प्रवचनसार गाथा 3

From जैनकोष

ते ते सव्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगं

वंदामि य वट्टंते अरहंते माणुसे खेत्ते ॥३॥


[तान् तान् सर्वान्] उन उन सबको [च] तथा [मानुषे क्षेत्रे वर्तमानान्] मनुष्य क्षेत्र में विद्यमान [अर्हत:] अरहन्तों को [समकं समकं] साथ ही साथ--समुदायरूप से और [प्रत्येकं एव प्रत्येकं] प्रत्येक प्रत्येक को--व्यक्तिगत [वंदे] वन्दना करता हूँ ॥३॥


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