• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

भव: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 13:01, 14 October 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
← Older edit
Latest revision as of 15:15, 27 November 2023 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
 
(4 intermediate revisions by 2 users not shown)
Line 1: Line 1:
== सिद्धांतकोष से ==

== सिद्धांतकोष से ==
<ol>
<ol>
   <li><span class="HindiText"><strong name="1" id="1">भव</strong></span><br />
   <li class="HindiText"><strong name="1" id="1">भव</strong></span><br />
     <span class="GRef"> सर्वार्थसिद्धि/1/21/125/6  </span><span class="SanskritText">आयुर्नामकर्मोदयनिमित्त  आत्मनः पर्यायो भवः। </span>= <span class="HindiText">आयुनामकर्म के उदय का निमित्त पाकर जो जीव की पर्याय होती  है उसे भव कहते हैं। (<span class="GRef"> राजवार्तिक/1/2179/6 </span>)। </span><br />
     <span class="GRef"> सर्वार्थसिद्धि/1/21/125/6  </span><span class="SanskritText">आयुर्नामकर्मोदयनिमित्त  आत्मनः पर्यायो भवः। </span>= <span class="HindiText">आयुनामकर्म के उदय का निमित्त पाकर जो जीव की पर्याय होती  है उसे भव कहते हैं। <span class="GRef">( राजवार्तिक/1/2179/6 )</span>। </span><br />
     <span class="GRef"> धवला 10/4,2,4,8/35/5  </span><span class="SanskritText">उत्पत्तिवारा भवाः। </span>= <span class="HindiText">उत्पत्ति के वारों का नाम भव है।</span><br />
     <span class="GRef"> धवला 10/4,2,4,8/35/5  </span><span class="SanskritText">उत्पत्तिवारा भवाः। </span>= <span class="HindiText">उत्पत्ति के वारों का नाम भव है।</span><br />
     <span class="GRef"> धवला 15/5/5/14  </span><span class="PrakritText">उप्पण्णवढमयप्पहुडि जाव चरिमसमओ  त्ति जो अवत्थाविसेसो सो भवो णाम। </span>= <span class="HindiText">उत्पन्न होने के प्रथम समय से लेकर अंतिम समय  तक जो विशेष अवस्था रहती है, उसे भव कहते हैं।</span><br />
     <span class="GRef"> धवला 15/5/5/14  </span><span class="PrakritText">उप्पण्णवढमयप्पहुडि जाव चरिमसमओ  त्ति जो अवत्थाविसेसो सो भवो णाम। </span>= <span class="HindiText">उत्पन्न होने के प्रथम समय से लेकर अंतिम समय  तक जो विशेष अवस्था रहती है, उसे भव कहते हैं।</span><br />
   <span class="GRef"> भगवती आराधना / विजयोदया टीका/25/18  </span>पर उद्धृत–<span class="PrakritText">देहो भवोत्ति  उवुच्चदि ...। </span>= <span class="HindiText">देह को भव कहते हैं। </span></li>
   <span class="GRef"> भगवती आराधना / विजयोदया टीका/25/18  </span>पर उद्धृत–<span class="PrakritText">देहो भवोत्ति  उवुच्चदि ...। </span>= <span class="HindiText">देह को भव कहते हैं। </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="2" id="2"> क्षुल्लक  भव का लक्षण</strong> </span><br />
   <li class="HindiText"><strong name="2" id="2"> क्षुल्लक  भव का लक्षण</strong> </span><br />
   <span class="GRef"> धवला 14/5,6,646/504/2  </span><span class="PrakritText">आउअबंधे संते जो उवरि विस्समणकालो  सव्वजहण्णो तस्स खुद्दा भवग्गहणं ति सण्णा। सो त्तो उवरि होदि।...  असंखेयद्धस्सुवरि खुद्धाभवगहणं त्ति वुत्ते।</span> = <span class="HindiText">आयु बंध के होने पर जो सबसे जघन्य  विश्रमण काल है उसकी क्षुल्लक भव ग्रहण संज्ञा है। वह आयु बंधकाल के ऊपर होता है।  ... असंक्षेपाद्धाके ऊपर (मृत्युपर्यंत) क्षुल्लक भव ग्रहण है।</span></li>
   <span class="GRef"> धवला 14/5,6,646/504/2  </span><span class="PrakritText">आउअबंधे संते जो उवरि विस्समणकालो  सव्वजहण्णो तस्स खुद्दा भवग्गहणं ति सण्णा। सो त्तो उवरि होदि।...  असंखेयद्धस्सुवरि खुद्धाभवगहणं त्ति वुत्ते।</span> = <span class="HindiText">आयु बंध के होने पर जो सबसे जघन्य  विश्रमण काल है उसकी क्षुल्लक भव ग्रहण संज्ञा है। वह आयु बंधकाल के ऊपर होता है।  ... असंक्षेपाद्धाके ऊपर (मृत्युपर्यंत) क्षुल्लक भव ग्रहण है।</span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="3" id="3">अन्य संबंधित विषय</strong> <br />
   <li class="HindiText"><strong name="3" id="3">अन्य संबंधित विषय</strong> <br />
     </span>
     </span>
     <ol>
     <ol>
Line 34: Line 35:


== पुराणकोष से ==
== पुराणकोष से ==
  <p id="1"> (1) अनागत ग्यारह रुद्रों में छठा रुद्र । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 60. 571 </span></p>
<div class="HindiText"> <p id="1" class="HindiText"> (1) अनागत ग्यारह रुद्रों में छठा रुद्र । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_60#571|हरिवंशपुराण - 60.571]] </span></p>
<p id="2">(2) जंबूस्वामी का प्रमुख शिष्य । <span class="GRef"> महापुराण 76.120 </span></p>
<p id="2" class="HindiText">(2) जंबूस्वामी का प्रमुख शिष्य । <span class="GRef"> महापुराण 76.120 </span></p>
<p id="3">(3) चारों गतियों में भ्रमण करने वाले जीवों को वर्तमान शरीर त्यागने के बाद प्राप्त होने वाला आगामी दूसरा शरीर । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 56. 47 </span></p>
<p id="3" class="HindiText">(3) चारों गतियों में भ्रमण करने वाले जीवों को वर्तमान शरीर त्यागने के बाद प्राप्त होने वाला आगामी दूसरा शरीर । <span class="GRef"> [[ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_56#47|हरिवंशपुराण - 56.47]] </span></p>
<p id="4">(4) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25.117 </span></p>
<p id="4" class="HindiText">(4) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25.117 </span></p>
  </div>


<noinclude>
<noinclude>
Line 48: Line 49:
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: भ]]
[[Category: भ]]
[[Category: प्रथमानुयोग]]
[[Category: करणानुयोग]]

Latest revision as of 15:15, 27 November 2023



सिद्धांतकोष से

  1. भव
    सर्वार्थसिद्धि/1/21/125/6 आयुर्नामकर्मोदयनिमित्त आत्मनः पर्यायो भवः। = आयुनामकर्म के उदय का निमित्त पाकर जो जीव की पर्याय होती है उसे भव कहते हैं। ( राजवार्तिक/1/2179/6 )।
    धवला 10/4,2,4,8/35/5 उत्पत्तिवारा भवाः। = उत्पत्ति के वारों का नाम भव है।
    धवला 15/5/5/14 उप्पण्णवढमयप्पहुडि जाव चरिमसमओ त्ति जो अवत्थाविसेसो सो भवो णाम। = उत्पन्न होने के प्रथम समय से लेकर अंतिम समय तक जो विशेष अवस्था रहती है, उसे भव कहते हैं।
    भगवती आराधना / विजयोदया टीका/25/18 पर उद्धृत–देहो भवोत्ति उवुच्चदि ...। = देह को भव कहते हैं।
  2. क्षुल्लक भव का लक्षण
    धवला 14/5,6,646/504/2 आउअबंधे संते जो उवरि विस्समणकालो सव्वजहण्णो तस्स खुद्दा भवग्गहणं ति सण्णा। सो त्तो उवरि होदि।... असंखेयद्धस्सुवरि खुद्धाभवगहणं त्ति वुत्ते। = आयु बंध के होने पर जो सबसे जघन्य विश्रमण काल है उसकी क्षुल्लक भव ग्रहण संज्ञा है। वह आयु बंधकाल के ऊपर होता है। ... असंक्षेपाद्धाके ऊपर (मृत्युपर्यंत) क्षुल्लक भव ग्रहण है।
  3. अन्य संबंधित विषय
    1. सम्यग्दृष्टि को भव धारण की सीमा–देखें सम्यग्दर्शन - I.5।
    2. श्रावक को भव धारण की सीमा–देखें श्रावक - 2।
    3. एक अंतर्मुहूर्त में संभव क्षुद्रभवों का प्रमाण–देखें आयु - 7।
    4. नरक गति में पुनःपुनः भव धारण की सीमा–देखें जन्म - 6.10।
    5. लब्ध्यपर्याप्तकों में पुनः पुनः भव धारण की सीमा–देखें आयु - 7।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

(1) अनागत ग्यारह रुद्रों में छठा रुद्र । हरिवंशपुराण - 60.571

(2) जंबूस्वामी का प्रमुख शिष्य । महापुराण 76.120

(3) चारों गतियों में भ्रमण करने वाले जीवों को वर्तमान शरीर त्यागने के बाद प्राप्त होने वाला आगामी दूसरा शरीर । हरिवंशपुराण - 56.47

(4) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.117


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=भव&oldid=127124"
Categories:
  • भ
  • पुराण-कोष
  • प्रथमानुयोग
  • करणानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 15:15.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki