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 <p> सिंहपुर नगर के राजा सिंहसेन के मंत्री श्रीभूति का जीव― इस नाम का एक सर्प । <span class="GRef"> <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 27.20-42 </span>  </span>श्रीभूति की योनि में यह सत्यघोष के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ था । धरोहर के रूप में अपने पास रखे हुए भद्रमित्र नामक वणिक् के रत्नों को लौटाने से यह लोभवश मुकर गया था । भद्रमित्र वृक्ष पर चढ़कर नित्य रोता और रत्न रख लिये जाने की बात करना था । इसका रुदन सुनकर रानी रामदत्ता ने सत्य जानना चाहा । इसके लिए उसने अपने पति सिंहसेन की आज्ञा से द्यूतक्रीडा की शरण ली । जुए में रानी ने सत्यघोष का यज्ञोपवीत और अंगूठी जीत ली । इसके पश्चात् एक कुशल सेविका को जुए में विजित दोनों वस्तुएँ देकर सत्यघोष की पत्नी से रत्नों का पिटारा मंगा लिया और भद्रमित्र को रत्न लौटा दिये । सत्यघोष को दण्डित किया गया जिससे वह आर्त्तध्यान से मरकर राजा के भाण्डागार में ही इस नाम का सर्प हुआ । <span class="GRef"> पद्मपुराण 59.146-177 </span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 27.20-42 </span></p>
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 <p> सिंहपुर नगर के राजा सिंहसेन के मंत्री श्रीभूति का जीव― इस नाम का एक सर्प । <span class="GRef"> <span class="GRef"> हरिवंशपुराण 27.20-42 </span>  </span>श्रीभूति की योनि में यह सत्यघोष के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ था । धरोहर के रूप में अपने पास रखे हुए भद्रमित्र नामक वणिक् के रत्नों को लौटाने से यह लोभवश मुकर गया था । भद्रमित्र वृक्ष पर चढ़कर नित्य रोता और रत्न रख लिये जाने की बात करना था । इसका रुदन सुनकर रानी रामदत्ता ने सत्य जानना चाहा । इसके लिए उसने अपने पति सिंहसेन की आज्ञा से द्यूतक्रीडा की शरण ली । जुए में रानी ने सत्यघोष का यज्ञोपवीत और अंगूठी जीत ली । इसके पश्चात् एक कुशल सेविका को जुए में विजित दोनों वस्तुएँ देकर सत्यघोष की पत्नी से रत्नों का पिटारा मंगा लिया और भद्रमित्र को रत्न लौटा दिये । सत्यघोष को दण्डित किया गया जिससे वह आर्त्तध्यान से मरकर राजा के भाण्डागार में ही इस नाम का सर्प हुआ । <span class="GRef"> पद्मपुराण 59.146-177</span><span class="GRef"> हरिवंशपुराण 27.20-42 </span></p>
 
   
 
   
  

Latest revision as of 20:01, 2 August 2020



सिंहपुर नगर के राजा सिंहसेन के मंत्री श्रीभूति का जीव― इस नाम का एक सर्प । हरिवंशपुराण 27.20-42 श्रीभूति की योनि में यह सत्यघोष के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ था । धरोहर के रूप में अपने पास रखे हुए भद्रमित्र नामक वणिक् के रत्नों को लौटाने से यह लोभवश मुकर गया था । भद्रमित्र वृक्ष पर चढ़कर नित्य रोता और रत्न रख लिये जाने की बात करना था । इसका रुदन सुनकर रानी रामदत्ता ने सत्य जानना चाहा । इसके लिए उसने अपने पति सिंहसेन की आज्ञा से द्यूतक्रीडा की शरण ली । जुए में रानी ने सत्यघोष का यज्ञोपवीत और अंगूठी जीत ली । इसके पश्चात् एक कुशल सेविका को जुए में विजित दोनों वस्तुएँ देकर सत्यघोष की पत्नी से रत्नों का पिटारा मंगा लिया और भद्रमित्र को रत्न लौटा दिये । सत्यघोष को दण्डित किया गया जिससे वह आर्त्तध्यान से मरकर राजा के भाण्डागार में ही इस नाम का सर्प हुआ । पद्मपुराण 59.146-177, हरिवंशपुराण 27.20-42


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