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अनैकांतिक हेत्वाभास

From जैनकोष

 न्यायदीपिका/3/40/86/11 सव्यभिचारोऽनैकांतिकः ( न्यायदर्शन सूत्र/ मूल/1/2/5) यथा–‘अनित्यः शब्दः प्रमेयत्वात्’ इति । प्रमेयत्वं हि हेतुः साध्यभूतमनित्यत्वं व्यभिचरति, गगनादौ विपक्षे नित्यत्वेनापि सह वृत्तेः । ततो विपक्षाद्व्यावृत्त्य-भावादनैकांतिकः । पक्षसपक्षविपक्षवृत्तिरनैकांतिकः । = जो हेतु व्यभिचारी हो सो अनैकांतिक है । जैसे–‘शब्द अनित्य है, क्योंकि वह प्रमेय है’, यहाँ ‘प्रमेयत्व’ हेतु अपने साध्य अनित्यत्व का व्यभिचारी है । कारण, आकाशादि विपक्ष में नित्यत्व के साथ भी वह रहता है । अतः विपक्ष से व्यावृत्ति न होने से अनैकांतिक हेत्वाभास है ।40। जो पक्ष, सपक्ष और विपक्ष में रहता है वह अनैकांतिक हेत्वाभास है ।62।


-देखें व्यभिचार ।


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