• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

वसु

From जैनकोष

Revision as of 08:00, 16 September 2022 by Rahul (talk | contribs)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)



सिद्धांतकोष से

  1. लौकांतिक देवों का एक भेद - देखें लौकांतिक_देव ।
  2. एक अज्ञानवादी - देखें अज्ञानवाद ।
  3. पद्मपुराण/11/श्लोक सं. - इक्ष्वाकु कुल के राजा ययाति का पुत्र ।13। क्षरिकदंब गुरु का शिष्य था ।14। सत्यवादी होते हुए भी गुरुमाता के कहने से उसके पुत्र पर्वत के पक्ष को पुष्ट करने के लिए, ‘अजैर्जष्टव्यम्’ शब्द का अर्थ तिसाला जौ न करके ‘बकरे से यज्ञ करना चाहिए’ ऐसा कर दिया।62। फलस्वरूप सातवें नरक में गया।73। ( महापुराण/67/256-281, 413-439 )।
  4. चंदेरी का राजा था। महाभारत से पूर्ववर्ती है। ‘‘इन्होंने इंद्र व पर्वत दोनों का इकट्ठे ही हव्य ग्रहण किया था’’ ऐसा कथन आता है। समय- ई.पू.2000 ( ऋग्वेद मंडल सूक्त 53)।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

(1) विनीता नगरी के इक्ष्वाकुवंशी राजा ययाति और रानी सुरकांता का पुत्र । यह क्षीरकदंबक गुरु का शिष्य और पर्वत तथा नारद का गुरु भाई था । सत्यवादी होते हुए भी इसने गुरु की पत्नी के कहने से उसके पुत्र पर्वत का पक्ष पुष्ट करने को ‘‘अजैर्यष्टव्यम्’’ शब्द का अर्थ ‘‘बकरे’’ से यज्ञ करना बताया था । इसके परिणामस्वरूप यह मरकर सातवें नरक में उत्पन्न हुआ । महापुराण में इसे भरतक्षेत्र में धवल देश की स्वास्तिकावती नगरी के राजा विश्वावसु और रानी श्रीमती का पुत्र बताया है । हरिवंशपुराण के अनुसार इसके पिता चेदि राष्ट्र के संस्थापक तथा शुक्तिमती नगरी के राजा अभिचंद्र तथा मां उनकी रानी वसुमती थी । राजा अभिचंद्र ने इसे राज्य सौंपकर दीक्षा ले ली थी । यह सभा में आकाश-स्फटिक स्तंभ के ऊपर स्थित सिंहासन पर बैठता था । इसकी दो रानियां थीं― एक इक्ष्वाकुवंश की और दूसरी कुरुवंश की । इन दोनों रानियों से इसके दस पुत्र हुए थे । वे हैं― वृहद्वसु, चित्रवसु, वासव, अर्क, महावसु, विश्वावतु, रवि, सूर्य, सुवसु और बृहध्वज । इन दोनों पुराणों में भी ‘‘अजैर्यष्टव्यं’’ की कथा थोड़े अंतर के साथ आयी है । दोनों ही जगह इस कथा के परिणामस्वरूप वसु का पतन हुआ है । पद्मपुराण 67.256-257, 413-439, पद्मपुराण 11. 13-14, 68-72, हरिवंशपुराण 17.37, 53-59, 149-152

(2) एक राजा । यह महावीर-निर्वाण के दो सौ पचासी वर्ष पश्चात् हुआ था । हरिवंशपुराण 6. 489

(3) कुरुवंशी एक राजा । यह राजा वासव का पुत्र और सुवसु इसका पुत्र था । हरिवंशपुराण 45.26


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वसु&oldid=96283"
Categories:
  • व
  • पुराण-कोष
  • प्रथमानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 16 September 2022, at 08:00.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki