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मैत्री: Difference between revisions

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<p>भ. आ./मू. व वि. /१६९६/१५१६/१२ <span class="SanskritText">‘जीवेसु मित्तचिंता मेत्ती’− जीवेसु मित्तचिंता अनंतकालं  चतसृषु गतिषु परिभ्रमतो घटीयन्त्रवत्सर्वे प्राणभृतोऽपि बहुशः कृतमहोपकारा इति  तेषु मित्रताचिंता मैत्री ।</span> =<span class="HindiText"> अनन्तकाल से मेरा आत्मा घटीयंत्र के समान इस  चतुर्गतिमय संसार में भ्रमण कर रहा है । इस संसार में सम्पूर्ण प्राणियों ने मेरे  ऊपर अनेक बार महान्‌ उपकार किये हैं’ ऐसा मन में जो विचार  करना, वह मैत्री भावना है । </span><br />
== सिद्धांतकोष से ==
   स. सि./७/११/३४९/७ <span class="SanskritText">परेषां दुःखानुत्पत्तयभिलाषा  मैत्री ।</span> =<span class="HindiText"> दूसरों को दुःख न हो ऐसी अभिलाषा रखना मैत्री है। (रा. वा./७/११/१/५३८/१४)। </span><br />
<p>भ. आ./मू. व वि. /1696/1516/12 <span class="SanskritText">‘जीवेसु मित्तचिंता मेत्ती’− जीवेसु मित्तचिंता अनंतकालं  चतसृषु गतिषु परिभ्रमतो घटीयन्त्रवत्सर्वे प्राणभृतोऽपि बहुशः कृतमहोपकारा इति  तेषु मित्रताचिंता मैत्री ।</span> =<span class="HindiText"> अनन्तकाल से मेरा आत्मा घटीयंत्र के समान इस  चतुर्गतिमय संसार में भ्रमण कर रहा है । इस संसार में सम्पूर्ण प्राणियों ने मेरे  ऊपर अनेक बार महान् उपकार किये हैं’ ऐसा मन में जो विचार  करना, वह मैत्री भावना है । </span><br />
ज्ञा./२७/५-७<span class="SanskritText"> क्षुद्रेतरविकल्पेषु चरस्थिरशरीरिषु  । सुखदुःखाद्यवस्थासु संसृतेषु यथायथम्‌ ।५। नानायोनिगतेष्वेषु समत्वेनाविराधिका ।  साध्वी महत्त्वमापन्ना मतिर्मैत्रीति पठ्‍यते ।६। जीवन्तु जन्तवः सर्वे  क्लेशव्यसनवर्जिताः । प्राप्नुवन्ति सुखं त्यक्त्वा वैरं पापं पराभवम्‌ ।७ । </span>=<span class="HindiText"> सूक्ष्म और बादर भेदरूप त्रस स्थावर प्राणी सुख-दुःखादि अवस्थाओं में जैसे-तैसे  तिष्ठे हों तथा नाना भेदरूप योनियों में प्राप्त होने वाले जीवों में समानता  विराधने वाली न हो ऐसी महत्ता को प्राप्त हुई समीचीन बुद्धि मैत्री भावना कही जाती  है ।५-६। इसमें ऐसी भावना रहती है कि−ये सब जीव कष्ट व आपदाओं से वर्जित हो जाओ, तथा वैर, पाप, अपमान को छोड़कर सुख को प्राप्त होओ ।७। </span></p>
   स. सि./7/11/349/7 <span class="SanskritText">परेषां दुःखानुत्पत्तयभिलाषा  मैत्री ।</span> =<span class="HindiText"> दूसरों को दुःख न हो ऐसी अभिलाषा रखना मैत्री है। (रा. वा./7/11/1/538/14)। </span><br />
ज्ञा./27/5-7<span class="SanskritText"> क्षुद्रेतरविकल्पेषु चरस्थिरशरीरिषु  । सुखदुःखाद्यवस्थासु संसृतेषु यथायथम् ।5। नानायोनिगतेष्वेषु समत्वेनाविराधिका ।  साध्वी महत्त्वमापन्ना मतिर्मैत्रीति पठ्यते ।6। जीवन्तु जन्तवः सर्वे  क्लेशव्यसनवर्जिताः । प्राप्नुवन्ति सुखं त्यक्त्वा वैरं पापं पराभवम् ।7 । </span>=<span class="HindiText"> सूक्ष्म और बादर भेदरूप त्रस स्थावर प्राणी सुख-दुःखादि अवस्थाओं में जैसे-तैसे  तिष्ठे हों तथा नाना भेदरूप योनियों में प्राप्त होने वाले जीवों में समानता  विराधने वाली न हो ऐसी महत्ता को प्राप्त हुई समीचीन बुद्धि मैत्री भावना कही जाती  है ।5-6। इसमें ऐसी भावना रहती है कि−ये सब जीव कष्ट व आपदाओं से वर्जित हो जाओ, तथा वैर, पाप, अपमान को छोड़कर सुख को प्राप्त होओ ।7। </span></p>


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== पुराणकोष से ==
<p id="1"> (1) मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ इन चार भावनाओं में प्रथम भावना-प्राणियों के सुखी रहने की समीचीन बुद्धि । <span class="GRef"> महापुराण 20. 65 </span></p>
<p id="2">(2) मित्रता― दो प्राणियों का एकचित्त होना । <span class="GRef"> महापुराण 46.40  </span></p>
 
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[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: म]]

Revision as of 21:46, 5 July 2020

== सिद्धांतकोष से ==

भ. आ./मू. व वि. /1696/1516/12 ‘जीवेसु मित्तचिंता मेत्ती’− जीवेसु मित्तचिंता अनंतकालं चतसृषु गतिषु परिभ्रमतो घटीयन्त्रवत्सर्वे प्राणभृतोऽपि बहुशः कृतमहोपकारा इति तेषु मित्रताचिंता मैत्री । = अनन्तकाल से मेरा आत्मा घटीयंत्र के समान इस चतुर्गतिमय संसार में भ्रमण कर रहा है । इस संसार में सम्पूर्ण प्राणियों ने मेरे ऊपर अनेक बार महान् उपकार किये हैं’ ऐसा मन में जो विचार करना, वह मैत्री भावना है ।
स. सि./7/11/349/7 परेषां दुःखानुत्पत्तयभिलाषा मैत्री । = दूसरों को दुःख न हो ऐसी अभिलाषा रखना मैत्री है। (रा. वा./7/11/1/538/14)।
ज्ञा./27/5-7 क्षुद्रेतरविकल्पेषु चरस्थिरशरीरिषु । सुखदुःखाद्यवस्थासु संसृतेषु यथायथम् ।5। नानायोनिगतेष्वेषु समत्वेनाविराधिका । साध्वी महत्त्वमापन्ना मतिर्मैत्रीति पठ्यते ।6। जीवन्तु जन्तवः सर्वे क्लेशव्यसनवर्जिताः । प्राप्नुवन्ति सुखं त्यक्त्वा वैरं पापं पराभवम् ।7 । = सूक्ष्म और बादर भेदरूप त्रस स्थावर प्राणी सुख-दुःखादि अवस्थाओं में जैसे-तैसे तिष्ठे हों तथा नाना भेदरूप योनियों में प्राप्त होने वाले जीवों में समानता विराधने वाली न हो ऐसी महत्ता को प्राप्त हुई समीचीन बुद्धि मैत्री भावना कही जाती है ।5-6। इसमें ऐसी भावना रहती है कि−ये सब जीव कष्ट व आपदाओं से वर्जित हो जाओ, तथा वैर, पाप, अपमान को छोड़कर सुख को प्राप्त होओ ।7।


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पुराणकोष से

(1) मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ इन चार भावनाओं में प्रथम भावना-प्राणियों के सुखी रहने की समीचीन बुद्धि । महापुराण 20. 65

(2) मित्रता― दो प्राणियों का एकचित्त होना । महापुराण 46.40


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