धर्म बिन कोई नहीं अपना

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धर्म बिन कोई नहीं अपना
सब सम्पत्ति धन थिर नहिं जगमें, जिसा रैन सपना ।।धर्म. ।।टेक ।।
आगैं किया सो पाया भाई, याही है निरना ।
अब जो करैगा सो पावैगा, तातैं धर्म करना ।।१ ।।धर्म. ।।
ऐसै सब संसार कहत है, धर्म कियैं तिरना ।
परपीड़ा बिसनादिक सेवैं, नरकविषैं परना ।।२ ।।धर्म. ।।
नृपके घर सारी सामग्री, ताकैं ज्वर तपना ।
अरु दारिद्रीकैं हू ज्वर है, पाप उदय थपना ।।३ ।।धर्म. ।।
नाती तो स्वारथ के साथी, तोहि विपत भरना ।
वन गिरि सरिता अगनि युद्धमैं, धर्महिका सरना ।।४ ।।धर्म. ।।
चित बुधजन सन्तोष धारना, पर चिन्ता हरना ।
विपति पड़ै तो समता रखना, परमातम जपना ।।५ ।।धर्म. ।।