प्रवचनसार गाथा 6

From जैनकोष

संपज्जदि णिव्वाणं देवासुरमणुयरायविहवेहिं

जीवस्स चरित्तादो दंसणणाणप्पहाणादो ॥६॥


[जीवस्य] जीवको [दर्शनज्ञानप्रधानात्] दर्शनज्ञानप्रधान [चारित्रात्] चारित्र से [देवासुरमनुजराजविभवै:] देवेन्द्र, असुरेन्द्र और नरेन्द्र के वैभवों के साथ [निर्वाणं] निर्वाण [संपद्यते] प्राप्त होता है ॥६॥


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