• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 106 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



सम्मत्तं सद्दहणं भावाणं तेसिमधिगमो णाणं । (106)

चारित्तं समभावो विसयेसु विरूढ़मग्गाणं ॥115॥

अर्थ: 

भावों का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है, उनका अधिगम ज्ञान है, विरुढ मार्गियों का विषयों में समभाव चारित्र है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[सम्मत्तं] सम्यक्त्व है । कर्तारूप क्या सम्यक्त्व है ? [सद्दहणं] मिथ्यात्व के उदय से उत्पन्न विपरीत अभिनिवेश से रहित श्रद्धान सम्यक्त्व है । किनका श्रद्धान सम्यक्त्व है ? [भावाणं] पंचास्तिकाय, षट्द्रव्य के विकल्प-रूप जीव-अजीव दो तथा जीव-पुद्गल के संयोग-रूप परिणाम से उत्पन्न आस्रव आदि सात पदार्थ इस-प्रकार कहे गए लक्षण-वाले भावों का, जीवादि नव पदार्थों का श्रद्धान सम्यक्त्व है । नवपदार्थों का विषय-भूत यह व्यवहार-सम्यक्त्व है । यह किस विशेषता-वाला है ? छद्मस्थ अवस्था में शुद्ध जीवास्तिकाय की रुचि-रूप निश्चय सम्यक्त्व का, आत्म-विषयक स्व-संवेदन ज्ञान का परम्परा से बीज है । वह स्व-संवेदन ज्ञान भी केवल-ज्ञान का बीज है । [चारित्तं] चारित्र है । वह चारित्र क्या है ? [समभावो] समभाव चारित्र है । किनमें समभाव चारित्र है ? [विसयेसु] विषयों में, इन्द्रिय-मनोगत सुख-दु:ख की उत्पत्ति-रूप शुभाशुभ विषयों में समभाव चारित्र है । वह किनके होता है ? [विरूढ़मग्गाणं] पूर्वोक्त सम्यक्त्व-ज्ञान के बल से समस्त अन्य मार्गों से छूटकर विशेष-रूप से रूढ़-मार्गियों (मोक्षमार्ग में रूढ़ जीवों) को, परिज्ञात-मोक्ष-मार्गियों को होता है।

यह व्यवहार चारित्र बहिरंग साधक होने से वीतराग चारित्र-रूप भावना से उत्पन्न परमात्म-तृप्तिरूप निश्चय सुख का बीज है, और वह निश्चय सुख भी अक्षय-अनंत सुख का बीज है । यहाँ यद्यपि साध्य-साधक ज्ञापनार्थ / बताने के लिए निश्चय-व्यवहार दोनों का व्याख्यान किया है; तथापि नव पदार्थ विषय रूप व्यवहार-मोक्षमार्ग की ही मुख्यता है, ऐसा भावार्थ है ॥११५॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_106_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=115502"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki