जिन के भजन में मगन रहु रे!

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जिन के भजन में मगन रहु रे!
जो छिन खोवै बातनिमांहिं, सो छिन भजन करैं अघ जाहिं।।१ ।।
भजन भला कहतैं क्या होय, जाप जपैं सुख पावै सोय।।२ ।।
बुद्धि न चहिये तन दुख नाहिं, द्रव्य न लागै भजनकेमाहिं।।३ ।।
षट दरसनमें नाम प्रधान, `द्यानत' जपैं बड़े धनमान ।।४ ।।