जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा

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जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा ।।टेक ।।
मोहमदवार पियौ, स्वपद विसार दियौ, पर अपनाय लियौ ।
इन्द्रिसुख में रचियौ, भवतैं न भियौ, न तजियौ मनमैलवा।।१ ।।जीव. ।।
मिथ्या ज्ञान आचरन धरिकर कुमरन, तीन लोककी धरन ।
तामें कियो है फिरन पायो न शरन, न लहायौ सुख शैलवा।।२ ।।जीव. ।।
अब नरभव पायौ, सुथल सुकुल आयौ जिन उपदेश भायौ ।
`दौल' झट झिटकायौ, परपरनति दुखदायिनी चुरेलवा।।३ ।।जीव. ।।