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<p id="6">(6) इस नाम के स्वर्ग का तीसरा इन्द्रक विमान । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 6.51  </span></p>
 
<p id="6">(6) इस नाम के स्वर्ग का तीसरा इन्द्रक विमान । <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 6.51  </span></p>
 
<p id="7">(7) अनन्तवीर्य का अनुज । <span class="GRef"> महापुराण 16. 3-4 </span></p>
 
<p id="7">(7) अनन्तवीर्य का अनुज । <span class="GRef"> महापुराण 16. 3-4 </span></p>
<p id="8">(8) सोलहवां स्वर्ग । यह सभी स्वर्गों के ऊपर स्थित है । यहाँ सर्वदा रत्नमयी प्रकाश रहता है । यहाँ एक सौ उनसठ दिव्य विमान, एक सौ तेईस प्रकीर्णक और छ: इन्द्रक विमान हैं दस हजार सामानिक देव, तीस हजार त्रायस्त्रिंश देव, चालीस हजार आत्मरक्ष देव, एक सो पच्चीस अन्त-परिषद के सदस्य देव, पाँच सौ बाह्य परिषद के सदस्य देव और दो सौ पचास मध्ययम परिषद के सदस्य देव यहाँ के इन्द्र की आज्ञा मानते हैं । यहाँ सभी ऋद्धियाँ, मनोवांछित भोग और वचनातीत सुख प्राप्त होते हैं । सभी गायें कामधेनु, सभी वृक्ष कल्पवृक्ष और सभी रत्न चिन्तामणि रत्न होते हैं । दिन रात का विभाग नहीं होता । जिनमन्दिरों में जिनेन्द्रदेव की सदैव पूजा होती रहती है । यहाँ का इन्द्र तीन हाथ ऊँचा, दिव्य देहधारी, सर्वमल रहित होता है । इसकी आयु बाईस सागर होती है । यह ग्यारह मास में एक बार उच्छ्वास लेता है । इसके मन प्रवीचार होता है । यह स्वर्ग मध्यलोक से छ. राजू ऊपर पुष्पक विमान से युक्त होकर स्थित है । इसे पाने के लिए रत्नावली तप किया जाता है । <span class="GRef"> महापुराण 7.32, 10. 185, 73.30,  </span><span class="GRef"> पद्मपुराण 105.166-169,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 6.38,  </span><span class="GRef"> वीरवर्द्धमान चरित्र 6.119-132, 165 </span>—172</p>
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<p id="8">(8) सोलहवां स्वर्ग । यह सभी स्वर्गों के ऊपर स्थित है । यहाँ सर्वदा रत्नमयी प्रकाश रहता है । यहाँ एक सौ उनसठ दिव्य विमान, एक सौ तेईस प्रकीर्णक और छ: इन्द्रक विमान हैं दस हजार सामानिक देव, तीस हजार त्रायस्त्रिंश देव, चालीस हजार आत्मरक्ष देव, एक सो पच्चीस अन्त-परिषद के सदस्य देव, पाँच सौ बाह्य परिषद के सदस्य देव और दो सौ पचास मध्ययम परिषद के सदस्य देव यहाँ के इन्द्र की आज्ञा मानते हैं । यहाँ सभी ऋद्धियाँ, मनोवांछित भोग और वचनातीत सुख प्राप्त होते हैं । सभी गायें कामधेनु, सभी वृक्ष कल्पवृक्ष और सभी रत्न चिन्तामणि रत्न होते हैं । दिन रात का विभाग नहीं होता । जिनमन्दिरों में जिनेन्द्रदेव की सदैव पूजा होती रहती है । यहाँ का इन्द्र तीन हाथ ऊँचा, दिव्य देहधारी, सर्वमल रहित होता है । उसकी आयु बाईस सागर होती है । वह ग्यारह मास में एक बार उच्छ्वास लेता है । उसके मन प्रवीचार होता है । यह स्वर्ग मध्यलोक से छ. राजू ऊपर पुष्पक विमान से युक्त होकर स्थित है । इसे पाने के लिए रत्नावली तप किया जाता है । <span class="GRef"> महापुराण 7.32, 10. 185, 73.30,  </span><span class="GRef"> पद्मपुराण 105.166-169,  </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 6.38,  </span><span class="GRef"> वीरवर्द्धमान चरित्र 6.119-132, 165 </span>—172</p>
 
<p id="9">(9) तीर्थंकर वृषभदेव और उनकी रानी यशस्वती का पुत्र । यह चरमशरीरी था । इसका अपरनाम श्रीषेण था । <span class="GRef"> महापुराण 16.1-5 47.372-373  </span>सातवें पूर्वभव में यह विजयनगर में राजा महानन्द और उनकी रानी बसन्तसेना का हरिवाहन नामक पुत्र था । छठे पूर्वभव में यह अप्रत्याख्यान मान के कारण आर्त्तध्यान से मरकर सूकर हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 8.227-229  </span>पाँचवें पूर्वभव में पात्रदान की अनुमोदना के प्रभाव से उत्तर कुरुक्षेत्र में भद्र परिणामी आर्य हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 9.90  </span>चौथे पूर्वभव में नन्द नामक विमान में मणिकुण्डली नामक देव हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 9.190  </span>तीसरे पूर्वभव में नन्दिषेण राजा और अनन्तमती रानी का वरसेन नामक पुत्र हुआ । दूसरे पूर्वभव में पुण्डरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन और उनको श्रीकान्ता नामा रानी का पुत्र हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 10. 150, 11. 10  </span>पहले पूर्वभव में यह अहमिन्द्र हुआ था । <span class="GRef"> महापुराण 11 160-161  </span>वर्तमान पर्याय में भरतेश द्वारा अधीनता स्वीकार करने के लिए कहे जाने पर विरक्त होकर इसने वृषभदेव से दीक्षा धारण कर ली थी । भरतेश के मोक्ष जाने के बाद इसने भी मोक्ष पाया । <span class="GRef"> महापुराण 34.90-126, 47.398-399  </span></p>
 
<p id="9">(9) तीर्थंकर वृषभदेव और उनकी रानी यशस्वती का पुत्र । यह चरमशरीरी था । इसका अपरनाम श्रीषेण था । <span class="GRef"> महापुराण 16.1-5 47.372-373  </span>सातवें पूर्वभव में यह विजयनगर में राजा महानन्द और उनकी रानी बसन्तसेना का हरिवाहन नामक पुत्र था । छठे पूर्वभव में यह अप्रत्याख्यान मान के कारण आर्त्तध्यान से मरकर सूकर हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 8.227-229  </span>पाँचवें पूर्वभव में पात्रदान की अनुमोदना के प्रभाव से उत्तर कुरुक्षेत्र में भद्र परिणामी आर्य हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 9.90  </span>चौथे पूर्वभव में नन्द नामक विमान में मणिकुण्डली नामक देव हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 9.190  </span>तीसरे पूर्वभव में नन्दिषेण राजा और अनन्तमती रानी का वरसेन नामक पुत्र हुआ । दूसरे पूर्वभव में पुण्डरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन और उनको श्रीकान्ता नामा रानी का पुत्र हुआ । <span class="GRef"> महापुराण 10. 150, 11. 10  </span>पहले पूर्वभव में यह अहमिन्द्र हुआ था । <span class="GRef"> महापुराण 11 160-161  </span>वर्तमान पर्याय में भरतेश द्वारा अधीनता स्वीकार करने के लिए कहे जाने पर विरक्त होकर इसने वृषभदेव से दीक्षा धारण कर ली थी । भरतेश के मोक्ष जाने के बाद इसने भी मोक्ष पाया । <span class="GRef"> महापुराण 34.90-126, 47.398-399  </span></p>
 
   
 
   

Latest revision as of 19:43, 2 August 2020



(1) भरतेश और सौधर्मेन्द्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 14.34,24.34,25.109

(2) लक्ष्मण का पुत्र । पद्मपुराण 54.27-28

(3) श्रीकृष्ण नारायण । हरिवंशपुराण 50.2

(4) जरासन्ध का पुत्र । हरिवंशपुराण 52.29-40

(5) तीर्थंकर ऋषभदेव के पूर्वभव का जीव-अच्युतेन्द्र । हरिवंशपुराण 9.59

(6) इस नाम के स्वर्ग का तीसरा इन्द्रक विमान । हरिवंशपुराण 6.51

(7) अनन्तवीर्य का अनुज । महापुराण 16. 3-4

(8) सोलहवां स्वर्ग । यह सभी स्वर्गों के ऊपर स्थित है । यहाँ सर्वदा रत्नमयी प्रकाश रहता है । यहाँ एक सौ उनसठ दिव्य विमान, एक सौ तेईस प्रकीर्णक और छ: इन्द्रक विमान हैं दस हजार सामानिक देव, तीस हजार त्रायस्त्रिंश देव, चालीस हजार आत्मरक्ष देव, एक सो पच्चीस अन्त-परिषद के सदस्य देव, पाँच सौ बाह्य परिषद के सदस्य देव और दो सौ पचास मध्ययम परिषद के सदस्य देव यहाँ के इन्द्र की आज्ञा मानते हैं । यहाँ सभी ऋद्धियाँ, मनोवांछित भोग और वचनातीत सुख प्राप्त होते हैं । सभी गायें कामधेनु, सभी वृक्ष कल्पवृक्ष और सभी रत्न चिन्तामणि रत्न होते हैं । दिन रात का विभाग नहीं होता । जिनमन्दिरों में जिनेन्द्रदेव की सदैव पूजा होती रहती है । यहाँ का इन्द्र तीन हाथ ऊँचा, दिव्य देहधारी, सर्वमल रहित होता है । उसकी आयु बाईस सागर होती है । वह ग्यारह मास में एक बार उच्छ्वास लेता है । उसके मन प्रवीचार होता है । यह स्वर्ग मध्यलोक से छ. राजू ऊपर पुष्पक विमान से युक्त होकर स्थित है । इसे पाने के लिए रत्नावली तप किया जाता है । महापुराण 7.32, 10. 185, 73.30, पद्मपुराण 105.166-169, हरिवंशपुराण 6.38, वीरवर्द्धमान चरित्र 6.119-132, 165 —172

(9) तीर्थंकर वृषभदेव और उनकी रानी यशस्वती का पुत्र । यह चरमशरीरी था । इसका अपरनाम श्रीषेण था । महापुराण 16.1-5 47.372-373 सातवें पूर्वभव में यह विजयनगर में राजा महानन्द और उनकी रानी बसन्तसेना का हरिवाहन नामक पुत्र था । छठे पूर्वभव में यह अप्रत्याख्यान मान के कारण आर्त्तध्यान से मरकर सूकर हुआ । महापुराण 8.227-229 पाँचवें पूर्वभव में पात्रदान की अनुमोदना के प्रभाव से उत्तर कुरुक्षेत्र में भद्र परिणामी आर्य हुआ । महापुराण 9.90 चौथे पूर्वभव में नन्द नामक विमान में मणिकुण्डली नामक देव हुआ । महापुराण 9.190 तीसरे पूर्वभव में नन्दिषेण राजा और अनन्तमती रानी का वरसेन नामक पुत्र हुआ । दूसरे पूर्वभव में पुण्डरीकिणी नगरी के राजा वज्रसेन और उनको श्रीकान्ता नामा रानी का पुत्र हुआ । महापुराण 10. 150, 11. 10 पहले पूर्वभव में यह अहमिन्द्र हुआ था । महापुराण 11 160-161 वर्तमान पर्याय में भरतेश द्वारा अधीनता स्वीकार करने के लिए कहे जाने पर विरक्त होकर इसने वृषभदेव से दीक्षा धारण कर ली थी । भरतेश के मोक्ष जाने के बाद इसने भी मोक्ष पाया । महापुराण 34.90-126, 47.398-399


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