको त्रिकाल नहीं छोड़ते और पर्याय क्षणिक होनेके कारण अपने स्वरूपको प्रतिक्षण छोड़ती है। यह दोनों ही अंश उस द्रव्यसे पृथक् कोई अर्थांतर रूप नहीं हैं। इन दोनोंसे समवेत द्रव्य ही कार्यका उपादान कारण है। अर्थांतरभूत रूपसे स्वीकार किये गये शाश्वत-पदार्थ या क्षणिकपदार्थ कभी भी उपादान नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सर्वथा शाश्वत पदार्थ में परिणमनका अभाव होनेके कारण कार्य ही नहीं तब कारण किसे कहें। और सर्वथा क्षणिक पदार्थ प्रतिक्षण विनष्ट ही हो जाता है तब उसे कारणपना कैसे बन सकता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(ज्ञानदर्पण 57-58)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;p&amp;gt;अष्टसहस्री श्लो. 58 की टीका-&amp;quot;परिणाम क्षणिक उपादान है और गुण शाश्वत उपादान है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निमित्त, उपादान चिट्ठी पं. बनारसीदास-&amp;quot;उपादान वस्तुकी सहन शक्ति है।&amp;quot;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 16 शुद्धानंतशक्तिज्ञानविपरिणमनस्वभावसमये पूर्वप्रवृत्तविकलज्ञानस्वभावापगमेऽपि सहजज्ञानस्वभावेनध्रुवत्वालंबनादपादानत्वमुपाददानः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शुद्धानंत शक्तिमय ज्ञान रूप से परिणमित होने के समय पूर्व में प्रवर्तमान विकल ज्ञान स्वभाव का नाश होने पर भी सहज ज्ञान स्वभाव से स्वयं ही ध्रुवता का अवलंबन करने से (आत्मा) अपादानता को धारण करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपादान कारक</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%95&amp;diff=106053"/>
		<updated>2022-12-14T12:42:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 16 शुद्धानंतशक्तिज्ञानविपरिणमनस्वभावसमये पूर्वप्रवृत्तविकलज्ञानस्वभावापगमेऽपि सहजज्ञानस्वभावेनध्रुवत्वालंबनादपादानत्वमुपाददानः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शुद्धानंत शक्तिमय ज्ञान रूप से परिणमित होने के समय पूर्व में प्रवर्तमान विकल ज्ञानस्वभाव का नाश होने पर भी सहज ज्ञानस्वभाव से स्वयं ही ध्रुवता का अवलंबन करने से (आत्मा) अपादानता को धारण करता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106052</id>
		<title>दान</title>
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		<updated>2022-12-14T12:39:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शुद्ध  धर्म का अवकाश न होने से गृहस्थ धर्म में दान की प्रधानता है। वह दान दो भागों  में विभाजित किया जा सकता है–अलौकिक व लौकिक। अलौकिक दान साधुओं को दिया जाता है  जो चार प्रकार का है–आहार, औषध, ज्ञान व अभय तथा लौकिक दान साधारण व्यक्तियों को  दिया जाता है जैसे समदत्ति, करुणादत्ति, औषधालय, स्कूल, सदाव्रत, प्याऊ आदि  खुलवाना इत्यादि।         निरपेक्ष  बुद्धि से सम्यक्त्व पूर्वक सद्पात्र को दिया गया अलौकिक दान दातार को परंपरा  मोक्ष प्रदान करता है। पात्र, कुपात्र व अपात्र को दिये गये दान में भावों की  विचित्रता के कारण फल में बड़ी विचित्रता पड़ती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दान सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1 |  दान सामान्य का लक्षण।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.2 |  दान के भेद।        ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.3 |  औषधालय सदाव्रतादि खुलवाने का विधान।   ]]     &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.4 |  दया दत्ति आदि के लक्षण।    ]]    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.5 |  सात्त्विक राजसादि दानों के लक्षण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.6 |  सात्त्विकादि दानों में परस्पर तरतमता।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.7 |  तिर्यंचों के लिए भी दान देना संभव है।   ]]     &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान कथंचित् क्षायोपशमिक भाव है।–देखें [[ क्षायोपशमिक ]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान भी कथंचित् सावद्य योग है।–देखें [[ सावद्य#7 | सावद्य - 7]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; विधि दान क्रिया।–देखें [[ संस्कार#2 | संस्कार - 2]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; क्षायिक दान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;  &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.1 |  क्षायिक दान का लक्षण।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.2 |  क्षायिक दान संबंधी शंका समाधान।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.3 |  सिद्धों में क्षायिक दान क्या है।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; गृहस्थों के लिए दान धर्म की प्रधानता&amp;lt;/strong&amp;gt;  &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.1 |  सत् पात्र को दान देना ही गृहस्थ का परमधर्म है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.2 |  दान देकर खाना ही योग्य है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.3 |  दान दिये बिना खाना योग्य नहीं।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.4 |  दान देने से ही जीवन व धन सफल है।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.5 |  दान को परम धर्म कहने का कारण। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान दिये बिना धर्म को खाना महापाप है।–देखें [[ पूजा#2.1 | पूजा - 2.1]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दान का महत्त्व व फल&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.1 |  पात्रदान सामान्य का महत्त्व।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.2 |  आहार दान का महत्त्व।     ]]   &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.3 |  औषध व ज्ञान दान का महत्त्व।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #4.4 | अभयदान का महत्त्व।    ]]    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.5 |  सत् पात्र को दान देना सम्यग्दृष्टि को मोक्ष  का कारण है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.6 |  सत्पात्र दान मिथ्यादृष्टि को सुभोग भूमिका कारण  है।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.7 |  कुपात्र दान कुभोग भूमिका कारण है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.8 |  अपात्र दान का फल अत्यंत अनिष्ट है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.9 |  विधि, द्रव्य, दाता व पात्र के कारण दान के फल  में विशेषता आ जाती है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; मंदिर में घंटी, चमर आदि के दान का महत्त्व व फल।–देखें [[ पूजा#4.2 | पूजा - 4.2]]।        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ol start=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.10 |  दान के प्रकृष्ट फल का कारण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; विधि, द्रव्य, दातृ, पात्रादि निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; भक्ति पूर्वक ही पात्र को दान देना चाहिए।–देखें [[ आहार#II.1 | आहार - II.1]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान की विधि अर्थात् नवधा भक्ति।–देखें [[ भक्ति#6 | भक्ति - 6]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.1 |   दान योग्य द्रव्य।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; साधु को दान देने योग्य दातार।–देखें [[ आहार#II.5 | आहार - II.5]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान योग्य पात्र कुपात्र आदि निर्देश।–देखें [[ पात्र ]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान के लिए पात्र की परीक्षा का विधि निषेध।–देखें [[ विनय#5 | विनय - 5]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.2 |  दान प्रति उपकार की भावना से निरपेक्ष देना चाहिए।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.3 |  गाय आदि का दान योग्य नहीं।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.4 |  मिथ्यादृष्टि को दान देने का निषेध।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.5 |  कुपात्र व अपात्र को करुणा बुद्धि से दान दिया  जाता है।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.6 |  दुखित भुखित को भी करुणा बुद्धि से दान दिया जाता  है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.7 |  ग्रहण व संक्रांति आदि के कारण दान देना योग्य  नहीं। ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह का विधि निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.1 |  दान के लिए धन की इच्छा अज्ञान है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.2 |  दान देने की बजाय धन का ग्रहण ही न करे।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.3 |  दानार्थ धन संग्रह को कथंचित् इष्टता।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.4 |  आय का वर्गीकरण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&amp;amp;nbsp;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; दान सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt; दान सामान्य का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        त.स./7/38  अ&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ।38। स्वपरोपकारोऽनुग्रह: (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/7/38 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;स्वयं  अपना और दूसरे के उपकार के लिए अपनी वस्तु का त्याग करना दान है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/6/12/330/14   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परानुग्रहबुद्धया स्वस्यातिसर्जनं दानम् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दूसरे का उपकार हो इस बुद्धि से  अपनी वस्तु का अर्पण करना दान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/6/12/4/522 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,5,137/389/12   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;रत्नत्रयवद्भ्य: स्ववित्तपरित्यागो दानं रत्नत्रयसाधनादित्सा वा।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;रत्नत्रय  से युक्त जीवों के लिए अपने वित्त का त्याग करने या रत्नत्रय के योग्य साधनों  के प्रदान करने की इच्छा का नाम दान है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt;दान के भेद&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./117  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आहारौषधयोरप्युपकरणावासयोश्च दानेन वैयावृत्यं ब्रुवते चतुरात्मत्वेन  चतुरस्रा:।117।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चार ज्ञान के धारक गणधर आहार, औषध के तथा ज्ञान के साधन शास्त्रादिक  उपकरण और स्थान के (वस्तिका के) दान से चार प्रकार का वैयावृत्य कहते हैं।117। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; जंबूद्वीपपण्णत्तिसंगहो/2/148 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/233 &amp;lt;/span&amp;gt;) (पं.वि./2/50)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/6/24/338/11   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;त्यागो दानम् । तत्त्रिविधम् – आहारदानमभयदानं ज्ञानदानं चेति। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;त्याग दान  है। वह तीन प्रकार का है–आहारदान, अभयदान और ज्ञानदान।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/38/35 &amp;lt;/span&amp;gt;...।  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;चतुर्धा वर्णिता दत्ति: दयापात्रसमान्वये।35।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और  अन्वय दत्ति ये चार प्रकार की दत्ति कही गयी है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–तीन प्रकार का दान कहा गया है–सात्त्विक, राजस और तामस दान।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;औषधालय सदाव्रत आदि खुलवाने का विधान&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/40   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सत्रमप्यनुकंप्यानां, सृजेदनुजिघृक्षया। चिकित्साशालवद्दुष्येन्नेज्जायै  वाटिकाद्यपि।40। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पाक्षिक श्रावक, औषधालय की तरह दुखी प्राणियों के उपकार की चाह  से अन्न और जल वितरण के स्थान को भी बनवाये और जिनपूजा के लिए पुष्पवाटिकाएँ बावड़ी  व सरोवर आदि बनवाने में भी हर्ज नहीं है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt; दया दत्ति आदि के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/38/36-41   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सानुकंपमनुग्राह्ये प्राणिवृंदेऽभयप्रदा। त्रिशुद्धयनुगता सेयं दयादत्तिर्मता  बुधै:।36। महातपोधनाचार्याप्रतिग्रहपुर:सरम् । प्रदानमशनादीनां पात्रदानं तदिष्यते।37।  समानायात्मनान्यस्मै क्रियामंत्रव्रतादिभि:। निस्तारकोत्तमायेह भूहेमाद्यतिसर्जनम्  ।38। समानदत्तिरेषा स्यात् पात्रे मध्यमतायिते। समानप्रतिपत्त्यैव प्रवृत्ता  श्रद्धयान्विता।39। आत्मान्वयप्रतिष्ठार्थं सूनवे यदशेषत:। समं समयवित्ताभ्यां  स्ववर्गस्यातिसर्जनम् ।40। सैषा सकलदत्ति:...।41।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अनुग्रह करने योग्य  प्राणियों के समूह पर दयापूर्वक मन, वचन, काय की शुद्धि के साथ उनके भय दूर करने  को पंडित लोग दयादत्ति मानते हैं।36। महा तपस्वी मुनियों के लिए सत्कारपूर्वक  पड़गाहन कर जो आहार आदि दिया जाता है उसे पात्र दत्ति कहते हैं।37। क्रिया, मंत्र  और व्रत आदि से जो अपने समान है तथा जो संसार समुद्र से पार कर देने वाला कोई अन्य  उत्तम गृहस्थ है उसके लिए (कन्या, हस्ति, घोड़ा, रथ, रत्न (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार  &amp;lt;/span&amp;gt;) पृथिवी  सुवर्ण आदि देना अथवा मध्यम पात्र के लिए समान बुद्धि से श्रद्धा के साथ जो दान  दिया जाता है वह समान दत्ति कहलाता है।38-39। अपने वंश की प्रतिष्ठा के लिए पुत्र  को समस्त कुल पद्धति तथा धन के साथ अपना कुटुंब समर्पण करने को सकल दत्ति (वा  अन्वयदत्ति) कहते हैं।40। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/7/27-28 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/234-238   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;असणं पाणं खाइयं साइयमिदि चउविहो वराहारो। पुव्वुत्त-णव-विहाणेहिं तिविहपत्तस्स  दायव्वो।234। अइबुड्ढ-बाल-मुयंध-बहिर-देसंतरीय-रोडाणं। जह जोग्गं दायव्वं  करुणादाणं त्ति भणिऊण।235। उववास-वाहि-परिसम-किलेस-परिपीडयं मुणेऊण। पत्थं  सरीरजोग्गं भेसजदाणं पि दायव्वं।236। आगम-सत्थाइं लिहाविऊण दिज्जंति जं  जहाजोग्गं। तं जाण सत्थदाणं जिणवयणज्झावणं च तहा।237। जं कीरइ परिरक्खा णिच्चं  मरण-भयभीरुजीवाणं। तं जाण अभयदाणं सिहामणिं सव्वदाणाणं।238। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अशन, पान, खाद्य और  स्वाद्य ये चार प्रकार का श्रेष्ठ आहार पूर्वोक्त नवधा भक्ति से तीन प्रकार के  पात्र को देना चाहिए।234। अति, बालक, मूक (गूँगा), अंध, बधिर (बहिरा), देशांतरीय  (परदेशी) और रोगी दरिद्री जीवों को ‘करुणादान दे रहा हूँ’ ऐसा कहकर अर्थात् समझकर  यथायोग्य आहार आदि देना चाहिए।235। उपवास, व्याधि, परिश्रम और क्लेश से परिपीड़ित  जीव को जानकर अर्थात् देखकर शरीर के योग्य पथ्यरूप औषधदान भी देना चाहिए।236।  जो आगम-शास्त्र लिखाकर यथायोग्य पात्रों को दिये जाते हैं, उसे शास्त्रदान  जानना चाहिए तथा जिनवचनों का अध्यापन कराना पढ़ाना भी शास्त्रदान है।237। मरण से  भयभीत जीवों का जो नित्य परिरक्षण किया जाता है, वह सब दानों का शिखामणिरूप  अभयदान जानना चाहिए।238।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दयादत्तिरनुकंपयाऽनुग्राह्येभ्य: प्राणिभ्यस्त्रिशुद्धिभिरभयदानं।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस पर  अनुग्रह करना आवश्यक है ऐसे दुखी प्राणियों को दयापूर्वक मन, वचन, काय की शुद्धता  से अभयदान देना दयादत्ति है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश/2/127/243/10   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयेन वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनपरिणामरूपमभयप्रदानं स्वकीयजीवस्य व्यवहारेण  प्राणरक्षारूपमभयप्रदानं परजीवानां।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयनयकर वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन  परिणाम रूप जो निज भावों का अभयदान निज जीव की रक्षा और व्यवहार नयकर परप्राणियों  के प्राणों की रक्षारूप अभयदान यह स्वदया परदयास्वरूप अभयदान है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5&amp;quot; id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt; सात्त्विक राजसादि दानों के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आतिथेयं हितं यत्र यत्र पात्रपरीक्षणं। गुणा: श्रद्धादयो यत्र तद्दानं  सात्त्विकं विदु:। यदात्मवर्णनप्रायं क्षणिकाहार्यविभ्रमं। परप्रत्ययसंभूतं दानं  तद्राजसं मतं। पात्रापात्रसमावेक्षमसत्कारमसंस्तुतं। दासभृत्यकृतोद्योगं दानं  तामसमूचिरे। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस दान में अतिथि का कल्याण हो, जिसमें पात्र की परीक्षा वा  निरीक्षण स्वयं किया गया हो और जिसमें श्रद्धादि समस्त गुण हों उसे सात्त्विक  दान कहते हैं। जो दान केवल अपने यश के लिए किया गया हो, जो थोड़े समय के लिए ही  सुंदर और चकित करने वाला हो और दूसरे से दिलाया गया हो उसको राजस दान कहते हैं।  जिसमें पात्र अपात्र का कुछ ख्याल न किया गया हो, अतिथि का सत्कार न किया गया  हो, जो निंद्य हो और जिसके सब उद्योग दास और सेवकों से कराये गये हों, ऐसे दान  को तामसदान कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.6&amp;quot; id=&amp;quot;1.6&amp;quot;&amp;gt; सात्त्विकादि दानों में परस्पर तरतमता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;उत्तमं सात्त्विकं दानं मध्यमं राजसं भवेत् । दानानामेव सर्वेषां  जघन्यं तामसं पुन:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सात्त्विक दान उत्तम है राजस मध्यम है, और सब दानों में  तामस दान जघन्य है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.7&amp;quot; id=&amp;quot;1.7&amp;quot;&amp;gt; तिर्यंचों के लिए भी दान देना संभव है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 7/2,2,16/123/4   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;कधं तिरिक्खेसु दाणस्स संभवो। ण, तिरिक्खसंजदासंजदाणं सचित्तभंजणे गहिदपच्चक्खाणं  सल्लइपल्लवादिं देंततिरिक्खाणं तदविरोधादो।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–तिर्यंचों में दान  देना कैसे संभव हो सकता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–नहीं, क्योंकि जो तिर्यंच संयतासंयत  जीव सचित्त भोजन के प्रत्याख्यान अर्थात् व्रत को ग्रहण कर लेते हैं उनके लिए  सल्लकी के पत्तों आदि का दान करने वाले तिर्यंचों के दान देना मान लेने में कोई  विरोध नहीं आता।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt; क्षायिक दान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.1&amp;quot; id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt;क्षायिक दान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/2/4/154/4   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दानांतरायस्यात्यंतक्षयादनंतप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदानम् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दानांतरायकर्म  के अत्यंत क्षय से अनंत प्राणियों के समुदाय का उपकार करने वाला क्षायिक अभयदान  होता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/2/4/2/105/28 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.2&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; क्षायिक दान संबंधी शंका समाधान&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 14/5,6,18/17/1   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;अरहंता खीणदाणंताराइया सव्वेसिं जीवाणमिच्छिदत्थे किण्ण देंति। ण, तेसिं जीवाणं  लाहंतराइयभावादो। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–अरिहंतों के दानांतराय का तो क्षय हो गया  है, फिर वे सब जीवों को इच्छित अर्थ क्यों नहीं देते ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–नहीं, क्योंकि  उन जीवों के लाभांतराय कर्म का सद्भाव पाया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.3&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt; सिद्धों में क्षायिक दान क्या&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;strong&amp;gt;है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/2/4/155/1   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यदि क्षायिकदानादिभावकृतमभयदानादि, सिद्धेष्वपि तत्प्रसंग: नैष दोष:,  शरीरनामतीर्थंकरनामकर्मोदयाद्यपेक्षत्वात् । तेषां तदभावे तदप्रसंग:। कथ तर्हि  तेषां सिद्धेषु वृत्ति:। परमानंदाव्याबाधरूपेणैव तेषां तत्र वृत्ति:।  केवलज्ञानरूपेणानंतवीर्यवृत्तिवत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–यदि क्षायिक दानादि भावों  के निमित्त से अभय दानादि कार्य होते हैं तो सिद्धों में भी उनका प्रसंग प्राप्त  होता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–यह कोई दोष नहीं, क्योंकि इन अभयदानादि के होने में शरीर  नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म के उदय की अपेक्षा रहती है। परंतु सिद्धों के  शरीरनामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं होते अत: उनके अभयदानादि नहीं प्राप्त होते। &amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–तो सिद्धों में क्षायिक दानादि भावों का सद्भाव कैसे माना जाय ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–जिस  प्रकार सिद्धों के केवलज्ञान रूप से अनंत वीर्य का सद्भाव माना गया है उसी  प्रकार परमानंद के अव्याबाध रूप से ही उनका सिद्धों के सद्भाव है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./11  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेणविणा।...।11। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सुपात्र में चार प्रकार का  दान देना और श्री देवशास्त्र गुरु की पूजा करना श्रावक का मुख्य धर्म है। नित्य  इन दोनों को जो अपना मुख्य कर्तव्य मानकर पालन करता है वही श्रावक है, धर्मात्मा  व सम्यग्दृष्टि है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./13) (पं.वि./7/7)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111/4/231/14   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थानामाहारदानादिकमेव परमोधर्म:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थों के तो आहार दानादिक ही बड़े  धर्म हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;32&amp;quot; id=&amp;quot;32&amp;quot;&amp;gt;दान देकर खाना ही योग्य है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./22  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;जो मूणिभुत्तावसेसं भुंजइसी भुंजए जिणवद्दिट्ठं। संसारसारसोक्खं कमसो णिव्वाणवरसोक्खं। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो भव्य जीव मुनीश्वरों को आहारदान देने के पश्चात् अवशेष अन्न को प्रसाद  समझकर सेवन करता है वह संसार के सारभूत उत्तम सुखों को प्राप्त होता है और क्रम  से मोक्ष सुख को प्राप्त होता है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/12-13 &amp;lt;/span&amp;gt;...&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;लच्छी  दिज्जउ दाणे दया-पहाणेण। जा जल-तरंग-चवला दो तिण्णि दिणाइ चिट्ठेइ।12। जो पुण  लच्छिं संचदि ण य...देदि पत्तेसु। सो अप्पाणं वंचदि मणुयत्तं णिप्फलं तस्स।13। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;यह  लक्ष्मी पानी में उठने वाली लहरों के समान चंचल है, दो, तीन दिन ठहरने वाली है तब  इसे...दयालु होकर दान दो।12। जो मनुष्य लक्ष्मी का केवल संचय करता है...न उसे  जघन्य, मध्यम अथवा उत्तम पात्रों में दान देता है, वह अपनी आत्मा को ठगता है,  और उसका मनुष्य पर्याय में जन्म लेना वृथा है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.3&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt; दान दिये बिना खाना योग्य नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        कुरल/9/2  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यदि देवाद् गृहे वासो देवस्यातिथिरूपिण:। पीयूषस्यापि पानं हि तं विना नैव  शोभते।2।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब घर में अतिथि हो तब चाहे अमृत ही क्यों न हो, अकेले नहीं पीना  चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        क्रिया  कोष/1986 &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जानौ गृद्ध समान ताके सुतदारादिका। जो नहीं करे सुदान ताके धन आमिष समा।1986। =जो दान नहीं करता है उसका धन मांस के समान है, और उसे खाने वाले पुत्र, स्त्री  आदिक गिद्ध मंडली के समान हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.4&amp;quot; id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt; दान देने से ही जीवन व धन सफल है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/14/19-20   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;जो संचिऊण लच्छिं धरणियले संठवेदि अइदूरे। सो पुरिसो तं लच्छिं पाहाण-सामाणियं  कुणदि।14। जो वड्ढमाण-लच्छिं अणवरयं देदि धम्म-कज्जेसु। सो पंडिएहि थुव्वदि  तस्स वि सयला हवे लच्छी।19। एवं जो जाणित्ता विहलिय-लोयाण धम्मजुत्ताणं।  णिरवेक्खो तं देदि हु तस्स हवे जीवियं सहलं।20। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मनुष्य लक्ष्मी का संचय  करके पृथिवी के गहरे तल में उसे गाड़ देता है, वह मनुष्य उस लक्ष्मी को पत्थर  के समान कर देता है।14। जो मनुष्य अपनी बढ़ती हुई लक्ष्मी को सर्वदा धर्म के  कामों में देता है, उसकी लक्ष्मी सदा सफल है और पंडित जन भी उसकी प्रशंसा करते  हैं।19। इस प्रकार लक्ष्मी को अनित्य जानकर जो उसे निर्धन धर्मात्मा व्यक्तियों  को देता है और बदले में प्रत्युपकार की वांछा नहीं करता, उसी का जीवन सफल है।20। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.5&amp;quot; id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt; दान को परम धर्म कहने का कारण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/13 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नानागृहव्यतिकरार्जितपापपुंजै: खंजीकृतानि  गृहिणो न तथा व्रतानि। उच्चै: फलं विदधतीह यथैकदापि प्रीत्याति शुद्धमनसा  कृतपात्रदानम् ।13।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;लोक में अत्यंत विशुद्ध मन वाले गृहस्थ के द्वारा प्रीति  पूर्वक पात्र के लिए एक बार भी किया गया दान जैसे उन्नत फल को करता है वैसे फल को  गृह की अनेक झंझटों से उत्पन्न हुए पाप समूहों के द्वारा कुबड़े अर्थात्  शक्तिहीन किये गये गृहस्थ के व्रत नहीं करते हैं।13।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111,4/231/15  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कस्मात् स एव परमो धर्म  इति चेत्, निरंतरविषयकषायाधीनतया आर्तरौद्रध्यानरतानां निश्चयरत्नत्रयलक्षणस्य  शुद्धोपयोगपरमधर्मस्यावकाशो नास्तीति।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–श्रावकों का दानादिक ही परम धर्म  कैसे है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–वह ऐसे है, कि ये गृहस्थ लोग हमेशा विषय कषाय के अधीन हैं, इससे  इनके आर्त, रौद्र ध्यान उत्पन्न होते रहते हैं, इस कारण निश्चय रत्नत्रयरूप  शुद्धोपयोग परमधर्म का तो इनके ठिकाना ही नहीं है। अर्थात् अवकाश ही नहीं है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4&amp;quot; id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt; दान का महत्त्व व फल&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.1&amp;quot; id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;पात्र दान  सामान्य का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/16-21  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;दिण्णइ सुपत्तदाणं विससतो होइ भोगसग्ग  मही। णिव्वाणसुहं कमसो णिद्दिट्ठं जिणवरिंदेहिं।16। खेत्तविसमे काले वविय सुवीयं  फलं जहा विउलं। होइ तहा तं जाणइ पत्तविसेसेसु दाणफलं।17। इस णियसुवित्तवीयं जो ववइ  जिणुत्त सत्तखेत्तेसु। सो तिहुवणरज्जफलं भुंजदि कल्लाणपंचफलं।18।  मादुपिदुपुत्तमित्तं कलत्त-धणधण्णवत्थु वाहणविसयं। संसारसारसोक्खं जाणउ  सुपत्तदाणफलं।19। सत्तंगरज्ज णवणिहिभंडार सडंगवलचउद्दहरणयं। छण्णवदिसहसिच्छिविहउ  जाणउ सुपत्तदाणफलं।20। सुकलसुरूवसुलक्खण सुमइ सुसिक्खा सुसील सुगुण चारित्तं।  सुहलेसं सुहणामं सुहसादं सुपत्तदाणफलं।21। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सुपात्र को दान प्रदान करने से भोगभूमि  तथा स्वर्ग के सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति होती है। और अनुक्रम से मोक्ष सुख की  प्राप्ति होती है।16। जो मनुष्य उत्तम खेत में अच्छे बीज को बोता है तो उसका फल  मनवांछित पूर्ण रूप से प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्तम पात्र में विधिपूर्वक  दान देने से सर्वोत्कृष्ट सुख की प्राप्ति होती है।17। जो भव्यात्मा अपने  द्रव्य को सात क्षेत्रों में विभाजित करता है वह पंचकल्याण से सुशोभित त्रिभुवन  के राज्यसुख को प्राप्त होता है।18। माता, पिता, पुत्र, स्त्री, मित्र आदि  कुटुंब परिवार का सुख और धन-धान्य, वस्त्र-अलंकार, हाथी, रथ, महल तथा  महाविभूति आदि का सुख एक सुपात्र दान का फल है।19। सात प्रकार राज्य के अंग, नवविधि,  चौदह रत्न, माल खजाना, गाय, हाथी, घोड़े, सात प्रकार की सेना, षट्खंड का राज्य  और छयानवे हजार रानी से सर्व सुपात्र दान का ही फल है।20। उत्तम कुल, सुंदर स्वरूप,  शुभ लक्षण, श्रेष्ठ बुद्धि, उत्तम निर्दोष शिक्षा, उत्तमशील, उत्तम उत्कृष्ट  गुण, अच्छा सम्यक्चारित्र, उत्तम शुभ लेश्या, शुभ नाम और समस्त प्रकार के  भोगोपभोग की सामग्री आदि सर्व सुख के साधन सुपात्र दान के फल से प्राप्त होते हैं।21।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./115-116 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;उच्चैर्गोत्रं प्रणतेर्भोगो  दानादुपासनात्पूजा। भक्ते: सुंदररूपं स्तवनात्कीर्तिस्तपोनिधिषु।115।  क्षितिगतमिववटवीजं पात्रगतं दानमल्पमति काले। फलति च्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृतां।116। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;तपस्वी मुनियों को नमस्कार करने से उच्चगोत्र, दान देने से भोग, उपासना करने  से प्रतिष्ठा, भक्ति करने से सुंदर रूप और स्तवन करने से कीर्ति होती है।115।  जीवों को पात्र में गया हुआ थोड़ा-सा भी दान समय पर पृथ्वी में प्राप्त हुए वट  बीज के छाया विभव वाले वृक्ष की तरह मनोवांछित बहुत फल को फलता है।116। &amp;lt;/span&amp;gt;(पं.वि./2/8-11)        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पुरुषार्थ-सिद्ध्युपाय/174  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कृतमात्मार्थं मुनये ददाति भक्तमिति  भावितस्त्याग:। अरतिविषादविमुक्त: शिथिलितलोभो भवत्यहिंसैव।174। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस अतिथि  संविभाग व्रत में द्रव्य अहिंसा तो परजीवों का दु:ख दूर करने के निमित्त प्रत्यक्ष  ही है, रहीं भावित अहिंसा वह भी लोभ कषाय के त्याग की अपेक्षा समझनी चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/15-44&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; प्राय: कुतो गृहगते परमात्मबोध:  शुद्धात्मनो भुवि यत: पुरुषार्थसिद्धि:। दानात्पुनर्ननु चतुर्विधत: करस्था सा  लीलयैव कृतपात्रजनानुषंगात् ।15। किं ते गुणा: किमिह तत्सुखमस्ति लोके सा किं  विभूतिरथ या न वशं प्रयाति। दानव्रतादिजनितो यदि मानवस्य धर्मो जगत्त्रयवशीकरणैकमंत्रा:।19।  सौभाग्यशौर्यसुखरूपविवेकिताद्या विद्यावपुर्धनगृहाणि कुले च जन्म। संपद्यतेऽखिलमिदं  किल पात्रदानात् तस्मात् किमत्र सततं क्रियते न यत्न:।44। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जगत् में जिस आत्मस्वरूप  के ज्ञान से शुद्ध आत्मा के पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, वह आत्मज्ञान गृह में  स्थित मनुष्यों के प्राय: कहाँ से होती है ? अर्थात् नहीं हो सकती ? किंतु वह  पुरुषार्थ की सिद्धि पात्रजनों में किये गये चार प्रकार के दान से अनायास ही हस्तगत  हो जाती है।15। यदि मनुष्य के पास तीनों लोकों को वशीभूत करने के लिए अद्वितीय  वशीकरण मंत्र के समान दान एवं व्रतादि से उत्पन्न हुआ धर्म विद्यमान है तो ऐसे  कौन से गुण है जो उसके वश में न हो सकें, तथा वह कौन-सी विभूति है जो उसके अधीन न  हो अर्थात् धर्मात्मा मनुष्य के लिए सब प्रकार के गुण, उत्तम सुख और अनुपम  विभूति भी स्वयमेव प्राप्त हो जाती है।19। सौभाग्य, शूरवीरता, सुख, सुंदरता,  विवेक, बुद्धि आदि विद्या, शरीर, धन और महल तथा उत्तम कुल में जन्म होना यह सब  निश्चय से पात्रदान के द्वारा ही प्राप्त होता है। फिर हे भव्य जन ! तुम इस  पात्रदान के विषय में क्यों नहीं यत्न करते हो।44। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.2&amp;quot; id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt; आहार दान का महत्त्व &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./114 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गृहकर्माणि निचितं कर्म विमार्ष्टि  खलु गृहविमुक्तानां। अतिथीनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते वारि।114।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे जल निश्चय  करके रुधिर को धो देता है, तैसे ही गृहरहित अतिथियों का प्रतिपूजन करना अर्थात्  नवधाभक्ति-पूर्वक आहारदान करना भी निश्चय करके गृहकार्यों से संचित हुए पाप को  नष्ट करता है।114। (पं.वि./7/13)        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/5/4  &amp;lt;/span&amp;gt;परनिंदाभयं यस्य विना दानं न भोजनम् ।  कृतिनस्तस्य निर्बीजो वंशो नैव कदाचन् ।4।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/33/2  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;इदं हि धर्मसर्वस्वं शास्तृणां वचने  द्वयम् । क्षुधार्तेन समं भुक्ति: प्राणिनां चैव रक्षणम् ।2। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो बुराई से डरता  है और भोजन करने से पहले दूसरों को दान देता है, उसका वंश कभी निर्बीज नहीं होता।4।  क्षुधाबाधितों के साथ अपनी रोटी बाँटकर खाना और हिंसा से दूर रहना, यह सब धर्म  उपदेष्टाओं के समस्त उपदेशों में श्रेष्ठम उपदेश है।2। &amp;lt;/span&amp;gt;(पं.वि./6/31)        पं.वि./7/8 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वो वांछति सौख्यमेव तनुभृत्तन्मोक्ष  एव स्फुटम् । दृष्टयादित्रय एव सिद्धयति स तंनिर्ग्रंथ एव स्थितम् । तद्वृत्तिर्वपुषोऽस्य  वृत्तिरशनात्तद्दीयते श्रावकै: काले क्लिष्टतरेऽपि मोक्षपदवी प्रायस्ततो  वर्तते।8। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सब प्राणी सुख की इच्छा करते हैं, वह सुख स्पष्टतया मोक्ष में ही  है, वह मोक्ष सम्यग्दर्शनादि स्वरूप रत्नत्रय के होने पर ही सिद्ध होता है, वह  रत्नत्रय साधु के होता है, उक्त साधु की स्थिति शरीर के निमित्त से होती है, उस  शरीर की स्थिति भोजन के निमित्त से होती है, और वह भोजन श्रावकों के द्वारा दिया  जाता है। इस प्रकार इस अतिशय क्लेशयुक्त काल में भी मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति  प्राय: उन श्रावकों के निमित्त से ही हो रही है।8।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/363-364  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;भोयण दाणे दिण्णे तिण्णि वि  दाणाणि होंति दिण्णाणि। भुक्ख-तिसाए वाही दिणे दिणे होंति देहीणं।363। भोयण-बलेण  साहू सत्थं सेवेदि रत्तिदिवसं पि। भोयणदाणे दिण्णे पाणा वि य रक्खिया होंति।364।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भोजन दान देने पर तीनों दान दिये होते हैं। क्योंकि प्राणियों को भूख और प्यास  रूपी व्याधि प्रतिदिन होती है। भोजन के बल से ही साधु रात दिन शास्त्र का अभ्यास  करता है और भोजन दान देने पर प्राणों की भी रक्षा होती है।363-364। भावार्थ–आहार  दान देने से विद्या, धर्म, तप, ज्ञान, मोक्ष सभी नियम से दिया हुआ समझना चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./11/25,30 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;केवलज्ञानतो ज्ञानं निर्वाणसुखत:  सुखम् । आहारदानतो दानं नोत्तमं विद्यते परम् ।25। बहुनात्र किमुक्तेन बिना  सकलवेदिना। फलं नाहारदानस्य पर: शक्नोति भाषितुम् ।31। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;केवलज्ञानतैं दूजा  उत्तम ज्ञान नहीं, और मोक्ष सु:खतै और दूजा सुख नहीं और आहारदानतै और दूजा उत्तम  दान नाहीं।25। जो किछु वस्तु तीन लोकविषै सुंदर देखिये है सो सर्व वस्तु अन्नदान  करता जो पुरुष ताकरि लीलामात्र करि शीघ्र पाइये है। (अमितगति श्रावकाचार/11/14-41)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/ &amp;lt;/span&amp;gt;पृ.161 पर फुट नोट–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आहाराद्भोगवान् भवेत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आहार  दान से भोगोपभोग मिलता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.3&amp;quot; id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt; औषध व ज्ञान दान का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमितगति श्रावकाचार/11/37-50 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आजन्म जायते यस्य न व्याधिस्तनुतापक:।  किं सुखं कथ्यते तस्य सिद्धस्येव महात्मन:।37। निधानमेष कांतीनां  कीर्त्तीनां कुलमंदिरम् । लावण्यानां नदीनाथो भैषज्यं येन दीयते।38। लभ्यते  केवलज्ञानं यतो विश्वावभासकम् । अपरज्ञानलाभेषु कीदृशी तस्य वर्णना।47। शास्त्रदायी  सतां पूज्य: सेवनीयो मनीषिणाम् । वादी वाग्मी कविर्मान्य: ख्यातशिक्ष:  प्रजायते।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जाकै जन्म तै लगाय शरीर को ताप उपजावनै वाला रोग न होय है तिस  सिद्धसमान महात्मा का सुख कहिये। भावार्थ–इहाँ सिद्ध समान कह्या सो जैसे  सिद्धनिकौं रोग नाहीं तैसे याकै भी रोग नाहीं, ऐसी समानता देखी उपमा दीनि है।37।  जा पुरुषकरि औषध दीजिये है सो यहु पुरुष कांति कहिये दीप्तिनिका तौ भंडार होय  है, और कीर्त्तिनिका कुल मंदिर होय है जामै यशकीर्त्ति सदा वसै है, बहुरि सुंदरतानिका  समुद्र होय है ऐसा जानना।38। जिस शास्त्रदान करि पवित्र मुक्ति दीजिये है ताकै  संसार की लक्ष्मी देते कहा श्रम है।46। शास्त्रकौ देने वाला पुरुष संतनिके  पूजनीक होय है अर पंडितनि के सेवनीक होय है, वादीनिके जीतने वाला होय है, सभा को  रंजायमान करने वाला वक्ता होय है, नवीन ग्रंथ रचने वाला कवि होय है अर मानने  योग्य होय है अर विख्यात है शिक्षा जाकी ऐसा होय है।50। &amp;lt;/span&amp;gt;पं.वि./7/9-10 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्वेच्छाहारविहारजल्पनतया नीरुग्वपुर्जायते।  साधूनां तु न सा ततस्तदपटु प्रायेण संभाव्यते। कुर्यादौषधपथ्यवारिभिरिदं  चारित्रभारक्षमं यत्तस्मादिह वर्तते प्रशमिनां धर्मो गृहस्थोत्तमात् ।9। व्याख्याता  पुस्तकदानमुन्नतधियां पाठाय भव्यात्मनां। भक्त्या यत्क्रियते श्रुताश्रयमिदं  दानं तदाहुर्बुधा:। सिद्धेऽस्मिन् जननांतरेषु कतिषु त्रैलोक्यलोकोत्सवश्रीकारिप्रकटीकृताखिलजगत्कैवल्यभाजो  जना:।10। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शरीर इच्छानुसार भोजन, गमन और संभाषण से नीरोग रहता है। परंतु इस  प्रकार की इच्छानुसार प्रवृत्ति साधुओं के संभव नहीं है। इसलिए उनका शरीर  प्राय: अस्वस्थ हो जाता है। ऐसी अवस्था में चूँकि श्रावक उस शरीर को औषध पथ्य  भोजन और जल के द्वारा व्रतपरिपालन के योग्य करता है अतएव यहाँ उन मुनियों का धर्म  उत्तम श्रावक के निमित्त से ही चलता है।9। उन्नत बुद्धि के धारक भव्य जीवों को  जो भक्ति से पुस्तक का दान किया जाता है अथवा उनके लिए तत्त्व का व्याख्यान किया  जाता है, इसे विद्वद्जन श्रुतदान (ज्ञानदान) कहते हैं। इस ज्ञानदान के सिद्ध हो  जाने पर कुछ थोड़े से ही भवों में मनुष्य उस केवलज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं  जिसके द्वारा संपूर्ण विश्व साक्षात् देखा जाता है। तथा जिसके प्रगट होने पर  तीनों लोकों के प्राणी उत्सव की शोभा करते हैं।10।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/ &amp;lt;/span&amp;gt;पृ.161 पर फुट नोट...। &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आरोग्यमौषधाज् ज्ञेयं  श्रुतात्स्यात् श्रुतकेवली। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;औषध दान से आरोग्य मिलता है तथा शास्त्रदान  अर्थात् (विद्यादान) देने से श्रुतकेवली होता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.4&amp;quot; id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt; अभयदान का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मूल आचार/939 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;मरण भयभीरु आणं अभयं जो देदि सव्वजीवाणं।  तं दाणाणवि तं दाणं पुण जोगेसु मूलजोगंपि।939।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मरणभय से भयमुक्त सब जीवों को जो  अभय दान है वही दान सब दानों में उत्तम है और वह दान सब आचरणों में प्रधान आचरण  है।&amp;lt;/span&amp;gt;939।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/8/54  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;किं न तप्तं तपस्तेन किं न दत्तं महात्मना।  वितीर्णमभयं येन प्रीतिमालंब्य देहिनाम् ।54।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस महापुरुष ने जीवों को  प्रीति का आश्रय देकर अभयदान दिया उस महात्मा ने कौन सा तप नहीं किया और कौन सा  दान नहीं दिया। अर्थात् उस महापुरुष ने समस्त तप, दान किया। क्योंकि अभयदान में  सब तप, दान आ जाते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      अमितगति श्रावकाचार/13&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt; शरीरं ध्रियते येन शममेव महाव्रतम् ।  कस्तस्याभयदानस्य फलं शक्नोति भाषितुम् ।13। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस अभयदान करि जीवनिका शरीर  पोषिए है जैसे समभावकरि महाव्रत पोषिए तैसें सो, तिस अभयदान के फल कहने को कौन  समर्थ है।13। &amp;lt;/span&amp;gt;पं.वि./7/11 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वेषामभयं प्रवृद्धकरुणैर्यद्दीयते  प्राणिनां, दानं स्यादभयादि तेन रहितं दानत्रयं निष्फलम् । आहरौषधशास्त्रदानविधिभि:  क्षुद्रोगजाडयाद्भयं यत्तत्पात्रजने विनश्यति ततो दानं तदेकं परम् ।11।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयालुपुरुषों  के द्वारा जो सब प्राणियों को अभयदान दिया जाता है, वह अभयदान कहलाता है उससे रहित  तीन प्रकार दान व्यर्थ होता है। चूँकि आहार, औषध और शास्त्र के दान की विधि से  क्रम से क्षुधा, रोग और अज्ञानता का भय ही नष्ट होता है अतएव वह एक अभयदान ही  श्रेष्ठ है।11। भावार्थ–अभयदान का अर्थ प्राणियों के सर्व प्रकार के भय दूर करना  है, अत: आहारादि दान अभयदान के ही अंतर्गत आ जाते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.5&amp;quot; id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt; सत्पात्र को दान देना सम्यग्दृष्टि को मोक्ष का  कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमितगति श्रावकाचार/11/102,123 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पात्राय विधिना दत्वा दानं मूत्वा  समाधिना। अच्युतांतेषु कल्पेषु जायंते शुद्धदृष्टय:।102। निषेव्य लक्ष्मीमिति  शर्मकारिणीं प्रथीयसीं द्वित्रिभवेषु कल्मषम् । प्रदह्यते ध्यानकृशानुनाखिलं  श्रयंति सिद्धि विधुतापदं सदा।123। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पात्र के अर्थि दान देकरि समाधि सहित मरकैं  सम्यग्दृष्टि जीव हैं ते अच्युतपर्यंत स्वर्गनिविषैं उपजैं हैं।102। (अमि.श्रा./102)  या प्रकार सुख की करने वाली महान् लक्ष्मी कौं भोग के दोय तीन भवनिविषैं समस्त  कर्मनिकौं ध्यान अग्निकरि जराय के ते जीव आपदारहित मोक्ष अवस्थाकौं सदा सेवै  हैं।123। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111-4/231/15 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      वसु./श्रा./249-269 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;बद्धाउगा सुदिट्ठी अणुमोयणेण  तिरिया वि। णियमेणुववज्जंति य ते उत्तमभागभूमीसु।249। जे पुण सम्माइट्ठी  विरयाविरया वि तिविहपत्तस्स। जायंति दाणफलओ कप्पेसु महडि्ढया देवा।265।  पडिबुद्धिऊण चइऊण णिवसिरिं संजमं च घित्तूण। उप्पाइऊण णाणं केई गच्छंति णिव्वाणं।268।  अण्णे उ सुदेवत्तं सुमाणुसत्तं पुणो पुणो लहिऊण। सत्तट्ठमवेहि तओ तरंति कम्मक्खयं  णियमा।269।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;बद्धायुष्क सम्यग्दृष्टि अर्थात् जिसने मिथ्यात्व अवस्था में  पहिले मनुष्यायु को बाँध लिया है, और पीछे सम्यग्दर्शन उत्पन्न किया है, ऐसे  मनुष्य पात्रदान देने से और उक्त प्रकार के ही तिर्यंच पात्र दान को अनुमोदना  करने से नियम से वे उत्तम भोगभूमियों में उत्पन्न होते हैं।249। =जो अविरत सम्यग्दृष्टि  और देशसंयत जीव हैं, वे तीनों प्रकार के पात्रों का दान देने के फल से स्वर्गों  में महर्द्धिक देव होते हैं।265। (उक्त प्रकार के सभी जीव मनुष्यों में आकर  चक्रवर्ती आदि होते हैं।) तब कोई वैराग्य का कारण देखकर प्रतिबुद्ध हो, राज्यलक्ष्मी  को छोड़कर और संयम को ग्रहण कर कितने ही केवलज्ञान को उत्पन्न कर निर्वाण को  प्राप्त होते हैं। और कितने ही जीव सुदेवत्व और सुमानुषत्व को पुन: पुन: प्राप्त  कर सात आठ भव में नियम से कर्मक्षय को करते हैं (268-269)। &amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.6&amp;quot; id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt; सत्पात्र  दान मिथ्यादृष्टि को सुभोगभूमि का कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/9/85  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;दानाद् दानानुमोदाद्वा यत्र  पात्रसमाश्रितात् । प्राणिन: सुखमेधंते यावज्जीवमनामया:।85। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;उत्तम पात्र के  लिए दान देने अथवा उनके लिए दिये हुए दान की अनुमोदना से जीव जिस भोगभूमि में  उत्पन्न होते हैं उसमें जीवन पर्यंत निरोग रहकर सुख से बढ़ते रहते हैं।85।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./62 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;पात्रेभ्यो य: प्रकृष्टेभ्यो मिथ्यादृष्टि:  प्रयच्छति। स याति भोगभूमीषु प्रकृष्टासु महोदय:।62। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मिथ्यादृष्टि उत्कृष्ट  पात्रनि के अर्थि दान देय है सो महान् है उदय जाका ऐसा उत्कृष्ट भोग भूमि कौ  जाय है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/245 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/246-247  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;जा मज्झिमम्मि पत्तम्मि देइ दाणं  खु वामदिट्ठी वि। सो मज्झिमासु जीवो उप्पज्जइ भोयभूमीसु।246। जो पुण जहण्णपत्तम्मि  देइ दाणं तहाविहो विणरो। जायइ फलेण जहण्णसु भोयभूमीसु सो जीवो।247। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अर जो मिथ्यादृष्टि  भी पुरुष मध्यम पात्र में दान देता है वह जीव मध्यम भोगभूमि में उत्पन्न होता  है।246। और जो जीव तथाविध अर्थात् उक्त प्रकार का मिथ्यादृष्टि भी मनुष्य जघन्य  पात्र में दान को देता है, वह जीव उस दान के फल से जघन्य भोगभूमियों में उत्पन्न  होता है।247। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.7&amp;quot; id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt; कुपात्र दान कुभोग भूमि का कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/256 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; छद्मत्थविहिदवत्थुसु वदणियमज्झयणझाणदाणरदो।  ण लहदि अपुणब्भावं भावं सादप्पगं लहदि।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो जीव छद्मस्थ विहित वस्तुओं (देव,  गुरु धर्मादिक में) व्रत-नियम-अध्ययन-ध्यान-दान में रत होता है वह मोक्ष को  प्राप्त नहीं होता, (किंतु) सातात्मक भाव को प्राप्त होता है।&amp;lt;/span&amp;gt;256।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/7/115   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रदानतो भूत्वा तिर्यंचो भोगभूमिषु। संभुंजतेऽंतरं  द्वीपं कुमानुषकुलेषु वा।115।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र दान के प्रभाव से मनुष्य, भोगभूमियों में  तिर्यंच होते हैं अथवा कुमानुष कुलों में उत्पन्न होकर अंतर द्वीपों का उपभोग  करते हैं।115।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      अमितगति श्रावकाचार/84-88 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रदानतो याति कुत्सितां  भोगमेदिनीम् । उप्ते क: कुत्सिते क्षेत्रे सुक्षेत्रफलमश्नुते।84। येऽंतरद्वीपजा:  संति ये नरा म्लेच्छखंडजा:। कुपात्रदानत: सर्वे ते भवंति यथायथम् ।85। वर्यमध्यजघन्यासु  तिर्यंच: संति भूमिषु। कुपात्रदानवृक्षोत्थं भुंजते तेऽखिला: फलम् ।86।  दासीदासद्विपम्लेच्छसारमेयाददोऽत्र ये। कुपात्रदानतो भोगस्तेषां भोगवतां स्फुटम्  ।87। दृश्यंते नीचजातीनां ये भोगा भोगिनामिह। सर्वे कुपात्रदानेन ते दीयंते  महोदया:।88।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र के दानतै जीव कुभोगभूमिकौं प्राप्त होय है, इहां दृष्टांत  कहै है–खोटा क्षेत्रविषै बीज बोये संते सुक्षेत्र के फलकौं कौन प्राप्त होय, अपितु  कोई न होय है।84। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/248 &amp;lt;/span&amp;gt;)। जे अंतरद्वीप लवण समुद्रविषैं वा कालोद  समुद्र विषैं छयानवैं कुभोग भूमि के टापू परे हैं, तिनविषै उपजे मनुष्य हैं अर म्लेच्छ  खंड विषैं उपजै मनुष्य हैं ते सर्व कुपात्र दानतैं यथायोग होय हैं।85। उत्तम,  मध्यम, जघन्य भोगभूमिन विषैं जे तिर्यंच हैं ते सर्व कुपात्र दान रूप वृक्षतैं  उपज्या जो फल ताहि खाय हैं।86। इहां आर्य खंड में जो दासी, दास, हाथी, म्लेच्छ,  कुत्ता आदि भोगवंत जीव हैं तिनको जो भोगै सो प्रगटपने कुपात्र दानतै हैं, ऐसा  जानना।87। इहां आर्य खंड विषै नीच जाति के भोगी जीवनिके जे भोग महाउदय रूप  देखिये है ते सर्व कुपात्र दान करि दीजिये हैं।88। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.8&amp;quot; id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt; अपात्र दान का फल अत्यंत अनिष्ट है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/257  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;अविदिदपरमत्थेसु य विसयकसायाधिगेसु  पुरिसेसु। जुट्ठं कदं व दत्तं फलदि कुदेवेसु मणुवेसु।257। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिन्होंने परमार्थ को  नहीं जाना है, और जो विषय कषाय में अधिक है, ऐसे पुरुषों के प्रति सेवा, उपकार या  दान कुदेवरूप में और कुमानुष रूप में फलता है।257।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/7/118  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;अंबु निंबद्रुमे रौद्रं कोद्रवे  मदकृद् यथा। विषं व्यालमुखे क्षीरमपात्रे पतितं तथा।118। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस प्रकार नीम के  वृक्ष में पड़ा हुआ पानी कडुवा हो जाता है, कोदों में दिया पानी मदकारक हो जाता  है, और सर्प के मुख में पड़ा दूध विष हो जाता है, उसी प्रकार अपात्र के लिये दिया  हुआ दान विपरीत फल को करने वाला हो जाता है।118। (अमितगति श्रावकाचार/89-99) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/243 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/242  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;जह उसरम्मि खित्ते पइण्णबीयं ण किं पि  रुहेइ। फला वज्जियं वियाणइ अपत्तदिण्णं तहा दाणं।242। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस प्रकार ऊसर खेत में  बोया गया बीज कुछ भी नहीं उगता है, उसी प्रकार अपात्र में दिया गया दान भी फल रहित  जानना चाहिए।242। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.9&amp;quot; id=&amp;quot;4.9&amp;quot;&amp;gt; विधि, द्रव्य, दाता व पात्र के कारण दान के फल  में विशेषता आ जाती है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वार्थसूत्र/7/39  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेष:।39। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;विधि, देयवस्तु, दाता और पात्र की विशेषता से दान की विशेषता है।39।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/9/7  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;आतिथ्यपूर्णमाहात्म्यवर्णने न क्षमा  वयम् । दातृपात्रविधिद्रव्यैस्तस्मिन्नस्ति विशेषता।7।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;हम किसी अतिथि सेवा के  माहात्म्य का वर्णन नहीं कर सकते कि उसमें कितना पुण्य है। अतिथि यज्ञ का  महत्त्व तो अतिथि की योग्यता पर निर्भर है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/255  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;रागो पसत्थभूदो वत्थुविसेसेण फलदि  विवरीदं। णाणाभूमिगदाणिह बीजाणिव सस्सकालम्हि।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे इस जगत् में अनेक प्रकार की  भूमियों में पड़े हुए बीज धान्य काल में विपरीततया फलित होते हैं, उसी प्रकार  प्रशस्तभूत राग वस्तु भेद से (पात्र भेद से) विपरीततया फलता है।255।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/7/39/373/5  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिग्रहादिक्रमो विधि:।  प्रतिग्रहादिष्वादरानादरकृतो भेद:। तप:स्वाध्यायपरिवृद्धिहेतुत्वादिर्द्रव्यविशेष:।  अनसूयाविषादादिर्दातृविशेष:। मोक्षकारणगुणसंयोग: पात्रविशेष:। ततश्च पुण्यफलविशेष:  क्षित्यादिविशेषाद् बीजफलविशेषवत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिग्रह आदि करने का जो क्रम है वह विधि  है। ...प्रतिग्रह आदि में आदर और अनादर होने से जो भेद होता है वह विधि विशेष है।  जिससे तप और स्वाध्याय आदिकी वृद्धि होती है वह द्रव्य विशेष है। अनसूया और  विषाद आदि का न होना दाता की विशेषता है। तथा मोक्ष के कारणभूत गुणों से युक्त  रहना पात्र की विशेषता है। जैसे पृथिवी आदि में विशेषता होने से उससे उत्पन्न हुए  बीज में विशेषता आ जाती है वैसे ही विधि आदिक की विशेषता से दान से प्राप्त होने  वाले पुण्य फल में विशेषता आ जाती है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/7/39/1-6/559 &amp;lt;/span&amp;gt;) (अमितगति श्रावकाचार/10/50)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/240-241 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.10&amp;quot; id=&amp;quot;4.10&amp;quot;&amp;gt; दान के प्रकृष्ट फल का कारण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/116 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; नन्वेवंविधं विशिष्टं फलं स्वल्पं  दानं कथं संपादयतीत्याशंकाऽपनोदार्थमाह–क्षितिगतमिव वटबीजं पात्रगतं दानमल्पमपि  काले। फलतिच्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृतां।116। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–स्वल्प मात्र दानतै  इतना विशिष्ट फल कैसे हो सकता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–जीवों को पात्र में गया हुआ अर्थात्  मुनि अर्जिका आदि के लिए दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान समय पर पृथ्वी में प्राप्त हुए  वट बीज के छाया विभव वाले वृक्ष की तरह मनोवांछित फल को फलता है।116। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/240 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/29/1 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      पं.वि./2/38 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;पुण्यक्षयात्क्षयमुपैति न दीयमाना  लक्ष्मीरत: कुरुत संततपात्रदानम् । कूपे न पश्यत जलं गृहिण: समंतादाकृष्यमाणमपि  वर्धत एव नित्यम् ।38।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;संपत्ति पुण्य के क्षय से क्षय को प्राप्त होती है, न  कि दान करने से। अतएव हे श्रावको ! आप निरंतर पात्र दान करें। क्या आप यह नहीं  देखते कि कुएँ से सब ओर से निकाला जाने वाला भी जल नित्य बढ़ता ही रहता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5&amp;quot; id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;विधि द्रव्य दातृ पात्र आदि निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.1&amp;quot; id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;दान योग्य  द्रव्य&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/23-24  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;सीदुण्ह वाउविउलं सिलेसियं तह परीसमव्वाहिं।  कायकिलेसुव्वासं जाणिज्जे दिण्णए दाणं।23। हियमियमण्णपाणं णिरवज्जोसहिणिराउलं  ठाणं। सयणासणमुवयरणं जाणिज्जा देइ मोक्खरवो।24।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मुनिराज की प्रकृति, शीत, उष्ण,  वायु, श्लेष्म या पित्त रूप में से कौन सी है। कायोत्सर्ग वा गमनागमन से कितना  परिश्रम हुआ है, शरीर में ज्वरादि पीड़ा तो नहीं है। उपवास से कंठ शुष्क तो  नहीं है इत्यादि बातों का विचार करके उसके उपचार स्वरूप दान देना चाहिए।23।  हित-मित प्रासुक शुद्ध अन्न, पान, निर्दोष हितकारी ओषधि, निराकुल स्थान, शयनोपकरण,  आसनोपकरण, शास्त्रोपकरण आदि दान योग्य वस्तुओं को आवश्यकता के अनुसार सुपात्र  में देता है वह मोक्षमार्ग में अग्रगामी होता है।24।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पुरुषार्थ-सिद्ध्युपाय/170 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt; रागद्वेषासंयममददु:खभयादिकं न यत्कुरुते।  द्रव्यं तदेव देयं सुतप:स्वाध्यायवृद्धिकरम् ।170। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दान देने योग्य पदार्थ  जिन वस्तुओं के देने से रागद्वेष, मान, दु:ख, भय आदिक पापों की उत्पत्ति होती है,  वह देने योग्य नहीं। जिन वस्तुओं के देने से तपश्चरण, पठन, पाठन स्वाध्यायादि  कार्यों में वृद्धि होती है, वही देने योग्य हैं।170। &amp;lt;/span&amp;gt;(अमि.श्रा./9/44) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/45 &amp;lt;/span&amp;gt;)।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/28/3  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दीयमानेऽन्नादौ प्रतिगृहीतुस्तप:स्वाध्यायपरिवृद्धिकरणत्वाद्द्रव्यविशेष:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भिक्षा में जो अन्न दिया जाता है वह यदि आहार लेने वाले साधु के तपश्चरण स्वाध्याय  आदि को बढ़ाने वाला हो तो वही द्रव्य की विशेषता कहलाती है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.2&amp;quot; id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;दान प्रति उपकार की भावना से निरपेक्ष देना चाहिए&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/20  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;एवं जो जाणित्ता विहलिय-लोयाण धम्मजुत्ताणं।  णिरवेक्खो तं देदि हु तस्स हवे जीवियं सहलं।20।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस प्रकार लक्ष्मी को अनित्य  जानकर जो उसे निर्धन धर्मात्मा व्यक्तियों को देता है और उसके बदले में उससे  प्रत्युपकार की वांछा नहीं करता, उसी का जीवन सफल है।20।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.3&amp;quot; id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt; गाय आदि का दान योग्य नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/50 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नान्यानि गोकनकभूमिरथांगनादिदानादि  निश्चितमवद्यकराणि यस्मात् ।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आहारादि चतुर्विध दान से अतिरिक्त गाय, सुवर्ण,  पृथिवी, रथ और स्त्री आदि के दान, महान् फल को देने वाले नहीं हैं।50।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/53  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;हिंसार्थत्वान्न भूगेह-लोहगोऽश्वादिनैष्ठिक:।  न दद्याद् ग्रहसंक्रांति-श्राद्धदौ वा सुदृग्द्रुहि।53। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;नैष्ठिक श्रावक  प्राणियों की हिंसा के निमित्त होने से भूमि, शस्त्र, गौ, बैल, घोड़ा वगैरह हैं  आदि में जिनके ऐसे कन्या, सुवर्ण और अन्न आदि पदार्थों को दान नहीं देवे। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/9/46-59 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.4&amp;quot; id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादृष्टि को दान देने का निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; दर्शनपाहुड़/ &amp;lt;/span&amp;gt;टी./2/3/1 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दर्शनहीन: ...तस्यान्नदानाक्षिकमपि  न देयं। उक्तं च–मिथ्यादृग्भ्यो ददद्दानं दाता मिथ्यात्ववर्धक:। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादृष्टि  को अन्नादिक दान भी नहीं देना चाहिए। कहा भी है–मिथ्यादृष्टि को दिया गया दान  दाता को मिथ्यात्व का बढ़ाने वाला है।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./50&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; तद्येनाष्टपदं यस्य दीयते हितकाभ्यया।  स तस्याष्टापदं मन्ये दत्ते जीवितशांतये।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे कोऊ जीवने के अर्थ काहूकौ  अष्टापद हिंसक जीवकौं देय तो ताका मरन ही होय है तैसैं धर्म के अर्थ मिथ्यादृष्टीनकौ  दिया जो सुवर्ण तातैं हिंसादिक होने तैं परके वा आपके पाप ही होय है ऐसा जानना।50।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/64/149  &amp;lt;/span&amp;gt;फुट नोट–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यात्वग्रस्तचित्तेसु  चारित्राभासभागिषु। दोषायैव भवेद्दानं पय:पानमिवाहिषु।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चारित्राभास को धारण करने  वाले मिथ्यादृष्टियों को दान देना सर्प को दूध पिलाने के समान केवल अशुभ के लिए  ही होता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.5&amp;quot; id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र व अपात्र को करुणा बुद्धि से दान दिया  जाता है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/730  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथोचितम्  । पात्रबुद्धया निषिद्धं स्यान्निषिद्धं न कृपाधिया।730। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र के लिए और  अपात्र के लिए भी यथायोग्य दान देना चाहिए क्योंकि कुपात्र तथा अपात्र के लिए  केवल पात्र बुद्धि से दान देना निषिद्ध है, करुणा बुद्धि से दान देना निषिद्ध नहीं  है।730। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/3/161 &amp;lt;/span&amp;gt;) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/6/225 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.6&amp;quot; id=&amp;quot;5.6&amp;quot;&amp;gt; दुखित भुखित को भी करुणाबुद्धि से दान दिया जाता  है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी x` 30/731  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;शेषेभ्य: क्षुत्पिपासादिपीडितेभ्योऽशुभोदयात्  । दीनेभ्योऽभयदानादि दातव्यं करुणार्णवै:।731। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयालु श्रावकों को अशुभ कर्म के  उदय से क्षुधा, तृषा, आदि से दुखी शेष दीन प्राणियों के लिए भी अभय दानादिक देना  चाहिए।731। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/3/162 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.7&amp;quot; id=&amp;quot;5.7&amp;quot;&amp;gt;ग्रहण व संक्रांति आदि के कारण दान देना योग्य  नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमितगति श्रावकाचार/60-61 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;य: संक्रांतौ ग्रहणे वारे वित्तं  ददाति मूढमति:। सम्यक्त्ववनं छित्त्वा मिथ्यात्ववनं वपत्येष:।60। ये ददते  मृततृप्त्यै बहुधादानानि नूनमस्तधिय:। पल्लवयितं तरुं ते भस्मीभूतं निषिंचंति।61। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मूढबुद्धि पुरुष संक्रांतिविषैं आदित्यवारादि (ग्रहण) वार विषैं धन को देय  है सो सम्यक्त्व वन को छेदिकै मिथ्यात्व वन को बोवै है।60। जे निर्बुद्धि  पुरुष मरे जीव की तृप्तिके अर्थ बहुत प्रकार दान देय है ते निश्चयकरि अग्निकरि  भस्मरूप वृक्षकौं पत्र सहित करनेकौं सींचै है।61।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/53  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;हिंसार्थत्वान्न भूगेह-लोहगोऽश्वादिनैष्ठिक:।  न दद्याद् ग्रहसंक्रांति-श्राद्धादौ वा सुदृग्द्रुहि।53।&amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;नैष्ठिक श्रावक  प्राणियों की हिंसा में निमित्त होने से भूमि आदि...को दान नहीं देवे। और जिनको  पर्व मानने से सम्यक्त्व का घात होता है ऐसे ग्रहण, संक्रांति, तथा श्राद्ध  वगैरह में अपने द्रव्य का दान नहीं देवे।53।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6&amp;quot; id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह का विधि निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.1&amp;quot; id=&amp;quot;6.1&amp;quot;&amp;gt; दान के  लिए धन की इच्छा अज्ञान है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; इष्टोपदेश/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./16 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;त्यागाय श्रेय से वित्तमवित्त: संचिनोति  य:। स्वशरीरं स पंकेन स्नास्यामीति विलिंपति।16।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो निर्धन मनुष्य  पात्रदान, देवपूजा आदि प्रशस्त कार्यों के लिए अपूर्व पुण्य प्राप्ति और पाप  विनाश की आशा से सेवा, कृषि और वाणिज्य आदि कार्यों के द्वारा धन उपार्जन करता है  वह मनुष्य अपने निर्मल शरीर में ‘नहा लूँगा’ इस आशा से कीचड़ लपेटता है।16। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.2&amp;quot; id=&amp;quot;6.2&amp;quot;&amp;gt; दान देने की अपेक्षा धन का ग्रहण ही न करे&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; आत्मानुशासन/102  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अर्थिम्यस्तृणवद्विचिंत्य विषयान्  कश्चिच्छ्रियं दत्तवान् पापं तामवितर्पिणी, विगणयन्नादात् परस्त्यक्तवान् ।  प्रागेव कुशलां विमृश्य सुभगोऽप्यन्यो न पर्यग्रहीत् एते ते  विदितोत्तरोत्तरवरा: सर्वोत्तमास्त्यागिन:।102। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कोई विद्वान् मनुष्य विषयों  को तृण के समान तुच्छ समझकर लक्ष्मी को याचकों के लिऐ दे देता है, कोई पाप रूप  समझकर किसी को बिना दिये ही त्याग देता है। सर्वोत्तम वह है जो पहिले से ही अकल्याणकारी  जानकर ग्रहण नहीं करता।102। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.3&amp;quot; id=&amp;quot;6.3&amp;quot;&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह की कथंचित् इष्टता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/23/6  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आर्तक्षुधाविनाशाय नियमोऽयं शुभावह:।  कर्तव्यो धनिभिर्नित्यमालये वित्तसंग्रह:।6। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गरीबों के पेट की ज्वाला को शांत  करने का यही एक मार्ग है कि जिससे श्रीमानों को अपने पास विशेष करके धन संग्रह कर  रखना चाहिए।6। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.4&amp;quot; id=&amp;quot;6.4&amp;quot;&amp;gt; आय का वर्गीकरण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/32 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;ग्रासस्तदर्धमपि देयमथार्धमेक तस्यापि  संततमणुव्रतिना यथर्द्धि। इच्छानुरूपमिह कस्य कदात्र लोके द्रव्यं भविष्यति  सदुत्तमदानहेतु:।32।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अणुव्रती श्रावक को निरंतर अपनी संपत्ति के अनुसार एक  ग्रास, आधा ग्रास उसके भी आधे भाग अर्थात् चतुर्थांश को भी देना चाहिए। कारण यह  है कि यहाँ लोक में इच्छानुसार द्रव्य किसके किस समय होगा जो कि उत्तम दान को दे  सके, यह कुछ नहीं कहा जा सकता।32। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/1/11/22  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पर फुट नोट–&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पादमायानिधिं कुर्यात्पादं  वित्ताय खट्वयेत् । धर्मोपभोगयो: पादं पादं भर्त्तव्यपोषणे। अथवा–आयार्द्धं च  नियुंजीत धर्मे समाधिकं तत:। शेषेण शेषं कुर्वीत यत्नतस्तुच्छमैहिकं।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थ  अपने कमाये हुए धन के चार भाग करे, उसमें से एक भाग तो जमा रखे, दूसरे भाग से  बर्तन वस्त्रादि घर की चीजें खरीदे, तीसरे भाग से धर्मकार्य और अपने भोग उपभोग  में खर्च करे और चौथे भाग से अपने कुटुंब का पालन करे। अथवा अपने कमाये हुए धन  का आधा अथवा कुछ अधिक धर्मकार्य में खर्च करे और बचे हुए द्रव्य से यत्नपूर्वक  कुटुंब आदि का पालन पोषण करै।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; (1) चतुर्विध राजनीति का एक अंग । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 50.18 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) सातावेदनीय का आस्रव । यह गृहस्थ के चतुर्विध धर्म में प्रथम धर्म है । इसमें स्व और पर के उपकार हेतु अपने स्व अर्थात् धन या अपनी वस्तु का त्याग किया जाता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;8.177-178, 41.104, 56.88-89, 63.270,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 58.94,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 1.123,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वीरवर्द्धमान चरित्र 6.12  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;में इसके तीन भेद बताये हैं― शास्त्रदान (ज्ञानदान), अभयदान और आहारदान । सत्पुरुषों का उपकार करने की इच्छा से सर्वज्ञ भाषित शास्त्र का दान शास्त्रदान, कर्मबंध के कारणों को छोड़ने के हेतु प्राणिपीड़ा का त्याग करना अभयदान और निर्ग्रंथ साधुओं को उनके शरीर आदि की रक्षार्थ शुद्ध आहार देना आहारदान कहा है । ज्ञानदान सबमें श्रेष्ठ है क्योंकि वह पाप कार्यों से रहित तथा देने और लेने वाले दोनों के लिए निजानंद रूप मोक्षप्राप्ति का कारण है । आरंभ जन्य पाप का कारण होने से आहारदान की अपेक्षा अभयदान श्रेष्ठ है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;56.67-77 औषधिदान को मिलाकर इसके चार भेद भी किये गये हैं । ये त्रिविध पात्रों को नवधा भक्तिपूर्वक दिये जाते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 14.56-59,76,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 1.126  &amp;lt;/span&amp;gt;पात्र के लिए दान देने अथवा अनुमोदना करने से जीव भोगभूमि में उत्पन्न होकर जीवन पर्यंत निरोग एव सुखी रहते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;9. 85-86, &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 7.107-118  &amp;lt;/span&amp;gt;दाता की विशुद्धता-देय वस्तु और लेने वाले पात्र को, देय वस्तु की पवित्रता-देने और लेने वाले दोनों को एवं पात्र की विशुद्धि-दाता और देय वस्तु इन दोनों को पवित्र करती है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;20.136-137 यह भोग संपदा का प्रदाता तथा स्वर्ग और मोक्ष का हेतु है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 123.107-108  &amp;lt;/span&amp;gt;आहारदान नवधा भक्तिपूर्वक दिया जाता है । दाता के लिए सर्वप्रथम पात्र को पड़गाहकर उसे उच्च स्थान देना, उसके पाद-प्रक्षालन करना, पूजा करना, नमस्कार करना, मन शुद्धि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि और आहारशुद्धि प्रकट करनी पड़ती हे । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 9.199-200  &amp;lt;/span&amp;gt;श्रावक की एक क्रिया दत्ति है । इसके चार भेद कहे है― दयादत्ति, पात्रदति, समददत्ति और अन्वयदत्ति । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;38.35-40&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[ दातृ | पूर्व पृष्ठ ]]&lt;br /&gt;
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&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: द]]&lt;br /&gt;
[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=106035</id>
		<title>दान</title>
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		<updated>2022-12-13T12:17:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शुद्ध  धर्म का अवकाश न होने से गृहस्थ धर्म में दान की प्रधानता है। वह दान दो भागों  में विभाजित किया जा सकता है–अलौकिक व लौकिक। अलौकिक दान साधुओं को दिया जाता है  जो चार प्रकार का है–आहार, औषध, ज्ञान व अभय तथा लौकिक दान साधारण व्यक्तियों को  दिया जाता है जैसे समदत्ति, करुणादत्ति, औषधालय, स्कूल, सदाव्रत, प्याऊ आदि  खुलवाना इत्यादि।         निरपेक्ष  बुद्धि से सम्यक्त्व पूर्वक सद्पात्र को दिया गया अलौकिक दान दातार को परंपरा  मोक्ष प्रदान करता है। पात्र, कुपात्र व अपात्र को दिये गये दान में भावों की  विचित्रता के कारण फल में बड़ी विचित्रता पड़ती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दान सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1 |  दान सामान्य का लक्षण।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.2 |  दान के भेद।        ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.3 |  औषधालय सदाव्रतादि खुलवाने का विधान।   ]]     &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.4 |  दया दत्ति आदि के लक्षण।    ]]    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.5 |  सात्त्विक राजसादि दानों के लक्षण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.6 |  सात्त्विकादि दानों में परस्पर तरतमता।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.7 |  तिर्यंचों के लिए भी दान देना संभव है।   ]]     &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान कथंचित् क्षायोपशमिक भाव है।–देखें [[ क्षायोपशमिक ]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान भी कथंचित् सावद्य योग है।–देखें [[ सावद्य#7 | सावद्य - 7]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; विधि दान क्रिया।–देखें [[ संस्कार#2 | संस्कार - 2]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; क्षायिक दान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;  &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.1 |  क्षायिक दान का लक्षण।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.2 |  क्षायिक दान संबंधी शंका समाधान।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.3 |  सिद्धों में क्षायिक दान क्या है।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; गृहस्थों के लिए दान धर्म की प्रधानता&amp;lt;/strong&amp;gt;  &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.1 |  सत् पात्र को दान देना ही गृहस्थ का परमधर्म है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.2 |  दान देकर खाना ही योग्य है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.3 |  दान दिये बिना खाना योग्य नहीं।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.4 |  दान देने से ही जीवन व धन सफल है।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.5 |  दान को परम धर्म कहने का कारण। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान दिये बिना धर्म को खाना महापाप है।–देखें [[ पूजा#2.1 | पूजा - 2.1]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दान का महत्त्व व फल&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.1 |  पात्रदान सामान्य का महत्त्व।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.2 |  आहार दान का महत्त्व।     ]]   &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.3 |  औषध व ज्ञान दान का महत्त्व।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #4.4 | अभयदान का महत्त्व।    ]]    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.5 |  सत् पात्र को दान देना सम्यग्दृष्टि को मोक्ष  का कारण है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.6 |  सत्पात्र दान मिथ्यादृष्टि को सुभोग भूमिका कारण  है।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.7 |  कुपात्र दान कुभोग भूमिका कारण है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.8 |  अपात्र दान का फल अत्यंत अनिष्ट है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.9 |  विधि, द्रव्य, दाता व पात्र के कारण दान के फल  में विशेषता आ जाती है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; मंदिर में घंटी, चमर आदि के दान का महत्त्व व फल।–देखें [[ पूजा#4.2 | पूजा - 4.2]]।        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ol start=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.10 |  दान के प्रकृष्ट फल का कारण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; विधि, द्रव्य, दातृ, पात्रादि निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; भक्ति पूर्वक ही पात्र को दान देना चाहिए।–देखें [[ आहार#II.1 | आहार - II.1]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान की विधि अर्थात् नवधा भक्ति।–देखें [[ भक्ति#6 | भक्ति - 6]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.1 |   दान योग्य द्रव्य।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; साधु को दान देने योग्य दातार।–देखें [[ आहार#II.5 | आहार - II.5]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान योग्य पात्र कुपात्र आदि निर्देश।–देखें [[ पात्र ]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान के लिए पात्र की परीक्षा का विधि निषेध।–देखें [[ विनय#5 | विनय - 5]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.2 |  दान प्रति उपकार की भावना से निरपेक्ष देना चाहिए।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.3 |  गाय आदि का दान योग्य नहीं।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.4 |  मिथ्यादृष्टि को दान देने का निषेध।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.5 |  कुपात्र व अपात्र को करुणा बुद्धि से दान दिया  जाता है।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.6 |  दुखित भुखित को भी करुणा बुद्धि से दान दिया जाता  है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.7 |  ग्रहण व संक्रांति आदि के कारण दान देना योग्य  नहीं। ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह का विधि निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.1 |  दान के लिए धन की इच्छा अज्ञान है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.2 |  दान देने की बजाय धन का ग्रहण ही न करे।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.3 |  दानार्थ धन संग्रह को कथंचित् इष्टता।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.4 |  आय का वर्गीकरण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;&amp;amp;nbsp;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; दान सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt; दान सामान्य का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        त.स./7/38  अ&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ।38। स्वपरोपकारोऽनुग्रह: (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/7/38 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;स्वयं  अपना और दूसरे के उपकार के लिए अपनी वस्तु का त्याग करना दान है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/6/12/330/14   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परानुग्रहबुद्धया स्वस्यातिसर्जनं दानम् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दूसरे का उपकार हो इस बुद्धि से  अपनी वस्तु का अर्पण करना दान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/6/12/4/522 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,5,137/389/12   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;रत्नत्रयवद्भ्य: स्ववित्तपरित्यागो दानं रत्नत्रयसाधनादित्सा वा।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;रत्नत्रय  से युक्त जीवों के लिए अपने वित्त का त्याग करने या रत्नत्रय के योग्य साधनों  के प्रदान करने की इच्छा का नाम दान है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt;दान के भेद&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./117  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आहारौषधयोरप्युपकरणावासयोश्च दानेन वैयावृत्यं ब्रुवते चतुरात्मत्वेन  चतुरस्रा:।117।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चार ज्ञान के धारक गणधर आहार, औषध के तथा ज्ञान के साधन शास्त्रादिक  उपकरण और स्थान के (वस्तिका के) दान से चार प्रकार का वैयावृत्य कहते हैं।117। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; जंबूद्वीपपण्णत्तिसंगहो/2/148 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/233 &amp;lt;/span&amp;gt;) (पं.वि./2/50)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/6/24/338/11   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;त्यागो दानम् । तत्त्रिविधम् – आहारदानमभयदानं ज्ञानदानं चेति। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;त्याग दान  है। वह तीन प्रकार का है–आहारदान, अभयदान और ज्ञानदान।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/38/35 &amp;lt;/span&amp;gt;...।  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;चतुर्धा वर्णिता दत्ति: दयापात्रसमान्वये।35।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और  अन्वय दत्ति ये चार प्रकार की दत्ति कही गयी है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–तीन प्रकार का दान कहा गया है–सात्त्विक, राजस और तामस दान।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;औषधालय सदाव्रत आदि खुलवाने का विधान&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/40   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सत्रमप्यनुकंप्यानां, सृजेदनुजिघृक्षया। चिकित्साशालवद्दुष्येन्नेज्जायै  वाटिकाद्यपि।40। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पाक्षिक श्रावक, औषधालय की तरह दुखी प्राणियों के उपकार की चाह  से अन्न और जल वितरण के स्थान को भी बनवाये और जिनपूजा के लिए पुष्पवाटिकाएँ बावड़ी  व सरोवर आदि बनवाने में भी हर्ज नहीं है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt; दया दत्ति आदि के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/38/36-41   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सानुकंपमनुग्राह्ये प्राणिवृंदेऽभयप्रदा। त्रिशुद्धयनुगता सेयं दयादत्तिर्मता  बुधै:।36। महातपोधनाचार्याप्रतिग्रहपुर:सरम् । प्रदानमशनादीनां पात्रदानं तदिष्यते।37।  समानायात्मनान्यस्मै क्रियामंत्रव्रतादिभि:। निस्तारकोत्तमायेह भूहेमाद्यतिसर्जनम्  ।38। समानदत्तिरेषा स्यात् पात्रे मध्यमतायिते। समानप्रतिपत्त्यैव प्रवृत्ता  श्रद्धयान्विता।39। आत्मान्वयप्रतिष्ठार्थं सूनवे यदशेषत:। समं समयवित्ताभ्यां  स्ववर्गस्यातिसर्जनम् ।40। सैषा सकलदत्ति:...।41।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अनुग्रह करने योग्य  प्राणियों के समूह पर दयापूर्वक मन, वचन, काय की शुद्धि के साथ उनके भय दूर करने  को पंडित लोग दयादत्ति मानते हैं।36। महा तपस्वी मुनियों के लिए सत्कारपूर्वक  पड़गाहन कर जो आहार आदि दिया जाता है उसे पात्र दत्ति कहते हैं।37। क्रिया, मंत्र  और व्रत आदि से जो अपने समान है तथा जो संसार समुद्र से पार कर देने वाला कोई अन्य  उत्तम गृहस्थ है उसके लिए (कन्या, हस्ति, घोड़ा, रथ, रत्न (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार  &amp;lt;/span&amp;gt;) पृथिवी  सुवर्ण आदि देना अथवा मध्यम पात्र के लिए समान बुद्धि से श्रद्धा के साथ जो दान  दिया जाता है वह समान दत्ति कहलाता है।38-39। अपने वंश की प्रतिष्ठा के लिए पुत्र  को समस्त कुल पद्धति तथा धन के साथ अपना कुटुंब समर्पण करने को सकल दत्ति (वा  अन्वयदत्ति) कहते हैं।40। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/7/27-28 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/234-238   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;असणं पाणं खाइयं साइयमिदि चउविहो वराहारो। पुव्वुत्त-णव-विहाणेहिं तिविहपत्तस्स  दायव्वो।234। अइबुड्ढ-बाल-मुयंध-बहिर-देसंतरीय-रोडाणं। जह जोग्गं दायव्वं  करुणादाणं त्ति भणिऊण।235। उववास-वाहि-परिसम-किलेस-परिपीडयं मुणेऊण। पत्थं  सरीरजोग्गं भेसजदाणं पि दायव्वं।236। आगम-सत्थाइं लिहाविऊण दिज्जंति जं  जहाजोग्गं। तं जाण सत्थदाणं जिणवयणज्झावणं च तहा।237। जं कीरइ परिरक्खा णिच्चं  मरण-भयभीरुजीवाणं। तं जाण अभयदाणं सिहामणिं सव्वदाणाणं।238। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अशन, पान, खाद्य और  स्वाद्य ये चार प्रकार का श्रेष्ठ आहार पूर्वोक्त नवधा भक्ति से तीन प्रकार के  पात्र को देना चाहिए।234। अति, बालक, मूक (गूँगा), अंध, बधिर (बहिरा), देशांतरीय  (परदेशी) और रोगी दरिद्री जीवों को ‘करुणादान दे रहा हूँ’ ऐसा कहकर अर्थात् समझकर  यथायोग्य आहार आदि देना चाहिए।235। उपवास, व्याधि, परिश्रम और क्लेश से परिपीड़ित  जीव को जानकर अर्थात् देखकर शरीर के योग्य पथ्यरूप औषधदान भी देना चाहिए।236।  जो आगम-शास्त्र लिखाकर यथायोग्य पात्रों को दिये जाते हैं, उसे शास्त्रदान  जानना चाहिए तथा जिनवचनों का अध्यापन कराना पढ़ाना भी शास्त्रदान है।237। मरण से  भयभीत जीवों का जो नित्य परिरक्षण किया जाता है, वह सब दानों का शिखामणिरूप  अभयदान जानना चाहिए।238।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दयादत्तिरनुकंपयाऽनुग्राह्येभ्य: प्राणिभ्यस्त्रिशुद्धिभिरभयदानं।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस पर  अनुग्रह करना आवश्यक है ऐसे दुखी प्राणियों को दयापूर्वक मन, वचन, काय की शुद्धता  से अभयदान देना दयादत्ति है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश/2/127/243/10   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयेन वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनपरिणामरूपमभयप्रदानं स्वकीयजीवस्य व्यवहारेण  प्राणरक्षारूपमभयप्रदानं परजीवानां।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयनयकर वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन  परिणाम रूप जो निज भावों का अभयदान निज जीव की रक्षा और व्यवहार नयकर परप्राणियों  के प्राणों की रक्षारूप अभयदान यह स्वदया परदयास्वरूप अभयदान है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5&amp;quot; id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt; सात्त्विक राजसादि दानों के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आतिथेयं हितं यत्र यत्र पात्रपरीक्षणं। गुणा: श्रद्धादयो यत्र तद्दानं  सात्त्विकं विदु:। यदात्मवर्णनप्रायं क्षणिकाहार्यविभ्रमं। परप्रत्ययसंभूतं दानं  तद्राजसं मतं। पात्रापात्रसमावेक्षमसत्कारमसंस्तुतं। दासभृत्यकृतोद्योगं दानं  तामसमूचिरे। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस दान में अतिथि का कल्याण हो, जिसमें पात्र की परीक्षा वा  निरीक्षण स्वयं किया गया हो और जिसमें श्रद्धादि समस्त गुण हों उसे सात्त्विक  दान कहते हैं। जो दान केवल अपने यश के लिए किया गया हो, जो थोड़े समय के लिए ही  सुंदर और चकित करने वाला हो और दूसरे से दिलाया गया हो उसको राजस दान कहते हैं।  जिसमें पात्र अपात्र का कुछ ख्याल न किया गया हो, अतिथि का सत्कार न किया गया  हो, जो निंद्य हो और जिसके सब उद्योग दास और सेवकों से कराये गये हों, ऐसे दान  को तामसदान कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.6&amp;quot; id=&amp;quot;1.6&amp;quot;&amp;gt; सात्त्विकादि दानों में परस्पर तरतमता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;उत्तमं सात्त्विकं दानं मध्यमं राजसं भवेत् । दानानामेव सर्वेषां  जघन्यं तामसं पुन:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सात्त्विक दान उत्तम है राजस मध्यम है, और सब दानों में  तामस दान जघन्य है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.7&amp;quot; id=&amp;quot;1.7&amp;quot;&amp;gt; तिर्यंचों के लिए भी दान देना संभव है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 7/2,2,16/123/4   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;कधं तिरिक्खेसु दाणस्स संभवो। ण, तिरिक्खसंजदासंजदाणं सचित्तभंजणे गहिदपच्चक्खाणं  सल्लइपल्लवादिं देंततिरिक्खाणं तदविरोधादो।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–तिर्यंचों में दान  देना कैसे संभव हो सकता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–नहीं, क्योंकि जो तिर्यंच संयतासंयत  जीव सचित्त भोजन के प्रत्याख्यान अर्थात् व्रत को ग्रहण कर लेते हैं उनके लिए  सल्लकी के पत्तों आदि का दान करने वाले तिर्यंचों के दान देना मान लेने में कोई  विरोध नहीं आता।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt; क्षायिक दान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.1&amp;quot; id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt;क्षायिक दान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/2/4/154/4   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दानांतरायस्यात्यंतक्षयादनंतप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदानम् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दानांतरायकर्म  के अत्यंत क्षय से अनंत प्राणियों के समुदाय का उपकार करने वाला क्षायिक अभयदान  होता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/2/4/2/105/28 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.2&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; क्षायिक दान संबंधी शंका समाधान&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 14/5,6,18/17/1   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;अरहंता खीणदाणंताराइया सव्वेसिं जीवाणमिच्छिदत्थे किण्ण देंति। ण, तेसिं जीवाणं  लाहंतराइयभावादो। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–अरिहंतों के दानांतराय का तो क्षय हो गया  है, फिर वे सब जीवों को इच्छित अर्थ क्यों नहीं देते ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–नहीं, क्योंकि  उन जीवों के लाभांतराय कर्म का सद्भाव पाया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.3&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt; सिद्धों में क्षायिक दान क्या&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;strong&amp;gt;है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/2/4/155/1   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यदि क्षायिकदानादिभावकृतमभयदानादि, सिद्धेष्वपि तत्प्रसंग: नैष दोष:,  शरीरनामतीर्थंकरनामकर्मोदयाद्यपेक्षत्वात् । तेषां तदभावे तदप्रसंग:। कथ तर्हि  तेषां सिद्धेषु वृत्ति:। परमानंदाव्याबाधरूपेणैव तेषां तत्र वृत्ति:।  केवलज्ञानरूपेणानंतवीर्यवृत्तिवत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–यदि क्षायिक दानादि भावों  के निमित्त से अभय दानादि कार्य होते हैं तो सिद्धों में भी उनका प्रसंग प्राप्त  होता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–यह कोई दोष नहीं, क्योंकि इन अभयदानादि के होने में शरीर  नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म के उदय की अपेक्षा रहती है। परंतु सिद्धों के  शरीरनामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं होते अत: उनके अभयदानादि नहीं प्राप्त होते। &amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–तो सिद्धों में क्षायिक दानादि भावों का सद्भाव कैसे माना जाय ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–जिस  प्रकार सिद्धों के केवलज्ञान रूप से अनंत वीर्य का सद्भाव माना गया है उसी  प्रकार परमानंद के अव्याबाध रूप से ही उनका सिद्धों के सद्भाव है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थों के लिए दान-धर्म की प्रधानता&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.1&amp;quot; id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;सद्पात्र को दान देना ही गृहस्थ का धर्म है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./11  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेणविणा।...।11। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सुपात्र में चार प्रकार का  दान देना और श्री देवशास्त्र गुरु की पूजा करना श्रावक का मुख्य धर्म है। नित्य  इन दोनों को जो अपना मुख्य कर्तव्य मानकर पालन करता है वही श्रावक है, धर्मात्मा  व सम्यग्दृष्टि है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./13) (पं.वि./7/7)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111/4/231/14   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थानामाहारदानादिकमेव परमोधर्म:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थों के तो आहार दानादिक ही बड़े  धर्म हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;32&amp;quot; id=&amp;quot;32&amp;quot;&amp;gt;दान देकर खाना ही योग्य है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./22  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;जो मूणिभुत्तावसेसं भुंजइसी भुंजए जिणवद्दिट्ठं। संसारसारसोक्खं कमसो णिव्वाणवरसोक्खं। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो भव्य जीव मुनीश्वरों को आहारदान देने के पश्चात् अवशेष अन्न को प्रसाद  समझकर सेवन करता है वह संसार के सारभूत उत्तम सुखों को प्राप्त होता है और क्रम  से मोक्ष सुख को प्राप्त होता है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/12-13 &amp;lt;/span&amp;gt;...&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;लच्छी  दिज्जउ दाणे दया-पहाणेण। जा जल-तरंग-चवला दो तिण्णि दिणाइ चिट्ठेइ।12। जो पुण  लच्छिं संचदि ण य...देदि पत्तेसु। सो अप्पाणं वंचदि मणुयत्तं णिप्फलं तस्स।13। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;यह  लक्ष्मी पानी में उठने वाली लहरों के समान चंचल है, दो, तीन दिन ठहरने वाली है तब  इसे...दयालु होकर दान दो।12। जो मनुष्य लक्ष्मी का केवल संचय करता है...न उसे  जघन्य, मध्यम अथवा उत्तम पात्रों में दान देता है, वह अपनी आत्मा को ठगता है,  और उसका मनुष्य पर्याय में जन्म लेना वृथा है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.3&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt; दान दिये बिना खाना योग्य नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        कुरल/9/2  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यदि देवाद् गृहे वासो देवस्यातिथिरूपिण:। पीयूषस्यापि पानं हि तं विना नैव  शोभते।2।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब घर में अतिथि हो तब चाहे अमृत ही क्यों न हो, अकेले नहीं पीना  चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        क्रिया  कोष/1986 &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जानौ गृद्ध समान ताके सुतदारादिका। जो नहीं करे सुदान ताके धन आमिष समा।1986। =जो दान नहीं करता है उसका धन मांस के समान है, और उसे खाने वाले पुत्र, स्त्री  आदिक गिद्ध मंडली के समान हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.4&amp;quot; id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt; दान देने से ही जीवन व धन सफल है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/14/19-20   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;जो संचिऊण लच्छिं धरणियले संठवेदि अइदूरे। सो पुरिसो तं लच्छिं पाहाण-सामाणियं  कुणदि।14। जो वड्ढमाण-लच्छिं अणवरयं देदि धम्म-कज्जेसु। सो पंडिएहि थुव्वदि  तस्स वि सयला हवे लच्छी।19। एवं जो जाणित्ता विहलिय-लोयाण धम्मजुत्ताणं।  णिरवेक्खो तं देदि हु तस्स हवे जीवियं सहलं।20। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मनुष्य लक्ष्मी का संचय  करके पृथिवी के गहरे तल में उसे गाड़ देता है, वह मनुष्य उस लक्ष्मी को पत्थर  के समान कर देता है।14। जो मनुष्य अपनी बढ़ती हुई लक्ष्मी को सर्वदा धर्म के  कामों में देता है, उसकी लक्ष्मी सदा सफल है और पंडित जन भी उसकी प्रशंसा करते  हैं।19। इस प्रकार लक्ष्मी को अनित्य जानकर जो उसे निर्धन धर्मात्मा व्यक्तियों  को देता है और बदले में प्रत्युपकार की वांछा नहीं करता, उसी का जीवन सफल है।20। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.5&amp;quot; id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt; दान को परम धर्म कहने का कारण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/13 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नानागृहव्यतिकरार्जितपापपुंजै: खंजीकृतानि  गृहिणो न तथा व्रतानि। उच्चै: फलं विदधतीह यथैकदापि प्रीत्याति शुद्धमनसा  कृतपात्रदानम् ।13।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;लोक में अत्यंत विशुद्ध मन वाले गृहस्थ के द्वारा प्रीति  पूर्वक पात्र के लिए एक बार भी किया गया दान जैसे उन्नत फल को करता है वैसे फल को  गृह की अनेक झंझटों से उत्पन्न हुए पाप समूहों के द्वारा कुबड़े अर्थात्  शक्तिहीन किये गये गृहस्थ के व्रत नहीं करते हैं।13।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111,4/231/15  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कस्मात् स एव परमो धर्म  इति चेत्, निरंतरविषयकषायाधीनतया आर्तरौद्रध्यानरतानां निश्चयरत्नत्रयलक्षणस्य  शुद्धोपयोगपरमधर्मस्यावकाशो नास्तीति।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–श्रावकों का दानादिक ही परम धर्म  कैसे है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–वह ऐसे है, कि ये गृहस्थ लोग हमेशा विषय कषाय के अधीन हैं, इससे  इनके आर्त, रौद्र ध्यान उत्पन्न होते रहते हैं, इस कारण निश्चय रत्नत्रयरूप  शुद्धोपयोग परमधर्म का तो इनके ठिकाना ही नहीं है। अर्थात् अवकाश ही नहीं है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4&amp;quot; id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt; दान का महत्त्व व फल&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.1&amp;quot; id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;पात्र दान  सामान्य का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/16-21  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;दिण्णइ सुपत्तदाणं विससतो होइ भोगसग्ग  मही। णिव्वाणसुहं कमसो णिद्दिट्ठं जिणवरिंदेहिं।16। खेत्तविसमे काले वविय सुवीयं  फलं जहा विउलं। होइ तहा तं जाणइ पत्तविसेसेसु दाणफलं।17। इस णियसुवित्तवीयं जो ववइ  जिणुत्त सत्तखेत्तेसु। सो तिहुवणरज्जफलं भुंजदि कल्लाणपंचफलं।18।  मादुपिदुपुत्तमित्तं कलत्त-धणधण्णवत्थु वाहणविसयं। संसारसारसोक्खं जाणउ  सुपत्तदाणफलं।19। सत्तंगरज्ज णवणिहिभंडार सडंगवलचउद्दहरणयं। छण्णवदिसहसिच्छिविहउ  जाणउ सुपत्तदाणफलं।20। सुकलसुरूवसुलक्खण सुमइ सुसिक्खा सुसील सुगुण चारित्तं।  सुहलेसं सुहणामं सुहसादं सुपत्तदाणफलं।21। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सुपात्र को दान प्रदान करने से भोगभूमि  तथा स्वर्ग के सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति होती है। और अनुक्रम से मोक्ष सुख की  प्राप्ति होती है।16। जो मनुष्य उत्तम खेत में अच्छे बीज को बोता है तो उसका फल  मनवांछित पूर्ण रूप से प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्तम पात्र में विधिपूर्वक  दान देने से सर्वोत्कृष्ट सुख की प्राप्ति होती है।17। जो भव्यात्मा अपने  द्रव्य को सात क्षेत्रों में विभाजित करता है वह पंचकल्याण से सुशोभित त्रिभुवन  के राज्यसुख को प्राप्त होता है।18। माता, पिता, पुत्र, स्त्री, मित्र आदि  कुटुंब परिवार का सुख और धन-धान्य, वस्त्र-अलंकार, हाथी, रथ, महल तथा  महाविभूति आदि का सुख एक सुपात्र दान का फल है।19। सात प्रकार राज्य के अंग, नवविधि,  चौदह रत्न, माल खजाना, गाय, हाथी, घोड़े, सात प्रकार की सेना, षट्खंड का राज्य  और छयानवे हजार रानी से सर्व सुपात्र दान का ही फल है।20। उत्तम कुल, सुंदर स्वरूप,  शुभ लक्षण, श्रेष्ठ बुद्धि, उत्तम निर्दोष शिक्षा, उत्तमशील, उत्तम उत्कृष्ट  गुण, अच्छा सम्यक्चारित्र, उत्तम शुभ लेश्या, शुभ नाम और समस्त प्रकार के  भोगोपभोग की सामग्री आदि सर्व सुख के साधन सुपात्र दान के फल से प्राप्त होते हैं।21।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./115-116 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;उच्चैर्गोत्रं प्रणतेर्भोगो  दानादुपासनात्पूजा। भक्ते: सुंदररूपं स्तवनात्कीर्तिस्तपोनिधिषु।115।  क्षितिगतमिववटवीजं पात्रगतं दानमल्पमति काले। फलति च्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृतां।116। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;तपस्वी मुनियों को नमस्कार करने से उच्चगोत्र, दान देने से भोग, उपासना करने  से प्रतिष्ठा, भक्ति करने से सुंदर रूप और स्तवन करने से कीर्ति होती है।115।  जीवों को पात्र में गया हुआ थोड़ा-सा भी दान समय पर पृथ्वी में प्राप्त हुए वट  बीज के छाया विभव वाले वृक्ष की तरह मनोवांछित बहुत फल को फलता है।116। &amp;lt;/span&amp;gt;(पं.वि./2/8-11)        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पुरुषार्थ-सिद्ध्युपाय/174  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कृतमात्मार्थं मुनये ददाति भक्तमिति  भावितस्त्याग:। अरतिविषादविमुक्त: शिथिलितलोभो भवत्यहिंसैव।174। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस अतिथि  संविभाग व्रत में द्रव्य अहिंसा तो परजीवों का दु:ख दूर करने के निमित्त प्रत्यक्ष  ही है, रहीं भावित अहिंसा वह भी लोभ कषाय के त्याग की अपेक्षा समझनी चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/15-44&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; प्राय: कुतो गृहगते परमात्मबोध:  शुद्धात्मनो भुवि यत: पुरुषार्थसिद्धि:। दानात्पुनर्ननु चतुर्विधत: करस्था सा  लीलयैव कृतपात्रजनानुषंगात् ।15। किं ते गुणा: किमिह तत्सुखमस्ति लोके सा किं  विभूतिरथ या न वशं प्रयाति। दानव्रतादिजनितो यदि मानवस्य धर्मो जगत्त्रयवशीकरणैकमंत्रा:।19।  सौभाग्यशौर्यसुखरूपविवेकिताद्या विद्यावपुर्धनगृहाणि कुले च जन्म। संपद्यतेऽखिलमिदं  किल पात्रदानात् तस्मात् किमत्र सततं क्रियते न यत्न:।44। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जगत् में जिस आत्मस्वरूप  के ज्ञान से शुद्ध आत्मा के पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, वह आत्मज्ञान गृह में  स्थित मनुष्यों के प्राय: कहाँ से होती है ? अर्थात् नहीं हो सकती ? किंतु वह  पुरुषार्थ की सिद्धि पात्रजनों में किये गये चार प्रकार के दान से अनायास ही हस्तगत  हो जाती है।15। यदि मनुष्य के पास तीनों लोकों को वशीभूत करने के लिए अद्वितीय  वशीकरण मंत्र के समान दान एवं व्रतादि से उत्पन्न हुआ धर्म विद्यमान है तो ऐसे  कौन से गुण है जो उसके वश में न हो सकें, तथा वह कौन-सी विभूति है जो उसके अधीन न  हो अर्थात् धर्मात्मा मनुष्य के लिए सब प्रकार के गुण, उत्तम सुख और अनुपम  विभूति भी स्वयमेव प्राप्त हो जाती है।19। सौभाग्य, शूरवीरता, सुख, सुंदरता,  विवेक, बुद्धि आदि विद्या, शरीर, धन और महल तथा उत्तम कुल में जन्म होना यह सब  निश्चय से पात्रदान के द्वारा ही प्राप्त होता है। फिर हे भव्य जन ! तुम इस  पात्रदान के विषय में क्यों नहीं यत्न करते हो।44। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.2&amp;quot; id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt; आहार दान का महत्त्व &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./114 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गृहकर्माणि निचितं कर्म विमार्ष्टि  खलु गृहविमुक्तानां। अतिथीनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते वारि।114।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे जल निश्चय  करके रुधिर को धो देता है, तैसे ही गृहरहित अतिथियों का प्रतिपूजन करना अर्थात्  नवधाभक्ति-पूर्वक आहारदान करना भी निश्चय करके गृहकार्यों से संचित हुए पाप को  नष्ट करता है।114। (पं.वि./7/13)        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/5/4  &amp;lt;/span&amp;gt;परनिंदाभयं यस्य विना दानं न भोजनम् ।  कृतिनस्तस्य निर्बीजो वंशो नैव कदाचन् ।4।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/33/2  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;इदं हि धर्मसर्वस्वं शास्तृणां वचने  द्वयम् । क्षुधार्तेन समं भुक्ति: प्राणिनां चैव रक्षणम् ।2। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो बुराई से डरता  है और भोजन करने से पहले दूसरों को दान देता है, उसका वंश कभी निर्बीज नहीं होता।4।  क्षुधाबाधितों के साथ अपनी रोटी बाँटकर खाना और हिंसा से दूर रहना, यह सब धर्म  उपदेष्टाओं के समस्त उपदेशों में श्रेष्ठम उपदेश है।2। &amp;lt;/span&amp;gt;(पं.वि./6/31)        पं.वि./7/8 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वो वांछति सौख्यमेव तनुभृत्तन्मोक्ष  एव स्फुटम् । दृष्टयादित्रय एव सिद्धयति स तंनिर्ग्रंथ एव स्थितम् । तद्वृत्तिर्वपुषोऽस्य  वृत्तिरशनात्तद्दीयते श्रावकै: काले क्लिष्टतरेऽपि मोक्षपदवी प्रायस्ततो  वर्तते।8। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सब प्राणी सुख की इच्छा करते हैं, वह सुख स्पष्टतया मोक्ष में ही  है, वह मोक्ष सम्यग्दर्शनादि स्वरूप रत्नत्रय के होने पर ही सिद्ध होता है, वह  रत्नत्रय साधु के होता है, उक्त साधु की स्थिति शरीर के निमित्त से होती है, उस  शरीर की स्थिति भोजन के निमित्त से होती है, और वह भोजन श्रावकों के द्वारा दिया  जाता है। इस प्रकार इस अतिशय क्लेशयुक्त काल में भी मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति  प्राय: उन श्रावकों के निमित्त से ही हो रही है।8।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/363-364  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;भोयण दाणे दिण्णे तिण्णि वि  दाणाणि होंति दिण्णाणि। भुक्ख-तिसाए वाही दिणे दिणे होंति देहीणं।363। भोयण-बलेण  साहू सत्थं सेवेदि रत्तिदिवसं पि। भोयणदाणे दिण्णे पाणा वि य रक्खिया होंति।364।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भोजन दान देने पर तीनों दान दिये होते हैं। क्योंकि प्राणियों को भूख और प्यास  रूपी व्याधि प्रतिदिन होती है। भोजन के बल से ही साधु रात दिन शास्त्र का अभ्यास  करता है और भोजन दान देने पर प्राणों की भी रक्षा होती है।363-364। भावार्थ–आहार  दान देने से विद्या, धर्म, तप, ज्ञान, मोक्ष सभी नियम से दिया हुआ समझना चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./11/25,30 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;केवलज्ञानतो ज्ञानं निर्वाणसुखत:  सुखम् । आहारदानतो दानं नोत्तमं विद्यते परम् ।25। बहुनात्र किमुक्तेन बिना  सकलवेदिना। फलं नाहारदानस्य पर: शक्नोति भाषितुम् ।31। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;केवलज्ञानतैं दूजा  उत्तम ज्ञान नहीं, और मोक्ष सु:खतै और दूजा सुख नहीं और आहारदानतै और दूजा उत्तम  दान नाहीं।25। जो किछु वस्तु तीन लोकविषै सुंदर देखिये है सो सर्व वस्तु अन्नदान  करता जो पुरुष ताकरि लीलामात्र करि शीघ्र पाइये है। (अमि.श्रा./11/14-41)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/ &amp;lt;/span&amp;gt;पृ.161 पर फुट नोट–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आहाराद्भोगवान् भवेत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आहार  दान से भोगोपभोग मिलता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.3&amp;quot; id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt; औषध व ज्ञान दान का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमि.श्रा./11/37-50 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आजन्म जायते यस्य न व्याधिस्तनुतापक:।  किं सुखं कथ्यते तस्य सिद्धस्येव महात्मन:।37। निधानमेष कांतीनां  कीर्त्तीनां कुलमंदिरम् । लावण्यानां नदीनाथो भैषज्यं येन दीयते।38। लभ्यते  केवलज्ञानं यतो विश्वावभासकम् । अपरज्ञानलाभेषु कीदृशी तस्य वर्णना।47। शास्त्रदायी  सतां पूज्य: सेवनीयो मनीषिणाम् । वादी वाग्मी कविर्मान्य: ख्यातशिक्ष:  प्रजायते।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जाकै जन्म तै लगाय शरीर को ताप उपजावनै वाला रोग न होय है तिस  सिद्धसमान महात्मा का सुख कहिये। भावार्थ–इहाँ सिद्ध समान कह्या सो जैसे  सिद्धनिकौं रोग नाहीं तैसे याकै भी रोग नाहीं, ऐसी समानता देखी उपमा दीनि है।37।  जा पुरुषकरि औषध दीजिये है सो यहु पुरुष कांति कहिये दीप्तिनिका तौ भंडार होय  है, और कीर्त्तिनिका कुल मंदिर होय है जामै यशकीर्त्ति सदा वसै है, बहुरि सुंदरतानिका  समुद्र होय है ऐसा जानना।38। जिस शास्त्रदान करि पवित्र मुक्ति दीजिये है ताकै  संसार की लक्ष्मी देते कहा श्रम है।46। शास्त्रकौ देने वाला पुरुष संतनिके  पूजनीक होय है अर पंडितनि के सेवनीक होय है, वादीनिके जीतने वाला होय है, सभा को  रंजायमान करने वाला वक्ता होय है, नवीन ग्रंथ रचने वाला कवि होय है अर मानने  योग्य होय है अर विख्यात है शिक्षा जाकी ऐसा होय है।50। &amp;lt;/span&amp;gt;पं.वि./7/9-10 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्वेच्छाहारविहारजल्पनतया नीरुग्वपुर्जायते।  साधूनां तु न सा ततस्तदपटु प्रायेण संभाव्यते। कुर्यादौषधपथ्यवारिभिरिदं  चारित्रभारक्षमं यत्तस्मादिह वर्तते प्रशमिनां धर्मो गृहस्थोत्तमात् ।9। व्याख्याता  पुस्तकदानमुन्नतधियां पाठाय भव्यात्मनां। भक्त्या यत्क्रियते श्रुताश्रयमिदं  दानं तदाहुर्बुधा:। सिद्धेऽस्मिन् जननांतरेषु कतिषु त्रैलोक्यलोकोत्सवश्रीकारिप्रकटीकृताखिलजगत्कैवल्यभाजो  जना:।10। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शरीर इच्छानुसार भोजन, गमन और संभाषण से नीरोग रहता है। परंतु इस  प्रकार की इच्छानुसार प्रवृत्ति साधुओं के संभव नहीं है। इसलिए उनका शरीर  प्राय: अस्वस्थ हो जाता है। ऐसी अवस्था में चूँकि श्रावक उस शरीर को औषध पथ्य  भोजन और जल के द्वारा व्रतपरिपालन के योग्य करता है अतएव यहाँ उन मुनियों का धर्म  उत्तम श्रावक के निमित्त से ही चलता है।9। उन्नत बुद्धि के धारक भव्य जीवों को  जो भक्ति से पुस्तक का दान किया जाता है अथवा उनके लिए तत्त्व का व्याख्यान किया  जाता है, इसे विद्वद्जन श्रुतदान (ज्ञानदान) कहते हैं। इस ज्ञानदान के सिद्ध हो  जाने पर कुछ थोड़े से ही भवों में मनुष्य उस केवलज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं  जिसके द्वारा संपूर्ण विश्व साक्षात् देखा जाता है। तथा जिसके प्रगट होने पर  तीनों लोकों के प्राणी उत्सव की शोभा करते हैं।10।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/ &amp;lt;/span&amp;gt;पृ.161 पर फुट नोट...। &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आरोग्यमौषधाज् ज्ञेयं  श्रुतात्स्यात् श्रुतकेवली। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;औषध दान से आरोग्य मिलता है तथा शास्त्रदान  अर्थात् (विद्यादान) देने से श्रुतकेवली होता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.4&amp;quot; id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt; अभयदान का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./939 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;मरण भयभीरु आणं अभयं जो देदि सव्वजीवाणं।  तं दाणाणवि तं दाणं पुण जोगेसु मूलजोगंपि।939।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मरणभय से भयमुक्त सब जीवों को जो  अभय दान है वही दान सब दानों में उत्तम है और वह दान सब आचरणों में प्रधान आचरण  है।&amp;lt;/span&amp;gt;939।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/8/54  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;किं न तप्तं तपस्तेन किं न दत्तं महात्मना।  वितीर्णमभयं येन प्रीतिमालंब्य देहिनाम् ।54।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस महापुरुष ने जीवों को  प्रीति का आश्रय देकर अभयदान दिया उस महात्मा ने कौन सा तप नहीं किया और कौन सा  दान नहीं दिया। अर्थात् उस महापुरुष ने समस्त तप, दान किया। क्योंकि अभयदान में  सब तप, दान आ जाते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      अमि.श्रा./13&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt; शरीरं ध्रियते येन शममेव महाव्रतम् ।  कस्तस्याभयदानस्य फलं शक्नोति भाषितुम् ।13। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस अभयदान करि जीवनिका शरीर  पोषिए है जैसे समभावकरि महाव्रत पोषिए तैसें सो, तिस अभयदान के फल कहने को कौन  समर्थ है।13। &amp;lt;/span&amp;gt;पं.वि./7/11 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वेषामभयं प्रवृद्धकरुणैर्यद्दीयते  प्राणिनां, दानं स्यादभयादि तेन रहितं दानत्रयं निष्फलम् । आहरौषधशास्त्रदानविधिभि:  क्षुद्रोगजाडयाद्भयं यत्तत्पात्रजने विनश्यति ततो दानं तदेकं परम् ।11।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयालुपुरुषों  के द्वारा जो सब प्राणियों को अभयदान दिया जाता है, वह अभयदान कहलाता है उससे रहित  तीन प्रकार दान व्यर्थ होता है। चूँकि आहार, औषध और शास्त्र के दान की विधि से  क्रम से क्षुधा, रोग और अज्ञानता का भय ही नष्ट होता है अतएव वह एक अभयदान ही  श्रेष्ठ है।11। भावार्थ–अभयदान का अर्थ प्राणियों के सर्व प्रकार के भय दूर करना  है, अत: आहारादि दान अभयदान के ही अंतर्गत आ जाते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.5&amp;quot; id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt; सत्पात्र को दान देना सम्यग्दृष्टि को मोक्ष का  कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमि.श्रा./11/102,123 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पात्राय विधिना दत्वा दानं मूत्वा  समाधिना। अच्युतांतेषु कल्पेषु जायंते शुद्धदृष्टय:।102। निषेव्य लक्ष्मीमिति  शर्मकारिणीं प्रथीयसीं द्वित्रिभवेषु कल्मषम् । प्रदह्यते ध्यानकृशानुनाखिलं  श्रयंति सिद्धि विधुतापदं सदा।123। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पात्र के अर्थि दान देकरि समाधि सहित मरकैं  सम्यग्दृष्टि जीव हैं ते अच्युतपर्यंत स्वर्गनिविषैं उपजैं हैं।102। (अमि.श्रा./102)  या प्रकार सुख की करने वाली महान् लक्ष्मी कौं भोग के दोय तीन भवनिविषैं समस्त  कर्मनिकौं ध्यान अग्निकरि जराय के ते जीव आपदारहित मोक्ष अवस्थाकौं सदा सेवै  हैं।123। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111-4/231/15 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      वसु./श्रा./249-269 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;बद्धाउगा सुदिट्ठी अणुमोयणेण  तिरिया वि। णियमेणुववज्जंति य ते उत्तमभागभूमीसु।249। जे पुण सम्माइट्ठी  विरयाविरया वि तिविहपत्तस्स। जायंति दाणफलओ कप्पेसु महडि्ढया देवा।265।  पडिबुद्धिऊण चइऊण णिवसिरिं संजमं च घित्तूण। उप्पाइऊण णाणं केई गच्छंति णिव्वाणं।268।  अण्णे उ सुदेवत्तं सुमाणुसत्तं पुणो पुणो लहिऊण। सत्तट्ठमवेहि तओ तरंति कम्मक्खयं  णियमा।269।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;बद्धायुष्क सम्यग्दृष्टि अर्थात् जिसने मिथ्यात्व अवस्था में  पहिले मनुष्यायु को बाँध लिया है, और पीछे सम्यग्दर्शन उत्पन्न किया है, ऐसे  मनुष्य पात्रदान देने से और उक्त प्रकार के ही तिर्यंच पात्र दान को अनुमोदना  करने से नियम से वे उत्तम भोगभूमियों में उत्पन्न होते हैं।249। =जो अविरत सम्यग्दृष्टि  और देशसंयत जीव हैं, वे तीनों प्रकार के पात्रों का दान देने के फल से स्वर्गों  में महर्द्धिक देव होते हैं।265। (उक्त प्रकार के सभी जीव मनुष्यों में आकर  चक्रवर्ती आदि होते हैं।) तब कोई वैराग्य का कारण देखकर प्रतिबुद्ध हो, राज्यलक्ष्मी  को छोड़कर और संयम को ग्रहण कर कितने ही केवलज्ञान को उत्पन्न कर निर्वाण को  प्राप्त होते हैं। और कितने ही जीव सुदेवत्व और सुमानुषत्व को पुन: पुन: प्राप्त  कर सात आठ भव में नियम से कर्मक्षय को करते हैं (268-269)। &amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.6&amp;quot; id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt; सत्पात्र  दान मिथ्यादृष्टि को सुभोगभूमि का कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/9/85  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;दानाद् दानानुमोदाद्वा यत्र  पात्रसमाश्रितात् । प्राणिन: सुखमेधंते यावज्जीवमनामया:।85। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;उत्तम पात्र के  लिए दान देने अथवा उनके लिए दिये हुए दान की अनुमोदना से जीव जिस भोगभूमि में  उत्पन्न होते हैं उसमें जीवन पर्यंत निरोग रहकर सुख से बढ़ते रहते हैं।85।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./62 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;पात्रेभ्यो य: प्रकृष्टेभ्यो मिथ्यादृष्टि:  प्रयच्छति। स याति भोगभूमीषु प्रकृष्टासु महोदय:।62। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मिथ्यादृष्टि उत्कृष्ट  पात्रनि के अर्थि दान देय है सो महान् है उदय जाका ऐसा उत्कृष्ट भोग भूमि कौ  जाय है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/245 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/246-247  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;जा मज्झिमम्मि पत्तम्मि देइ दाणं  खु वामदिट्ठी वि। सो मज्झिमासु जीवो उप्पज्जइ भोयभूमीसु।246। जो पुण जहण्णपत्तम्मि  देइ दाणं तहाविहो विणरो। जायइ फलेण जहण्णसु भोयभूमीसु सो जीवो।247। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अर जो मिथ्यादृष्टि  भी पुरुष मध्यम पात्र में दान देता है वह जीव मध्यम भोगभूमि में उत्पन्न होता  है।246। और जो जीव तथाविध अर्थात् उक्त प्रकार का मिथ्यादृष्टि भी मनुष्य जघन्य  पात्र में दान को देता है, वह जीव उस दान के फल से जघन्य भोगभूमियों में उत्पन्न  होता है।247। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.7&amp;quot; id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt; कुपात्र दान कुभोग भूमि का कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/256 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; छद्मत्थविहिदवत्थुसु वदणियमज्झयणझाणदाणरदो।  ण लहदि अपुणब्भावं भावं सादप्पगं लहदि।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो जीव छद्मस्थ विहित वस्तुओं (देव,  गुरु धर्मादिक में) व्रत-नियम-अध्ययन-ध्यान-दान में रत होता है वह मोक्ष को  प्राप्त नहीं होता, (किंतु) सातात्मक भाव को प्राप्त होता है।&amp;lt;/span&amp;gt;256।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/7/115   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रदानतो भूत्वा तिर्यंचो भोगभूमिषु। संभुंजतेऽंतरं  द्वीपं कुमानुषकुलेषु वा।115।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र दान के प्रभाव से मनुष्य, भोगभूमियों में  तिर्यंच होते हैं अथवा कुमानुष कुलों में उत्पन्न होकर अंतर द्वीपों का उपभोग  करते हैं।115।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      अमि.श्रा./84-88 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रदानतो याति कुत्सितां  भोगमेदिनीम् । उप्ते क: कुत्सिते क्षेत्रे सुक्षेत्रफलमश्नुते।84। येऽंतरद्वीपजा:  संति ये नरा म्लेच्छखंडजा:। कुपात्रदानत: सर्वे ते भवंति यथायथम् ।85। वर्यमध्यजघन्यासु  तिर्यंच: संति भूमिषु। कुपात्रदानवृक्षोत्थं भुंजते तेऽखिला: फलम् ।86।  दासीदासद्विपम्लेच्छसारमेयाददोऽत्र ये। कुपात्रदानतो भोगस्तेषां भोगवतां स्फुटम्  ।87। दृश्यंते नीचजातीनां ये भोगा भोगिनामिह। सर्वे कुपात्रदानेन ते दीयंते  महोदया:।88।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र के दानतै जीव कुभोगभूमिकौं प्राप्त होय है, इहां दृष्टांत  कहै है–खोटा क्षेत्रविषै बीज बोये संते सुक्षेत्र के फलकौं कौन प्राप्त होय, अपितु  कोई न होय है।84। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/248 &amp;lt;/span&amp;gt;)। जे अंतरद्वीप लवण समुद्रविषैं वा कालोद  समुद्र विषैं छयानवैं कुभोग भूमि के टापू परे हैं, तिनविषै उपजे मनुष्य हैं अर म्लेच्छ  खंड विषैं उपजै मनुष्य हैं ते सर्व कुपात्र दानतैं यथायोग होय हैं।85। उत्तम,  मध्यम, जघन्य भोगभूमिन विषैं जे तिर्यंच हैं ते सर्व कुपात्र दान रूप वृक्षतैं  उपज्या जो फल ताहि खाय हैं।86। इहां आर्य खंड में जो दासी, दास, हाथी, म्लेच्छ,  कुत्ता आदि भोगवंत जीव हैं तिनको जो भोगै सो प्रगटपने कुपात्र दानतै हैं, ऐसा  जानना।87। इहां आर्य खंड विषै नीच जाति के भोगी जीवनिके जे भोग महाउदय रूप  देखिये है ते सर्व कुपात्र दान करि दीजिये हैं।88। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.8&amp;quot; id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt; अपात्र दान का फल अत्यंत अनिष्ट है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/257  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;अविदिदपरमत्थेसु य विसयकसायाधिगेसु  पुरिसेसु। जुट्ठं कदं व दत्तं फलदि कुदेवेसु मणुवेसु।257। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिन्होंने परमार्थ को  नहीं जाना है, और जो विषय कषाय में अधिक है, ऐसे पुरुषों के प्रति सेवा, उपकार या  दान कुदेवरूप में और कुमानुष रूप में फलता है।257।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/7/118  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;अंबु निंबद्रुमे रौद्रं कोद्रवे  मदकृद् यथा। विषं व्यालमुखे क्षीरमपात्रे पतितं तथा।118। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस प्रकार नीम के  वृक्ष में पड़ा हुआ पानी कडुवा हो जाता है, कोदों में दिया पानी मदकारक हो जाता  है, और सर्प के मुख में पड़ा दूध विष हो जाता है, उसी प्रकार अपात्र के लिये दिया  हुआ दान विपरीत फल को करने वाला हो जाता है।118। (अमि.श्रा./89-99) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/243 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/242  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;जह उसरम्मि खित्ते पइण्णबीयं ण किं पि  रुहेइ। फला वज्जियं वियाणइ अपत्तदिण्णं तहा दाणं।242। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस प्रकार ऊसर खेत में  बोया गया बीज कुछ भी नहीं उगता है, उसी प्रकार अपात्र में दिया गया दान भी फल रहित  जानना चाहिए।242। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.9&amp;quot; id=&amp;quot;4.9&amp;quot;&amp;gt; विधि, द्रव्य, दाता व पात्र के कारण दान के फल  में विशेषता आ जाती है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वार्थसूत्र/7/39  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेष:।39। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;विधि, देयवस्तु, दाता और पात्र की विशेषता से दान की विशेषता है।39।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/9/7  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;आतिथ्यपूर्णमाहात्म्यवर्णने न क्षमा  वयम् । दातृपात्रविधिद्रव्यैस्तस्मिन्नस्ति विशेषता।7।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;हम किसी अतिथि सेवा के  माहात्म्य का वर्णन नहीं कर सकते कि उसमें कितना पुण्य है। अतिथि यज्ञ का  महत्त्व तो अतिथि की योग्यता पर निर्भर है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/255  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;रागो पसत्थभूदो वत्थुविसेसेण फलदि  विवरीदं। णाणाभूमिगदाणिह बीजाणिव सस्सकालम्हि।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे इस जगत् में अनेक प्रकार की  भूमियों में पड़े हुए बीज धान्य काल में विपरीततया फलित होते हैं, उसी प्रकार  प्रशस्तभूत राग वस्तु भेद से (पात्र भेद से) विपरीततया फलता है।255।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/7/39/373/5  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिग्रहादिक्रमो विधि:।  प्रतिग्रहादिष्वादरानादरकृतो भेद:। तप:स्वाध्यायपरिवृद्धिहेतुत्वादिर्द्रव्यविशेष:।  अनसूयाविषादादिर्दातृविशेष:। मोक्षकारणगुणसंयोग: पात्रविशेष:। ततश्च पुण्यफलविशेष:  क्षित्यादिविशेषाद् बीजफलविशेषवत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिग्रह आदि करने का जो क्रम है वह विधि  है। ...प्रतिग्रह आदि में आदर और अनादर होने से जो भेद होता है वह विधि विशेष है।  जिससे तप और स्वाध्याय आदिकी वृद्धि होती है वह द्रव्य विशेष है। अनसूया और  विषाद आदि का न होना दाता की विशेषता है। तथा मोक्ष के कारणभूत गुणों से युक्त  रहना पात्र की विशेषता है। जैसे पृथिवी आदि में विशेषता होने से उससे उत्पन्न हुए  बीज में विशेषता आ जाती है वैसे ही विधि आदिक की विशेषता से दान से प्राप्त होने  वाले पुण्य फल में विशेषता आ जाती है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/7/39/1-6/559 &amp;lt;/span&amp;gt;) (अमि.श्रा./10/50)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/240-241 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.10&amp;quot; id=&amp;quot;4.10&amp;quot;&amp;gt; दान के प्रकृष्ट फल का कारण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/116 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; नन्वेवंविधं विशिष्टं फलं स्वल्पं  दानं कथं संपादयतीत्याशंकाऽपनोदार्थमाह–क्षितिगतमिव वटबीजं पात्रगतं दानमल्पमपि  काले। फलतिच्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृतां।116। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–स्वल्प मात्र दानतै  इतना विशिष्ट फल कैसे हो सकता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–जीवों को पात्र में गया हुआ अर्थात्  मुनि अर्जिका आदि के लिए दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान समय पर पृथ्वी में प्राप्त हुए  वट बीज के छाया विभव वाले वृक्ष की तरह मनोवांछित फल को फलता है।116। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/240 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/29/1 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      पं.वि./2/38 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;पुण्यक्षयात्क्षयमुपैति न दीयमाना  लक्ष्मीरत: कुरुत संततपात्रदानम् । कूपे न पश्यत जलं गृहिण: समंतादाकृष्यमाणमपि  वर्धत एव नित्यम् ।38।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;संपत्ति पुण्य के क्षय से क्षय को प्राप्त होती है, न  कि दान करने से। अतएव हे श्रावको ! आप निरंतर पात्र दान करें। क्या आप यह नहीं  देखते कि कुएँ से सब ओर से निकाला जाने वाला भी जल नित्य बढ़ता ही रहता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5&amp;quot; id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;विधि द्रव्य दातृ पात्र आदि निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.1&amp;quot; id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;दान योग्य  द्रव्य&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/23-24  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;सीदुण्ह वाउविउलं सिलेसियं तह परीसमव्वाहिं।  कायकिलेसुव्वासं जाणिज्जे दिण्णए दाणं।23। हियमियमण्णपाणं णिरवज्जोसहिणिराउलं  ठाणं। सयणासणमुवयरणं जाणिज्जा देइ मोक्खरवो।24।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मुनिराज की प्रकृति, शीत, उष्ण,  वायु, श्लेष्म या पित्त रूप में से कौन सी है। कायोत्सर्ग वा गमनागमन से कितना  परिश्रम हुआ है, शरीर में ज्वरादि पीड़ा तो नहीं है। उपवास से कंठ शुष्क तो  नहीं है इत्यादि बातों का विचार करके उसके उपचार स्वरूप दान देना चाहिए।23।  हित-मित प्रासुक शुद्ध अन्न, पान, निर्दोष हितकारी ओषधि, निराकुल स्थान, शयनोपकरण,  आसनोपकरण, शास्त्रोपकरण आदि दान योग्य वस्तुओं को आवश्यकता के अनुसार सुपात्र  में देता है वह मोक्षमार्ग में अग्रगामी होता है।24।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पुरुषार्थ-सिद्ध्युपाय/170 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt; रागद्वेषासंयममददु:खभयादिकं न यत्कुरुते।  द्रव्यं तदेव देयं सुतप:स्वाध्यायवृद्धिकरम् ।170। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दान देने योग्य पदार्थ  जिन वस्तुओं के देने से रागद्वेष, मान, दु:ख, भय आदिक पापों की उत्पत्ति होती है,  वह देने योग्य नहीं। जिन वस्तुओं के देने से तपश्चरण, पठन, पाठन स्वाध्यायादि  कार्यों में वृद्धि होती है, वही देने योग्य हैं।170। &amp;lt;/span&amp;gt;(अमि.श्रा./9/44) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/45 &amp;lt;/span&amp;gt;)।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/28/3  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दीयमानेऽन्नादौ प्रतिगृहीतुस्तप:स्वाध्यायपरिवृद्धिकरणत्वाद्द्रव्यविशेष:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भिक्षा में जो अन्न दिया जाता है वह यदि आहार लेने वाले साधु के तपश्चरण स्वाध्याय  आदि को बढ़ाने वाला हो तो वही द्रव्य की विशेषता कहलाती है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.2&amp;quot; id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;दान प्रति उपकार की भावना से निरपेक्ष देना चाहिए&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/20  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;एवं जो जाणित्ता विहलिय-लोयाण धम्मजुत्ताणं।  णिरवेक्खो तं देदि हु तस्स हवे जीवियं सहलं।20।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस प्रकार लक्ष्मी को अनित्य  जानकर जो उसे निर्धन धर्मात्मा व्यक्तियों को देता है और उसके बदले में उससे  प्रत्युपकार की वांछा नहीं करता, उसी का जीवन सफल है।20।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.3&amp;quot; id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt; गाय आदि का दान योग्य नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/50 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नान्यानि गोकनकभूमिरथांगनादिदानादि  निश्चितमवद्यकराणि यस्मात् ।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आहारादि चतुर्विध दान से अतिरिक्त गाय, सुवर्ण,  पृथिवी, रथ और स्त्री आदि के दान, महान् फल को देने वाले नहीं हैं।50।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/53  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;हिंसार्थत्वान्न भूगेह-लोहगोऽश्वादिनैष्ठिक:।  न दद्याद् ग्रहसंक्रांति-श्राद्धदौ वा सुदृग्द्रुहि।53। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;नैष्ठिक श्रावक  प्राणियों की हिंसा के निमित्त होने से भूमि, शस्त्र, गौ, बैल, घोड़ा वगैरह हैं  आदि में जिनके ऐसे कन्या, सुवर्ण और अन्न आदि पदार्थों को दान नहीं देवे। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/9/46-59 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.4&amp;quot; id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादृष्टि को दान देने का निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; दर्शनपाहुड़/ &amp;lt;/span&amp;gt;टी./2/3/1 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दर्शनहीन: ...तस्यान्नदानाक्षिकमपि  न देयं। उक्तं च–मिथ्यादृग्भ्यो ददद्दानं दाता मिथ्यात्ववर्धक:। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादृष्टि  को अन्नादिक दान भी नहीं देना चाहिए। कहा भी है–मिथ्यादृष्टि को दिया गया दान  दाता को मिथ्यात्व का बढ़ाने वाला है।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./50&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; तद्येनाष्टपदं यस्य दीयते हितकाभ्यया।  स तस्याष्टापदं मन्ये दत्ते जीवितशांतये।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे कोऊ जीवने के अर्थ काहूकौ  अष्टापद हिंसक जीवकौं देय तो ताका मरन ही होय है तैसैं धर्म के अर्थ मिथ्यादृष्टीनकौ  दिया जो सुवर्ण तातैं हिंसादिक होने तैं परके वा आपके पाप ही होय है ऐसा जानना।50।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/64/149  &amp;lt;/span&amp;gt;फुट नोट–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यात्वग्रस्तचित्तेसु  चारित्राभासभागिषु। दोषायैव भवेद्दानं पय:पानमिवाहिषु।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चारित्राभास को धारण करने  वाले मिथ्यादृष्टियों को दान देना सर्प को दूध पिलाने के समान केवल अशुभ के लिए  ही होता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.5&amp;quot; id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र व अपात्र को करुणा बुद्धि से दान दिया  जाता है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/730  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथोचितम्  । पात्रबुद्धया निषिद्धं स्यान्निषिद्धं न कृपाधिया।730। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र के लिए और  अपात्र के लिए भी यथायोग्य दान देना चाहिए क्योंकि कुपात्र तथा अपात्र के लिए  केवल पात्र बुद्धि से दान देना निषिद्ध है, करुणा बुद्धि से दान देना निषिद्ध नहीं  है।730। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/3/161 &amp;lt;/span&amp;gt;) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/6/225 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.6&amp;quot; id=&amp;quot;5.6&amp;quot;&amp;gt; दुखित भुखित को भी करुणाबुद्धि से दान दिया जाता  है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी x` 30/731  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;शेषेभ्य: क्षुत्पिपासादिपीडितेभ्योऽशुभोदयात्  । दीनेभ्योऽभयदानादि दातव्यं करुणार्णवै:।731। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयालु श्रावकों को अशुभ कर्म के  उदय से क्षुधा, तृषा, आदि से दुखी शेष दीन प्राणियों के लिए भी अभय दानादिक देना  चाहिए।731। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/3/162 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.7&amp;quot; id=&amp;quot;5.7&amp;quot;&amp;gt;ग्रहण व संक्रांति आदि के कारण दान देना योग्य  नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमि.श्रा./60-61 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;य: संक्रांतौ ग्रहणे वारे वित्तं  ददाति मूढमति:। सम्यक्त्ववनं छित्त्वा मिथ्यात्ववनं वपत्येष:।60। ये ददते  मृततृप्त्यै बहुधादानानि नूनमस्तधिय:। पल्लवयितं तरुं ते भस्मीभूतं निषिंचंति।61। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मूढबुद्धि पुरुष संक्रांतिविषैं आदित्यवारादि (ग्रहण) वार विषैं धन को देय  है सो सम्यक्त्व वन को छेदिकै मिथ्यात्व वन को बोवै है।60। जे निर्बुद्धि  पुरुष मरे जीव की तृप्तिके अर्थ बहुत प्रकार दान देय है ते निश्चयकरि अग्निकरि  भस्मरूप वृक्षकौं पत्र सहित करनेकौं सींचै है।61।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/53  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;हिंसार्थत्वान्न भूगेह-लोहगोऽश्वादिनैष्ठिक:।  न दद्याद् ग्रहसंक्रांति-श्राद्धादौ वा सुदृग्द्रुहि।53।&amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;नैष्ठिक श्रावक  प्राणियों की हिंसा में निमित्त होने से भूमि आदि...को दान नहीं देवे। और जिनको  पर्व मानने से सम्यक्त्व का घात होता है ऐसे ग्रहण, संक्रांति, तथा श्राद्ध  वगैरह में अपने द्रव्य का दान नहीं देवे।53।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6&amp;quot; id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह का विधि निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.1&amp;quot; id=&amp;quot;6.1&amp;quot;&amp;gt; दान के  लिए धन की इच्छा अज्ञान है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; इष्टोपदेश/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./16 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;त्यागाय श्रेय से वित्तमवित्त: संचिनोति  य:। स्वशरीरं स पंकेन स्नास्यामीति विलिंपति।16।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो निर्धन मनुष्य  पात्रदान, देवपूजा आदि प्रशस्त कार्यों के लिए अपूर्व पुण्य प्राप्ति और पाप  विनाश की आशा से सेवा, कृषि और वाणिज्य आदि कार्यों के द्वारा धन उपार्जन करता है  वह मनुष्य अपने निर्मल शरीर में ‘नहा लूँगा’ इस आशा से कीचड़ लपेटता है।16। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.2&amp;quot; id=&amp;quot;6.2&amp;quot;&amp;gt; दान देने की अपेक्षा धन का ग्रहण ही न करे&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; आत्मानुशासन/102  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अर्थिम्यस्तृणवद्विचिंत्य विषयान्  कश्चिच्छ्रियं दत्तवान् पापं तामवितर्पिणी, विगणयन्नादात् परस्त्यक्तवान् ।  प्रागेव कुशलां विमृश्य सुभगोऽप्यन्यो न पर्यग्रहीत् एते ते  विदितोत्तरोत्तरवरा: सर्वोत्तमास्त्यागिन:।102। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कोई विद्वान् मनुष्य विषयों  को तृण के समान तुच्छ समझकर लक्ष्मी को याचकों के लिऐ दे देता है, कोई पाप रूप  समझकर किसी को बिना दिये ही त्याग देता है। सर्वोत्तम वह है जो पहिले से ही अकल्याणकारी  जानकर ग्रहण नहीं करता।102। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.3&amp;quot; id=&amp;quot;6.3&amp;quot;&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह की कथंचित् इष्टता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/23/6  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आर्तक्षुधाविनाशाय नियमोऽयं शुभावह:।  कर्तव्यो धनिभिर्नित्यमालये वित्तसंग्रह:।6। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गरीबों के पेट की ज्वाला को शांत  करने का यही एक मार्ग है कि जिससे श्रीमानों को अपने पास विशेष करके धन संग्रह कर  रखना चाहिए।6। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.4&amp;quot; id=&amp;quot;6.4&amp;quot;&amp;gt; आय का वर्गीकरण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/32 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;ग्रासस्तदर्धमपि देयमथार्धमेक तस्यापि  संततमणुव्रतिना यथर्द्धि। इच्छानुरूपमिह कस्य कदात्र लोके द्रव्यं भविष्यति  सदुत्तमदानहेतु:।32।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अणुव्रती श्रावक को निरंतर अपनी संपत्ति के अनुसार एक  ग्रास, आधा ग्रास उसके भी आधे भाग अर्थात् चतुर्थांश को भी देना चाहिए। कारण यह  है कि यहाँ लोक में इच्छानुसार द्रव्य किसके किस समय होगा जो कि उत्तम दान को दे  सके, यह कुछ नहीं कहा जा सकता।32। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/1/11/22  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पर फुट नोट–&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पादमायानिधिं कुर्यात्पादं  वित्ताय खट्वयेत् । धर्मोपभोगयो: पादं पादं भर्त्तव्यपोषणे। अथवा–आयार्द्धं च  नियुंजीत धर्मे समाधिकं तत:। शेषेण शेषं कुर्वीत यत्नतस्तुच्छमैहिकं।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थ  अपने कमाये हुए धन के चार भाग करे, उसमें से एक भाग तो जमा रखे, दूसरे भाग से  बर्तन वस्त्रादि घर की चीजें खरीदे, तीसरे भाग से धर्मकार्य और अपने भोग उपभोग  में खर्च करे और चौथे भाग से अपने कुटुंब का पालन करे। अथवा अपने कमाये हुए धन  का आधा अथवा कुछ अधिक धर्मकार्य में खर्च करे और बचे हुए द्रव्य से यत्नपूर्वक  कुटुंब आदि का पालन पोषण करै।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; (1) चतुर्विध राजनीति का एक अंग । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 50.18 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) सातावेदनीय का आस्रव । यह गृहस्थ के चतुर्विध धर्म में प्रथम धर्म है । इसमें स्व और पर के उपकार हेतु अपने स्व अर्थात् धन या अपनी वस्तु का त्याग किया जाता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;8.177-178, 41.104, 56.88-89, 63.270,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 58.94,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 1.123,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वीरवर्द्धमान चरित्र 6.12  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;में इसके तीन भेद बताये हैं― शास्त्रदान (ज्ञानदान), अभयदान और आहारदान । सत्पुरुषों का उपकार करने की इच्छा से सर्वज्ञ भाषित शास्त्र का दान शास्त्रदान, कर्मबंध के कारणों को छोड़ने के हेतु प्राणिपीड़ा का त्याग करना अभयदान और निर्ग्रंथ साधुओं को उनके शरीर आदि की रक्षार्थ शुद्ध आहार देना आहारदान कहा है । ज्ञानदान सबमें श्रेष्ठ है क्योंकि वह पाप कार्यों से रहित तथा देने और लेने वाले दोनों के लिए निजानंद रूप मोक्षप्राप्ति का कारण है । आरंभ जन्य पाप का कारण होने से आहारदान की अपेक्षा अभयदान श्रेष्ठ है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;56.67-77 औषधिदान को मिलाकर इसके चार भेद भी किये गये हैं । ये त्रिविध पात्रों को नवधा भक्तिपूर्वक दिये जाते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 14.56-59,76,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 1.126  &amp;lt;/span&amp;gt;पात्र के लिए दान देने अथवा अनुमोदना करने से जीव भोगभूमि में उत्पन्न होकर जीवन पर्यंत निरोग एव सुखी रहते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;9. 85-86, &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 7.107-118  &amp;lt;/span&amp;gt;दाता की विशुद्धता-देय वस्तु और लेने वाले पात्र को, देय वस्तु की पवित्रता-देने और लेने वाले दोनों को एवं पात्र की विशुद्धि-दाता और देय वस्तु इन दोनों को पवित्र करती है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;20.136-137 यह भोग संपदा का प्रदाता तथा स्वर्ग और मोक्ष का हेतु है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 123.107-108  &amp;lt;/span&amp;gt;आहारदान नवधा भक्तिपूर्वक दिया जाता है । दाता के लिए सर्वप्रथम पात्र को पड़गाहकर उसे उच्च स्थान देना, उसके पाद-प्रक्षालन करना, पूजा करना, नमस्कार करना, मन शुद्धि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि और आहारशुद्धि प्रकट करनी पड़ती हे । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 9.199-200  &amp;lt;/span&amp;gt;श्रावक की एक क्रिया दत्ति है । इसके चार भेद कहे है― दयादत्ति, पात्रदति, समददत्ति और अन्वयदत्ति । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;38.35-40&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द]]&lt;br /&gt;
[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=105903</id>
		<title>दान</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=105903"/>
		<updated>2022-12-11T15:31:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शुद्ध  धर्म का अवकाश न होने से गृहस्थ धर्म में दान की प्रधानता है। वह दान दो भागों  में विभाजित किया जा सकता है–अलौकिक व लौकिक। अलौकिक दान साधुओं को दिया जाता है  जो चार प्रकार का है–आहार, औषध, ज्ञान व अभय तथा लौकिक दान साधारण व्यक्तियों को  दिया जाता है जैसे समदत्ति, करुणादत्ति, औषधालय, स्कूल, सदाव्रत, प्याऊ आदि  खुलवाना इत्यादि।         निरपेक्ष  बुद्धि से सम्यक्त्व पूर्वक सद्पात्र को दिया गया अलौकिक दान दातार को परंपरा  मोक्ष प्रदान करता है। पात्र, कुपात्र व अपात्र को दिये गये दान में भावों की  विचित्रता के कारण फल में बड़ी विचित्रता पड़ती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दान सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1 |  दान सामान्य का लक्षण।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.2 |  दान के भेद।        ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.3 |  औषधालय सदाव्रतादि खुलवाने का विधान।   ]]     &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.4 |  दया दत्ति आदि के लक्षण।    ]]    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.5 |  सात्त्विक राजसादि दानों के लक्षण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.6 |  सात्त्विकादि दानों में परस्पर तरतमता।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.7 |  तिर्यंचों के लिए भी दान देना संभव है।   ]]     &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान कथंचित् क्षायोपशमिक भाव है।–देखें [[ क्षायोपशमिक ]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान भी कथंचित् सावद्य योग है।–देखें [[ सावद्य#7 | सावद्य - 7]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; विधि दान क्रिया।–देखें [[ संस्कार#2 | संस्कार - 2]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; क्षायिक दान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;  &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.1 |  क्षायिक दान का लक्षण।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.2 |  क्षायिक दान संबंधी शंका समाधान।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.3 |  सिद्धों में क्षायिक दान क्या है।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; गृहस्थों के लिए दान धर्म की प्रधानता&amp;lt;/strong&amp;gt;  &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.1 |  सत् पात्र को दान देना ही गृहस्थ का परमधर्म है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.2 |  दान देकर खाना ही योग्य है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.3 |  दान दिये बिना खाना योग्य नहीं।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.4 |  दान देने से ही जीवन व धन सफल है।]]        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.5 |  दान को परम धर्म कहने का कारण। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान दिये बिना धर्म को खाना महापाप है।–देखें [[ पूजा#2.1 | पूजा - 2.1]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दान का महत्त्व व फल&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.1 |  पात्रदान सामान्य का महत्त्व।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.2 |  आहार दान का महत्त्व।     ]]   &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.3 |  औषध व ज्ञान दान का महत्त्व।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; [[ #4.4 | अभयदान का महत्त्व।    ]]    &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.5 |  सत् पात्र को दान देना सम्यग्दृष्टि को मोक्ष  का कारण है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.6 |  सत्पात्र दान मिथ्यादृष्टि को सुभोग भूमिका कारण  है।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.7 |  कुपात्र दान कुभोग भूमिका कारण है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.8 |  अपात्र दान का फल अत्यंत अनिष्ट है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.9 |  विधि, द्रव्य, दाता व पात्र के कारण दान के फल  में विशेषता आ जाती है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; मंदिर में घंटी, चमर आदि के दान का महत्त्व व फल।–देखें [[ पूजा#4.2 | पूजा - 4.2]]।        &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;ol start=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.10 |  दान के प्रकृष्ट फल का कारण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; विधि, द्रव्य, दातृ, पात्रादि निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; भक्ति पूर्वक ही पात्र को दान देना चाहिए।–देखें [[ आहार#II.1 | आहार - II.1]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान की विधि अर्थात् नवधा भक्ति।–देखें [[ भक्ति#6 | भक्ति - 6]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.1 |   दान योग्य द्रव्य।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; साधु को दान देने योग्य दातार।–देखें [[ आहार#II.5 | आहार - II.5]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान योग्य पात्र कुपात्र आदि निर्देश।–देखें [[ पात्र ]]।&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; दान के लिए पात्र की परीक्षा का विधि निषेध।–देखें [[ विनय#5 | विनय - 5]]। &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ul&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol start=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.2 |  दान प्रति उपकार की भावना से निरपेक्ष देना चाहिए।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.3 |  गाय आदि का दान योग्य नहीं।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.4 |  मिथ्यादृष्टि को दान देने का निषेध।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.5 |  कुपात्र व अपात्र को करुणा बुद्धि से दान दिया  जाता है।]] &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.6 |  दुखित भुखित को भी करुणा बुद्धि से दान दिया जाता  है।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #5.7 |  ग्रहण व संक्रांति आदि के कारण दान देना योग्य  नहीं। ]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह का विधि निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt; &lt;br /&gt;
    &amp;lt;/span&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.1 |  दान के लिए धन की इच्छा अज्ञान है। ]]       &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.2 |  दान देने की बजाय धन का ग्रहण ही न करे।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.3 |  दानार्थ धन संग्रह को कथंचित् इष्टता।  ]]      &amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #6.4 |  आय का वर्गीकरण।]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1&amp;quot; id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; दान सामान्य निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.1&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt; दान सामान्य का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        त.स./7/38  अ&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ।38। स्वपरोपकारोऽनुग्रह: (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/7/38 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;स्वयं  अपना और दूसरे के उपकार के लिए अपनी वस्तु का त्याग करना दान है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/6/12/330/14   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परानुग्रहबुद्धया स्वस्यातिसर्जनं दानम् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दूसरे का उपकार हो इस बुद्धि से  अपनी वस्तु का अर्पण करना दान है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/6/12/4/522 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 13/5,5,137/389/12   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;रत्नत्रयवद्भ्य: स्ववित्तपरित्यागो दानं रत्नत्रयसाधनादित्सा वा।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;रत्नत्रय  से युक्त जीवों के लिए अपने वित्त का त्याग करने या रत्नत्रय के योग्य साधनों  के प्रदान करने की इच्छा का नाम दान है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.2&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt;दान के भेद&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./117  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आहारौषधयोरप्युपकरणावासयोश्च दानेन वैयावृत्यं ब्रुवते चतुरात्मत्वेन  चतुरस्रा:।117।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चार ज्ञान के धारक गणधर आहार, औषध के तथा ज्ञान के साधन शास्त्रादिक  उपकरण और स्थान के (वस्तिका के) दान से चार प्रकार का वैयावृत्य कहते हैं।117। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; जंबूद्वीपपण्णत्तिसंगहो/2/148 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/233 &amp;lt;/span&amp;gt;) (पं.वि./2/50)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/6/24/338/11   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;त्यागो दानम् । तत्त्रिविधम् – आहारदानमभयदानं ज्ञानदानं चेति। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;त्याग दान  है। वह तीन प्रकार का है–आहारदान, अभयदान और ज्ञानदान।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/38/35 &amp;lt;/span&amp;gt;...।  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;चतुर्धा वर्णिता दत्ति: दयापात्रसमान्वये।35।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और  अन्वय दत्ति ये चार प्रकार की दत्ति कही गयी है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–तीन प्रकार का दान कहा गया है–सात्त्विक, राजस और तामस दान।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.3&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;औषधालय सदाव्रत आदि खुलवाने का विधान&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/40   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सत्रमप्यनुकंप्यानां, सृजेदनुजिघृक्षया। चिकित्साशालवद्दुष्येन्नेज्जायै  वाटिकाद्यपि।40। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पाक्षिक श्रावक, औषधालय की तरह दुखी प्राणियों के उपकार की चाह  से अन्न और जल वितरण के स्थान को भी बनवाये और जिनपूजा के लिए पुष्पवाटिकाएँ बावड़ी  व सरोवर आदि बनवाने में भी हर्ज नहीं है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.4&amp;quot; id=&amp;quot;1.4&amp;quot;&amp;gt; दया दत्ति आदि के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/38/36-41   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सानुकंपमनुग्राह्ये प्राणिवृंदेऽभयप्रदा। त्रिशुद्धयनुगता सेयं दयादत्तिर्मता  बुधै:।36। महातपोधनाचार्याप्रतिग्रहपुर:सरम् । प्रदानमशनादीनां पात्रदानं तदिष्यते।37।  समानायात्मनान्यस्मै क्रियामंत्रव्रतादिभि:। निस्तारकोत्तमायेह भूहेमाद्यतिसर्जनम्  ।38। समानदत्तिरेषा स्यात् पात्रे मध्यमतायिते। समानप्रतिपत्त्यैव प्रवृत्ता  श्रद्धयान्विता।39। आत्मान्वयप्रतिष्ठार्थं सूनवे यदशेषत:। समं समयवित्ताभ्यां  स्ववर्गस्यातिसर्जनम् ।40। सैषा सकलदत्ति:...।41।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अनुग्रह करने योग्य  प्राणियों के समूह पर दयापूर्वक मन, वचन, काय की शुद्धि के साथ उनके भय दूर करने  को पंडित लोग दयादत्ति मानते हैं।36। महा तपस्वी मुनियों के लिए सत्कारपूर्वक  पड़गाहन कर जो आहार आदि दिया जाता है उसे पात्र दत्ति कहते हैं।37। क्रिया, मंत्र  और व्रत आदि से जो अपने समान है तथा जो संसार समुद्र से पार कर देने वाला कोई अन्य  उत्तम गृहस्थ है उसके लिए (कन्या, हस्ति, घोड़ा, रथ, रत्न (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार  &amp;lt;/span&amp;gt;) पृथिवी  सुवर्ण आदि देना अथवा मध्यम पात्र के लिए समान बुद्धि से श्रद्धा के साथ जो दान  दिया जाता है वह समान दत्ति कहलाता है।38-39। अपने वंश की प्रतिष्ठा के लिए पुत्र  को समस्त कुल पद्धति तथा धन के साथ अपना कुटुंब समर्पण करने को सकल दत्ति (वा  अन्वयदत्ति) कहते हैं।40। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6 &amp;lt;/span&amp;gt;); (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/7/27-28 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/234-238   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;असणं पाणं खाइयं साइयमिदि चउविहो वराहारो। पुव्वुत्त-णव-विहाणेहिं तिविहपत्तस्स  दायव्वो।234। अइबुड्ढ-बाल-मुयंध-बहिर-देसंतरीय-रोडाणं। जह जोग्गं दायव्वं  करुणादाणं त्ति भणिऊण।235। उववास-वाहि-परिसम-किलेस-परिपीडयं मुणेऊण। पत्थं  सरीरजोग्गं भेसजदाणं पि दायव्वं।236। आगम-सत्थाइं लिहाविऊण दिज्जंति जं  जहाजोग्गं। तं जाण सत्थदाणं जिणवयणज्झावणं च तहा।237। जं कीरइ परिरक्खा णिच्चं  मरण-भयभीरुजीवाणं। तं जाण अभयदाणं सिहामणिं सव्वदाणाणं।238। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अशन, पान, खाद्य और  स्वाद्य ये चार प्रकार का श्रेष्ठ आहार पूर्वोक्त नवधा भक्ति से तीन प्रकार के  पात्र को देना चाहिए।234। अति, बालक, मूक (गूँगा), अंध, बधिर (बहिरा), देशांतरीय  (परदेशी) और रोगी दरिद्री जीवों को ‘करुणादान दे रहा हूँ’ ऐसा कहकर अर्थात् समझकर  यथायोग्य आहार आदि देना चाहिए।235। उपवास, व्याधि, परिश्रम और क्लेश से परिपीड़ित  जीव को जानकर अर्थात् देखकर शरीर के योग्य पथ्यरूप औषधदान भी देना चाहिए।236।  जो आगम-शास्त्र लिखाकर यथायोग्य पात्रों को दिये जाते हैं, उसे शास्त्रदान  जानना चाहिए तथा जिनवचनों का अध्यापन कराना पढ़ाना भी शास्त्रदान है।237। मरण से  भयभीत जीवों का जो नित्य परिरक्षण किया जाता है, वह सब दानों का शिखामणिरूप  अभयदान जानना चाहिए।238।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/43/6   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दयादत्तिरनुकंपयाऽनुग्राह्येभ्य: प्राणिभ्यस्त्रिशुद्धिभिरभयदानं।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस पर  अनुग्रह करना आवश्यक है ऐसे दुखी प्राणियों को दयापूर्वक मन, वचन, काय की शुद्धता  से अभयदान देना दयादत्ति है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश/2/127/243/10   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयेन वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनपरिणामरूपमभयप्रदानं स्वकीयजीवस्य व्यवहारेण  प्राणरक्षारूपमभयप्रदानं परजीवानां।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;निश्चयनयकर वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन  परिणाम रूप जो निज भावों का अभयदान निज जीव की रक्षा और व्यवहार नयकर परप्राणियों  के प्राणों की रक्षारूप अभयदान यह स्वदया परदयास्वरूप अभयदान है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.5&amp;quot; id=&amp;quot;1.5&amp;quot;&amp;gt; सात्त्विक राजसादि दानों के लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आतिथेयं हितं यत्र यत्र पात्रपरीक्षणं। गुणा: श्रद्धादयो यत्र तद्दानं  सात्त्विकं विदु:। यदात्मवर्णनप्रायं क्षणिकाहार्यविभ्रमं। परप्रत्ययसंभूतं दानं  तद्राजसं मतं। पात्रापात्रसमावेक्षमसत्कारमसंस्तुतं। दासभृत्यकृतोद्योगं दानं  तामसमूचिरे। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस दान में अतिथि का कल्याण हो, जिसमें पात्र की परीक्षा वा  निरीक्षण स्वयं किया गया हो और जिसमें श्रद्धादि समस्त गुण हों उसे सात्त्विक  दान कहते हैं। जो दान केवल अपने यश के लिए किया गया हो, जो थोड़े समय के लिए ही  सुंदर और चकित करने वाला हो और दूसरे से दिलाया गया हो उसको राजस दान कहते हैं।  जिसमें पात्र अपात्र का कुछ ख्याल न किया गया हो, अतिथि का सत्कार न किया गया  हो, जो निंद्य हो और जिसके सब उद्योग दास और सेवकों से कराये गये हों, ऐसे दान  को तामसदान कहते हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.6&amp;quot; id=&amp;quot;1.6&amp;quot;&amp;gt; सात्त्विकादि दानों में परस्पर तरतमता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/47   &amp;lt;/span&amp;gt;में उद्धृत–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;उत्तमं सात्त्विकं दानं मध्यमं राजसं भवेत् । दानानामेव सर्वेषां  जघन्यं तामसं पुन:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सात्त्विक दान उत्तम है राजस मध्यम है, और सब दानों में  तामस दान जघन्य है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;1.7&amp;quot; id=&amp;quot;1.7&amp;quot;&amp;gt; तिर्यंचों के लिए भी दान देना संभव है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 7/2,2,16/123/4   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;कधं तिरिक्खेसु दाणस्स संभवो। ण, तिरिक्खसंजदासंजदाणं सचित्तभंजणे गहिदपच्चक्खाणं  सल्लइपल्लवादिं देंततिरिक्खाणं तदविरोधादो।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–तिर्यंचों में दान  देना कैसे संभव हो सकता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–नहीं, क्योंकि जो तिर्यंच संयतासंयत  जीव सचित्त भोजन के प्रत्याख्यान अर्थात् व्रत को ग्रहण कर लेते हैं उनके लिए  सल्लकी के पत्तों आदि का दान करने वाले तिर्यंचों के दान देना मान लेने में कोई  विरोध नहीं आता।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2&amp;quot; id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt; क्षायिक दान निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.1&amp;quot; id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt;क्षायिक दान का लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/2/4/154/4   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दानांतरायस्यात्यंतक्षयादनंतप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदानम् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दानांतरायकर्म  के अत्यंत क्षय से अनंत प्राणियों के समुदाय का उपकार करने वाला क्षायिक अभयदान  होता है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/2/4/2/105/28 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.2&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt; क्षायिक दान संबंधी शंका समाधान&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; धवला 14/5,6,18/17/1   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;अरहंता खीणदाणंताराइया सव्वेसिं जीवाणमिच्छिदत्थे किण्ण देंति। ण, तेसिं जीवाणं  लाहंतराइयभावादो। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–अरिहंतों के दानांतराय का तो क्षय हो गया  है, फिर वे सब जीवों को इच्छित अर्थ क्यों नहीं देते ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–नहीं, क्योंकि  उन जीवों के लाभांतराय कर्म का सद्भाव पाया जाता है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;2.3&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt; सिद्धों में क्षायिक दान क्या&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;strong&amp;gt;है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/2/4/155/1   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यदि क्षायिकदानादिभावकृतमभयदानादि, सिद्धेष्वपि तत्प्रसंग: नैष दोष:,  शरीरनामतीर्थंकरनामकर्मोदयाद्यपेक्षत्वात् । तेषां तदभावे तदप्रसंग:। कथ तर्हि  तेषां सिद्धेषु वृत्ति:। परमानंदाव्याबाधरूपेणैव तेषां तत्र वृत्ति:।  केवलज्ञानरूपेणानंतवीर्यवृत्तिवत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–यदि क्षायिक दानादि भावों  के निमित्त से अभय दानादि कार्य होते हैं तो सिद्धों में भी उनका प्रसंग प्राप्त  होता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–यह कोई दोष नहीं, क्योंकि इन अभयदानादि के होने में शरीर  नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म के उदय की अपेक्षा रहती है। परंतु सिद्धों के  शरीरनामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं होते अत: उनके अभयदानादि नहीं प्राप्त होते। &amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–तो सिद्धों में क्षायिक दानादि भावों का सद्भाव कैसे माना जाय ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–जिस  प्रकार सिद्धों के केवलज्ञान रूप से अनंत वीर्य का सद्भाव माना गया है उसी  प्रकार परमानंद के अव्याबाध रूप से ही उनका सिद्धों के सद्भाव है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3&amp;quot; id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थों के लिए दान-धर्म की प्रधानता&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.1&amp;quot; id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;सद्पात्र को दान देना ही गृहस्थ का धर्म है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./11  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेणविणा।...।11। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सुपात्र में चार प्रकार का  दान देना और श्री देवशास्त्र गुरु की पूजा करना श्रावक का मुख्य धर्म है। नित्य  इन दोनों को जो अपना मुख्य कर्तव्य मानकर पालन करता है वही श्रावक है, धर्मात्मा  व सम्यग्दृष्टि है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./13) (पं.वि./7/7)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111/4/231/14   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थानामाहारदानादिकमेव परमोधर्म:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थों के तो आहार दानादिक ही बड़े  धर्म हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;32&amp;quot; id=&amp;quot;32&amp;quot;&amp;gt;दान देकर खाना ही योग्य है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./22  &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;जो मूणिभुत्तावसेसं भुंजइसी भुंजए जिणवद्दिट्ठं। संसारसारसोक्खं कमसो णिव्वाणवरसोक्खं। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो भव्य जीव मुनीश्वरों को आहारदान देने के पश्चात् अवशेष अन्न को प्रसाद  समझकर सेवन करता है वह संसार के सारभूत उत्तम सुखों को प्राप्त होता है और क्रम  से मोक्ष सुख को प्राप्त होता है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/12-13 &amp;lt;/span&amp;gt;...&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;लच्छी  दिज्जउ दाणे दया-पहाणेण। जा जल-तरंग-चवला दो तिण्णि दिणाइ चिट्ठेइ।12। जो पुण  लच्छिं संचदि ण य...देदि पत्तेसु। सो अप्पाणं वंचदि मणुयत्तं णिप्फलं तस्स।13। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;यह  लक्ष्मी पानी में उठने वाली लहरों के समान चंचल है, दो, तीन दिन ठहरने वाली है तब  इसे...दयालु होकर दान दो।12। जो मनुष्य लक्ष्मी का केवल संचय करता है...न उसे  जघन्य, मध्यम अथवा उत्तम पात्रों में दान देता है, वह अपनी आत्मा को ठगता है,  और उसका मनुष्य पर्याय में जन्म लेना वृथा है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.3&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt; दान दिये बिना खाना योग्य नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        कुरल/9/2  &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;यदि देवाद् गृहे वासो देवस्यातिथिरूपिण:। पीयूषस्यापि पानं हि तं विना नैव  शोभते।2।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जब घर में अतिथि हो तब चाहे अमृत ही क्यों न हो, अकेले नहीं पीना  चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        क्रिया  कोष/1986 &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जानौ गृद्ध समान ताके सुतदारादिका। जो नहीं करे सुदान ताके धन आमिष समा।1986। =जो दान नहीं करता है उसका धन मांस के समान है, और उसे खाने वाले पुत्र, स्त्री  आदिक गिद्ध मंडली के समान हैं।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.4&amp;quot; id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt; दान देने से ही जीवन व धन सफल है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/14/19-20   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;जो संचिऊण लच्छिं धरणियले संठवेदि अइदूरे। सो पुरिसो तं लच्छिं पाहाण-सामाणियं  कुणदि।14। जो वड्ढमाण-लच्छिं अणवरयं देदि धम्म-कज्जेसु। सो पंडिएहि थुव्वदि  तस्स वि सयला हवे लच्छी।19। एवं जो जाणित्ता विहलिय-लोयाण धम्मजुत्ताणं।  णिरवेक्खो तं देदि हु तस्स हवे जीवियं सहलं।20। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मनुष्य लक्ष्मी का संचय  करके पृथिवी के गहरे तल में उसे गाड़ देता है, वह मनुष्य उस लक्ष्मी को पत्थर  के समान कर देता है।14। जो मनुष्य अपनी बढ़ती हुई लक्ष्मी को सर्वदा धर्म के  कामों में देता है, उसकी लक्ष्मी सदा सफल है और पंडित जन भी उसकी प्रशंसा करते  हैं।19। इस प्रकार लक्ष्मी को अनित्य जानकर जो उसे निर्धन धर्मात्मा व्यक्तियों  को देता है और बदले में प्रत्युपकार की वांछा नहीं करता, उसी का जीवन सफल है।20। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;3.5&amp;quot; id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt; दान को परम धर्म कहने का कारण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/13 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नानागृहव्यतिकरार्जितपापपुंजै: खंजीकृतानि  गृहिणो न तथा व्रतानि। उच्चै: फलं विदधतीह यथैकदापि प्रीत्याति शुद्धमनसा  कृतपात्रदानम् ।13।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;लोक में अत्यंत विशुद्ध मन वाले गृहस्थ से द्वारा प्रीति  पूर्वक पात्र के लिए एक बार भी किया गया दान जैसे उन्नत फल को करता है वैसे फल को  गृह की अनेक झंझटों से उत्पन्न हुए पाप समूहों के द्वारा कुबड़े अर्थात्  शक्तिहीन किये गये गृहस्थ के व्रत नहीं करते हैं।13।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111,4/231/15  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कस्मात् स एव परमो धर्म  इति चेत्, निरंतरविषयकषायाधीनतया आर्तरौद्रध्यानरतानां निश्चयरत्नत्रयलक्षणस्य  शुद्धोपयोगपरमधर्मस्यावकाशो नास्तीति।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–श्रावकों का दानादिक ही परम धर्म  कैसे है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–वह ऐसे है, कि ये गृहस्थ लोग हमेशा विषय कषाय के अधीन हैं, इससे  इनके आर्त, रौद्र ध्यान उत्पन्न होते रहते हैं, इस कारण निश्चय रत्नत्रयरूप  शुद्धोपयोग परमधर्म का तो इनके ठिकाना ही नहीं है। अर्थात् अवकाश ही नहीं है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4&amp;quot; id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt; दान का महत्त्व व फल&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.1&amp;quot; id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;पात्र दान  सामान्य का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/16-21  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;दिण्णइ सुपत्तदाणं विससतो होइ भोगसग्ग  मही। णिव्वाणसुहं कमसो णिद्दिट्ठं जिणवरिंदेहिं।16। खेत्तविसमे काले वविय सुवीयं  फलं जहा विउलं। होइ तहा तं जाणइ पत्तविसेसेसु दाणफलं।17। इस णियसुवित्तवीयं जो ववइ  जिणुत्त सत्तखेत्तेसु। सो तिहुवणरज्जफलं भुंजदि कल्लाणपंचफलं।18।  मादुपिदुपुत्तमित्तं कलत्त-धणधण्णवत्थु वाहणविसयं। संसारसारसोक्खं जाणउ  सुपत्तदाणफलं।19। सत्तंगरज्ज णवणिहिभंडार सडंगवलचउद्दहरणयं। छण्णवदिसहसिच्छिविहउ  जाणउ सुपत्तदाणफलं।20। सुकलसुरूवसुलक्खण सुमइ सुसिक्खा सुसील सुगुण चारित्तं।  सुहलेसं सुहणामं सुहसादं सुपत्तदाणफलं।21। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सुपात्र को दान प्रदान करने से भोगभूमि  तथा स्वर्ग के सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति होती है। और अनुक्रम से मोक्ष सुख की  प्राप्ति होती है।16। जो मनुष्य उत्तम खेत में अच्छे बीज को बोता है तो उसका फल  मनवांछित पूर्ण रूप से प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्तम पात्र में विधिपूर्वक  दान देने से सर्वोत्कृष्ट सुख की प्राप्ति होती है।17। जो भव्यात्मा अपने  द्रव्य को सात क्षेत्रों में विभाजित करता है वह पंचकल्याण से सुशोभित त्रिभुवन  के राज्यसुख को प्राप्त होता है।18। माता, पिता, पुत्र, स्त्री, मित्र आदि  कुटुंब परिवार का सुख और धन-धान्य, वस्त्र-अलंकार, हाथी, रथ, महल तथा  महाविभूति आदि का सुख एक सुपात्र दान का फल है।19। सात प्रकार राज्य के अंग, नवविधि,  चौदह रत्न, माल खजाना, गाय, हाथी, घोड़े, सात प्रकार की सेना, षट्खंड का राज्य  और छयानवे हजार रानी से सर्व सुपात्र दान का ही फल है।20। उत्तम कुल, सुंदर स्वरूप,  शुभ लक्षण, श्रेष्ठ बुद्धि, उत्तम निर्दोष शिक्षा, उत्तमशील, उत्तम उत्कृष्ट  गुण, अच्छा सम्यक्चारित्र, उत्तम शुभ लेश्या, शुभ नाम और समस्त प्रकार के  भोगोपभोग की सामग्री आदि सर्व सुख के साधन सुपात्र दान के फल से प्राप्त होते हैं।21।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./115-116 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;उच्चैर्गोत्रं प्रणतेर्भोगो  दानादुपासनात्पूजा। भक्ते: सुंदररूपं स्तवनात्कीर्तिस्तपोनिधिषु।115।  क्षितिगतमिववटवीजं पात्रगतं दानमल्पमति काले। फलति च्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृतां।116। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;तपस्वी मुनियों को नमस्कार करने से उच्चगोत्र, दान देने से भोग, उपासना करने  से प्रतिष्ठा, भक्ति करने से सुंदर रूप और स्तवन करने से कीर्ति होती है।115।  जीवों को पात्र में गया हुआ थोड़ा-सा भी दान समय पर पृथ्वी में प्राप्त हुए वट  बीज के छाया विभव वाले वृक्ष की तरह मनोवांछित बहुत फल को फलता है।116। &amp;lt;/span&amp;gt;(पं.वि./2/8-11)        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पुरुषार्थ-सिद्ध्युपाय/174  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कृतमात्मार्थं मुनये ददाति भक्तमिति  भावितस्त्याग:। अरतिविषादविमुक्त: शिथिलितलोभो भवत्यहिंसैव।174। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस अतिथि  संविभाग व्रत में द्रव्य अहिंसा तो परजीवों का दु:ख दूर करने के निमित्त प्रत्यक्ष  ही है, रहीं भावित अहिंसा वह भी लोभ कषाय के त्याग की अपेक्षा समझनी चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/15-44&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; प्राय: कुतो गृहगते परमात्मबोध:  शुद्धात्मनो भुवि यत: पुरुषार्थसिद्धि:। दानात्पुनर्ननु चतुर्विधत: करस्था सा  लीलयैव कृतपात्रजनानुषंगात् ।15। किं ते गुणा: किमिह तत्सुखमस्ति लोके सा किं  विभूतिरथ या न वशं प्रयाति। दानव्रतादिजनितो यदि मानवस्य धर्मो जगत्त्रयवशीकरणैकमंत्रा:।19।  सौभाग्यशौर्यसुखरूपविवेकिताद्या विद्यावपुर्धनगृहाणि कुले च जन्म। संपद्यतेऽखिलमिदं  किल पात्रदानात् तस्मात् किमत्र सततं क्रियते न यत्न:।44। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जगत् में जिस आत्मस्वरूप  के ज्ञान से शुद्ध आत्मा के पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, वह आत्मज्ञान गृह में  स्थित मनुष्यों के प्राय: कहाँ से होती है ? अर्थात् नहीं हो सकती ? किंतु वह  पुरुषार्थ की सिद्धि पात्रजनों में किये गये चार प्रकार के दान से अनायास ही हस्तगत  हो जाती है।15। यदि मनुष्य के पास तीनों लोकों को वशीभूत करने के लिए अद्वितीय  वशीकरण मंत्र के समान दान एवं व्रतादि से उत्पन्न हुआ धर्म विद्यमान है तो ऐसे  कौन से गुण है जो उसके वश में न हो सकें, तथा वह कौन-सी विभूति है जो उसके अधीन न  हो अर्थात् धर्मात्मा मनुष्य के लिए सब प्रकार के गुण, उत्तम सुख और अनुपम  विभूति भी स्वयमेव प्राप्त हो जाती है।19। सौभाग्य, शूरवीरता, सुख, सुंदरता,  विवेक, बुद्धि आदि विद्या, शरीर, धन और महल तथा उत्तम कुल में जन्म होना यह सब  निश्चय से पात्रदान के द्वारा ही प्राप्त होता है। फिर हे भव्य जन ! तुम इस  पात्रदान के विषय में क्यों नहीं यत्न करते हो।44। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.2&amp;quot; id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt; आहार दान का महत्त्व &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./114 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गृहकर्माणि निचितं कर्म विमार्ष्टि  खलु गृहविमुक्तानां। अतिथीनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते वारि।114।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे जल निश्चय  करके रुधिर को धो देता है, तैसे ही गृहरहित अतिथियों का प्रतिपूजन करना अर्थात्  नवधाभक्ति-पूर्वक आहारदान करना भी निश्चय करके गृहकार्यों से संचित हुए पाप को  नष्ट करता है।114। (पं.वि./7/13)        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/5/4  &amp;lt;/span&amp;gt;परनिंदाभयं यस्य विना दानं न भोजनम् ।  कृतिनस्तस्य निर्बीजो वंशो नैव कदाचन् ।4।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/33/2  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;इदं हि धर्मसर्वस्वं शास्तृणां वचने  द्वयम् । क्षुधार्तेन समं भुक्ति: प्राणिनां चैव रक्षणम् ।2। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो बुराई से डरता  है और भोजन करने से पहले दूसरों को दान देता है, उसका वंश कभी निर्बीज नहीं होता।4।  क्षुधाबाधितों के साथ अपनी रोटी बाँटकर खाना और हिंसा से दूर रहना, यह सब धर्म  उपदेष्टाओं के समस्त उपदेशों में श्रेष्ठम उपदेश है।2। &amp;lt;/span&amp;gt;(पं.वि./6/31)        पं.वि./7/8 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वो वांछति सौख्यमेव तनुभृत्तन्मोक्ष  एव स्फुटम् । दृष्टयादित्रय एव सिद्धयति स तंनिर्ग्रंथ एव स्थितम् । तद्वृत्तिर्वपुषोऽस्य  वृत्तिरशनात्तद्दीयते श्रावकै: काले क्लिष्टतरेऽपि मोक्षपदवी प्रायस्ततो  वर्तते।8। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;सब प्राणी सुख की इच्छा करते हैं, वह सुख स्पष्टतया मोक्ष में ही  है, वह मोक्ष सम्यग्दर्शनादि स्वरूप रत्नत्रय के होने पर ही सिद्ध होता है, वह  रत्नत्रय साधु के होता है, उक्त साधु की स्थिति शरीर के निमित्त से होती है, उस  शरीर की स्थिति भोजन के निमित्त से होती है, और वह भोजन श्रावकों के द्वारा दिया  जाता है। इस प्रकार इस अतिशय क्लेशयुक्त काल में भी मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति  प्राय: उन श्रावकों के निमित्त से ही हो रही है।8।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/363-364  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;भोयण दाणे दिण्णे तिण्णि वि  दाणाणि होंति दिण्णाणि। भुक्ख-तिसाए वाही दिणे दिणे होंति देहीणं।363। भोयण-बलेण  साहू सत्थं सेवेदि रत्तिदिवसं पि। भोयणदाणे दिण्णे पाणा वि य रक्खिया होंति।364।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भोजन दान देने पर तीनों दान दिये होते हैं। क्योंकि प्राणियों को भूख और प्यास  रूपी व्याधि प्रतिदिन होती है। भोजन के बल से ही साधु रात दिन शास्त्र का अभ्यास  करता है और भोजन दान देने पर प्राणों की भी रक्षा होती है।363-364। भावार्थ–आहार  दान देने से विद्या, धर्म, तप, ज्ञान, मोक्ष सभी नियम से दिया हुआ समझना चाहिए।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./11/25,30 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;केवलज्ञानतो ज्ञानं निर्वाणसुखत:  सुखम् । आहारदानतो दानं नोत्तमं विद्यते परम् ।25। बहुनात्र किमुक्तेन बिना  सकलवेदिना। फलं नाहारदानस्य पर: शक्नोति भाषितुम् ।31। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;केवलज्ञानतैं दूजा  उत्तम ज्ञान नहीं, और मोक्ष सु:खतै और दूजा सुख नहीं और आहारदानतै और दूजा उत्तम  दान नाहीं।25। जो किछु वस्तु तीन लोकविषै सुंदर देखिये है सो सर्व वस्तु अन्नदान  करता जो पुरुष ताकरि लीलामात्र करि शीघ्र पाइये है। (अमि.श्रा./11/14-41)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/ &amp;lt;/span&amp;gt;पृ.161 पर फुट नोट–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आहाराद्भोगवान् भवेत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आहार  दान से भोगोपभोग मिलता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.3&amp;quot; id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt; औषध व ज्ञान दान का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमि.श्रा./11/37-50 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आजन्म जायते यस्य न व्याधिस्तनुतापक:।  किं सुखं कथ्यते तस्य सिद्धस्येव महात्मन:।37। निधानमेष कांतीनां  कीर्त्तीनां कुलमंदिरम् । लावण्यानां नदीनाथो भैषज्यं येन दीयते।38। लभ्यते  केवलज्ञानं यतो विश्वावभासकम् । अपरज्ञानलाभेषु कीदृशी तस्य वर्णना।47। शास्त्रदायी  सतां पूज्य: सेवनीयो मनीषिणाम् । वादी वाग्मी कविर्मान्य: ख्यातशिक्ष:  प्रजायते।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जाकै जन्म तै लगाय शरीर को ताप उपजावनै वाला रोग न होय है तिस  सिद्धसमान महात्मा का सुख कहिये। भावार्थ–इहाँ सिद्ध समान कह्या सो जैसे  सिद्धनिकौं रोग नाहीं तैसे याकै भी रोग नाहीं, ऐसी समानता देखी उपमा दीनि है।37।  जा पुरुषकरि औषध दीजिये है सो यहु पुरुष कांति कहिये दीप्तिनिका तौ भंडार होय  है, और कीर्त्तिनिका कुल मंदिर होय है जामै यशकीर्त्ति सदा वसै है, बहुरि सुंदरतानिका  समुद्र होय है ऐसा जानना।38। जिस शास्त्रदान करि पवित्र मुक्ति दीजिये है ताकै  संसार की लक्ष्मी देते कहा श्रम है।46। शास्त्रकौ देने वाला पुरुष संतनिके  पूजनीक होय है अर पंडितनि के सेवनीक होय है, वादीनिके जीतने वाला होय है, सभा को  रंजायमान करने वाला वक्ता होय है, नवीन ग्रंथ रचने वाला कवि होय है अर मानने  योग्य होय है अर विख्यात है शिक्षा जाकी ऐसा होय है।50। &amp;lt;/span&amp;gt;पं.वि./7/9-10 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्वेच्छाहारविहारजल्पनतया नीरुग्वपुर्जायते।  साधूनां तु न सा ततस्तदपटु प्रायेण संभाव्यते। कुर्यादौषधपथ्यवारिभिरिदं  चारित्रभारक्षमं यत्तस्मादिह वर्तते प्रशमिनां धर्मो गृहस्थोत्तमात् ।9। व्याख्याता  पुस्तकदानमुन्नतधियां पाठाय भव्यात्मनां। भक्त्या यत्क्रियते श्रुताश्रयमिदं  दानं तदाहुर्बुधा:। सिद्धेऽस्मिन् जननांतरेषु कतिषु त्रैलोक्यलोकोत्सवश्रीकारिप्रकटीकृताखिलजगत्कैवल्यभाजो  जना:।10। &amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;शरीर इच्छानुसार भोजन, गमन और संभाषण से नीरोग रहता है। परंतु इस  प्रकार की इच्छानुसार प्रवृत्ति साधुओं के संभव नहीं है। इसलिए उनका शरीर  प्राय: अस्वस्थ हो जाता है। ऐसी अवस्था में चूँकि श्रावक उस शरीर को औषध पथ्य  भोजन और जल के द्वारा व्रतपरिपालन के योग्य करता है अतएव यहाँ उन मुनियों का धर्म  उत्तम श्रावक के निमित्त से ही चलता है।9। उन्नत बुद्धि के धारक भव्य जीवों को  जो भक्ति से पुस्तक का दान किया जाता है अथवा उनके लिए तत्त्व का व्याख्यान किया  जाता है, इसे विद्वद्जन श्रुतदान (ज्ञानदान) कहते हैं। इस ज्ञानदान के सिद्ध हो  जाने पर कुछ थोड़े से ही भवों में मनुष्य उस केवलज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं  जिसके द्वारा संपूर्ण विश्व साक्षात् देखा जाता है। तथा जिसके प्रगट होने पर  तीनों लोकों के प्राणी उत्सव की शोभा करते हैं।10।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/ &amp;lt;/span&amp;gt;पृ.161 पर फुट नोट...। &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आरोग्यमौषधाज् ज्ञेयं  श्रुतात्स्यात् श्रुतकेवली। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;औषध दान से आरोग्य मिलता है तथा शास्त्रदान  अर्थात् (विद्यादान) देने से श्रुतकेवली होता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.4&amp;quot; id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt; अभयदान का महत्त्व&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        मू.आ./939 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;मरण भयभीरु आणं अभयं जो देदि सव्वजीवाणं।  तं दाणाणवि तं दाणं पुण जोगेसु मूलजोगंपि।939।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मरणभय से भयमुक्त सब जीवों को जो  अभय दान है वही दान सब दानों में उत्तम है और वह दान सब आचरणों में प्रधान आचरण  है।&amp;lt;/span&amp;gt;939।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; ज्ञानार्णव/8/54  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;किं न तप्तं तपस्तेन किं न दत्तं महात्मना।  वितीर्णमभयं येन प्रीतिमालंब्य देहिनाम् ।54।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस महापुरुष ने जीवों को  प्रीति का आश्रय देकर अभयदान दिया उस महात्मा ने कौन सा तप नहीं किया और कौन सा  दान नहीं दिया। अर्थात् उस महापुरुष ने समस्त तप, दान किया। क्योंकि अभयदान में  सब तप, दान आ जाते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      अमि.श्रा./13&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt; शरीरं ध्रियते येन शममेव महाव्रतम् ।  कस्तस्याभयदानस्य फलं शक्नोति भाषितुम् ।13। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस अभयदान करि जीवनिका शरीर  पोषिए है जैसे समभावकरि महाव्रत पोषिए तैसें सो, तिस अभयदान के फल कहने को कौन  समर्थ है।13। &amp;lt;/span&amp;gt;पं.वि./7/11 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वेषामभयं प्रवृद्धकरुणैर्यद्दीयते  प्राणिनां, दानं स्यादभयादि तेन रहितं दानत्रयं निष्फलम् । आहरौषधशास्त्रदानविधिभि:  क्षुद्रोगजाडयाद्भयं यत्तत्पात्रजने विनश्यति ततो दानं तदेकं परम् ।11।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयालुपुरुषों  के द्वारा जो सब प्राणियों को अभयदान दिया जाता है, वह अभयदान कहलाता है उससे रहित  तीन प्रकार दान व्यर्थ होता है। चूँकि आहार, औषध और शास्त्र के दान की विधि से  क्रम से क्षुधा, रोग और अज्ञानता का भय ही नष्ट होता है अतएव वह एक अभयदान ही  श्रेष्ठ है।11। भावार्थ–अभयदान का अर्थ प्राणियों के सर्व प्रकार के भय दूर करना  है, अत: आहारादि दान अभयदान के ही अंतर्गत आ जाते हैं।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.5&amp;quot; id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt; सत्पात्र को दान देना सम्यग्दृष्टि को मोक्ष का  कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमि.श्रा./11/102,123 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पात्राय विधिना दत्वा दानं मूत्वा  समाधिना। अच्युतांतेषु कल्पेषु जायंते शुद्धदृष्टय:।102। निषेव्य लक्ष्मीमिति  शर्मकारिणीं प्रथीयसीं द्वित्रिभवेषु कल्मषम् । प्रदह्यते ध्यानकृशानुनाखिलं  श्रयंति सिद्धि विधुतापदं सदा।123। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पात्र के अर्थि दान देकरि समाधि सहित मरकैं  सम्यग्दृष्टि जीव हैं ते अच्युतपर्यंत स्वर्गनिविषैं उपजैं हैं।102। (अमि.श्रा./102)  या प्रकार सुख की करने वाली महान् लक्ष्मी कौं भोग के दोय तीन भवनिविषैं समस्त  कर्मनिकौं ध्यान अग्निकरि जराय के ते जीव आपदारहित मोक्ष अवस्थाकौं सदा सेवै  हैं।123। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; परमात्मप्रकाश टीका/2/111-4/231/15 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      वसु./श्रा./249-269 &amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;बद्धाउगा सुदिट्ठी अणुमोयणेण  तिरिया वि। णियमेणुववज्जंति य ते उत्तमभागभूमीसु।249। जे पुण सम्माइट्ठी  विरयाविरया वि तिविहपत्तस्स। जायंति दाणफलओ कप्पेसु महडि्ढया देवा।265।  पडिबुद्धिऊण चइऊण णिवसिरिं संजमं च घित्तूण। उप्पाइऊण णाणं केई गच्छंति णिव्वाणं।268।  अण्णे उ सुदेवत्तं सुमाणुसत्तं पुणो पुणो लहिऊण। सत्तट्ठमवेहि तओ तरंति कम्मक्खयं  णियमा।269।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;बद्धायुष्क सम्यग्दृष्टि अर्थात् जिसने मिथ्यात्व अवस्था में  पहिले मनुष्यायु को बाँध लिया है, और पीछे सम्यग्दर्शन उत्पन्न किया है, ऐसे  मनुष्य पात्रदान देने से और उक्त प्रकार के ही तिर्यंच पात्र दान को अनुमोदना  करने से नियम से वे उत्तम भोगभूमियों में उत्पन्न होते हैं।249। =जो अविरत सम्यग्दृष्टि  और देशसंयत जीव हैं, वे तीनों प्रकार के पात्रों का दान देने के फल से स्वर्गों  में महर्द्धिक देव होते हैं।265। (उक्त प्रकार के सभी जीव मनुष्यों में आकर  चक्रवर्ती आदि होते हैं।) तब कोई वैराग्य का कारण देखकर प्रतिबुद्ध हो, राज्यलक्ष्मी  को छोड़कर और संयम को ग्रहण कर कितने ही केवलज्ञान को उत्पन्न कर निर्वाण को  प्राप्त होते हैं। और कितने ही जीव सुदेवत्व और सुमानुषत्व को पुन: पुन: प्राप्त  कर सात आठ भव में नियम से कर्मक्षय को करते हैं (268-269)। &amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.6&amp;quot; id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt; सत्पात्र  दान मिथ्यादृष्टि को सुभोगभूमि का कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण/9/85  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;दानाद् दानानुमोदाद्वा यत्र  पात्रसमाश्रितात् । प्राणिन: सुखमेधंते यावज्जीवमनामया:।85। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;उत्तम पात्र के  लिए दान देने अथवा उनके लिए दिये हुए दान की अनुमोदना से जीव जिस भोगभूमि में  उत्पन्न होते हैं उसमें जीवन पर्यंत निरोग रहकर सुख से बढ़ते रहते हैं।85।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./62 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;पात्रेभ्यो य: प्रकृष्टेभ्यो मिथ्यादृष्टि:  प्रयच्छति। स याति भोगभूमीषु प्रकृष्टासु महोदय:।62। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मिथ्यादृष्टि उत्कृष्ट  पात्रनि के अर्थि दान देय है सो महान् है उदय जाका ऐसा उत्कृष्ट भोग भूमि कौ  जाय है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/245 &amp;lt;/span&amp;gt;)&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/246-247  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;जा मज्झिमम्मि पत्तम्मि देइ दाणं  खु वामदिट्ठी वि। सो मज्झिमासु जीवो उप्पज्जइ भोयभूमीसु।246। जो पुण जहण्णपत्तम्मि  देइ दाणं तहाविहो विणरो। जायइ फलेण जहण्णसु भोयभूमीसु सो जीवो।247। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अर जो मिथ्यादृष्टि  भी पुरुष मध्यम पात्र में दान देता है वह जीव मध्यम भोगभूमि में उत्पन्न होता  है।246। और जो जीव तथाविध अर्थात् उक्त प्रकार का मिथ्यादृष्टि भी मनुष्य जघन्य  पात्र में दान को देता है, वह जीव उस दान के फल से जघन्य भोगभूमियों में उत्पन्न  होता है।247। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.7&amp;quot; id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt; कुपात्र दान कुभोग भूमि का कारण है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/256 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt; छद्मत्थविहिदवत्थुसु वदणियमज्झयणझाणदाणरदो।  ण लहदि अपुणब्भावं भावं सादप्पगं लहदि।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो जीव छद्मस्थ विहित वस्तुओं (देव,  गुरु धर्मादिक में) व्रत-नियम-अध्ययन-ध्यान-दान में रत होता है वह मोक्ष को  प्राप्त नहीं होता, (किंतु) सातात्मक भाव को प्राप्त होता है।&amp;lt;/span&amp;gt;256।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/7/115   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रदानतो भूत्वा तिर्यंचो भोगभूमिषु। संभुंजतेऽंतरं  द्वीपं कुमानुषकुलेषु वा।115।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र दान के प्रभाव से मनुष्य, भोगभूमियों में  तिर्यंच होते हैं अथवा कुमानुष कुलों में उत्पन्न होकर अंतर द्वीपों का उपभोग  करते हैं।115।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      अमि.श्रा./84-88 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रदानतो याति कुत्सितां  भोगमेदिनीम् । उप्ते क: कुत्सिते क्षेत्रे सुक्षेत्रफलमश्नुते।84। येऽंतरद्वीपजा:  संति ये नरा म्लेच्छखंडजा:। कुपात्रदानत: सर्वे ते भवंति यथायथम् ।85। वर्यमध्यजघन्यासु  तिर्यंच: संति भूमिषु। कुपात्रदानवृक्षोत्थं भुंजते तेऽखिला: फलम् ।86।  दासीदासद्विपम्लेच्छसारमेयाददोऽत्र ये। कुपात्रदानतो भोगस्तेषां भोगवतां स्फुटम्  ।87। दृश्यंते नीचजातीनां ये भोगा भोगिनामिह। सर्वे कुपात्रदानेन ते दीयंते  महोदया:।88।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र के दानतै जीव कुभोगभूमिकौं प्राप्त होय है, इहां दृष्टांत  कहै है–खोटा क्षेत्रविषै बीज बोये संते सुक्षेत्र के फलकौं कौन प्राप्त होय, अपितु  कोई न होय है।84। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/248 &amp;lt;/span&amp;gt;)। जे अंतरद्वीप लवण समुद्रविषैं वा कालोद  समुद्र विषैं छयानवैं कुभोग भूमि के टापू परे हैं, तिनविषै उपजे मनुष्य हैं अर म्लेच्छ  खंड विषैं उपजै मनुष्य हैं ते सर्व कुपात्र दानतैं यथायोग होय हैं।85। उत्तम,  मध्यम, जघन्य भोगभूमिन विषैं जे तिर्यंच हैं ते सर्व कुपात्र दान रूप वृक्षतैं  उपज्या जो फल ताहि खाय हैं।86। इहां आर्य खंड में जो दासी, दास, हाथी, म्लेच्छ,  कुत्ता आदि भोगवंत जीव हैं तिनको जो भोगै सो प्रगटपने कुपात्र दानतै हैं, ऐसा  जानना।87। इहां आर्य खंड विषै नीच जाति के भोगी जीवनिके जे भोग महाउदय रूप  देखिये है ते सर्व कुपात्र दान करि दीजिये हैं।88। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.8&amp;quot; id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt; अपात्र दान का फल अत्यंत अनिष्ट है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/257  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;अविदिदपरमत्थेसु य विसयकसायाधिगेसु  पुरिसेसु। जुट्ठं कदं व दत्तं फलदि कुदेवेसु मणुवेसु।257। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिन्होंने परमार्थ को  नहीं जाना है, और जो विषय कषाय में अधिक है, ऐसे पुरुषों के प्रति सेवा, उपकार या  दान कुदेवरूप में और कुमानुष रूप में फलता है।257।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण/7/118  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;अंबु निंबद्रुमे रौद्रं कोद्रवे  मदकृद् यथा। विषं व्यालमुखे क्षीरमपात्रे पतितं तथा।118। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस प्रकार नीम के  वृक्ष में पड़ा हुआ पानी कडुवा हो जाता है, कोदों में दिया पानी मदकारक हो जाता  है, और सर्प के मुख में पड़ा दूध विष हो जाता है, उसी प्रकार अपात्र के लिये दिया  हुआ दान विपरीत फल को करने वाला हो जाता है।118। (अमि.श्रा./89-99) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/243 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/242  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritGatha&amp;quot;&amp;gt;जह उसरम्मि खित्ते पइण्णबीयं ण किं पि  रुहेइ। फला वज्जियं वियाणइ अपत्तदिण्णं तहा दाणं।242। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जिस प्रकार ऊसर खेत में  बोया गया बीज कुछ भी नहीं उगता है, उसी प्रकार अपात्र में दिया गया दान भी फल रहित  जानना चाहिए।242। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.9&amp;quot; id=&amp;quot;4.9&amp;quot;&amp;gt; विधि, द्रव्य, दाता व पात्र के कारण दान के फल  में विशेषता आ जाती है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; तत्त्वार्थसूत्र/7/39  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेष:।39। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;विधि, देयवस्तु, दाता और पात्र की विशेषता से दान की विशेषता है।39।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/9/7  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;आतिथ्यपूर्णमाहात्म्यवर्णने न क्षमा  वयम् । दातृपात्रविधिद्रव्यैस्तस्मिन्नस्ति विशेषता।7।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;हम किसी अतिथि सेवा के  माहात्म्य का वर्णन नहीं कर सकते कि उसमें कितना पुण्य है। अतिथि यज्ञ का  महत्त्व तो अतिथि की योग्यता पर निर्भर है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/255  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;रागो पसत्थभूदो वत्थुविसेसेण फलदि  विवरीदं। णाणाभूमिगदाणिह बीजाणिव सस्सकालम्हि।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे इस जगत् में अनेक प्रकार की  भूमियों में पड़े हुए बीज धान्य काल में विपरीततया फलित होते हैं, उसी प्रकार  प्रशस्तभूत राग वस्तु भेद से (पात्र भेद से) विपरीततया फलता है।255।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सर्वार्थसिद्धि/7/39/373/5  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिग्रहादिक्रमो विधि:।  प्रतिग्रहादिष्वादरानादरकृतो भेद:। तप:स्वाध्यायपरिवृद्धिहेतुत्वादिर्द्रव्यविशेष:।  अनसूयाविषादादिर्दातृविशेष:। मोक्षकारणगुणसंयोग: पात्रविशेष:। ततश्च पुण्यफलविशेष:  क्षित्यादिविशेषाद् बीजफलविशेषवत् । &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;प्रतिग्रह आदि करने का जो क्रम है वह विधि  है। ...प्रतिग्रह आदि में आदर और अनादर होने से जो भेद होता है वह विधि विशेष है।  जिससे तप और स्वाध्याय आदिकी वृद्धि होती है वह द्रव्य विशेष है। अनसूया और  विषाद आदि का न होना दाता की विशेषता है। तथा मोक्ष के कारणभूत गुणों से युक्त  रहना पात्र की विशेषता है। जैसे पृथिवी आदि में विशेषता होने से उससे उत्पन्न हुए  बीज में विशेषता आ जाती है वैसे ही विधि आदिक की विशेषता से दान से प्राप्त होने  वाले पुण्य फल में विशेषता आ जाती है। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; राजवार्तिक/7/39/1-6/559 &amp;lt;/span&amp;gt;) (अमि.श्रा./10/50)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/240-241 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;4.10&amp;quot; id=&amp;quot;4.10&amp;quot;&amp;gt; दान के प्रकृष्ट फल का कारण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रत्नकरंड श्रावकाचार/116 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; नन्वेवंविधं विशिष्टं फलं स्वल्पं  दानं कथं संपादयतीत्याशंकाऽपनोदार्थमाह–क्षितिगतमिव वटबीजं पात्रगतं दानमल्पमपि  काले। फलतिच्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृतां।116। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;प्रश्न&amp;lt;/strong&amp;gt;–स्वल्प मात्र दानतै  इतना विशिष्ट फल कैसे हो सकता है ? &amp;lt;strong&amp;gt;उत्तर&amp;lt;/strong&amp;gt;–जीवों को पात्र में गया हुआ अर्थात्  मुनि अर्जिका आदि के लिए दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान समय पर पृथ्वी में प्राप्त हुए  वट बीज के छाया विभव वाले वृक्ष की तरह मनोवांछित फल को फलता है।116। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वसुनंदी श्रावकाचार/240 &amp;lt;/span&amp;gt;)  (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/29/1 &amp;lt;/span&amp;gt;)।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      पं.वि./2/38 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;पुण्यक्षयात्क्षयमुपैति न दीयमाना  लक्ष्मीरत: कुरुत संततपात्रदानम् । कूपे न पश्यत जलं गृहिण: समंतादाकृष्यमाणमपि  वर्धत एव नित्यम् ।38।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;संपत्ति पुण्य के क्षय से क्षय को प्राप्त होती है, न  कि दान करने से। अतएव हे श्रावको ! आप निरंतर पात्र दान करें। क्या आप यह नहीं  देखते कि कुएँ से सब ओर से निकाला जाने वाला भी जल नित्य बढ़ता ही रहता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5&amp;quot; id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;विधि द्रव्य दातृ पात्र आदि निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.1&amp;quot; id=&amp;quot;5.1&amp;quot;&amp;gt;दान योग्य  द्रव्य&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; रयणसार/23-24  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;सीदुण्ह वाउविउलं सिलेसियं तह परीसमव्वाहिं।  कायकिलेसुव्वासं जाणिज्जे दिण्णए दाणं।23। हियमियमण्णपाणं णिरवज्जोसहिणिराउलं  ठाणं। सयणासणमुवयरणं जाणिज्जा देइ मोक्खरवो।24।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मुनिराज की प्रकृति, शीत, उष्ण,  वायु, श्लेष्म या पित्त रूप में से कौन सी है। कायोत्सर्ग वा गमनागमन से कितना  परिश्रम हुआ है, शरीर में ज्वरादि पीड़ा तो नहीं है। उपवास से कंठ शुष्क तो  नहीं है इत्यादि बातों का विचार करके उसके उपचार स्वरूप दान देना चाहिए।23।  हित-मित प्रासुक शुद्ध अन्न, पान, निर्दोष हितकारी ओषधि, निराकुल स्थान, शयनोपकरण,  आसनोपकरण, शास्त्रोपकरण आदि दान योग्य वस्तुओं को आवश्यकता के अनुसार सुपात्र  में देता है वह मोक्षमार्ग में अग्रगामी होता है।24।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पुरुषार्थ-सिद्ध्युपाय/170 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt; रागद्वेषासंयममददु:खभयादिकं न यत्कुरुते।  द्रव्यं तदेव देयं सुतप:स्वाध्यायवृद्धिकरम् ।170। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दान देने योग्य पदार्थ  जिन वस्तुओं के देने से रागद्वेष, मान, दु:ख, भय आदिक पापों की उत्पत्ति होती है,  वह देने योग्य नहीं। जिन वस्तुओं के देने से तपश्चरण, पठन, पाठन स्वाध्यायादि  कार्यों में वृद्धि होती है, वही देने योग्य हैं।170। &amp;lt;/span&amp;gt;(अमि.श्रा./9/44) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/45 &amp;lt;/span&amp;gt;)।        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; चारित्रसार/28/3  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दीयमानेऽन्नादौ प्रतिगृहीतुस्तप:स्वाध्यायपरिवृद्धिकरणत्वाद्द्रव्यविशेष:।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;भिक्षा में जो अन्न दिया जाता है वह यदि आहार लेने वाले साधु के तपश्चरण स्वाध्याय  आदि को बढ़ाने वाला हो तो वही द्रव्य की विशेषता कहलाती है।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.2&amp;quot; id=&amp;quot;5.2&amp;quot;&amp;gt;दान प्रति उपकार की भावना से निरपेक्ष देना चाहिए&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कार्तिकेयानुप्रेक्षा/20  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;PrakritText&amp;quot;&amp;gt;एवं जो जाणित्ता विहलिय-लोयाण धम्मजुत्ताणं।  णिरवेक्खो तं देदि हु तस्स हवे जीवियं सहलं।20।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;इस प्रकार लक्ष्मी को अनित्य  जानकर जो उसे निर्धन धर्मात्मा व्यक्तियों को देता है और उसके बदले में उससे  प्रत्युपकार की वांछा नहीं करता, उसी का जीवन सफल है।20।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.3&amp;quot; id=&amp;quot;5.3&amp;quot;&amp;gt; गाय आदि का दान योग्य नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/50 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;नान्यानि गोकनकभूमिरथांगनादिदानादि  निश्चितमवद्यकराणि यस्मात् ।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;आहारादि चतुर्विध दान से अतिरिक्त गाय, सुवर्ण,  पृथिवी, रथ और स्त्री आदि के दान, महान् फल को देने वाले नहीं हैं।50।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/53  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;हिंसार्थत्वान्न भूगेह-लोहगोऽश्वादिनैष्ठिक:।  न दद्याद् ग्रहसंक्रांति-श्राद्धदौ वा सुदृग्द्रुहि।53। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;नैष्ठिक श्रावक  प्राणियों की हिंसा के निमित्त होने से भूमि, शस्त्र, गौ, बैल, घोड़ा वगैरह हैं  आदि में जिनके ऐसे कन्या, सुवर्ण और अन्न आदि पदार्थों को दान नहीं देवे। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/9/46-59 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.4&amp;quot; id=&amp;quot;5.4&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादृष्टि को दान देने का निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; दर्शनपाहुड़/ &amp;lt;/span&amp;gt;टी./2/3/1 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दर्शनहीन: ...तस्यान्नदानाक्षिकमपि  न देयं। उक्तं च–मिथ्यादृग्भ्यो ददद्दानं दाता मिथ्यात्ववर्धक:। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यादृष्टि  को अन्नादिक दान भी नहीं देना चाहिए। कहा भी है–मिथ्यादृष्टि को दिया गया दान  दाता को मिथ्यात्व का बढ़ाने वाला है।&amp;lt;/span&amp;gt; अमि.श्रा./50&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; तद्येनाष्टपदं यस्य दीयते हितकाभ्यया।  स तस्याष्टापदं मन्ये दत्ते जीवितशांतये।50।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जैसे कोऊ जीवने के अर्थ काहूकौ  अष्टापद हिंसक जीवकौं देय तो ताका मरन ही होय है तैसैं धर्म के अर्थ मिथ्यादृष्टीनकौ  दिया जो सुवर्ण तातैं हिंसादिक होने तैं परके वा आपके पाप ही होय है ऐसा जानना।50।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/2/64/149  &amp;lt;/span&amp;gt;फुट नोट–&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मिथ्यात्वग्रस्तचित्तेसु  चारित्राभासभागिषु। दोषायैव भवेद्दानं पय:पानमिवाहिषु।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;चारित्राभास को धारण करने  वाले मिथ्यादृष्टियों को दान देना सर्प को दूध पिलाने के समान केवल अशुभ के लिए  ही होता है। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.5&amp;quot; id=&amp;quot;5.5&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र व अपात्र को करुणा बुद्धि से दान दिया  जाता है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/730  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथोचितम्  । पात्रबुद्धया निषिद्धं स्यान्निषिद्धं न कृपाधिया।730। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कुपात्र के लिए और  अपात्र के लिए भी यथायोग्य दान देना चाहिए क्योंकि कुपात्र तथा अपात्र के लिए  केवल पात्र बुद्धि से दान देना निषिद्ध है, करुणा बुद्धि से दान देना निषिद्ध नहीं  है।730। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/3/161 &amp;lt;/span&amp;gt;) (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/6/225 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.6&amp;quot; id=&amp;quot;5.6&amp;quot;&amp;gt; दुखित भुखित को भी करुणाबुद्धि से दान दिया जाता  है&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी x` 30/731  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;शेषेभ्य: क्षुत्पिपासादिपीडितेभ्योऽशुभोदयात्  । दीनेभ्योऽभयदानादि दातव्यं करुणार्णवै:।731। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;दयालु श्रावकों को अशुभ कर्म के  उदय से क्षुधा, तृषा, आदि से दुखी शेष दीन प्राणियों के लिए भी अभय दानादिक देना  चाहिए।731। (&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; लाटी संहिता/3/162 &amp;lt;/span&amp;gt;)। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;5.7&amp;quot; id=&amp;quot;5.7&amp;quot;&amp;gt;ग्रहण व संक्रांति आदि के कारण दान देना योग्य  नहीं&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        अमि.श्रा./60-61 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;य: संक्रांतौ ग्रहणे वारे वित्तं  ददाति मूढमति:। सम्यक्त्ववनं छित्त्वा मिथ्यात्ववनं वपत्येष:।60। ये ददते  मृततृप्त्यै बहुधादानानि नूनमस्तधिय:। पल्लवयितं तरुं ते भस्मीभूतं निषिंचंति।61। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो मूढबुद्धि पुरुष संक्रांतिविषैं आदित्यवारादि (ग्रहण) वार विषैं धन को देय  है सो सम्यक्त्व वन को छेदिकै मिथ्यात्व वन को बोवै है।60। जे निर्बुद्धि  पुरुष मरे जीव की तृप्तिके अर्थ बहुत प्रकार दान देय है ते निश्चयकरि अग्निकरि  भस्मरूप वृक्षकौं पत्र सहित करनेकौं सींचै है।61।&amp;lt;/span&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/5/53  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;हिंसार्थत्वान्न भूगेह-लोहगोऽश्वादिनैष्ठिक:।  न दद्याद् ग्रहसंक्रांति-श्राद्धादौ वा सुदृग्द्रुहि।53।&amp;lt;/span&amp;gt;= &amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;नैष्ठिक श्रावक  प्राणियों की हिंसा में निमित्त होने से भूमि आदि...को दान नहीं देवे। और जिनको  पर्व मानने से सम्यक्त्व का घात होता है ऐसे ग्रहण, संक्रांति, तथा श्राद्ध  वगैरह में अपने द्रव्य का दान नहीं देवे।53।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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  &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6&amp;quot; id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह का विधि निषेध&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;strong&amp;gt; &amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
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      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.1&amp;quot; id=&amp;quot;6.1&amp;quot;&amp;gt; दान के  लिए धन की इच्छा अज्ञान है&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; इष्टोपदेश/ &amp;lt;/span&amp;gt;मू./16 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;त्यागाय श्रेय से वित्तमवित्त: संचिनोति  य:। स्वशरीरं स पंकेन स्नास्यामीति विलिंपति।16।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;जो निर्धन मनुष्य  पात्रदान, देवपूजा आदि प्रशस्त कार्यों के लिए अपूर्व पुण्य प्राप्ति और पाप  विनाश की आशा से सेवा, कृषि और वाणिज्य आदि कार्यों के द्वारा धन उपार्जन करता है  वह मनुष्य अपने निर्मल शरीर में ‘नहा लूँगा’ इस आशा से कीचड़ लपेटता है।16। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.2&amp;quot; id=&amp;quot;6.2&amp;quot;&amp;gt; दान देने की अपेक्षा धन का ग्रहण ही न करे&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; आत्मानुशासन/102  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अर्थिम्यस्तृणवद्विचिंत्य विषयान्  कश्चिच्छ्रियं दत्तवान् पापं तामवितर्पिणी, विगणयन्नादात् परस्त्यक्तवान् ।  प्रागेव कुशलां विमृश्य सुभगोऽप्यन्यो न पर्यग्रहीत् एते ते  विदितोत्तरोत्तरवरा: सर्वोत्तमास्त्यागिन:।102। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;कोई विद्वान् मनुष्य विषयों  को तृण के समान तुच्छ समझकर लक्ष्मी को याचकों के लिऐ दे देता है, कोई पाप रूप  समझकर किसी को बिना दिये ही त्याग देता है। सर्वोत्तम वह है जो पहिले से ही अकल्याणकारी  जानकर ग्रहण नहीं करता।102। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.3&amp;quot; id=&amp;quot;6.3&amp;quot;&amp;gt; दानार्थ धन संग्रह की कथंचित् इष्टता&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; कुरल काव्य/23/6  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;आर्तक्षुधाविनाशाय नियमोऽयं शुभावह:।  कर्तव्यो धनिभिर्नित्यमालये वित्तसंग्रह:।6। &amp;lt;/span&amp;gt;=&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गरीबों के पेट की ज्वाला को शांत  करने का यही एक मार्ग है कि जिससे श्रीमानों को अपने पास विशेष करके धन संग्रह कर  रखना चाहिए।6। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
      &amp;lt;li&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong name=&amp;quot;6.4&amp;quot; id=&amp;quot;6.4&amp;quot;&amp;gt; आय का वर्गीकरण&amp;lt;/strong&amp;gt; &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
        पं.वि./2/32 &amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritGatha&amp;quot;&amp;gt;ग्रासस्तदर्धमपि देयमथार्धमेक तस्यापि  संततमणुव्रतिना यथर्द्धि। इच्छानुरूपमिह कस्य कदात्र लोके द्रव्यं भविष्यति  सदुत्तमदानहेतु:।32।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;अणुव्रती श्रावक को निरंतर अपनी संपत्ति के अनुसार एक  ग्रास, आधा ग्रास उसके भी आधे भाग अर्थात् चतुर्थांश को भी देना चाहिए। कारण यह  है कि यहाँ लोक में इच्छानुसार द्रव्य किसके किस समय होगा जो कि उत्तम दान को दे  सके, यह कुछ नहीं कहा जा सकता।32। &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; सागार धर्मामृत/1/11/22  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;पर फुट नोट–&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पादमायानिधिं कुर्यात्पादं  वित्ताय खट्वयेत् । धर्मोपभोगयो: पादं पादं भर्त्तव्यपोषणे। अथवा–आयार्द्धं च  नियुंजीत धर्मे समाधिकं तत:। शेषेण शेषं कुर्वीत यत्नतस्तुच्छमैहिकं।&amp;lt;/span&amp;gt; =&amp;lt;span class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;गृहस्थ  अपने कमाये हुए धन के चार भाग करे, उसमें से एक भाग तो जमा रखे, दूसरे भाग से  बर्तन वस्त्रादि घर की चीजें खरीदे, तीसरे भाग से धर्मकार्य और अपने भोग उपभोग  में खर्च करे और चौथे भाग से अपने कुटुंब का पालन करे। अथवा अपने कमाये हुए धन  का आधा अथवा कुछ अधिक धर्मकार्य में खर्च करे और बचे हुए द्रव्य से यत्नपूर्वक  कुटुंब आदि का पालन पोषण करै।&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; (1) चतुर्विध राजनीति का एक अंग । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 50.18 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) सातावेदनीय का आस्रव । यह गृहस्थ के चतुर्विध धर्म में प्रथम धर्म है । इसमें स्व और पर के उपकार हेतु अपने स्व अर्थात् धन या अपनी वस्तु का त्याग किया जाता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;8.177-178, 41.104, 56.88-89, 63.270,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 58.94,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 1.123,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वीरवर्द्धमान चरित्र 6.12  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;में इसके तीन भेद बताये हैं― शास्त्रदान (ज्ञानदान), अभयदान और आहारदान । सत्पुरुषों का उपकार करने की इच्छा से सर्वज्ञ भाषित शास्त्र का दान शास्त्रदान, कर्मबंध के कारणों को छोड़ने के हेतु प्राणिपीड़ा का त्याग करना अभयदान और निर्ग्रंथ साधुओं को उनके शरीर आदि की रक्षार्थ शुद्ध आहार देना आहारदान कहा है । ज्ञानदान सबमें श्रेष्ठ है क्योंकि वह पाप कार्यों से रहित तथा देने और लेने वाले दोनों के लिए निजानंद रूप मोक्षप्राप्ति का कारण है । आरंभ जन्य पाप का कारण होने से आहारदान की अपेक्षा अभयदान श्रेष्ठ है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;56.67-77 औषधिदान को मिलाकर इसके चार भेद भी किये गये हैं । ये त्रिविध पात्रों को नवधा भक्तिपूर्वक दिये जाते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 14.56-59,76,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 1.126  &amp;lt;/span&amp;gt;पात्र के लिए दान देने अथवा अनुमोदना करने से जीव भोगभूमि में उत्पन्न होकर जीवन पर्यंत निरोग एव सुखी रहते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;9. 85-86, &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 7.107-118  &amp;lt;/span&amp;gt;दाता की विशुद्धता-देय वस्तु और लेने वाले पात्र को, देय वस्तु की पवित्रता-देने और लेने वाले दोनों को एवं पात्र की विशुद्धि-दाता और देय वस्तु इन दोनों को पवित्र करती है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;20.136-137 यह भोग संपदा का प्रदाता तथा स्वर्ग और मोक्ष का हेतु है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 123.107-108  &amp;lt;/span&amp;gt;आहारदान नवधा भक्तिपूर्वक दिया जाता है । दाता के लिए सर्वप्रथम पात्र को पड़गाहकर उसे उच्च स्थान देना, उसके पाद-प्रक्षालन करना, पूजा करना, नमस्कार करना, मन शुद्धि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि और आहारशुद्धि प्रकट करनी पड़ती हे । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 9.199-200  &amp;lt;/span&amp;gt;श्रावक की एक क्रिया दत्ति है । इसके चार भेद कहे है― दयादत्ति, पात्रदति, समददत्ति और अन्वयदत्ति । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण  &amp;lt;/span&amp;gt;38.35-40&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=105745</id>
		<title>अपात्र</title>
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		<updated>2022-12-10T12:44:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; &amp;lt;p&amp;gt;1. दान योग्य अपात्र-देखें [[ पात्र ]]। 2. ज्ञान योग्य अपात्र-देखें [[ श्रोता ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p&amp;gt; व्रत शील आदि से रहित, कुदृष्टिवान्, दाता एवं दत्त वस्तु को दूषित करने वाला व्यक्ति । ऐसे कुपात्र को दान देकर दाता कुमानुष योनि में जन्मता है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 20.141-143,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 7. 114 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपहृत</title>
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		<updated>2022-12-10T12:38:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A5%83%E0%A4%A4&amp;diff=105743</id>
		<title>अपहृत</title>
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		<updated>2022-12-10T12:37:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
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		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A5%83%E0%A4%A4&amp;diff=105742</id>
		<title>अपहृत</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A5%83%E0%A4%A4&amp;diff=105742"/>
		<updated>2022-12-10T12:29:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4&amp;diff=105741</id>
		<title>अपसिद्धांत</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4&amp;diff=105741"/>
		<updated>2022-12-10T12:28:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; न्यायदर्शन सूत्र / मूल या टीका अध्याय 5/2/23 सिद्धांतमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसंगोऽपसिद्धांतः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 ( श्लोकवार्तिक पुस्तक 4/न्या.268/422/15)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= किसी अर्थ के सिद्धांत को मानकर नियम-विरुद्ध `कथाप्रसंग' करना `अपसिद्धांत' नामक निग्रहस्थान होता है। अर्थात् स्वीकृत आगम के विरुद्ध अर्थ का साधन करने लग जाना अपसिद्धांत है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 (पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक 568)&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; जैसे शरीर को जीव बताना अपसिद्धांत रूप विरुद्ध वचन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
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		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4&amp;diff=105740</id>
		<title>अपसिद्धांत</title>
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		<updated>2022-12-10T12:25:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; न्यायदर्शन सूत्र / मूल या टीका अध्याय 5/2/23 सिद्धांतमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसंगोऽपसिद्धांतः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 ( श्लोकवार्तिक पुस्तक 4/न्या.268/422/15)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= किसी अर्थ के सिद्धांत को मानकर नियम-विरुद्ध `कथाप्रसंग' करना `अपसिद्धांत' नामक निग्रहस्थान होता है। अर्थात् स्वीकृत आगम के विरुद्ध अर्थ का साधन करने लग जाना अपसिद्धांत है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 (पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक 568)&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; जैसे शरीरको जीव बताना अपसिद्धांत रूप विरुद्ध वचन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपसिद्धांत</title>
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		<updated>2022-12-10T12:24:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; न्यायदर्शन सूत्र / मूल या टीका अध्याय 5/2/23 सिद्धांतमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसंगोऽपसिद्धांतः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 ( श्लोकवार्तिक पुस्तक 4/न्या.268/422/15)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= किसी अर्थ के सिद्धांत को मानकर नियम-विरुद्ध `कथाप्रसंग' करना `अपसिद्धांत' नामक निग्रहस्थान होता है। अर्थात् स्वीकृत आगम के विरुद्ध अर्थ का साधन करने लग जाना अपसिद्धांत है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt; पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक 568 जैसे शरीरको जीव बताना अपसिद्धांत रूप विरुद्ध वचन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपसिद्धांत</title>
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		<updated>2022-12-10T12:23:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; न्यायदर्शन सूत्र / मूल या टीका अध्याय 5/2/23 सिद्धांतमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसंगोऽपसिद्धांतः। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p ( श्लोकवार्तिक पुस्तक 4/न्या.268/422/15)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= किसी अर्थ के सिद्धांत को मानकर नियम-विरुद्ध `कथाप्रसंग' करना `अपसिद्धांत' नामक निग्रहस्थान होता है। अर्थात् स्वीकृत आगम के विरुद्ध अर्थ का साधन करने लग जाना अपसिद्धांत है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; पंचाध्यायी / पूर्वार्ध श्लोक 568 जैसे शरीरको जीव बताना अपसिद्धांत रूप विरुद्ध वचन है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
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		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=104486</id>
		<title>अपवाद</title>
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		<updated>2022-11-24T14:28:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p&amp;gt;यद्यपि मोक्षमार्ग केवल साम्यता की साधना का नाम है, परंतु शरीर स्थिति के कारण आहार-विहार आदि में प्रवृत्ति भी करनी पड़ती है। यदि इससे सर्वथा उपेक्षित हो जाये तो भी साधना होनी संभव नहीं और यदि केवल इस ही की चर्या में निरर्गल प्रवृत्ति करने लगे तो भी साधना संभव नहीं। अतः साधक को दोनों ही बातों का संतुलन करके चलना आवश्यक है। तहाँ साम्यता की वास्तविक साधना को उत्सर्ग और शरीर चर्या को अपवाद कहते हैं। इन दोनों के सम्मेल संबंधी विषय ही इस अधिकार में प्ररूपित है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;भेद व लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1 | अपवाद सामान्य का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.2 | अपवादमार्ग का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.3 | उत्सर्गमार्ग का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	उत्सर्ग व अपवाद लिंग के लक्षण-देखें [[ लिंग#1 | लिंग - 1]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;अपवादमार्ग निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.1 | मोक्षमार्ग में क्षेत्र काल आदि का विचार आवश्यक है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.2 | अपनी शक्ति का विचार आवश्यक है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.3 | आत्मोपयोग में विघ्न न पड़े ऐसा ही त्याग योग्य है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.4 | आत्मोपयोग में विघ्न पड़ता जाने तो अपवाद मार्ग का आश्रय ले]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	प्रथम व अंतिम तीर्थ में छेदोपस्थापना चारित्र प्रधान होते हैं। -देखें [[ छेदोपस्थापना ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	उत्सर्ग व अपवाद व्याख्यान में अंतर।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;परिस्थितिवश साधुवृत्ति में कुछ अपवाद&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.1 | कदाचित् 9 कोटि शुद्ध की अपेक्षा 5 कोटि शुद्ध आहार का ग्रहण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.2 | उपदेशार्थ शास्त्रों का और वैयावृत्त्यर्थ औषध आदि का संग्रह]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	आचार्य की वैयावृत्त्य के लिए आहार व उपकरणादिक माँगकर लाना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.3 | क्षपक के लिए आहार माँगकर लाना]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.4 | क्षपक को कुरले व तेलमर्दन आदि की आज्ञा]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.5 | क्षपक के लिए शीतोपचार व अनीमा आदि]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.6 | क्षपक के मृतशरीर के अंगोपांगों का छेदन]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कालानुसार चारित्र में हीनाधिकता संभव है।-देखें [[ निर्यापक में ]]भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 671।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् लौकिक संसर्ग की आज्ञा। -देखें [[ संगति ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् मंत्र प्रयोग की आज्ञा। -देखें [[ मंत्र ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.7 | परोपकारार्थ विद्या व शस्त्रादि का प्रदान]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् अकाल में स्वाध्याय। -देखें [[ स्वाध्याय#2.2 | स्वाध्याय - 2.2]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.8 | कदाचित् रात्रि की भी बातचीत]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् नौका का ग्रहण व जल में प्रवेश। -देखें [[ विहार ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	शूद्र से छू जाने पर स्नान।-देखें [[ भिक्षा#6 | भिक्षा - 6]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	मार्ग में कोई पदार्थ मिलने पर उठाकर आचार्य को दे दे। - देखें [[ अस्तेय ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	एकांत में आर्य का संगति का विधि-निषेध।-देखें [[ संगति ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् स्त्री को नग्न रहने की आज्ञा।-देखें [[ लिंग#1 | लिंग - 1]]/4।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;उत्सर्ग व अपवादमार्ग का समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.1 | वास्तव में उत्सर्ग ही मार्ग है अपवाद नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.2 | कारणवश ही अपवाद का ग्रहण निर्दिष्ट है सर्वतः नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.3 | अपवादमार्गमें योग्य ही उपधि आदिके ग्रहणकी आज्ञा है अयोग्यकी नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	साधुके योग्य उपधि। -देखें [[ परिग्रह#1 | परिग्रह - 1]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	स्वच्छंदाचारपूर्वक आहार ग्रहणका निषेध। -देखें [[ आहार#II.2.7 | आहार - II.2.7]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.4 | अपवाद का ग्रहण भी त्याग के अर्थ होता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.5 | अपवाद उत्सर्ग का साधक होना चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.6 | उत्सर्ग व अपवाद में परस्पर सापेक्षता ही श्रेय है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.7 | निरपेक्ष उत्सर्ग या अपवाद श्रेय नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; भेद व लक्षण&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt;अपवाद सामान्य का लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/33/141 पर्यायो विशेषोऽपवादो व्यावृत्तिरित्यर्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पर्याय का अर्थ विशेष अपवाद और व्यावृत्ति है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दर्शनपाहुड़ / मूल या टीका गाथा 24/21/20 विशेषोक्तो विधिरपवाद इति परिभाषणात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विशेष रूप से कही गयी विधि को अपवाद कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt;अपवादमार्ग का लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;स.प्र./230 शरीरस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनभूतसंयमसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा बालवृद्धश्रांतग्लानस्य स्वस्थ योग्यं मृद्वैवाचरणमाचरणीयमित्यपवादः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रांत व ग्लान मुनियों को शुद्धात्म तत्त्व के साधनभूत संयम का साधन होने के कारण जो मूलभूत है, उसका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरण ही आचरना, इस प्रकार अपवाद है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 230 असमर्थः पुरुषः शुद्धात्मभावनासहकारिभूतं किमपि प्रासुकाहारज्ञानोपकरणादिकं गृह्णातीत्यपवादो `व्यवहारय' एकदेश परित्यागस्तथा चापहृतसंयमः सरागचारित्रं शुभोपयोग इति यावदेकार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= असमर्थ जन शुद्धात्मभावना के सहकारीभूत जो कुछ भी प्रासुक आहार ज्ञान व उपकरण आदि का ग्रहण करते हैं, उसी को अपवाद, व्यवहारनय, एकदेशत्याग, अपहृत संयम, सराग चारित्र, शुभोपयोग इन नामों से कहा जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;उत्सर्ग मार्ग का लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 आत्मद्रव्यस्य द्वितीयपुद्गलद्रव्याभावात्सर्व एवोपधिः प्रतिषिद्ध इत्युत्सर्गः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उत्सर्ग मार्ग वह है जिसमें कि सर्व परिग्रह का त्याग किया जाये, क्योंकि आत्मा के एक अपने भाव के सिवाय परद्रव्यरूप दूसरा पुद्गलभाव नहीं है। इस कारण उत्सर्ग मार्ग परिग्रह रहित है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 230 बालवृद्धश्रांतग्लानेनापि संयमस्य शुद्धात्मसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्य&lt;br /&gt;
मतिकर्कशमाचरणीयमित्युत्सर्गः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रमित या ग्लान (रोगी श्रमण) को भी संयम का जो कि शुद्धात्मतत्त्व का साधन होने से मूलभूत है, उसका छेद जैसे न हो उस प्रकार संयत को अपने योग्य अति कर्कश आचरण ही आचरना; इस प्रकार उत्सर्ग है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 230/315/5 शुद्धात्मनः सकाशादंयद्बाह्याभ्यंतरपरिग्रहरूपं सर्वं त्याज्यमित्युत्सर्गे `निश्चयनयः' सर्व परित्यागः परमोपेक्षासंयमो वीतरागचारित्रं शुद्धोपयोग इति यावदेकार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शुद्धात्मा के सिवाय अन्य जो कुछ भी बाह्य अवभ्यंतर परिग्रह रूप है, उस सर्व का त्याग ही उत्सर्ग है। निश्चयनय कहो या सर्वपरित्याग कहो या परमोपेक्षा संयम कहो, या वीतराग चारित्र कहो या शुद्धोपयोग कहो, ये सब एकार्थवाची हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;अपवाद मार्ग निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt;मोक्षमार्ग में क्षेत्र कालादि का विचार आवश्यक है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अनगार धर्मामृत अधिकार 5/65/558 द्रव्य क्षेत्रं बलं भावं कालं वीर्यं समीक्ष्य च। स्वास्थाय वर्ततां सर्व विशुद्धशुद्धाशनैः सुधीः ॥65॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विचार पूर्वक आचरण करने वाले साधुओं को आरोग्य और आत्मस्वरूप में अवस्थान रखने के लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, बल और वीर्य इन छः बातों का अच्छी तरह पर्यालोचन करके सर्वाशन, विद्वाशन और शुद्धाशन के द्वारा आहार में प्रवृत्ति करना चाहिए। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( अनगार धर्मामृत अधिकार 7/16-17)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt;अपनी शक्ति का विचार आवश्यक है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,4,26/56/12 पित्तप्पकोवेण उववास अक्खयेहि अद्धाहारेण उववासादो अहियपरिस्समेहि....।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो पित्त के प्रकोपवश उपवास करने में असमर्थ है; जिन्हें आधे आहार की अपेक्षा उपवास करने में अधिक थकान होती है...(उन्हें यह अवमोदर्य तप करना चाहिए।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; अनगार धर्मामृत अधिकार 5/95; 7/16-17-देखें- पहलेवाला सं.2/1।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
\-\&amp;lt;p&amp;gt; प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 230 (असमर्थ पुरुष को अपवादमार्ग का आश्रय लेना चाहिए देखें [[ पहले सं#1.2 | पहले सं - 1.2]])।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;आत्मोपयोग में विघ्न न पड़े ऐसा ही त्याग योग्य है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार/तत्त्वप्रदीपिका/215 तथाविधशरीरवृत्त्यविरोधेन शुद्धात्मद्रव्यनीरंगनिस्तरंगविश्रांतिसूत्रणानुसारेण प्रवर्तमाने क्षपणे....।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तथाविध शरीर की वृत्ति के साथ विरोध रहित शुद्धात्म द्रव्य में नीरंग और निस्तरंग विश्रांति की रचनानुसार प्रवर्तमान अनशन में...।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;आत्मोपयोग में विघ्न पड़ता जाने तो अपवादमार्ग का आश्रय करे&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 11/138 पर उद्धृत `सव्वत्थं संजमं संजमाओ अप्पाणमेव रक्खिज्जा। मुच्चइ अइवायाओ पुणो विसोही नियाविरई।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= मुनि को सर्व प्रकार से अपने संयम की रक्षा करनी चाहिए। यदि संयम का पालन करने में अपना मरण होता हो तो संयम को छोड़कर अपनी आत्मा की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि इस तरह मुनि दोषों से रहित होता है। वह फिर से शुद्ध हो सकता है, और उसके व्रत भंग का दोष नहीं लगता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;परिस्थितिवश साधुवृत्ति में कुछ अपवाद&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;9 कोटि की अपेक्षा 5 कोटि शुद्ध आहार का ग्रहण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 11/138/9 यथा जैनानां संयमपरिपालनार्थं नवकोटिविशुद्धाहारग्रहणमुत्सर्गः। तथाविधद्रव्यक्षेत्रकालभावापत्सु च निपतितस्य गत्यंतराभावे पंचकादियतनया अनेषणीयादिग्रहणमपवादः। सोऽपि च संयमपरिपालनार्थमेव।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जैन मुनियों के वास्ते सामान्यरूप से संयम की रक्षा के लिए नव कोटि से विशुद्ध आहार ग्रहण करने की विधि बतायी गयी है। परंतु यदि किसी कारण से कोई द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावजन्य आपदाओं से ग्रस्त हो जाये और उसे कोई मार्ग सूझ न पड़े, तो ऐसी दशामें वह पांच कोटि से शुद्ध आहार का ग्रहण कर सकता है। यह अपवाद नियम है। परंतु जैसे सामान्य विधि संयम की रक्षा के लिए है, वैसे ही अपवाद विधि भी संयम की रक्षा के लिए है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;उपदेशार्थ शास्त्र तथा वैयावृत्त्यर्थ औषध संग्रह&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 175/393 किंचितत्कारणमुपदिश्य श्रुतग्रहणं, परेषां वा श्रुतोपदेशम् आचार्यादिवैयावृत्त्यादिकं, वा परिभुक्तं व्यवहृतम्। उवधिं परिग्रहमौषधं अतिरिक्तज्ञानसंयमोपकरणानि वा। अणुपधिं ईषत्परिग्रहम्....वसतिरुच्यते। ....वर्जयित्वा आचारति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शास्त्र पढ़ना, दूसरों को शास्त्रोपदेश देना, आचार्यों की वैयावृत्त्य करना इत्यादि कारणों के उद्देश्य से जो परिग्रह संगृहीत किया था, अथवा औषध व तद्व्यतिरिक्त ज्ञानोपकरण और संयमोपकरण संगृहीत किया था, उसका (इस सल्लेखना के अंतिम अवसर पर) त्याग कर विहार करे। तथा ईषत्परिग्रह अर्थात् वसतिका भी त्याग करे।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;क्षपक के लिए आहार आदि माँगकर लाना&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 662/666 चत्तारि जणा भत्तं उवकप्पेंति अगिलाए पाओग्गं। छंदियमवगददोसं अमाइणो लद्धिसंपण्णा ॥662॥ चत्तारि जणा पामयमुवकप्पंति अडिलाए पाओग्गं। छंदियमवगददोसं अमाइण लद्धि संपण्णा ॥663॥ चत्तारि जणा रक्खंति दवियमुवकप्पियं तयं तेहिं। अगिलाए अप्पमत्ता खवयस्स समाधिमिच्छंति ॥664॥ काइयमादी सव्वं चत्तारि पदिट्ठवंति खवयस्स। पडिलेहंति य उवधोकाले सेज्जुवधिसंथारं ॥665॥ खवगस्स घरदुवार सारक्खंति जणा चत्तारि। चत्तारि समोसरणदुवारं रक्खंति जदणाए ॥666॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= चार साधु तो क्षपक के लिए उद्गमादि दोष रहित आहार के पदार्थ (श्रावक के घर से माँगकर) लाते हैं। चार साधु पीने के पदार्थ लाते हैं। कितने दिन तक लाना पड़ेगा, इतना विचार भी नहीं करते हैं। माया भाव रहित वे मुनि वात, पित्त, कफ, संबंधी दोषों को शांत करने वाले ही पदार्थ लाते हैं। भिक्षा लब्धि से संपन्न अर्थात् जिन्हें भिक्षा आसानी से मिल जाती है, ऐसे मुनि ही इस काम के लिए नियुक्त किये जाते है ॥662-663॥ उपर्युक्त मुनियों द्वारा लाये गये आहार-पान की चार मुनि प्रमाद छोड़कर रक्षा करते हैं, ताकि उन पदार्थों में त्रस जीवों का प्रवेश न होने पावे। क्योंकि जिस प्रकार भी क्षपक का मन रत्नत्रय में स्थिर हो वैसा ही वे प्रयत्न करते हैं ॥664॥ चार मुनि क्षपक का मलमूत्र निकालने का कार्य करते हैं, तथा सूर्य के उदयकाल में और अस्तकाल के समय में वे वसतिका, उपकरण और संस्तर इनको शुद्ध करते हैं, स्वच्छ करते हैं ॥665॥ चार परिचारक मुनि क्षपक को वसतिका के दरवाजे का प्रयत्न से रक्षण करते हैं, अर्थात् असंयत और शिक्षकों को वे अंदर आने को मना करते हैं और चार मुनि समोसरण के द्वार का प्रयत्न से रक्षण करते हैं, धर्मोपदेश देने मंडप के द्वार पर चार मुनि रक्षण के लिए बैठते हैं ॥666॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 1993)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 1978/1742 उयसयपडिदावण्णं उवसंगहिदं तु तत्थ उवकरणं। सागारियं च दुविहं पडिहारियमपडिहारिं वा ॥1978॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= क्षपककी शुश्रूषा करनेके लिए जिन उपकरणोंका संग्रह किया जाता था उनका वर्णन इस गाथामें किया गया है? कुछ उपकरण गृहस्थोंसे लाये जाते थे जैसे औषध, जलपात्र, थाली वगैरह। कुछ उपकरण त्यागने योग्य रहते हैं, और कुछ उपकरण त्यागने योग्य नहीं होते। जो त्याज्य नहीं है वे गृहस्थोंको वापिस दिये जाते हैं। कुछ कपड़ा वगैरह उपकरण त्याज्य रहता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;देखें [[ सल्लेखना#3.12  | सल्लेखना - 3.12 ]](इंगिनीमरण धारक क्षपक अपने संस्तरके लिए स्वयं गाँवसे तृण माँगकर लाता है।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;क्षपकको कुरले व तेलमर्दन आदि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 688 तेल्लकसायादीहिं य बहुसो गडूसया दु घेतव्वा। जिब्भाकण्णाण बलं होहि दि तुंडं च से विसदं ॥688॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तेल और कषायले द्रव्यके क्षपकको बहुत बार कुरले करने चाहिये। कुरले करनेसे जीभ और कानोंमें सामर्थ्य प्राप्त होती है। कर्णमें तेल डालनेसे श्रवण शक्ति बढ़ती है ॥688॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt;क्षपकके लिए शीतोपचार आदि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 1499 बच्छीहिं अवट्ठवणतावणेहिं आलेवसीदकिरियाहिं। अब्भंगणपरिमद्दण आदीहिं तिगिंछदे खवयं ॥1499॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वस्ति कर्म (अनीमा करना), अग्निसे सैंकना, शरीरमें उष्णता उत्पन्न करना, औषधिका लेप करना, शीतपना उत्पन्न करना, सर्व अंग मर्दन करना, इत्यादिके द्वारा क्षपककी वेदनाका उपशमन करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 375 `प्रतिरूपकालक्रिया'-उष्णकाले शीतक्रिया, शीतकाले उष्णक्रिया, वर्षाकाले तद्योग्यक्रिया।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उष्णकालमें शीतक्रिया और शीतकालमें उष्णक्रिया, वर्षाकालमें तद्योग्य क्रिया करना प्रतिरूपकाल क्रिया है (जिसके करनेका मूल गाथामें निर्देश किया है)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तत्त्वार्थवृत्ति अध्याय 9/47/316/12 केचिदसमर्था महर्षयः शीतकालादौ कंबलशब्दवाच्यं कौशेयादिकं गृह्णंति।....केचिच्छरीरे उत्पन्नदोषाल्लज्जित्वात् तथा कुर्वंतीति। व्याख्यानमाराधनाभगवतीप्रोक्ताभिप्रायेणापवादरूपं ज्ञातव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कोई-कोई असमर्थ महर्षि शीत आदि कालमें कंबल शब्दका वाच्य कुश घास या पराली आदिक ग्रहण कर लेते हैं। कोई शरीरमें उत्पन्न हुए दोष वश लज्जाके कारण ऐसा करते हैं। यह व्याख्यान भगवती आराधन में कहे हुए अभिप्रायसे अपवाद रूप है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 421/611/18)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;बोधपाहुड़ / मूल या टीका गाथा 17/85 तस्य....आचार्यस्य-वात्सल्यं भोजनं पानं पादमर्दनं शुद्धतैलादिनांगाभ्यंजनं तत्प्रक्षालनं चैत्यादिकं कर्म सर्वं तीर्थंकरनाम कर्मोपार्जनहेतुभूतं वैयावृत्त्यं कुरुत यूयम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उन आचार्य (उपाध्याय व साधु ) परमेष्ठीकी वात्सल्य, भोजन, पान, पादमर्दन, शुद्धतेल आदिके द्वारा अंगमर्दन, शरीर प्रक्षालन आदिक द्वारा वैयावृत्ति करना, ये सब कर्म तीर्थंकर नाम कर्मोपार्जनके हेतुभूत हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.6&amp;quot;&amp;gt;क्षपकके मृत शरीरके अंगोपांगों का छेदन&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 1976-1977 गीदत्था कदकज्जा महाबलपरक्कमा महासत्ता। बंधंति य छिंदंति य करचरणंगुट्ठयपदेसे ॥1676॥ जदि वा एस ण कीरेज्ज विधी तो तत्थ देवदा कोई। आदाय तं कलेवरमुट्ठिज्ज रमिज्ज बाधेज्ज ॥1977॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= महान् पराक्रम और धैर्य युक्त मुनि क्षपकके हाथ और पाँव तथा अंगूठा इनका कुछ भाग बांधते हैं अथवा छेदते हैं ॥1976॥ यदि यह विधि न की जायेगी तो उस मृतशरीरमें क्रीड़ा करनेका स्वभाववाला कोई भूत अथवा पिशाच प्रवेश करेगा, जिसके उपकरण वह शरीर उठना, बैठना, भागना आदि भीषण क्रियायें करेगा ॥1977॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.7&amp;quot;&amp;gt;परोपकारार्थं विद्या व शस्त्रादिका प्रदान&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;महापुराण सर्ग संख्या 95/98 कामधेन्वभिधां विद्यामीप्सितार्थप्रदायिनीम्। तस्यै विश्राणयांचक्रे समंत्रं परशुं च सः ॥98॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उन्होंने (मुनिराजने रेणुकाको, उसके सम्यक्त्व व व्रत ग्रहणसे संतुष्ट होकर) मनवांछित पदार्थ देनेवाली कामधेनु नामकी विद्या और मंत्र सहित एक फरसा भी उसके लिए प्रदान किया ॥98॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.8&amp;quot;&amp;gt;कदाचित् रात्रिको भी बोलते हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पद्मपुराण सर्ग 48/38 स्मरेषुहतचित्तोऽसौ तामुद्दिश्य ब्रजन्निशि। मुनिनावधियुक्तेन मैवमित्यभ्यभाषत ॥38॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= (दरिद्रोंकी बस्तीमें किसी सुंदरीको देखकर) काम बाणोंसे उसका (यक्षदत्तका) हृदय हरा गया। सो वह रात्रिके समय उसके उद्देश्यसे जा रहा था, कि अवधिज्ञानसे युक्त मुनिराजने `मा अर्थात् नहीं' इस प्रकार (शब्द) उच्चारण किया।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;उत्सर्ग व अपवाद मार्गका समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;वास्तवमें उत्सर्ग ही मार्ग है, अपवाद नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;ष्ट.सा./त.प्र./224 ततोऽवधार्यते उत्सर्ग एव वस्तुधर्मो न पुनरपवादः। इदमत्र तात्पर्यं वस्तुधर्मत्वात्परमनैर्ग्रंथ्यमेवावलंब्यं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इससे निश्चय होता है कि उत्सर्ग ही वस्तुधर्म है अपवाद नहीं। तात्पर्य यह है कि वस्तु धर्म होनेसे परम निर्ग्रंथत्व ही अवलंबन योग्य है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;कारणवश ही अपवादका ग्रहण निर्दिष्ट है, सर्वतः नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 421/612/14 तस्माद्वस्त्रं पात्रं चार्थाधिकारमषेक्ष्य सूत्रेषु बहुषु यदुक्तं तत्कारणमपेक्ष्य निर्दिष्टमिति ग्राह्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इसलिए अर्थाधिकारकी अपेक्षासे बहुत-से सूत्रोंमें जो वस्त्र और पात्रका ग्रहण कहा गया है, वह कारणकी अपेक्षासे निर्दिष्ट है, ऐसा समझना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;महापुराण सर्ग संख्या 74/314 चतुर्थ ज्ञाननेत्रस्य निसर्गबलशालिनः। तस्याद्यमेव चारित्रं द्वितीयं तु प्रमादिनाम् ॥314॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= मनःपर्ययज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले और स्वाभाविक बलसे सुशोभित उन भगवान्के पहिला सामायिक चारित्र ही था, क्योंकि दूसरा छेदोपस्थापना चारित्र प्रमादी जीवोंके ही होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार कर्मकांड / जीव तत्त्व प्रदीपिका टीका गाथा 547/714/5)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 अयं तु विशिष्टकालक्षेत्रवशात्कश्चिदप्रतिषिद्ध इत्यपवादः। यदा हि श्रमणः सर्वोपधिप्रतिषेधमास्थाय परमुपेक्षासंयमं प्रतिपत्तुकामोऽपि विशिष्टकालक्षेत्रवशादवसंन्नशक्तिर्न प्रतिपत्तुं क्षमते तदापकृष्य संयमं प्रतिपद्यमानस्तद्बहिरंगसाधनमात्रमुपधिमातिष्ठते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विशिष्ट काल, क्षेत्रके वश कोई उपधि अनिषिद्ध है। ऐसा अपवाद है। जब श्रमण सर्व उपधिके निषेधका आश्रय लेकर परमोपेक्षा संयमको प्राप्त करनेका इच्छुक होनेपर भी विशिष्ट काल, क्षेत्रके वश हीन शक्तिवाला होनेसे उसे प्राप्त करनेमें असमर्थ होता है, तब उसमें अपकर्षण करके (अनुत्कृष्ट) संयम प्राप्त करता हुआ उसकी बाह्य साधनमात्र उपधिका आश्रय लेता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;अपवाद मार्गमें भी योग्य ही उपधि आदिके ग्रहणकी आज्ञा है अयोग्यकी नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / मूल या टीका गाथा 223 अप्पडिकुट्ठं उवधिं अपत्थणिज्जं असंजदजणेहिं। मुच्छादिजणणरहिदं गेण्हदु समणो जदि वि अप्पं ॥223॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= भले ही अल्प हो तथापि जो अनिंदित हो, असंयत जनोंसे अप्रार्थनीय हो और मूर्च्छादि उत्पन्न करनेवाली न हो, ऐसी ही उपधिको श्रमण ग्रहण करो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 162/375/19 उपधिर्नाम पिच्छांतरं कमंडल्वंतरं वा तदानीं संयमसिद्धौ न करणमिति संयमसाधनं न भवति।...अथवा ज्ञानोपकरणं अवशिष्टोपधिरुच्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= एक ही पिच्छिका और एक ही कमंडल रखता है, क्योंकि उससे ही उसका संयम साधन होता है। दूसरा कमंडल व दूसरी पिच्छिका उसको संयम साधनमें कारण नहीं है। अवशिष्ट ज्ञानोपकरण (शास्त्र) भी उस (सल्लेखनाके) समय परिग्रह माना गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 की उत्थानिका &amp;quot;कस्यचित्कदाचित्कथंचित्कश्चिदुपधिरप्रतिषिद्धोऽप्यस्तीत्यपवादमुपदिशति। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= किसीके कहीं कभी किसी प्रकार कोई उपधि अनिषिद्ध भी है, ऐसा अपवाद कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 223 गृह्णातु श्रमणो यमप्यल्पं तथापि पूर्वोक्तोचितलक्षणमेव ग्राह्यं न च तद्विपरीतमधिकं वेत्यभिप्रायः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= श्रमण जो कुछ भी अल्पमात्र उपधि ग्रहण करता है। वह पूर्वोक्त उचित लक्षणवाली ही ग्रहण करता है, उससे विपरीत या अधिक नहीं, ऐसा अभिप्राय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;अपवादका अर्थ स्वच्छंद वृत्ति नहीं है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 931 जो जट्ठ जहा लद्धं गेण्हदि आहारमुवधियादीयं। समणगुणमुक्कजोगी संसारपवड्ढओ होदि ॥931॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो साधु जिस शुद्ध-अशुद्ध देशमें जैसा कैसा शुद्ध-अशुद्ध मिला आहार व उपकरण ग्रहण करता है, वह श्रमणगुणसे रहित योगी संसारको बढ़ानेवाला ही होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परमात्मप्रकाश / मूल या टीका अधिकार 2/91 जे. जिणलिंगु धरेवि मुणि इट्ठ परिग्गह लेंति। छद्दि करेविणु ते जि जिय सा पुणु छिद्दि गिलंति ॥91॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो मुनि जिनलिंगको धारण कर फिर भी इच्छित परिग्रहका ग्रहण करते हैं, वे जीव! वे ही वमन करके फिर उस वमनको पीछे निगलते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 250 योऽसौ स्वशरीरपोषणार्थं शिष्यादिमोहेन वा सावद्यं नेच्छति तस्येदं (अपवादमार्ग) व्याख्यानं शोभते। यदि पुनरन्यत्र सावद्यमिच्छति वैयावृत्त्यादिस्वकीयावस्थायोग्ये धर्मकार्ये नेच्छति तदा तस्य सम्यक्त्वमेव नास्तीति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 252 अत्रेदं तात्पर्यम्.... स्वभावनाविघातकरोगादिप्रस्तावे वैयावृत्त्यं करोति शेषकाले स्वकीयानुष्ठानं करोतीति॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो स्व शरीरका पोषण करनेके लिए अथवा शिष्य आदिके मोहके कारण सावद्यकी इच्छा नहीं करता है, उसको ही यह अपवाद मार्गका व्याख्यान शोभा देता है। यदि अन्यत्र तो सावद्यकी इच्छा करे और वैयावृत्ति आदि स्वकीय अवस्थाके योग्य धर्मकार्यमें इच्छा न करे, तब तो उसके सम्यक्त्व ही नहीं है ॥250॥ यहाँ ऐसा तात्पर्य है कि स्वभाव विघातक रोगादि आ जानेपर तो वैयावृत्ति करता है, परंतु शेषकालमें स्वकीय अनुष्ठान (ध्यान आदि) ही करता है ॥252॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;अपवादका ग्रहण भी त्यागके अर्थ होता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 अयं तु....आहारनिहारादिग्रहणविसर्जनविषयच्छेदप्रतिषेधार्थसुपादीयमानः सर्वथा शुद्धोपयोगाविनाभूतत्वाच्छेदप्रतिषेध एव स्यात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यह आहारनीहारादिका ग्रहण-विसर्जन संबंधी बात छेदके निषेधार्थ ग्रहण करनेमें आयी है, क्योंकि, सर्वत्र शुद्धोपयोग सहित है। इसलिए वह छेदके निषेधरूप ही है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;अपवाद उत्सर्गका साधक होना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 11/138/6 अन्यार्थमुत्सृष्टम्....अन्यस्मै कार्याय प्रयुक्तम्-उत्सर्गवाक्यम्, अन्यार्थप्रयुक्तेन वाक्येन नापोद्यते-नापवादगोचरीक्रियते। यमेवार्थमाश्रित्य शास्त्रेषूत्सर्गः प्रवर्तते, तमेवाश्रित्यापवादोऽपि प्रवर्तते, तयोन्निम्नोन्नतादिव्यवहारवत् परस्परसापेक्षत्वेनैकार्थ साधनविषयत्वात्।....सोऽपि च संयमपरिपालनार्थमेव। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सामान्य (उत्सर्ग) और अपवाद दोनों वाक्य शास्त्रोंके एक ही अर्थको लेकर प्रयुक्त होते हैं। जैसे ऊँच-नीच आदिका व्यवहार सापेक्ष होनेसे एक ही अर्थका साधक है, वैसे ही सामान्य और अपवाद दोनों परस्पर सापेक्ष होनेसे एक ही प्रयोजनकी सिद्ध करते हैं। -(उदाहरणार्थ नव कोटि शुद्धकी बजाये परिस्थितिवश साधु जो पंचकोटि भी शुद्ध आहारका ग्रहण कर लेता है। जैसे सामान्य विधि संयमकी रक्षाके लिए है, तैसे ही वह अपवाद भी संयमकी रक्षाके लिए ही है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;उत्सर्ग व अपवादमें परस्पर सापेक्षता ही श्रेय है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / मूल या टीका गाथा 230 बालो वा बुड्ढो वा समभिहदो वा पुणो गिलाणो वा। चरियं चरउ सजोग्गं मूलच्छेदं जधा ण हवदि ॥230॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रांत अथवा ग्लान श्रमण, मूलका छेद जिस प्रकारसे न होय उस प्रकार अपने योग्य आचरण आचरो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 230 बालवृद्धश्रांतग्लानेनापि संयमस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यातिकर्कशमेवाचरणमाचरणीयमित्युत्सर्गः। .....शरीरस्य.....छेदो न यथा स्यात्तथा.....स्वस्य योग्यं मृद्वेवाचरणमाचरणीयमित्यपवादः। संयमस्य....छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमाचरणमाचरता शरीरस्य.....छेदो यथा न स्यात्तथा....स्वस्य योग्यं मृद्वप्याचरणमाचरणीयमित्ययमपवादसापेक्ष उत्सर्गः। शरीरस्य छेदो न यथा स्यात्तथा स्वस्य योग्यं मृद्वाचरणमाचरता संयमस्य....छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमप्याचरणमाचरणीयमित्युत्सर्गसापेक्षोऽपवादः। अतः सर्वथोत्सर्गपवादमैत्र्या सौस्थितस्यमाचरणस्य विधेयम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रांत अथवा ग्लान श्रमणको भी संयमका, कि जो शुद्धात्म तत्त्वका साधन होनेसे मूलभूत है, उसका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार संयतका ऐसा अपने योग्य अतिकर्कश आचरण ही आचरना उत्सर्ग है।....संयमके साधनभूत शरीरका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरण ही आचरना अपवाद है। संयमका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य अतिकर्कश आचरण आचरते हुए भी शरीरका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरणका आचरना अपवादसापेक्ष उत्सर्ग है। शरीरका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरणको आचारते हुए भी संयमका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य अतिकर्कश आचरणको भी आचरना उत्सर्गसापेक्ष अपवाद है। इससे सर्वथा उत्सर्ग अपवादकी मैत्रीके द्वारा आचरणको स्थिर करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;निरपेक्ष उत्सर्ग या अपवाद श्रेय नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 231 अथ देशकालज्ञस्यापि....मृद्वाचरणप्रवृत्तत्वादल्पो लेपां भवत्येव तद्वरमुत्सर्गः। .....मृद्वाचरणं प्रवृत्तत्वादल्प एव लेपो भवति तद्वरमपवादः। ....अल्पलेपभयेनाप्रवर्तमानस्यातिकर्कशाचरणीभूयाक्रमेण शरीरं पातयित्वा सुरलोकं प्राप्योद्वांतसमस्तसंयमामृतभारस्य तपसोऽनवकाशतयाऽशक्यप्रतिकारो महान् लेपो भवति। तन्न श्रेयानपवादनिरपेक्ष उत्सर्गः। देशकालज्ञस्यापि.....आहारविहारयोरल्पलेपत्वं विगणय्य यथेष्टं प्रवर्त्तमानस्य मृद्वाचरणीभूय संयम विराध्या संयतजनसमानीभूतस्य तदात्वे तपसोऽनवकाशतयाशक्यप्रतिकारो महान् लेपो भवति, तत्र श्रेयानुत्सर्गनिरपेक्षोऽपवादः। अत....परस्परसापेक्षोत्सर्गापवादविजृंभितवृत्तिः स्याद्वादः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= देशकालज्ञको भी मृदु आचरणमें प्रवृत्त होनेसे अल्प लेप होता ही है, इसलिए उत्सर्ग अच्छा है। और मृदु आचरणमें प्रवृत्त होनेसे अल्प (मात्र) ही लेप होता है, इसलिए अपवाद अच्छा है अल्पलेपके भयसे उसमें प्रवृत्ति न करे तो अतिकर्कश आचरण रूप होकर अक्रमसे ही शरीरपात करके देवलोक प्राप्त करता है। तहाँ जिसने समस्त संयमामृतका समूह वमन कर डाला है, उसे तपका अवकाश न रहनेसे, जिसका प्रतिकार अशक्य है, ऐसा महान् लेप होता है। इसलिए अपवाद निरपेक्ष उत्सर्ग श्रेयस्कर नहीं। देशकालज्ञको भी, आहार-विहार आदिसे होनेवाले अल्पलेपको न गिनकर यदि वह उसमें यथेष्ट प्रवृत्ति करे तो, मृदु आचरणरूप होकर संयमविरोधी असंयतजनके समान हुए उसको उस समय तपका अवकाश न रहनेसे, जिसका प्रतिकार अशक्य है ऐसा महान् लेप होता है। इसलिए उत्सर्ग निरपेक्ष अपवाद श्रेयस्कर नहीं है। इसलिए परस्पर सापेक्ष उत्सर्ग और अपवादसे जिसकी वृत्ति प्रगट होती है ऐसा स्याद्वाद सदा अनुगम्य है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;br /&gt;
[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=104483</id>
		<title>अपवाद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=104483"/>
		<updated>2022-11-24T12:27:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p&amp;gt;यद्यपि मोक्षमार्ग केवल साम्यता की साधना का नाम है, परंतु शरीर स्थिति के कारण आहार-विहार आदि में प्रवृत्ति भी करनी पड़ती है। यदि इससे सर्वथा उपेक्षित हो जाये तो भी साधना होनी संभव नहीं और यदि केवल इस ही की चर्या में निरर्गल प्रवृत्ति करने लगे तो भी साधना संभव नहीं। अतः साधक को दोनों ही बातों का संतुलन करके चलना आवश्यक है। तहाँ साम्यता की वास्तविक साधना को उत्सर्ग और शरीर चर्या को अपवाद कहते हैं। इन दोनों के सम्मेल संबंधी विषय ही इस अधिकार में प्ररूपित है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;भेद व लक्षण&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.1 | अपवाद सामान्य का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.2 | अपवादमार्ग का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #1.3 | उत्सर्गमार्ग का लक्षण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	उत्सर्ग व अपवाद लिंग के लक्षण-देखें [[ लिंग#1 | लिंग - 1]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;अपवादमार्ग निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.1 | मोक्षमार्ग में क्षेत्र काल आदि का विचार आवश्यक है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.2 | अपनी शक्ति का विचार आवश्यक है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.3 | आत्मोपयोग में विघ्न न पड़े ऐसा ही त्याग योग्य है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #2.4 | आत्मोपयोग में विघ्न पड़ता जाने तो अपवाद मार्ग का आश्रय ले]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	प्रथम व अंतिम तीर्थ में छेदोपस्थापना चारित्र प्रधान होते हैं। -देखें [[ छेदोपस्थापना ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	उत्सर्ग व अपवाद व्याख्यान में अंतर।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;परिस्थितिवश साधुवृत्ति में कुछ अपवाद&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.1 | कदाचित् 9 कोटि शुद्ध की अपेक्षा 5 कोटि शुद्ध आहार का ग्रहण]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.2 | उपदेशार्थ शास्त्रों का और वैयावृत्त्यर्थ औषध आदि का संग्रह]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	आचार्य की वैयावृत्त्य के लिए आहार व उपकरणादिक माँगकर लाना।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.3 | क्षपक के लिए आहार माँगकर लाना]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.4 | क्षपक को कुरले व तेलमर्दन आदि की आज्ञा]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.5 | क्षपक के लिए शीतोपचार व अनीमा आदि]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.6 | क्षपक के मृतशरीर के अंगोपांगों का छेदन]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कालानुसार चारित्र में हीनाधिकता संभव है।-देखें [[ निर्यापक में ]]भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 671।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् लौकिक संसर्ग की आज्ञा। -देखें [[ संगति ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् मंत्र प्रयोग की आज्ञा। -देखें [[ मंत्र ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.7 | परोपकारार्थ विद्या व शस्त्रादि का प्रदान]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् अकाल में स्वाध्याय। -देखें [[ स्वाध्याय#2.2 | स्वाध्याय - 2.2]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #3.8 | कदाचित् रात्रि की भी बातचीत]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् नौका का ग्रहण व जल में प्रवेश। -देखें [[ विहार ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	शूद्र से छू जाने पर स्नान।-देखें [[ भिक्षा#6 | भिक्षा - 6]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	मार्ग में कोई पदार्थ मिलने पर उठाकर आचार्य को दे दे। - देखें [[ अस्तेय ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	एकांतमें आर्यका संगतिका विधि-निषेध।-देखें [[ संगति ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	कदाचित् स्त्रीको नग्न रहनेकी आज्ञा।-देखें [[ लिंग#1 | लिंग - 1]]/4।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;उत्सर्ग व अपवादमार्गका समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.1 | वास्तवमें उत्सर्ग ही मार्ग है अपवाद नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.2 | कारणवश ही अपवादका ग्रहण निर्दिष्ट है सर्वतः नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.3 | अपवादमार्गमें योग्य ही उपधि आदिके ग्रहणकी आज्ञा है अयोग्यकी नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	साधुके योग्य उपधि। -देखें [[ परिग्रह#1 | परिग्रह - 1]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	स्वच्छंदाचारपूर्वक आहार ग्रहणका निषेध। -देखें [[ आहार#II.2.7 | आहार - II.2.7]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.4 | अपवादका ग्रहण भी त्यागके अर्थ होता है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.5 | अपवाद उत्सर्गका साधक होना चाहिए]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.6 | उत्सर्ग व अपवादमें परस्पर सापेक्षता ही श्रेय है]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;[[ #4.7 | निरपेक्ष उत्सर्ग या अपवाद श्रेय नहीं]]&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt; भेद व लक्षण&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;1.1&amp;quot;&amp;gt;अपवाद सामान्यका लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 1/33/141 पर्यायो विशेषोऽपवादो व्यावृत्तिरित्यर्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पर्यायका अर्थ विशेष अपवाद और व्यावृत्ति है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;दर्शनपाहुड़ / मूल या टीका गाथा 24/21/20 विशेषोक्तो विधिरपवाद इति परिभाषणात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विशेष रूपसे कही गयी विधिको अपवाद कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;1.2&amp;quot;&amp;gt;अपवादमार्गका लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; प्रवचनसार/ &amp;lt;/span&amp;gt;स.प्र./230 शरीरस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनभूतसंयमसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा बालवृद्धश्रांतग्लानस्य स्वस्थ योग्यं मृद्वैवाचरणमाचरणीयमित्यपवादः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रांत व ग्लान मुनियोंको शुद्धात्म तत्त्वके साधनभूत संयमका साधन होनेके कारण जो मूलभूत है, उसका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरण ही आचरना, इस प्रकार अपवाद है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 230 असमर्थः पुरुषः शुद्धात्मभावनासहकारिभूतं किमपि प्रासुकाहारज्ञानोपकरणादिकं गृह्णातीत्यपवादो `व्यवहारय' एकदेश परित्यागस्तथा चापहृतसंयमः सरागचारित्रं शुभोपयोग इति यावदेकार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= असमर्थ जन शुद्धात्मभावनाके सहकारीभूत जो कुछ भी प्रासुक आहार ज्ञान व उपकरण आदिका ग्रहण करते हैं, उसीको अपवाद, व्यवहारनय, एकदेशत्याग, अपहृत संयम, सराग चारित्र, शुभोपयोग इन नामोंसे कहा जाता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;1.3&amp;quot;&amp;gt;उत्सर्ग मार्गका लक्षण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 आत्मद्रव्यस्य द्वितीयपुद्गलद्रव्याभावात्सर्व एवोपधिः प्रतिषिद्ध इत्युत्सर्गः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उत्सर्ग मार्ग वह है जिसमें कि सर्व परिग्रहका त्याग किया जाये, क्योंकि, आत्माके एक अपने भावके सिवाय परद्रव्यरूप दूसरा पुद्गलभाव नहीं है। इस कारण उत्सर्ग मार्ग परिग्रह रहित है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 230 बालवृद्धश्रांतग्लानेनापि संयमस्य शुद्धात्मसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमाचरणीयमित्युत्सर्गः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रमित या ग्लान (रोगी श्रमण) को भी संयमका जो कि शुद्धात्मतत्त्वका साधन होनेसे मूलभूत है, उसका छेद जैसे न हो उस प्रकार संयतको अपने योग्य अतिकर्कश आचरण ही आचरना; इस प्रकार उत्सर्ग है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 230/315/5 शुद्धात्मनः सकाशादंयद्बाह्याभ्यंतरपरिग्रहरूपं सर्वं त्याज्यमित्युत्सर्गे `निश्चयनयः' सर्व परित्यागः परमोपेक्षासंयमो वीतरागचारित्रं शुद्धोपयोग इति यावदेकार्थः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शुद्धात्माके सिवाय अन्य जो कुछ भी बाह्य अवभ्यंतर परिग्रह रूप है, उस सर्वका त्याग ही उत्सर्ग है। निश्चयनय कहो या सर्वपरित्याग कहो या परमोपेक्षा संयम कहो, या वीतरागचारित्र कहो या शुद्धोपयोग कहो, ये सब एकार्थवाची हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;अपवादमार्ग निर्देश&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.1&amp;quot;&amp;gt;मोक्षमार्गमें क्षेत्र कालादिका विचार आवश्यक है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;अनगार धर्मामृत अधिकार 5/65/558 द्रव्य क्षेत्रं बलं भावं कालं वीर्यं समीक्ष्य च। स्वास्थाय वर्ततां सर्व विशुद्धशुद्धाशनैः सुधीः ॥65॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विचार पूर्वक आचरण करनेवाले साधुओंको आरोग्य और आत्मस्वरूपमें अवस्थान रखनेके लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, बल और वीर्य इन छः बातोंका अच्छी तरह पर्यालोचन करके सर्वाशन, विद्वाशन और शुद्धाशनके द्वारा आहारमें प्रवृत्ति करना चाहिए। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( अनगार धर्मामृत अधिकार 7/16-17)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.2&amp;quot;&amp;gt;अपनी शक्तिका विचार आवश्यक है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 13/5,4,26/56/12 पित्तप्पकोवेण उववास अक्खयेहि अद्धाहारेण उववासादो अहियपरिस्समेहि....।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो पित्तके प्रकोपवश उपवास करनेमें असमर्थ है; जिन्हें आधे आहारकी अपेक्षा उपवास करनेमें अधिक थकान होती है...(उन्हें यह अवमोदर्य तप करना चाहिए।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; अनगार धर्मामृत अधिकार 5/95; 7/16-17-दे, पहलेवाला सं.2/1।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 230 (असमर्थ पुरुषको अपवादमार्गका आश्रय लेना चाहिए देखें [[ पहले सं#1.2 | पहले सं - 1.2]])।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.3&amp;quot;&amp;gt;आत्मोपयोगमें विघ्न न पड़े ऐसा ही त्याग योग्य है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्र.स./त.प्र./215 तथाविधशरीरवृत्त्यविरोधेन शुद्धात्मद्रव्यनीरंगनिस्तरंगविश्रांतिसूत्रणानुसारेण प्रवर्तमाने क्षपणे....।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तथाविध शरीरकी वृत्तिके साथ विरोधरहित शुद्धात्म द्रव्यमें नीरंग और निस्तरंग विश्रांतिकी रचनानुसार प्रवर्तमान अनशनमें...।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;2.4&amp;quot;&amp;gt;आत्मोपयोगमें विघ्न पड़ता जाने तो अपवादमार्ग का आश्रय करे&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 11/138 पर उद्धृत `सव्वत्थं संजमं संजमाओ अप्पाणमेव रक्खिज्जा। मुच्चइ अइवायाओ पुणो विसोही नियाविरई।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= मुनिको सर्व प्रकारसे अपने संयमकी रक्षा करनी चाहिए। यदि संयमका पालन करनेमें अपना मरण होता हो तो संयमको छोड़कर अपनी आत्माकी रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि इस तरह मुनि दोषोंसे रहित होता है। वह फिरसे शुद्ध हो सकता है, और उसके व्रत भंगका दोष नहीं लगता।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;परिस्थितिवश साधुवृत्तिमें कुछ अपवाद&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.1&amp;quot;&amp;gt;9 कोटिकी अपेक्षा 5 कोटि शुद्ध आहारका ग्रहण&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 11/138/9 यथा जैनानां संयमपरिपालनार्थं नवकोटिविशुद्धाहारग्रहणमुत्सर्गः। तथाविधद्रव्यक्षेत्रकालभावापत्सु च निपतितस्य गत्यंतराभावे पंचकादियतनया अनेषणीयादिग्रहणमपवादः। सोऽपि च संयमपरिपालनार्थमेव।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जैन मुनियोंके वास्ते सामान्यरूपसे संयमकी रक्षाके लिए नव कोटिसे विशुद्ध आहार ग्रहण करनेकी विधि बतायी गयी है। परंतु यदि किसी कारणसे कोई द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावजन्य आपदाओंसे ग्रस्त हो जाये और उसे कोई मार्ग सूझ न पड़े, तो एसो दशामें वह पांच कोटिसे शुद्ध आहारका ग्रहण कर सकता है। यह अपवाद नियम है। परंतु जैसे सामान्य विधि संयमकी रक्षाके लिए है, वैसे ही अपवाद विधि भी संयमकी रक्षाके लिए है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.2&amp;quot;&amp;gt;उपदेशार्थ शास्त्र तथा वैयावृत्त्यर्थ औषध संग्रह&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 175/393 किंचितत्कारणमुपदिश्य श्रुतग्रहणं, परेषां वा श्रुतोपदेशम् आचार्यादिवैयावृत्त्यादिकं, वा परिभुक्तं व्यवहृतम्। उवधिं परिग्रहमौषधं अतिरिक्तज्ञानसंयमोपकरणानि वा। अणुपधिं ईषत्परिग्रहम्....वसतिरुच्यते। ....वर्जयित्वा आचारति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= शास्त्र पढ़ना, दूसरोंको शास्त्रोपदेश देना, आचार्योंकी वैयावृत्त्य करना इत्यादि कारणोंके उद्देश्यसे जो परिग्रह संगृहीत किया था, अथवा औषध व तद्व्यतिरिक्त ज्ञानोपकरण और संयमोपकरण संगृहीत किया था, उसका (इस सल्लेखनाके अंतिम अवसरपर) त्यागकर विहार करे। तथा ईषत्परिग्रह अर्थात् वसतिका भी त्याग करे।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.3&amp;quot;&amp;gt;क्षपकके लिए आहार आदि माँगकर लाना&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 662/666 चत्तारि जणा भत्तं उवकप्पेंति अगिलाए पाओग्गं। छंदियमवगददोसं अमाइणो लद्धिसंपण्णा ॥662॥ चत्तारि जणा पामयमुवकप्पंति अडिलाए पाओग्गं। छंदियमवगददोसं अमाइण लद्धि संपण्णा ॥663॥ चत्तारि जणा रक्खंति दवियमुवकप्पियं तयं तेहिं। अगिलाए अप्पमत्ता खवयस्स समाधिमिच्छंति ॥664॥ काइयमादी सव्वं चत्तारि पदिट्ठवंति खवयस्स। पडिलेहंति य उवधोकाले सेज्जुवधिसंथारं ॥665॥ खवगस्स घरदुवार सारक्खंति जणा चत्तारि। चत्तारि समोसरणदुवारं रक्खंति जदणाए ॥666॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= चार साधु तो क्षपक के लिए उद्गमादि दोषरहित आहारके पदार्थ (श्रावकके घरसे माँगकर) लाते हैं। चार साधु पीनेके पदार्थ लाते हैं। कितने दिन तक लाना पड़ेगा, इतना विचार भी नहीं करते हैं। माया भाव रहित वे मुनि वात, पित्त, कफ, संबंधी दोषोंको शांत करनेवाले ही पदार्थ लाते हैं। भिक्षा लब्धिसे संपन्न अर्थात् जिन्हें भिक्षा आसानीसे मिल जाती है, ऐसे मुनि ही इस कामके लिए नियुक्त किये जाते है ॥662-663॥ उपर्युक्त मुनियों-द्वारा लाये गये आहार-पानकी चार मुनि प्रमाद छोड़कर रक्षा करते हैं, ताकि उन पदार्थोंमें त्रस जीवोंका प्रवेश न होने पावे। क्योंकि जिस प्रकार भी क्षपकका मन रत्नत्रयमें स्थिर हो वैसा ही वे प्रयत्न करते हैं ॥664॥ चार मुनि क्षपकका मलमूत्र निकालनेका कार्य करते हैं, तथा सूर्यके उदयकालमें और अस्तकालके समयमें वे वसतिका, उपकरण और संस्तर इनको शुद्ध करते हैं, स्वच्छ करते हैं ॥665॥ चार परिचारक मुनि क्षपकको वसतिकाके दरवाजेका प्रयत्नसे रक्षण करते हैं, अर्थात् असंयत और शिक्षकोंको वे अंदर आनेको मना करते हैं और चार मुनि समोसरणके द्वारका प्रयत्नसे रक्षण करते हैं, धर्मोपदेश देने मंडपके द्वारपर चार मुनि रक्षणके लिए बैठते हैं ॥666॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 1993)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 1978/1742 उयसयपडिदावण्णं उवसंगहिदं तु तत्थ उवकरणं। सागारियं च दुविहं पडिहारियमपडिहारिं वा ॥1978॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= क्षपककी शुश्रूषा करनेके लिए जिन उपकरणोंका संग्रह किया जाता था उनका वर्णन इस गाथामें किया गया है? कुछ उपकरण गृहस्थोंसे लाये जाते थे जैसे औषध, जलपात्र, थाली वगैरह। कुछ उपकरण त्यागने योग्य रहते हैं, और कुछ उपकरण त्यागने योग्य नहीं होते। जो त्याज्य नहीं है वे गृहस्थोंको वापिस दिये जाते हैं। कुछ कपड़ा वगैरह उपकरण त्याज्य रहता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;देखें [[ सल्लेखना#3.12  | सल्लेखना - 3.12 ]](इंगिनीमरण धारक क्षपक अपने संस्तरके लिए स्वयं गाँवसे तृण माँगकर लाता है।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.4&amp;quot;&amp;gt;क्षपकको कुरले व तेलमर्दन आदि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 688 तेल्लकसायादीहिं य बहुसो गडूसया दु घेतव्वा। जिब्भाकण्णाण बलं होहि दि तुंडं च से विसदं ॥688॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= तेल और कषायले द्रव्यके क्षपकको बहुत बार कुरले करने चाहिये। कुरले करनेसे जीभ और कानोंमें सामर्थ्य प्राप्त होती है। कर्णमें तेल डालनेसे श्रवण शक्ति बढ़ती है ॥688॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.5&amp;quot;&amp;gt;क्षपकके लिए शीतोपचार आदि&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 1499 बच्छीहिं अवट्ठवणतावणेहिं आलेवसीदकिरियाहिं। अब्भंगणपरिमद्दण आदीहिं तिगिंछदे खवयं ॥1499॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= वस्ति कर्म (अनीमा करना), अग्निसे सैंकना, शरीरमें उष्णता उत्पन्न करना, औषधिका लेप करना, शीतपना उत्पन्न करना, सर्व अंग मर्दन करना, इत्यादिके द्वारा क्षपककी वेदनाका उपशमन करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 375 `प्रतिरूपकालक्रिया'-उष्णकाले शीतक्रिया, शीतकाले उष्णक्रिया, वर्षाकाले तद्योग्यक्रिया।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उष्णकालमें शीतक्रिया और शीतकालमें उष्णक्रिया, वर्षाकालमें तद्योग्य क्रिया करना प्रतिरूपकाल क्रिया है (जिसके करनेका मूल गाथामें निर्देश किया है)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;तत्त्वार्थवृत्ति अध्याय 9/47/316/12 केचिदसमर्था महर्षयः शीतकालादौ कंबलशब्दवाच्यं कौशेयादिकं गृह्णंति।....केचिच्छरीरे उत्पन्नदोषाल्लज्जित्वात् तथा कुर्वंतीति। व्याख्यानमाराधनाभगवतीप्रोक्ताभिप्रायेणापवादरूपं ज्ञातव्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= कोई-कोई असमर्थ महर्षि शीत आदि कालमें कंबल शब्दका वाच्य कुश घास या पराली आदिक ग्रहण कर लेते हैं। कोई शरीरमें उत्पन्न हुए दोष वश लज्जाके कारण ऐसा करते हैं। यह व्याख्यान भगवती आराधन में कहे हुए अभिप्रायसे अपवाद रूप है। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 421/611/18)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;बोधपाहुड़ / मूल या टीका गाथा 17/85 तस्य....आचार्यस्य-वात्सल्यं भोजनं पानं पादमर्दनं शुद्धतैलादिनांगाभ्यंजनं तत्प्रक्षालनं चैत्यादिकं कर्म सर्वं तीर्थंकरनाम कर्मोपार्जनहेतुभूतं वैयावृत्त्यं कुरुत यूयम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उन आचार्य (उपाध्याय व साधु ) परमेष्ठीकी वात्सल्य, भोजन, पान, पादमर्दन, शुद्धतेल आदिके द्वारा अंगमर्दन, शरीर प्रक्षालन आदिक द्वारा वैयावृत्ति करना, ये सब कर्म तीर्थंकर नाम कर्मोपार्जनके हेतुभूत हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.6&amp;quot;&amp;gt;क्षपकके मृत शरीरके अंगोपांगों का छेदन&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / मुल या टीका गाथा 1976-1977 गीदत्था कदकज्जा महाबलपरक्कमा महासत्ता। बंधंति य छिंदंति य करचरणंगुट्ठयपदेसे ॥1676॥ जदि वा एस ण कीरेज्ज विधी तो तत्थ देवदा कोई। आदाय तं कलेवरमुट्ठिज्ज रमिज्ज बाधेज्ज ॥1977॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= महान् पराक्रम और धैर्य युक्त मुनि क्षपकके हाथ और पाँव तथा अंगूठा इनका कुछ भाग बांधते हैं अथवा छेदते हैं ॥1976॥ यदि यह विधि न की जायेगी तो उस मृतशरीरमें क्रीड़ा करनेका स्वभाववाला कोई भूत अथवा पिशाच प्रवेश करेगा, जिसके उपकरण वह शरीर उठना, बैठना, भागना आदि भीषण क्रियायें करेगा ॥1977॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.7&amp;quot;&amp;gt;परोपकारार्थं विद्या व शस्त्रादिका प्रदान&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;महापुराण सर्ग संख्या 95/98 कामधेन्वभिधां विद्यामीप्सितार्थप्रदायिनीम्। तस्यै विश्राणयांचक्रे समंत्रं परशुं च सः ॥98॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उन्होंने (मुनिराजने रेणुकाको, उसके सम्यक्त्व व व्रत ग्रहणसे संतुष्ट होकर) मनवांछित पदार्थ देनेवाली कामधेनु नामकी विद्या और मंत्र सहित एक फरसा भी उसके लिए प्रदान किया ॥98॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;3.8&amp;quot;&amp;gt;कदाचित् रात्रिको भी बोलते हैं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;पद्मपुराण सर्ग 48/38 स्मरेषुहतचित्तोऽसौ तामुद्दिश्य ब्रजन्निशि। मुनिनावधियुक्तेन मैवमित्यभ्यभाषत ॥38॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= (दरिद्रोंकी बस्तीमें किसी सुंदरीको देखकर) काम बाणोंसे उसका (यक्षदत्तका) हृदय हरा गया। सो वह रात्रिके समय उसके उद्देश्यसे जा रहा था, कि अवधिज्ञानसे युक्त मुनिराजने `मा अर्थात् नहीं' इस प्रकार (शब्द) उच्चारण किया।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;/ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;&amp;lt;strong&amp;gt;उत्सर्ग व अपवाद मार्गका समन्वय&amp;lt;/strong&amp;gt;&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;ol&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.1&amp;quot;&amp;gt;वास्तवमें उत्सर्ग ही मार्ग है, अपवाद नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;ष्ट.सा./त.प्र./224 ततोऽवधार्यते उत्सर्ग एव वस्तुधर्मो न पुनरपवादः। इदमत्र तात्पर्यं वस्तुधर्मत्वात्परमनैर्ग्रंथ्यमेवावलंब्यं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इससे निश्चय होता है कि उत्सर्ग ही वस्तुधर्म है अपवाद नहीं। तात्पर्य यह है कि वस्तु धर्म होनेसे परम निर्ग्रंथत्व ही अवलंबन योग्य है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.2&amp;quot;&amp;gt;कारणवश ही अपवादका ग्रहण निर्दिष्ट है, सर्वतः नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 421/612/14 तस्माद्वस्त्रं पात्रं चार्थाधिकारमषेक्ष्य सूत्रेषु बहुषु यदुक्तं तत्कारणमपेक्ष्य निर्दिष्टमिति ग्राह्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= इसलिए अर्थाधिकारकी अपेक्षासे बहुत-से सूत्रोंमें जो वस्त्र और पात्रका ग्रहण कहा गया है, वह कारणकी अपेक्षासे निर्दिष्ट है, ऐसा समझना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;महापुराण सर्ग संख्या 74/314 चतुर्थ ज्ञाननेत्रस्य निसर्गबलशालिनः। तस्याद्यमेव चारित्रं द्वितीयं तु प्रमादिनाम् ॥314॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= मनःपर्ययज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले और स्वाभाविक बलसे सुशोभित उन भगवान्के पहिला सामायिक चारित्र ही था, क्योंकि दूसरा छेदोपस्थापना चारित्र प्रमादी जीवोंके ही होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( गोम्मट्टसार कर्मकांड / जीव तत्त्व प्रदीपिका टीका गाथा 547/714/5)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 अयं तु विशिष्टकालक्षेत्रवशात्कश्चिदप्रतिषिद्ध इत्यपवादः। यदा हि श्रमणः सर्वोपधिप्रतिषेधमास्थाय परमुपेक्षासंयमं प्रतिपत्तुकामोऽपि विशिष्टकालक्षेत्रवशादवसंन्नशक्तिर्न प्रतिपत्तुं क्षमते तदापकृष्य संयमं प्रतिपद्यमानस्तद्बहिरंगसाधनमात्रमुपधिमातिष्ठते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= विशिष्ट काल, क्षेत्रके वश कोई उपधि अनिषिद्ध है। ऐसा अपवाद है। जब श्रमण सर्व उपधिके निषेधका आश्रय लेकर परमोपेक्षा संयमको प्राप्त करनेका इच्छुक होनेपर भी विशिष्ट काल, क्षेत्रके वश हीन शक्तिवाला होनेसे उसे प्राप्त करनेमें असमर्थ होता है, तब उसमें अपकर्षण करके (अनुत्कृष्ट) संयम प्राप्त करता हुआ उसकी बाह्य साधनमात्र उपधिका आश्रय लेता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.3&amp;quot;&amp;gt;अपवाद मार्गमें भी योग्य ही उपधि आदिके ग्रहणकी आज्ञा है अयोग्यकी नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / मूल या टीका गाथा 223 अप्पडिकुट्ठं उवधिं अपत्थणिज्जं असंजदजणेहिं। मुच्छादिजणणरहिदं गेण्हदु समणो जदि वि अप्पं ॥223॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= भले ही अल्प हो तथापि जो अनिंदित हो, असंयत जनोंसे अप्रार्थनीय हो और मूर्च्छादि उत्पन्न करनेवाली न हो, ऐसी ही उपधिको श्रमण ग्रहण करो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 162/375/19 उपधिर्नाम पिच्छांतरं कमंडल्वंतरं वा तदानीं संयमसिद्धौ न करणमिति संयमसाधनं न भवति।...अथवा ज्ञानोपकरणं अवशिष्टोपधिरुच्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= एक ही पिच्छिका और एक ही कमंडल रखता है, क्योंकि उससे ही उसका संयम साधन होता है। दूसरा कमंडल व दूसरी पिच्छिका उसको संयम साधनमें कारण नहीं है। अवशिष्ट ज्ञानोपकरण (शास्त्र) भी उस (सल्लेखनाके) समय परिग्रह माना गया है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 की उत्थानिका &amp;quot;कस्यचित्कदाचित्कथंचित्कश्चिदुपधिरप्रतिषिद्धोऽप्यस्तीत्यपवादमुपदिशति। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= किसीके कहीं कभी किसी प्रकार कोई उपधि अनिषिद्ध भी है, ऐसा अपवाद कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 223 गृह्णातु श्रमणो यमप्यल्पं तथापि पूर्वोक्तोचितलक्षणमेव ग्राह्यं न च तद्विपरीतमधिकं वेत्यभिप्रायः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= श्रमण जो कुछ भी अल्पमात्र उपधि ग्रहण करता है। वह पूर्वोक्त उचित लक्षणवाली ही ग्रहण करता है, उससे विपरीत या अधिक नहीं, ऐसा अभिप्राय है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.4&amp;quot;&amp;gt;अपवादका अर्थ स्वच्छंद वृत्ति नहीं है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 931 जो जट्ठ जहा लद्धं गेण्हदि आहारमुवधियादीयं। समणगुणमुक्कजोगी संसारपवड्ढओ होदि ॥931॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो साधु जिस शुद्ध-अशुद्ध देशमें जैसा कैसा शुद्ध-अशुद्ध मिला आहार व उपकरण ग्रहण करता है, वह श्रमणगुणसे रहित योगी संसारको बढ़ानेवाला ही होता है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परमात्मप्रकाश / मूल या टीका अधिकार 2/91 जे. जिणलिंगु धरेवि मुणि इट्ठ परिग्गह लेंति। छद्दि करेविणु ते जि जिय सा पुणु छिद्दि गिलंति ॥91॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो मुनि जिनलिंगको धारण कर फिर भी इच्छित परिग्रहका ग्रहण करते हैं, वे जीव! वे ही वमन करके फिर उस वमनको पीछे निगलते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt; प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 250 योऽसौ स्वशरीरपोषणार्थं शिष्यादिमोहेन वा सावद्यं नेच्छति तस्येदं (अपवादमार्ग) व्याख्यानं शोभते। यदि पुनरन्यत्र सावद्यमिच्छति वैयावृत्त्यादिस्वकीयावस्थायोग्ये धर्मकार्ये नेच्छति तदा तस्य सम्यक्त्वमेव नास्तीति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 252 अत्रेदं तात्पर्यम्.... स्वभावनाविघातकरोगादिप्रस्तावे वैयावृत्त्यं करोति शेषकाले स्वकीयानुष्ठानं करोतीति॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो स्व शरीरका पोषण करनेके लिए अथवा शिष्य आदिके मोहके कारण सावद्यकी इच्छा नहीं करता है, उसको ही यह अपवाद मार्गका व्याख्यान शोभा देता है। यदि अन्यत्र तो सावद्यकी इच्छा करे और वैयावृत्ति आदि स्वकीय अवस्थाके योग्य धर्मकार्यमें इच्छा न करे, तब तो उसके सम्यक्त्व ही नहीं है ॥250॥ यहाँ ऐसा तात्पर्य है कि स्वभाव विघातक रोगादि आ जानेपर तो वैयावृत्ति करता है, परंतु शेषकालमें स्वकीय अनुष्ठान (ध्यान आदि) ही करता है ॥252॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.5&amp;quot;&amp;gt;अपवादका ग्रहण भी त्यागके अर्थ होता है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 222 अयं तु....आहारनिहारादिग्रहणविसर्जनविषयच्छेदप्रतिषेधार्थसुपादीयमानः सर्वथा शुद्धोपयोगाविनाभूतत्वाच्छेदप्रतिषेध एव स्यात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= यह आहारनीहारादिका ग्रहण-विसर्जन संबंधी बात छेदके निषेधार्थ ग्रहण करनेमें आयी है, क्योंकि, सर्वत्र शुद्धोपयोग सहित है। इसलिए वह छेदके निषेधरूप ही है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.6&amp;quot;&amp;gt;अपवाद उत्सर्गका साधक होना चाहिए&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;स्याद्वादमंजरी श्लोक 11/138/6 अन्यार्थमुत्सृष्टम्....अन्यस्मै कार्याय प्रयुक्तम्-उत्सर्गवाक्यम्, अन्यार्थप्रयुक्तेन वाक्येन नापोद्यते-नापवादगोचरीक्रियते। यमेवार्थमाश्रित्य शास्त्रेषूत्सर्गः प्रवर्तते, तमेवाश्रित्यापवादोऽपि प्रवर्तते, तयोन्निम्नोन्नतादिव्यवहारवत् परस्परसापेक्षत्वेनैकार्थ साधनविषयत्वात्।....सोऽपि च संयमपरिपालनार्थमेव। &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= सामान्य (उत्सर्ग) और अपवाद दोनों वाक्य शास्त्रोंके एक ही अर्थको लेकर प्रयुक्त होते हैं। जैसे ऊँच-नीच आदिका व्यवहार सापेक्ष होनेसे एक ही अर्थका साधक है, वैसे ही सामान्य और अपवाद दोनों परस्पर सापेक्ष होनेसे एक ही प्रयोजनकी सिद्ध करते हैं। -(उदाहरणार्थ नव कोटि शुद्धकी बजाये परिस्थितिवश साधु जो पंचकोटि भी शुद्ध आहारका ग्रहण कर लेता है। जैसे सामान्य विधि संयमकी रक्षाके लिए है, तैसे ही वह अपवाद भी संयमकी रक्षाके लिए ही है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.7&amp;quot;&amp;gt;उत्सर्ग व अपवादमें परस्पर सापेक्षता ही श्रेय है&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / मूल या टीका गाथा 230 बालो वा बुड्ढो वा समभिहदो वा पुणो गिलाणो वा। चरियं चरउ सजोग्गं मूलच्छेदं जधा ण हवदि ॥230॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रांत अथवा ग्लान श्रमण, मूलका छेद जिस प्रकारसे न होय उस प्रकार अपने योग्य आचरण आचरो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 230 बालवृद्धश्रांतग्लानेनापि संयमस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यातिकर्कशमेवाचरणमाचरणीयमित्युत्सर्गः। .....शरीरस्य.....छेदो न यथा स्यात्तथा.....स्वस्य योग्यं मृद्वेवाचरणमाचरणीयमित्यपवादः। संयमस्य....छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमाचरणमाचरता शरीरस्य.....छेदो यथा न स्यात्तथा....स्वस्य योग्यं मृद्वप्याचरणमाचरणीयमित्ययमपवादसापेक्ष उत्सर्गः। शरीरस्य छेदो न यथा स्यात्तथा स्वस्य योग्यं मृद्वाचरणमाचरता संयमस्य....छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमप्याचरणमाचरणीयमित्युत्सर्गसापेक्षोऽपवादः। अतः सर्वथोत्सर्गपवादमैत्र्या सौस्थितस्यमाचरणस्य विधेयम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= बाल, वृद्ध, श्रांत अथवा ग्लान श्रमणको भी संयमका, कि जो शुद्धात्म तत्त्वका साधन होनेसे मूलभूत है, उसका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार संयतका ऐसा अपने योग्य अतिकर्कश आचरण ही आचरना उत्सर्ग है।....संयमके साधनभूत शरीरका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरण ही आचरना अपवाद है। संयमका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य अतिकर्कश आचरण आचरते हुए भी शरीरका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरणका आचरना अपवादसापेक्ष उत्सर्ग है। शरीरका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य मृदु आचरणको आचारते हुए भी संयमका छेद जिस प्रकार न हो उस प्रकार अपने योग्य अतिकर्कश आचरणको भी आचरना उत्सर्गसापेक्ष अपवाद है। इससे सर्वथा उत्सर्ग अपवादकी मैत्रीके द्वारा आचरणको स्थिर करना चाहिए।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
    &amp;lt;li class=&amp;quot;HindiText&amp;quot; id=&amp;quot;4.8&amp;quot;&amp;gt;निरपेक्ष उत्सर्ग या अपवाद श्रेय नहीं&amp;lt;/li&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 231 अथ देशकालज्ञस्यापि....मृद्वाचरणप्रवृत्तत्वादल्पो लेपां भवत्येव तद्वरमुत्सर्गः। .....मृद्वाचरणं प्रवृत्तत्वादल्प एव लेपो भवति तद्वरमपवादः। ....अल्पलेपभयेनाप्रवर्तमानस्यातिकर्कशाचरणीभूयाक्रमेण शरीरं पातयित्वा सुरलोकं प्राप्योद्वांतसमस्तसंयमामृतभारस्य तपसोऽनवकाशतयाऽशक्यप्रतिकारो महान् लेपो भवति। तन्न श्रेयानपवादनिरपेक्ष उत्सर्गः। देशकालज्ञस्यापि.....आहारविहारयोरल्पलेपत्वं विगणय्य यथेष्टं प्रवर्त्तमानस्य मृद्वाचरणीभूय संयम विराध्या संयतजनसमानीभूतस्य तदात्वे तपसोऽनवकाशतयाशक्यप्रतिकारो महान् लेपो भवति, तत्र श्रेयानुत्सर्गनिरपेक्षोऽपवादः। अत....परस्परसापेक्षोत्सर्गापवादविजृंभितवृत्तिः स्याद्वादः।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= देशकालज्ञको भी मृदु आचरणमें प्रवृत्त होनेसे अल्प लेप होता ही है, इसलिए उत्सर्ग अच्छा है। और मृदु आचरणमें प्रवृत्त होनेसे अल्प (मात्र) ही लेप होता है, इसलिए अपवाद अच्छा है अल्पलेपके भयसे उसमें प्रवृत्ति न करे तो अतिकर्कश आचरण रूप होकर अक्रमसे ही शरीरपात करके देवलोक प्राप्त करता है। तहाँ जिसने समस्त संयमामृतका समूह वमन कर डाला है, उसे तपका अवकाश न रहनेसे, जिसका प्रतिकार अशक्य है, ऐसा महान् लेप होता है। इसलिए अपवाद निरपेक्ष उत्सर्ग श्रेयस्कर नहीं। देशकालज्ञको भी, आहार-विहार आदिसे होनेवाले अल्पलेपको न गिनकर यदि वह उसमें यथेष्ट प्रवृत्ति करे तो, मृदु आचरणरूप होकर संयमविरोधी असंयतजनके समान हुए उसको उस समय तपका अवकाश न रहनेसे, जिसका प्रतिकार अशक्य है ऐसा महान् लेप होता है। इसलिए उत्सर्ग निरपेक्ष अपवाद श्रेयस्कर नहीं है। इसलिए परस्पर सापेक्ष उत्सर्ग और अपवादसे जिसकी वृत्ति प्रगट होती है ऐसा स्याद्वाद सदा अनुगम्य है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: चरणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%A8&amp;diff=104480</id>
		<title>अपवर्तन</title>
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		<updated>2022-11-24T12:18:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p&amp;gt;1. अपवर्तनाघात सामान्य का लक्षण&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 2/53/201 बाह्यस्योपघातनिमित्तस्य विषशस्त्रादेः सति संनिधाने ह्रस्वं भवतीत्यपवर्त्यम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उपघात के निमित्त विष शस्त्रादिक बाह्य निमित्तों के मिलने पर जो आयु घट जाती है वह अपवर्त्य आयु कहलाती है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 1,18/$315/347/5 किमोवट्टणं णाम। णवुंसयवेए खविदे सेसणोकसायक्खवणमोवट्टणं णाम।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= '''प्रश्न'''-अपवर्तना किसे कहते हैं। '''उत्तर'''-नपुंसकवेद का क्षपण हो जाने पर शेष नोकषायों के क्षपण होने को यहाँ अपवर्तना कहा है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;गोम्मट्टसार कर्मकांड / जीव तत्त्व प्रदीपिका टीका गाथा 643/837/16 आयुर्बंधं कुर्वतां जीवानां परिणामवशेन बध्यामानस्यायुषोऽपवर्तनमपि भवति तदेवापवर्तनघात इत्युच्यते, उदीयमानायुरपवर्तनस्यैव कदलीघाताभिधानात्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= आयुके बंध को करते जीव तिनि कै परिणामनि के वश तै बध्यमान आयु का अपवर्तन भी होता है। अपवर्तन नाम घटने का है, सो याकौ अपवर्तनघात कहिए, जातैं उदय आई (भुज्यमान) आयु कै अपवर्तन का नाम कदलीघात है। (अर्थात् भुज्यमान आयु के घटने का नाम कदलीघात और बध्यमान आयु के घटने का नाम अपवर्तनघात है।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;2. अनुसमयापवर्तना का लक्षण&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कषायपाहुड़ पुस्तक 5/4-22/$627/396/13 का अणुसमओवट्टणा। उदय-उदयावलियासु पविस्समाणट्टिदीणमणुभागस्स उदयावलिबाहिरट्ठिदीणमणुभागस्स य समयं पडि अपंतगुणहीणकमेण घादो।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= '''प्रश्न'''-प्रतिसमय अपवर्तना किसे कहते हैं। '''उत्तर'''-उदय और उदयावलि में प्रवेश करने वाली स्थितियों के अनुभाग का तथा उदयावली से बाहर की स्थितियों के अनुभाग जो प्रति समय अनंतगुणहीन क्रम से घात होता है उसे प्रतिसमय अपवर्तना कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;धवला पुस्तक 12/4,2,7,41/12/32/2 उक्कीरणकालेण विणा एगसमएणेव पददि सा अणुसमओवट्टणा। अण्णं च, अणुसमओवट्टणाए णियमेण अणंताभागा हम्मंति।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= उत्कीरणकाल के बिना, एक समय द्वारा जो घात होता है वह अनुसमयापवर्तना है। अथवा अनुसमयापवर्तना में नियम से अनंत बहुभाग नष्ट होता है। (अर्थात् एक समय में ही अनंतों कांडकों का युगपत् घात करना अनुसमयापवर्तना है।)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	अनुसमयापवर्तना व कांडकघात में अंतर-देखें [[ अपकर्षण#4.6 | अपकर्षण - 4.6]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	आयु के अपवर्तन संबंधी-देखें [[ आयु#5 | आयु - 5]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	अकाल मृत्यु वश आयु का अपवर्तन-देखें [[ मरण#4 | मरण - 4]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;•	अपवर्तनोद्वर्तन-देखें [[ अश्वकर्ण करण ]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;3. गणित के संबंध में अपवर्तन&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;अमान मूल्यों में बदलना जैसे 18/72=1/4-देखें [[ गणित#II.1.10 | गणित - II.1.10]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;br /&gt;
[[Category: करणानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपराध</title>
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		<updated>2022-11-22T13:41:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿''समयसार / मूल या टीका गाथा 305''  &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; संसिद्धिराद्धसिद्धं साधियमाराधियं च एयट्ठं। अवगयराधो जो खलु चेया सो होइ अवराधो ॥304॥ &amp;lt;/p&amp;gt;&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित, ये एकार्थवाची शब्द हैं। जो आत्मा अपगतराध अर्थात् राध से रहित है वह आत्मा अपराध है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''नियमसार / तात्पर्यवृत्तिगाथा 84'')&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
सा./सा./आ/300/क 186 &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परद्रव्यग्रहं कुर्वन् बध्येतैवापराधवान्। बध्येतानपराधो म स्वद्रव्ये संवृतो यतिः ॥186॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो परद्रव्यको ग्रहण करता है वह अपराधी है, इसलिए बंधमें पड़ता है। और जो स्व-द्रव्यमें ही संवृत है, ऐसा यति निरपराधी है, इसलिए बंधता नहीं है &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''समयसार / आत्मख्याति गाथा 301'')।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपराध</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿''समयसार / मूल या टीका गाथा 305''  &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; संसिद्धिराद्धसिद्धं साधियमाराधियं च एयट्ठं। अवगयराधो जो खलु चेया सो होइ अवराधो ॥304॥ &amp;lt;/p&amp;gt;संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित, ये एकार्थवाची शब्द हैं। जो आत्मा अपगतराध अर्थात् राध से रहित है वह आत्मा अपराध है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''नियमसार / तात्पर्यवृत्तिगाथा 84'')&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
सा./सा./आ/300/क 186 &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;परद्रव्यग्रहं कुर्वन् बध्येतैवापराधवान्। बध्येतानपराधो म स्वद्रव्ये संवृतो यतिः ॥186॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो परद्रव्यको ग्रहण करता है वह अपराधी है, इसलिए बंधमें पड़ता है। और जो स्व-द्रव्यमें ही संवृत है, ऐसा यति निरपराधी है, इसलिए बंधता नहीं है &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''समयसार / आत्मख्याति गाथा 301'')।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपराध</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿''समयसार / मूल या टीका गाथा 305''  &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; संसिद्धिराद्धसिद्धं साधियमाराधियं च एयट्ठं। अवगयराधो जो खलु चेया सो होइ अवराधो ॥304॥ संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित, ये एकार्थवाची शब्द हैं। जो आत्मा अपगतराध अर्थात् राधसे रहित है वह मात्मा अपराध है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''नियमसार / तात्पर्यवृत्तिगाथा 84'')&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सा./सा./आ/300/क 186 परद्रव्यग्रहं कुर्वन् बध्येतैवापराधवान्। बध्येतानपराधो म स्वद्रव्ये संवृतो यतिः ॥186॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो परद्रव्यको ग्रहण करता है वह अपराधी है, इसलिए बंधमें पड़ता है। और जो स्व-द्रव्यमें ही संवृत है, ऐसा यति निरपराधी है, इसलिए बंधता नहीं है &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''समयसार / आत्मख्याति गाथा 301'')।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपराध</title>
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		<updated>2022-11-22T13:37:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt; ''समयसार / मूल या टीका गाथा 305'' संसिद्धिराद्धसिद्धं साधियमाराधियं च एयट्ठं। अवगयराधो जो खलु चेया सो होइ अवराधो ॥304॥ संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित, ये एकार्थवाची शब्द हैं। जो आत्मा अपगतराध अर्थात् राधसे रहित है वह मात्मा अपराध है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''नियमसार / तात्पर्यवृत्तिगाथा 84'')&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सा./सा./आ/300/क 186 परद्रव्यग्रहं कुर्वन् बध्येतैवापराधवान्। बध्येतानपराधो म स्वद्रव्ये संवृतो यतिः ॥186॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जो परद्रव्यको ग्रहण करता है वह अपराधी है, इसलिए बंधमें पड़ता है। और जो स्व-द्रव्यमें ही संवृत है, ऐसा यति निरपराधी है, इसलिए बंधता नहीं है &amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( ''समयसार / आत्मख्याति गाथा 301'')।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपराजिता</title>
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		<updated>2022-11-22T13:24:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p&amp;gt;1. भगवान् मुनिसुव्रतनाथ की शासिका यक्षिणी-देखें [[ तीर्थंकर#5.3 | तीर्थंकर - 5.3]]; 2. पूर्व विदेहस्थ महावत्सा देश की मुख्य नगरी-देखें [[ लोक#5.2 | लोक - 5.2]]; 3. नंदीश्वर द्वीप के पश्चिम में स्थित एक वापी; देखें [[ लोक#5.11 | लोक - 5.11]]; 4. रुचकपर्वत निवासिनी दिक्कुमारी-देखें [[ लोक#5.13 | लोक - 5.13]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;br /&gt;
[[Category: प्रथमानुयोग]]&lt;br /&gt;
[[Category: करणानुयोग]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt;(1) बलभद्र पद्म की जननी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 20.238-239 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) तीर्थंकर मुनिसुव्रत की दीक्षा-शिविका । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 67.40,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 21.36 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;(3) दर्भस्थल नगर के राजा सुकौशल और उसकी रानी अमृतप्रभावा की पुत्री, दशरथ की पत्नी, राम की जननी । अंत में यह मरकर आनत स्वर्ग मे देव हुई थी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 22.170-172, 25.19-22, 123. 80-81 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;(4) उज्जयिनी के राजा विजय की भार्या । सयुक्त 71.443&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;(5) महावत्सा देश की राजधानी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 63.208-216,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 5.247,236  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;(6) वाराणसी के राजा अग्निशिख की रानी, बलभद्र नंदिमित्र की जननी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 66.102-107 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;7&amp;quot;&amp;gt;(7) रुचकवर द्वीप में स्थित इसी नाम के पर्वत पर पूर्व दिशा में वर्तमान अरिष्टकूटवासिनी देवी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 5.699, 704-705 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;(8) रुचकवर पर्वत की वायव्य दिशा में स्थित रत्नोच्ययकूट वासिनी देवी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 5.699,726 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;9&amp;quot;&amp;gt;(9) समवसरण के सप्तपर्ण वन की वापिका । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 57.33 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt;(10) नंदीश्वर द्वीप के दक्षिण में स्थित अंजनगिरि की एक वापी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 5.660 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;diff=104377</id>
		<title>अपराजित</title>
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		<updated>2022-11-22T13:16:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: /* सिद्धांतकोष से */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p&amp;gt;1. एक यक्ष-देखें [[ यक्ष ]]; 2. एक ग्रह-देखें [[ ग्रह ]]; 3. कल्पातीत देवों का एक भेद-देखें [[ स्वर्ग#2.1 | स्वर्ग - 2.1]]; 4, अपराजित स्वर्ग-देखें [[ स्वर्ग#5.4 | स्वर्ग - 5.4]]; 5. जंबूद्वीप की वेदिका का उत्तर द्वार-देखें [[ लोक#3.1 | लोक - 3.1]]; 6. अपर विदेहस्थ व प्रवान क्षेत्र की मुख्य नगरी-देखें [[ लोक#5.2 | लोक - 5.2]]; 7. रुचकवर पर्वत का कूट-देखें [[ लोक#5.13 | लोक - 5.13]]; 8. विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी का एक नगर-देखें [[ विद्याधर ]]; 9. विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर-देखें [[ विद्याधर ]]। 10. ( ''महापुराण सर्ग संख्या 52/श्लो.7'') धातकी खंड में सुसीमा देश का राजा था (2-3) प्रव्रज्या ग्रहण कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया और ऊर्ध्व ग्रैवेयक में अहमिंद्र हो गये (12-14) यह पद्मप्रभ भगवान का  पूर्व का तीसरा भव है। 11. ( ''महापुराण सर्ग संख्या 62/श्लो.'') वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी के राजा स्तमितसागर का पुत्र था (412-413) राज्य पाकर नृत्य देखने में आसक्त हो गया और नारद का सत्कार करना भूल गया (430-431) क्रुद्ध नारद ने शत्रु दमितारि को युद्धार्थ प्रस्तुत किया (443) इन्होंने नर्तकी का वेश बना उसकी लड़की का हरण कर लिया और युद्ध में उसको हरा दिया (461-484) तथा बलभद्र पद पाया (510)। अंत में दीक्षा ले समाधि-मरण कर अच्युतेंद्र पद पाया (26-27) यह शांतिनाथ भगवान का  पूर्व का 7वाँ भव है। 12. ( ''महापुराण सर्ग संख्या 62/श्लो.'') सुगंधिला देश के सिंहपुर नगर के राजा अर्हदास का पुत्र था (3-10) पहिले अणुव्रत धारण किये (16) फिर एक माह का उत्कृष्ट संन्यास धारण कर अच्युतेंद्र हुआ (45-50) यह भगवान् नेमिनाथ का पूर्व का पाँचवाँ भव है। 13. ( ''हरिवंश पुराण सर्ग 36/श्लो''.) जरासंध का भाई था, कंस की मृत्यु के पश्चात् कृष्ण के साथ युद्ध में मारा गया (72-73)। 14. श्रुतावतार के अनुसार आप भगवान् वीर के पश्चात् तृतीय श्रुतकेवली हुए थे। समय-वी.नि. 92-114, ई.पू.434-412। देखें [[ इतिहास ]]। 4/4। 15. ( ''सिद्धिविनिश्चय / प्रस्तावना 34/पं.महेंद्रकुमार'') आप सुमति आचार्य के शिष्य थे। समय-वि. 494 (ई.437) 16. ( ''भगवती आराधना / प्रस्तावना /पं. नाथूराम प्रेमी'') आप चंद्रनंदि के प्रशिष्य और बलदेवसूरि के शिष्य थे। आपका अपर नाम विजयाचार्य था। आपने भगवती आराधना पर विस्तृत संस्कृत टीका लिखी है। समय-शक 658 (वि. 793) में टीका पूरी की।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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[[Category: अ]]&lt;br /&gt;
[[Category: करणानुयोग]]&lt;br /&gt;
[[Category: प्रथमानुयोग]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; (1) अंतिम केवली जंबूस्वामी के पश्चात् होने वाले ग्यारह अंग और चौदह पूर्व रूप महाविद्याओं के पारगामी पाँच श्रुतकेवलियों में तृतीय श्रुतकेवली । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 2.130-142  &amp;lt;/span&amp;gt;ये अनेक नयों से अति विशुद्ध विचित्र अर्थों के कर्ता, पूर्ण श्रुतज्ञानी और महातपस्वी थे । इनके पूर्व नंदी, नंदिमित्र और गोवर्द्धन तथा बाद में भद्रबाहु हुए थे । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 76.518-521,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 1.61,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वीरवर्द्धमान चरित्र 1.41-44 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) बहुत ऊँचे गोपुर, कोट और तीन परिखाओं से युक्त विजयार्ध की दक्षिण और उत्तर श्रेणी का एक नगर । यह महावत्स की देश की राजधानी था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 19.48,53, 63. 209-214,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 22.87 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;(3) वृषभदेव के पैतीसवें गणधर । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 12.61 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;(4) सातवें तीर्थंकर, सुपार्श्व के पूर्वजन्म का नाम । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 20. 14-24 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;(5) तीर्थंकर मुनिसुव्रत की दीक्षा-शिविका । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 67.40, &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;(6) नवग्रैवेयक के ऊपर स्थित पाँच अनुत्तर विमानों में एक विमान । यहाँ देव तैंतीस सागर प्रमाण आयु पाते हैं । शरीर एक हाथ ऊँचा होता है । साढ़े सोलह मास बीत जाने पर यहाँ वे एक बार श्वास लेते हैं, तैंतीस हजार वर्ष बाद मानसिक आहार करते हैं और प्रवीचार रहित होते हैं । तीर्थंकर सुविधिनाथ पृष्ठ के पूर्वभव में इसी विमान में थे । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 66.16-19  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 20. 31.35, 105. 170-171,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 6.65,33.155 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;7&amp;quot;&amp;gt;(7) चक्रपुर नगर का राजा । इसने तीर्थंकर अरनाथ को आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किये थे । चक्रायुध इसका पुत्र था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 59.239, 65.35-36,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 27.89-90,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 7.28 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;(8) उज्जयिनी नगरी का राजा । इसकी विजया नाम की रानी और उससे उत्पन्न विजयश्री नाम की पुत्री थी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 60. 105 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;9&amp;quot;&amp;gt;(9) जरासंध का पुत्र । इसने तीन सौ छियालीस बार यादवों से युद्ध किया था फिर भी असफल रहा । अंत में यह कृष्ण के बाणों से मारा गया था । इसे जरासंध का भाई भी कहा है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 71.7-70,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 36.71-73, 50.14,18.25 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt;(10) जंबूद्वीप के पूर्व विदेह में स्थित वत्सकावती देश की सुसीमा नगरी में उत्पन्न केवली । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 69.38-39 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;11&amp;quot;&amp;gt;(11) पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन और उसकी रानी श्रीकांता का पुत्र, वज्रनाभि का सहोदर । यह स्वर्ग से च्युत प्रशांत मदन का जीव था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 11.9-10 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;12&amp;quot;&amp;gt;(12) वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी के राजा स्तिमितसागर और उनकी रानी वसुंधरा का पुत्र । इसी राजा की दूसरी रानी से उत्पन्न अनंतवीर्य इसका भाई था । राज्य प्राप्त कर नृत्यांगनाओं के नृत्य में आसक्त होने से यह अपने यहाँ आये नारद का स्वागत नहीं कर सका जिससे कुपित हुए नारद ने दमितारि को युद्ध करने को प्रेरित किया था । इन दोनों भाइयों ने नर्तकी का वेष बनाकर और दमितारि के यहाँ जाकर अपने कलापूर्ण नृत्य से उसे प्रसन्न किया था । दमितारि ने नृत्यकला सीखने के लिए अपनी कन्या कनकश्री इन्हें सौंप दी थी । नर्तकी वेषी इसने अनंतवीर्य के सौंदर्य और शौर्य की प्रशंसा की जिससे प्रभावित होकर कनकश्री ने अनंतवीर्य से मिलना चाहा । अनंतवीर्य अपने रूप में प्रकट हुआ और इसे अपने साथ ले गया । इस कारण हुए युद्ध में दमितारि अनंतवीर्य द्वारा अपने ही चक्र से मारा गया । इसके बाद अनंतवीर्य तीन खंडों का राज्य करके मर गया । उसके वियोग से पीड़ित इसने उसके पुत्र अनंतसेन को राज्य दे दिया और स्वयं यशोधर मुनि से संयमी हुआ । संन्यास मरण करके यह अच्युत स्वर्ग में इंद्र हुआ । इसने बलभद्र का पद पाया था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 62.412-489, 510,63 2-4, 26-27,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 4.248,280,5.3-4 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;13&amp;quot;&amp;gt;(13) इस नाम का हलायुध । यह राम को प्राप्त रत्नों में एक रक्त था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 68.673 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;14&amp;quot;&amp;gt;(14) जंबूद्वीप के पश्चिम विदेह क्षेत्र में सीतोदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित सुगंधिल देश के सिंहपुर नगर के निवासों राजा अर्हद्दास और उसकी रानी जिनदत्ता का पुत्र । इसके जन्म से इसका पिता अजेय हो गया इससे इसे यह नाम प्राप्त हुआ था । मुनि विमवाहन से इसने सम्यग्दर्शन धारण कर अणुव्रत आदि श्रावक के व्रत धारण किये थे । विमलवाहन तीर्थ के दर्शन कर भोजन व ग्रहण करने की प्रतिज्ञा थी आठ दिन के उपवास के बाद इंद्र के आदेश से यक्षपति ने पूर्ण की थी । चारणऋद्धिधारी अमितमति और अमिततेज नामक मुनियों से निज पूर्वभव सुनकर तथा एक मास की आयु शेष ज्ञात कर इसने अपने पुत्र प्रीतिकर को राज्य दे दिया । प्रायोपगमन नामक संन्यास धार कर यह सोलहवें स्वर्ग के सातंकर नाम के विमान में बाईस सागर प्रमाण आयु का धारी अच्युतेंद्र हुआ और वहाँ से च्युत होकर कुरजांगल देश के हस्तिनापुर नगर के राजा श्रीचंद्र की रानी श्रीमती का सुप्रतिष्ठ नाम का पुत्र हुआ । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 70.4-52,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 34.3-43 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;15&amp;quot;&amp;gt;(15) धातकीखंड द्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में सीता नदी के दक्षिणी तट पर स्थित वत्स । देश के सुसीमा नगर का स्वामी । यह अपने पुत्र सुमित्र को राज्य देकर पिहितास्रव मुनि से दीक्षित हुआ तथा समाधिमरण हारा शरीर त्याग कर अहमिंद्र हुआ । वहाँ से चयकर कौशांबी नगरी में तीर्थंकर पद्मप्रभ का पिता, धरण नाम का नृप हुआ । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 52. 2-3, 12-18, 26 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;16&amp;quot;&amp;gt;(16) जंबूद्वीप को घेरे हुए जगती के चारों दिशाओं के चार द्वारों में एक द्वार । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 5.377, 390 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;17&amp;quot;&amp;gt;(17) समवसरण के तीसरे कोट की उत्तर दिशा में निर्मित द्वार के आठ नामों मे एक नाम । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 57.3, 56 16 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category: पुराण-कोष]]&lt;br /&gt;
[[Category: अ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;diff=104376</id>
		<title>अपराजित</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4&amp;diff=104376"/>
		<updated>2022-11-22T13:12:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;﻿&lt;br /&gt;
== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
 &amp;lt;p&amp;gt;1. एक यक्ष-देखें [[ यक्ष ]]; 2. एक ग्रह-देखें [[ ग्रह ]]; 3. कल्पातीत देवों का एक भेद-देखें [[ स्वर्ग#2.1 | स्वर्ग - 2.1]]; 4, अपराजित स्वर्ग-देखें [[ स्वर्ग#5.4 | स्वर्ग - 5.4]]; 5. जंबूद्वीप की वेदिका का उत्तर द्वार-देखें [[ लोक#3.1 | लोक - 3.1]]; 6. अपर विदेहस्थ व प्रवान क्षेत्र की मुख्य नगरी-देखें [[ लोक#5.2 | लोक - 5.2]]; 7. रुचकवर पर्वत का कूट-देखें [[ लोक#5.13 | लोक - 5.13]]; 8. विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी का एक नगर-देखें [[ विद्याधर ]]; 9. विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर-देखें [[ विद्याधर ]]। 10. ( महापुराण सर्ग संख्या 52/श्लो.7) धातकी खंड में सुसीमा देश का राजा था (2-3) प्रव्रज्या ग्रहण कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया और ऊर्ध्व ग्रैवेयक में अहमिंद्र हो गये (12-14) यह पद्मप्रभ भगवान का  पूर्व का तीसरा भव है। 11. ( महापुराण सर्ग संख्या 62/श्लो.) वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी के राजा स्तमितसागर का पुत्र था (412-413) राज्य पाकर नृत्य देखने में आसक्त हो गया और नारद का सत्कार करना भूल गया (430-431) क्रुद्ध नारद ने शत्रु दमितारि को युद्धार्थ प्रस्तुत किया (443) इन्होंने नर्तकी का वेश बना उसकी लड़की का हरण कर लिया और युद्ध में उसको हरा दिया (461-484) तथा बलभद्र पद पाया (510)। अंत में दीक्षा ले समाधि-मरण कर अच्युतेंद्र पद पाया (26-27) यह शांतिनाथ भगवान का  पूर्व का 7वाँ भव है। 12. ( महापुराण सर्ग संख्या 62/श्लो.) सुगंधिला देश के सिंहपुर नगर के राजा अर्हदास का पुत्र था (3-10) पहिले अणुव्रत धारण किये (16) फिर एक माह का उत्कृष्ट संन्यास धारण कर अच्युतेंद्र हुआ (45-50) यह भगवान् नेमिनाथ का पूर्व का पाँचवाँ भव है। 13. ( हरिवंश पुराण सर्ग 36/श्लो.) जरासंध का भाई था, कंस की मृत्यु के पश्चात् कृष्ण के साथ युद्ध में मारा गया (72-73)। 14. श्रुतावतार के अनुसार आप भगवान् वीर के पश्चात् तृतीय श्रुतकेवली हुए थे। समय-वी.नि. 92-114, ई.पू.434-412। देखें [[ इतिहास ]]। 4/4। 15. ( सिद्धिविनिश्चय / प्रस्तावना 34/पं.महेंद्रकुमार) आप सुमति आचार्य के शिष्य थे। समय-वि. 494 (ई.437) 16. ( भगवती आराधना / प्रस्तावना /पं. नाथूराम प्रेमी) आप चंद्रनंदि के प्रशिष्य और बलदेवसूरि के शिष्य थे। आपका अपर नाम विजयाचार्य था। आपने भगवती आराधना पर विस्तृत संस्कृत टीका लिखी है। समय-शक 658 (वि. 793) में टीका पूरी की।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[Category: करणानुयोग]]&lt;br /&gt;
[[Category: प्रथमानुयोग]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; (1) अंतिम केवली जंबूस्वामी के पश्चात् होने वाले ग्यारह अंग और चौदह पूर्व रूप महाविद्याओं के पारगामी पाँच श्रुतकेवलियों में तृतीय श्रुतकेवली । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 2.130-142  &amp;lt;/span&amp;gt;ये अनेक नयों से अति विशुद्ध विचित्र अर्थों के कर्ता, पूर्ण श्रुतज्ञानी और महातपस्वी थे । इनके पूर्व नंदी, नंदिमित्र और गोवर्द्धन तथा बाद में भद्रबाहु हुए थे । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 76.518-521,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 1.61,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; वीरवर्द्धमान चरित्र 1.41-44 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) बहुत ऊँचे गोपुर, कोट और तीन परिखाओं से युक्त विजयार्ध की दक्षिण और उत्तर श्रेणी का एक नगर । यह महावत्स की देश की राजधानी था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 19.48,53, 63. 209-214,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 22.87 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;3&amp;quot;&amp;gt;(3) वृषभदेव के पैतीसवें गणधर । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 12.61 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;4&amp;quot;&amp;gt;(4) सातवें तीर्थंकर, सुपार्श्व के पूर्वजन्म का नाम । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 20. 14-24 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;5&amp;quot;&amp;gt;(5) तीर्थंकर मुनिसुव्रत की दीक्षा-शिविका । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 67.40, &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;6&amp;quot;&amp;gt;(6) नवग्रैवेयक के ऊपर स्थित पाँच अनुत्तर विमानों में एक विमान । यहाँ देव तैंतीस सागर प्रमाण आयु पाते हैं । शरीर एक हाथ ऊँचा होता है । साढ़े सोलह मास बीत जाने पर यहाँ वे एक बार श्वास लेते हैं, तैंतीस हजार वर्ष बाद मानसिक आहार करते हैं और प्रवीचार रहित होते हैं । तीर्थंकर सुविधिनाथ पृष्ठ के पूर्वभव में इसी विमान में थे । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 66.16-19  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पद्मपुराण 20. 31.35, 105. 170-171,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 6.65,33.155 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;7&amp;quot;&amp;gt;(7) चक्रपुर नगर का राजा । इसने तीर्थंकर अरनाथ को आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किये थे । चक्रायुध इसका पुत्र था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 59.239, 65.35-36,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 27.89-90,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 7.28 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;8&amp;quot;&amp;gt;(8) उज्जयिनी नगरी का राजा । इसकी विजया नाम की रानी और उससे उत्पन्न विजयश्री नाम की पुत्री थी । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 60. 105 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;9&amp;quot;&amp;gt;(9) जरासंध का पुत्र । इसने तीन सौ छियालीस बार यादवों से युद्ध किया था फिर भी असफल रहा । अंत में यह कृष्ण के बाणों से मारा गया था । इसे जरासंध का भाई भी कहा है । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 71.7-70,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 36.71-73, 50.14,18.25 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;10&amp;quot;&amp;gt;(10) जंबूद्वीप के पूर्व विदेह में स्थित वत्सकावती देश की सुसीमा नगरी में उत्पन्न केवली । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 69.38-39 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;11&amp;quot;&amp;gt;(11) पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन और उसकी रानी श्रीकांता का पुत्र, वज्रनाभि का सहोदर । यह स्वर्ग से च्युत प्रशांत मदन का जीव था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 11.9-10 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;12&amp;quot;&amp;gt;(12) वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी के राजा स्तिमितसागर और उनकी रानी वसुंधरा का पुत्र । इसी राजा की दूसरी रानी से उत्पन्न अनंतवीर्य इसका भाई था । राज्य प्राप्त कर नृत्यांगनाओं के नृत्य में आसक्त होने से यह अपने यहाँ आये नारद का स्वागत नहीं कर सका जिससे कुपित हुए नारद ने दमितारि को युद्ध करने को प्रेरित किया था । इन दोनों भाइयों ने नर्तकी का वेष बनाकर और दमितारि के यहाँ जाकर अपने कलापूर्ण नृत्य से उसे प्रसन्न किया था । दमितारि ने नृत्यकला सीखने के लिए अपनी कन्या कनकश्री इन्हें सौंप दी थी । नर्तकी वेषी इसने अनंतवीर्य के सौंदर्य और शौर्य की प्रशंसा की जिससे प्रभावित होकर कनकश्री ने अनंतवीर्य से मिलना चाहा । अनंतवीर्य अपने रूप में प्रकट हुआ और इसे अपने साथ ले गया । इस कारण हुए युद्ध में दमितारि अनंतवीर्य द्वारा अपने ही चक्र से मारा गया । इसके बाद अनंतवीर्य तीन खंडों का राज्य करके मर गया । उसके वियोग से पीड़ित इसने उसके पुत्र अनंतसेन को राज्य दे दिया और स्वयं यशोधर मुनि से संयमी हुआ । संन्यास मरण करके यह अच्युत स्वर्ग में इंद्र हुआ । इसने बलभद्र का पद पाया था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 62.412-489, 510,63 2-4, 26-27,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; पांडवपुराण 4.248,280,5.3-4 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;13&amp;quot;&amp;gt;(13) इस नाम का हलायुध । यह राम को प्राप्त रत्नों में एक रक्त था । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 68.673 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;14&amp;quot;&amp;gt;(14) जंबूद्वीप के पश्चिम विदेह क्षेत्र में सीतोदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित सुगंधिल देश के सिंहपुर नगर के निवासों राजा अर्हद्दास और उसकी रानी जिनदत्ता का पुत्र । इसके जन्म से इसका पिता अजेय हो गया इससे इसे यह नाम प्राप्त हुआ था । मुनि विमवाहन से इसने सम्यग्दर्शन धारण कर अणुव्रत आदि श्रावक के व्रत धारण किये थे । विमलवाहन तीर्थ के दर्शन कर भोजन व ग्रहण करने की प्रतिज्ञा थी आठ दिन के उपवास के बाद इंद्र के आदेश से यक्षपति ने पूर्ण की थी । चारणऋद्धिधारी अमितमति और अमिततेज नामक मुनियों से निज पूर्वभव सुनकर तथा एक मास की आयु शेष ज्ञात कर इसने अपने पुत्र प्रीतिकर को राज्य दे दिया । प्रायोपगमन नामक संन्यास धार कर यह सोलहवें स्वर्ग के सातंकर नाम के विमान में बाईस सागर प्रमाण आयु का धारी अच्युतेंद्र हुआ और वहाँ से च्युत होकर कुरजांगल देश के हस्तिनापुर नगर के राजा श्रीचंद्र की रानी श्रीमती का सुप्रतिष्ठ नाम का पुत्र हुआ । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 70.4-52,  &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 34.3-43 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;15&amp;quot;&amp;gt;(15) धातकीखंड द्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में सीता नदी के दक्षिणी तट पर स्थित वत्स । देश के सुसीमा नगर का स्वामी । यह अपने पुत्र सुमित्र को राज्य देकर पिहितास्रव मुनि से दीक्षित हुआ तथा समाधिमरण हारा शरीर त्याग कर अहमिंद्र हुआ । वहाँ से चयकर कौशांबी नगरी में तीर्थंकर पद्मप्रभ का पिता, धरण नाम का नृप हुआ । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 52. 2-3, 12-18, 26 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;16&amp;quot;&amp;gt;(16) जंबूद्वीप को घेरे हुए जगती के चारों दिशाओं के चार द्वारों में एक द्वार । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 5.377, 390 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;17&amp;quot;&amp;gt;(17) समवसरण के तीसरे कोट की उत्तर दिशा में निर्मित द्वार के आठ नामों मे एक नाम । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 57.3, 56 16 &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपरसंग्रह</title>
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		<updated>2022-11-22T13:05:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p&amp;gt;आगम के 7 नयों में संग्रह नय का एक भेद-देखें [[ नय#III.4 | नय - III.4]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपरव्यवहार</title>
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		<updated>2022-11-22T13:00:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;﻿ &amp;lt;p&amp;gt;आगम के  7 नयों में व्यवहारनय का एक भेद-देखें [[ नय#V.4 | नय - V.4]]।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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[[Category: द्रव्यानुयोग]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Poonam Jain</name></author>
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		<title>अपध्यान</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Poonam Jain: &lt;/p&gt;
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== सिद्धांतकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;रत्नकरंडश्रावकाचार श्लोक 78 वधबंधच्छेदादेर्द्वेषाद्रागाच्च परकलत्रादेः। आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदः ॥78॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= जिनशासन में चतुर पुरुष, राग से अथवा द्वेष से अन्य की स्त्री आदि के नाश होने, कैद होने, कट जाने आदि के चिंतन करने को आध्यान या उपध्याननामा अनर्थदंड कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;सर्वार्थसिद्धि अध्याय 7/21/360 परेषां जयपराजयवधबंधनांगच्छेदपरस्वहरणादि कथं स्यादिति मनसा चिंतनमपध्यानम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= दूसरों की जय, पराजय, मारना, बाँधना, अंगों का छेदना, और धन का अपहरण आदि कैसे किया जाये इस प्रकार मन से विचार करना अपध्यान है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;(राजवार्तिक अध्याय 7/21/21/549/7) ( चारित्रसार पृष्ठ 16/5) ( पुरुषार्थसिद्ध्युपाय श्लोक 141)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;चारित्रसार पृष्ठ 171/3 उभयमप्येतदपध्यानमम्।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= ये दोनों आर्त व रौद्रध्यान अपध्यान हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( सागार धर्मामृत अधिकार 5/9)&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;कार्तिकेयानुप्रेक्षा / मूल या टीका गाथा 344 परदोसाण वि गहणं परलच्छीणं समीहणं जं च। परइत्थी अवलोओ परकलहालोयणं पढमं ॥344॥&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= पर के दोषों का ग्रहण करना, पर की लक्ष्मी को चाहना, परायी स्त्री को ताकना तथा परायी कलह को देखना प्रथम (अपध्यान) अनर्थदंड है।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;SanskritText&amp;quot;&amp;gt;द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 22/66/9 स्वयं विषयानुभवरहितोऽप्ययंजीवः परकीयविषयानुभवं दृष्टं श्रुतं च मनसि स्मृत्वा यद्विषयाभिलाषं करोति तदपध्यानं भण्यते।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;= स्वयं विषयों के अनुभव से रहित भी यह जीव अन्य के देखे हुए तथा सुने हुए विषय के अनुभव को मन में स्मरण करके विषयों की इच्छा करता है, उसको अपध्यान कहते हैं।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p&amp;gt;( प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 158/219)।&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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== पुराणकोष से ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;HindiText&amp;quot;&amp;gt;  &amp;lt;p id=&amp;quot;1&amp;quot;&amp;gt; (1) ध्यान का विपरीत रूप-बुद्धि का अपने आधीन न होता । यह विषयों में तृष्णा बढ़ाने वाली मन की दुष्प्रणिधान नाम की प्रवृत्ति से होता है । इसमें अशुभ भाव होते हैं । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; महापुराण 21. 11, 25   &amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;p id=&amp;quot;2&amp;quot;&amp;gt;(2) अनर्थदंड का दूसरा भेद-अपनी जय और पर की पराजय तथा अहित का चिंतन । अनर्थदंडव्रती इस प्रकार का चिंतन नहीं करता । &amp;lt;span class=&amp;quot;GRef&amp;quot;&amp;gt; हरिवंशपुराण 58.146,149  &amp;lt;/span&amp;gt;देखें [[ अनर्थदंडव्रत ]]&amp;lt;/p&amp;gt;&lt;br /&gt;
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