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अशरण

From जैनकोष

बारसाणुवेक्खा गाथा 11

जाइजरामरणरोगभयदो रक्खेदि अप्पणो अप्पा। जम्हा आदा सरणं बंधोदयसत्तकम्मवदिरित्तो ॥11॥

= जन्म, जरा, मरण, रोग और भय आदि से आत्मा ही अपनी रक्षा करता है, इसलिए वास्तव में जो कर्मों की बंध, उदय और सत्ता अवस्था से जुदा है, वह आत्मा ही इस संसार में शरण है। अर्थात् संसार में अपने आत्मा के सिवाय अपना और कोई रक्षा करने वाला नहीं है। यह स्वयं ही कर्मों को खिपाकर जन्म जरा मरणादि के कष्टों से बच सकता है।

सर्वार्थसिद्धि अध्याय /9/7/414

यथा-मृगशावस्यैकांते बलवता क्षुधितेनामिषैषिणा व्याघ्रेणाभिभूतस्य न किंचिच्छरणमस्ति, तथा जन्मजरामृत्युव्याधिप्रभृतिव्यसनमध्ये परिभ्रमतो जंतोः शरणं न विद्यते। परिपुष्टमपि शरीरं भोजनं प्रति सहायीभवति न व्यसनोपनिपाते। यत्नेन संचिता अर्था अपि न भवांतरमनुगच्छंति। संविभक्तसुखदुःखा सुहृदोऽपि न मरणकाले परित्रायंते। बांधवाः समुदिताश्च रुजा परीतं न परिपालयंति। अस्ति चेत्सुचरितो धर्मो व्यसनमहार्णवे तरणोपायो भवति। मृत्युना नीयमानस्य सहस्रनयनादयोऽपि न शरणम्। तस्माद् भवव्यसनसंकटे धर्म एव शरणं सुहृदर्थोऽप्यनपायी, नान्यकिंचिच्छरणमिति भावना अशरणानुप्रेक्षा।

= जैसे हिरण के बच्चे को अकेले में भूखे मांस के अभिलाषी व बलवान् व्याघ्र-द्वारा पकड़े हुए का कुछ भी शरण नहीं है, तैसे जन्म, बुढ़ापा, मरण, पीड़ा इत्यादि विपत्ति के बीच में भ्रमते हुए जीव का कोई रक्षक नहीं है। बराबर पोषा हुआ शरीर भी भोजन करते तांई सहाय करने वाला होता है न कि कष्ट आने पर। जतन करि इकट्ठा किया हुआ धन भी परलोक को नहीं जाता है। सुख-दुःख में भागी मित्र भी मरण समय में रक्षा नहीं करते हैं। इकट्ठे हुए कुटुंबी रोग ग्रसित का प्रतिपालन नहीं कर सकते हैं। यदि भले प्रकार आचरण किया हुआ धर्म है तो विपत्तिरूपी बड़े समुद्र में तरणे का उपाय होता है। कालकरि ग्रहण किये हुए का इंद्रादिक भी शरण नहीं होते हैं। इसलिए भवरूपी विपत्ति में वा कष्ट में धर्म ही शरण है, मित्र है, धन है, अविनाशी भी है। अन्य कुछ भी शरण नहीं है। इस प्रकार बार-बार चिंतवन करना सो अशरण अनुप्रेक्षा है।



अशरणानुप्रेक्षा व अन्य अनुप्रेक्षाओं को विस्तार के लिये -देखें अनुप्रेक्षा ।


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