• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 144 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व जोगपरिणामो । (144)

तस्स सुहासुहदहणो झाणमओ जायदे अगणी ॥154॥

अर्थ: 

जिसके राग, द्वेष, मोह तथा योग परिणमन नहीं है; उसके शुभाशुभ को जलाने वाली ध्यानमय अग्नि उत्पन्न होती है ।

समय-व्याख्या: 

ध्यानस्वरूपाभिधानमेतत् ।

शुद्धस्वरूपेऽविचलितचैतन्यवृत्तिर्हि ध्यानम् ।

अथास्यात्मलाभविधिरभिधीयते ।यदा खलु योगी दर्शनचारित्रमोहनीयविपाकं पुद्गलकर्मत्वात् कर्मसु संहृत्य,तदनुवृत्तेः व्यावृत्त्योपयोगममुह्यन्तमरज्यन्तमद्विषन्तं चात्यन्तशुद्ध एवात्मनि निष्कम्पं निवेशयति, तदास्य निष्क्रियचैतन्यरूपस्वरूपविश्रान्तस्य वाङ्मनःकायानभावयतः स्वकर्मस्वव्यापारयतः सकलशुभाशुभकर्मेन्धनदहनसमर्थत्वात् अग्निकल्पं परमपुरुषार्थ-सिद्धयुपायभूतं ध्यानं जायते इति । तथा चोक्तम् -

((अज्ज वि तिरयणसुद्धाअप्पा झाएवि लहइ इंदत्तं ।

लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुआ णिव्वुदिं जंति ॥

अंतोणत्थि सुईणं कालो थोओ वयं च दुम्मेहा ।

तण्णवरि सिक्खियव्वं जं जरमरणंखयं कुणइ ॥१४६॥))

समय-व्याख्या हिंदी : 

यह, ध्यान के स्वरूप का कथन है ।

शुद्ध स्वरूप में अविचलित चैतन्य-परिणति सो वास्तव में ध्यान है । वह ध्यान प्रगट होने की विधि अब कही जाती है -- जब वास्तव में योगी, दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय का विपाक पुद्‍गल-कर्म होने से उस विपाक को (अपने से भिन्न ऐसे अचेतन) कर्मों में समेटकर, तदनुसार परिणति से उपयोग को व्यावृत्त करके (उस विपाक के अनुरूप परिणमन में से उपयोग का निवर्तन करके), मोही, रागी और द्वेषी न होने वाले ऐसे उस उपयोग को अत्यंत शुद्ध आत्मा में ही निष्कम्प रूप से लीन करता है, तब उस योगी को- जो कि अपने निष्क्रिय चैतन्य रूप स्वरूप में विश्रान्त है, वचन-मन-काया को नहीं १भाता और स्वकर्मों में १व्यापार नहीं करता उसे-सकल शुभाशुभ कर्म-रूप ईंधन को जलाने में समर्थ होने से अग्नि-समान ऐसा, २परम-पुरुषार्थ-सिद्धि के उपायभूत ध्यान प्रगट होता है ।

फ़िर कहा है कि-

((३अज्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाएवि लहइ इन्दतं

लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुआ णिव्वृर्दि जंति ॥

अंतो णत्थि सुईणं कालो थोओ वयं च दुम्मेहा

तण्णवरि सिक्खियव्वं जं जरमरणं खयं कुणइ ॥ ))

इस समय भी त्रिरत्नशुद्ध जीव, इस काल भी सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र-रूप तीन रत्नों से शुद्ध ऐसे मुनि, आत्मा का ध्यान करके इन्द्रपना तथा लौकान्तिक-देवपना प्राप्त करते हैं और वहाँ से चयकर, मनुष्यभव प्राप्त करके, निर्वाण को प्राप्त करते हैं ।

श्रुतियों का अन्त नहीं है, शास्त्रों का पार नहीं है, काल अल्प है और हम ४दुर्मेध हैं, इसलिये वही केवल सीखने योग्य है कि जो जरा-मरण का क्षय करे ।

इस प्रकार निर्जरा-पदार्थ का व्याख्यान समाप्त हुआ ॥१४४॥

अब बन्ध पदार्थ का व्याख्यान है ।

१भाना = चिंतवन करना, ध्याना, अनुभव करना ।

२व्यापार = प्रवृत्ति (स्वरूप विश्रान्त योगी को अपने पूर्वोपार्जित कर्मों में प्रवर्तन नहीं है, क्योंकि वह मोहनीय-कर्म के विपाक को अपने से भिन्न-अचेतन-जानता है तथा उस कर्मविपाक को अनुरूप परिणमन से उसने उपयोग को विमिख किया है।)

३पुरुषार्थ = पुरुष का अर्थ, पुरुष का प्रयोजन, आत्मा का प्रयोजन, आत्म-प्रयोजन। (परम-पुरुषार्थ अर्थात्‌ आत्मा का परम प्रयोजन मोक्ष है और वह मोक्ष ध्यान से सधता है, इसलिये परमपुरुषार्थ की, मोक्ष की, सिद्धि का उपाय ध्यान है।)

४दुर्मेध = अल्प-बुद्धि वाले, मन्द-बुद्धि, ठोट ।

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_144_-_समय-व्याख्या&oldid=115581"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki