जानके सुज्ञानी जैनवानी की सरधा लाइये

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(राग दीपचन्दी कानेर)
जानके सुज्ञानी, जैनवानी की सरधा लाइये ।।टेक ।।
जा बिन काल अनंते भ्रमता, सुख न मिलै कहूँ प्रानी ।।१ ।।
स्वपर विवेक अखंड मिलत है जाहीके सरधानी ।।२ ।।
अखिलप्रमानसिद्ध अविरुद्धत, स्यात्पद शुद्ध निशानी ।।३ ।।
`भागचन्द' सत्यारथ जानी, परमधरम रजधानी ।।४ ।।