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आलोचना

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

= प्रतिक्षण उदित होनोवाली कषायों जनित जो अंतरंग व बाह्य दोष साधक की प्रतीति में आते हैं, जीवन शोधन के लिए उनका दूर करना अत्यंत आवश्यक है, इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए आलोचना सबसे उत्तम मार्ग है। गुरु के समक्ष निष्कपट भाव से अपने सर्व छोटे या बड़े दोषों को कह देना आलोचना कहलाता है। यह वीतरागी गुरु के समक्ष ही की जाती है, रागी व्यक्ति के समक्ष नहीं।



  1. भेद व लक्षण
    1. आलोचना सामान्य के लक्षण
    2. आलोचना के भेद
    3. आलोचना के भेदों के लक्षण
  2. आलोचना के अतिचार व लक्षण
    1. आलोचना के 10 अतिचार
    2. आलोचना के अतिचारों के लक्षण
  3. आलोचना निर्देश
    1. आलोचना वीतरागी गुरु के ही समक्ष की जानी चाहिए
    2. आलोचना सुनने की विधि
    3. एक आचार्य को एक ही शिष्य की आलोचना सुननी चाहिए
    4. आलोचना एकांत में सुननी चाहिए
    5. आलोचना का माहात्म्य
    6. अन्य संबंधित विषय

1. भेद व लक्षण

1. आलोचना सामान्य के लक्षण

समयसार मूल व.आत्मख्याति गाथा/385

जं सुहमसुहमुदिण्णं संपडिय अणेयवित्थरविसेसं। तं दोसं जो चेयइ सो खलु आलोयणं चेया ॥385॥

= जो वर्तमान काल में शुभ-अशुभ कर्म रूप अनेक प्रकार ज्ञानावरणादि विस्तार रूप विशेषों को लिए हुए उदय आया है, उस दोष को जो ज्ञानी अनुभव करता है, वह आत्मा निश्चय से आलोचना स्वरूप है।

(समयसार / आत्मख्याति गाथा 385)

नियमसार / मूल या टीका गाथा 109

जो पस्सदि अप्पाणं समभावे संठवित्तु परिणामं। आलोयणमिदि जाणह परमजिणंदस्स उवएसं ॥109॥

= जो (जीव) परिणाम की समभाव में स्थाप कर (निज) आत्मा को देखता है, वह आलोचन है ऐसा परम जिनेंद्र का उपदेश जानना।

सर्वार्थसिद्धि अध्याय 9/22/440/6

तत्र गुरवे प्रमादनिवेदनं दशदोषविवर्जितमालोचनम्।

= गुरु के समक्ष दश दोषों को टालकर अपने प्रमाद का निवेदन करना (व्यवहार) आलोचना है।

(राजवार्तिक अध्याय 9/22/2/620), (तत्त्वार्थसार अधिकार 7/22), ( अनगार धर्मामृत अधिकार 7/38)

धवला पुस्तक 13/5,4/36/60/7

गुरुणमपरिस्सवाणं सुहरहस्साणं वीयराया तिरयणे मेरु व्व थिराणं सगदोसणिवेयणमालोयणा णाम पायच्छित्तं।

= अपरिस्रव अर्थात् आस्रव से रहित, श्रुत के रहस्य को जाननेवाले, वीतराग और रत्नत्रय में मेरु के समान स्थिर ऐसे गुरुओं के सामने अपने दोषों का निवेदन करना (व्यवहार) आलोचना नाम का प्रायश्चित है।

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 6/32/2

स्वकृतापराधगूपनत्यजनम् आलोचना।

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 10/49/9

कृतातिचारजुगुप्सापुरःसरं वचनमालोचनेति ।

= अपने द्वारा किये गये अपराधों या दोषों को दबाने का प्रयत्न न करके अर्थात् छिपाने का प्रयत्न न करके उसका त्याग करना निश्चय आलोचना है। तथा चारित्राचरण करते समय जो अतिचार होते हैं। उसकी पश्चात्ताप पूर्वक निंदा करना व्यवहार आलोचना है।

2. आलोचना के भेद

भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 533

आलोयणाहु दुविहा आघेण य होदि पदविभागीय। आघेण मूलपत्तस्स पयविभागी य इदरस्स ॥533॥

= आलोचना के दो ही प्रकार हैं - एक ओघालोचना दूसरी पदविभागी आलोचना अर्थात् सामान्य आलोचना और विशेष आलोचना ऐसे इनके और भी दो नाम हैं। वचन सामान्य और विशेष, इन धर्मों का आश्रय लेकर प्रवृत्त होता है, अतः आलोचना के उपर्युक्त दो भेद हैं।

मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 619

आलोचणं दिवसियं रादिअ इरियाबंध च बोधव्वं। पक्खिय चादुम्मासिय संवच्छरमुत्तमट्ठं च ॥619॥

= गुरु के समीप अपराध का कहना आलोचना है। वह दैवसिक, रात्रिक, ईर्यापथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक सांवत्सरिक, उत्तमार्थ - इस तरह सात प्रकार की है।

नियमसार / मूल या टीका गाथा 208

आलोयणमालंच्छणवियडीकरणं च भावसुद्धी य। चउविहमिह परिकहियं आलोयण लक्खणं समए ॥208॥

= आलोचना का स्वरूप आलोचन, आलुंच्छन, अविकृतिकरण और भावशुद्धि ऐसे चार प्रकार शास्त्र में कहा है।

3. आलोचना के भेदों के लक्षण

भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 534-535

ओघेणालोचेदि हु अपरिमिदवराधसव्वघादी वा। अज्जोपाए इत्थं सामण्णमहं खु तुच्छेति ॥534॥ पव्वज्जादी सव्व कमेण ज जत्थ जेण भावेण। पडिसेविदं तहा तं आलोचिंतो पदविभागी ॥535॥

= जिसने अपरिमित अपराध किये हैं अथवा जिसके रत्नत्रय और सर्व व्रतों का नाश हुआ है, वह मुनि सामान्य रीति से अपराध का निवेदन करता है। आज से में पुनः मुनि होने की इच्छा करता हूँ मैं तुच्छ हूँ अर्थात् मैं रत्नत्रय से आप लोगों से छोटा हूँ ऐसा कहना सामान्य आलोचना है ॥535॥ तीन काल में, जिस देश में, जिस परिणाम से जो दोष हो गया है उस दोष की मैं आलोचना करता हूँ। ऐसा कहकर जो दोष क्रम से आचार्य के आगे क्षपक कहता है उसकी वह पदविभागी आलोचना है ॥536॥

नियमसार / मूल या टीका गाथा 110-112

कम्ममहोरुहमूलच्छेदसमत्थो सकीयपरिणामो साहीणो समभावो आलुंच्छणमिदि समुद्दिट्ठं ॥110॥ कम्मादो अप्पाणं भिण्णं भावेइ विमलगुणणिलयं मज्झत्थ भावणाए वियडीकरणं त्ति। विण्णेयं ॥111॥ मदमाणमायालोहविवज्जिय भावो दु भावसुद्धि त्ति। परिकहिदं भव्वाणं लोयालोयप्पदरिसीहिं ॥112॥

= कर्म रूपी वृक्ष का मूल छेदन में समर्थ ऐसा जो समभाव रूप स्वाधीन निज परिणाम उसे आलंच्छन कहा है ॥110॥ जो मध्यस्थ भावना में कर्म से भिन्न आत्मा को, जो कि विमल गुणों का निवास है, उसे भाता है उस जीव को अविकृति करण जानना ॥111॥ मद, मान, माया और लोभ रहित भाव वह भावशुद्धि है। ऐसा भव्यों का लोक के द्रष्टाओं ने कहा है ॥112॥

2. आलोचना के अतिचार व लक्षण

1. आलोचना के 10 अतिचार

भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 562

आकंपिय अणुमाणिय जं दिट्ठं बादर च सुहुमं च। छण्णं सद्दाउलयं बहुजण अव्वत्त तस्सेवी।

= आलोचना के दश दोष हैं - आकंपित, अनुमानित, यद्दृष्ट, स्थूल, सूक्ष्म, छन्न, शब्दाकुलित, बहुजन, अव्यक्त और तत्सेवी।

( मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा 1030), (सर्वार्थसिद्धि अध्याय 9/22/440/4), (चारित्रसार पृष्ठ 138/2)

2. आलोचना के अतिचारों के लक्षण

भगवती आराधना / मूल या टीका गाथा 563-603

भत्तेण व पाणेण व उवकरणेण किरियकम्मकरणेण। अणकंपेऊण गणिं करेइ आलोयणं कोई ॥563॥ गणह य मज्झ थाम अंगाणं दुव्बलदा अणारोगं। णेव समत्थोमि अहं तवं विकट्ठं पि कादुंजे ॥570॥ आलोचेमि य सव्वं जइ मे पच्छा अणुग्गहं कुणह। तुज्झ सिरीए इच्छं सोधी जह णिच्छरेज्जामि ॥571॥ अणुमाणेदूण गुरुं एवं आलोचणं तदो पच्छा। कुणइ ससल्लो सो से विदिओ आलोयणा दोसो ॥572॥ जो होदि अण्णदिट्ठं तं आलोचेदि गुरुसयासम्मि। अद्दिट्ठं गूहंतो मायिल्लो होदि णायव्वो ॥574॥ दिट्ठं वा अदिट्ठं बा जदि ण कहेइ परमेण विणएण। आयरियपायमूले तदिओ आलोयणा दोसो ॥575॥ बादरमालोचंतो जत्तो जत्तो वदाओ पडिभग्गो। सुहुमं पच्छादेंतो जिणवयणपरंमुहो होइ ॥577॥ इह जो दोसं लहुगं समालोचेदि गूहदे चूलं। भयमयमायाहिदओ जिणपयणपरंमुहो होदि ॥581॥ जदि मूलगुणे उत्तरगुणे य कस्सइ तदिए चउत्थए पंचमे च वदे ॥584॥ को तस्स दिज्जइ तवो केण उवाएण वा हवदि मुद्धो। इय पच्छण्णं पुच्छदि पायच्छित्तं करिस्सदि ॥585॥

पच्छण्णं पुच्छिय साधु जो कुणइ अप्पणो सुद्धिं। तो सो जणेहिं वुत्तो छट्ठो आलोयणा दोसो ॥586॥ पक्खियचडमासिय संवच्छरिएसु सोधिकालेसु। बहु जण सद्दाउलए कहेदि दोसो जहिच्छाए ॥590॥ इय अव्वत्तं जइ सावेंतो दोसो कहेइ सगुरुणं। आलोचणाए दोसो सत्तमओ सो गुरुसयासे ॥591॥ तेसिं असद्दहंतो आइरियाणं पुणोवि अण्णाणं। जइ पुच्छइ सो आलोयणाए दोसो हु अट्ठमओ ॥596॥ आलोचिदं असेसं सव्वं एदं मएत्ति जाणादि। बालस्सालोचेंतो णवमो आलोचणाए दोसो ॥599॥ पासत्थो पासत्थस्स अणुगदो दुक्कडं परिकहेइ। एसो वि मज्झसरिसो सव्वत्थविदोस संचइओ ॥601॥ जाणादि मज्झ एसो सुहसीलत्तं च सव्वदोसे य। तो एस मे ण दाहिदि पायच्छित्तं महल्लित्ति ॥602॥ आलोचिदं असेसं सव्वं एदं मएत्ति जाणादि। सोपवयणपडिकुद्धो दसमो आलोचणा दोसो ॥603॥

= 1. आकंपित - स्वतः भिक्षालब्धि से युक्त होने से आचार्य की प्रासुक और उद्गमादि दोषों से रहित आहार-पानी के द्वारा वैयावृत्त्य करना, पिंछी, कमंडलु वगैरह उपकरण देना, कृतिकर्म वंदना करना इत्यादि प्रकार से गुरु के मन में दया उत्पन्न करके दोषों को कहता है सो आकंपित दोष से दूषित है॥563॥
2. अनुमानित - हे प्रभो! आप मेरा सामर्थ्य कितना है यह तो जानते ही हैं, मेरी उदराग्नि अतिशय दुर्बल है, मेरे अंग के अवयव कृश हैं, इसलिए मैं उत्कृष्ट तप करने में असमर्थ हूं, मेरा शरीर हमेशा रोगी रहता है। यदि मेरे ऊपर आप अनुग्रह करेंगे, अर्थात् मेरे को आप यदि थोड़ा-सा प्रायश्चित्त देंगे तो मैं अपने संपूर्ण अतिचारों का कथन करूँगा और आपकी कृपा से शुद्धि युक्त होकर मैं अपराधों से मुक्त होऊँगा ॥570-571॥ इस प्रकार गुरु मेरे को थोड़ा-सा प्रायश्चित देकर मेरे ऊपर अनुग्रह करेंगे, ऐसा अनुमान करके माया भाव से जो मुनि पश्चात् आलोचना करता है, वह अनुमानित नामक आलोचना का दूसरा दोष है।
3. यद्दृष्ट - जो अपराध अन्य जनों ने देखे हैं, उतने ही गुरु के पास जाकर कोई मुनि कहता है और अन्य से न देखे गये अपराधों को छिपाता है, वह मायावी है ऐसा समझना चाहिए। दूसरों के द्वारा देखे गये हों अथवा न देखे गये हों संपूर्ण अपराधों का कथन गुरु के पास जाकर अतिशय विनय से कहना चाहिए, परंतु जो मुनि ऐसा नहीं करता है वह आलोचना के तीसरे दोष से लिप्त होता है, ऐसा समझना चाहिए ॥574-575॥
4. बादर - जिन-जिन व्रतों में अतिचार लगे होंगे उन-उन व्रतों में स्थूल अतिचारों की तो आलोचना करके सूक्ष्म अतिचारों को छिपाने वाला मुनि जिनेंद्र भगवान् के वचनों से पराङ्मुख हुआ है ऐसा समझना चाहिए ॥577॥
5. सूक्ष्म - जो छोटे-छोटे दोष कहकर बड़े दोष छिपाता है, वह मुनि भय, मद और कपट इन दोषों से भरा हुआ जिनवचन से पराङ्मुख होता है। बड़े दोष यदि मैं कहूँगा तो आचार्य मुझे महा प्रायश्चित्त देंगे, अथवा मेरा त्याग कर देंगे, ऐसे भय से कोई बड़े दोष नहीं कहता है। मैं निरतिचार चारित्र हूं ऐसा समझकर स्थूल दोषों को कोई मुनि कहता नहीं, कोई मुनि स्वभाव से ही कपटी रहता है अतः वह भी बड़े दोष कहता नहीं, वास्तव में ये मुनि जिनवचन से पराङ्मुख हैं ॥581॥
6. प्रच्छन्न - यदि किसी मुनि को मूलगुणों में अर्थात् पाँच महाव्रतों में और उत्तर गुणों में तपश्चरण में अनशनादि बारह तपों में अतिचार लगेगा तो उसको कौन-सा तप दिया जाता है, अथवा किस उपाय से उसकी शुद्धि होती है ऐसा प्रच्छन्न रूप से पूछता है, अर्थात् मैंने ऐसा-ऐसा अपराध किया है उसका क्या प्रायश्चित्त है? ऐसा न पूछकर प्रच्छन्न पूछता है, प्रच्छन्न पूछकर तदनंतर मैं उस प्रायश्चित्त का आचरण कहूँगा, ऐसा हेतु उसके मन में रहता है। ऐसा गुप्त रीति से पूछकर जो साधु अपनी शुद्धि कर लेता है वह आलोचना का छठा दोष है ॥584-586॥
7. शब्दाकुलित अथवा बहुजन - पाक्षिक दोषों की आलोचना, चातुर्मासिक दोषों की आलोचना और वार्षिक दोषों की आलोचना, सब यति समुदाय मिलकर जब करते हैं तब अपने दोष स्वेच्छा से कहना यह बहुजन नाम का दोष है। यदि अस्पष्ट रीति से गुरु को सुनाता हुआ अपने दोष मुनि कहेगा तो गुरु के चरण सान्निध्य में उसने सातवाँ शब्दाकुलिक दोष किया है। ऐसा समझना ॥590-591॥
8. बहुजन-पृच्छा - आचार्य के द्वारा (आचार्य के द्वारा) दिये हुए प्रायश्चित् में अश्रद्धान करके यह आलोचक मुनि यदि अन्य को पूछेगा अर्थात् आचार्य महाराज ने दिया हुआ प्रायश्चित्त योग्य है या अयोग्य है ऐसा पूछेगा तो यह आलोचना का बहुजन पृच्छा नामक आठवाँ दोष होगा ॥596॥
9. अव्यक्त - और मैंने इसके (आगम बाल वा चारित्र बाल मुनि के) पास संपूर्ण अपराधों की आलोचना की है मन, वचन, काय से और कृत, कारित, अनुमोदना से किये हुए अपराधों की मैनें आलोचना की है ऐसे जो समझता है, उसकी यह आलोचना करना नौवें दोष से दृष्ट हैं ॥599॥
10. तत्सेवी - पार्श्वस्थ मुनि, पार्श्वस्थ मुनि के पास जाकर उसको अपने दोष कहता है, क्योंकि यह मुनि भी सर्व व्रतों मे मेरे समान दोषों से भरा हुआ है ऐसा वह समझता है। यह मेरे सुखिया स्वभाव को और व्रतों के अतिचारों को जानता है, इसका और मेरा आचरण समान है, इसलिए यह मेरे को बड़ा प्रायश्चित न देगा ऐसा विचार कर वह पार्श्वस्थ मुनि गुरु को अपने अतिचार कहता नहीं और समान शील को अपने दोष बताता है। यह पार्श्वस्थ मुनि कहे हुए संपूर्ण अतिचारों के स्वरूप को जानता है, ऐसा समझकर व्रत भ्रष्टों से प्रायश्चित्त लेना यह आगम निषिद्ध तत्सेवी नाम का दसवाँ दोष हैं ॥601-603॥

(राजवार्तिक अध्याय 9/22/2/621/1), (चारित्रसार पृष्ठ 138/3), (दर्शनपाहुड/टीका 9 में उद्धृत), ( अनगार धर्मामृत अधिकार 7/40/44)

3. आलोचना निर्देश

1. आलोचना वीतरागी गुरु के ही समक्ष की जानी चाहिए

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा /686..।

आलोयणा वि हु पसत्थमेव कादव्विया तत्थ ॥586॥ ...आलोचनागोचाराद्यतिचारविषया। तथा क्षपकसमीपे। परत्थमेव कादव्वा यथासौ न शृणोति तथा कार्यो। बहुषु युक्ताचारेषु सूरिषु सत्सु।

= योग्य आचारों को जानने वाले आचार्यों के पास ही सूक्ष्म अतिचार विषयक आलोचना करना हो तो वह भी प्रशस्त ही करनी चाहिए अर्थात् वह क्षपक सुन न सके ऐसी आलोचना करनी चाहिए।

2. आलोचना सुनने की विधि

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 560

पाचीणोदीचिमुहो आयदणमुहो व सुहणिसण्णो हु ।..॥560॥ निर्व्याकुलमासीनस्य यत् श्रवणं तदालोचयितुः सम्माननं। यथा कथंचिच्छ्रवणे मयि अनादरो गुरोरिति नोत्साहः परस्य स्यात्।

= पूर्वाभिमुख, उत्तराभिमुख अथवा जिनमंदिराभिमुख होकर सुख से बैठकर आचार्य आलोचना सुनते हैं। अथवा निर्व्याकुल बैठकर गुरु आलोचना सुनते हैं, इस प्रकार से सुनने से आलोचना करने वाले का सम्मान होता है। इधर-उधर लक्ष देकर सुनने से गुरु का मेरे संबंध में अनादर भाव है ऐसी आलोचक की समझ होगी, जिससे दोष कहने में आलोचना करने वाले का उत्साह नष्ट होगा।

3. एक आचार्य को एक ही शिष्य की आलोचना सुननी चाहिए

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 560.

..आलोयण पडिच्छदि एक्को एक्कस्स विरहम्मि। एक एव शृणुयात्सुरिर्लज्जापरो बहूनां मध्ये नात्मदोषं प्रकटयितुमीहते। चित्तखेदश्चास्य भवति। तथा कथयतः एकस्यैवालोचनां शृणुयात्। दुःखधारत्वाद्यु गमदनेकवचनसंदर्भस्य। तद्दोषनिग्रहं नायं वराक प्रतीच्छति।

= आचार्य एक क्षपक की ही आलोचना सुनता है। एक ही आचार्य एक के दोष सुने, यदि बहुत गुरु सुनने बैठेंगे तो आलोचना करने वाला क्षपक लज्जित होकर अपने दोष कहने के लिए तैयार होने पर भी उसके मन में खेद उत्पन्न होगा। अतः एक ही आचार्य एक ही के दोष सुने, एक काल में एक आचार्य अनेक क्षपकों की आलोचना सुनने की इच्छा न करें, क्योंकि अनेकों का वचन ध्यान में रखना बड़ा कठिन कार्य है। इसलिए उनके दोष सुनकर योग्य प्रायश्चित्त नहीं दे सकेगा।

4. आलोचना एकांत में सुननी चाहिए

भगवती आराधना / विजयोदयी टीका / गाथा 560

...आलोयणं पडिच्छदि..विरहम्मि ॥569॥ इत्यनेनैव गत्वाद्विरहम्मि इति वचनं निरर्थक। यद्यन्येऽपि तत्र स्युर्न एकेकैव श्रुतं स्यात्। न लज्जत्ययमस्य अपराधश्चास्य अनेनावगत एवेति नान्यस्य सकाशे शृणुयात् इति। एतत्सूच्यते विरहम्मि एकांते आचार्यशिक्षेति।

= एकांत में ही आचार्य आलोचना सुनता है ॥560॥ प्रश्न - (एक समय में एक ही शिष्य की तथा एक ही आचार्य आलोचना सुने उपरोक्त) इतने विवेचन से ही एकांत में गुरु के बिना अन्य कोई नहीं होगा ऐसे समय में आलोचना सुननी चाहिए तथा करनी चाहिए' ऐसा सिद्ध होता है अतः `विरहम्मि' यह पद व्यर्थ हैं? उत्तर - यदि वहाँ अन्य भी होंगे तो आलोचक के दोष बाहर फूटने संभव हैं, एक गुरु यदि होंगे तो उस स्थान में प्रच्छन्न रीति से दूसरे का प्रवेश होना योग्य नहीं है, यह सूचित करने के लिए आचार्य ने `विरहम्मि' ऐसा पद दिया है।

5. आलोचना का माहात्म्य

राजवार्तिक अध्याय 9/22/2/621/13

लज्जापरपरिभवादिगणनया निवेद्यातिचारं यदि न शोधयेद् अपरोक्षितायव्ययाधमर्णवदवसीदति। महदपि तपस्कर्म अनालोचनपूर्वकम् नाभिप्रेतफलप्रदम् आविरिक्तकायगतौषधवत् कृतानालोचनस्यापि गुरुमतप्रायश्चित्तमकुर्वतोऽपरिकर्मसस्यवत् महाफलं न स्यात्। कृतालोचनचित्तगतं प्रायश्चित्तं परिमृष्टदर्पणतलरूपवत् परिभ्राजते।

= लज्जा और पर तिरस्कार आदि के कारण दोषों का निवेदन करके भी यदि उनका शोधन नहीं किया जाता है तो अपनी आमदनी और खर्च का हिसाब न रखनेवाले कर्जदार की तरह दुःख का पात्र होना पड़ता है। बड़ी भारी दुष्कर तपस्याएँ भी आलोचना के बिना उसी तरह इष्ट फल नहीं दे सकती जिस प्रकार विरेचन से शरीर मल की शुद्धि किये बिना खायी गयी औषधि। आलोचना करके भी यदि गुरु के द्वारा दिये गये प्रायश्चित्त का अनुष्ठान नहीं किया जाता है। तो वह बिना सँवारे ध्यान की तरह महाफलदायक नहीं हो सकता। आलोचना युक्त चित्त से किया गया प्रायश्चित्त माँजे हुए दर्पण के रूप की तरह निखरकर चमक जाता है।

6. अन्य संबंधित विषय

• निश्चय व्यवहार आलोचना की मुख्यता गौणता - देखें चारित्र 1.10

• सातिचार आलोचना मायाचारी है - देखें माया - 2

• किस अपराध में आलोचना प्रायश्चित किया जाता है - देखें प्रायश्चित्त

• तदुभय प्रायश्चित्त - देखें प्रायश्चित्त#1.3 ]



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पुराणकोष से

प्रायश्चित्त के नौ भेदों में प्रथम भेद । इसमें दस प्रकार के दोषों को छोड़कर प्रमाद से किये हुए दोषों का संपूर्ण रूप से गुरु के समक्ष निवेदन किया जाता है । महापुराण 20.189-203 हरिवंशपुराण - 64.28,32


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