• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

Help
 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

उपसमुद्र: Difference between revisions

From जैनकोष

Revision as of 13:48, 10 July 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
← Older edit
Revision as of 16:20, 19 August 2020 (view source)
Maintenance script (talk | contribs)
(Imported from text file)
Newer edit →
Line 1: Line 1:
== सिद्धांतकोष से ==
== सिद्धांतकोष से ==
<p class="SanskritText">महापुराण सर्ग संख्या 28/46 बहिः ससुद्रमुद्रिक्तं द्वैप्यं निम्नोपगं जलम्। समुदस्येव निष्यंदम् अब्धेराराद् व्यलोकयत् ।46।</p>
<p class="SanskritText">महापुराण सर्ग संख्या 28/46 बहिः ससुद्रमुद्रिक्तं द्वैप्यं निम्नोपगं जलम्। समुदस्येव निष्यंदम् अब्धेराराद् व्यलोकयत् ।46।</p>
<p class="HindiText">= उन्होंने (भारत चक्रवर्तीकी सेनाने) समुद्रके समीप ही समुद्रसे बाहर उछल-उछल कर गहरे स्थान में इकट्ठे हुए द्वीप सम्बन्धी उस जलको देखा जो कि समुद्रके निष्यंदके समान मालूम होता था। अर्थात् समुद्रका जो जल उछल-उछल कर समुद्र के समीप ही किसी गहरे स्थानमें इकट्ठा हो जाता है वही उपसमुद्र कहलाता है।</p>
<p class="HindiText">= उन्होंने (भारत चक्रवर्तीकी सेनाने) समुद्रके समीप ही समुद्रसे बाहर उछल-उछल कर गहरे स्थान में इकट्ठे हुए द्वीप संबंधी उस जलको देखा जो कि समुद्रके निष्यंदके समान मालूम होता था। अर्थात् समुद्रका जो जल उछल-उछल कर समुद्र के समीप ही किसी गहरे स्थानमें इकट्ठा हो जाता है वही उपसमुद्र कहलाता है।</p>
   
   



Revision as of 16:20, 19 August 2020

== सिद्धांतकोष से ==

महापुराण सर्ग संख्या 28/46 बहिः ससुद्रमुद्रिक्तं द्वैप्यं निम्नोपगं जलम्। समुदस्येव निष्यंदम् अब्धेराराद् व्यलोकयत् ।46।

= उन्होंने (भारत चक्रवर्तीकी सेनाने) समुद्रके समीप ही समुद्रसे बाहर उछल-उछल कर गहरे स्थान में इकट्ठे हुए द्वीप संबंधी उस जलको देखा जो कि समुद्रके निष्यंदके समान मालूम होता था। अर्थात् समुद्रका जो जल उछल-उछल कर समुद्र के समीप ही किसी गहरे स्थानमें इकट्ठा हो जाता है वही उपसमुद्र कहलाता है।



पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

समुद्र से उछलकर द्वीप में आया अलंघनीय एवं गहरा जल । इससे द्वीप के चारों ओर का समीपवर्ती भाग आवृत हो जाता है । महापुराण 28.48


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=उपसमुद्र&oldid=56560"
Categories:
  • उ
  • पुराण-कोष
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 19 August 2020, at 16:20.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki