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शंकर वेदांत या ब्रह्माद्वैत

From जैनकोष



  1. शंकर वेदांत या ब्रह्माद्वैत
    1. शंकर वेदांत का तत्त्व विचार
      षड्दर्शन समुच्चय/68/67; (भारतीय दर्शन)
      1. सत्ता तीन प्रकार है–पारमार्थिक, प्रातिभासिक व व्यावहारिक। इनमें-से ब्रह्म ही एक पारमार्थिक सत् है। इसके अतिरिक्त घट, पट आदि व्यावहारिक सत् है। वास्तव में ये सब रस्सी में सर्प की भाँति प्रातिभासिक हैं।
      2. ब्रह्म, एक निर्विशेष, सर्वव्यापी, स्वप्रकाश, नित्य, स्वयं सिद्ध चेतन तत्त्व है।
      3. माया से अवच्छिन्न होने के कारण इसके दो रूप हो जाते हैं–ईश्वर व प्राज्ञ। दोनों में समष्टि व व्यष्टि, एक व अनेक, विशुद्ध सत्त्व व मलिन सत्त्व, सर्वज्ञ व अल्पज्ञ, सर्वेश्वर व अनीश्वर, समष्टि का कारण शरीर और व्यष्टि का कारण शरीर आदि रूप से दो भेद हैं। ईश्वर, नियंता, अव्यक्त, अंतर्यामी, सृष्टि का रचयिता व जीवों को उनके कर्मानुसार फलदाता है।
      4. सांख्य प्ररूपित बुद्धि व पाँचों ज्ञानेंद्रियों से मिलकर एक विज्ञानमय कोश बनता है। इसी में घिरा हुआ चैतन्य उपचार से जीव कहलाता है। जो कर्ता, भोक्ता, सुख, दुख, मरण आदि सहित हैं।
      5. इस शरीर युक्त चैतन्य (जीव) में ही ज्ञान, इच्छा व क्रिया रूप शक्तियाँ रहती हैं। वास्तव में चैतन्य ब्रह्म इन सबसे अतीत है।
      6. जगत् इस ब्रह्म का विवर्तमात्र है। जो जल-बुद्बुद्वत् उसमें से अभिव्यक्त होता है और उसी में लय हो जाता है।
    2. माया व सृष्टि
      (तत्त्व बोध); (भारतीय दर्शन)
      1. सत्त्वादि तीन गुणों की साम्यावस्था का नाम अव्यक्त प्रकृति है। व्यक्त प्रकृति में सत्त्व गुण ही प्रधान होने पर उसके दो रूप हो जाते हैं–माया व अविद्या। विशुद्धि सत्त्व प्रधान माया और मलिन सत्त्वप्रधान अविद्या है।
      2. माया से अवच्छिन्न ब्रह्म ईश्वर तथा अविद्या से अवच्छिन्न जीव कहाता है।
      3. माया न सत् है न असत्, बल्कि अनिर्वचनीय है। समष्टि रूप से एक होती हुई भी व्यष्टि रूप से अनेक है। मायावच्छिन्न ईश्वर संकल्प मात्र से सृष्टि की रचना करता है। चैतन्य तो नित्य, सूक्ष्म व अपरिणामी है। जितने भी सूक्ष्म व स्थूल पदार्थ हैं वे माया के विकास हैं। त्रिगुणों की साम्यावस्था में माया कारण शक्ति रूप से विद्यमान रहती है। पर तमोगुण का प्राधान्य होने पर उसकी विक्षेप शक्ति के संपन्न चैतन्य से आकाश की, आकाश से वायु की, वायु से अग्नि की, अग्नि से जल की और जल से पृथिवी की क्रमशः उत्पत्ति होती है। इन्हें अपंचीकृत भूत कहते हैं। इन्हीं से आगे जाकर सूक्ष्म व स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है।
      4. अविद्या की दो शक्तियाँ है।–आवरण व विक्षेप। आवरण द्वारा ज्ञान की हीनता और विक्षेप द्वारा राग द्वेष होता है।
    3. इंद्रिय व शरीर
      (तत्त्व बोध); (भारतीय दर्शन)
      1. आकाशादि अपंचीकृत भूतों के पृथक्-पृथक् सात्त्विक अंशों से क्रमशः श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा और घ्राण इंद्रिय की उत्पत्ति होती है।
      2. इन्हीं पाँच के मिलित सात्त्विक अंशों से बुद्धि, मन, चित्त व अहंकार की उत्पत्ति होती है। ये चारों मिलकर अंतःकरण कहलाते हैं।
      3. बुद्धि व पाँच ज्ञानेंद्रियों के सम्मेल को ज्ञानमयकोष कहते हैं। इसमें घिरा हुआ चैतन्य ही जीव कहलाता है। जो जन्म मरणादि करता है।
      4. मन व ज्ञानेंद्रियों के सम्मेल को मनोमय कोष कहते हैं। ज्ञानमय कोष की अपेक्षा यह कुछ स्थूल है।
      5. आकाशादि के व्यष्टिगत राजसिक अंशों से पाँच कर्मेंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं।
      6. और इन्हीं पाँचों के मिलित अंश से प्राण की उत्पत्ति होती है। वह पाँच प्रकार का होता है–प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान। नासिका में स्थित वायु प्राण है, गुदा की ओर जाने वाला अपान है, समस्त शरीर में व्याप्त व्यान है, कंठ में स्थित उदान और भोजन का पाक करके बाहर निकलने वाला समान है।
      7. पाँच कर्मेंद्रियों व प्राण के सम्मेल से प्राणमय कोष बनता है।
      8. शरीर में यही तीन कोष काम आते हैं। ज्ञानमय कोष से ज्ञान, मनोमय कोष से इच्छा तथा प्राणमय कोष से क्रिया होती है।
      9. इन तीनों कोषों के सम्मेल से सूक्ष्म शरीर बनता है। इसी में वासनाएँ रहती हैं। यह स्वप्नावस्था रूप तथा अनुपभोग्य है।
      10. समष्टि रूप सूक्ष्म शरीर से आच्छादित चैतन्य सूत्रात्मा या हिरण्यगर्भ या प्राण कहा जाता है तथा उसी के व्यष्टि रूप से आच्छादित चैतन्य तैजस कहा जाता है।
      11. पंजीकृत उपरोक्त पंच भूतों से स्थूलशरीर बनता है। इसे ही अन्नमय कोष कहते हैं। यह जागृत स्वरूप तथा उपभोग्य है। वह चार प्रकार का है–जरायुज, अंडज, स्वेदज, व उद्भिज्ज (वनस्पति)।
      12. समष्टि रूप स्थूल शरीर से आच्छज्ञदित चैतन्य वैश्वानर या विराट कहा जाता है। तथा व्यष्टि रूप स्थूल शरीर से आच्छादित चैतन्य विश्व कहा जाता है।
    4. पंचीकृत विचार
      (तत्त्व बोध); (भारतीय दर्शन) प्रत्येक भूत का आधा भाग ग्रहण करके उसमें शेष चार भूतों के 1/8-1/8 भाग मिला देने से वह पंचीकृत भूत कहलाता है। जैसे–1/2 आकश + 1/8 वायु + 1/8 तैजस + 1/8 जल + 1/8 पृथिवी, इन्हीं पंचीकृत भूतों से समष्टि व व्यष्टि रूप स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है।
    5. मोक्ष विचार
      (तत्त्व बोध); (भारतीय दर्शन) अविद्या वश ईश्वर व प्राज्ञ, सूत्रात्मा व तैजस, वैश्वानर व विश्व आदि में भेद की प्रतीति होती है। तत्त्वमसि ऐसा गुरु का उपदेश पाकर उन सर्व भेदों से परे उस अद्वैत ब्रह्म की ओर लक्ष्य जाता है । तब पहले ‘सोऽहं’ और पीछे ‘अहं ब्रह्म’ की प्रतीति होने से अज्ञान का नाश होता है। चित्त वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। चित्प्रतिबिंब ब्रह्म से एकाकार हो जाता है। यही जीव व ब्रह्म का ऐक्य है। यही ब्रह्म साक्षात्कार है। इस अवस्था की प्राप्ति के लिए श्रवण, मनन, निदिध्यासन व अष्टांग योग साधन की आवश्यकता पड़ती है। यह अवस्था आनंदमय तथा अवाङ्मनसगोचर है। तत्पश्चात् प्रारब्ध कर्म शेष रहने तक शरीर में रहना पड़ता है। उस समय तक वह जीवन्मुक्त कहलाता है। अंत में शरीर छूट जाने पर पूर्ण मुक्ति हो जाती है।
    6. प्रमाण विचार
      (भारतीय दर्शन)
      1. प्रमाण छह हैं–प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम, अर्थापत्ति व अनुपलब्धि। पिछले चार के लक्षण मीमांसकों वत् हैं। चित्त वृत्तिका इंद्रिय द्वार से बाहर निकलकर विषयाकार हो जाना प्रत्यक्ष है। पर ब्रह्मका प्रत्यक्ष चित्त वृत्ति से निरपेक्ष है।
      2. इस प्रत्यक्ष के दो भेद हैं–सविकल्प व निर्विकल्प अथवा जीव साक्षी व ईश्वर साक्षी अथवा ज्ञप्तिगत व ज्ञेयगत अथवा इंद्रियज व अतींद्रियज। सविकल्प व निर्विकल्प तो नैयायिकों वत् है। अंतःकरण की उपाधि सहित चैतन्य का प्रत्यक्ष जीव साक्षी है जो नाना रूप है। इसी प्रकार मायोपहित चैतन्य का प्रत्यक्ष ईश्वर साक्षी है जो एक रूप है। ज्ञप्तिगत स्वप्रकाशक है और ज्ञेयगत ऊपर कहा गया है। पाँचों इंद्रियों का ज्ञान इंद्रिय प्रत्यक्ष और सुख-दुःख का वेदन अतींद्रिय प्रत्यक्ष है।
      3. व्याप्ति ज्ञान से उत्पन्न अनुमति के कारण को अनुमान कहते हैं। वह केवल अन्वय रूप ही होता है व्यतिरेक रूप नहीं। नैयायिकों की भाँति तृतीय लिंग परामर्श का स्वीकार नहीं करते।


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