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कुंथुनाथ

From जैनकोष

Contents

  • 1 सिद्धांतकोष से
  • 2 सामान्य परिचय
  • 3 पूर्व भव सम्बंधित तथ्य
  • 4 गर्भ-जन्म कल्याणक सम्बंधित तथ्य
  • 5 दीक्षा कल्याणक सम्बंधित तथ्य
  • 6 ज्ञान कल्याणक सम्बंधित तथ्य
  • 7 निर्वाण कल्याणक सम्बंधित तथ्य
  • 8 समवशरण सम्बंधित तथ्य
  • 9 आयु विभाग
  • 10 तीर्थ संबंधी तथ्य
  • 11 पुराणकोष से

सिद्धांतकोष से


सामान्य परिचय

तीर्थंकर क्रमांक 17
चिह्न छाग
पिता सूरसेन
माता श्रीकान्‍ता
वंश कुरु
उत्सेध (ऊँचाई) 35 धनुष
वर्ण स्‍वर्ण
आयु 95000 वर्ष

पूर्व भव सम्बंधित तथ्य

पूर्व मनुष्य भव सिं‍हरथ
पूर्व मनुष्य भव में क्या थे मण्‍डलेश्‍वर
पूर्व मनुष्य भव के पिता विपुलवाहन
पूर्व मनुष्य भव का देश, नगर जम्‍बू वि.सुसीमा
पूर्व भव की देव पर्याय सर्वार्थसि.

गर्भ-जन्म कल्याणक सम्बंधित तथ्य

गर्भ-तिथि श्रावण कृष्ण 10
गर्भ-नक्षत्र कृत्तिका
गर्भ-काल अन्तिम रात्रि
जन्म तिथि वैशाख शुक्ल 1
जन्म नगरी हस्‍तनागपुर
जन्म नक्षत्र कृत्तिका
योग आग्‍नेय

दीक्षा कल्याणक सम्बंधित तथ्य

वैराग्य कारण जातिस्‍मरण
दीक्षा तिथि वैशाख शुक्ल 1
दीक्षा नक्षत्र कृत्तिका
दीक्षा काल अपराह्न
दीक्षोपवास तृतीय भक्त
दीक्षा वन सहेतुक
दीक्षा वृक्ष तिलक
सह दीक्षित 1000

ज्ञान कल्याणक सम्बंधित तथ्य

केवलज्ञान तिथि चैत्र शुक्ल 3
केवलज्ञान नक्षत्र कृत्तिका
केवलोत्पत्ति काल अपराह्न
केवल स्थान हस्‍तनागपुर
केवल वन सहेतुक
केवल वृक्ष तिलक

निर्वाण कल्याणक सम्बंधित तथ्य

योग निवृत्ति काल 1 मास पूर्व
निर्वाण तिथि वैशाख शुक्ल 1
निर्वाण नक्षत्र कृत्तिका
निर्वाण काल सायं
निर्वाण क्षेत्र सम्‍मेद

समवशरण सम्बंधित तथ्य

समवसरण का विस्तार 4 योजन
सह मुक्त 1000
पूर्वधारी 700
शिक्षक 43150
अवधिज्ञानी 2500
केवली 3200
विक्रियाधारी 5100
मन:पर्ययज्ञानी 3350
वादी 2000
सर्व ऋषि संख्‍या 60000
गणधर संख्‍या 35
मुख्‍य गणधर स्‍वयंभू
आर्यिका संख्‍या 60350
मुख्‍य आर्यिका भाविता
श्रावक संख्‍या 100000
मुख्‍य श्रोता नारायण
श्राविका संख्‍या 300000
यक्ष गन्‍धर्व
यक्षिणी महामानसी

आयु विभाग

आयु 95000 वर्ष
कुमारकाल 23750 वर्ष
विशेषता चक्रवर्ती
राज्‍यकाल 23750+23750
छद्मस्‍थ काल 16 वर्ष
केवलिकाल 23734 वर्ष

तीर्थ संबंधी तथ्य

जन्मान्तरालकाल 1/2 पल्य+5000 वर्ष
केवलोत्पत्ति अन्तराल 1/4 पल्य–9999997250 वर्ष
निर्वाण अन्तराल 1/4 पल्य–1000 को. वर्ष
तीर्थकाल 1/4 पल्य–9999997250 वर्ष
तीर्थ व्‍युच्छित्ति ❌
शासन काल में हुए अन्य शलाका पुरुष
चक्रवर्ती स्‍वयं
बलदेव ❌
नारायण ❌
प्रतिनारायण ❌
रुद्र ❌

 महापुराण /64/ श्लोक ‘‘पूर्वभव नं.3 में वत्स देश की सुसीमा के राजा सिंहरथ थे (2−3) फिर दूसरे भव में सर्वार्थसिद्धि में देव हुए (10) वर्तमान भव में 17 वें तीर्थंकर हुए।5। विशेष परिचय–देखें तीर्थंकर - 5.।


पुराणकोष से

अवसर्पिणी काल के दु:षमा सुषमा नामक चतुर्थ काल में उत्पन्न शलाकापुरुष, छठें चक्रवर्ती एवं सत्रहवें तीर्थंकर । ये सोलह स्वप्नपूर्वक कृत्ति का नक्षत्र में श्रावणकृष्णा दशमी की रात्रि के पिछले प्रहर में हस्तिनापुर के कौरववंशी एवं काश्यपगोत्री महाराज शूरसेन की रानी श्रीकांता के गर्भ में आये । वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन आग्नेय योग में इनका जन्म हुआ । क्षीरसागर के जल से अभिषेक करने के पश्चात् इंद्र ने इनका नाम कुंथु रखा । इनका जन्म तीर्थंकर शांतिनाथ के बाद आधा पल्य समय बीत जाने पर हुआ था । इनकी आयु पचानवें हजार वर्ष, शरीर की अवगाहना पैंतीस धनुष और कांति तप्त स्वर्ण के समान थी । कुमारकाल के तेईस हजार सात सी पचास वर्ष बीत जाने पर इनका राज्याभिषेक हुआ और इतना ही समय और निकल जाने पर इन्हें चक्रवर्तित्व मिला । राज्य-भोगों से विरक्त होकर इन्होंने पुत्र को राज्य दे दिया । ये विजया नामक पाल की में बैठकर सहेतुक वन में पहुँचे । वहाँ इन्होंने वेला (दो दिन का उपवास) किया । वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन सायंकाल के समय एक हजार राजाओं के साथ ये दीक्षित हुए । दीक्षित होते ही ये मन:पर्ययज्ञानी हो गये । इस समय कृत्ति का नक्षत्र था । इसी नक्षत्र मे 16 वर्ष तप करने के बाद तिलक वृक्ष के नीचे चैत्र शुक्ल तृतीया की सायं वेला में ये केवली हुए । इनके संघ में स्वयंभू आदि पैंतीस गणधर, साठ हजार मुनि, साठ हजार तीन सौ पचास आर्यिकाएँ, तीन लाख श्राविकाएँ और दो लाख श्रावक थे । एक मास की आयु शेष रहने पर ये सम्मेदगिरि आये । इन्होंने प्रतिमायोग धारण किया और वैशाख अमल प्रतिपदा के दिन रात्रि के पूर्व भाग में कृत्ति का नक्षत्र में निर्वाण प्राप्त किया । दूसरे पूर्वभव में ये वत्स देश की सुसीमा नगरी के राजा सिंहरथ थे । तपश्चर्या पूर्वक मरण होने से ये पहले पूर्वभव में सर्वार्थसिद्धि के अनुत्तर विमान में अहमिंद्र हुए । वहाँ से च्युत होकर इस पर्याय में आये और तीर्थंकर हुए । महापुराण 2. 132, 64. 2-5, 10-15, 22-28, 36-54, पद्मपुराण -5. 215,223, 20.15-35, 53, 61-68, 87, 115, 121, हरिवंशपुराण - 1.19,हरिवंशपुराण - 1.45. 20, 60.154-198, 341-349, पांडवपुराण 6.27,51 वीरवर्द्धमान चरित्र 18. 101-109


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