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सूत्रपाहुड़ गाथा 10

From जैनकोष

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णिच्चेलपाणिपत्तं उवइट्ठं परमजिणवरिंदेहिं ।
एक्को वि मोक्खमग्गो सेसा य अमग्गया सव्वे ॥१०॥
निश्चेलपाणिपात्रं उपदिष्टं परमजिनवरेन्द्रै: ।
एकोऽपि मोक्षमार्ग: शेषाश्च अमार्गा: सर्वे ॥१०॥


आगे कहते हैं कि जिनसूत्र में ऐसा मोक्षमार्ग कहा है -
अर्थ - जो निश्चेल अर्थात्‌ वस्त्ररहित दिगम्बर मुद्रास्वरूप और पाणिपात्र अर्थात्‌ हाथरूपी पात्र में खड़े-खड़े आहार करना इसप्रकार एक अद्वितीय मोक्षमार्ग तीर्थंकर परमदेव जिनेन्द्र ने उपदेश दिया है, इसके सिवाय अन्य रीति सब अमार्ग हैं ।
भावार्थ - - जो मृगचर्म, वृक्ष के वल्कल, कपास पट्ट, दुकूल, रोमवस्त्र, टाट के और तृण के वस्त्र इत्यादि रखकर अपने को मोक्षमार्गी मानते हैं तथा इस काल में जिनसूत्र से च्युत हो गये हैं, उन्होंने अपनी इच्छा से अनेक भेष चलाये हैं, कई श्वेत वस्त्र रखते हैं, कई रक्त वस्त्र, कई पीले वस्त्र, कई टाट के वस्त्र, कई घास के वस्त्र और कई रोम के वस्त्र आदि रखते हैं, उनके मोक्षमार्ग नहीं है, क्योंकि जिनसूत्र में तो एक नग्न दिगम्बर स्वरूप पाणिपात्र भोजन करना, इसप्रकार मोक्षमार्ग में कहा है, अन्य सब भेष मोक्षमार्ग नहीं हैं और जो मानते हैं, वे मिथ्यादृष्टि हैं ॥१०॥


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