थारा तो वैना में सरधान घणो छै

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थारा तो वैना में सरधान घणो छै, म्हारे छवि निरखत हिय सरसावै ।
तुमधुनिघन परचहन-दहनहर, वर समता-रस-झर वरसावै ।।थारा. ।।
रूपनिहारत ही बुधि ह्वै सो, निजपरचिह्न जुदे दरसावै ।
मैं चिदंक अकलंक अमल थिर, इन्द्रियसुखदुख जड़फरसावै ।।१ ।।
ज्ञान विराग सुगुनतुम तिनकी, प्रापति हित सुरपति तरसावै ।
मुनि बड़भाग लीन तिनमें नित, `दौल' धवल उपयोग रसावै ।।२ ।।