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<p> राजवार्तिक/2/37/1/147/29  <span class="SanskritText">परशब्दोऽयमनेकार्थवचनः।  क्वचिद्वयवस्थायां वर्तते - यथा पूर्वः पर इति। क्चचिदन्यार्थे  वर्तते - यथा परपुत्रः परभार्येति  अन्यपुत्रोऽन्यभार्येति गम्यते। क्वचित्प्राधान्ये वर्तते - यथा परमियं कन्या अस्मिन्कुटुंबे प्रधानमिति गम्यते। क्वचिदिष्टार्थे वर्तते - यथा परंधाम गत इष्टं धाम गत इत्यर्थः। </span><br />
<p><span class="GRef"> राजवार्तिक/2/37/1/147/29  </span><span class="SanskritText">परशब्दोऽयमनेकार्थवचनः।  क्वचिद्वयवस्थायां वर्तते - यथा पूर्वः पर इति। क्चचिदन्यार्थे  वर्तते - यथा परपुत्रः परभार्येति  अन्यपुत्रोऽन्यभार्येति गम्यते। क्वचित्प्राधान्ये वर्तते - यथा परमियं कन्या अस्मिन्कुटुंबे प्रधानमिति गम्यते। क्वचिदिष्टार्थे वर्तते - यथा परंधाम गत इष्टं धाम गत इत्यर्थः। </span><br />
राजवार्तिक/3/6/7/167/17 <span class="SanskritText"> परोत्कृष्टेति पर्यायौ। 7।</span> = <span class="HindiText">पर शब्द के अनेक अर्थ हैं जैसे - </span></p>
<span class="GRef"> राजवार्तिक/3/6/7/167/17 </span><span class="SanskritText"> परोत्कृष्टेति पर्यायौ। 7।</span> = <span class="HindiText">पर शब्द के अनेक अर्थ हैं जैसे - </span></p>
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   <li><span class="HindiText"> कहीं पर व्यवस्था अर्थ में वर्तता है  जैसे - पहला, पिछला। </span></li>
   <li><span class="HindiText"> कहीं पर व्यवस्था अर्थ में वर्तता है  जैसे - पहला, पिछला। </span></li>
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   <li><span class="HindiText"> कहीं पर प्राधान्य अर्थ में वर्तता है  जैसे - इस कुटुंब में यह कन्या पर है। यहाँ ‘प्रधान है’ ऐसा ज्ञान होता है। </span></li>
   <li><span class="HindiText"> कहीं पर प्राधान्य अर्थ में वर्तता है  जैसे - इस कुटुंब में यह कन्या पर है। यहाँ ‘प्रधान है’ ऐसा ज्ञान होता है। </span></li>
   <li><span class="HindiText">कहीं पर इष्ट अर्थ में वर्तता है जैसे - ‘परंधाम गत’  अर्थात् अपने  इष्ट स्थान पर गया ऐसा ज्ञान होता है। </span></li>
   <li><span class="HindiText">कहीं पर इष्ट अर्थ में वर्तता है जैसे - ‘परंधाम गत’  अर्थात् अपने  इष्ट स्थान पर गया ऐसा ज्ञान होता है। </span></li>
   <li><span class="HindiText"> पर और उत्कृष्ट ये पर्यायवाची नाम हैं। ( परमात्मप्रकाश टीका/1/24/29/8 )। </span><br />
   <li><span class="HindiText"> पर और उत्कृष्ट ये पर्यायवाची नाम हैं। (<span class="GRef"> परमात्मप्रकाश टीका/1/24/29/8 </span>)। </span><br />
    स्याद्वादमंजरी/4/18/27  <span class="SanskritText">परत्वं चान्यत्वं  तच्चैकांतभेदाविनाभावि। </span><br />
    <span class="GRef"> स्याद्वादमंजरी/4/18/27  </span><span class="SanskritText">परत्वं चान्यत्वं  तच्चैकांतभेदाविनाभावि। </span><br />
    स्याद्वादमंजरी/27/305/27  <span class="SanskritText">परशब्दो हि शत्रुपर्यायोऽप्यस्ति।</span> = <span class="HindiText">परत्व शब्द एकांतभेद का अविनाभावी है। इसका अर्थ अन्यपना होता है। ‘पर’ शब्द शत्रु शब्द का पर्यायवाची है। </span><br />
    <span class="GRef"> स्याद्वादमंजरी/27/305/27  </span><span class="SanskritText">परशब्दो हि शत्रुपर्यायोऽप्यस्ति।</span> = <span class="HindiText">परत्व शब्द एकांतभेद का अविनाभावी है। इसका अर्थ अन्यपना होता है। ‘पर’ शब्द शत्रु शब्द का पर्यायवाची है। </span><br />
    पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/397  <span class="SanskritText">स्वापूर्वार्थद्वयोरेव ग्राहकं  ज्ञानमेकशः। 397।</span> = <span class="HindiText">ज्ञान युगपत् स्व और अपूर्व अर्थात् पर  दोनों ही अर्थों का ग्राहक है। </span></li>
    <span class="GRef"> पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/397  </span><span class="SanskritText">स्वापूर्वार्थद्वयोरेव ग्राहकं  ज्ञानमेकशः। 397।</span> = <span class="HindiText">ज्ञान युगपत् स्व और अपूर्व अर्थात् पर  दोनों ही अर्थों का ग्राहक है। </span></li>
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Revision as of 13:00, 14 October 2020



राजवार्तिक/2/37/1/147/29 परशब्दोऽयमनेकार्थवचनः। क्वचिद्वयवस्थायां वर्तते - यथा पूर्वः पर इति। क्चचिदन्यार्थे वर्तते - यथा परपुत्रः परभार्येति अन्यपुत्रोऽन्यभार्येति गम्यते। क्वचित्प्राधान्ये वर्तते - यथा परमियं कन्या अस्मिन्कुटुंबे प्रधानमिति गम्यते। क्वचिदिष्टार्थे वर्तते - यथा परंधाम गत इष्टं धाम गत इत्यर्थः।
राजवार्तिक/3/6/7/167/17 परोत्कृष्टेति पर्यायौ। 7। = पर शब्द के अनेक अर्थ हैं जैसे -

  1. कहीं पर व्यवस्था अर्थ में वर्तता है जैसे - पहला, पिछला।
  2. कहीं पर भिन्न अर्थ में वर्तता है जैसे - ‘परपुत्र’, ‘परभार्या’। इससे ‘अन्य का पुत्र’ व ‘अन्य की स्त्री’ ऐसा ज्ञान होता है।
  3. कहीं पर प्राधान्य अर्थ में वर्तता है जैसे - इस कुटुंब में यह कन्या पर है। यहाँ ‘प्रधान है’ ऐसा ज्ञान होता है।
  4. कहीं पर इष्ट अर्थ में वर्तता है जैसे - ‘परंधाम गत’ अर्थात् अपने इष्ट स्थान पर गया ऐसा ज्ञान होता है।
  5. पर और उत्कृष्ट ये पर्यायवाची नाम हैं। ( परमात्मप्रकाश टीका/1/24/29/8 )।
    स्याद्वादमंजरी/4/18/27 परत्वं चान्यत्वं तच्चैकांतभेदाविनाभावि।
    स्याद्वादमंजरी/27/305/27 परशब्दो हि शत्रुपर्यायोऽप्यस्ति। = परत्व शब्द एकांतभेद का अविनाभावी है। इसका अर्थ अन्यपना होता है। ‘पर’ शब्द शत्रु शब्द का पर्यायवाची है।
    पंचाध्यायी / उत्तरार्ध/397 स्वापूर्वार्थद्वयोरेव ग्राहकं ज्ञानमेकशः। 397। = ज्ञान युगपत् स्व और अपूर्व अर्थात् पर दोनों ही अर्थों का ग्राहक है।


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