जिन छवि लखत यह बुधि भयी

From जैनकोष

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जिन छवि लखत यह बुधि भयी ।।टेक. ।।
मैं न देह चिदंकमय तन, जड़ फरसरसमयी ।।जिन. ।।
अशुभशुभफल कर्म दुखसुख, पृथकता सब गयी ।
रागदोषविभावचालित, ज्ञानता थिर थयी।।१ ।।जिन. ।।
परिग्रह न आकुलता दहन, विनशि शमता लयी ।
`दौल' पूरवअलभ आनँद, लह्यौ भवथिति जयी।।२ ।।जिन. ।।