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जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

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अस्तित्व

From जैनकोष

1. `अस्तित्व' शब्द के अनेक अर्थ

1. सामान्य सत्ता के अर्थ में अस्तित्व

राजवार्तिक अध्याय 2/7/13/111/32

अस्तित्व तावत् साधारणं षड्द्रव्यविषयत्त्वात्। तत् कर्मोदयक्षयक्षयोपशमोपशमानपेक्षत्वात् पारिणामिकम्।

= अस्तित्व छहों द्रव्यों में पाया जाता है अतः साधारण है। कर्मोदय, क्षय, क्षयोपशम व उपशम से निरपेक्ष होने के कारण यह पारिणामिक है।

नयचक्रवृहद् गाथा 61

अस्थिसहावे सत्ता।

= अस्तित्व स्वभाव को ही सत्ता कहते हैं।

आलापपद्धति अधिकार 6

अस्तीत्येतस्य भावोऽस्तित्वं सद्रूपत्वम्।

= अस्ति अर्थात् 'है पने' के भाव को अस्तित्व कहते हैं। अस्तित्व अर्थात् सद्रूपत्व।

(द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 24) (नियमसार / तात्पर्यवृत्तिगाथा 34)

2. अवस्थान अर्थ में अस्तित्व

राजवार्तिक अध्याय 4/42/4/250/17

आयुरादिनिमित्तवशादवस्थानमस्तित्वम्।

= आयु आदि निमित्तों के अनुसार उस पर्याय में बने रहना सद्भाव या स्थिति है।

3. उत्पाद व्यय ध्रौव्य स्वभाव अर्थ में अस्तित्व

तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 5/30

उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥30॥

= जो उत्पाद व्यय और ध्रौव्य इन तीनों से युक्त अर्थात् इन तीनों रूप है वह सत् है।

प्रवचनसार / मूल या टीका गाथा 96

सब्भावो हि सहावो गुणेहिं सगपज्जएहिं चित्तेहिं। दव्वस्स सव्वकालं उप्पादव्वयधुवत्तेहिं ॥96॥

= सर्वकाल में गुणों तथा अनेक प्रकार की अपनी पर्यायों से और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य से द्रव्य का जो अस्तित्व है वह वास्तव में स्वभाव है।

पंचास्तिकाय/ तत्त्वप्रदीपिका 5/14

एकेण पर्यायेण प्रलीपयमानस्यान्येनोपजायमानस्यान्वयिना गुणेन ध्रौव्यं बिभ्राणस्यैकस्यापि वस्तुनः समुच्छेदोत्पादध्रौव्यलक्षणमस्तित्वमुपपद्यत् एव।

= जिसमें एक पर्याय का विनाश होता है, अन्य पर्याय की उत्पत्ति होती है तथा उसी समय अन्वयी गुण के द्वारा जो ध्रुव है ऐसी एक वस्तु का उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य रूप लक्षण ही अस्तित्व है।

2. अस्तित्व के भेद

प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 95

अस्तित्वं हि वक्ष्यति द्विविधं-स्वरूपास्तित्वं सादृश्यास्तित्वं चेति।

= अस्तित्व दो प्रकार का कहेंगे - स्वरूपास्तित्व और सादृश्यास्तित्व।

नियमसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 34

अस्तित्वं नाम सत्ता। सा किंविशिष्टा। सप्रतिपक्षा अवांतरसत्ता महासत्तेति।

= अस्तित्व अर्थात् सत्ता। वह कैसी है? महासत्ता और अवांतर सत्ता।

3. स्वरूपास्तित्व या अवान्तर सत्ता

प्रवचनसार / मूल या टीका गाथा 96

इदं स्वरूपास्तित्वाभिधानम् ( प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / उत्थानिका)

सब्भावो हि सहावो गुणेहिं सगपज्जएहि। चत्तेहिं। दव्वस्स सव्वकालं उप्पादव्वयधुवत्तेहिं ॥96॥

= सर्वकाल में गुण तथा अनेक प्रकार की अपनी पर्यायों से और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य से द्रव्य का जो अस्तित्व है, वह वास्तव में स्वभाव है।

प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 97

प्रतिद्रव्यं सीमानमासूत्रयता विशेषलक्षणभ्रतेन च स्वरूपास्तित्वेन लक्ष्यमाणानामपि।

= प्रत्येक द्रव्य की सीमा को बाँधते हुए ऐसे विशेष लक्षणभूत स्वरूपास्तित्व से लक्षित होते हैं।

पंचास्तिकाय / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 8

प्रतिनियतवस्तुवर्तिनी स्वरूपास्तित्वसूचिकाऽवान्तरसत्ता।

= प्रतिनियत वस्तुवर्ती तथा स्वरूपास्तित्व की सूचना देनेवाली (अर्थात् पृथक्-पृथक् पदार्थ का पृथक्-पृथक् स्वतंत्र अस्तित्व बताने वाली) अवान्तरसत्ता है।

नियमसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 34

प्रतिनियतवस्तुव्यापिनी ह्यवान्तरसत्ता...प्रतिनियतैकरूपव्यापिनी ह्यवान्तरसत्ता, ...प्रतिनियतैकपर्यायव्यापिनी ह्यवान्तरसत्ता।

= प्रतिनियत वस्तु (द्रव्य) में व्यापने वाली या प्रतिनियत एक रूप (गुण) में व्यापने वाली या प्रतिनियत एक पर्याय में व्यापने वाली अवांतर सत्ता है।

प्रवचनसार/ तात्पर्यवृत्ति 96/129/17

मुक्तात्मद्रव्यस्य स्वकीयगुणपर्यायोत्पादव्ययध्रौव्यैः सहस्वरूपास्तित्वाभिधानमवांतरास्तित्वभिन्नं व्यवस्थापितं।

= मुक्तात्म-द्रव्य के स्वकीय गुण-पर्यायों का उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यता के जो स्वरूपास्तित्व का अभिधान या निर्देश है, वही अभिन्न रूप से अवांतर सत्ता स्थापित की गयी है।

पंचाध्यायी / श्लोक 1/266

अपि चावान्तरसत्ता सद्द्रव्यं सद्गुणश्च पर्यायः सच्चोत्पादध्वसौ सदिति ध्रौव्यं किलेति विस्तारः ॥266॥

= तथा सत् द्रव्य है, सत् गुण है और सत् पर्याय है। तथा सत् ही उत्पाद व्यय है, सत् ही ध्रौव्य है, इस प्रकार के विस्तार का नाम ही निश्चय से अवांतर सत्ता है।

4. सादृश्य अस्तित्व या महासत्ता

प्रवचनसार / मूल या टीका गाथा 97

इदं तु सादृश्यास्तित्वाभिधानमस्तीति कथयति - (उत्थानिका)। इह विविहलक्खणाणं लक्खणमेगं सदिति सव्वगयं। उवदिसदा खलु धम्मं जिणवरवसहेण पण्णत्तं।

= यह सादृश्यास्तित्व का कथन है - धर्म का वास्तव में उपदेश करते हुए जिनवर वृषभ ने इस विश्व में विविध लक्षणवाले (भिन्न-भिन्न स्वरूपास्तित्व वाले) सर्व द्रव्यों का 'सत्' ऐसा सर्वगत एक लक्षण कहा है।

प्रवचनसार / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 97

स्वरूपास्तित्वेन लक्ष्यमाणानामपि सर्वद्रव्याणामस्तमितवैचित्र्यप्रपञ्चं प्रवृत्त्य वृतं प्रतिद्रव्यमासूत्रितं सीमानं भिन्दत्सदिति सर्वगतं सामान्यलक्षणभूतं सादृश्यास्तित्वमेकं खल्ववबोधव्यम्।

= (यद्यपि सर्व द्रव्य) स्वरूपास्तित्व से लक्षित होते हैं, फिर भी सर्व द्रव्यों का विचित्रता के विस्तार को अस्त करता हुआ, सर्व द्रव्यों में प्रवृत्त होकर रहने वाला, और प्रत्येक द्रव्य की बंधी हुई सीमा की अवगणना करता हुआ 'सत्' ऐसा जो सर्वगत सामान्य लक्षण भूत सादृश्य अस्तित्व है, वह वास्तव में एक ही जानना चाहिए।

पंचास्तिकाय संग्रह / तत्त्वप्रदीपिका / गाथा 8

सर्वपदार्थसार्थव्यापिनी सादृश्यास्तित्वसूचिका महासत्ता प्रौक्तैव।

= सर्व पदार्थ समूह में व्याप्त होने वाली सादृश्य अस्तित्व को सूचित करने वाली महासत्ता कही जा चुकी है।

नियमसार / तात्पर्यवृत्ति गाथा 34

समस्तवस्तुविस्तारव्यापिनी महासत्ता, ...समस्तव्यापकरूपव्यापिनी महासत्ता,...अनंतपर्यायव्यव्यापिनी महासत्ता।

= समस्त वस्तु-विस्तार में व्यापने वाली, अर्थात् छहों द्रव्यों व उनके समस्त भेद प्रभेदों में व्यापने वाली तथा समस्त व्यापक रूपों (गुणों) में व्यापने वाली तथा अनंत पर्यायों में व्यापने वाली महासत्ता है।

( प्रवचनसार / तात्पर्यवृत्ति टीका / गाथा 97/130/14)



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