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व्यंतर: Difference between revisions

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Revision as of 00:25, 6 October 2014 (view source)
Vikasnd (talk | contribs)
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Revision as of 00:20, 28 February 2015 (view source)
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       <li> व्यंतर मरकर कहाँ  जन्मे और कौन स्थान प्राप्त करे ।–दे. जन्म/६ । <br />
       <li> व्यंतर मरकर कहाँ  जन्मे और कौन स्थान प्राप्त करे ।– देखें - [[ जन्म#6 | जन्म / ६ ]]। <br />
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Revision as of 00:20, 28 February 2015



भूत, पिशाच जाति के देवों को जैनागम में व्यंतर देव कहा गया है । ये लोग वैक्रियिक शरीर के धारी होते हैं । अधिकतर मध्य लोक के सूने स्थानों में रहते हैं । मनुष्य व तिर्यंचों के शरीर में प्रवेश करके उन्हें लाभ हानि पहुँचा सकते हैं । इनका काफी कुछ वैभव व परिवार होता है ।

  1. [[ व्यंतर देव निर्देश ]]
    1. [[व्यंतर देव निर्देश #1.1 | व्यंतर देव का लक्षण । ]]
    2. [[व्यंतर देव निर्देश #1.2 | व्यंतर देवों के भेद । ]]
    • किंनर किंपुरुष आदि के उत्तर भेद ।–देखें - वह -वह नाम ।
    • व्यंतर मरकर कहाँ जन्मे और कौन स्थान प्राप्त करे ।– देखें - जन्म / ६ ।
    • व्यंतरों का जन्म, दिव्य शरीर, आहार, सुख, दुःख सम्यक्त्वादि ।– देखें - देव / II / २ / ३ ।
    1. [[व्यंतर देव निर्देश #1.3 | व्यंतरों के आहार व श्वास का अन्तराल । ]]
    2. [[व्यंतर देव निर्देश #1.4 | व्यंतरों के ज्ञान व शरीर की शक्ति विक्रिया आदि । ]]
    3. [[व्यंतर देव निर्देश #1.5 | व्यंतर देव मनुष्यों के शरीरों में प्रवेश करके उन्हें विकृत कर सकते हैं । ]]
    4. [[व्यंतर देव निर्देश #1.6 | व्यंतरों के शरीरों के वर्ण व चैत्य वृक्ष । ]]
    • व्यंतरों की आयु व अवगाहना ।–देखें - वह -वह नाम ।
    • व्यंतरों में सम्भव कषाय, लेश्या, वेद, पर्याप्ति आदि । देखें - वह -वह नाम ।
    • व्यंतरों में गुणस्थान, मार्गंणास्थान आदि की २० प्ररूपणा ।–दे . सत्‌ ।
    • व्यंतरों सम्बन्धी सत्‌‍, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन ।
    • काल अंतर भाव व अल्पबहुत्व । –देखें - वह -वह नाम ।
    • व्यंतरों में कर्मों का बन्ध उदय सत्त्व ।–देखें - वह -वह नाम ।
  2. [[ व्यंतर इन्द्र निर्देश]]
    1. [[ व्यंतर इन्द्र निर्देश #2.1 | व्यंतर इन्द्रों के नाम व संख्या ।]]
    2. [[ व्यंतर इन्द्र निर्देश #2.2 | व्यंतरेंद्रों का परिवार ।]]
  3. व्यंतरों की देवियों का निर्देश
    1. [[व्यंतरों की देवियों का निर्देश#3.1 | १६ इन्द्रों की देवियों के नाम व संख्या । ]]
    2. [[व्यंतरों की देवियों का निर्देश#3.2 | श्री ह्री आदि देवियों का परिवार ।]]
  4. [[ व्यंतर लोक निर्देश ]]
    1. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.1 | व्यंतर लोक सामान्य परिचय । ]]
    2. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.2 | निवास स्थानों के भेद व लक्षण । ]]
    3. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.3 | व्यंतरों के भवनों व नगरों आदि की संख्या । ]]
    4. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.4 | भवनों व नगरों आदि का स्वरूप । ]]
    5. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.5 | मध्यलोक में व्यन्तरों व भवनवासियों का निवास ।]]
    6. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.6 | मध्यलोक में व्यंतर देवियों का निवास । ]]
    7. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.7 | द्वीप समुद्रों के अधिपति देव । ]]
    8. [[व्यंतर लोक निर्देश #4.8 | भवनों आदि का विस्तार । ]]

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