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अप्रत्यवेक्षित

From जैनकोष

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 814/957

.......निक्षिप्यत इति निक्षेपः। उपकरणं पुस्तकादि, शरीरं, शरीरमलानि वा सहसा शीघ्रं निक्षिप्यमाणानि भयात्। कुतश्चित्कार्यांतरकरणप्रयुक्तेन वा त्वरितेन षड्जीवनिकायसाधाधिकरणं प्रतिपद्यंते। असत्यामपि त्वरायां जीवाः संति न संतीति निरूपणामंतरेण निक्षिप्यमाणं तदेवोपकरणादिकं अनाभोगनिक्षेपाधिकरणमुच्यते। दुष्प्रमृष्टमुपकरणादिनिक्षिप्यमाणं दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरणं स्थाप्यमानाधिकरणं वा दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरणम्। प्रमार्जनोत्तरकाले जीवाः संति न संतीति अप्रत्यवेक्षितं यन्निक्षिप्यते तदप्रत्यवेक्षितं निक्षेपाधिकरणम्। निर्वर्तनाभेदमाचष्टे-देहो य दुप्पजुत्तो दुःप्रयुक्तं शरीरं हिंसोपकरणतया निर्वर्त्यत इति निर्वर्तनाधिकरणं भवति। उपकरणानि च सच्छिद्राणि यानि जीवबाधानिमित्तानि निर्वर्त्यंते तान्यपि निर्वर्तनाधिकरणं यस्मिन्सौवीरादिभाजने प्रविष्टानि म्रियंते ॥814॥ संजोजणमुवकरणाणं उपकरणानां पिच्छादीनां अन्योन्येन संयोजना। शीतस्पर्शस्य पुस्तकस्य कमंडल्वादेर्वा आतपादिपिच्छेन प्रमार्जनं इत्यादिकम्। तहा तथा। पाणभोजणाणं च पानभोजनयीश्च पानेन पानं, भोजनं भोजनेन, भोजनं पानेनेत्येवमादिकं संयोजनं। यस्य संमूर्छनं संभवति सा हिंसाधिकरणत्वेनात्रोपात्ता न सर्वा। दुट्ठणिसिट्ठा मणवचिकाया दुष्टुप्रवृत्ता मनोवाक्कायप्रभेदानिसर्गशब्देनोच्यंते।

= निक्षेप किया जाये उसे निक्षेप कहते हैं। पिच्छी कमंडलु आदि उपकरण, पुस्तकादि, शरीर और शरीर का मल इनको भय से सहसा जल्दी फैंक देना, रखना। किसी कार्य में तत्पर रहने से अथवा त्वरा से पिच्छी कमंडल्वादिक पदार्थ जब जमीन पर रखे जाते हैं तब षट्काय जीवों को बाधा देने में आधाररूप होते हैं अर्थात् इन पदार्थों से जीवों को बाधा पहुँचती हैं। त्वरा नहीं होने पर भी जीव है अथवा नहीं है इसका विचार न करके, देख भाल किये बिना ही उपकरणादि जमीन पर रखना, फैंकना, उसको अनाभोगनिक्षेपाधिकरण कहते हैं।
उपकरणादिक वस्तु बिना साफ किये ही जमीन पर रख देना अथवा जिस पर उपकरणादिक रखे जाते हैं उसको अर्थात् चौकी जमीन वगैरह को अच्छी तरह साफ न करना, इसको दुष्प्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण कहते हैं। साफ करने पर जीव हैं अथवा नहीं हैं, यह देखे बिना उपकरणादिक रखना अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण है। शरीर की असावधानता पूर्वक प्रवृत्ति करना दुःप्रयुक्त कहा जाता है, ऐसा दुःप्रयुक्त शरीर हिंसा का उपकरण बन जाता है। इसलिए इसको देहनिर्वर्तनाधिकरण कहते हैं। जीव-बाधाको कारण ऐसे छिद्र सहित उपकरण बनाना, इसको भी निर्वर्तनाधिकरण कहते हैं। जैसे-कांजी वगैरह रखे हुए पात्र में जंतु प्रवेश कर मर जाते हैं। पिच्छी-कमंडलु आदि उपकरणों का संयोग करना, जैसे ठंडे स्पर्शवाले पुस्तक का धूप से संतप्त कमंडलु और पिच्छी के साथ संयोग करना अथवा धूप से तपी हुई पिच्छी से कमंडलु, पुस्तक को स्वच्छ करना आदि को उपकरण संयोजना कहते हैं। जिनसे सम्मूर्च्छन जीवों की उत्पत्ति होगी ऐसे पेयपदार्थ दूसरे पेयपदार्थ के साथ संयुक्त करना, अथवा भोज्य पदार्थ के साथ पेय पदार्थ को संयुक्त करना। जिनसे जीवों की हिंसा होती है ऐसा ही पेय और भोज्य पदार्थों का संयोग निषिद्ध है, इससे अन्य संयोग निषिद्ध नहीं है। ऐसा भक्तपानसंयोजना है। मन, वचन और शरीर के द्वारा दुष्ट प्रवृत्ति करना उसको निसर्गाधिकरण कहते हैं।



निक्षेपाधिकरण-देखें अधिकरण ।


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