• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

वचनयोग: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 10:58, 4 March 2024 (view source)
J2jinendra (talk | contribs)
No edit summary
← Older edit
Latest revision as of 10:59, 4 March 2024 (view source)
J2jinendra (talk | contribs)
No edit summary
 
Line 1: Line 1:
<span class="GRef"> सर्वार्थसिद्धि/6/1/318/9  </span><span class="SanskritText">शरीरनामकर्मोदयापादितवाग्वर्गणालंबने सति वीर्यांतरायमत्यक्षराद्यावरण- क्षयोपशमापादिताभ्यंतरवाग्लब्धिसांनिध्ये  वाक्परिणामाभिमुखस्यात्मनः प्रदेशपरिस्पंदो वाग्योगः।</span> = <span class="HindiText">शरीर नामकर्म के उदय से  प्राप्त हुई वचनवर्गणाओं का आलंबन होने पर तथा वीर्यांतराय और मत्यक्षरादि आवरण  के क्षयोपशम से प्राप्त हुई भीतरी वचन लब्धि के मिलने पर वचनरूप पर्याय के अभिमुख  हुए आत्मा के होने वाला प्रदेश-परिस्पंद '''वचनयोग''' कहलाता है। </span><br />
<span class="GRef"> सर्वार्थसिद्धि/6/1/318/9  </span><span class="SanskritText">शरीरनामकर्मोदयापादितवाग्वर्गणालंबने सति वीर्यांतरायमत्यक्षराद्यावरण- क्षयोपशमापादिताभ्यंतरवाग्लब्धिसांनिध्ये  वाक्परिणामाभिमुखस्यात्मनः प्रदेशपरिस्पंदो वाग्योगः।</span> = <span class="HindiText">शरीर नामकर्म के उदय से  प्राप्त हुई वचनवर्गणाओं का आलंबन होने पर तथा वीर्यांतराय और मत्यक्षरादि आवरण  के क्षयोपशम से प्राप्त हुई भीतरी वचन लब्धि के मिलने पर वचनरूप पर्याय के अभिमुख  हुए आत्मा के होने वाला प्रदेश-परिस्पंद '''वचनयोग''' कहलाता है। </span><br />


<p  class="HindiText">अधिक जानकारी के लिये देखें [[ वचन#2 | वचन - 2]]।</span>
<p  class="HindiText">अधिक जानकारी के लिये देखें [[ वचन#2 | वचन - 2]]।</p>  


<noinclude>
<noinclude>

Latest revision as of 10:59, 4 March 2024

सर्वार्थसिद्धि/6/1/318/9 शरीरनामकर्मोदयापादितवाग्वर्गणालंबने सति वीर्यांतरायमत्यक्षराद्यावरण- क्षयोपशमापादिताभ्यंतरवाग्लब्धिसांनिध्ये वाक्परिणामाभिमुखस्यात्मनः प्रदेशपरिस्पंदो वाग्योगः। = शरीर नामकर्म के उदय से प्राप्त हुई वचनवर्गणाओं का आलंबन होने पर तथा वीर्यांतराय और मत्यक्षरादि आवरण के क्षयोपशम से प्राप्त हुई भीतरी वचन लब्धि के मिलने पर वचनरूप पर्याय के अभिमुख हुए आत्मा के होने वाला प्रदेश-परिस्पंद वचनयोग कहलाता है।

अधिक जानकारी के लिये देखें वचन - 2।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वचनयोग&oldid=132553"
Categories:
  • व
  • द्रव्यानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 4 March 2024, at 10:59.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki