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कनक: Difference between revisions

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Revision as of 13:26, 18 July 2022 (view source)
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== पुराणकोष से ==
== पुराणकोष से ==
  <span class="HindiText"> (1)  स्वर्ण अर्थ में व्यवहृत शब्द । <span class="GRef"> महापुराण 3. 36 ,<span></br><span class="HindiText"> (2) भविष्यत् कालीन प्रथम कुलकर । <span class="GRef">महापुराण 76.483,  हरिवंशपुराण 60.555 <span></br><span class="HindiText"> (3)  धृतराष्ट्र तथा उसकी रानी गांधारी का पुत्र ।<span class="GRef"> पांडवपुराण 8.205 <span></br><span class="HindiText"> (4) धृतवर समुद्र का रक्षक देव । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 5.642  <span></br><span class="HindiText"> (5) कुंडलगिरि की पूर्व दिशा का एक कूट । यह महाशिरस् नामक देव की निवासभूमि था । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 5.690 <span></br><span class="HindiText"> (6) कनकाभ नगर का राजा । कनकश्री इसकी रानी तथा कनकावली इसकी पुत्री थी । <span class="GRef">पद्मपुराण 6.567 <span></br><span class="HindiText"> (7) एक राजा । इसकी रानी का नाम संध्या, तथा पुत्री का नाम विद्युत्प्रभा था ।<span class="GRef"> दशानन इसका जामाता था ।  पद्मपुराण 8.105 <span></br> <span class="HindiText"> (8) एक शस्त्र । इससे रथ तोड़े जा सकते थे । <span class="GRef"> पद्मपुराण 12.211,234 <span></br><span class="HindiText"> (9) मृत्तिकावपी नगरी का निवासी वणिक् । <span class="GRef">यह बंधुदत्त का पिता था । पद्मपुराण 48.43 <span></br><span class="HindiText"> (10) रावण का व्याघ्ररथी योद्धा ।<span class="GRef">पद्मपुराण 57.49-52 <span></br><span class="HindiText"> (11) राजा जनक का अनुज । म्लेच्छराज के साथ हुए युद्ध में यह लड़ा था । यह सम्यग्दृष्टि था । मरकर यह आनत स्वर्ग में देव हुआ था । <span class="GRef"> पद्मपुराण 27.50-51, 123.80-81  
  <span class="HindiText">(1)  स्वर्ण अर्थ में व्यवहृत शब्द ।<span class="GRef"> महापुराण 3. 36 ,<span></br><span class="HindiText"> (2) भविष्यत् कालीन प्रथम कुलकर । <span class="GRef">महापुराण 76.483,  हरिवंशपुराण 60.555 <span></br><span class="HindiText"> (3)  धृतराष्ट्र तथा उसकी रानी गांधारी का पुत्र ।<span class="GRef"> पांडवपुराण 8.205 <span></br><span class="HindiText"> (4) धृतवर समुद्र का रक्षक देव । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 5.642  <span></br><span class="HindiText"> (5) कुंडलगिरि की पूर्व दिशा का एक कूट । यह महाशिरस् नामक देव की निवासभूमि था । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 5.690 <span></br><span class="HindiText"> (6) कनकाभ नगर का राजा । कनकश्री इसकी रानी तथा कनकावली इसकी पुत्री थी । <span class="GRef">पद्मपुराण 6.567 <span></br><span class="HindiText"> (7) एक राजा । इसकी रानी का नाम संध्या, तथा पुत्री का नाम विद्युत्प्रभा था ।<span class="GRef"> दशानन इसका जामाता था ।  पद्मपुराण 8.105 <span></br> <span class="HindiText"> (8) एक शस्त्र । इससे रथ तोड़े जा सकते थे । <span class="GRef"> पद्मपुराण 12.211,234 <span></br><span class="HindiText"> (9) मृत्तिकावपी नगरी का निवासी वणिक् । <span class="GRef">यह बंधुदत्त का पिता था । पद्मपुराण 48.43 <span></br><span class="HindiText"> (10) रावण का व्याघ्ररथी योद्धा ।<span class="GRef">पद्मपुराण 57.49-52 <span></br><span class="HindiText"> (11) राजा जनक का अनुज । म्लेच्छराज के साथ हुए युद्ध में यह लड़ा था । यह सम्यग्दृष्टि था । मरकर यह आनत स्वर्ग में देव हुआ था ।<span class="GRef"> पद्मपुराण 27.50-51, 123.80-81  
    
    



Revision as of 13:29, 18 July 2022



सिद्धांतकोष से

दक्षिण क्षौद्रवर द्वीप तथा घृतवर समुद्र के रक्षक व्यंतर देव–देखें व्यंतर - 4।


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पुराणकोष से

(1)  स्वर्ण अर्थ में व्यवहृत शब्द । महापुराण 3. 36 ,
(2) भविष्यत् कालीन प्रथम कुलकर । महापुराण 76.483, हरिवंशपुराण 60.555
(3) धृतराष्ट्र तथा उसकी रानी गांधारी का पुत्र । पांडवपुराण 8.205
(4) धृतवर समुद्र का रक्षक देव । हरिवंशपुराण 5.642
(5) कुंडलगिरि की पूर्व दिशा का एक कूट । यह महाशिरस् नामक देव की निवासभूमि था । हरिवंशपुराण 5.690
(6) कनकाभ नगर का राजा । कनकश्री इसकी रानी तथा कनकावली इसकी पुत्री थी । पद्मपुराण 6.567
(7) एक राजा । इसकी रानी का नाम संध्या, तथा पुत्री का नाम विद्युत्प्रभा था । दशानन इसका जामाता था । पद्मपुराण 8.105
(8) एक शस्त्र । इससे रथ तोड़े जा सकते थे । पद्मपुराण 12.211,234
(9) मृत्तिकावपी नगरी का निवासी वणिक् । यह बंधुदत्त का पिता था । पद्मपुराण 48.43
(10) रावण का व्याघ्ररथी योद्धा ।पद्मपुराण 57.49-52
(11) राजा जनक का अनुज । म्लेच्छराज के साथ हुए युद्ध में यह लड़ा था । यह सम्यग्दृष्टि था । मरकर यह आनत स्वर्ग में देव हुआ था । पद्मपुराण 27.50-51, 123.80-81


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