कुमति कुनारि नहीं है भली रे

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कुमति कुनारि नहीं है भली रे, सुमति नारि सुन्दर गुनवाली ।।टेक ।।
वासौं विरचि रचौ नित यासौं, जो पावो शिवधाम गली रे ।
वह कुबजा दुखदा, यह राधा, बाधा टारन करन रली रे ।।१ ।।
वह कारी परसौं रति ठानत, मानत नाहिं न सीख भली रे ।
यह गोरी चिदगुण सहचारिनि, रमत सदा स्वसमाधि-थली रे ।।२ ।।
वा संग कुथल कुयोनि वस्यौ नित, तहाँ महादुखबेल फली रे ।
या संग रसिक भविनकी निजमें, परिनति `दौल' भई न चली रे ।।३ ।।