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कालानुयोग - संयम मार्गणा

From जैनकोष

8.संयम मार्गणा— 

मार्गणा

गुणस्थान     

नाना जीवापेक्षया

एक जीवापेक्षया

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

प्रमाण

जघन्य

विशेष

उत्कृष्ट

विशेष

नं.1

नं.2

नं.1 

नं.3

 

संयम सामान्य

 

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

148-149

अंतर्मु.

संयमी से असंयमी      

8 वर्ष कम 1 पूर्व कोड़

8 वर्ष की आयु में संयम धार उत्कृष्ट मनुष्य आयु पर्यंत संयम सहित रहे   

सामायिक छेदो.

 

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

151-152

1 समय      

उपशम श्रेणी से उतरते हुए मृत्यु

8 वर्ष कम 1 पूर्व कोड़

8 वर्ष की आयु में संयम धार उत्कृष्ट मनुष्य आयु पर्यंत संयम सहित रहे   

परिहार विशुद्धि

 

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

148-149

अंतर्मु.

 

38 वर्ष कम 1 पूर्व कोड़

सर्व लघु काल 8 वर्ष में संयम धार 30 साल पश्चात् तीर्थंकर के पादमूल में प्रत्याख्यान पूर्व को पढ़कर परिहार विशुद्धि संयत हुआ।  

सूक्ष्म सांपराय

उप.

 

35-37

1 समय      

1 जीववत्      

अंतर्मु.

जघन्यवत् प्रवाह 

 

154-155

1  समय      

प्रथम समय प्रवेश  द्वितीय समय मरण  

अंतर्मुहूर्त

इससे अधिक न रहे   

 

क्षप.

 

33-34

सर्वदा 

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

156-157

अंतर्मु.

मरण का यहाँ अभाव है      

अंतर्मुहूर्त

 

यथाख्यात

उप.

 

35-37

1 समय      

1 जीववत्      

अंतर्मु.

जघन्यवत् प्रवाह 

 

159-160

1 समय      

प्रथम समय प्रवेश द्वितीय समय मरण  

अंतर्मुहूर्त

 

 

क्षप.

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

161-162

अंतर्मु.

मरण का अभाव 

8 वर्ष कम 1 पूर्व कोड़ अंत.

संयम सामान्यवत् पर यथा योग्य अंत.पश्चात् यथाख्यात धारण करे   

संयतासंयत

 

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

148-149

अंतर्मुहूर्त

 

अंतर्मु.कम 1 पूर्व कोड़

सम्मूर्च्छिम तिर्यंच मेंढकादि की अपेक्षा    

असंयत (अभ.)

 

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

164

 —

अनादि अनंत 

 —

   —

असंयत (भव्य)

 

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

सर्वदा

विच्छेदाभाव      

 

165-166

सादि सांत 

संयत से असंयत हो पुन: संयत

अनादि सांत      

प्रथम बार संयम धारे तो

(सादि सांत) 

 

 

33-34

सर्वदा

विच्छेदाभाव

सर्वदा

विच्छेदाभाव

 

167-168

अंतर्मु.

संयत से असंयत हो पुन: संयत

अर्ध.पु.परि.

इतने काल मिथ्यात्व में रहकर पुन: सं.

संयम सामान्य

6-14

269

 —

 —

मूलओघवत्      

 —

 —

269

 —

 —

मूलोघवत्      

 —

   —

सामायिक छेदो.

6-9

270

—

 —

मूलोघवत्      

 —

 —

270

—

 —

मूलोघवत्      

  —

   —

परिहार विशुद्धि

6-7

271

 

 

मूलोघवत्

 

 

271

 

 

मूलोघवत्

 

 

सूक्ष्म सांपराय उप.क्षप.

272

 

 

मूलोघवत्

मूलोघवत्

 

272

 

 

मूलोघवत्

 

 

यथाख्यात

13-14

273

 

 

मूलोघवत्

 

 

273

 

 

मूलोघवत्

 

 

संयतासंयत      

5

274

 

 

मूलोघवत्

 

 

274

 

 

मूलोघवत्

 

 

असंयत

1-4

275

 

 

मूलोघवत्

 

 

275

 

 

मूलोघवत्

 

 

 


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