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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 110 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



एदे जीवणिकाया पंचविहा पुढविकाइयादीया । (110)

मणपरिणामविराहिदा जीवा एगेंदिया भणिया ॥120॥

अर्थ: 

ये पृथ्वीकायिक आदि पाँच प्रकार के जीव-निकाय मन परिणाम से विरहित एकेन्द्रिय जीव हैं ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

ये पृथ्वीकायिक आदि पाँच प्रकार के प्रत्यक्षीभूत जीव-निकाय जीव हैं । वे कैसे हैं ? मन परिणाम से विरहित कहे गए हैं; मात्र मन-परिणाम से विरहित ही नहीं, अपितु एकेन्द्रिय भी कहे गए हैं । कैसे होने पर वे इसप्रकार कहे गये हैं ? वीर्यान्तराय और स्पर्शनेन्द्रियावरण के क्षयोपशम का लाभ होने से तथा शेष इन्द्रियावरण का उदय और नोइन्द्रियावरण का उदय होने पर वे इसप्रकार कहे गए हैं ।

यहाँ सूत्र में विश्व की अथवा अनेक प्रकार की उपाधि से विमुक्त / रहित शुद्ध सत्ता-मात्र का ज्ञान करनेवाले / कथन करने-वाले निश्चय-नय की अपेक्षा यद्यपि जीव पृथ्वी आदि पाँच भेदों से रहित है; तथापि व्यवहार-नय से अशुद्ध मनोगत रागादि अपध्यान से सहित तथा शुद्ध मनोगत स्व-सम्वेदन-ज्ञान से रहित होने के कारण जो बँधा हुआ एकेन्द्रिय जाति नाम-कर्म, उसका उदय होने से एकेन्द्रिय मन रहित ही होते हैं, ऐसा अभिप्राय है ॥१२०॥

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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