Difference between revisions of "ज्ञानी जीव निवार भरमतम"

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Latest revision as of 07:13, 16 February 2008

ज्ञानी जीव निवार भरमतम, वस्तुस्वरूप विचारत ऐसैं ।।टेक ।।
सुत तिय बंधु धनादि प्रगट पर, ये मुझतैं हैं भिन्नप्रदेशैं ।
इनकी परनति है इन आश्रित, जो इन भाव परनवैं वैसे।।१ ।।ज्ञानी. ।।
देह अचेतन चेतन मैं, इन परनति होय एकसी कैसैं ।
पूरनगलन स्वभाव धरै तन, मैं अज अचल अमल नभ जैसैं।।२ ।।ज्ञानी. ।।
पर परिनमन न इष्ट अनिष्ट न, वृथा रागरुष द्वंद भयेसैं ।
नसै ज्ञान निज फँसै बंधमें, मुक्त होय समभाव लयेसैं।।३ ।।ज्ञानी. ।।
विषयचाहदवदाह नसै नहिं, विन निज सुधा सिंधुमें पैसैं ।
अब जिनवैन सुने श्रवननतैं, मिटे विभाव करूं विधि तैसैं।।४ ।।ज्ञानी. ।।
ऐसो अवसर कठिन पाय अब, निजहितहेत विलम्ब करेसैं ।
पछताओ बहु होय सयाने चेतन, `दौल' छुटो भव भयसैं।।५ ।।ज्ञानी. ।।