• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

भव

From जैनकोष

Revision as of 21:44, 5 July 2020 by Maintenance script (talk | contribs) (Imported from text file)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)

== सिद्धांतकोष से ==

  1. भव
    स.सि./1/21/125/6 आयुर्नामकर्मोदयनिमित्त आत्मनः पर्यायो भवः। = आयुनामकर्म के उदय का निमित्त पाकर जो जीव की पर्याय होती है उसे भव कहते हैं। (रा.वा./1/2179/6)।
    ध.10/4,2,4,8/35/5 उत्पत्तिवारा भवाः। = उत्पत्ति के वारों का नाम भव है।
    ध.15/5/5/14 उप्पण्णवढमयप्पहुडि जाव चरिमसमओ त्ति जो अवत्थाविसेसो सो भवो णाम। = उत्पन्न होने के प्रथम समय से लेकर अन्तिम समय तक जो विशेष अवस्था रहती है, उसे भव कहते हैं।
    भ.आ./वि./25/18 पर उद्धृत–देहो भवोत्ति उवुच्चदि ...। = देह को भव कहते हैं।
  2. क्षुल्लक भव का लक्षण
    ध.14/5,6,646/504/2 आउअबंधे संते जो उवरि विस्समणकालो सव्वजहण्णो तस्स खुद्दा भवग्गहणं ति सण्णा। सो त्तो उवरि होदि।... असंखेयद्धस्सुवरि खुद्धाभवगहणं त्ति वुत्ते। = आयु बन्ध के होने पर जो सबसे जघन्य विश्रमण काल है उसकी क्षुल्लक भव ग्रहण संज्ञा है। वह आयु बन्धकाल के ऊपर होता है। ... असंक्षेपाद्धाके ऊपर (मृत्युपर्यन्त) क्षुल्लक भव ग्रहण है।
  3. अन्य सम्बन्धित विषय
    1. सम्यग्दृष्टि को भव धारण की सीमा–देखें सम्यग्दर्शन - I.5।
    2. श्रावक को भव धारण की सीमा–देखें श्रावक - 2।
    3. एक अन्तर्मुहूर्त में सम्भव क्षुद्रभवों का प्रमाण–देखें आयु - 7।
    4. नरक गति में पुनःपुनः भव धारण की सीमा–देखें जन्म - 6.10।
    5. लब्ध्यपर्याप्तकों में पुनः पुनः भव धारण की सीमा–देखें आयु - 7।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

(1) अनागत ग्यारह रुद्रों में छठा रुद्र । हरिवंशपुराण 60. 571

(2) जम्बूस्वामी का प्रमुख शिष्य । महापुराण 76.120

(3) चारों गतियों में भ्रमण करने वाले जीवों को वर्तमान शरीर त्यागने के बाद प्राप्त होने वाला आगामी दूसरा शरीर । हरिवंशपुराण 56. 47

(4) सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.117


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=भव&oldid=40784"
Categories:
  • भ
  • पुराण-कोष
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 5 July 2020, at 21:44.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki