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केवली समुद्घात

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लघुकर्मपरिपाचनस्याशेषकर्मरेणुपरिशातनशक्तिस्वाभाव्याद्दंडकपाटप्रतरलोकपूरणानि स्वात्मप्रदेशविसर्पणत:...। समुपहृतप्रदेशविसरण:।=जिनके स्वल्पमात्र में कर्मों का परिपाचन हो रहा है ऐसे वे अपने (केवली अपने) आत्म­प्रदेशों के फैलने से कर्म रज को परिशातन करने की शक्तिवाले दंड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घात को...करके अनंतर के विसर्पण का संकोच करके...।
राजवार्तिक/1/20/12/77/19 द्रव्यस्वभावत्वात् सुराद्रव्यस्य फेनवेगबुद्​बुदाविर्भावोपशमनवद् देहस्थात्मप्रदेशानां बहि:समुद्​घातनं केवलिसमुद्​घात:।=जैसे मदिरा में फेन आकर शांत हो जाता है उसी तरह समुद्​घात में देहस्थ आत्मप्रदेश बाहर निकलकर फिर शरीर में समा जाते हैं, ऐसा समुद्घात केवली करते हैं।
धवला 13/2/61/300/9 दंड-कवाड-पदर-लोगपूरणाणि केवलिसमुग्घादो णाम।=दंड, कपाट, प्रतर और लोकपूरणरूप जीव प्रदेशों की अवस्था को केवलिसमुद्घात कहते हैं। (पंचास्तिकाय / तात्पर्यवृत्ति/153/221)।

       

देखें केवली - 7।


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