• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

भोक्ता: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 22:20, 27 February 2015 (view source)
Vikasnd (talk | contribs)
No edit summary
 
Revision as of 21:45, 5 July 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
Newer edit →
Line 1: Line 1:
<ol>
== सिद्धांतकोष से ==
<ol>
   <li><strong class="HindiText" name="1" id="1"> सामान्य निर्देश</strong> <br />
   <li><strong class="HindiText" name="1" id="1"> सामान्य निर्देश</strong> <br />
     पं.का./त.प्र./२७ <span class="SanskritText">निश्चयेन  शुभाशुभकर्मनिमित्तसुखदुःखपरिणामानां, व्यवहारेण  शुभाशुभकर्मसंपादितेष्टानिष्टविषयाणां भोक्‍तृत्वाद्‌भोक्ता।</span> = <span class="HindiText">निश्चय से  शुभाशुभकर्म जिनका निमित्त है ऐसे सुखदु:खपरिणामों का भोक्‍तृत्व होने से भोक्ता  है। व्यवहार से (असद्‌भूत व्यवहारनय से) शुभाशुभ कर्मों से सम्पादित इष्टानिष्ट  विषयों का भोक्‍तृत्व होने से भोक्ता है।<br />
     पं.का./त.प्र./27 <span class="SanskritText">निश्चयेन  शुभाशुभकर्मनिमित्तसुखदुःखपरिणामानां, व्यवहारेण  शुभाशुभकर्मसंपादितेष्टानिष्टविषयाणां भोक्तृत्वाद्भोक्ता।</span> = <span class="HindiText">निश्चय से  शुभाशुभकर्म जिनका निमित्त है ऐसे सुखदु:खपरिणामों का भोक्तृत्व होने से भोक्ता  है। व्यवहार से (असद्भूत व्यवहारनय से) शुभाशुभ कर्मों से सम्पादित इष्टानिष्ट  विषयों का भोक्तृत्व होने से भोक्ता है।<br />
   स.सा./आ./३२०/पं. जयचन्द–जो स्वतत्रपने करे–भोगे  उसको परमार्थ में कर्ता भोक्ता कहते हैं। </span></li>
   स.सा./आ./320/पं. जयचन्द–जो स्वतत्रपने करे–भोगे  उसको परमार्थ में कर्ता भोक्ता कहते हैं। </span></li>
   <li><span class="HindiText"><strong name="2" id="2">भोक्तृत्व  का लक्षण</strong> </span><br />
   <li><span class="HindiText"><strong> भोक्तृत्व  का लक्षण</strong> </span><br />
     रा./वा./२/७/१३/११२/१३ <span class="SanskritText">भोक्तृत्वमपि साधारणम्‍‍। कुत:। तल्लक्षणोपपत्तेः। वीर्यप्रकर्षात्‌ परद्रव्यवीर्यादानसामर्थ्यभोक्तृत्वलक्षणम्‌। यथा आत्मा आहारादेः परद्रव्यस्यापि वीर्यात्मसात्करणाद्भोक्ता, .... कर्मोदयापेक्षाभावात्तदपि पारिणामिकम्‌।</span> =  <span class="HindiText">भोक्तृत्व भी साधारण है क्योंकि उसके लक्षण से ज्ञात होता है । एक प्रकृष्ट  शक्तिवाले द्रव्य के द्वारा दूसरे द्रव्य की सामर्थ्य को ग्रहण करना भोक्तृत्व  कहलाता है। जैसे कि आत्मा आहारादि द्रव्य की शक्ति को खींचने के कारण भोक्ता कहा  जाता है। ... कर्मों के उदय आदि की अपेक्षा नहीं होने के कारण यह भी  पारिणामिक  भाव है।</span><br />
     रा./वा./2/7/13/112/13 <span class="SanskritText">भोक्तृत्वमपि साधारणम्। कुत:। तल्लक्षणोपपत्तेः। वीर्यप्रकर्षात् परद्रव्यवीर्यादानसामर्थ्यभोक्तृत्वलक्षणम्। यथा आत्मा आहारादेः परद्रव्यस्यापि वीर्यात्मसात्करणाद्भोक्ता, .... कर्मोदयापेक्षाभावात्तदपि पारिणामिकम्।</span> =  <span class="HindiText">भोक्तृत्व भी साधारण है क्योंकि उसके लक्षण से ज्ञात होता है । एक प्रकृष्ट  शक्तिवाले द्रव्य के द्वारा दूसरे द्रव्य की सामर्थ्य को ग्रहण करना भोक्तृत्व  कहलाता है। जैसे कि आत्मा आहारादि द्रव्य की शक्ति को खींचने के कारण भोक्ता कहा  जाता है। ... कर्मों के उदय आदि की अपेक्षा नहीं होने के कारण यह भी  पारिणामिक  भाव है।</span><br />
   पं.का./त.प्र./२८<span class="SanskritText"> स्वरूपभूतस्वातन्‍त्र्यलक्षणसुखोपलक्षणसुखोपलम्भरूपंभोक्तृत्वं।</span>=<span class="HindiText">स्वरूपभूत  स्वातत्र्य जिसका लक्षण है ऐसे सुख की उपलब्धिरूप ‘भोक्तृत्व’ होता है।</span></li>
   पं.का./त.प्र./28<span class="SanskritText"> स्वरूपभूतस्वातन्त्र्यलक्षणसुखोपलक्षणसुखोपलम्भरूपंभोक्तृत्वं।</span>=<span class="HindiText">स्वरूपभूत  स्वातत्र्य जिसका लक्षण है ऐसे सुख की उपलब्धिरूप ‘भोक्तृत्व’ होता है।</span></li>
</ol>
</ol>
<ul>
<ul>
Line 13: Line 14:
<ol>
<ol>
   <ol>
   <ol>
     <li><span class="HindiText"> सम्यग्दृष्टि  भोगों का भोक्ता नहीं है।– देखें - [[ राग#6.6 | राग / ६ / ६ ]],७।<br />
     <li><span class="HindiText"> सम्यग्दृष्टि  भोगों का भोक्ता नहीं है।–देखें [[ राग#6.6 | राग - 6.6]],7।<br />
       </span></li>
       </span></li>
     <li><span class="HindiText"> षट्‍द्रव्यों में भोक्ता-अभोक्ता विभाग।– देखें - [[ द्रव्य#3 | द्रव्य / ३ ]]।<br />
     <li><span class="HindiText"> षट्द्रव्यों में भोक्ता-अभोक्ता विभाग।–देखें [[ द्रव्य#3 | द्रव्य - 3]]।<br />
       </span></li>
       </span></li>
     <li><span class="HindiText"> जीव  को भोक्ता कहने की विवक्षा।– देखें - [[ जीव#1.3 | जीव / १ / ३ ]]।<br />
     <li><span class="HindiText"> जीव  को भोक्ता कहने की विवक्षा।–देखें [[ जीव#1.3 | जीव - 1.3]]।<br />
       </span></li>
       </span></li>
     <li><span class="HindiText"> भोग  सम्बन्धी विषय।–देखें - [[ नीचे | नीचे। ]]</span></li>
     <li><span class="HindiText"> भोग  सम्बन्धी विषय।–देखें [[ नीचे ]]।</span></li>
   </ol>
   </ol>
</ol>
</ol>


[[भेदाभेद विपर्यय | Previous Page]]
<noinclude>
[[भोक्ता भोग्य भाव | Next Page]]
[[ भेषजदान | पूर्व पृष्ठ ]]
 
[[ भोक्ता भोग्य भाव | अगला पृष्ठ ]]
 
</noinclude>
[[Category: भ]]
 
 
== पुराणकोष से ==
<p> सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । <span class="GRef"> महापुराण 25.100  </span></p>
 
<noinclude>
[[ भेषजदान | पूर्व पृष्ठ ]]
 
[[ भोक्ता भोग्य भाव | अगला पृष्ठ ]]


[[Category:भ]]
</noinclude>
[[Category: पुराण-कोष]]
[[Category: भ]]

Revision as of 21:45, 5 July 2020

== सिद्धांतकोष से ==

  1. सामान्य निर्देश
    पं.का./त.प्र./27 निश्चयेन शुभाशुभकर्मनिमित्तसुखदुःखपरिणामानां, व्यवहारेण शुभाशुभकर्मसंपादितेष्टानिष्टविषयाणां भोक्तृत्वाद्भोक्ता। = निश्चय से शुभाशुभकर्म जिनका निमित्त है ऐसे सुखदु:खपरिणामों का भोक्तृत्व होने से भोक्ता है। व्यवहार से (असद्भूत व्यवहारनय से) शुभाशुभ कर्मों से सम्पादित इष्टानिष्ट विषयों का भोक्तृत्व होने से भोक्ता है।
    स.सा./आ./320/पं. जयचन्द–जो स्वतत्रपने करे–भोगे उसको परमार्थ में कर्ता भोक्ता कहते हैं।
  2. भोक्तृत्व का लक्षण
    रा./वा./2/7/13/112/13 भोक्तृत्वमपि साधारणम्। कुत:। तल्लक्षणोपपत्तेः। वीर्यप्रकर्षात् परद्रव्यवीर्यादानसामर्थ्यभोक्तृत्वलक्षणम्। यथा आत्मा आहारादेः परद्रव्यस्यापि वीर्यात्मसात्करणाद्भोक्ता, .... कर्मोदयापेक्षाभावात्तदपि पारिणामिकम्। = भोक्तृत्व भी साधारण है क्योंकि उसके लक्षण से ज्ञात होता है । एक प्रकृष्ट शक्तिवाले द्रव्य के द्वारा दूसरे द्रव्य की सामर्थ्य को ग्रहण करना भोक्तृत्व कहलाता है। जैसे कि आत्मा आहारादि द्रव्य की शक्ति को खींचने के कारण भोक्ता कहा जाता है। ... कर्मों के उदय आदि की अपेक्षा नहीं होने के कारण यह भी पारिणामिक  भाव है।
    पं.का./त.प्र./28 स्वरूपभूतस्वातन्त्र्यलक्षणसुखोपलक्षणसुखोपलम्भरूपंभोक्तृत्वं।=स्वरूपभूत स्वातत्र्य जिसका लक्षण है ऐसे सुख की उपलब्धिरूप ‘भोक्तृत्व’ होता है।
  • अन्य सम्बन्धित विषय
    1. सम्यग्दृष्टि भोगों का भोक्ता नहीं है।–देखें राग - 6.6,7।
    2. षट्द्रव्यों में भोक्ता-अभोक्ता विभाग।–देखें द्रव्य - 3।
    3. जीव को भोक्ता कहने की विवक्षा।–देखें जीव - 1.3।
    4. भोग सम्बन्धी विषय।–देखें नीचे ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.100


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=भोक्ता&oldid=41033"
Categories:
  • भ
  • पुराण-कोष
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 5 July 2020, at 21:45.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki