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 <p id="1">(1) सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25. 113 </span></p>
<span class="GRef"> पंचास्तिकाय/28</span>  <span class="PrakritGatha">कम्ममलविप्पमुक्को उड्ढं लोगस्स  अंतमधिगंता । सो सव्वणाणदरिसी लहदिं सुहमणिंदियमणंतं ।28।</span> = <span class="HindiText">कर्ममल से मुक्त आत्मा ऊर्ध्वलोक के अंत को प्राप्त करके सर्वज्ञ सर्वदर्शी अनंत अतिंद्रिय सुख का  अनुभव करता है । </span><br />
<p id="2">(2) जीवों का एक भेद । ये अष्टकर्मों से रहित, सम्यक्त्व आदि आठ गुणों से विभूषित, सुख के सागर, सर्व दुःखों से रहित लोकाग्रवासी, सर्व बाधाओं से विमुक्त, ज्ञानशरीरी और अनन्त गुणसम्पन्न होते हैं । इन्हें अन्तराय से रहित अतुल और अनन्त सुख होता है । इनमें अचलत्व, अक्षयत्व, अव्याबाधत्व, अनन्तज्ञानत्व, अनन्तदर्शनत्व, अनन्तवीर्यता, अनन्तसुखता, नीरजस्त्व, निर्मलत्व, अच्छेद्यत्व, अभेद्यत्व, अक्षरत्व, अप्रमेयत्व, अगौरवलाघव, अक्षोभ्यत्व, अविलीनत्व, परमसिद्धता ये गुण भी होते हैं । <span class="GRef"> महापुराण 24.88-89, 42.97-107, 67.5, 10, </span><span class="GRef"> पद्मपुराण 105.148, </span><span class="GRef"> वीरवर्द्धमान चरित्र 16.33-35 </span></p>
<span class="GRef"> नयचक्र बृहद्/107  </span><span class="PrakritGatha">णट्ठट्ठकम्मसुद्धा असरीराणंतसोक्खणाणट्ठा । परमपहुत्तं पत्ता जे ते सिद्धा हु खलु मुक्का ।107। </span>=  <span class="HindiText">जिनके अष्ट कर्म नष्ट हो गये हैं, शरीर रहित हैं, अनंतसुख व अनंतज्ञान में आसीन हैं और परम प्रभुत्व को  प्राप्त हैं ऐसे सिद्ध भगवान् मुक्त हैं । </span><br />
 
<span class="HindiText">अधिक जानकारी के लिये देखें [[ मोक्ष ]]। </span>
   
   


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[[ मुकुन्द | पूर्व पृष्ठ ]]
[[ मुकुट सप्तमी व्रत | पूर्व पृष्ठ ]]


[[ मुक्त जीवों का मृत शरीर आकार ऊर्ध्व गमन व अवस्थान | अगला पृष्ठ ]]
[[ मुक्त जीवों का मृत शरीर आकार ऊर्ध्व गमन व अवस्थान | अगला पृष्ठ ]]


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[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: म]]
[[Category: म]]
[[Category: करणानुयोग]]

Latest revision as of 14:51, 28 June 2023

पंचास्तिकाय/28 कम्ममलविप्पमुक्को उड्ढं लोगस्स अंतमधिगंता । सो सव्वणाणदरिसी लहदिं सुहमणिंदियमणंतं ।28। = कर्ममल से मुक्त आत्मा ऊर्ध्वलोक के अंत को प्राप्त करके सर्वज्ञ सर्वदर्शी अनंत अतिंद्रिय सुख का अनुभव करता है ।
 नयचक्र बृहद्/107 णट्ठट्ठकम्मसुद्धा असरीराणंतसोक्खणाणट्ठा । परमपहुत्तं पत्ता जे ते सिद्धा हु खलु मुक्का ।107। = जिनके अष्ट कर्म नष्ट हो गये हैं, शरीर रहित हैं, अनंतसुख व अनंतज्ञान में आसीन हैं और परम प्रभुत्व को प्राप्त हैं ऐसे सिद्ध भगवान् मुक्त हैं ।


अधिक जानकारी के लिये देखें मोक्ष ।


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