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अज्ञानी पाप धतूरा न बोय

अति संक्लेश विशुद्ध शुद्ध पुनि

अन्तर उज्जवल करना रे भाई!

अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ

अब अघ करत लजाय रे भाई

अब घर आये चेतनराय

अब पूरी कर नींदड़ी, सुन जिया रे! चिरकाल

अब मेरे समकित सावन आयो

अब मोहि जानि परी

अब समझ कही

अरहंत सुमर मन बावरे

अरिरजरहस हनन प्रभु अरहन

अरे जिया, जग धोखे की टाटी

अरे हाँ रे तैं तो सुधरी बहुत बिगारी

अरे हो अज्ञानी तूने कठिन मनुषभव पायो

अरे हो जियरा धर्म में चित्त लगाय रे


आकुलरहित होय इमि निशदिन

आगै कहा करसी भैया

आज मैं परम पदारथ पायौ

आज सी सुहानी सु घड़ी इतनी

आतम अनुभव आवै जब निज

आतम अनुभव कीजै हो

आतम अनुभव सार हो, अब जिय सार हो, प्राणी

आतम काज सँवारिये, तजि विषय किलोलैं

आतम जान रे जान रे जान

आतम जाना, मैं जाना ज्ञानसरूप

आतम जानो रे भाई!

आतम महबूब यार, आतम महबूब

आतम रूप अनूपम अद्भुत

आतमज्ञान लखैं सुख होइ

आतमरूप अनूपम है, घटमाहिं विराजै हो

आतमरूप सुहावना, कोई जानै रे भाई ।

कविवर श्री द्यानतरायजी कृत भजन