• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

कर्मभूमि

From जैनकोष

वृषभदेव ने कृषि आदि छ: कर्मों की व्यवस्था इस भरतक्षेत्र की भूमि में की थी । यह भूमि इसी नाम से विख्यात है । महापुराण 16.2249, हरिवंशपुराण - 3.112 यहाँ उत्पन्न मनुष्य अपनी-अपनी वृत्ति की विशेषता से तीन प्रकार के होते हैं― उत्तम, मध्यम और जघन्य । इनमें शलाकापुरुष, कामदेव, विद्याधर और देवार्चित संत ये उत्तम मनुष्य तथा छठे काल के मनुष्य जघन्य और इन दोनों के बीच के मनुष्य मध्यम हैं । महापुराण 76.500-502 अढ़ाई द्वीप संबंधी कर्मभूमियाँ पंद्रह होती है । देवकुरु और उत्तरकुरु सहित विदेह, भरत तथा ऐरावत क्षेत्रों में इन कर्मभूमियों की संख्या 15 है― 5 विदेह क्षेत्र में, 5 भरत क्षेत्र में और 5 ऐरावत क्षेत्र में । पद्मपुराण - 89.106,105.162


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=कर्मभूमि&oldid=124324"
Categories:
  • पुराण-कोष
  • क
  • करणानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 14:41.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki