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देखें [[ वेदनीय ]]
<span class="GRef"> राजवार्तिक/8/8/1-2/573/20  </span><span class="SanskritText">देवादिषु गतिषु  बहुप्रकारजातिविशिष्टासु यस्यादयात् अनगृहीत (तृ द्रव्यसंबंधापेक्षात्  प्राणिनां शरीरमानसानेकविधसुखपरिणामस्तत्सद्वेद्यम् । प्रशस्तं वेद्यं सद्वेद्यं  ।1। नारकादिषु गतिषु नानाप्रकारजातिविशेषावकीर्णासु कायिकं बहुविधं मानसं वाति  दुःसहं जन्मजरामरणप्रियविप्रयोगाप्रियसंयोगव्याधिवधबंधादिजनितं दुःखं यस्य फलं  प्राणिनां तदसद्वद्यम् । अप्रशस्तं वेद्यम्   असद्वेद्यम् । </span>= <span class="HindiText">बहुत प्रकार की जाति-विशिष्ट देव आदि गतियों में इष्ट  सामग्री के सन्निधान की अपेक्षा प्राणियों के अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक  सुखों का, जिसके उदय से अनुभव होता है  वह '''साता वेदनीय''' है और जिसके उदय से नाना प्रकार जातिरूप विशेषों से अवकीर्ण नरक आदि  गतियों में बहुत प्रकार के कायिक, मानस, अतिदुःसह जन्म-जरा-मरण, प्रियवियोग,  अप्रियसंयोग, व्याधि, वध और बंध आदि से जनित दुःख का अनुभव होता है वह असातावेदनीय  है । </span><br />
 
<p  class="HindiText">अधिक जानकारी के लिये देखें [[ वेदनीय#3 | वेदनीय 3 ]] </p>


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[[Category: स]]
[[Category: स]]
[[Category: करणानुयोग]]

Latest revision as of 10:11, 22 February 2024

राजवार्तिक/8/8/1-2/573/20 देवादिषु गतिषु बहुप्रकारजातिविशिष्टासु यस्यादयात् अनगृहीत (तृ द्रव्यसंबंधापेक्षात् प्राणिनां शरीरमानसानेकविधसुखपरिणामस्तत्सद्वेद्यम् । प्रशस्तं वेद्यं सद्वेद्यं ।1। नारकादिषु गतिषु नानाप्रकारजातिविशेषावकीर्णासु कायिकं बहुविधं मानसं वाति दुःसहं जन्मजरामरणप्रियविप्रयोगाप्रियसंयोगव्याधिवधबंधादिजनितं दुःखं यस्य फलं प्राणिनां तदसद्वद्यम् । अप्रशस्तं वेद्यम्  असद्वेद्यम् । = बहुत प्रकार की जाति-विशिष्ट देव आदि गतियों में इष्ट सामग्री के सन्निधान की अपेक्षा प्राणियों के अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक सुखों का, जिसके उदय से अनुभव होता है वह साता वेदनीय है और जिसके उदय से नाना प्रकार जातिरूप विशेषों से अवकीर्ण नरक आदि गतियों में बहुत प्रकार के कायिक, मानस, अतिदुःसह जन्म-जरा-मरण, प्रियवियोग, अप्रियसंयोग, व्याधि, वध और बंध आदि से जनित दुःख का अनुभव होता है वह असातावेदनीय है ।

अधिक जानकारी के लिये देखें वेदनीय 3


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